Lulla Family

प्रश्नोपनिषद्

अथर्व वेद · उपनिषद्
छह जिज्ञासु, छह सवाल, और एक ऋषि जिसने जवाब देने से पहले कहा, एक बरस यहीं रहकर तप करो।

कल्पना कीजिए, एक शान्त आश्रम में सुबह की पहली किरणें पेड़ों के बीच से छन कर आ रही हैं, और छह जिज्ञासु शिष्य अपने-अपने मन में एक-एक भारी सवाल लिए, हाथ में समिधा (हवन की लकड़ी) थामे, गुरु के चरणों के पास आ बैठे हैं। ये साधारण विद्यार्थी नहीं थे। ये वे साधक थे जिन्होंने संसार के ऊपरी उत्तरों से जी भर लिया था और अब असली जड़ तक पहुँचना चाहते थे। इनके सामने विराजमान हैं ऋषि पिप्पलाद (आचार्य, जो ब्रह्मविद्या के ज्ञाता माने जाते हैं), जो उन्हें तुरन्त ज्ञान नहीं थमा देते; पहले वे कहते हैं कि एक वर्ष श्रद्धा, तप और ब्रह्मचर्य के साथ हमारे पास रहिए, फिर जो भी आपके मन में हो, पूछिए। यही धैर्य भरी प्रतीक्षा इस उपनिषद् का पहला पाठ है।

यह उपनिषद् अथर्ववेद की परम्परा से आता है, और इसका नाम ही इसकी आत्मा बता देता है: “प्रश्न” यानी सवाल, इसलिए “प्रश्नोपनिषद्” वह उपनिषद् है जो छह गहरे प्रश्नों और उनके उत्तरों के रूप में बुना गया है। छह शिष्य बारी-बारी ऋषि पिप्पलाद से पूछते हैं, और हर उत्तर हमें थोड़ा और भीतर ले जाता है: यह सारी सृष्टि (समस्त रचना) आख़िर कहाँ से उपजी, हमारे भीतर का प्राण (जीवन-शक्ति) क्या है और देह में कैसे बँटा रहता है, नींद में हम कहाँ चले जाते हैं और स्वप्न किसका खेल है, ॐ (परम ध्वनि-प्रतीक) का ध्यान हमें किस लोक तक पहुँचाता है, और अन्त में वह सोलह कलाओं वाला पुरुष (सोलह अंशों में व्यक्त परम चेतन) कौन है जिसमें यह सब लौट कर समा जाता है। इन छह सवालों की डोर पकड़ कर यह उपनिषद् एक ही मूल प्रश्न की ओर ले चलता है, कि इस दिखती हुई दुनिया के पीछे वह अविनाशी सत्य क्या है, जिसे जान लेने पर और कुछ जानना शेष नहीं रहता।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

पिप्पलाद: अथर्व-परम्परा के ऋषि, जिन्होंने छहों शिष्यों को एक बरस तप के बाद उत्तर दिए।

छह जिज्ञासु: सुकेशा, सत्यकाम, गार्ग्य (सौर्यायणी), कौसल्य, भार्गव वैदर्भि और कबन्धी कात्यायन, ब्रह्म की खोज में आए विद्यार्थी।

सृष्टि और प्राण

पहला प्रश्न: प्रजा कहाँ से जन्मती है

Six earnest young seekers in white dhotis, each carrying sticks of sacred firewood, bowing before the seated forest-sage Pippalada in a sunlit ashram clearing at dawn.

दृश्य कुछ यों है। छह जिज्ञासु, हाथ में समिधा (हवन की लकड़ी) लिए, ऋषि पिप्पलाद के आश्रम पहुँचते हैं। ये वही पिप्पलाद हैं जिन्हें यह उपनिषद् अपना गुरु मानता है। आगन्तुक ब्रह्म की खोज में हैं, और गुरु उनसे कहते हैं कि अभी एक वर्ष और तप (साधना और संयम का अभ्यास), ब्रह्मचर्य (इन्द्रियों पर अनुशासन) और श्रद्धा के साथ यहाँ रहिए, फिर जो मन में प्रश्न उठें, वे आप पूछिए। बरस बीतता है, और सबमें पहले उठते हैं कबन्धी कात्यायन, यानी कत्य-वंश के वह शिष्य जिनके मन में सृष्टि का मूल सवाल कौंध रहा है। वे पूछते हैं, हे भगवन्, यह सारी प्रजा (जीव-जगत्) आख़िर कहाँ से जन्मती है?

पिप्पलाद उत्तर एक पुरानी कथा से देते हैं। आरम्भ में प्रजापति (सृष्टि के स्वामी, रचयिता) ने प्रजा रचने की कामना की। उन्होंने तप किया, और उस तप से एक जोड़ा रचा, रयि और प्राण। रयि वह है जो रूप देता है, ठोस करता है, भरता है, यानी पदार्थ और अन्न (खाद्य, स्थूल वस्तु); प्राण वह है जो चेतना देता है, गति देता है, जिलाता है, यानी जीवन-शक्ति। प्रजापति ने सोचा कि इन्हीं दो से अनेक प्रजा बनेगी।

Cosmic tableau of the Prajapati pair: a radiant golden Sun (prana) and a silver waxing-waning Moon (rayi) facing each other across the sky over a world of living creatures, day and night divided below.

