प्रश्नोपनिषद्

Six Students, Six Questions, One Master
अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा
कुल 67 मन्त्र, छह प्रश्नों में बँटे। हर प्रश्न एक अलग शिष्य का है, और हर उत्तर पिप्पलाद ऋषि का। यह उपनिषद् अपने नाम के अनुरूप ही चलती है, सब कुछ प्रश्न-उत्तर के through।
॥ ओं भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ॥
हे देवों, हम कानों से कल्याणकारी बातें सुनें, आँखों से कल्याणकारी देखें, स्थिर शरीर से तुम्हारी सेवा करते रहें।
पढ़ने का समय: लगभग 35 मिनट

Background

प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा से ली गई है। नाम ‘प्रश्न’ इसलिए, क्योंकि पूरी उपनिषद् छह प्रश्नों और उनके उत्तरों पर खड़ी है।

एक बार छह विद्यार्थी समिधा (हाथ में पवित्र लकड़ी) लेकर पिप्पलाद ऋषि के पास आए। उन्होंने कहा, ‘गुरुदेव, हमारे प्रश्न हैं। आप ही ब्रह्म-विद्या के सबसे बड़े ज्ञाता हैं। हमें बताइए।’ पिप्पलाद ने कहा, ‘एक साल मेरे यहाँ ब्रह्मचर्य से रहो, फिर पूछो।’

एक साल बाद, हर शिष्य ने एक-एक प्रश्न पूछा। पिप्पलाद ने हर एक का जवाब दिया, और इस तरह छह प्रश्नों में पूरी ब्रह्म-विद्या खुली।

यह उपनिषद् की एक ख़ासियत है: यहाँ शिष्य-शिक्षा का format बहुत साफ़ है। हर प्रश्न एक specific issue पर है, और हर उत्तर systematic है। यह उपनिषद् को पढ़ने में बहुत friendly बनाता है, क्योंकि हर section अपने आप में पूरी है।

छह प्रश्न six layers हैं: सृष्टि (कहाँ से आया सब?), देव-तत्व (शरीर में कौन-कौन है?), प्राण (जीवन-शक्ति कहाँ से?), स्वप्न (नींद में कौन देखता है?), ओम् (ध्यान से कहाँ पहुँचता है?), और अंत में सोलह-कला वाला पुरुष (असली ‘मैं’ क्या है?)। यह क्रम accidental नहीं है। बाहर से शुरू, अंदर तक का सफ़र।

कथा-सार (Story in Brief)

छह नौजवान शिष्य पिप्पलाद के पास आते हैं। हाथ में समिधा, मन में सवाल। नाम हैं: कबन्धी कात्यायन, भार्गव वैदर्भि, कौसल्य आश्वलायन, सौर्यायणी गार्ग्य, शैब्य सत्यकाम, और सुकेश भारद्वाज।

पिप्पलाद कहते हैं, ‘एक साल यहाँ रहो, ब्रह्मचर्य से, फिर पूछो।’ यह वेदान्त की पुरानी परंपरा है, सीखने से पहले तैयारी।

एक साल बाद, हर एक अपना सवाल पूछता है। कबन्धी पूछता है, ‘सब प्राणी कहाँ से आते हैं?’ पिप्पलाद बताते हैं, प्रजापति ने तप किया और ‘रयि’ और ‘प्राण’ दो जोड़े बनाए। यहीं से सब निकला।

भार्गव पूछता है, ‘शरीर में कौन-कौन से देव हैं?’ पिप्पलाद पाँच भूत और इन्द्रियों की list देते हैं। फिर कहते हैं, ‘इन सब में सबसे ऊँचा प्राण है। बाक़ी सब उसके बिना कुछ नहीं।’

कौसल्य पूछता है, ‘प्राण कहाँ से आता है, और शरीर में कैसे जाता है?’ पिप्पलाद का जवाब: ‘प्राण आत्मा से आता है, छाया की तरह। और शरीर में पाँच रूपों में बँटता है, हर एक का अपना काम।’

सौर्यायणी पूछता है, ‘नींद में क्या होता है? कौन देखता है सपने? कौन सुखी है सुषुप्ति में?’ पिप्पलाद बताते हैं, इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, मन प्राण में, और प्राण अपने स्रोत में। यहीं वो आनन्द है जिसे हम ‘गहरी नींद’ कहते हैं।

शैब्य पूछता है, ‘मरते वक़्त जो ओम् पर ध्यान देता है, वो कहाँ जाता है?’ पिप्पलाद कहते हैं, ओम् के तीन अक्षर तीन स्तर हैं। एक अक्षर पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, दो पर चाँद-लोक, तीनों पर सूर्य-लोक, और तीनों के पार जो है, वो ब्रह्म पाता है।

अंत में सुकेश पूछता है, ‘क्या सोलह-कला वाला पुरुष है? कौन है वो?’ पिप्पलाद का जवाब: ‘पुरुष यहीं तुम्हारे अंदर है। उसने सोलह कलाएँ बनाईं, मगर पुरुष ख़ुद कलाओं से ऊपर है। जब तुम जान लोगे तो कलाएँ भी मिट जाएँगी, और पुरुष बच जाएगा।’

Introduction

अगर आपके मन में कभी एक ही समय में कई-कई questions उठें, तो आप समझेंगे इन छह शिष्यों को। वो सब अलग-अलग सवाल लेकर आए हैं, मगर मूल में सब एक ही बात पूछ रहे हैं: ‘मैं कौन हूँ, और यह सब कहाँ से?’

पिप्पलाद ने एक-एक करके जवाब दिए। और दिलचस्प यह है कि कोई जवाब अधूरा नहीं, हर एक अपने आप में पूरा है। मगर सबको साथ रखकर पढ़ें, तो एक complete picture बनती है।

प्रश्न 1

कबन्धी कात्यायन का प्रश्न: सब प्राणी कहाँ से?
सबसे basic सवाल। सृष्टि की शुरुआत कहाँ से हुई? रयि और प्राण के जोड़े का सिद्धान्त।

मन्त्र 1.1

सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः
सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो
भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनः ते हैते
ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः
एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो
भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥
साधारण अनुवादसुकेशा, शैब्य, सौर्यायणी, कौसल्य, भार्गव, और कबन्धी, ये छह ब्रह्म-निष्ठ विद्यार्थी, परम ब्रह्म की खोज में, समिधा हाथ में लेकर पिप्पलाद ऋषि के पास पहुँचे। उन्होंने सोचा था, यह ऋषि सब कुछ बता देंगे।

उपनिषद् की शुरुआत में ही छह नौजवानों की list। यह छोटी सी बात नहीं है। एक guru, छह students। हर शिष्य की अपनी curiosity। हर एक एक अलग angle से ब्रह्म को पकड़ना चाहता है।

‘समिधा हाथ में’ का मतलब है: हम सीखने को तैयार हैं, अपनी विनम्रता के साथ। यह वेदान्त की old tradition है, guru के पास खाली हाथ नहीं जाते।

मन्त्र 1.2

तान् ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण
श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ ।
यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत यदि विज्ञास्यामः
सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘एक साल और तप, ब्रह्मचर्य, और श्रद्धा से यहाँ रहो। फिर इच्छा से प्रश्न पूछना। अगर मैं जान सकूँगा, तो सब बता दूँगा।’

पिप्पलाद का जवाब बहुत characteristic है: ‘जल्दबाज़ी मत करो, एक साल और तप करो।’ यह कोई delay-tactic नहीं है। यह एक test है।

एक साल में जो बच्चे टिक जाएँगे, वही सीखने लायक होंगे। बाक़ी बीच में ही चले जाएँगे। पिप्पलाद यह screening कर रहे हैं।

मन्त्र 1.3

अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ ।
भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥
साधारण अनुवादएक साल बाद कबन्धी कात्यायन ने पूछा, ‘गुरुदेव, ये सब प्राणी कहाँ से उत्पन्न होते हैं?’

