लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
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पथ-दर्शिकाएँ

प्रेम और भक्ति

लुल्ला परिवार का पुस्तकालय · तीन पड़ाव, अपनी गति से

प्रेम की कई सीढ़ियाँ हैं। एक मित्र का साथ, एक सेवक का समर्पण, एक प्रेमी की तड़प, और सबसे ऊपर वह प्रेम जिसका एकमात्र लक्ष्य स्वयं परम है। यहाँ तीन पड़ाव हैं: अपने को थामने वाले को पार उतारने का कृष्ण का वचन, यमुना की बालू पर उनके ओझल हो जाने के बाद गोपियों का गीत, और काँख में चिउड़े की पोटली दबाए द्वारका में उतरता एक दरिद्र ब्राह्मण। एक-एक सीढ़ी चढ़िए; कोई सीढ़ी छोटी नहीं।

  1. पड़ाव 1

    सरल राह

    भगवद्गीता 12.1 से 8

    अर्जुन पूछते हैं कि साकार को भजने वाला और निराकार को भजने वाला, इन दोनों में योग की दृष्टि से कौन बढ़कर है। कृष्ण का उत्तर बड़े व्यावहारिक ढंग से आता है: देह रखते हुए निराकार पर मन टिकाना बहुत कठिन काम है, और जो अनन्य प्रेम से उन्हीं को थामे रहते हैं, उन्हें वे स्वयं संसार-सागर से पार उतारते हैं। फिर सबसे सीधी बात, कि पहले तो अपना सारा मन मुझमें लगा दीजिए।

    अंश पढ़िए

    ज़रा ठहरिए। अर्जुन एक ऐसा चेहरा माँगते हैं जिससे बात की जा सके। आप अपनी रोज़ की साधना में किसे थामते हैं?

  2. पड़ाव 2

    विरह में एक गीत

    भागवत 10.31

    रास के बीचोबीच से कृष्ण ओझल हो जाते हैं, और बाँसुरी बहुत देर तक नहीं बजती। गोपियाँ कदम्ब से, हिरनी से, माधवी लता से पूछती हैं कि वे किस ओर गए; हर एक चुप। तब वे यमुना की बालू पर कन्धे से कन्धा सटाकर बैठ जाती हैं और उनके लौटने के लिए गाने लगती हैं। उन्नीस बार वह स्वर उठता है, हर बार थोड़ा और टूटकर।

    अंश पढ़िए

    ज़रा ठहरिए। गोपियाँ एक सुर में उलाहना देती हैं और अगले में आराधना। आपके गले से कौन-सा सुर उठता?

  3. पड़ाव 3

    द्वारका में मित्र का स्वागत

    भागवत 10.80 से 81

    सुदामा पैदल द्वारका चलते हैं, पुराने कपड़े में बँधा चार मुट्ठी चिउड़ा काँख में दबाए, रास्ते भर इस डर के साथ कि कृष्ण पहचानेंगे भी या नहीं। नगर के स्वामी उन्हें दूर से देखते ही दौड़ पड़ते हैं, गले लगाते हैं, स्वयं उनके पाँव धोते हैं और वही जल अपने सिर पर धारण करते हैं। पोटली काँख में ही दबी रहती है; कृष्ण स्वयं उसे खींचकर एक मुट्ठी चाव से खा लेते हैं। सुबह सुदामा घर को चलते हैं, बिना कुछ माँगे।

    अंश पढ़िए

    ज़रा ठहरिए। सुदामा लज्जा से चिउड़ा छिपा लेते हैं और कुछ नहीं माँगते। उस स्वागत में उन्हें उत्तर पहले ही कहाँ मिल चुका था?

आज यहीं ठहरें

तीन दृश्य, तीन प्रेम। थामने वाले के लिए पानी में उतरता एक हाथ; बालू पर उठते उन्नीस सुर; भिखारी के पाँव धोने झुका एक राजा। जो दृश्य साथ रह जाए उसे धीरे-धीरे दोबारा पढ़िए, जैसे किसी अपने का पत्र दोबारा पढ़ा जाता है, और उसे अपने समय पर खुलने दीजिए।

दूसरे रास्ते देखिए

इस प्रश्न के साथ और पढ़िए
  1. रास लीला
    शरद की पूर्णिमा पर वंशी का एक स्वर यमुना के पार जाकर गोकुल के घरों में शाम के काम में लगी गोपियों तक पहुँचता है: दूध चूल्हे पर छूट जाता है। जिस वेश में थीं, उसी में निकल पड़ती हैं। पूरी रात एक मोड़ पर ठहरी है, जब उनके मन में ‘हम ही सबमें बढ़कर’ का भाव उठता है और उसी क्षण श्याम ओझल हो जाते हैं।
  2. भ्रमर-गीत
    श्रीकृष्ण उद्धव का हाथ थामकर उन्हें व्रज भेजते हैं, उन गोपियों के लिए सन्देश देकर जिनकी साँस एक ही वचन पर टिकी है, कि मैं आऊँगा। उद्धव इस भरोसे के साथ चलते हैं कि भोली ग्वालिनों को आत्मा का ज्ञान सुनाकर उनका मोह छुड़ा देंगे। उनके पाठ से पहले एक भौंरा आ पहुँचता है, और सारा विरह उसी पर उमड़ पड़ता है।
  3. नारद भक्ति सूत्र · प्रेम के रूप
    नारद पहले ही चेता देते हैं कि जिसकी बात वे करने जा रहे हैं उसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता; यह वैसा है जैसे कोई गूँगा मिठाई चखे। फिर वे उसके लक्षण ऐसे गिनाते हैं मानो अँधेरे में किसी रत्न को छू रहे हों, और नीचे की सीढ़ियों को क्रम से रखते हैं: आर्त, अर्थार्थी और जिज्ञासु।
  4. पात्र · हनुमान
    महेन्द्र पर्वत का शिखर, नीचे सौ योजन का समुद्र, और बीच में एक वानर जो जामवन्त के यह याद दिलाने पर उठ खड़ा हुआ है कि आप वायु के पुत्र हैं। सुन्दरकाण्ड के पहले सर्ग में वाल्मीकि उनके बारे में एक सीधा वाक्य कहते हैं, कि जो कर्म दूसरों से हो ही न सकता था, उसे वे बिना किसी सहारे के, अकेले, पूरा करने चले थे।
स्रोत और इस रास्ते का दायरा

हर पड़ाव किसी लम्बे पाठ के भीतर एक अंश पर खुलता है। यह नहीं माना गया कि सभी भाष्य इन पर एकमत हैं।

  • गीता के प्रसंग: गीताप्रेस संस्करण; तुलना: 12.1, 12.5, 12.8.
  • भागवत 10.31 तथा 10.80 से 81: गीताप्रेस; तुलना: BBT 10.31, 10.80, 10.81.

अंश और क्रम ऊपर दिए संस्करणों से जाँचे गए।