(Sikh tradition refers to pages as “अंग” rather than “pages” (पृष्ठ) because the Granth Sahib is treated as a living body, not a text. Each page is a limb of the Guru.
Background
गुरु अर्जुन देव जी सिख परंपरा के पहले शहीद हैं। उनकी शहादत 30 मई, 1606 को लाहौर में हुई। यह कहानी श्रद्धाराजनीति और अटूट विश्वास की कहानी है।
गुरु अर्जुन देव जी ने दो ऐसे कार्य किए जिन्होंने सिख पंथ को एक संगठित शक्ति के रूप में स्थापित किया। पहला, उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन किया और 1604 में उसे श्री हरमंदिर साहिब में प्रतिष्ठित किया। यह पहली बार था कि किसी धर्म का पवित्र ग्रंथ उसके संस्थापकों के जीवनकाल में ही लिपिबद्ध हुआ, और उसमें हिंदू भक्तों और मुस्लिम सूफियों दोनों की वाणी सम्मिलित की गई। दूसरा, उन्होंने अमृतसर को सिखों के आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया, हरमंदिर साहिब का निर्माण पूर्ण किया, और मसंद प्रथा (दशांश संग्रह) को व्यवस्थित किया। इससे सिख समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हुआ।
1605 में मुगल सम्राट अकबर की मृत्यु हुई। अकबर relatively calm and measured शासक थे। उनके पुत्र जहाँगीर ने गद्दी संभाली। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा “तुज़ुक-ए-जहाँगीरी” में स्वयं लिखा कि वह बहुत समय से गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करना चाहता था। उसने लिखा कि “इस दुकान को बंद करना चाहिए, या इसे इस्लाम में लाना चाहिए।”
तत्काल कारण यह बना कि जहाँगीर का पुत्र खुसरो, जिसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था, लाहौर से भागते हुए गुरु अर्जुन देव जी से मिला। गुरु साहिब ने उसे आशीर्वाद दिया (कुछ इतिहासकारों के अनुसार आर्थिक सहायता भी दी)। जहाँगीर ने इसे राजद्रोह माना।
लाहौर के दीवान (राजस्व अधिकारी) चंदू शाह की गुरु साहिब से व्यक्तिगत शत्रुता थी। एक विवाह प्रस्ताव के अपमान को लेकर चंदू शाह ने गुरु साहिब के विरुद्ध जहाँगीर को भड़काया और उनकी गिरफ्तारी तथा दंड की व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई। Btw, चंदू शाह पंजाबी खत्री वंश से थे। खत्री पंजाब का एक प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक समुदाय है। उनके नाम में “शाह” खत्री समुदाय की एक उपजाति (गोत्र) का सूचक है। इसे फ़ारसी या सिंधी उपाधि समझ लेना ग़लती है। वे मूल रूप से पंजाब के निवासी थे, लेकिन मुगल दरबार में अपने पद के कारण लाहौर और दिल्ली दोनों में रहते थे। वे लाहौर के सूबेदार (गवर्नर) के अधीन दीवान (राजस्व अधिकारी) थे। साथ ही वे एक धनी साहूकार भी थे।
एक उल्लेखनीय बात यह है कि स्वयं सिख गुरु भी खत्री थे: गुरु नानक देव जी बेदी खत्री थे, गुरु अंगद देव जी त्रेहन खत्री, गुरु अमरदास जी भल्ला खत्री, और गुरु रामदास जी से गुरु गोबिंद सिंह जी तक सभी सोढी खत्री थे। इसलिए चंदू शाह और गुरु अर्जुन देव जी एक ही पंजाबी खत्री समुदाय से आते थे। यही कारण है कि सिख इतिहास में चंदू शाह के विश्वासघात को और भी अधिक पीड़ादायक माना जाता है: यह अपने ही समुदाय के एक व्यक्ति का कुकर्म था, किसी बाहरी शत्रु के अत्याचार से कहीं ज़्यादा खटकने वाला।