एक साल बाद कबन्धी पहला सवाल पूछता है। सबसे basic question: ‘सब प्राणी कहाँ से आते हैं?’ यह वो सवाल है जो हर बच्चा अपनी माँ से पूछता है। और जिसका जवाब philosophy/science आज भी पूरा नहीं पाई।

मन्त्र 1.4

तस्मै स होवाच ।
प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत
स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते रयिं च प्राणं चैत्यौ मे बहुधा
प्रजाः करिष्यत इति ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘प्रजापति को सृष्टि की इच्छा हुई। उन्होंने तप किया। तप करके एक मिथुन (जोड़ा) उत्पन्न किया: रयि (पदार्थ) और प्राण (ऊर्जा)। सोचा, ये दोनों मिलकर कई तरह की प्रजाएँ बनाएँगी।’

पिप्पलाद का जवाब creation-myth नहीं, structural है। ‘प्रजापति ने तप किया, और एक जोड़ा बनाया, रयि और प्राण।’

‘रयि’ = matter, पदार्थ, female principle। ‘प्राण’ = energy, ऊर्जा, male principle। दोनों मिलकर सब प्रजा बनी। यह यिन-यांग का Indian रूप है। बहुत basic level पर सब चीज़ें इन्हीं दो की कुश्ती हैं।

मन्त्र 1.5

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमाः ।
रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च ।
तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥
साधारण अनुवादसूर्य प्राण है, चन्द्र रयि। जो भी मूर्त (form-ful) और अमूर्त (form-less) है, सब रयि का अंग है। तो मूर्ति यानी रयि।

‘सूर्य प्राण है, चन्द्र रयि।’ Day-energy, night-substance। यह सिर्फ़ astronomy नहीं, हर level पर: active force vs receptive substance।

‘जो भी मूर्त-अमूर्त है, सब रयि।’ यानी जो आँखों से दिखता है, और जो दिखाई नहीं देता मगर बस उसकी ज़रूरत है, सब रयि है। प्राण उसको चलाने वाली ऊर्जा।

मन्त्र 1.6

अथादित्य उदयन् यत् प्राचीं दिशं प्रविशति
तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ।
यद्दक्षिणां यत् प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो
यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत् सर्वं प्रकाशयति
तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥
साधारण अनुवादउगता सूर्य पूर्व दिशा में प्रवेश करके, उस दिशा के प्राणों को अपनी किरणों में समेट लेता है। ऐसे ही दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर, और बीच की दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, वो सब प्राणों को अपने में समेटता है।

अब सूर्य के through एक छोटा cosmic mechanism बताते हैं। सूर्य उगते वक़्त, हर दिशा से ‘प्राण’ को अपनी किरणों में समेटता है।

तो सूर्य सिर्फ़ rosानी नहीं देता, वो प्राण भी देता है। सब living systems को energize करता है, साँस-भर ही नहीं, उन्हें अंदर से ज़िंदा रखता है।

मन्त्र 1.7

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते ।
तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥
साधारण अनुवादयही वैश्वानर है, विश्व-रूप, प्राण, अग्नि, जो उदय हो रहा है। ऋग्वेद का एक श्लोक भी इसे कहता है।

(मन्त्र 1.7 और 1.8 साथ:) सूर्य ही वैश्वानर है, विश्व-रूप, अग्नि। ऋग्वेद का एक श्लोक भी इसी पर बात करता है: ‘हज़ार किरणें, सौ रूप, प्रजाओं का प्राण।’

मन्त्र 1.8

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं
परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः
प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥
साधारण अनुवाद‘विश्व-रूप, हरि-वर्ण, सब-जन्मों-का-जानकार, परायण, एक ज्योति, तपता हुआ। हज़ार किरणें, सौ रूप, यह सूर्य ही प्रजाओं का प्राण है।’

(मन्त्र 1.7 और 1.8 साथ:) सूर्य ही वैश्वानर है, विश्व-रूप, अग्नि। ऋग्वेद का एक श्लोक भी इसी पर बात करता है: ‘हज़ार किरणें, सौ रूप, प्रजाओं का प्राण।’

मन्त्र 1.9

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च ।
तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते
ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते ।
त एव पुनरावर्तन्ते ।
तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते ।
एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥
साधारण अनुवादसंवत्सर (साल) ही प्रजापति है। उसके दो रास्ते: दक्षिणायन और उत्तरायण। जो लोग ‘इष्ट-पूर्त’ (यज्ञ-दान) कर्म करके स्वर्ग चाहते हैं, वो चान्द्रमस लोक पाते हैं, मगर वहाँ से लौटना पड़ता है। इसलिए संतान चाहने वाले ऋषि दक्षिणायन का रास्ता पकड़ते हैं। यही ‘पितृयाण’ है, यानी ‘रयि’ का रास्ता।

एक important distinction: दो रास्ते। दक्षिणायन और उत्तरायण। यानी सूर्य के दो half-yearly journeys।

दक्षिणायन का रास्ता पकड़ने वाले ‘इष्ट-पूर्त’ करते हैं (यज्ञ, दान, मंदिर बनवाना)। वो चन्द्र-लोक पाते हैं। लेकिन यहाँ catch है: ‘पुनरावर्तन्ते।’ वहाँ से लौटना पड़ता है, फिर जन्म।

तो यह ‘पितृयाण’ है, यानी पितरों का रास्ता। संतान चाहने वालों का।

मन्त्र 1.10

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्य आदित्यमभिजयन्ते ।
एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणम् ।
एतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ।
तदेष श्लोकः ॥
साधारण अनुवादउत्तरायण का रास्ता तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, और विद्या से आत्मा को खोजने वाले लोग पकड़ते हैं। वे आदित्य को पाते हैं। यही प्राणों का आयतन है, यही अमृत है, अभय है, परायण है। यहाँ से लौटना नहीं। यही निरोध (मुक्ति) है। एक श्लोक भी कहता है।

दूसरा रास्ता: उत्तरायण। तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, और विद्या से आत्मा को खोजने वाले। वो आदित्य को पाते हैं। और यहाँ से लौटना नहीं।

यह कैसा है? यह deva-yana है। मुक्ति का रास्ता। यहाँ pita-yana से अलग है, क्योंकि कर्म + तकनीक + वैराग्य का जोड़ है। बाद में भगवद् गीता 8.24-25 में यह आता है।

