Background
प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा से ली गई है। नाम ‘प्रश्न’ इसलिए, क्योंकि पूरी उपनिषद् छह प्रश्नों और उनके उत्तरों पर खड़ी है।
एक बार छह विद्यार्थी समिधा (हाथ में पवित्र लकड़ी) लेकर पिप्पलाद ऋषि के पास आए। उन्होंने कहा, ‘गुरुदेव, हमारे प्रश्न हैं। आप ही ब्रह्म-विद्या के सबसे बड़े ज्ञाता हैं। हमें बताइए।’ पिप्पलाद ने कहा, ‘एक साल मेरे यहाँ ब्रह्मचर्य से रहो, फिर पूछो।’
एक साल बाद, हर शिष्य ने एक-एक प्रश्न पूछा। पिप्पलाद ने हर एक का जवाब दिया, और इस तरह छह प्रश्नों में पूरी ब्रह्म-विद्या खुली।
यह उपनिषद् की एक ख़ासियत है: यहाँ शिष्य-शिक्षा का format बहुत साफ़ है। हर प्रश्न एक specific issue पर है, और हर उत्तर systematic है। यह उपनिषद् को पढ़ने में बहुत friendly बनाता है, क्योंकि हर section अपने आप में पूरी है।
कथा-सार (Story in Brief)
छह नौजवान शिष्य पिप्पलाद के पास आते हैं। हाथ में समिधा, मन में सवाल। नाम हैं: कबन्धी कात्यायन, भार्गव वैदर्भि, कौसल्य आश्वलायन, सौर्यायणी गार्ग्य, शैब्य सत्यकाम, और सुकेश भारद्वाज।
पिप्पलाद कहते हैं, ‘एक साल यहाँ रहो, ब्रह्मचर्य से, फिर पूछो।’ यह वेदान्त की पुरानी परंपरा है, सीखने से पहले तैयारी।
एक साल बाद, हर एक अपना सवाल पूछता है। कबन्धी पूछता है, ‘सब प्राणी कहाँ से आते हैं?’ पिप्पलाद बताते हैं, प्रजापति ने तप किया और ‘रयि’ और ‘प्राण’ दो जोड़े बनाए। यहीं से सब निकला।
भार्गव पूछता है, ‘शरीर में कौन-कौन से देव हैं?’ पिप्पलाद पाँच भूत और इन्द्रियों की list देते हैं। फिर कहते हैं, ‘इन सब में सबसे ऊँचा प्राण है। बाक़ी सब उसके बिना कुछ नहीं।’
कौसल्य पूछता है, ‘प्राण कहाँ से आता है, और शरीर में कैसे जाता है?’ पिप्पलाद का जवाब: ‘प्राण आत्मा से आता है, छाया की तरह। और शरीर में पाँच रूपों में बँटता है, हर एक का अपना काम।’
सौर्यायणी पूछता है, ‘नींद में क्या होता है? कौन देखता है सपने? कौन सुखी है सुषुप्ति में?’ पिप्पलाद बताते हैं, इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, मन प्राण में, और प्राण अपने स्रोत में। यहीं वो आनन्द है जिसे हम ‘गहरी नींद’ कहते हैं।
शैब्य पूछता है, ‘मरते वक़्त जो ओम् पर ध्यान देता है, वो कहाँ जाता है?’ पिप्पलाद कहते हैं, ओम् के तीन अक्षर तीन स्तर हैं। एक अक्षर पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, दो पर चाँद-लोक, तीनों पर सूर्य-लोक, और तीनों के पार जो है, वो ब्रह्म पाता है।
अंत में सुकेश पूछता है, ‘क्या सोलह-कला वाला पुरुष है? कौन है वो?’ पिप्पलाद का जवाब: ‘पुरुष यहीं तुम्हारे अंदर है। उसने सोलह कलाएँ बनाईं, मगर पुरुष ख़ुद कलाओं से ऊपर है। जब तुम जान लोगे तो कलाएँ भी मिट जाएँगी, और पुरुष बच जाएगा।’
Introduction
अगर आपके मन में कभी एक ही समय में कई-कई questions उठें, तो आप समझेंगे इन छह शिष्यों को। वो सब अलग-अलग सवाल लेकर आए हैं, मगर मूल में सब एक ही बात पूछ रहे हैं: ‘मैं कौन हूँ, और यह सब कहाँ से?’