यातना और शहादत:
गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में कई दिनों तक यातनाएँ दी गईं। उन्हें तपती लोहे की तवी (गर्म लोहे की चादर) पर बैठाया गया। उनके शरीर पर जलती हुई रेत डाली गई। उन्हें उबलते पानी में डुबोया गया। May की भीषण गर्मी में यह सब किया गया। अंत में उन्हें रावी नदी में स्नान करने दिया गया, जहाँ उनके प्राण निकल गए। तिथि थी 30 मई, 1606।
शहादत का प्रभाव:
गुरु अर्जुन देव जी की शहादत ने सिख इतिहास की दिशा बदल दी। उनके पुत्र गुरु हरगोबिंद साहिब ने गद्दी संभालते ही दो तलवारें धारण कीं, मीरी (सांसारिक सत्ता) और पीरी (आध्यात्मिक सत्ता), और अकाल तख्त की स्थापना की। यह क्षण सिख पंथ के शांत भक्ति आंदोलन से सशस्त्र योद्धा परंपरा में परिवर्तन का आरंभ था।
Introduction
सुखमनी साहिब सिख धर्म की गहरी और सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली बाणी है। इसे पाँचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी ने लगभग 1602-03 में अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे लिखा था, वही जगह जो आज भी हरिमंदिर साहिब (Golden Temple) के पास मौजूद है। उस वक़्त वो जगह घने जंगल से घिरी हुई थी।
“सुखमनी” शब्द दो हिस्सों से बना है: “सुख” यानी शान्ति, आराम, चैन; और “मनी” यानी मन, या मणि (रत्न)। तो सुखमनी का मतलब है “मन को शान्ति देने वाला रत्न” या “मन की सांत्वना”। अंग्रेज़ी में इसे “Psalm of Peace” या “Jewel of Peace” कहा गया है।
इसकी संरचना बड़ी व्यवस्थित है। कुल 24 अष्टपदी हैं। हर अष्टपदी की शुरुआत एक श्लोक (दोहे) से होती है, जो उस पूरी अष्टपदी का सार बताता है। फिर उसके बाद 8 पउड़ियाँ (छंद) आती हैं। हर पउड़ी में 10 पंक्तियाँ हैं, यानी 5 दोहे। पूरी रचना में 24 श्लोक और 192 पउड़ियाँ हैं।
रचना का ऐतिहासिक संदर्भ
सुखमनी साहिब की रचना अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे, क़रीब 1602-03 ईस्वी में हुई। उस-समय गुरु अर्जुन देव जी की आयु लगभग चालीस वर्ष थी। चार वर्ष पहले, 1598 में, अकबर बादशाह ने स्वयं हरमंदिर साहिब आ कर लंगर में बैठ कर भोजन किया था, और गुरु-घर का आदर-व्यवहार किया था। अकबर की 1605 में मृत्यु हुई, जहाँगीर गद्दी पर बैठा, और 1606 में गुरु अर्जुन देव जी की शहादत। सुखमनी इस तीन-वर्षीय खिड़की में रची गयी, जब मुग़ल-सिख-सम्बन्ध अभी संतुलित थे, मगर बदलने को थे।
परम्परा कहती है कि बाबा बुद्ध जी, जिन्हें छहों गुरुओं (नानक से हरगोबिंद तक) से दीक्षा का सौभाग्य मिला, सुखमनी-पाठ के प्रथम-श्रोता थे। आज भी सिख घरों में बच्चे के जन्म के बाद के चालीस-दिन, बीमारी के समय, और परिवार में किसी की मृत्यु के बाद, सुखमनी का अखंड-पाठ करवाया जाता है।
संरचना के बारे में एक उल्लेखनीय बात है। चौबीस-अष्टपदियाँ चौबीस-वर्ष की एक संख्यात्मक समानता बनाती हैं, गुरु अर्जुन देव जी ने अठारह वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली थी और चौवालीस की आयु में शहीद हुए, यानी पूरे चौबीस-वर्ष का गुरुत्व-काल। यह संख्यात्मक संगति आज भी विद्वान चर्चा का विषय है।