मन्त्र 1.11

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं
दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ।
अथेमेऽन्ये उ परे विचक्षणं
सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥
साधारण अनुवाद‘पाँच पाद वाले पिता, बारह आकृति वाले, आकाश के परे आधे में, जल-धारी कहे गए हैं। और कुछ अन्य विचक्षण लोग कहते हैं, वो सात चक्र वाले, छह अरों वाले रथ में स्थित हैं।’

एक थोड़ा रहस्यमय श्लोक। ‘पाँच पाद, बारह आकृति वाला पिता।’ टीकाकारों ने explanation दिए हैं: पाँच ऋतुएँ, बारह महीने। ‘सात चक्र, छह अरे वाला’ = सूर्य की कलाएँ। लेकिन literal exact meaning पर मतभेद है।

मन्त्र 1.12

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणः ।
तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥
साधारण अनुवादमहीना भी प्रजापति है। उसका कृष्ण-पक्ष रयि, शुक्ल-पक्ष प्राण। इसलिए ऋषि शुक्ल-पक्ष में यज्ञ करते हैं, बाक़ी लोग दूसरे में।

(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)

अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।

आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।

मन्त्र 1.13

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः ।
प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ।
ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥
साधारण अनुवाददिन-रात भी प्रजापति है। दिन प्राण, रात रयि। जो दिन में रति-क्रिया करते हैं, वो प्राण को क्षीण करते हैं। रात में जो रति करते हैं, वो ब्रह्मचर्य है।

(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)

अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।

आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।

मन्त्र 1.14

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्ते ॥
साधारण अनुवादअन्न भी प्रजापति है। अन्न से रेत बनता है, रेत से प्रजाएँ।

(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)

अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।

आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।

मन्त्र 1.15

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ।
तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥
साधारण अनुवादजो प्रजापति-व्रत (मिथुन-धर्म) ठीक से निभाते हैं, वो प्रजा उत्पन्न करते हैं। उन्हीं को ब्रह्म-लोक मिलता है, जिनमें तप, ब्रह्मचर्य, और सत्य स्थापित है।

(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)

अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।

आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।

मन्त्र 1.16

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥
साधारण अनुवादउनको वो विरज (रजोगुण-रहित) ब्रह्म-लोक मिलता है, जहाँ कोई जिह्म (कुटिल), अनृत (झूठ), और माया नहीं।

(अगले मन्त्र:) महीना भी प्रजापति है, उसका कृष्ण-पक्ष रयि और शुक्ल-पक्ष प्राण। दिन-रात भी। दिन में रति-क्रिया प्राण को क्षीण करती है, रात में करना ब्रह्मचर्य है। (परंपरा का एक prescription।)

अन्न प्रजापति है। अन्न से रेत, रेत से प्रजाएँ। और जो प्रजापति-व्रत ठीक से निभाता है, वो प्रजा भी पैदा करता है और ब्रह्म-लोक भी पाता है, अगर साथ में तप-ब्रह्मचर्य-सत्य हो।

आख़िरी मन्त्र: वो विरज ब्रह्म-लोक, जहाँ कुटिलता, झूठ, और माया नहीं।

सारएक वाक्य में: सब प्राणी प्रजापति के दो जोड़ों, रयि और प्राण, से बने हैं। पदार्थ और ऊर्जा का यह मेल पूरी सृष्टि चलाता है।

प्रश्न 2

भार्गव का प्रश्न: शरीर में कितने देव? कौन ऊँचा?
शरीर एक सभा है। अग्नि, वायु, चक्षु, श्रोत्र, मन, प्राण, सब अंदर हैं। पर सब में सबसे महत्वपूर्ण कौन?

मन्त्र 2.1

अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ ।
भगवन् कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते
कतर एतत् प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥
साधारण अनुवादफिर भार्गव वैदर्भि ने पूछा, ‘गुरुदेव, शरीर में कितने देव हैं? कौन-कौन से इसे प्रकाशित करते हैं? और इनमें सबसे श्रेष्ठ कौन है?’

दूसरा प्रश्न-वाला आता है, भार्गव वैदर्भि। उसका सवाल अलग है: ‘शरीर में कितने देव हैं?’

यह सिर्फ़ anatomy नहीं है। यह ‘who is in charge?’ question है। शरीर में आँख-कान-नाक-मन-बुद्धि सब काम कर रहे हैं। कौन इन्हें coordinate कर रहा है?

मन्त्र 2.2

तस्मै स होवाच ।
आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ।
ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘आकाश यह देव है, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, मन, चक्षु, और कान, ये सब। इन्होंने एक बार खुद को महिमामय मानकर कहा, हम ही हैं जो इस बाण (शरीर) को टिकाए हुए हैं।’

ऋषि का जवाब: ‘सब देव हैं।’ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, मन, चक्षु, श्रोत्र। नौ basic forces।

‘ते प्रकाश्याभिवदन्ति’ = ‘इन्होंने प्रकाश में आकर कहा’। यानी एक conference हुई, और सब बोले, ‘हम ही इस शरीर को टिकाए हुए हैं।’

मन्त्र 2.3

तान् वरिष्ठः प्राण उवाच ।
मा मोहमापद्यथाहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति ।
तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥
साधारण अनुवादतब वरिष्ठ प्राण ने कहा, ‘मोह में मत पड़ो। मैं ही पाँच रूपों में अपने आप को बाँटकर इस शरीर को टिकाए हूँ।’ पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ।

तब प्राण बोला, ‘मोह में मत पड़ो।’ मगर बाक़ी सब को विश्वास नहीं हुआ। ‘अश्रद्दधाना बभूवुः।’ यह एक छोटा सा drama है, मगर बहुत meaningful।

मन्त्र 2.4

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रामत इव ।
तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते ।
तस्मिꣳश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते ।
तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तꣳ सर्वा एवोत्क्रामन्ते
तस्मिꣳश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्ते एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ।
ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥
साधारण अनुवादअहंकार में आकर प्राण ऊपर उठने लगा, यानी शरीर से निकलने लगा। उसके निकलते ही बाक़ी सब इन्द्रियाँ भी निकलने लगीं। जैसे रानी-मधुमक्खी उड़ जाए तो सब मधुमक्खियाँ उसके साथ। फिर जब प्राण स्थिर हुआ, सब स्थिर हुईं। तब इन्द्रियाँ खुश होकर प्राण की स्तुति करने लगीं।

तब प्राण ने demonstration किया। ‘अहंकार में आकर ऊपर उठने लगा,’ यानी शरीर से निकलने लगा। और जैसे ही प्राण निकला, बाक़ी सब इन्द्रियाँ भी निकलने लगीं।

‘जैसे रानी-मधुमक्खी उड़ जाए तो सब मधुमक्खियाँ उसके साथ।’ यह बहुत iconic image है। प्राण = queen bee। बाक़ी इन्द्रियाँ = worker bees।

तब सब समझ गए। और ‘प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति’ = ‘खुश होकर प्राण की स्तुति करने लगे।’

