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प्रेम और भक्ति

प्रेम की कई सीढ़ियाँ हैं। एक मित्र का साथ, एक सेवक का समर्पण, एक प्रेमी की तड़प, और अन्त में वह प्रेम जो किसी पात्र को नहीं, स्वयं परम को खोजता है। यह रास्ता इन्हीं सीढ़ियों पर एक-एक क़दम रखकर ऊपर चढ़ता है, बिना किसी सीढ़ी को छोटा माने।

यहाँ हम गोपियों का गीत सुनेंगे, सुदामा की चुपचाप निभाई गई मित्रता देखेंगे, और हनुमान का वह समर्पण जिसमें अपने लिए कुछ नहीं माँगा जाता। हर कथा प्रेम का एक अलग स्वाद है, और मिलकर ये उस एक ही रस की ओर इशारा करती हैं, जो हर हृदय के तल में बहता रहता है।

क्रम को हमने सिद्धान्त से भाव की ओर रखा है। पहले गीता भक्ति की परिभाषा देती है, फिर कथाएँ उसे जीकर दिखाती हैं, और नारद हमें याद दिलाते हैं कि प्रेम अपने आप में साधन भी है और साध्य भी। यहाँ समझने से अधिक महसूस करना काम आता है।

  1. भगवद्गीता · अध्याय 12: भक्ति योग
    प्रेम के मार्ग की नींव यहीं रखी जाती है, जहाँ कृष्ण बताते हैं कि निराकार तक पहुँचना कठिन है, पर एक भरे हुए हृदय से जुड़ना सहज, और यही राह सबसे कोमल भी है और सबसे सीधी भी।
  2. रास लीला
    रास लीला देह का खेल नहीं, आत्मा का वह नृत्य है जिसमें हर भक्त को लगता है कि प्रभु केवल उसी के साथ हैं, और यही प्रेम की सबसे बड़ी उदारता है, कि वह बाँटने से घटता नहीं।
  3. गोपी गीत
    जब प्रिय ओझल हो जाता है, गोपियों का यह गीत बताता है कि विरह भी प्रेम का ही गहरा रूप है, शायद मिलन से भी सघन, क्योंकि दूरी में याद और तीखी हो जाती है।
  4. भ्रमर-गीत
    उद्धव ज्ञान लेकर आते हैं और गोपियाँ प्रेम से उत्तर देती हैं, और यह संवाद दिखाता है कि हृदय का भाव कभी-कभी सबसे ऊँचे तर्क से भी आगे निकल जाता है, और वहीं ठहर जाता है।
  5. नारद भक्ति सूत्र · प्रेम के रूप
    नारद प्रेम के अलग-अलग रंगों को नाप-तौलकर रखते हैं, और यह सूत्र हमारे अपने भाव को पहचानने का एक शान्त दर्पण बन जाता है, जिसमें हम अपनी भक्ति का चेहरा देख पाते हैं।
  6. सुदामा की यात्रा
    सुदामा कुछ माँगने नहीं, बस मिलने आते हैं, और उनकी मुट्ठी भर चावल हमें सिखाते हैं कि सच्ची मित्रता में लेन-देन का हिसाब नहीं होता, केवल एक-दूसरे का होना काफ़ी है।
  7. पात्र · हनुमान
    हनुमान का पूरा जीवन एक ही वाक्य है, कि जहाँ प्रेम पूरा हो वहाँ शक्ति अपने आप सेवा बन जाती है, और अहंकार के लिए जगह ही नहीं बचती, यही भक्ति का सबसे साफ़ रूप है।

इन पन्नों को धीरे पढ़िए, जैसे कोई प्रिय पत्र दोबारा पढ़ता है। प्रेम समझने की चीज़ कम, भीतर उतरने की चीज़ अधिक है, और वह अपने समय पर अपने आप खुलता है।