अंग 213

अंग
213
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਹਿਰੈ ਬਾਗਾ ਕਰਿ ਇਸਨਾਨਾ ਚੋਆ ਚੰਦਨ ਲਾਏ ॥
ਨਿਰਭਉ ਨਿਰੰਕਾਰ ਨਹੀ ਚੀਨਿਆ ਜਿਉ ਹਸਤੀ ਨਾਵਾਏ ॥੩॥
ਜਉ ਹੋਇ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਤ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੈ ਸਭਿ ਸੁਖ ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਏ ॥
ਮੁਕਤੁ ਭਇਆ ਬੰਧਨ ਗੁਰਿ ਖੋਲੇ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੪॥੧੪॥੧੫੨॥
पहिरै बागा करि इसनाना चोआ चंदन लाए ॥
निरभउ निरंकार नही चीनिआ जिउ हसती नावाए ॥३॥
जउ होइ क्रिपाल त सतिगुरु मेलै सभि सुख हरि के नाए ॥
मुकतु भइआ बंधन गुरि खोले जन नानक हरि गुण गाए ॥४॥१४॥१५२॥

हिन्दी अर्थ: मनुष्य नहा-धो के सफेद साफ कपड़े पहनता है~ इत्र और चंदन आदि (शरीर को कपड़ों को) लगाता है~ पर यदि मनुष्य निरभउ~ निरंकार के साथ जान-पहिचान नहीं डालता तो ये सब उद्यम यूँ ही हैं जैसे कोई मनुष्य हाथी को नहलाता है (और नहाने के बाद हाथी अपने ऊपर धूल डाल लेता है)। 3। (पर) हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश?) जब परमात्मा (किसी पर) दयावान होता है~ तब उसे गुरू मिलाता है (गुरू उसे नाम की दाति देता है जिस) हरी-नाम में सारे ही सुख हैं। जिस मनुष्य के (माया के मोह के) बंधन गुरू ने खोल दिए~ वह मनुष्य (ही) परमात्मा के गुण गाता है। 4। 14। 152।
ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਸਦ ਕਰੀਐ ॥
ਰਤਨ ਜਨਮੁ ਸਫਲੁ ਗੁਰਿ ਕੀਆ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿਹਰੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਸਾਸ ਗ੍ਰਾਸ ਮਨੁ ਲੇਤਾ ਤੇਤੇ ਹੀ ਗੁਨ ਗਾਈਐ ॥
ਜਉ ਹੋਇ ਦੈਆਲੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਤਾ ਇਹ ਮਤਿ ਬੁਧਿ ਪਾਈਐ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਨਾਮਿ ਲਏ ਜਮ ਬੰਧ ਤੇ ਛੂਟਹਿ ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਸੁਖ ਪਾਈਐ ॥
ਸੇਵਿ ਸੁਆਮੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਮਨ ਬੰਛਤ ਫਲ ਆਈਐ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਇਸਟੁ ਮੀਤ ਸੁਤ ਕਰਤਾ ਮਨ ਸੰਗਿ ਤੁਹਾਰੈ ਚਾਲੈ ॥
ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪਾਲੈ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਕਿਰਪਾਲਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੀ ਬਿਨਸੇ ਸਰਬ ਅੰਦੇਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨਿ ਮਿਟਿਓ ਸਗਲ ਕਲੇਸਾ ॥੪॥੧੫॥੧੫੩॥
गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
मेरे मन गुरु गुरु गुरु सद करीऐ ॥
रतन जनमु सफलु गुरि कीआ दरसन कउ बलिहरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जेते सास ग्रास मनु लेता तेते ही गुन गाईऐ ॥
जउ होइ दैआलु सतिगुरु अपुना ता इह मति बुधि पाईऐ ॥१॥
मेरे मन नामि लए जम बंध ते छूटहि सरब सुखा सुख पाईऐ ॥
सेवि सुआमी सतिगुरु दाता मन बंछत फल आईऐ ॥२॥
नामु इसटु मीत सुत करता मन संगि तुहारै चालै ॥
करि सेवा सतिगुर अपुने की गुर ते पाईऐ पालै ॥३॥
गुरि किरपालि क्रिपा प्रभि धारी बिनसे सरब अंदेसा ॥
