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प्रश्न उपनिषद्: पिप्पलाद से पूछे गये छह सवाल

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अथर्ववेद · प्रश्न उपनिषद्
छह जिज्ञासु, हाथों में समिधा, और एक बरस का इन्तज़ार, जिसके बाद पिप्पलाद ने वे छह उत्तर दिए जिन पर यह उपनिषद् टिका है।

आश्रम की सुबह है और रास्ते पर पैरों की आहट है। छह ब्रह्मचारी एक-एक करके पहुँचे हैं, हर एक के हाथ में समिधा, वह लकड़ी जो शिष्य गुरु की अग्नि के लिए साथ लाता है और जिसे थामकर वह बिना बोले इतना कह देता है कि अब मैं आपका हुआ। सुकेशा भारद्वाज, शैब्य सत्यकाम, सौर्यायणी गार्ग्य, कौसल्य आश्वलायन, भार्गव वैदर्भि और कबन्धी कात्यायन, छहों परब्रह्म की खोज में निकले हुए, छहों इस भरोसे के साथ आए हैं कि यही ऋषि वह सब बता देंगे जो जानना बाक़ी है। पाठ इस पूरे दृश्य को एक पंक्ति में बाँध देता है, “समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः”, हाथों में समिधा लिए वे भगवान् पिप्पलाद के पास जा बैठे।

यह उपनिषद् अथर्ववेद का है और अपना ढाँचा अपने नाम में ही रखता है। यहाँ न कोई लम्बी कथा चलती है, न यज्ञशाला का विस्तार खुलता है। यहाँ छह सवाल हैं और छह उत्तर, और पूछने वाले छह अलग नामों वाले लोग, जिनमें से हर एक अपनी एक गिरह लेकर आया है। सवाल भी एक तय क्रम में रखे हुए हैं, सृष्टि के सबसे बाहरी छोर से शुरू होकर भीतर की सबसे गहरी जगह तक। यह उपनिषद् पहले पूछता है कि यह सारी प्रजा आती कहाँ से है, और आख़िर में जाकर पूछता है कि वह पुरुष रहता कहाँ है जिसमें सोलह कलाएँ जाकर डूब जाती हैं।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

पिप्पलाद: वह ऋषि जिनके पास छहों जिज्ञासु पहुँचते हैं; पहले एक बरस ठहरने को कहते हैं, फिर एक-एक करके छहों प्रश्नों का उत्तर देते हैं और अन्त में अपनी सीमा भी सच्चाई से बता देते हैं।

कबन्धी कात्यायन: पहला पूछने वाला, जिसकी जिज्ञासा सबसे बाहरी छोर पर है, कि यह सारी प्रजा जन्म कहाँ से लेती है।

भार्गव वैदर्भि: दूसरा पूछने वाला, जो जानना चाहता है कि देह को थामे रखने वाले देवता कितने हैं और उनमें सबसे बड़ा कौन है।

कौसल्य आश्वलायन: तीसरा पूछने वाला, जिसके छह टुकड़ों वाले सवाल को सुनकर पिप्पलाद कहते हैं कि आप बहुत ऊँचा पूछ रहे हैं।

सौर्यायणी गार्ग्य: चौथा पूछने वाला, जिसकी दिलचस्पी नींद में है, कि सोते हुए आदमी में क्या सोता है और क्या जागता रह जाता है।

शैब्य सत्यकाम: पाँचवाँ पूछने वाला, जो ओंकार के ध्यान का हिसाब चाहता है, कि जीवन भर उसी पर टिके रहने वाला आदमी पहुँचता कहाँ है।

सुकेशा भारद्वाज: छठा पूछने वाला, जिसे एक राजकुमार के सामने ईमानदारी से यह कहना पड़ा था कि मैं नहीं जानता, और जो वही अधूरा सवाल यहाँ ले आया है।

समिधा हाथ में, और एक बरस का इन्तज़ार

छहों नाम पाठ में एक साथ आते हैं और उनके साथ एक विशेषण भी आता है, ब्रह्मपरा और ब्रह्मनिष्ठ, यानी जिनका सारा रुख़ ब्रह्म की ओर है और जिनका पाँव वहीं जमा है। ये लोग जिज्ञासा में नए नहीं हैं। ये पढ़े हुए हैं, तपे हुए हैं, और इसीलिए इनके भीतर एक हल्की-सी जल्दी भी है। उन्हें लगता है कि पिप्पलाद के पास वह आख़िरी बात रखी है जो अब तक नहीं मिली, और आज माँग लेने पर आज मिल जाएगी। समिधा हाथ में होना उस ज़माने का सबसे सादा वाक्य था, बिना कहे कही गई प्रार्थना, कि हमें शिष्य मान लीजिए।