आदि शंकराचार्य की पाँच-शताब्दी पुरानी विवेक-चूड़ामणि और गुरु अर्जुन देव की सुखमनी, दोनों का केन्द्रीय-विषय एक ही है, मन की शान्ति का सूत्र। दोनों के बीच पाँच-सौ साल का अन्तर है, और भाषाएँ अलग, मगर पाठ-शैली में एक-तरह की संगति है, प्रत्येक खंड एक सूत्र-वाक्य के चारों ओर बँधा। यह तुलना आज भी तुलनात्मक-दर्शन के विद्वानों के बीच रोचक मानी जाती है।
पूरी रचना में कुछ बुनियादी विषय बार-बार लौटते हैं:
- ईश्वर की सर्वव्यापकता,
- नाम सिमरन की शक्ति,
- साध-संगत का महत्व,
- अहंकार का त्याग, और
- ब्रह्मज्ञानी की पहचान।
अष्टपदी 1

श्लोक
सतिगुरए नमः ॥ श्री गुरदेवए नमः ॥1॥
भगत जना कै मनि बिसरामु ॥ रहाउ ॥
पउड़ी 1
पउड़ी 2
हर पंक्ति “प्रभ कै सिमरनि” से शुरू होती है, जैसे ढोल पर एक ही ताल बार-बार बजे, और हर बार थोड़ा गहरा उतरे। सिमरन से जन्म-मरण का चक्र टूटता है। दुख और यम का डर भाग जाता है। काल हट जाता है। दुश्मन, बाहर के भी और अंदर के भी (काम, क्रोध, लोभ), दूर हो जाते हैं। कोई विघ्न नहीं लगता। अज्ञान की नींद टूट जाती है। भय नहीं सताता। दुख नहीं तपाता।
और आख़िर में: ये सिमरन साधू की संगत में गहरा होता है। जैसे एक कोयले को अकेला रख दो तो बुझ जाता है, लेकिन दूसरे जलते कोयलों के बीच रखो तो दहकता रहता है। “सभ निधान नानक हरि रंगि”: सारे ख़ज़ाने हरि के प्रेम में हैं।
पउड़ी 3
सिमरन में सब कुछ है: ऋद्धि-सिद्धि, नौ निधियाँ, ज्ञान, ध्यान, तत्व-बुद्धि। सिमरन ही जप है, तप है, पूजा है। और सबसे बड़ी बात: “बिनसै दूजा”, द्वैत ख़त्म हो जाता है। ये “दूजा” यहाँ “दूसरा देवता” से कहीं गहरा है, ये वो मन की फाँक है जो कहती है “मैं अलग हूँ, ईश्वर अलग है।”
“से सिमरहि जिन आपि सिमराए”: सिमरन वही करते हैं जिन्हें ख़ुद ईश्वर ने सिमरन करवाया। सिमरन को हम अपनी उपलब्धि समझ बैठते हैं, असल में ये ईश्वर की कृपा है। और नानक ऐसे लोगों के चरणों में झुकते हैं।
पउड़ी 4
सिमरन सबसे ऊँचा है। “त्रिसना बुझै”: तृष्णा बुझ जाती है। ये वो अंदरूनी खालीपन है जो इंसान हर चीज़ से भरने की कोशिश करता है। “मन की मलु जाइ, अम्रित नामु रिद माहि समाइ”: पहले मैल जाता है, फिर नाम भरता है। जैसे बर्तन पहले साफ़ करो, तब दूध डालो।
“नानक जन का दासनि दसना”: नानक भक्तों के दासों का भी दास है। ये विनम्रता का शिखर है। एक बादशाह के दरबार में सबसे ज़्यादा इज़्ज़त किसकी होती है? जो बादशाह के सबसे क़रीब हो। और बादशाह के सबसे क़रीब वो होता है जो सबसे ज़्यादा झुका हुआ हो: दरबान, सेवक, पानी देने वाला। गुरु जी कहते हैं, मैं भक्तों के सेवकों का भी सेवक बनूँ। ये ऊँचा पद है, नीचे होकर।
पउड़ी 5
जो प्रभु को सिमरते हैं, वो धनवंत हैं (आत्मिक समृद्धि वाले, बैंक बैलेंस की भाषा में नहीं)। वो इज़्ज़तदार हैं। वो ईश्वर के दरबार में स्वीकार किए हुए हैं। वो किसी के मोहताज नहीं रहते, और इसीलिए “सरब के राजे” कहलाते हैं, क्योंकि जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत न रहे, वही असली राजा है। वो सुखी हैं और कभी नष्ट नहीं होने वाले।