पिप्पलाद ने एक-एक करके जवाब दिए। और दिलचस्प यह है कि कोई जवाब अधूरा नहीं, हर एक अपने आप में पूरा है। मगर सबको साथ रखकर पढ़ें, तो एक complete picture बनती है।
प्रश्न 1
मन्त्र 1.1
सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो
भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनः ते हैते
ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः
एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो
भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥
मन्त्र 1.2
श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ ।
यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत यदि विज्ञास्यामः
सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥
पिप्पलाद का जवाब बहुत characteristic है: ‘जल्दबाज़ी मत करो, एक साल और तप करो।’ यह कोई delay-tactic नहीं है। यह एक test है।
एक साल में जो बच्चे टिक जाएँगे, वही सीखने लायक होंगे। बाक़ी बीच में ही चले जाएँगे। पिप्पलाद यह screening कर रहे हैं।
मन्त्र 1.3
भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥
एक साल बाद कबन्धी पहला सवाल पूछता है। सबसे basic question: ‘सब प्राणी कहाँ से आते हैं?’ यह वो सवाल है जो हर बच्चा अपनी माँ से पूछता है। और जिसका जवाब philosophy/science आज भी पूरा नहीं पाई।
मन्त्र 1.4
प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत
स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते रयिं च प्राणं चैत्यौ मे बहुधा
प्रजाः करिष्यत इति ॥
पिप्पलाद का जवाब creation-myth नहीं, structural है। ‘प्रजापति ने तप किया, और एक जोड़ा बनाया, रयि और प्राण।’
‘रयि’ = matter, पदार्थ, female principle। ‘प्राण’ = energy, ऊर्जा, male principle। दोनों मिलकर सब प्रजा बनी। यह यिन-यांग का Indian रूप है। बहुत basic level पर सब चीज़ें इन्हीं दो की कुश्ती हैं।
मन्त्र 1.5
रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च ।
तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥
‘सूर्य प्राण है, चन्द्र रयि।’ Day-energy, night-substance। यह सिर्फ़ astronomy नहीं, हर level पर: active force vs receptive substance।
‘जो भी मूर्त-अमूर्त है, सब रयि।’ यानी जो आँखों से दिखता है, और जो दिखाई नहीं देता मगर बस उसकी ज़रूरत है, सब रयि है। प्राण उसको चलाने वाली ऊर्जा।
मन्त्र 1.6
तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ।
यद्दक्षिणां यत् प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो
यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत् सर्वं प्रकाशयति
तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥
अब सूर्य के through एक छोटा cosmic mechanism बताते हैं। सूर्य उगते वक़्त, हर दिशा से ‘प्राण’ को अपनी किरणों में समेटता है।
तो सूर्य सिर्फ़ rosानी नहीं देता, वो प्राण भी देता है। सब living systems को energize करता है, साँस-भर ही नहीं, उन्हें अंदर से ज़िंदा रखता है।
मन्त्र 1.7
तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥
(मन्त्र 1.7 और 1.8 साथ:) सूर्य ही वैश्वानर है, विश्व-रूप, अग्नि। ऋग्वेद का एक श्लोक भी इसी पर बात करता है: ‘हज़ार किरणें, सौ रूप, प्रजाओं का प्राण।’
मन्त्र 1.8
परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः
प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥
(मन्त्र 1.7 और 1.8 साथ:) सूर्य ही वैश्वानर है, विश्व-रूप, अग्नि। ऋग्वेद का एक श्लोक भी इसी पर बात करता है: ‘हज़ार किरणें, सौ रूप, प्रजाओं का प्राण।’
मन्त्र 1.9
तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते
ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते ।
त एव पुनरावर्तन्ते ।
तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते ।
एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥
एक important distinction: दो रास्ते। दक्षिणायन और उत्तरायण। यानी सूर्य के दो half-yearly journeys।
दक्षिणायन का रास्ता पकड़ने वाले ‘इष्ट-पूर्त’ करते हैं (यज्ञ, दान, मंदिर बनवाना)। वो चन्द्र-लोक पाते हैं। लेकिन यहाँ catch है: ‘पुनरावर्तन्ते।’ वहाँ से लौटना पड़ता है, फिर जन्म।
तो यह ‘पितृयाण’ है, यानी पितरों का रास्ता। संतान चाहने वालों का।
मन्त्र 1.10
एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणम् ।
एतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ।
तदेष श्लोकः ॥
दूसरा रास्ता: उत्तरायण। तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, और विद्या से आत्मा को खोजने वाले। वो आदित्य को पाते हैं। और यहाँ से लौटना नहीं।
यह कैसा है? यह deva-yana है। मुक्ति का रास्ता। यहाँ pita-yana से अलग है, क्योंकि कर्म + तकनीक + वैराग्य का जोड़ है। बाद में भगवद् गीता 8.24-25 में यह आता है।
मन्त्र 1.11
दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ।