फिर यह उपनिषद् इस जोड़े को आकाश के दो दीयों से जोड़ता है। प्राण को सूर्य कहा गया और रयि को चन्द्रमा। सूर्य अपनी किरणों से ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं में जीवों को जिलाता हुआ उगता है, इसलिए वह सब प्राणियों का प्राण है। चन्द्रमा वह घट है जो भरता और घटता है, अन्न और रस का कोष; इसी से रयि का स्वरूप पुष्ट होता है। दिन और रात, उजाला और साया, खाद्य और खाने वाला, ये सब इसी एक जोड़े के दो पहलू हैं। संसार में जो कुछ रूप धरता है वह रयि का अंश है, और जो कुछ उस रूप में साँस लेता है वह प्राण का अंश है।

स्वामी कृष्णानन्द इस प्रसंग का सार बड़ी सादगी से कसते हैं। उनके अनुसार यह उपनिषद् कहता है कि ईश्वर वही परम प्रजापति या रचयिता है, जिसमें जगत् का पदार्थ और शक्ति, दोनों एक साथ घुले-मिले रहते हैं। दूसरे शब्दों में, रयि और प्राण कोई दो अलग सत्ताएँ नहीं हैं, वे एक ही रचयिता के भीतर बँधे दो रुख़ हैं; और स्वामी जी के अनुसार वही समूचा ईश्वर प्रणव अर्थात् ॐकार (ॐ की ध्वनि) में प्रतीक रूप से समाया हुआ है। पदार्थ बिना शक्ति के जड़ है और शक्ति बिना पदार्थ के निराधार; जगत् इन्हीं दोनों के अटूट गठजोड़ का नाम है।

अब प्रश्न का दूसरा सिरा। यदि सब कुछ इसी जोड़े से जन्मता है, तो मरने के बाद जीव जाता कहाँ है? यहाँ परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) इस अंश को दो राहों के रूप में खोलती है, और इन्हें सूर्य की दो चालों से जोड़ती है। एक चाल दक्षिणायन है, जब सूर्य दक्षिण की ओर ढलता जान पड़ता है; यह रयि की, चन्द्रमा की राह है। दूसरी चाल उत्तरायण है, जब सूर्य उत्तर की ओर चढ़ता है; यह प्राण की, सूर्य की राह है।

परम्परा के अनुसार जो लोग कर्म और दान में लगे रहते हैं, यज्ञ करते हैं, कुआँ-तालाब बनवाते हैं, इष्ट-पूर्त (धर्म-कर्म और लोक-हित के काम) को ही जीवन का सार मानते हैं, वे मरने पर चन्द्र-लोक तक पहुँचते हैं। वहाँ अपने पुण्य का फल भोगते हैं, और फल चुक जाने पर लौट आते हैं; यह आना-जाना बना रहता है। पर जो तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से भीतर मुड़कर सत्य को खोजते हैं, वे सूर्य-लोक की राह पकड़ते हैं, जहाँ से लौटना नहीं होता; उसी को अमृत (अमरता, फिर न जन्मने की अवस्था) कहा गया है। इसीलिए कथा के अन्त में सूर्य की महिमा गाई जाती है, क्योंकि वही प्राण उस अमर राह का द्वार है।

सार: सारी सृष्टि एक ही जोड़े का खेल है, रयि और प्राण, पदार्थ और चेतना, चन्द्रमा और सूर्य; और स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार ये दोनों एक ही रचयिता के भीतर घुले हुए हैं। बाहर भले अनगिनत रूप दिखें, राह सिर्फ़ दो हैं। केवल फल पाने को किए कर्म घुमावदार लौटती चन्द्र-राह देते हैं, जबकि भीतर मुड़कर सत्य खोजना वह सूर्य-राह है, जहाँ से फिर लौटना नहीं पड़ता।

दूसरा प्रश्न: सबको थामने वाला प्राण

पिप्पलाद ऋषि के आश्रम में जो छह जिज्ञासु एक वर्ष तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से रहकर ठहरे थे, उनमें दूसरे का नाम था भार्गव। विदर्भ देश से आए थे, इसलिए वैदर्भि कहलाते हैं। पहले प्रश्न का उत्तर सुनकर इनके मन में जिज्ञासा उठी, और हाथ जोड़कर इन्होंने पूछा कि भगवन्, यह जो हमारा शरीर खड़ा है, इसको कौन-कौन देवता (देह के भीतर काम करती हुई शक्तियाँ) थामे रखते हैं, उनमें कौन उजाला फैलाता है, और उन सबमें श्रेष्ठ कौन है।