ऋषि का जवाब उन्हें ठिठका देता है। वे कहते हैं कि आप लोग एक बरस और यहीं रहिए, तप के साथ, ब्रह्मचर्य के साथ, श्रद्धा के साथ। उसके बाद जैसा मन हो वैसे प्रश्न पूछिए, और जो हम जानते होंगे वह सब आपसे कह देंगे। इस एक वाक्य में दो बातें एक साथ रखी हैं। पहली, कि उत्तर टाला जा रहा है, और टालने की एक साफ़ वजह है। दूसरी, कि जो देने वाला है वह भी अपने ऊपर एक शर्त लगा रहा है, जो हम जानते होंगे, उतना ही। यह विनम्रता छठे प्रश्न के अन्त में फिर लौटकर आएगी।

वह एक बरस इस उपनिषद् की सबसे कम बोली गई और सबसे ज़्यादा काम करने वाली बात है। उसमें कोई पाठ नहीं पढ़ाया जाता, कोई सूत्र नहीं रटाया जाता। उसमें बस रहना होता है, आग सँभालनी होती है, समय पर उठना होता है, और चुप रहना होता है। साल भर में सवाल वही रहते हैं, पर सवाल पूछने वाला वही नहीं रहता। जो जल्दी शुरू में थी वह बैठ जाती है, और जो सुनने की जगह भीतर बननी चाहिए वह बन जाती है। यही वजह है कि इसके बाद जो उत्तर आते हैं वे टुकड़ों में नहीं आते, एक सीढ़ी की तरह आते हैं।

ध्यान देने लायक़ यह भी है कि पिप्पलाद ने पूछने का क्रम ख़ुद तय नहीं किया। उन्होंने कहा, जैसा मन हो वैसे पूछिए। फिर भी जो क्रम बना वह सबसे बाहर से सबसे भीतर की ओर चला गया, जैसे किसी ने पहले से बिछा रखा हो। शायद यही उस बरस का असर है। जब भीतर की धूल बैठ जाती है तो सवाल अपने आप क्रम में खड़े हो जाते हैं, और पूछने वाले को भी नहीं पता होता कि वह किस सीढ़ी पर पहला पाँव रख रहा है।

सार: उत्तर तैयार था, सुनने वाले तैयार नहीं थे, इसलिए बीच में एक बरस रख दिया गया। पिप्पलाद ने साथ ही अपनी सीमा भी पहले दिन बता दी, कि जो हम जानते होंगे वही कहेंगे। यही दोनों बातें आगे के छहों उत्तरों का मिज़ाज तय करती हैं।

पहला प्रश्न: यह सारी प्रजा आती कहाँ से है

बरस पूरा होने पर पहले उठता है कबन्धी कात्यायन। उसका सवाल सीधे आँख से उठता है। इतने जीव, इतने रूप, इतनी साँसें, ये सब निकलते कहाँ से हैं। पाठ उसके शब्द रख देता है, “कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्ते”, ये प्रजाएँ आख़िर किससे जन्म लेती हैं। यह वही सवाल है जो हर बच्चा एक बार पूछता है और फिर पूछना छोड़ देता है, क्योंकि जवाब देने वाले थक जाते हैं। यहाँ जवाब देने वाला थकता नहीं।

पिप्पलाद पीछे की ओर चलते हैं, वहाँ तक जहाँ अभी कोई प्रजा है ही नहीं। वहाँ प्रजापति हैं, और उनके भीतर संतति की इच्छा है। वे तप करते हैं, और तप से एक जोड़ा पैदा करते हैं, रयि और प्राण, इस सोच के साथ कि ये दोनों मिलकर मेरे लिए बहुत तरह की प्रजा बना देंगे। रयि का मतलब है वह जो भरता है, अन्न, पदार्थ, आकार, ठोसपन। प्राण का मतलब है वह जो चलाता है, साँस, गति, चेतना की हरकत। सृष्टि दोनों के बिना नहीं बनती, और तब से आज तक हर जीव इन्हीं दो का जोड़ है।

फिर ऋषि इस जोड़े को आसमान पर टाँग देते हैं। सूरज प्राण है, चाँद रयि है। जो कुछ मूर्त है और जो कुछ अमूर्त है, वह सब रयि है, इसलिए आकार अपने आप में रयि ही है। उगता हुआ सूरज जब पूरब में उतरता है तो पूरब के सारे प्राणों को अपनी किरणों में समेट लेता है, और यही वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर और बीच की हर दिशा के साथ करता है। जिस-जिस को वह उजाला देता है, उस-उस के प्राण उसकी किरणों में टिके रहते हैं। पाठ इसी सूरज के लिए एक ऋचा उद्धृत करता है जिसमें उसे विश्वरूप, हरिण, जातवेदा और प्रजा का प्राण कहा गया है।