अथेमेऽन्ये उ परे विचक्षणं
सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥
एक थोड़ा रहस्यमय श्लोक। ‘पाँच पाद, बारह आकृति वाला पिता।’ टीकाकारों ने explanation दिए हैं: पाँच ऋतुएँ, बारह महीने। ‘सात चक्र, छह अरे वाला’ = सूर्य की कलाएँ। लेकिन literal exact meaning पर मतभेद है।
मन्त्र 1.12
तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥
(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)
अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।
आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।
मन्त्र 1.13
प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ।
ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥
(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)
अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।
आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।
मन्त्र 1.14
(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)
अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।
आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।
मन्त्र 1.15
तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥
(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)
अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।
आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।
मन्त्र 1.16
(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)
अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।
आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।
प्रश्न 2
मन्त्र 2.1
भगवन् कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते
कतर एतत् प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥
दूसरा प्रश्न-वाला आता है, भार्गव वैदर्भि। उसका सवाल अलग है: ‘शरीर में कितने देव हैं?’
यह सिर्फ़ anatomy नहीं है। यह ‘who is in charge?’ question है। शरीर में आँख-कान-नाक-मन-बुद्धि सब काम कर रहे हैं। कौन इन्हें coordinate कर रहा है?
मन्त्र 2.2
आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ।
ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥
ऋषि का जवाब: ‘सब देव हैं।’ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, मन, चक्षु, श्रोत्र। नौ basic forces।
‘ते प्रकाश्याभिवदन्ति’ = ‘इन्होंने प्रकाश में आकर कहा’। यानी एक conference हुई, और सब बोले, ‘हम ही इस शरीर को टिकाए हुए हैं।’
मन्त्र 2.3
मा मोहमापद्यथाहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति ।
तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥
तब प्राण बोला, ‘मोह में मत पड़ो।’ मगर बाक़ी सब को विश्वास नहीं हुआ। ‘अश्रद्दधाना बभूवुः।’ यह एक छोटा सा drama है, मगर बहुत meaningful।
मन्त्र 2.4
तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते ।
तस्मिꣳश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते ।
तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तꣳ सर्वा एवोत्क्रामन्ते
तस्मिꣳश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्ते एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ।
ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥
तब प्राण ने demonstration किया। ‘अहंकार में आकर ऊपर उठने लगा,’ यानी शरीर से निकलने लगा। और जैसे ही प्राण निकला, बाक़ी सब इन्द्रियाँ भी निकलने लगीं।
‘जैसे रानी-मधुमक्खी उड़ जाए तो सब मधुमक्खियाँ उसके साथ।’ यह बहुत iconic image है। प्राण = queen bee। बाक़ी इन्द्रियाँ = worker bees।
तब सब समझ गए। और ‘प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति’ = ‘खुश होकर प्राण की स्तुति करने लगे।’
मन्त्र 2.5
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.6
ऋचो यजूꣳषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.7
तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.8
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.9
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.10
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.11
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.12
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
मन्त्र 2.13
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥
(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।
‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।
आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।
प्रश्न 3
मन्त्र 3.1
भगवन् कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीरे
आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते
कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥
तीसरा प्रश्न, कौसल्य आश्वलायन का। बहुत specific: ‘प्राण कहाँ से? कैसे आता है? कैसे बँटता है? कैसे निकलता है?’