पिप्पलाद ऋषि ने जो उत्तर दिया, उसमें एक भीतरी सभा का दृश्य खुलता है। यहाँ देवता कोई बाहर बैठी मूरतें नहीं हैं। ये वे शक्तियाँ हैं जो देह के भीतर अपना-अपना काम करती हैं, आकाश (खुली जगह), वायु (हवा), अग्नि (ताप), जल और पृथ्वी (ठोस आधार), तथा हमारी इन्द्रियाँ (देखने, सुनने, बोलने, सोचने की शक्तियाँ) और मन। इन सबने मिलकर इस देह-रूपी घर को सँभाल रखा है, जैसे खंभे और दीवारें मिलकर छत को।

फिर इन्हीं शक्तियों में एक होड़ छिड़ती है। हर इन्द्रिय अपनी बड़ाई गाने लगती है। वाणी (बोलने की शक्ति) कहती है कि हम न हों तो यह देह गूँगी पड़ी रहे। आँख कहती है कि हम न हों तो सब अँधेरा। कान, मन, सब अपनी-अपनी अहमियत जताते हैं, मानो हर एक यही समझे बैठा हो कि इस घर का असली मालिक हम ही हैं।

Inside a translucent body-as-house, the central Prana rises like a queen bee lifting from her honeycomb and every other bee (the senses) swarms up to follow, the personified sense-deities scattering in alarm.

तब बीच में उठता है मुख्य प्राण (वह केन्द्रीय जीवन-शक्ति जिससे साँस और हर क्रिया चलती है)। इस होड़ से कुछ खिन्न होकर वह उठने लगता है, मानो देह छोड़कर जाने को तैयार हो। और जैसे ही प्राण ज़रा-सा डोलता है, सारी इन्द्रियाँ एक साथ डगमगा जाती हैं, उनकी सारी अकड़ बैठ जाती है। यहीं उपनिषद् वह रूपक रखता है जो आज भी मन में टँक जाता है, जैसे छत्ते की रानी-मक्खी उड़ चले तो उसके पीछे सारी मक्खियाँ छत्ता छोड़कर उड़ पड़ती हैं, और वह बैठ जाए तो सब फिर बैठ जाती हैं, वैसे ही प्राण के टिकने पर ही ये सारी शक्तियाँ अपनी-अपनी जगह टिकी रहती हैं।

परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) इस प्रसंग को ऐसे खोलती है। इन्द्रियों का यह झगड़ा असल में हमारे भीतर के अहंकार (मैं-ही-बड़ा का भाव) का चित्र है। हर इन्द्रिय को लगता है कि वह स्वतन्त्र है, अपने बल पर चलती है। पर परम्परा बताती है कि उनकी सारी सामर्थ्य उधार की है, वह प्राण से मिलती है। जैसे कोई शक्ति-स्रोत बन्द हो जाए तो घर के सारे दीये एक साथ बुझ जाएँ, वैसे ही प्राण के हटते ही देखना, सुनना, बोलना, सोचना, सब एक झटके में ठहर जाते हैं। इसीलिए प्राण को सबका आधार कहा गया। वह कोई एक इन्द्रिय भर नहीं है, वह तो वह जीवन है जिसके सहारे बाक़ी सब इन्द्रियाँ अपना खेल खेलती हैं।

परम्परा एक और छवि यहाँ जोड़ती है, अग्नि की। जैसे एक ही आग कई काठ-कोयलों में बँटकर हर एक में अलग-अलग जलती दिखती है, फिर भी आग एक ही है, वैसे ही एक प्राण देह में बँटकर पाँच रूपों में काम करता है (साँस लेना, मल-त्याग, पचाना, ऊपर ले जाना, और देह में फैलकर थामना), पर भीतर से वह एक ही जीवन-ज्योति है जो सबमें जल रही है। यही कारण है कि सूरज भी, और दिशाएँ, और पृथ्वी, और देह की हर शक्ति, सब प्राण के ही अलग-अलग चेहरे ठहरते हैं। जो इस प्राण को इस तरह सबमें बहता हुआ पहचान ले, परम्परा कहती है, उसकी सन्तान और पशुधन कभी क्षीण नहीं होते, और वह अमृत का भागी बनता है।

सार: इन्द्रियाँ अपनी-अपनी बड़ाई में चाहे जितना अकड़ें, उनकी पूरी ताक़त उधार की है। जिस प्राण के डोलते ही सब डगमगा जाएँ, और जिसके टिकने पर ही सब टिके रहें, वही असली आधार है, अग्नि की तरह सबमें एक होकर जलता हुआ। अपने भीतर उसी एक जीवन को पहचान लेना ही ठहराव की जड़ है।

तीसरा प्रश्न: प्राण शरीर में कैसे बँटता है

पिप्पलाद ऋषि के आश्रम में छह जिज्ञासु एक बरस तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा बिताकर बैठे हैं, और बारी-बारी अपना प्रश्न रख रहे हैं। अब तीसरी बार जो शिष्य हाथ जोड़कर सामने आते हैं, वे हैं कौसल्य अश्वलायन (अश्वल के कुल में जन्मे साधक)। उनके मन में जीवन की परम रोज़मर्रा और गहरे-से-गहरे रहस्य वाली चीज़ का सवाल है, वही साँस जो भीतर-बाहर चल रही है। वे पूछते हैं, हे भगवन्, यह प्राण (जीवन-शक्ति, जिससे शरीर जीता है) कहाँ से जन्म लेता है? यह इस देह में आता कैसे है, और भीतर आकर अपने को बाँटता किस तरह है? किस राह से यह देह छोड़कर जाता है, और बाहर रहकर बाहरी जगत् को तथा भीतर रहकर इन्द्रियों को कैसे थामे रखता है?