मन्त्र 2.5

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः ।
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥
साधारण अनुवाद‘यही अग्नि है जो तपती है। यही सूर्य है। यही पर्जन्य (बारिश का देव) है, यही इन्द्र है, यही वायु है, यही पृथ्वी है, यही रयि देव है, यही सत्-असत्, और यही अमृत।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.6

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
ऋचो यजूꣳषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे रथ-नाभि (पहिये के बीच) में अरे (spokes) टिके होते हैं, वैसे ही प्राण में सब टिका है। ऋग, यजुष, साम, यज्ञ, क्षत्र, और ब्रह्म, सब।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.7

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे ।
तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥
साधारण अनुवाद‘तू प्रजापति है, तू गर्भ में चलता है, तू ही जन्म लेता है। तेरे लिए प्रजाएँ बलि (offerings) लाती हैं, क्योंकि तू ही प्राणों से सब को टिकाए है।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.8

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥
साधारण अनुवाद‘देवों में तू सबसे बड़ा वाहन है, पितरों की पहली स्वधा है, ऋषियों का सत्य-चरित है, अथर्व-अंगिरस का है तू।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.9

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥
साधारण अनुवाद‘हे प्राण, तेज से तू इन्द्र है, रक्षक रूप में रुद्र है। अंतरिक्ष में चलता है, सूर्य है, तू ज्योतियों का स्वामी है।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.10

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥
साधारण अनुवाद‘जब तू बरसता है (बारिश की तरह), तब प्रजाएँ आनन्द-रूप होकर खड़ी होती हैं। और जब इच्छा होती है, अन्न होता है।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.11

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥
साधारण अनुवाद‘तू व्रात्य है (अनिर्धारित जीवन वाला), एकर्षि है, अत्ता (खाने वाला) है, विश्व का सत्-पति है। हम तेरे पहले देने वाले हैं, तू मातरिश्व, हमारा पिता है।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.12

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥
साधारण अनुवाद‘जो तेरा रूप वाणी में, श्रोत्र में, चक्षु में, और मन में फैला है, उसे शिव (मंगलमय) कर। उसे मत निकल जाने दे।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

मन्त्र 2.13

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत् प्रतिष्ठितम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥
साधारण अनुवाद‘त्रिदिव (तीन लोकों) में जो टिका है, सब प्राण के वश में है। माँ जैसे बच्चों को रखती है, हमें रख। हमारे लिए श्री (समृद्धि) और प्रज्ञा दे।’

(मन्त्र 2.5 से 2.13 तक:) यह सब इन्द्रियों की प्राण-स्तुति है। प्राण को अग्नि, सूर्य, पर्जन्य, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, सत्-असत्, अमृत, सब कहा गया।

‘अरे रथ-नाभि की तरह प्राण में सब टिका है।’ पूरा knowledge-system, ऋग-यजुष-साम-यज्ञ, सब प्राण पर।

आख़िर में एक प्रार्थना: ‘माँ की तरह हमें रख। श्री और प्रज्ञा दे।’ यह उपनिषद् की मानवीय रूप है, philosophy को प्रार्थना में बदल देती है।

सारएक वाक्य में: शरीर में नौ देव हैं, मगर सब में सबसे ऊँचा प्राण है। प्राण निकल जाए तो बाक़ी सब भी निकल जाते हैं।

प्रश्न 3

कौसल्य का प्रश्न: प्राण कहाँ से, कैसे आता है?
प्राण का anatomy। वो आत्मा की छाया है, और शरीर में पाँच रूपों में काम करता है। यह उपनिषद् का सबसे technical हिस्सा।

मन्त्र 3.1

अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ ।
भगवन् कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीरे
आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते
कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥
साधारण अनुवादफिर कौसल्य आश्वलायन ने पूछा, ‘गुरुदेव, यह प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? शरीर में कैसे आता है? अपने आप को कैसे बाँटकर रहता है? कैसे बाहर निकलता है? बाहर और अंदर का संबंध क्या?’

तीसरा प्रश्न, कौसल्य आश्वलायन का। बहुत specific: ‘प्राण कहाँ से? कैसे आता है? कैसे बँटता है? कैसे निकलता है?’

यह almost एक medical question है। प्राण-anatomy।

मन्त्र 3.2

तस्मै स होवाच ।
अतिप्रश्नान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘तुम तो बड़े सूक्ष्म प्रश्न पूछ रहे हो। ब्रह्म-निष्ठ हो, इसलिए मैं तुम्हें बताता हूँ।’

ऋषि कहते हैं, ‘तुम तो बहुत सूक्ष्म पूछ रहे हो, मगर तुम ब्रह्म-निष्ठ हो, मैं तुम्हें बताता हूँ।’

मन्त्र 3.3

आत्मन एष प्राणो जायते ।
यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥
साधारण अनुवाद‘प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है। जैसे पुरुष की छाया उससे निकलती है, वैसे ही प्राण आत्मा से। मन के संकल्प से वो शरीर में आता है।’

‘प्राण आत्मा से जन्मता है।’ जैसे आदमी की छाया उससे निकलती है। यह छाया का रूपक बहुत powerful है, क्योंकि छाया अपने source से अलग नहीं हो सकती।

‘मनोकृतेन आयाति’ = ‘मन के संकल्प से आता है।’ यानी जब आत्मा एक specific birth लेना चाहती है, उसका ‘thought’ प्राण के form में materialize होता है।

मन्त्र 3.4

यथा सम्राडेवाधिकृतान् विनियुङ्क्ते ।
एतान् ग्रामानेतान् ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे एक सम्राट अपने अधिकारियों को alag-alag जगहों पर नियुक्त करता है, ”तुम इन गाँवों के देखो, तुम उन गाँवों के,” वैसे ही प्राण बाक़ी प्राणों को अलग-अलग जगहों पर रखता है।’

शरीर एक राज्य है। प्राण उसका राजा। राजा अपने adhikari (officers) को अलग-अलग गाँवों में रखता है। ऐसे ही प्राण शरीर के अलग हिस्सों में अलग प्राणों को बैठाता है: अपान नीचे, समान बीच, और प्राण self ऊपर।

सात अग्नियाँ = सिर के सात openings (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुँह)। सब प्राण की अग्नि से चलते हैं।

मन्त्र 3.5

पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः ।
एष ह्येतद्धुतमन्नꣳ समं नयति ।
तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥
साधारण अनुवाद‘पायु-उपस्थ (निचले अंगों) में अपान, चक्षु-श्रोत्र-मुख-नासिका में स्वयं प्राण, और बीच में समान। जो हवि-अन्न खाया जाता है, उसे समान बराबर बाँटता है। इसलिए सात अग्नियाँ (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुँह) उठती हैं।’

शरीर एक राज्य है। प्राण उसका राजा। राजा अपने adhikari (officers) को अलग-अलग गाँवों में रखता है। ऐसे ही प्राण शरीर के अलग हिस्सों में अलग प्राणों को बैठाता है: अपान नीचे, समान बीच, और प्राण self ऊपर।

सात अग्नियाँ = सिर के सात openings (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुँह)। सब प्राण की अग्नि से चलते हैं।