यह almost एक medical question है। प्राण-anatomy।
मन्त्र 3.2
अतिप्रश्नान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥
ऋषि कहते हैं, ‘तुम तो बहुत सूक्ष्म पूछ रहे हो, मगर तुम ब्रह्म-निष्ठ हो, मैं तुम्हें बताता हूँ।’
मन्त्र 3.3
यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥
‘प्राण आत्मा से जन्मता है।’ जैसे आदमी की छाया उससे निकलती है। यह छाया का रूपक बहुत powerful है, क्योंकि छाया अपने source से अलग नहीं हो सकती।
‘मनोकृतेन आयाति’ = ‘मन के संकल्प से आता है।’ यानी जब आत्मा एक specific birth लेना चाहती है, उसका ‘thought’ प्राण के form में materialize होता है।
मन्त्र 3.4
एतान् ग्रामानेतान् ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥
शरीर एक राज्य है। प्राण उसका राजा। राजा अपने adhikari (officers) को अलग-अलग गाँवों में रखता है। ऐसे ही प्राण शरीर के अलग हिस्सों में अलग प्राणों को बैठाता है: अपान नीचे, समान बीच, और प्राण self ऊपर।
सात अग्नियाँ = सिर के सात openings (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुँह)। सब प्राण की अग्नि से चलते हैं।
मन्त्र 3.5
एष ह्येतद्धुतमन्नꣳ समं नयति ।
तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥
शरीर एक राज्य है। प्राण उसका राजा। राजा अपने adhikari (officers) को अलग-अलग गाँवों में रखता है। ऐसे ही प्राण शरीर के अलग हिस्सों में अलग प्राणों को बैठाता है: अपान नीचे, समान बीच, और प्राण self ऊपर।
सात अग्नियाँ = सिर के सात openings (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुँह)। सब प्राण की अग्नि से चलते हैं।
मन्त्र 3.6
अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतꣳ शतमेकैकस्या द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्ति
आसु व्यानश्चरति ॥
‘हृदय में आत्मा है।’ एक सौ एक नाड़ियाँ, हर एक की सौ शाखाएँ। यह योग-शरीर-शास्त्र का foundation है।
उदान ऊपर जाता है। पुण्य-कर्म वाले को पुण्य-लोक, पाप वाले को पाप-लोक, और दोनों मिले हों तो मनुष्य-लोक। यानी मरने के बाद का destination उदान-flow पर depend करता है।
मन्त्र 3.7
पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥
‘हृदय में आत्मा है।’ एक सौ एक नाड़ियाँ, हर एक की सौ शाखाएँ। यह योग-शरीर-शास्त्र का foundation है।
उदान ऊपर जाता है। पुण्य-कर्म वाले को पुण्य-लोक, पाप वाले को पाप-लोक, और दोनों मिले हों तो मनुष्य-लोक। यानी मरने के बाद का destination उदान-flow पर depend करता है।
मन्त्र 3.8
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥
बाहर का प्राण आदित्य है, अंदर का प्राण उससे जुड़ा है। यह ‘micro-macro correspondence’ का continuation।
तेज ही उदान है। जब तेज शान्त हो जाता है, मतलब मरते वक़्त, तब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और मन प्राण के साथ चलता है।
आख़िर में: ‘जिसका जो चित्त, उसी के साथ प्राण लौटता है।’ Death-time consciousness next birth determine करता है। यह बात Bhagavad Gita 8.6 में भी आती है।
मन्त्र 3.9
पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥
बाहर का प्राण आदित्य है, अंदर का प्राण उससे जुड़ा है। यह ‘micro-macro correspondence’ का continuation।
तेज ही उदान है। जब तेज शान्त हो जाता है, मतलब मरते वक़्त, तब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और मन प्राण के साथ चलता है।
आख़िर में: ‘जिसका जो चित्त, उसी के साथ प्राण लौटता है।’ Death-time consciousness next birth determine करता है। यह बात Bhagavad Gita 8.6 में भी आती है।
मन्त्र 3.10
प्राणस्तेजसा युक्तः सहाऽऽत्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥
बाहर का प्राण आदित्य है, अंदर का प्राण उससे जुड़ा है। यह ‘micro-macro correspondence’ का continuation।
तेज ही उदान है। जब तेज शान्त हो जाता है, मतलब मरते वक़्त, तब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और मन प्राण के साथ चलता है।
आख़िर में: ‘जिसका जो चित्त, उसी के साथ प्राण लौटता है।’ Death-time consciousness next birth determine करता है। यह बात Bhagavad Gita 8.6 में भी आती है।
मन्त्र 3.11
तदेष श्लोकः ॥
‘जो विद्वान् प्राण को ऐसा जानता है, उसकी प्रजा क्षीण नहीं होती।’ यानी उसकी lineage भी चलती है, और वो अमर भी होता है।
आख़िरी मन्त्र: प्राण की पाँच चीज़ें जानो, अमृत मिलेगा। दोहराव से finality।
मन्त्र 3.12
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥
‘जो विद्वान् प्राण को ऐसा जानता है, उसकी प्रजा क्षीण नहीं होती।’ यानी उसकी lineage भी चलती है, और वो अमर भी होता है।
आख़िरी मन्त्र: प्राण की पाँच चीज़ें जानो, अमृत मिलेगा। दोहराव से finality।
प्रश्न 4
मन्त्र 4.1
भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति
कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति कस्यैतत् सुखं भवति
कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥
चौथा प्रश्न सौर्यायणी का है, बहुत interesting: ‘नींद में क्या होता है?’