पिप्पलाद ऋषि उत्तर का आरम्भ बड़ी गहरी बात से करते हैं। आप जो प्रश्न ऊँचे पूछ रहे हैं, उसी ऊँचाई से उत्तर भी आएगा। परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) इस उत्तर को यों खोलती है, कि प्राण किसी जड़ हवा से नहीं उपजता; वह आत्मा (भीतर बैठा शुद्ध चैतन्य) से जन्म लेता है। जैसे किसी पुरुष की छाया उस पुरुष से अलग नहीं होती और फिर भी फैली दिखती है, वैसे ही प्राण आत्मा की ही एक छाया है, उसी की इच्छा से इस देह में उतरता है। इसी से एक मरम की बात निकलती है, कि साँस केवल जीव-विज्ञान का काम नहीं, उसके पीछे चेतना का संकल्प खड़ा है।

अब प्राण देह में आकर अपने को पाँच रूपों में बाँट लेता है, मानो एक राजा अपने राज्य के पाँच अलग कामों पर पाँच अलग अधिकारी बैठा दे। स्वामी कृष्णानन्द इस बँटवारे को बड़ी साफ़-साफ़ गिनाते हैं। उनके अनुसार जब हम साँस बाहर छोड़ते हैं, तब प्राण (बाहर की ओर चलती ऊर्जा) सक्रिय रहता है; और जब साँस भीतर खींचते हैं, तब अपान (भीतर की ओर खींचती ऊर्जा) काम करता है। तीसरा है व्यान (पूरे शरीर में फैली ऊर्जा), जो रक्त को घुमाता है और देह के हर कोने में जीवित होने का वही एहसास भर देता है। पाँचवाँ है समान (नाभि-क्षेत्र की ऊर्जा), जो नाभि में बैठकर गरमी पैदा करता है, जठर-रस को जगाता है, भूख उठाता है और खाए हुए को पचाता है।

इन पाँचों में स्वामी कृष्णानन्द उदान (ऊपर की ओर ले जाती ऊर्जा) पर अलग से ठहरते हैं, और इसके तीन काम बताते हैं। पहला, जब हम मुँह में अन्न रखते हैं तो वही उदान उसे कण्ठ से नीचे उतारकर निगलवाता है। दूसरा, यही उदान हमारी जीव-चेतना (अलग-अलग व्यक्ति-रूप में सिमटी चेतना) को गहरी नींद की ओर धकेल देता है, मानो दिन भर के जागरण को थपककर सुला दे। और तीसरा, उनके अनुसार उदान का गहरे-से-गहरा काम मृत्यु के समय आता है, जब यही उदान सूक्ष्म प्राणमय देह को इस स्थूल शरीर से अलग कर देता है। यानी जिस ऊर्जा से हम रोज़ कौर निगलते और नींद में उतरते हैं, उसी ऊर्जा के हाथ में अन्त-यात्रा की डोर भी है।

परम्परा इस अन्त-यात्रा का नक़्शा और खोलकर रखती है। कहा जाता है कि हृदय से एक सौ एक (101) नाड़ियाँ (प्राण के बहने की सूक्ष्म नलियाँ) निकलती हैं, और उन्हीं में से एक ऊपर सिर की ओर जाती है। मरते समय उदान जीव को किसी एक नाड़ी से लेकर ऊपर उठता है, और कौन-सी राह खुलेगी यह जीवन भर के कर्मों और जाते-जाते मन में टिके अन्तिम भाव पर निर्भर करता है। पुण्य की चाल हो तो शुभ लोकों की ओर, पाप की चाल हो तो हीन गति की ओर, और दोनों मिले-जुले हों तो फिर मनुष्य-लोक की ओर। जैसा अन्तिम विचार, वैसी आगे की गति; इसीलिए साधक का सारा अभ्यास इसी बात की तैयारी है कि अन्तिम घड़ी में मन किस ओर ठहरे।

तो कौसल्य के प्रश्न का पूरा उत्तर एक ही सूत्र में बँध जाता है। प्राण आत्मा से जन्मता है, पाँच अधिकारियों के रूप में देह का सारा कारोबार सँभालता है, हृदय की एक सौ एक नाड़ियों के जाल में बहता है, और जिस उदान से हम रोज़ जीते हैं वही एक दिन हमें यहाँ से ले भी जाता है। साँस छोटी-सी दिखती है, पर उसकी जड़ में चेतना है और उसके सिरे पर अगली यात्रा।

सार: जो साँस हमें मिली है, वह जड़ हवा नहीं, आत्मा की छाया है; वह पाँच रूपों में बँटकर पूरे जीवन का काम चलाती है, और जिस उदान से हम रोज़ कौर निगलते और नींद में उतरते हैं, वही अन्तिम घड़ी में हमें ले जाता है। इसलिए जीवन भर मन को जहाँ साधते रहेंगे, अन्त में चेतना उसी राह पर बहेगी।