मन्त्र 3.6

हृदि ह्येष आत्मा ।
अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतꣳ शतमेकैकस्या द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्ति
आसु व्यानश्चरति ॥
साधारण अनुवाद‘हृदय में ही आत्मा है। यहाँ एक सौ एक मुख्य नाड़ियाँ हैं। हर एक की सौ शाखाएँ, हर शाखा की बहत्तर हज़ार शाखाएँ। इन सब में व्यान बहता है।’

‘हृदय में आत्मा है।’ एक सौ एक नाड़ियाँ, हर एक की सौ शाखाएँ। यह योग-शरीर-शास्त्र का foundation है।

उदान ऊपर जाता है। पुण्य-कर्म वाले को पुण्य-लोक, पाप वाले को पाप-लोक, और दोनों मिले हों तो मनुष्य-लोक। यानी मरने के बाद का destination उदान-flow पर depend करता है।

मन्त्र 3.7

अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति
पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥
साधारण अनुवाद‘फिर एक से ऊपर उदान चलता है। पुण्य से पुण्य-लोक, पाप से पाप-लोक, और दोनों मिले हों तो मनुष्य-लोक देता है।’

‘हृदय में आत्मा है।’ एक सौ एक नाड़ियाँ, हर एक की सौ शाखाएँ। यह योग-शरीर-शास्त्र का foundation है।

उदान ऊपर जाता है। पुण्य-कर्म वाले को पुण्य-लोक, पाप वाले को पाप-लोक, और दोनों मिले हों तो मनुष्य-लोक। यानी मरने के बाद का destination उदान-flow पर depend करता है।

मन्त्र 3.8

आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः ।
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥
साधारण अनुवाद‘बाहर का प्राण आदित्य है, जो रोज़ उगता है, और जो शरीर के चाक्षुष-प्राण को मदद देता है। पृथ्वी की देवी अपान को सहारा देती है। बीच में जो आकाश है, वो समान, और वायु व्यान है।’

बाहर का प्राण आदित्य है, अंदर का प्राण उससे जुड़ा है। यह ‘micro-macro correspondence’ का continuation।

तेज ही उदान है। जब तेज शान्त हो जाता है, मतलब मरते वक़्त, तब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और मन प्राण के साथ चलता है।

आख़िर में: ‘जिसका जो चित्त, उसी के साथ प्राण लौटता है।’ Death-time consciousness next birth determine करता है। यह बात Bhagavad Gita 8.6 में भी आती है।

मन्त्र 3.9

तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः ।
पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥
साधारण अनुवाद‘तेज ही उदान है। तेज शान्त होने पर मनुष्य फिर जन्म लेता है, इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं।’

बाहर का प्राण आदित्य है, अंदर का प्राण उससे जुड़ा है। यह ‘micro-macro correspondence’ का continuation।

तेज ही उदान है। जब तेज शान्त हो जाता है, मतलब मरते वक़्त, तब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और मन प्राण के साथ चलता है।

आख़िर में: ‘जिसका जो चित्त, उसी के साथ प्राण लौटता है।’ Death-time consciousness next birth determine करता है। यह बात Bhagavad Gita 8.6 में भी आती है।

मन्त्र 3.10

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति ।
प्राणस्तेजसा युक्तः सहाऽऽत्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥
साधारण अनुवाद‘जिसका जो चित्त (अंतिम विचार) होता है, उसी के साथ प्राण लौटता है। प्राण तेज से मिलकर, आत्मा के साथ, संकल्पित लोक में ले जाता है।’

बाहर का प्राण आदित्य है, अंदर का प्राण उससे जुड़ा है। यह ‘micro-macro correspondence’ का continuation।

तेज ही उदान है। जब तेज शान्त हो जाता है, मतलब मरते वक़्त, तब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और मन प्राण के साथ चलता है।

आख़िर में: ‘जिसका जो चित्त, उसी के साथ प्राण लौटता है।’ Death-time consciousness next birth determine करता है। यह बात Bhagavad Gita 8.6 में भी आती है।

मन्त्र 3.11

य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति ।
तदेष श्लोकः ॥
साधारण अनुवाद‘जो विद्वान् इस प्राण को ऐसा जानता है, उसकी प्रजा क्षीण नहीं होती, वो अमर हो जाता है। एक श्लोक भी कहता है।’

‘जो विद्वान् प्राण को ऐसा जानता है, उसकी प्रजा क्षीण नहीं होती।’ यानी उसकी lineage भी चलती है, और वो अमर भी होता है।

आख़िरी मन्त्र: प्राण की पाँच चीज़ें जानो, अमृत मिलेगा। दोहराव से finality।

मन्त्र 3.12

उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥
साधारण अनुवाद‘प्राण की उत्पत्ति, आगमन, स्थान, पाँच रूपों में बँटाव, और अध्यात्म (self) में स्थिति, जो विज्ञान-पूर्वक जानता है, वो अमृत प्राप्त करता है, हाँ, अमृत प्राप्त करता है।’

‘जो विद्वान् प्राण को ऐसा जानता है, उसकी प्रजा क्षीण नहीं होती।’ यानी उसकी lineage भी चलती है, और वो अमर भी होता है।

आख़िरी मन्त्र: प्राण की पाँच चीज़ें जानो, अमृत मिलेगा। दोहराव से finality।

सारएक वाक्य में: प्राण आत्मा की छाया है, और शरीर में पाँच रूपों में बँटकर हर system को चलाता है। मरते वक़्त जो अंतिम विचार होता है, वही अगला जन्म तय करता है।

प्रश्न 4

सौर्यायणी का प्रश्न: नींद में क्या होता है?
जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति का breakdown। माण्डूक्य से बहुत मेल खाता है, मगर एक अलग angle से।

मन्त्र 4.1

अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ ।
भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति
कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति कस्यैतत् सुखं भवति
कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥
साधारण अनुवादसौर्यायणी गार्ग्य ने पूछा, ‘गुरुदेव, इस पुरुष में नींद में क्या-क्या सोता है? क्या जागता है? कौन सा देव स्वप्न देखता है? सुख किसको होता है? और सब किसमें टिक जाते हैं?’

चौथा प्रश्न सौर्यायणी का है, बहुत interesting: ‘नींद में क्या होता है?’

ऋषि का जवाब: एक beautiful analogy। सूर्य अस्त होने पर उसकी किरणें उसमें मिल जाती हैं। उगने पर निकलती हैं। ऐसे ही नींद में सब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं।

तब आदमी न देखता है, न सुनता है, न कुछ। ‘सो रहा है।’ यह सीधा सा description।

मन्त्र 4.2

तस्मै स होवाच ।
यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिन् तेजोमण्डल एकीभवन्ति ।
ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्ति एवꣳ ह वै तत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति ।
तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते
नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘जैसे सूर्य अस्त होते समय, सूर्य की किरणें उस तेज-मंडल में मिल जाती हैं, और फिर उगते समय निकलती हैं, ऐसे ही नींद में सब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं। तब पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न छूता है, न बोलता है, न लेता है, न आनन्द लेता है, न मलविसर्जन करता है, न चलता है। हम कहते हैं वो ”सो रहा है।”’

चौथा प्रश्न सौर्यायणी का है, बहुत interesting: ‘नींद में क्या होता है?’