ऋषि का जवाब: एक beautiful analogy। सूर्य अस्त होने पर उसकी किरणें उसमें मिल जाती हैं। उगने पर निकलती हैं। ऐसे ही नींद में सब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं।
तब आदमी न देखता है, न सुनता है, न कुछ। ‘सो रहा है।’ यह सीधा सा description।
मन्त्र 4.2
यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिन् तेजोमण्डल एकीभवन्ति ।
ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्ति एवꣳ ह वै तत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति ।
तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते
नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥
चौथा प्रश्न सौर्यायणी का है, बहुत interesting: ‘नींद में क्या होता है?’
ऋषि का जवाब: एक beautiful analogy। सूर्य अस्त होने पर उसकी किरणें उसमें मिल जाती हैं। उगने पर निकलती हैं। ऐसे ही नींद में सब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं।
तब आदमी न देखता है, न सुनता है, न कुछ। ‘सो रहा है।’ यह सीधा सा description।
मन्त्र 4.3
गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥
मगर एक twist। ‘प्राण-अग्नियाँ’ अभी भी जागती रहती हैं। शरीर में पाँच आहुतियाँ चल रही हैं।
एक यज्ञ-रूपक: अपान गार्हपत्य अग्नि, व्यान अन्वाहार्यपचन, प्राण आहवनीय। मन यजमान। उदान फल देने वाला। उदान रोज़-रोज़ यजमान को ब्रह्म तक ले जाता है।
मन्त्र 4.4
मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवोदानः ।
स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥
मगर एक twist। ‘प्राण-अग्नियाँ’ अभी भी जागती रहती हैं। शरीर में पाँच आहुतियाँ चल रही हैं।
एक यज्ञ-रूपक: अपान गार्हपत्य अग्नि, व्यान अन्वाहार्यपचन, प्राण आहवनीय। मन यजमान। उदान फल देने वाला। उदान रोज़-रोज़ यजमान को ब्रह्म तक ले जाता है।
मन्त्र 4.5
यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतꣳ श्रुतमेवार्थमनुशृणोति
देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति ।
दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥
‘स्वप्न में यह देव अपनी महिमा अनुभव करता है।’ देखे-सुने-अनुभव किए सब को फिर देखता है। और ‘दृष्ट-अदृष्ट, श्रुत-अश्रुत, सत्-असत्, सब को देखता है।’
यह सपनों का बहुत साफ़ description है। सपने में हम सब कुछ देखते हैं, क्योंकि मन फ्री है। यहाँ tema-content combinations आते हैं जो जागते हुए नहीं हो सकते।
मन्त्र 4.6
अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीरे एतत् सुखं भवति ॥
‘जब मन तेज से अभिभूत होता है, तब सपने नहीं आते।’ यानी जब मन इतना थक जाता है कि कुछ भी project नहीं कर पाता, तब गहरी नींद।
‘तब इस शरीर में यह सुख होता है।’ सुषुप्ति का सुख। माण्डूक्य 5 भी यही कहती है।
मन्त्र 4.7
एवꣳ ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥
एक beautiful image। ‘जैसे पक्षी शाम को अपने वासो-वृक्ष पर लौट जाते हैं, वैसे ही सब परम आत्मा में लौट जाते हैं।’
नींद = roost। सब इन्द्रियाँ और मन परम आत्मा में आराम कर रहे हैं।
मन्त्र 4.8
वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च
चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च
त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं च
उपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च
मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहंकारश्चाहंकर्तव्यं च
चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥
एक long list, सब tattvas और उनके objects: पृथिवी और पृथिवी-तत्व, चक्षु और दृश्य, मन और मंतव्य। सब इन्हीं couples में पाए जाते हैं।
‘यही द्रष्टा, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सोचने वाला, करने वाला, विज्ञानात्मा पुरुष।’ सब functions का agent एक ही है। और वो परम अक्षर आत्मा में टिका है।
मन्त्र 4.9
स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥
एक long list, सब tattvas और उनके objects: पृथिवी और पृथिवी-तत्व, चक्षु और दृश्य, मन और मंतव्य। सब इन्हीं couples में पाए जाते हैं।
‘यही द्रष्टा, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सोचने वाला, करने वाला, विज्ञानात्मा पुरुष।’ सब functions का agent एक ही है। और वो परम अक्षर आत्मा में टिका है।
मन्त्र 4.10
स सर्वज्ञः सर्वो भवति ।
तदेष श्लोकः ॥
‘जो परम अक्षर को जानता है, वो सर्वज्ञ हो जाता है, सब हो जाता है।’ छाया-रहित, शरीर-रहित, रक्त-रहित, शुभ्र।
अक्षर को जानने वाला, सब में प्रवेश कर जाता है। यह ‘सर्वो भवति’ का meaning है, हर चीज़ बन जाता है।
मन्त्र 4.11
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥
‘जो परम अक्षर को जानता है, वो सर्वज्ञ हो जाता है, सब हो जाता है।’ छाया-रहित, शरीर-रहित, रक्त-रहित, शुभ्र।