और फिर वही बात: सिमरन उन्हीं को मिलता है जिन पर ख़ुद ईश्वर ने दया की। नानक ऐसे जनों के चरणों की धूल माँगते हैं।
पउड़ी 6
सिमरन करने वाले परोपकारी होते हैं। उनके चेहरे पर नूर आता है (“मुख सुहावे”), वो नूर अंदर की शान्ति से आता है। “आतमु जीता”: उन्होंने अपने आप को जीत लिया है, जो कठिन जीत है। उनकी रीति निर्मल है। उनके पास आनंद के भंडार हैं और वो ईश्वर के पास बसते हैं।
“नानक सिमरनु पूरै भागि”: सिमरन पूरे भाग्य से मिलता है, भाग्य यानी कर्म और कृपा का संगम।
पउड़ी 7
सिमरन से सारे काम पूरे होते हैं। कभी अफ़सोस नहीं होता। “निहचल आसनु”: मन स्थिर हो जाता है। “कमल बिगासनु”: हृदय-कमल खिल जाता है, चेतना का विकास होता है।
“अनहद झुनकार”: अनहद नाद सुनाई देता है, वो आंतरिक ध्वनि जो गहरे ध्यान में सुनाई देती है, बिना किसी चीज़ को ठोके बजने वाली ध्वनि। कमल कीचड़ में उगता है, लेकिन कीचड़ उसे छूता नहीं। ठीक वैसे ही, सिमरन करने वाला इंसान दुनिया में रहता है, कमाता है, परिवार चलाता है, लेकिन दुनिया का मैल उसके मन को नहीं छूता। फूल खिला हुआ है, पानी के ऊपर, धूप की तरफ़। जड़ें कीचड़ में हैं लेकिन सुगंध आकाश में फैलती है।
पउड़ी 8
आठवीं पउड़ी पहली अष्टपदी का समापन है। यहाँ गुरु जी एक बड़ा दावा करते हैं: सिमरन personal साधना से कहीं आगे जाकर सृष्टि का मूल सिद्धांत बन जाता है। सिमरन से भगत प्रकट हुए। सिमरन से वेदों की रचना हुई। सिमरन से सिद्ध, जती, और दानी पैदा हुए। सिमरन से नीच लोग चारों दिशाओं में प्रसिद्ध हुए, यानी सिमरन जात-पात नहीं देखता।
“हरि सिमरनि धारी सभ धरना”: सिमरन से सारी धरती धारण की गई। “हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा”: सारा संसार सिमरन से ही रचा गया। “हरि सिमरन मह आपि निरंकारा”: सिमरन के अंदर ही निराकार ईश्वर ख़ुद बसता है।
निष्कर्ष: “करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ, नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ”: जिसे ईश्वर ने ख़ुद कृपा करके समझाया, उस गुरमुख ने ही सिमरन पाया।
पहली अष्टपदी का सार: सिमरन सबसे ऊँचा है, सबसे गहरा है, और ये मिलता है गुरु की कृपा से।
अष्टपदी 2

श्लोक
सरणि आपकी आइओ नानक के प्रभ साथ ॥1॥
पउड़ी 1
गुरु जी एक-एक करके उन जगहों को गिनाते हैं जहाँ इंसान बिल्कुल अकेला होता है। जहाँ माता, पिता, बेटा, दोस्त, भाई कोई नहीं होता, वहाँ नाम ही साथी है। जहाँ यमराज के भयानक दूत घेर लेते हैं, वहाँ भी सिर्फ़ नाम साथ चलता है। जहाँ मुश्किल बहुत भारी हो, वहाँ नाम पल-भर में बचाव कर देता है।
“अनिक पुनहचरन करत नही तरै”: अनगिनत प्रायश्चित करने से भी पार नहीं होता, लेकिन “हरि को नामु कोटि पाप परहरै”: नाम करोड़ों पापों को दूर कर देता है। बाहरी प्रायश्चित की सीमा है, नाम की शक्ति असीम है।
पउड़ी 2
“सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ”: सारी सृष्टि का राजा भी दुखी है। अगर राजा भी दुखी है, तो दुख का इलाज पैसे, ताक़त, या रुतबे में नहीं। “अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै”: माया के अनगिनत रंग-तमाशे प्यास नहीं बुझाते। ये नमकीन पानी पीने जैसा है: जितना पीओ, उतनी और लगती है।