ऋषि का जवाब: एक beautiful analogy। सूर्य अस्त होने पर उसकी किरणें उसमें मिल जाती हैं। उगने पर निकलती हैं। ऐसे ही नींद में सब इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं।

तब आदमी न देखता है, न सुनता है, न कुछ। ‘सो रहा है।’ यह सीधा सा description।

मन्त्र 4.3

प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति ।
गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥
साधारण अनुवाद‘इस नगर में प्राण-अग्नियाँ जागती रहती हैं। अपान गार्हपत्य-अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन-अग्नि है, और प्राण आहवनीय-अग्नि है, क्योंकि वो गार्हपत्य से लाया गया है।’

मगर एक twist। ‘प्राण-अग्नियाँ’ अभी भी जागती रहती हैं। शरीर में पाँच आहुतियाँ चल रही हैं।

एक यज्ञ-रूपक: अपान गार्हपत्य अग्नि, व्यान अन्वाहार्यपचन, प्राण आहवनीय। मन यजमान। उदान फल देने वाला। उदान रोज़-रोज़ यजमान को ब्रह्म तक ले जाता है।

मन्त्र 4.4

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः ।
मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवोदानः ।
स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥
साधारण अनुवाद‘जो उच्छ्वास-निःश्वास दो आहुतियाँ बराबर देता है, वो समान है। मन यजमान है, और इष्ट-फल उदान है। उदान यजमान को रोज़-रोज़ ब्रह्म तक ले जाता है।’

मगर एक twist। ‘प्राण-अग्नियाँ’ अभी भी जागती रहती हैं। शरीर में पाँच आहुतियाँ चल रही हैं।

एक यज्ञ-रूपक: अपान गार्हपत्य अग्नि, व्यान अन्वाहार्यपचन, प्राण आहवनीय। मन यजमान। उदान फल देने वाला। उदान रोज़-रोज़ यजमान को ब्रह्म तक ले जाता है।

मन्त्र 4.5

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति ।
यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतꣳ श्रुतमेवार्थमनुशृणोति
देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति ।
दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥
साधारण अनुवाद‘यहाँ यह देव (मन) स्वप्न में अपनी महिमा का अनुभव करता है। जो पहले देखा, उसे फिर देखता है, सुना उसे सुनता है। अलग-अलग जगहों और दिशाओं के अनुभवों को फिर अनुभव करता है। देखे-अनदेखे, सुने-अनसुने, अनुभव किए-नहीं किए, सत्-असत्, सब को देखता है, सब को होते देखता है।’

‘स्वप्न में यह देव अपनी महिमा अनुभव करता है।’ देखे-सुने-अनुभव किए सब को फिर देखता है। और ‘दृष्ट-अदृष्ट, श्रुत-अश्रुत, सत्-असत्, सब को देखता है।’

यह सपनों का बहुत साफ़ description है। सपने में हम सब कुछ देखते हैं, क्योंकि मन फ्री है। यहाँ tema-content combinations आते हैं जो जागते हुए नहीं हो सकते।

मन्त्र 4.6

स यदा तेजसाऽभिभूतो भवति ।
अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीरे एतत् सुखं भवति ॥
साधारण अनुवाद‘जब मन तेज से अभिभूत हो जाता है, तब इस देव को सपने भी नहीं आते। तब इस शरीर में यह सुख होता है (गहरी नींद का आनन्द)।’

‘जब मन तेज से अभिभूत होता है, तब सपने नहीं आते।’ यानी जब मन इतना थक जाता है कि कुछ भी project नहीं कर पाता, तब गहरी नींद।

‘तब इस शरीर में यह सुख होता है।’ सुषुप्ति का सुख। माण्डूक्य 5 भी यही कहती है।

मन्त्र 4.7

स यथा सोम्य वयाꣳसि वासोवृक्षꣳ संप्रतिष्ठन्ते
एवꣳ ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे, हे सोम्य, पक्षी (शाम को) अपने वासो-वृक्ष पर लौट जाते हैं, वैसे ही यह सब परम आत्मा में लौट जाते हैं।’

एक beautiful image। ‘जैसे पक्षी शाम को अपने वासो-वृक्ष पर लौट जाते हैं, वैसे ही सब परम आत्मा में लौट जाते हैं।’

नींद = roost। सब इन्द्रियाँ और मन परम आत्मा में आराम कर रहे हैं।

मन्त्र 4.8

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च
वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च
चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च
त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं च
उपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च
मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहंकारश्चाहंकर्तव्यं च
चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥
साधारण अनुवाद‘पृथिवी और पृथिवी-तत्व, जल और जल-तत्व, तेज और तेज-तत्व, वायु और वायु-तत्व, आकाश और आकाश-तत्व; चक्षु और दृश्य, श्रोत्र और श्राव्य, घ्राण और गन्ध, रस और रसयित्य, त्वचा और स्पर्श, वाणी और वाच्य, हाथ और गृह्य, उपस्थ और आनन्द्य, पायु और विसर्ज्य, पाँव और गन्तव्य; मन और मंतव्य, बुद्धि और बोद्धव्य, अहंकार और अहंकर्तव्य, चित्त और चेतयित्य, तेज और विद्योतयित्य, प्राण और विधारयित्य।’

एक long list, सब tattvas और उनके objects: पृथिवी और पृथिवी-तत्व, चक्षु और दृश्य, मन और मंतव्य। सब इन्हीं couples में पाए जाते हैं।

‘यही द्रष्टा, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सोचने वाला, करने वाला, विज्ञानात्मा पुरुष।’ सब functions का agent एक ही है। और वो परम अक्षर आत्मा में टिका है।

मन्त्र 4.9

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः ।
स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥
साधारण अनुवाद‘यही द्रष्टा है, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सूँघने वाला, स्वाद लेने वाला, सोचने वाला, समझने वाला, करने वाला, विज्ञानात्मा पुरुष। वो परम अक्षर आत्मा में स्थित है।’

एक long list, सब tattvas और उनके objects: पृथिवी और पृथिवी-तत्व, चक्षु और दृश्य, मन और मंतव्य। सब इन्हीं couples में पाए जाते हैं।

‘यही द्रष्टा, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सोचने वाला, करने वाला, विज्ञानात्मा पुरुष।’ सब functions का agent एक ही है। और वो परम अक्षर आत्मा में टिका है।

मन्त्र 4.10

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितꣳ शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य ।
स सर्वज्ञः सर्वो भवति ।
तदेष श्लोकः ॥
साधारण अनुवाद‘जो परम अक्षर को पाता है, वो जो छाया-रहित, शरीर-रहित, रक्त-रहित, शुभ्र, अक्षर है, वो हे सोम्य, सर्वज्ञ हो जाता है, सब हो जाता है। एक श्लोक भी कहता है।’

‘जो परम अक्षर को जानता है, वो सर्वज्ञ हो जाता है, सब हो जाता है।’ छाया-रहित, शरीर-रहित, रक्त-रहित, शुभ्र।