इसके बाद प्रजापति की परिभाषा घूमती चली जाती है। संवत्सर प्रजापति है, और उसके दो अयन हैं, दक्षिण और उत्तर। जो लोग इष्ट और पूर्त को, यानी यज्ञ और कुआँ-बावड़ी जैसे लोकहित के काम को ही सब कुछ मानकर उपासना करते हैं, वे चन्द्रलोक तक पहुँचते हैं और वहाँ से लौट आते हैं। पाठ इस लौटा लाने वाले रास्ते को पितृयाण कहता है और उसे सीधे रयि के खाते में डाल देता है। जो उत्तर के रास्ते जाते हैं, तप और ब्रह्मचर्य और श्रद्धा और विद्या से आत्मा को खोजते हुए, वे आदित्य तक पहुँचते हैं, और वहाँ से लौटना नहीं होता।

यही जोड़ा फिर छोटे-छोटे पैमानों पर उतरता है। महीना प्रजापति है, उसका कृष्णपक्ष रयि है और शुक्लपक्ष प्राण। दिन-रात प्रजापति है, दिन प्राण है और रात रयि। अन्न प्रजापति है, उसी से वीर्य बनता है, और उसी से यह सारी प्रजा जन्म लेती है। बाहर का बरस, बीच का महीना, हाथ भर का दिन और थाली भर का अन्न, हर पैमाने पर वही दो टाँके दिखते हैं। सवाल पूछा गया था कि प्रजा कहाँ से आती है, और उत्तर यह निकला कि वह एक ही तरतीब से हर पैमाने पर बार-बार बनती रहती है।

पहले प्रश्न का अन्त एक शर्त पर होता है। जो प्रजापति का व्रत निभाते हैं, यानी जो संयम के साथ गृहस्थी चलाते हैं, वे संतति पाते हैं। पर ब्रह्मलोक उन्हीं का है जिनमें तप है, ब्रह्मचर्य है, और जिनमें सत्य जमा हुआ है। और फिर एक आख़िरी पंक्ति, कि वह निर्मल ब्रह्मलोक उन्हीं का है जिनमें टेढ़ापन नहीं, झूठ नहीं, और छल नहीं। पूरा पहला उत्तर सृष्टि का नक़्शा खींचता है और आख़िर में जाकर चरित्र पर आ टिकता है, जो इस उपनिषद् की आदत है।

सार: प्रजापति ने तप करके रयि और प्राण का जोड़ा बनाया, और वही जोड़ा सूरज-चाँद, उत्तरायण-दक्षिणायन, शुक्ल-कृष्ण, दिन-रात, हर पैमाने पर दुहराया जाता है। दो रास्ते खुलते हैं, एक लौटा लाने वाला और एक न लौटाने वाला। और आख़िरी शर्त सच्चाई की रखी जाती है।

दूसरा प्रश्न: इस देह को थामे हुए कौन है

अब भार्गव वैदर्भि आगे आता है और सवाल बाहर से भीतर सरक जाता है। वह पूछता है कि कितने देवता इस प्रजा को थामे रखते हैं, उनमें से कौन इसे उजाला देते हैं, और सबसे बड़ा कौन है। पाठ उसके आख़िरी टुकड़े को यों रखता है, “कः पुनरेषां वरिष्ठः”, इनमें सबसे श्रेष्ठ फिर कौन ठहरा। पहले प्रश्न में जगत् एक नक़्शा था, यहाँ वह एक देह बन जाता है, और देह के भीतर सत्ता का सवाल खड़ा हो जाता है।

पिप्पलाद पहले गिनती देते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, फिर वाणी, मन, आँख और कान। ये नौ मिलकर इस देह को घेरे हुए हैं, और ये सब अपना-अपना उजाला भी देते हैं। और फिर वही होता है जो ताक़त के पास बैठे हर समूह के साथ होता है। वे आपस में बड़ाई करने लगते हैं और कहते हैं कि हम ही इस देह-रूपी बाण को थामकर सँभाले हुए हैं। वाक्य में एक ठसक है जिसे पाठ छिपाता नहीं, क्योंकि उसी ठसक पर अगला दृश्य टिका है।

तब प्राण बोलता है, और उसका पहला शब्द एक चेतावनी है। वह कहता है कि भ्रम में मत पड़िए, मैं ही अपने को पाँच हिस्सों में बाँटकर इस बाण को थामे हुए हूँ। बाक़ी मानने को तैयार नहीं होते। तो प्राण कुछ कहता नहीं, बस उठने लगता है, जैसे देह छोड़कर जा रहा हो। और जैसे ही वह उठता है, सब उठ जाते हैं, और जैसे ही वह बैठता है, सब बैठ जाते हैं। पाठ इसके लिए एक बहुत सीधी उपमा रखता है, जैसे मधुमक्खियों का राजा उड़ता है तो सारा छत्ता उड़ जाता है और वह बैठता है तो सब बैठ जाती हैं।