अक्षर को जानने वाला, सब में प्रवेश कर जाता है। यह ‘सर्वो भवति’ का meaning है, हर चीज़ बन जाता है।
प्रश्न 5
मन्त्र 5.1
स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत
कतमं वै स तेन लोकं जयतीति ॥
पाँचवाँ प्रश्न: ‘मरते वक़्त ओम् पर ध्यान देने वाला कहाँ जाता है?’
ऋषि का जवाब: ‘ओम् ही परम और अपर दोनों ब्रह्म हैं। विद्वान् इसी से एक या दूसरा पाता है।’
परम = निर्गुण ब्रह्म, attributes के बिना। अपर = सगुण ब्रह्म, ईश्वर। ओम् दोनों का door है।
मन्त्र 5.2
एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः ।
तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥
पाँचवाँ प्रश्न: ‘मरते वक़्त ओम् पर ध्यान देने वाला कहाँ जाता है?’
ऋषि का जवाब: ‘ओम् ही परम और अपर दोनों ब्रह्म हैं। विद्वान् इसी से एक या दूसरा पाता है।’
परम = निर्गुण ब्रह्म, attributes के बिना। अपर = सगुण ब्रह्म, ईश्वर। ओम् दोनों का door है।
मन्त्र 5.3
तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते ।
स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥
तीन levels के results:
एक मात्रा (अ) पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, ऋग्वेद के mantras से। यानी पृथ्वी पर अच्छा जन्म।
दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान वाला सोम-लोक पाता है, यजुर्वेद के mantras से। यहाँ विभूति का अनुभव, फिर वापस।
तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से, साम-वेद के mantras से, ब्रह्म-लोक। ‘जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही पाप से निकल जाता है।’ और वहाँ वो परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। यह final मंजिल।
मन्त्र 5.4
स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥
तीन levels के results:
एक मात्रा (अ) पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, ऋग्वेद के mantras से। यानी पृथ्वी पर अच्छा जन्म।
दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान वाला सोम-लोक पाता है, यजुर्वेद के mantras से। यहाँ विभूति का अनुभव, फिर वापस।
तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से, साम-वेद के mantras से, ब्रह्म-लोक। ‘जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही पाप से निकल जाता है।’ और वहाँ वो परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। यह final मंजिल।
मन्त्र 5.5
स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः ।
यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवꣳ ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् ।
स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ।
तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥
तीन levels के results:
एक मात्रा (अ) पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, ऋग्वेद के mantras से। यानी पृथ्वी पर अच्छा जन्म।
दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान वाला सोम-लोक पाता है, यजुर्वेद के mantras से। यहाँ विभूति का अनुभव, फिर वापस।
तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से, साम-वेद के mantras से, ब्रह्म-लोक। ‘जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही पाप से निकल जाता है।’ और वहाँ वो परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। यह final मंजिल।
मन्त्र 5.6
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥
‘तीन मात्राएँ अलग-अलग use हों तो मृत्यु-मय हैं। साथ हों तो अमृत।’ ओम् को अच्छे से बोलना भी एक discipline है।
विद्वान् ओम् के सहारे ही उस शान्त, अजर, अमृत, अभय, और परम तक पहुँचता है।
मन्त्र 5.7
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥
‘तीन मात्राएँ अलग-अलग use हों तो मृत्यु-मय हैं। साथ हों तो अमृत।’ ओम् को अच्छे से बोलना भी एक discipline है।
विद्वान् ओम् के सहारे ही उस शान्त, अजर, अमृत, अभय, और परम तक पहुँचता है।
प्रश्न 6
मन्त्र 6.1
भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत
षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद ।
यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति ।
समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् ।
स तूष्णीꣳ रथमारुह्य प्रवव्राज ।
तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥
आख़िरी प्रश्न, सुकेश का। उसने एक backstory बताई। एक राजकुमार ने उससे पूछा था, ‘सोलह-कला वाला पुरुष कहाँ?’ सुकेश ने मना कर दिया, क्योंकि वो नहीं जानता था।
एक beautiful integrity: ‘जो झूठ बोले, वो जड़ से सूख जाए।’ यानी झूठ बोलकर knowledge gap छिपाना खुद को कमज़ोर करना है।
अब वो पिप्पलाद से पूछ रहा है, ‘कहाँ है वो पुरुष?’