नींद, ॐ, और पुरुष

चौथा प्रश्न: नींद में कौन जागता है

आश्रम में चौथे शिष्य की बारी आती है। सौर्यायणी गार्ग्य (सूर्य के गोत्र में जन्मे एक जिज्ञासु ब्राह्मण) हाथ जोड़े गुरु ऋषि पिप्पलाद (इस प्रश्नोपनिषद् के आचार्य, जिनसे छह विद्यार्थी एक-एक करके प्रश्न पूछते हैं) के सामने बैठते हैं। उनका प्रश्न रोज़ की एक मामूली घटना से उठता है, मगर उसकी जड़ बहुत गहरी है। वह पूछते हैं कि जब आदमी सो जाता है, तो उसमें असल में सोता कौन है और जागता कौन रहता है? सपने किसको दिखते हैं? और गहरी नींद का वह सुख आख़िर भोगता कौन है?

ऋषि पिप्पलाद उत्तर को तीन अवस्थाओं में खोलते हैं। पहली है जागृत-अवस्था (जागने की हालत), जिसमें हम इस समय बैठे हैं। स्वामी कृष्णानन्द इसे यों समझाते हैं कि जागते आदमी की चेतना उन्नीस द्वारों से बाहर की दुनिया को छूती और भोगती है। ये उन्नीस द्वार हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (देखना, सुनना, सूँघना, चखना, छूना), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, वाणी, पैर और दो अन्य क्रिया के अंग), पाँच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, यानी साँस और शरीर की पाँच जीवनी-धाराएँ), और मन की चार वृत्तियाँ (मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त)। इन्हीं उन्नीस मुँहों से चेतना संसार रूपी भोजन खाती रहती है। उनके अनुसार जागृति में स्थूलतम परत, यानी अन्नमय कोष (अन्न से बना भौतिक शरीर) पूरे ज़ोर पर रहता है।

A sleeping man on a mat while above him his luminous dreaming self conjures an entire imagined world (people, rivers, his own birth and death) spun out of the mind alone, the waking senses dimmed and withdrawn.

दूसरी अवस्था स्वप्न (सपने की हालत) है। स्वामी कृष्णानन्द का कहना है कि सपने में बाहर की असली दुनिया हट जाती है, स्थूल शरीर की चेतना सो जाती है, मगर इन्द्रियाँ चुपचाप मन में समा जाती हैं। अब इन्द्रियों की कोई बाहरी मदद नहीं रहती, फिर भी मन अकेला ही अपने पुराने छापों से एक पूरा संसार रच लेता है। उनके शब्दों में, सपने में भी वही उन्नीस द्वार चलते हैं, बस अब वे मन के बनाए होते हैं। सपने की आँखें, सपने के कान, सपने के हाथ-पैर, सपने का देश और काल, सपने के लोग। आदमी सपने में दौड़ता है, भोजन करता है, यहाँ तक कि अपना जन्म और अपनी मृत्यु तक देख लेता है। यह सारा जगत मन ने अपने ही संस्कारों (पुराने अनुभवों की छाप) से गढ़ा होता है, किसी बाहरी वस्तु की सहायता बिना।

तीसरी और गहरी-से-गहरी अवस्था सुषुप्ति (बिना सपने वाली गहरी नींद) है। स्वामी कृष्णानन्द इसे यों बताते हैं कि यहाँ न शरीर का बोध रहता, न मन सोचता, न बुद्धि कोई निर्णय करती, न ही यह भान रहता कि हम साँस भी ले रहे हैं। मन भी अब उस परम तेज में लीन हो जाता है, और केवल आनन्दमय कोष (आनन्द की वह बीज-परत जिसे कारण-शरीर कहते हैं) बचा रहता है। न कोई सपना, न कोई दुख, सिर्फ़ शुद्ध विश्राम। उनके अनुसार उस घड़ी हम न शरीर थे, न मन, न बुद्धि। हम केवल शुद्ध चैतन्य (मिलावट रहित विशुद्ध चेतना) के रूप में थे, और वही सत्-चित्-आनन्द (सत्ता, बोध और आनन्द का एक स्वरूप) हमारा असली रूप था। तभी तो नींद से उठकर आदमी कहता है, कितनी अच्छी नींद आई, मुझे कुछ पता ही न चला।

अब गार्ग्य का असली प्रश्न यहीं सुलझता है, कि जब वहाँ कुछ था ही नहीं, तो सुख भोगा किसने और यह बात याद किसने रखी? स्वामी कृष्णानन्द इसका एक सीधा प्रमाण देते हैं। आप सुबह उठकर पूरे विश्वास से कहते हैं कि आज भी हम वही व्यक्ति हैं जो कल थे, बीच की नींद में भी हमारी पहचान टूटी नहीं। उनके अनुसार चेतना की यही अटूट लड़ी सिद्ध करती है कि गहरी नींद में भी कोई जागता रहा, जो सबको देखता रहा। वही जागने वाला आत्मा (हमारा असली चेतन स्वरूप) है, जो तीनों हालतों का साक्षी (बिना डिगे देखने वाला गवाह) है। जागते समय यही विश्व कहलाता है, सपने में तैजस, गहरी नींद में प्राज्ञ, और इन तीनों के परे, इन सबको देखता हुआ, यही शुद्ध आत्मा है। इन्द्रियाँ मन में सोती हैं, मन आत्मा में सोता है, पर आत्मा कभी नहीं सोता।