यह उपमा अपनी बात सीधे अनुभव पर बैठा देती है। आँख कितनी भी तेज़ हो, साँस रुकने के बाद वह क्या देखेगी। वाणी कितनी भी सधी हो, वह किसके बल पर उठेगी। इसीलिए झगड़ा एक ही झटके में ख़त्म हो जाता है और बाक़ी नौ अपनी बड़ाई भूलकर प्राण की स्तुति करने लगते हैं। इस स्तुति में नौ श्लोक हैं और उनका लहजा ऋग्वेद के सूक्तों जैसा है। प्राण को अग्नि कहा जाता है, सूर्य कहा जाता है, बरसने वाला बादल कहा जाता है, वायु और पृथ्वी कहा जाता है, और जो कुछ सत् है, असत् है, अमृत है, वह सब कहा जाता है।

इसी स्तुति के बीच वह पंक्ति आती है जो इस उपनिषद् की सबसे ज़्यादा दुहराई जाने वाली पंक्तियों में है, “अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्”, जैसे पहिये की नाभि में आरे टिके होते हैं वैसे ही प्राण में सब कुछ टिका है। इसके बाद गिनाया जाता है कि उसमें ऋचाएँ टिकी हैं, यजुष् टिके हैं, साम टिके हैं, यज्ञ टिका है, क्षत्र टिका है, ब्रह्म टिका है। स्तुति के अन्त में देवता एक बच्चे की तरह माँगते हैं, कि जो रूप आपका वाणी में, कान में, आँख में और मन में फैला है उसे कल्याणकारी बनाए रखिए, और हमें छोड़कर मत जाइए, माँ जैसे बेटों की रक्षा करती है वैसे हमारी कीजिए।

सार: देह में नौ शक्तियाँ बड़ाई करती हैं, और प्राण बिना बहस किए सिर्फ़ उठने का उपक्रम करके फ़ैसला करा देता है। मधुमक्खियों के राजा वाली उपमा यह बात सीधे अनुभव पर बैठा देती है। अन्त में विजेता की जगह एक याचना बची रहती है, कि हमें छोड़कर मत जाइए।

तीसरा प्रश्न: प्राण कहाँ से आता है और भीतर कैसे बँटता है

कौसल्य आश्वलायन के सवाल गिनती में छह हैं, और वह उन्हें एक ही साँस में रख देता है। यह प्राण जन्म कहाँ से लेता है। फिर, यह इस शरीर में आता कैसे है। अपने को बाँटकर यह टिकता कैसे है। किसके सहारे यह बाहर निकलता है। बाहर के जगत् को यह कैसे थामे रहता है और भीतर के जगत् को कैसे। पिप्पलाद उसे टोकते नहीं, बल्कि उसकी तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि आप बहुत ऊँचे सवाल पूछ रहे हैं, आप ब्रह्म में गहरे उतरे हुए हैं, इसीलिए मैं आपसे कहता हूँ।

पहला उत्तर सबसे छोटा और सबसे बड़ा है, “आत्मन एष प्राणो जायते”, यह प्राण आत्मा से जन्म लेता है। फिर एक उपमा, कि जैसे आदमी की छाया आदमी पर ही टिकी रहती है, वैसे ही यह प्राण उस आत्मा पर फैला हुआ है। और वह इस देह में आता कैसे है, मन के किए हुए से। जो संकल्प मन ने पिछले जन्म में गढ़े, उन्हीं की खींच से प्राण इस देह में उतरता है। दूसरे प्रश्न में प्राण सबसे बड़ा था; तीसरे प्रश्न में वह भी किसी से जन्मा हुआ ठहरता है, और सीढ़ी एक क़दम और ऊपर चढ़ जाती है।

भीतर की बँटवारी समझाने के लिए ऋषि राजकाज की उपमा उठाते हैं। जैसे सम्राट् अपने अधिकारियों को नियुक्त करता है और कहता है कि आप इन गाँवों को देखिए और आप इन गाँवों को, वैसे ही मुख्य प्राण दूसरे प्राणों को अलग-अलग जगहों पर बिठा देता है। अपान को पायु और उपस्थ में, यानी नीचे की ओर बहने वाले काम में। प्राण स्वयं आँख, कान, मुँह और नाक में। और बीच में समान, जो खाए हुए अन्न को बराबर-बराबर बाँटता है, जिससे सिर की वे सात लपटें बनी रहती हैं जिनसे यह देह दुनिया को छूती है।

फिर पाठ हृदय पर आता है और कहता है कि यह आत्मा हृदय में ही बैठा है। वहीं से एक सौ एक नाड़ियाँ निकलती हैं, हर एक की सौ शाखाएँ, और हर शाखा की बहत्तर हज़ार उपशाखाएँ, और इन सबमें व्यान चलता है। यह गिनती इसलिए दी गई है कि जिस जगह को हम एक बिन्दु समझते हैं वह अपने भीतर एक पूरा जाल समेटे बैठी है। साँस सिर्फ़ नाक से नहीं चलती, वह देह के आख़िरी कोने तक बिछी हुई है।