अक्षर को जानने वाला, सब में प्रवेश कर जाता है। यह ‘सर्वो भवति’ का meaning है, हर चीज़ बन जाता है।

मन्त्र 4.11

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥
साधारण अनुवाद‘विज्ञानात्मा सब देवों और प्राणों और भूतों के साथ जिसमें टिका है, वो अक्षर जिसे जान लेता है, वो सर्वज्ञ हो जाता है, सब में प्रवेश कर जाता है।’

‘जो परम अक्षर को जानता है, वो सर्वज्ञ हो जाता है, सब हो जाता है।’ छाया-रहित, शरीर-रहित, रक्त-रहित, शुभ्र।

अक्षर को जानने वाला, सब में प्रवेश कर जाता है। यह ‘सर्वो भवति’ का meaning है, हर चीज़ बन जाता है।

सारएक वाक्य में: नींद में इन्द्रियाँ मन में मिल जाती हैं, और सपने मन की अपनी रचना हैं। गहरी नींद में सब परम आत्मा में पक्षियों की तरह लौट जाते हैं।

प्रश्न 5

शैब्य का प्रश्न: ओम् का ध्यान कहाँ ले जाता है?
ओम् की मात्राओं पर ध्यान देने के तीन स्तर के परिणाम। एक मात्रा, दो मात्रा, और पूरा ओम्।

मन्त्र 5.1

अथ हैनꣳ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ ।
स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत
कतमं वै स तेन लोकं जयतीति ॥
साधारण अनुवादशैब्य सत्यकाम ने पूछा, ‘गुरुदेव, जो कोई मनुष्य मरते वक़्त ओ3म्-कार का ध्यान करता है, वो किस लोक को जीतता है?’

पाँचवाँ प्रश्न: ‘मरते वक़्त ओम् पर ध्यान देने वाला कहाँ जाता है?’

ऋषि का जवाब: ‘ओम् ही परम और अपर दोनों ब्रह्म हैं। विद्वान् इसी से एक या दूसरा पाता है।’

परम = निर्गुण ब्रह्म, attributes के बिना। अपर = सगुण ब्रह्म, ईश्वर। ओम् दोनों का door है।

मन्त्र 5.2

तस्मै स होवाच ।
एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः ।
तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘हे सत्यकाम, यह ओम्-कार ही परम-ब्रह्म और अपर-ब्रह्म दोनों है। विद्वान् इसी के सहारे एक या दूसरा पाता है।’

पाँचवाँ प्रश्न: ‘मरते वक़्त ओम् पर ध्यान देने वाला कहाँ जाता है?’

ऋषि का जवाब: ‘ओम् ही परम और अपर दोनों ब्रह्म हैं। विद्वान् इसी से एक या दूसरा पाता है।’

परम = निर्गुण ब्रह्म, attributes के बिना। अपर = सगुण ब्रह्म, ईश्वर। ओम् दोनों का door है।

मन्त्र 5.3

स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते ।
तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते ।
स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥
साधारण अनुवाद‘अगर वो केवल एक मात्रा (अ) पर ध्यान करता है, तो उसी से तुरंत ज्ञात होकर पृथ्वी पर पहुँचता है। ऋग्वेद के मन्त्र उसे मनुष्य-लोक तक ले जाते हैं। वहाँ वो तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा से महिमामय बनता है।’

तीन levels के results:

एक मात्रा (अ) पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, ऋग्वेद के mantras से। यानी पृथ्वी पर अच्छा जन्म।

दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान वाला सोम-लोक पाता है, यजुर्वेद के mantras से। यहाँ विभूति का अनुभव, फिर वापस।

तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से, साम-वेद के mantras से, ब्रह्म-लोक। ‘जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही पाप से निकल जाता है।’ और वहाँ वो परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। यह final मंजिल।

मन्त्र 5.4

अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् ।
स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥
साधारण अनुवाद‘अगर दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान करता है, तो वो मन में अंतरिक्ष को पाता है। यजुर्वेद के मन्त्र उसे सोम-लोक तक ले जाते हैं। वहाँ विभूति का अनुभव करके वो लौट आता है।’

तीन levels के results:

एक मात्रा (अ) पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, ऋग्वेद के mantras से। यानी पृथ्वी पर अच्छा जन्म।

दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान वाला सोम-लोक पाता है, यजुर्वेद के mantras से। यहाँ विभूति का अनुभव, फिर वापस।

तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से, साम-वेद के mantras से, ब्रह्म-लोक। ‘जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही पाप से निकल जाता है।’ और वहाँ वो परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। यह final मंजिल।

मन्त्र 5.5

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत
स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः ।
यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवꣳ ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् ।
स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ।
तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥
साधारण अनुवाद‘और जो तीनों मात्राओं (अ-उ-म) वाले ओम्-अक्षर से परम पुरुष का ध्यान करता है, वो सूर्य के तेज में मिल जाता है। जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही वो पाप से निकल जाता है। साम-वेद के मन्त्र उसे ब्रह्म-लोक ले जाते हैं। वहाँ वो इस जीव-घन (जीव-समूह) से ऊपर के परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। दो श्लोक हैं।’

तीन levels के results:

एक मात्रा (अ) पर ध्यान देने वाला मनुष्य-लोक पाता है, ऋग्वेद के mantras से। यानी पृथ्वी पर अच्छा जन्म।

दो मात्राओं (अ-उ) पर ध्यान वाला सोम-लोक पाता है, यजुर्वेद के mantras से। यहाँ विभूति का अनुभव, फिर वापस।

तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से, साम-वेद के mantras से, ब्रह्म-लोक। ‘जैसे साँप अपनी त्वचा से निकलता है, वैसे ही पाप से निकल जाता है।’ और वहाँ वो परम पुरुष को देखता है, जो हृदय-गुफा में बैठा है। यह final मंजिल।

मन्त्र 5.6

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता
अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु
सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥
साधारण अनुवाद‘तीन मात्राएँ मृत्यु-मय हैं अगर अलग-अलग use हों। मगर एक-दूसरे से जुड़ी, अविच्छिन्न रूप में, बाहरी-अंदरूनी-मध्यम सब क्रियाओं में ठीक से use हों, तो ज्ञानी नहीं हिलता।’

‘तीन मात्राएँ अलग-अलग use हों तो मृत्यु-मय हैं। साथ हों तो अमृत।’ ओम् को अच्छे से बोलना भी एक discipline है।

विद्वान् ओम् के सहारे ही उस शान्त, अजर, अमृत, अभय, और परम तक पहुँचता है।

मन्त्र 5.7

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षꣳ सामभिर्यत्तत् कवयो वेदयन्ते ।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥
साधारण अनुवाद‘ऋग से मनुष्य-लोक, यजुष से अंतरिक्ष, साम से जो परम है, ये कवि-लोग जानते हैं। विद्वान् ओम्-कार के सहारे ही उस शान्त, अजर, अमृत, अभय, और परम तक पहुँचता है।’

‘तीन मात्राएँ अलग-अलग use हों तो मृत्यु-मय हैं। साथ हों तो अमृत।’ ओम् को अच्छे से बोलना भी एक discipline है।