मन्त्र 6.2
इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥
ऋषि का जवाब बहुत simple: ‘यहीं इस शरीर के अंदर।’ यानी सोलह-कला वाला पुरुष कोई बाहरी god नहीं, आपके अंदर ही है।
मन्त्र 6.3
कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥
पुरुष ने सोचा, ‘मेरे निकलने से कौन निकलेगा? टिकने से कौन टिकेगा?’
फिर एक creation sequence। प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, फिर पाँच elements, इन्द्रियाँ, मन। फिर अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, और लोकों में नाम।
तो सोलह कलाएँ हैं। प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, नाम।
मन्त्र 6.4
अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥
पुरुष ने सोचा, ‘मेरे निकलने से कौन निकलेगा? टिकने से कौन टिकेगा?’
फिर एक creation sequence। प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, फिर पाँच elements, इन्द्रियाँ, मन। फिर अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, और लोकों में नाम।
तो सोलह कलाएँ हैं। प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, नाम।
मन्त्र 6.5
समुद्र इत्येवं प्रोच्यते ।
एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति
भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते ।
स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥
एक gorgeous image। ‘जैसे नदियाँ बहती हुई समुद्र की ओर जाती हैं, समुद्र पाकर नदियों के नाम मिट जाते हैं, बस ”समुद्र” बच जाता है।’
‘वैसे ही ये सोलह कलाएँ पुरुष को पाकर मिट जाती हैं। बस ”पुरुष” बच जाता है।’
यह वेदान्त का central message है: सब individuality temporary है, मूल चेतना नित्य।
मन्त्र 6.6
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥
‘जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उसे जानो।’ Death की चिंता मिट जाती है।
आख़िर में पिप्पलाद कहते हैं, ‘इतना ही मैं जानता हूँ।’ विद्यार्थी उनकी पूजा करते हैं: ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले गए।’
‘नमः परमऋषिभ्यः।’ Twice, finality के लिए। उपनिषद् यहाँ बंद।
मन्त्र 6.7
‘जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उसे जानो।’ Death की चिंता मिट जाती है।
आख़िर में पिप्पलाद कहते हैं, ‘इतना ही मैं जानता हूँ।’ विद्यार्थी उनकी पूजा करते हैं: ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले गए।’
‘नमः परमऋषिभ्यः।’ Twice, finality के लिए। उपनिषद् यहाँ बंद।
मन्त्र 6.8
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥
‘जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उसे जानो।’ Death की चिंता मिट जाती है।
आख़िर में पिप्पलाद कहते हैं, ‘इतना ही मैं जानता हूँ।’ विद्यार्थी उनकी पूजा करते हैं: ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले गए।’
‘नमः परमऋषिभ्यः।’ Twice, finality के लिए। उपनिषद् यहाँ बंद।
उपनिषद् की शुरुआत में ही छह नौजवानों की list। यह छोटी सी बात नहीं है। एक guru, छह students। हर शिष्य की अपनी curiosity। हर एक एक अलग angle से ब्रह्म को पकड़ना चाहता है।
‘समिधा हाथ में’ का मतलब है: हम सीखने को तैयार हैं, अपनी विनम्रता के साथ। यह वेदान्त की old tradition है, guru के पास खाली हाथ नहीं जाते।