इनमें से एक नाड़ी ऊपर जाती है और उसमें उदान रहता है। और यहीं यह उत्तर मृत्यु तक पहुँच जाता है। उदान पुण्य के सहारे पुण्य के लोक तक ले जाता है, पाप के सहारे पाप के लोक तक, और दोनों के सहारे मनुष्य लोक तक। बाहर का प्राण आदित्य है, जो उगते ही आँख के प्राण पर कृपा करता है। पृथ्वी में जो देवता है वही आदमी के अपान को नीचे से थामे रहता है। बीच का आकाश समान है और बाहर की हवा व्यान। भीतर जो बँटा हुआ है, वह बाहर भी उसी तरह बँटा हुआ है, और दोनों एक ही धागे पर बँधे हैं।

आख़िरी बात सबसे मार्मिक है। उदान तेज है, इसलिए जिसका तेज बुझ चला होता है वह इन्द्रियों के मन में समा जाने के साथ फिर जन्म की ओर चल देता है। और जाते वक़्त वह अपने साथ कुछ ले जाता है, जो चित्त में बसा है वही। मन जिस पर टिका रहा, प्राण उसी की ओर मुड़ जाता है, और तेज के साथ जुड़ा हुआ प्राण आत्मा को उसी लोक तक पहुँचा देता है जैसा उसने सोच रखा था। जीवन भर जिसे हम सोचते रहते हैं, वह हमारा अन्तिम पता बन जाता है।

सार: प्राण आत्मा से जन्मता है और मन के किए हुए संकल्पों की खींच से देह में उतरता है। भीतर वह सम्राट् की तरह पाँच जगह पाँच काम बाँट देता है, और वही बँटवारा बाहर सूरज, धरती, आकाश और हवा में दिखता है। और जो चित्त में बसा रहता है, प्राण अन्त में उसी ओर मुड़ जाता है।

चौथा प्रश्न: सोता कौन है और जागता कौन रह जाता है

सौर्यायणी गार्ग्य का सवाल रोज़ की सबसे साधारण घटना से उठता है। वह पूछता है कि इस पुरुष में क्या सोता है और क्या जागता रहता है, “कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति”। फिर, सपने कौन देखता है। यह सुख किसका होता है। और वह कौन है जिसमें सब जाकर टिक जाते हैं। हम सब हर रात इस दरवाज़े से गुज़रते हैं और सुबह उठकर भूल जाते हैं कि गुज़रे थे। यह प्रश्न उसी भूले हुए रास्ते का नक़्शा माँगता है।

पिप्पलाद डूबते सूरज से शुरू करते हैं। वे कहते हैं, हे गार्ग्य, जैसे डूबते सूरज की सारी किरणें उसी तेजोमण्डल में एक हो जाती हैं और उगते वक़्त फिर बिखर जाती हैं, वैसे ही यह सब कुछ मन में, उस परे बैठे देव में, एक हो जाता है। उस घड़ी यह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न छूता है, न बोलता है, न लेता है, न छोड़ता है, न चलता है। तब लोग कहते हैं कि वह सो रहा है। पाठ नींद को इन्कारों की एक लम्बी लड़ी से बनाता है, और लड़ी के आख़िर में एक अकेला जागता हुआ कोना छोड़ देता है।

वह कोना क्या है, यह अगली ही पंक्ति खोलती है, “प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति”, इस नगर में केवल प्राणरूपी अग्नियाँ जागती रहती हैं। और फिर सोए हुए आदमी को एक चलते हुए यज्ञ में बदल दिया जाता है। अपान गार्हपत्य अग्नि है, वह घर की वह आग जो कभी बुझती नहीं। व्यान दक्षिणाग्नि है। प्राण आहवनीय है, क्योंकि वह गार्हपत्य से ही लाकर जलाई जाती है। समान वह है जो उच्छ्वास और निःश्वास, इन दो आहुतियों को बराबर कर देता है। मन यजमान है, और उदान यज्ञ का फल, जो उस यजमान को रोज़-रोज़ ब्रह्म तक पहुँचा देता है।

यह तस्वीर चुपचाप एक बड़ी बात कह जाती है। यज्ञ करने के लिए किसी वेदी की, किसी घी की, किसी मन्त्र की ज़रूरत नहीं रह जाती, क्योंकि वह देह के भीतर चौबीस घण्टे चल ही रहा है, और सबसे साफ़ तब चलता है जब हम सो रहे होते हैं और कर्ता का दावा करने वाला कोई जागा हुआ नहीं होता। यही वजह है कि नींद को इस उपनिषद् में कोई ख़ाली जगह नहीं माना गया। वह रोज़ मिलने वाली एक छोटी वापसी है, जिसमें हम बिना जाने घर हो आते हैं।