विद्वान् ओम् के सहारे ही उस शान्त, अजर, अमृत, अभय, और परम तक पहुँचता है।

सारएक वाक्य में: ओम् पर अधूरा ध्यान मनुष्य-लोक या चन्द्र-लोक देता है, मगर पूरा तीन-मात्रा वाला ध्यान ब्रह्म-लोक तक ले जाता है।

प्रश्न 6

सुकेश का प्रश्न: सोलह-कला वाला पुरुष कहाँ?
अंतिम प्रश्न, सबसे ऊँचा। पुरुष ही सब का स्रोत है। और जो खुद को पुरुष जान लेता है, उसके लिए कलाएँ मिट जाती हैं।

मन्त्र 6.1

अथ हैनꣳ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ ।
भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत
षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद ।
यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति ।
समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् ।
स तूष्णीꣳ रथमारुह्य प्रवव्राज ।
तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥
साधारण अनुवादसुकेशा भारद्वाज ने पूछा, ‘गुरुदेव, एक बार हिरण्यनाभ कौसल्य राजकुमार ने मेरे पास आकर पूछा, ”भारद्वाज, क्या तुम सोलह-कला वाले पुरुष को जानते हो?” मैंने कहा, ”नहीं जानता। अगर जानता तो क्यों न बताता? जो झूठ बोले, वो जड़ से सूख जाए। मैं झूठ नहीं बोल सकता।” वो चुप-चाप रथ पर बैठकर चला गया। आपसे पूछता हूँ, कहाँ है वो पुरुष?’

आख़िरी प्रश्न, सुकेश का। उसने एक backstory बताई। एक राजकुमार ने उससे पूछा था, ‘सोलह-कला वाला पुरुष कहाँ?’ सुकेश ने मना कर दिया, क्योंकि वो नहीं जानता था।

एक beautiful integrity: ‘जो झूठ बोले, वो जड़ से सूख जाए।’ यानी झूठ बोलकर knowledge gap छिपाना खुद को कमज़ोर करना है।

अब वो पिप्पलाद से पूछ रहा है, ‘कहाँ है वो पुरुष?’

मन्त्र 6.2

तस्मै स होवाच ।
इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥
साधारण अनुवादऋषि ने कहा, ‘हे सोम्य, यहीं इस शरीर के अंदर वो पुरुष है, जिसमें ये सोलह कलाएँ उत्पन्न होती हैं।’

ऋषि का जवाब बहुत simple: ‘यहीं इस शरीर के अंदर।’ यानी सोलह-कला वाला पुरुष कोई बाहरी god नहीं, आपके अंदर ही है।

मन्त्र 6.3

स ईक्षाञ्चक्रे ।
कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥
साधारण अनुवाद‘उसने सोचा, ”किसके निकलने से मैं निकलूँगा, और किसके टिकने से मैं टिकूँगा?” ‘

पुरुष ने सोचा, ‘मेरे निकलने से कौन निकलेगा? टिकने से कौन टिकेगा?’

फिर एक creation sequence। प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, फिर पाँच elements, इन्द्रियाँ, मन। फिर अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, और लोकों में नाम।

तो सोलह कलाएँ हैं। प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, नाम।

मन्त्र 6.4

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः ।
अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥
साधारण अनुवाद‘उसने प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, ज्योति, जल, पृथ्वी, इन्द्रियाँ, मन। अन्न, अन्न से वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, और लोकों में नाम।’

पुरुष ने सोचा, ‘मेरे निकलने से कौन निकलेगा? टिकने से कौन टिकेगा?’

फिर एक creation sequence। प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, फिर पाँच elements, इन्द्रियाँ, मन। फिर अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, और लोकों में नाम।

तो सोलह कलाएँ हैं। प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक, नाम।

मन्त्र 6.5

स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे
समुद्र इत्येवं प्रोच्यते ।
एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति
भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते ।
स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे ये नदियाँ बहती हुई समुद्र की ओर जाती हैं, समुद्र पाकर अस्त हो जाती हैं, नदियों के नाम-रूप नहीं रहते, सिर्फ़ ”समुद्र” कहा जाता है, वैसे ही इस परिद्रष्टा (देखने वाले) की ये सोलह कलाएँ पुरुष को पाकर अस्त हो जाती हैं, नाम-रूप मिट जाते हैं, सिर्फ़ ”पुरुष” कहा जाता है। वो कला-रहित, अमर। एक श्लोक है।’

एक gorgeous image। ‘जैसे नदियाँ बहती हुई समुद्र की ओर जाती हैं, समुद्र पाकर नदियों के नाम मिट जाते हैं, बस ”समुद्र” बच जाता है।’

‘वैसे ही ये सोलह कलाएँ पुरुष को पाकर मिट जाती हैं। बस ”पुरुष” बच जाता है।’

यह वेदान्त का central message है: सब individuality temporary है, मूल चेतना नित्य।

मन्त्र 6.6

अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥
साधारण अनुवाद‘जैसे रथ की नाभि में अरे टिकी हैं, वैसे ही जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उस वेद्य पुरुष को जानो, ताकि तुम्हें मृत्यु की कोई पीड़ा न हो।’

‘जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उसे जानो।’ Death की चिंता मिट जाती है।

आख़िर में पिप्पलाद कहते हैं, ‘इतना ही मैं जानता हूँ।’ विद्यार्थी उनकी पूजा करते हैं: ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले गए।’

‘नमः परमऋषिभ्यः।’ Twice, finality के लिए। उपनिषद् यहाँ बंद।

मन्त्र 6.7

तान् होवाचैतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥
साधारण अनुवादउन्होंने (पिप्पलाद ने) कहा, ‘इतना ही मैं इस परम ब्रह्म के बारे में जानता हूँ, इससे आगे कुछ नहीं।’

‘जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उसे जानो।’ Death की चिंता मिट जाती है।

आख़िर में पिप्पलाद कहते हैं, ‘इतना ही मैं जानता हूँ।’ विद्यार्थी उनकी पूजा करते हैं: ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले गए।’

‘नमः परमऋषिभ्यः।’ Twice, finality के लिए। उपनिषद् यहाँ बंद।

मन्त्र 6.8

ते तमर्चयन्तस्त्वꣳ हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति ।
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥
साधारण अनुवादवे उनकी पूजा करते हुए कहने लगे, ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले जा रहे हैं।’ नमस्कार है परम ऋषियों को, नमस्कार है परम ऋषियों को।

‘जिसमें कलाएँ टिकी हैं, उसे जानो।’ Death की चिंता मिट जाती है।

आख़िर में पिप्पलाद कहते हैं, ‘इतना ही मैं जानता हूँ।’ विद्यार्थी उनकी पूजा करते हैं: ‘आप हमारे पिता हैं, जो हमें अविद्या के पार ले गए।’

‘नमः परमऋषिभ्यः।’ Twice, finality के लिए। उपनिषद् यहाँ बंद।

सारएक वाक्य में: पुरुष आपके अंदर है, और उसने अपनी सोलह कलाएँ बनाई। जब आप उसे जान लेते हैं, कलाएँ नदियों की तरह उसमें मिल जाती हैं।