“जिह मारगि एहु जात एकेला”: जिस रास्ते पर इंसान अकेला जाता है (मृत्यु का रास्ता), वहाँ भी नाम साथ चलता है। एक व्यापारी के पास बहुत सारा सोना था। नदी में बाढ़ आ गई और नाव डूबने लगी। नाव वाले ने कहा, “सोना फेंको, वरना डूब जाएँगे।” व्यापारी ने सोना पकड़े रखा और डूब गया। दूसरा आदमी, जिसके पास कुछ नहीं था सिवाय ईश्वर के नाम के, वो तैरकर पार हो गया। जिस रास्ते पर सब कुछ छूट जाता है, वहाँ सिर्फ़ नाम काम आता है।
पउड़ी 3
लाखों-करोड़ों प्रयत्नों से छुटकारा नहीं मिलता, लेकिन नाम जपने से पार हो जाते हैं। “तत्काल उधारै”: “तत्काल” (फ़ौरन), देर नहीं लगती।
“हउ मैला मलु कबहु न धोवै”: अहंकार (“हउ”) का मैल कभी नहीं धुलता, किसी भी बाहरी तरीक़े से। तीर्थ में नहाने से नहीं, उपवास करने से नहीं, दान देने से नहीं। सिर्फ़ नाम करोड़ों पापों को धो देता है। और ये नाम मिलता है “साध कै संगि”, संत की संगत में।
पउड़ी 4
ये पउड़ी एक यात्रा का चित्र खींचती है। जिस रास्ते की दूरी गिनी न जा सके, वहाँ नाम आपका “तोसा” (रसद) है। जहाँ गहरा अँधेरा है, वहाँ नाम उजाला है। जहाँ कोई आपको नहीं पहचानता, वहाँ नाम आपका पहचान-पत्र है। जहाँ भयानक तपती धूप है, वहाँ नाम आपके ऊपर छाँव है। जहाँ प्यास मन को खींचे, वहाँ हरि का अमृत बरसता है।
गुरु जी ने कितनी सजीव कल्पना इस्तेमाल की है: लंबा रास्ता, अँधेरा, अजनबीपन, तपती धूप, प्यास। ये सब ज़िंदगी के रूपक हैं। और हर एक का जवाब एक ही है: नाम।
पउड़ी 5
“भगत जना की बरतनि नामु”: भक्तों की बरतन (दैनिक उपयोग की चीज़) नाम है। जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बरतन ज़रूरी हैं, वैसे ही भक्तों के लिए नाम रोज़ की ज़रूरत है। “हरि हरि अउखधु साध कमाति”: नाम वो औषधि (दवाई) है जो संतों की कमाई है। “पारब्रहमि जन कीनो दान”: ये दान ईश्वर ने ख़ुद दिया है, कोई ख़ुद कमाकर नहीं लाता।
पउड़ी 6
नाम ही मुक्ति है, नाम ही तृप्ति है, नाम ही रूप-रंग है, नाम ही शोभा है, नाम ही भोग और योग दोनों है। इंसान जो कुछ भी ढूँढता है, चाहे भौतिक सुख हो या आत्मिक मुक्ति, वो सब एक ही जगह मिलता है: नाम में। ये दो अलग दुनियाएँ नहीं हैं, ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
पउड़ी 7
“ओटि पोटि जन हरि रसि राते”: ताने-बाने की तरह भक्त हरि के रस में रँगे हैं। जैसे कपड़े में ताना और बाना अलग नहीं किए जा सकते, वैसे ही भक्त और नाम को अलग नहीं किया जा सकता। “हरि का भगतु प्रगट नही छपै”: ये अंदरूनी बदलाव इतना गहरा होता है कि बाहर दिखने लगता है। जैसे सुबह का सूरज चाहे भी छिपना चाहे तो नहीं छिप सकता।
“नानक जन संगि केते तरे”: ऐसे भक्तों की संगत में और भी कितने ही तर जाते हैं। सिमरन व्यक्तिगत होने के साथ-साथ दूसरों को भी पार लगाता है।
पउड़ी 8
“पारजातु एहु हरि को नाम”: हरि का नाम पारिजात वृक्ष है, वो पौराणिक कल्प-वृक्ष जो हर इच्छा पूरी करता है। “कामधेनु हरि हरि गुण गाम”: हरि के गुण गाना कामधेनु (इच्छा-पूरक गाय) है।