नानक सुखु पाइआ हरि कीरतनि मिटिओ सगल कलेसा ॥४॥१५॥१५३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! सदा सदा ही गुरू को याद रखना चाहिए। गुरू के दर्शनों से सदके जाना चाहिए। गुरू ने (ही जीवों के) कीमती मानस जनम को फल लगाया है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जीव जितने भी श्वास लेता है~ जितने भी ग्रास खाता है (हरेक स्वास व ग्रास के साथ-साथ) उतने ही परमात्मा के गुण गाता रहे। (पर) ये अक्ल ये मति तभी जीव को मिलती है जब प्यारा सतिगुरू दयावान हो। 1। हे मेरे मन ! अगर तू परमात्मा का नाम सिमरता रहे तो यम के बंधनों से निजात पा लेगा (उन मायावी बंधनों से छूट जाएगा जो जम के वश में डालते हैं जो आत्मिक मौत ला देते हैं)~ और नाम सिमरने से सारे सुखों से श्रेष्ठ आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। (हे भाई !) मालिक प्रभू के नाम की दाति देने वाले सतिगुरू की सेवा करके मन-इच्छित फल हाथ आ जाते हैं। 2। हे मेरे मन ! करतार का नाम ही तेरा असल प्यारा है~ मित्र है~ पुत्र है। हे मन ! ये नाम ही हर समय तेरे साथ साथ रहता है। हे मन ! अपने सतिगुरू की शरण पड़~ करतार का नाम सतिगुरू से ही मिलता है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य पर कृपालु सतिगुरू ने परमात्मा ने मेहर की उसके सारे चिंता-फिक्र समाप्त हो गए। जिस मनुष्य ने परमात्मा के कीर्तन में आनंद उठाया~ उसके सारे दुख-कलेश दूर हो गऐ। 4। 15। 153।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬਿਰਲੇ ਹੀ ਕੀ ਬੁਝੀ ਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੋਟਿ ਜੋਰੇ ਲਾਖ ਕ੍ਰੋਰੇ ਮਨੁ ਨ ਹੋਰੇ ॥
ਪਰੈ ਪਰੈ ਹੀ ਕਉ ਲੁਝੀ ਹੇ ॥੧॥
ਸੁੰਦਰ ਨਾਰੀ ਅਨਿਕ ਪਰਕਾਰੀ ਪਰ ਗ੍ਰਿਹ ਬਿਕਾਰੀ ॥
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਨਹੀ ਸੁਝੀ ਹੇ ॥੨॥
ਅਨਿਕ ਬੰਧਨ ਮਾਇਆ ਭਰਮਤੁ ਭਰਮਾਇਆ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਨਹੀ ਗਾਇਆ ॥
ਮਨ ਬਿਖੈ ਹੀ ਮਹਿ ਲੁਝੀ ਹੇ ॥੩॥
ਜਾ ਕਉ ਰੇ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ਜੀਵਤ ਸੋਈ ਮਰੈ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਾਇਆ ਤਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਜਨੁ ਦਰਿ ਹਰਿ ਸਿਝੀ ਹੇ ॥੪॥੧॥੧੫੪॥
रागु गउड़ी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
त्रिसना बिरले ही की बुझी हे ॥१॥ रहाउ ॥
कोटि जोरे लाख क्रोरे मनु न होरे ॥
परै परै ही कउ लुझी हे ॥१॥
सुंदर नारी अनिक परकारी पर ग्रिह बिकारी ॥
बुरा भला नही सुझी हे ॥२॥
अनिक बंधन माइआ भरमतु भरमाइआ गुण निधि नही गाइआ ॥
मन बिखै ही महि लुझी हे ॥३॥
जा कउ रे किरपा करै जीवत सोई मरै साधसंगि माइआ तरै ॥
नानक सो जनु दरि हरि सिझी हे ॥४॥१॥१५४॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) किसी विरले मनुष्य के अंदर से तृष्णा (की आग) बुझती है। 1। रहाउ। (साधारण हालात ये बने हुए हैं कि मनुष्य) करोड़ों रुपए कमाता है लाखों करोड़ों रुपए एकत्र करता है (फिर भी माया के लालच से अपने) मन को रोकता नहीं (बल्कि) और ज्यादा और ज्यादा धन इकट्ठा करने के लिए (तृष्णा की आग में) जलता रहता है। 1। मनुष्य अपनी सुंदर स्त्री के साथ अनेकों किस्मों के लाड-प्यार करता है~ फिर भी पर-स्त्री संग का कु-कर्म करता है (काम वासना में अंधे हुए हुए को) ये नहीं सूझता कि बुरा कर्म कौन सा है और अच्छा कर्म कौन सा। 2। (हे भाई ! माया के मोह के) अनेकों बंधनों में बंधा हुआ मनुष्य (माया की खातिर) भटकता फिरता है। माया इसे खुआर करती है~ (माया के प्रभाव तले) मनुष्य गुणों के खजाने परमात्मा की सिफत सालाह नहीं करता। मनुष्यों के मन विषौ-विकारों की आग में जलते रहते हैं। 3। हे नानक ! (कह,) हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है~ वही मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ भी माया के मोह से अछूता रहता है~ और साध-संगति में रह के माया (के बवंडर से) पार लांघ जाता है। वह मनुष्य परमात्मा के दर पर कामयाब गिना जाता है। 4। 1। 154।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਭਹੂ ਕੋ ਰਸੁ ਹਰਿ ਹੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਹੂ ਜੋਗ ਕਾਹੂ ਭੋਗ ਕਾਹੂ ਗਿਆਨ ਕਾਹੂ ਧਿਆਨ ॥