इसके आगे तीन अवस्थाएँ अलग-अलग खोली जाती हैं। सपने में यह देव अपनी महिमा भोगता है। जो देखा था उसे फिर देखता है, जो सुना था उसे फिर सुनता है, दूर देशों और दिशाओं का भोगा हुआ फिर-फिर भोगता है, और देखा-अनदेखा, सुना-अनसुना, भोगा-अनभोगा, सत् और असत्, सब देख लेता है, क्योंकि उस घड़ी वह सब हो जाता है। पर जब वह तेज से ढक जाता है, तब सपने भी नहीं रहते, और तब इस देह में वह सुख उतरता है जिसका कोई कारण नहीं बताया जा सकता। उसी को समझाने के लिए उपमा आती है, कि जैसे पंछी शाम को अपने बसेरे के पेड़ पर लौट आते हैं, वैसे ही यह सब परम आत्मा में लौटकर टिक जाता है।

और तब पाठ एक लम्बी जोड़ियों वाली सूची रखता है, जिसे पढ़ते हुए साँस लेनी पड़ती है। पृथ्वी और पृथ्वी की मात्रा, जल और जल की मात्रा, तेज, वायु, आकाश और उनकी मात्राएँ; आँख और जो देखा जाना है, कान और जो सुना जाना है, नाक और जो सूँघा जाना है, रस और जो चखा जाना है, त्वचा और जो छुआ जाना है, वाणी और जो कहा जाना है, हाथ और जो लिया जाना है, पाँव और जो चला जाना है, मन और जो सोचा जाना है, बुद्धि और जो जाना जाना है, अहंकार और जो अपनाया जाना है, चित्त और जो चेता जाना है, तेज और जो चमकाया जाना है, प्राण और जो थामा जाना है। हर इन्द्रिय अपने विषय के साथ बँधी है, और दोनों एक साथ उठते हैं और एक साथ बैठ जाते हैं।

इस पूरी सूची के सिरे पर वह खड़ा है जो देखता है, छूता है, सुनता है, सूँघता है, चखता है, सोचता है, जानता है और करता है, यानी विज्ञानात्मा पुरुष। और उसका ठिकाना भी पाठ बता देता है, “स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते”, वह उस परम अक्षर आत्मा में जाकर टिक जाता है। जो उस छायारहित, देहरहित, रंगरहित, शुभ्र अक्षर को जान लेता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है, सब कुछ हो जाता है। चौथा प्रश्न नींद के दरवाज़े से शुरू हुआ था और अक्षर तक पहुँचकर बन्द होता है।

सार: नींद में इन्द्रियाँ मन में सिमट जाती हैं, जैसे किरणें डूबते सूरज में, और जागती सिर्फ़ प्राण की अग्नियाँ रहती हैं। सोए हुए आदमी की देह अपने आप में एक चलता हुआ यज्ञ है, जिसमें मन यजमान है। और गहरी नींद का बेवजह सुख बताता है कि लौटने की जगह हमारे भीतर ही रखी है।

पाँचवाँ प्रश्न: ओंकार का ध्यान कहाँ तक ले जाता है

शैब्य सत्यकाम का सवाल पहली बार साधना की ओर मुड़ता है। वह पूछता है कि मनुष्यों में जो कोई मरते दम तक ओंकार का ध्यान करता रहे, वह उससे कौन-सा लोक जीतता है। यह सवाल हिसाब माँगता है, और इसमें कोई बुराई नहीं। जो आदमी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा किसी एक अभ्यास पर लगाने वाला है, उसे यह जानने का हक़ है कि वह रास्ता ले कहाँ जाता है।

पिप्पलाद का पहला वाक्य ही पूरा उत्तर है, “एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः”, हे सत्यकाम, जो ओंकार है वही पर ब्रह्म है और वही अपर ब्रह्म है। यानी वह अक्षर एक ही साथ आकारवाले और निराकार, दोनों का दरवाज़ा है। इसीलिए जानकार इसी एक आधार के सहारे इन दोनों में से जिसकी ओर चले, वहाँ पहुँच जाता है। एक ही सीढ़ी है, और उस पर कितना चढ़ना है, यह चढ़ने वाले पर छोड़ दिया गया है।

फिर तीन मात्राओं का हिसाब खुलता है। जो सिर्फ़ एक मात्रा का ध्यान करता है, वह उसी से जग जाता है और जल्दी ही वापस इसी धरती पर आ जाता है। ऋचाएँ उसे मनुष्यलोक तक ले आती हैं और वहाँ तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से भरा हुआ वह अपनी महिमा भोगता है। जो दो मात्राओं तक जाता है वह मन में समा जाता है, यजुष् उसे अन्तरिक्ष तक, सोमलोक तक ऊपर ले जाते हैं, और वहाँ ऐश्वर्य भोगकर वह लौट आता है। लौटना दोनों जगह से है, बस ऊँचाई अलग है।