“नामु सुनत दरद दुख लथा”: नाम सुनते ही दर्द और दुख उतर जाते हैं। “सुनत” (सुनते ही) पर ध्यान दें: सिर्फ़ सुनने मात्र से ही असर शुरू हो जाता है। “नाम तुलि कछु अवरु न होइ”: नाम की तुलना में और कुछ भी नहीं।
ये दूसरी अष्टपदी का निष्कर्ष है। ज़िंदगी के हर अँधेरे कोने में, हर कठिन मोड़ पर, जब सब छूट जाता है, तब भी नाम साथ रहता है। पारिजात वृक्ष और कामधेनु की उपमा से स्पष्ट किया कि नाम में सब कुछ है।
अष्टपदी 3
श्लोक
पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल ॥1॥
पउड़ी 1
गुरु जी एक लंबी सूची गिनाते हैं: जाप, तप, ज्ञान, ध्यान, छह शास्त्रों का अध्ययन, स्मृतियों की व्याख्या, योगाभ्यास, कर्मकांड, सब कुछ त्यागकर जंगल में भटकना, दान-पुण्य, हवन, शरीर को कष्ट देना, व्रत-नियम। ये सब कर लो, सब।
और फिर एक पंक्ति में सब उलट देते हैं: “नही तुलि राम नाम बीचार”, इन सबकी तुलना राम नाम के विचार (चिंतन) से नहीं। “नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार”: गुरमुख बनकर एक बार भी नाम जप लो, तो वो सब कुछ से ज़्यादा है।
ये बात सुनने में सरल लगती है, लेकिन इसकी गहराई बहुत है। गुरु जी कर्मकांड के ख़िलाफ़ नहीं हैं, वो कह रहे हैं कि बिना अंदरूनी प्रेम और चेतना के ये सब खोखले हैं। जैसे बिना पानी के बादल गरजता तो है, लेकिन फ़सल नहीं उगती।
पउड़ी 2
गुरु जी और आगे जाते हैं: चाहे नौ खंड पृथ्वी घूम लो, चिरंजीवी बन जाएँ, महान उदासी (संन्यासी) बन जाएँ, अग्नि में प्राण होम कर दो, सोना, घोड़े, ज़मीन दान कर दो, जैन मार्ग के संयम और कठिन साधन कर लो, पल-पल शरीर कटवाते रहो।
“तउ भी हउमै मैलु न जावै”: फिर भी अहंकार का मैल नहीं जाता। ये तीखी बात है। गुरु जी कह रहे हैं कि ये सारी कठिन तपस्या भी अहंकार के मैल को नहीं धो सकती। क्यों? क्योंकि बहुत बार ये तपस्या ख़ुद अहंकार का कारण बन जाती है: “मैंने इतना कठिन व्रत रखा, मैंने इतना दान दिया, मैंने इतनी तपस्या की।” ये “मैंने” ही तो अहंकार है।
पउड़ी 3
“मन कामना तीरथ देह छुटै”: मन में कामना (इच्छा) रखकर तीर्थ जाएँ तो शरीर भले ही छूटे (थक जाए), लेकिन गर्व और अभिमान मन से नहीं हटता। “सोच करै दिनसु अरु राति”: दिन-रात शुद्धि करो (स्नान, शौच, सफ़ाई), मन का मैल तन से नहीं जाता।
“जलि धोवै बहु देह अनीति, सुध कहा होइ काची भीति”: पानी से शरीर को बार-बार धोओ, कच्ची दीवार कहाँ शुद्ध होगी? ये सटीक उपमा है। कच्ची मिट्टी की दीवार को जितना पानी डालो, वो और गलती है, मज़बूत नहीं होती। ठीक वैसे ही, बाहरी शुद्धि से मन का मैल और फैलता है, क्योंकि इंसान सोचता है “मैं तो शुद्ध हो गया” और ये सोच ख़ुद मैल है।
“नानक नामि उधरे पतित बहु मूच”: नाम से बहुत-से पतित (गिरे हुए, पापी) उधर गए हैं। ये आशा की बात है: गुरु जी कह रहे हैं कि चाहे आप कितने ही गिरे हैं, नाम आपको उठा सकता है।
पउड़ी 4
“बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै”: बहुत चतुराई करने पर भी यम का भय लगा रहता है। “भेख अनेक अगनि नही बुझै”: अनेक वेष (भेष) बदलने से अंदर की अग्नि (तृष्णा, विकार) नहीं बुझती। कोई साधु का वेष ले ले, कोई संन्यासी बन जाए, लेकिन अंदर अगर वही आग जल रही है तो कपड़े बदलने से क्या होंगे?