सार: सपना मन का गढ़ा संसार है और गहरी नींद उस परम तेज में पूरा विश्राम, मगर दोनों हालतों में एक चीज़ कभी नहीं सोती, वह आप ख़ुद हैं, वह जागता हुआ साक्षी जिसके बिना न नींद का सुख याद रहता, न सुबह यह पक्का होता कि उठने वाले आप वही हैं जो कल सोए थे।

पाँचवाँ प्रश्न: ॐ का ध्यान

सभा अब अपने पाँचवें मोड़ पर है। छह जिज्ञासु शिष्य गुरु पिप्पलाद (वह आचार्य जिनके पास ये नौजवान ब्रह्मविद्या सीखने आए हैं) के चरणों में बैठे हैं, और बारी आती है शैब्य सत्यकाम की (शिबि-कुल के, सत्य की चाह रखने वाले एक साधक)। वह हाथ जोड़कर एक सीधा-सादा सवाल रखते हैं, जो असल में जीवन भर की साधना का सवाल है, “हे भगवन्, जो मनुष्य आख़िरी साँस तक ॐ (प्रणव, यानी ब्रह्म का एकमात्र नाम और आत्मा का नाद-रूप) का ही ध्यान करता रहे, उसे मरने के बाद कौन-सा लोक मिलता है?” यह कोई पंडिताई का प्रश्न नहीं, यह उस आदमी का प्रश्न है जो अपनी पूरी ज़िंदगी एक ही पुकार पर लगा देना चाहता है।

गुरु पिप्पलाद पहले उस ॐ की असली ऊँचाई बताते हैं। वे कहते हैं कि यह जो प्रणव है, यही परब्रह्म (निर्गुण, निराकार, परम सत्य) है और यही अपरब्रह्म (सगुण, साकार, ध्यान में पकड़ में आने वाला रूप) भी है। एक ही ॐ की दो सीढ़ियाँ हैं, एक नीचे की जिस पर पैर रखा जाता है, और एक ऊपर की जहाँ पहुँचना है। इसीलिए जो साधक इसका आश्रय लेता है, वह इसी एक साधन से दोनों में से किसी एक तक पहुँच जाता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसने इस नाद को कितनी गहराई तक जिया।

स्वामी कृष्णानन्द इसी बिंदु पर ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार गुरु पिप्पलाद सत्यकाम को जो ॐ समझा रहे हैं, वह पर और अपर, ऊँचे और नीचे, दोनों रूपों वाला ही है, एक ही प्रणव में पूरी सीढ़ी छिपी है। ॐ की बनावट के बारे में वे बार-बार याद दिलाते हैं कि यह तीन मात्राओं (ध्वनि-अंशों) अ, उ, म का मेल है, अ-उ-म मिलकर ॐ बनता है। स्वामी जी के मत में ये तीन मात्राएँ कोई बाहरी अक्षर भर नहीं, ये हमारी चेतना की तीन अवस्थाओं से जुड़ी हैं, अ जागना (विश्व), उ सपना (तैजस), और म गहरी नींद (प्राज्ञ), और इन तीनों के पार जो नादहीन शान्ति बचती है, वही आत्मा है। वे साफ़ कहते हैं कि असल ॐ “कोई शब्द या अक्षर नहीं, एक कम्पन है”, एक ऐसी सर्वव्यापी थरथराहट जिसे जपने का मक़सद है मन में जमी पुराने कर्मों की धूल (संस्कारों की मैल) को धोकर हटा देना।

अब गुरु पिप्पलाद की असली शिक्षा खुलती है, और परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) इसे इस तरह सुनाती है कि फल इस पर टिका है कि साधक ॐ की कितनी मात्राओं तक उतर पाया। जो केवल एक मात्रा (अ) तक का ध्यान साध पाता है, उसकी साधना उसे जल्दी ही वापस इसी मनुष्य-लोक में लौटा लाती है, ऋग्वेद की ऋचाएँ उसे मनुष्यों के संसार तक पहुँचाकर छोड़ देती हैं, जहाँ तप और संयम के बल पर वह बड़ाई तो पाता है, पर बँधा रहता है।

जो दो मात्राओं (अ और उ) को जोड़कर ध्यान करता है, वह मन के लोक तक उठ जाता है, यजुर्वेद के मन्त्र उसे बीच के अन्तरिक्ष तक, चन्द्रमा के लोक (सोम-लोक) तक ले जाते हैं। वहाँ वह अपने पुण्य का सुख भोगता है, पर भोग चुकने पर फिर लौट आता है, यह भी ठहराव नहीं, बस एक ऊँचा पड़ाव है।