तीसरी सीढ़ी पर तस्वीर बदल जाती है। जो तीनों मात्राओं के साथ, उसी एक अक्षर से, परम पुरुष का ध्यान करता है, वह सूरज के तेज में जा मिलता है। और यहाँ वह उपमा आती है जो इस उपनिषद् की सबसे साफ़ तस्वीरों में है, कि जैसे साँप अपनी केंचुल से निकल आता है वैसे ही वह पाप से निकल आता है। साम-मन्त्र उसे ब्रह्मलोक तक ले जाते हैं, और वहाँ से वह जीवों के इस समूचे पिण्ड के पार, पर से भी पर, नगर में सोए हुए उस पुरुष को देख लेता है।

दो श्लोक इस उत्तर को बाँध देते हैं। पहला कहता है कि तीनों मात्राएँ अलग-अलग बरती जाएँ तो मृत्यु के भीतर ही रहती हैं, पर बाहरी, भीतरी और बीच की क्रियाओं में जब वे ठीक से, आपस में जुड़ी हुई और बिना बिछड़े बरती जाएँ, तब जानने वाला डोलता नहीं। दूसरा कहता है कि ओंकार ही वह आधार है जिसके सहारे जानकार उस तक पहुँचता है जो शान्त है, जिसमें बुढ़ापा नहीं, मृत्यु नहीं, भय नहीं, और जो सबसे परे है। साधना का पूरा हिसाब यहाँ एक शर्त पर टिक जाता है, कि अभ्यास टुकड़ों में न हो।

सार: ओंकार एक ही साथ अपर और पर ब्रह्म का दरवाज़ा है, इसलिए वह जहाँ तक ले जाएगा यह साधक की गहराई पर टिका है। एक मात्रा धरती तक, दो मात्राएँ सोमलोक तक, और तीनों साथ जुड़ी हुई मात्राएँ केंचुल छुड़ाकर उस पुरुष तक। शर्त एक ही है, कि अभ्यास बँटा हुआ न रहे।

छठा प्रश्न: सोलह कलाओं वाला पुरुष रहता कहाँ है

आख़िरी सवाल सुकेशा भारद्वाज का है, और वह अकेला ऐसा है जो पूछने वाले की एक पुरानी हार से निकलता है। वह बताता है कि हिरण्यनाभ कौसल्य नाम का एक राजकुमार उसके पास आया था और उसने पूछा था कि हे भारद्वाज, क्या आप सोलह कलाओं वाले उस पुरुष को जानते हैं। सुकेशा के पास उत्तर नहीं था। उसने उस कुमार से साफ़ कह दिया कि मैं इसे नहीं जानता, और अगर जानता होता तो आपसे क्यों न कहता।

उसने अपने इन्कार के साथ एक वजह भी जोड़ी थी, जिसे पाठ ज्यों का त्यों रखता है, “समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति”, जो झूठ बोलता है वह जड़ समेत सूख जाता है। इसीलिए मैं झूठ बोलने की हिम्मत नहीं कर सका। यह सुनकर राजकुमार चुपचाप अपने रथ पर चढ़ा और चला गया। उस चुप्पी में कोई अपमान नहीं था, पर उसमें एक ख़ालीपन ज़रूर था, जो सुकेशा के भीतर बरसों रह गया। वही अधूरापन अब पिप्पलाद के सामने रखा जा रहा है, कि बताइए, वह पुरुष है कहाँ।

पिप्पलाद का उत्तर कहीं दूर नहीं भेजता। वे कहते हैं कि वह पुरुष यहीं, इसी देह के भीतर है, “यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति”, जिसमें ये सोलह कलाएँ उपजती हैं। और फिर वे उस पुरुष की एक बहुत मानवीय घड़ी दिखाते हैं। उसने सोचा था कि किसके निकलने पर मैं निकला हुआ ठहरूँगा, और किसके टिके रहने पर मैं टिका हुआ रहूँगा। सृष्टि की शुरुआत यहाँ एक सवाल से होती है, ठीक वैसे ही जैसे यह पूरा उपनिषद् सवालों से चलता है।

उसी सोच से सोलह कलाएँ निकलीं। पहले प्राण, प्राण से श्रद्धा, फिर आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथ्वी, फिर इन्द्रिय और मन, फिर अन्न, अन्न से वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, और लोकों में नाम। इस सूची में सबसे ग़ौर करने लायक़ जगह दूसरी है। प्राण के तुरन्त बाद श्रद्धा आती है, पदार्थ से भी पहले, आकाश से भी पहले। जिस क्रम में यह जगत् बना, उसमें भरोसा इतनी जल्दी आ गया कि उसके बिना बाक़ी पन्द्रह कलाओं की बुनियाद ही न पड़ती।