“अवर करतूति सगली जमु डानै, गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै”: बाक़ी सारे काम यम डाँटता है (स्वीकार नहीं करता)। गोविंद के भजन के बिना तिल-भर भी नहीं मानता। ये ऐसा है जैसे कोई परीक्षा में ग़लत विषय की कॉपी भर ले, बहुत मेहनत की, लेकिन सवाल का जवाब तो दिया ही नहीं।
“नानक बोलै सहजि सुभाए”: नानक सहज स्वभाव से (बिना किसी दिखावे के, सरलता से) कहते हैं: नाम जपो, दुख जाएगा।
पउड़ी 5
अब गुरु जी सीधे-सीधे बताते हैं कि अगर आपको ये चाहिए, तो ये करो:
अगर चार पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चाहिए, तो साध जनों की सेवा करो। अगर अपना दुख मिटाना है, तो हरि का नाम गाओ। अगर अपनी शोभा (इज़्ज़त) चाहते हैं, तो साधसंगत में अहंकार छोड़ो। अगर जन्म-मरण से डरते हैं, तो संतों की शरण में जाएँ।
हर जवाब में या तो “नाम” है या “साध जना की सेवा/संगत” है। गुरु जी बार-बार इन्हीं दो बातों पर लौटते हैं। और अंत में: “जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा, नानक ता कै बलि बलि जासा”: जो प्रभु के दर्शन का प्यासा है, नानक उस पर बलिहारी जाते हैं।
पउड़ी 6
“आपस कउ जो जाणै नीचा, सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा”: जो अपने आप को नीचा (छोटा) जाने, वही सबसे ऊँचा गिना जाता है। ये सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध पंक्तियों में से है। ये विरोधाभास (paradox) है जो सारे धर्मों में मिलता है: ऊँचाई नीचे होने में है।
“जा का मनु होइ सगल की रीना”: जिसका मन सबके चरणों की धूल (रीना) बन जाए। “मन अपुने ते बुरा मिटाना, पेखै सगल स्रिसटि साजना”: अपने मन से बुराई मिटा ली, अब सारी सृष्टि में उसे सज्जन (अपने) दिखते हैं।
“सूख दूख जन सम द्रिसटेता”: सुख-दुख को समान दृष्टि से देखता है। “पाप पुंन नही लेपा”: पाप-पुण्य का लेप उस पर नहीं लगता। ये कर्म से ऊपर उठने की बात है, जहाँ इंसान करता सब कुछ है लेकिन “मैंने किया” का बोध नहीं रहता।
गाँव में दो कुएँ थे। एक कुआँ कहता था, “मैं बहुत गहरा हूँ, मेरा पानी बहुत मीठा है।” लोग आते, पानी पीते, लेकिन कुएँ का गर्व बढ़ता जाता। दूसरा कुआँ चुपचाप पानी देता रहता, न कोई दावा, न कोई शोर। धीरे-धीरे पहले कुएँ का पानी कड़वा हो गया और दूसरे का और मीठा। गुरु जी कहते हैं: जो अपने आप को नीचा जाने, वही सबसे ऊँचा है।
पउड़ी 7
ये पउड़ी एक सुंदर प्रार्थना है। “निधन कउ धनु आपके नाउ”: निर्धन (ग़रीब) के लिए आपका नाम ही धन है। “निथावे कउ नाउ आपका थाउ”: बेघर के लिए आपका नाम ही ठिकाना है। “निमाने कउ प्रभ आपके मानु”: अपमानित के लिए आपका नाम ही सम्मान है।
गुरु जी ने तीन तरह की ग़रीबी बताई: धन की ग़रीबी, ठिकाने की ग़रीबी, और इज़्ज़त की ग़रीबी। और तीनों का इलाज एक ही है: नाम। “तुम्हरी उसतति आप ते होइ”: आपकी स्तुति आपसे ही हैं सकती है। कोई और आपकी पूरी महिमा बयान नहीं कर सकता।