और जो तीनों मात्राओं (अ, उ, म) को एक समग्र इकाई जानकर, परम पुरुष पर मन टिकाकर ध्यान करता है, उसकी राह ही और है। परम्परा कहती है कि सामवेद के स्वर उसे ऊपर, उस सत्य नामक ब्रह्म-लोक तक पहुँचाते हैं। जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुल (ऊपरी खाल) को छोड़ देता है, वैसे ही वह साधक अपने सारे पापों को छोड़ देता है, और उस परम पुरुष का दर्शन पाता है जो हर देह के भीतर बसा है। यही पूरी साधना का शिखर है, जहाँ अधूरा ध्यान लौटा लाता है और समग्र ध्यान घर पहुँचा देता है।

सार: एक ही ॐ है, पर फल इस पर है कि हम उसमें कितने गहरे उतरे। आधी पकड़ हमें इसी संसार में लौटा लाती है, थोड़ी और गहराई किसी ऊँचे पड़ाव तक, पर तीनों मात्राओं को समग्र जीकर किया गया ध्यान ही केंचुल की तरह पाप झाड़ देता है और परम पुरुष तक पहुँचाता है। नाद वही रहता है, बदलती है हमारी गहराई।

छठा प्रश्न: सोलह कलाओं वाला पुरुष

आख़िरी प्रश्न लेकर जो शिष्य पिप्पलाद के पास आते हैं, उनका नाम सुकेशा है। पिप्पलाद वही ऋषि हैं जिनके आश्रम में छह जिज्ञासु एक बरस तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा (अटूट विश्वास) के साथ रहकर अपने-अपने प्रश्न रख रहे हैं। सुकेशा एक पुरानी घटना सुनाते हैं। बहुत पहले एक राजकुमार, हिरण्यनाभ कौसल्य, उनके पास आया और पूछ बैठा, “हे सुकेशा, क्या आप उस सोलह कलाओं वाले पुरुष को जानते हैं?” यहाँ कला का अर्थ है अंश, घटक, वह टुकड़ा जिनसे कोई पूर्ण वस्तु बनती है; और पुरुष से तात्पर्य उस चेतन तत्त्व से है जो इस देह में बसा हुआ है।

सुकेशा सच बोलने वाले विद्यार्थी थे। उन्होंने झूठ गढ़ने के बजाय हाथ जोड़कर कहा कि वह इसे नहीं जानते, क्योंकि झूठ बोलना ब्रह्मविद्या के साधक के लिए जड़ से ख़ुद को सुखा देना है। वही अधूरापन वर्षों तक उनके मन में टँका रहा। इसीलिए अब, इस आश्रम में, वही प्रश्न वह अपने गुरु पिप्पलाद के आगे रखते हैं, “वह सोलह कलाओं वाला पुरुष कहाँ है?”

पिप्पलाद उत्तर देते हैं, और उनका उत्तर भीतर की ओर मोड़ देने वाला है। “हे सौम्य, वह पुरुष कहीं दूर आकाश में नहीं, इसी शरीर के भीतर है। उसी से सोलह कलाएँ जन्मीं।” फिर वह एक-एक कला गिनाते हैं। पहले-पहल उस अविभाज्य पुरुष से प्राण (जीवन-शक्ति) उठा। प्राण से श्रद्धा (विश्वास), फिर पाँच महाभूत, यानी आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी (सृष्टि के पाँच मूल तत्त्व)। इनके साथ इन्द्रियाँ (देखने-सुनने-छूने की शक्तियाँ), मन (विचारों का पटल), और अन्न (वह आहार जिससे देह टिकती है) प्रकट हुए। अन्न से वीर्य (सृजन की ऊर्जा), उससे तप (साधना का ताप), मन्त्र, कर्म और लोक, और लोकों में नाम। इस तरह कुल सोलह कलाएँ उसी एक पुरुष की किरणों की तरह फैलीं।

परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) के अनुसार यहाँ रहस्य यही है कि ये सोलह कलाएँ पुरुष से बाहर की कोई चीज़ नहीं। जैसे रथ के पहिये में अरे (तीलियाँ) नाभि से निकलकर भी नाभि में ही टिके रहते हैं, वैसे ही ये कलाएँ उसी केन्द्रीय पुरुष पर आश्रित हैं। यह पुरुष स्वयं निष्कल है, यानी जिसके अपने कोई हिस्से नहीं; कलाएँ उसमें से उपजी ज़रूर हैं, पर वह उनमें बँटता नहीं। हम जिसे अपना शरीर, अपनी इन्द्रियाँ, अपने नाम-रूप कहते हैं, वह सब इसी एक की छाया है।

Ganga, Yamuna and Sarasvati flowing as named rivers that merge into a vast ocean and lose their separate names, symbolizing the sixteen kalas of the seeker dissolving back into the one undivided cosmic Purusha.