ਕਾਹੂ ਹੋ ਡੰਡ ਧਰਿ ਹੋ ॥੧॥
ਕਾਹੂ ਜਾਪ ਕਾਹੂ ਤਾਪ ਕਾਹੂ ਪੂਜਾ ਹੋਮ ਨੇਮ ॥
ਕਾਹੂ ਹੋ ਗਉਨੁ ਕਰਿ ਹੋ ॥੨॥
ਕਾਹੂ ਤੀਰ ਕਾਹੂ ਨੀਰ ਕਾਹੂ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰ ॥
ਨਾਨਕਾ ਭਗਤਿ ਪ੍ਰਿਅ ਹੋ ॥੩॥੨॥੧੫੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
सभहू को रसु हरि हो ॥१॥ रहाउ ॥
काहू जोग काहू भोग काहू गिआन काहू धिआन ॥
काहू हो डंड धरि हो ॥१॥
काहू जाप काहू ताप काहू पूजा होम नेम ॥
काहू हो गउनु करि हो ॥२॥
काहू तीर काहू नीर काहू बेद बीचार ॥
नानका भगति प्रिअ हो ॥३॥२॥१५५॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम ही सब जीवों का श्रेष्ठ आनंद है। 1। रहाउ। (पर) हे भाई ! (प्रभू के नाम से विछुड़ के) किसी मनुष्य को जोग कमाने का शौक पड़ गया है~ किसी को दुनियावी पदार्थ भोगने का चस्का है। किसी को ज्ञान-चर्चा अच्छी लगती है~ किसी को समाधियां पसंद हैं और किसी को डण्डाधारी जोगी बनना अच्छा लगता है। 1। हे भाई ! (परमात्मा का नाम छोड़ के) किसी को (देवी-देवताओं के वश करने के) जाप पसंद आ रहे हैं~ किसी को धूणियां तपानी अच्छी लगती हैं~ किसी को देव पूजा~ किसी को हवन आदि के नित्य के नियम पसंद हैं और किसी को (रमता साधु बन के) धरती पर चलते जाना अच्छा लगता है। 2। हे भाई ! किसी को किसी नदी के किनारे बैठना~ किसी को तीर्थ-स्नान~ और किसी को वेदों की विचार पसंद है। पर~ हे नानक ! परमात्मा भक्ति को प्यार करने वाला है। 3। 2। 155।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਨ ਕੀਰਤਿ ਨਿਧਿ ਮੋਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂੰਹੀ ਰਸ ਤੂੰਹੀ ਜਸ ਤੂੰਹੀ ਰੂਪ ਤੂਹੀ ਰੰਗ ॥
ਆਸ ਓਟ ਪ੍ਰਭ ਤੋਰੀ ॥੧॥
ਤੂਹੀ ਮਾਨ ਤੂੰਹੀ ਧਾਨ ਤੂਹੀ ਪਤਿ ਤੂਹੀ ਪ੍ਰਾਨ ॥
ਗੁਰਿ ਤੂਟੀ ਲੈ ਜੋਰੀ ॥੨॥
ਤੂਹੀ ਗ੍ਰਿਹਿ ਤੂਹੀ ਬਨਿ ਤੂਹੀ ਗਾਉ ਤੂਹੀ ਸੁਨਿ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गुन कीरति निधि मोरी ॥१॥ रहाउ ॥
तूंही रस तूंही जस तूंही रूप तूही रंग ॥
आस ओट प्रभ तोरी ॥१॥
तूही मान तूंही धान तूही पति तूही प्रान ॥
गुरि तूटी लै जोरी ॥२॥
तूही ग्रिहि तूही बनि तूही गाउ तूही सुनि ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे प्रभू !) तेरे गुणों की उपमा करनी ही मेरे लिए (दुनिया के सारे पदार्थों का) खजाना है। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) तू ही (मेरे वास्ते दुनिया के पदार्थों के) स्वाद है। तू ही (मेरे लिए दुनिया के) मान-सम्मान है~ तू ही (मेरे लिए) जगत के सुंदर रूप और रंग तमाशे है। हे प्रभू ! मुझे तेरी ओट है तेरी ही आस है। 1। (हे प्रभू !) तू ही मेरा आदर-मान है~ तू ही मेरा धन है~ तू ही मेरी इज्जत है~ तू ही मेरी जिंद (का सहारा) है। मेरी टूटी हुई (सुरति) को गुरू ने (तेरे साथ) जोड़ दिया है। 2। हे प्रभू ! तू ही (मुझे) घर में दिखाई दे रहा है~ तू ही (मुझे) जंगल में (दिख रहा) है~ तू ही (मुझे) आबादी में (दिखाई दे रहा) है~ तू ही (मुझे) उजाड़ में (दिख रहा) है।

संदर्भ: यह अंग 213 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 213” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 214 →, पीछे का: ← अंग 212

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।