और फिर वह उपमा आती है जिस पर यह उपनिषद् अपना सारा वज़न रख देता है। जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र की ओर जाती हैं, और समुद्र में पहुँचकर अपने अन्त को प्राप्त होती हैं, उनका नाम और रूप टूट जाता है, और फिर उसे बस समुद्र कहा जाता है। ऐसे ही इस देखने वाले की ये सोलह कलाएँ पुरुष की ओर जाती हैं, पुरुष को पाकर अपने अन्त को प्राप्त होती हैं, उनका नाम और रूप टूट जाता है, और फिर उसे बस पुरुष कहा जाता है। पाठ इस पर एक पंक्ति और जोड़ता है, कि वह कलाओं से रहित और अमृत हो जाता है।

एक श्लोक इसे बाँधता है और कहता है कि जिसमें कलाएँ पहिये की नाभि में लगे आरों की तरह टिकी हुई हैं, वही जानने योग्य पुरुष है, उसे जान लीजिए, ताकि मृत्यु आपको दुख न दे। दूसरे प्रश्न में यही उपमा प्राण के लिए आई थी, और छठे में वही उपमा पुरुष के लिए लौट आती है। बीच के चार उत्तरों ने जो सीढ़ी बनाई थी, उसका आख़िरी डण्डा यहाँ रखा जाता है, कि जिस नाभि में सब टिका है वह देह के भीतर ही है।

सार: सुकेशा एक ऐसे सवाल के साथ आता है जिसका उत्तर वह ईमानदारी से देने से इन्कार कर चुका था। पिप्पलाद उसे कहीं भेजते नहीं, देह के भीतर ही इशारा कर देते हैं। और नदियों के समुद्र में मिलने की उपमा बता देती है कि सोलह कलाओं का सिर्फ़ अलग नाम मिटता है।

और अन्त में, अपनी ओर

छह उत्तर देने के बाद पिप्पलाद एक ऐसी बात कहते हैं जो किसी भी बड़े शिक्षक के मुँह से कम ही निकलती है। वे कहते हैं, “नातः परमस्ति”, इस परब्रह्म के बारे में मैं बस इतना ही जानता हूँ, इससे आगे कुछ है नहीं। पहले दिन उन्होंने कहा था कि जो हम जानते होंगे वह कहेंगे, और आख़िरी दिन उन्होंने वह शर्त निभा दी। जिस आदमी ने सूरज, नींद, मृत्यु और ओंकार तक का हिसाब खोल दिया, वह अपनी सीमा पर आकर रुक जाता है, और उसी रुकने से उसकी कही हुई हर पिछली बात का वज़न बढ़ जाता है। छहों शिष्य उनकी पूजा करते हैं और कहते हैं कि आप ही हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार उतार देते हैं।

इस उपनिषद् को पढ़कर एक चीज़ बार-बार लौटती है, वह बरस। छहों जानकार थे, छहों तैयार थे, फिर भी उन्हें रुकना पड़ा। हमारे दिनों में यह सबसे मुश्किल हिस्सा है, क्योंकि हमें हर सवाल का जवाब उसी क्षण चाहिए, और जो उसी क्षण मिल जाता है वह टिकता भी उतनी ही देर है। पिप्पलाद का तरीक़ा सीधा है, कि जवाब बाद में आएगा, पहले सुनने वाला बनिए। जो अपने किसी सवाल के साथ सालभर बिना जल्दी किए रह सकता है, उसे अक्सर पता चलता है कि सवाल बदल चुका है।

दूसरी चीज़ जो अपनी ओर मुड़ती है, वह सुकेशा का इन्कार है। उसके पास उत्तर नहीं था और उसने कह दिया कि नहीं है, और उसी ईमानदारी ने आख़िर में उसे उत्तर तक पहुँचा दिया। हम सबके पास एक हिरण्यनाभ है, कोई ऐसा सवाल जिसे हमने टाल रखा है, या जिसका जवाब हमने अन्दाज़े से गढ़कर काम चला लिया है। यह उपनिषद् उस टाले हुए सवाल को बुरा नहीं कहता, वह सिर्फ़ इतना चाहता है कि हम उसे भूलें नहीं, और उसे लेकर किसी ऐसे के पास बैठ जाएँ जो अपनी सीमा जानता हो।

और आख़िर में वे नदियाँ। हम ज़िन्दगी भर अपनी कलाएँ गिनते रहते हैं, अपना नाम, अपना काम, अपनी साँस, अपनी श्रद्धा, अपना अन्न, अपना जमा किया हुआ तप। इस उपनिषद् के अनुसार इनमें से कुछ भी बेकार नहीं जाता, इनमें से कुछ भी नष्ट नहीं होता। बस एक जगह ऐसी है जहाँ पहुँचकर इनके अलग-अलग नाम काम आना बन्द कर देते हैं, जैसे समुद्र में पहुँची हुई नदी का नाम। उस जगह को पिप्पलाद ने कहीं दूर नहीं बताया। उन्होंने कहा, वह यहीं है, इसी देह के भीतर, और यही एक वाक्य इस पूरे उपनिषद् को हमारे दरवाज़े तक ले आता है।

आधार: प्रश्न उपनिषद्, छहों प्रश्न, प्रथम से षष्ठ; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।