फिर पिप्पलाद वह उपमा देते हैं जो इस प्रश्न का सार बन जाती है। “जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र की ओर जाती हैं, और समुद्र में पहुँचकर अपना अलग नाम-रूप खो देती हैं, और बस ‘समुद्र’ कहलाती हैं, वैसे ही मुक्ति के क्षण में इस ज्ञानी पुरुष की सोलहों कलाएँ अपने उद्गम उसी पुरुष में लौटकर लीन हो जाती हैं।” गंगा, यमुना, सरस्वती, सबका नाम सागर में डूब जाता है; पर पानी मिटता नहीं, केवल अलगाव की दीवार गिरती है। परम्परा इसे यों पढ़ती है कि नदियों का “मरना” असल में उनका पूरा हो जाना है।

इसीलिए उत्तर का अन्तिम सिरा यह है कि कलाएँ नश्वर हैं, पर जिससे वे निकलीं वह पुरुष अमृत है। नाम और रूप, यानी जिसे हम पहचान कहकर पकड़े रहते हैं, समय के साथ बिखर जाते हैं; पर वह आधार-चेतना ज्यों की त्यों रहती है। जो साधक इस अविभाज्य पुरुष को जान लेता है, परम्परा कहती है, उसके लिए मृत्यु एक टूटना भर नहीं रह जाती, वह तो नदी का सागर से जा मिलना बन जाती है।

सार: जिसे आप अपने सोलह टुकड़े समझते हैं, प्राण, इन्द्रियाँ, मन, नाम-रूप, वे सब एक ही पुरुष से निकली किरणें हैं, और इसी देह में बसा वह पुरुष आपसे कहीं अलग नहीं। नदियाँ सागर में पहुँचकर नाम खोती हैं, पानी नहीं; उसी तरह जिस दिन ये कलाएँ अपने उद्गम में लौटती हैं, बिखरता केवल पहचान का खोल है, और जो रह जाता है वह अमर पुरुष आप ख़ुद हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

दृश्य वही है जहाँ से हम चले थे। आश्रम का प्रांगण, सुबह की हवा, और ऋषि पिप्पलाद (वह आचार्य जिनके पास छह जिज्ञासु एक वर्ष तप करके पहुँचे थे) के सामने बैठे वे छह शिष्य। आख़िरी प्रश्न सुकेशा (भरद्वाज के पुत्र) का था: सोलह कलाओं वाला वह पुरुष कौन है? सुकेशा ने आचार्य से सच कहा था कि वे स्वयं उसे नहीं जानते, क्योंकि जो असत्य बोलता है वह जड़ से सूख जाता है। और पिप्पलाद ने उँगली बाहर किसी दूर लोक की ओर नहीं उठाई, इसी देह के भीतर की ओर मोड़ दी: वह पुरुष यहीं है, आप ही के भीतर। प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रियाँ, मन, अन्न, नाम, रूप, ये सोलह कलाएँ (अंश) उसी एक से निकलीं, और लौटकर उसी में समा जाती हैं। यहीं छह प्रश्नों का एक ही जोड़ खुल जाता है: जो प्रजा-सृष्टि का प्रश्न था, जो प्राण की महिमा का, जो स्वप्न और सुषुप्ति का, जो ओंकार के ध्यान का, सब एक ही केन्द्र पर आ टिकते हैं। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यह सृष्टि किसी जड़ प्रकृति से अनायास नहीं फूटी; इसके मूल में वह सचेतन पुरुष है जिसने पहले ‘सोचा’, तब प्राण को रचा, इसलिए सारा जीवन प्राण और चेतना के दो सहारों पर ही चल रहा है, और उन दोनों के पीछे वही अविभाज्य, निष्कल (बिना अंश का) पुरुष खड़ा है। परम्परा इसे रथ के पहिये की उपमा से कहती है: जैसे सारे आरे (तीलियाँ) नाभि (बीच के धुरे) में जा धँसते हैं, वैसे ही ये सोलह कलाएँ उस पुरुष में जा मिलती हैं; वहाँ पहुँचकर इनके नाम और रूप टूट जाते हैं, और जो उसे जान लेता है वह निष्कल होकर अमर हो जाता है, मृत्यु उसे फिर नहीं सताती।

तो यह उपनिषद् हमें अन्त में किसी नई जानकारी की ओर नहीं, अपनी ही ओर मोड़ देता है। जिसे आप बाहर ढूँढते रहे, वह बाहर कहीं था ही नहीं; जो सोलह तीलियाँ इस जीवन को घुमा रही हैं, उन सबका धुरा आप ही के भीतर मौन बैठा है, बिना हिले सबको घुमाता हुआ। सारे प्रश्न उसी को पहचानने के बहाने थे, और उसे पहचान लेना ही सब प्रश्नों का विश्राम है। पिप्पलाद का प्रांगण अब आपका अपना हृदय है; एक बार भीतर मुड़कर उस अविभाज्य पुरुष को नमस्कार कर लीजिए, फिर पूछने को कुछ शेष नहीं रहता।

सार: छह प्रश्नों का एक ही उत्तर है, और वह उत्तर बाहर नहीं, भीतर है। जीवन की सारी तीलियाँ जिस धुरे पर घूम रही हैं, वह निष्कल पुरुष आप ही के हृदय में है; उसे पहचान लेना ही हर जिज्ञासा का अन्तिम विश्राम।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की प्रश्नोपनिषद् की शांकर-परम्परा की व्याख्या पर आधारित।