पउड़ी 8
तीसरी अष्टपदी का समापन। गुरु जी चार “सबसे श्रेष्ठ” बताते हैं: सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म: हरि का नाम जपना। सब क्रियाओं में श्रेष्ठ क्रिया: साधसंगत में मन का मैल धोना। सब उद्यमों में श्रेष्ठ उद्यम: हरि का नाम सदा जपना। सब बाणियों (वाचाओं) में अमृत बाणी: हरि का यश सुनना और बखानना।
और सबसे ऊँचा स्थान? कोई तीर्थ नहीं, कोई पहाड़ नहीं, कोई मंदिर नहीं। “नानक जिह घटि वसै हरि नामु”: वो हृदय सबसे ऊँचा स्थान है जिसमें हरि का नाम बसता है। ये पूरी तीसरी अष्टपदी का निचोड़ है: बाहर कहीं मत भटको, सबसे पवित्र तीर्थ आपका अपना हृदय है, अगर उसमें नाम बसा हो।
अष्टपदी 4
श्लोक
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि ॥1॥
पउड़ी 1
गुरु जी एक-एक करके ईश्वर के उपकार गिनाते हैं, और ये गिनती किसी भी इंसान की ज़िंदगी पर लागू होती है:
“कवन मूल ते”: किस मूल (जड़, शुरुआत) से आप बना? कुछ भी नहीं था, और उसने आपको रचा, सजाया, सँवारा। “गरभ अगनि मह जिनहि उबारिआ”: गर्भ की अग्नि (गर्भ में जो तपिश और अँधेरा है) में उसने आपको बचाया। “बार बिवसथा आपहि पिआरै दूध”: बचपन में (जब आप बेबस था) आपको दूध पिलाया। “भरि जोबन भोजन सुख सूध”: जवानी में भोजन, सुख, और समझ दी। “बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन”: बुढ़ापे में आपके ऊपर रिश्तेदार और साथी रखे जो आपकी देखभाल करें।
और फिर: “इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै”: ये निर्गुण (कृतघ्न) इंसान कुछ नहीं समझता। “बखसि लेहु तउ नानक सीझै”: बख़्श (माफ़ कर) दो, तभी नानक सफल होंगे।
पउड़ी 2
अब “जिह प्रसादि” (जिसकी कृपा से) की लय शुरू होती है, जो छठी अष्टपदी में पूरी तरह खिलेगी। जिसकी कृपा से आप धरती पर सुख से बसता है, बेटों, भाइयों, दोस्तों, पत्नी के साथ हँसता है। जिसकी कृपा से ठंडा पानी पीता है, सुखदायी हवा और अमूल्य अग्नि मिलती है। जिसकी कृपा से सब रस भोगता है। जिसने हाथ, पैर, कान, आँखें, जीभ दी।
“तिसहि तिआगि अवर संगि रचना”: उसी को छोड़कर और (दूसरों) के साथ रचा-बसा (लिपटा) है। ये बड़ी सीधी बात है: जिसने सब दिया, उसे भूल गए, और जो कुछ नहीं दे सकते (माया, दुनियादारी), उनके पीछे भाग रहे हैं।
“ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे”: ऐसे दोष मूर्ख अंधे को सता रहे हैं। “नानक काढि लेहु प्रभ आपे”: नानक कहते हैं, प्रभु ख़ुद (इन दोषों से) निकाल लो।
पउड़ी 3
गुरु जी इंसान की मूर्खता को कई कोणों से दिखाते हैं। जो आदि से अंत तक रक्षा करने वाला है, उससे प्रीत नहीं करता। जिसकी सेवा से नौ निधियाँ मिलें, उस पर मन नहीं लगाता। जो ठाकुर (मालिक) सदा हज़ूर (पास) है, उसे अंधा दूर जानता है। जिसकी टहल (सेवा) से दरगाह (ईश्वर के दरबार) में मान मिले, उसे मूर्ख अज्ञानी भूल जाता है।
“सदा सदा इहु भूलनहारु, नानक राखनहारु अपारु”: ये इंसान सदा-सदा भूलने वाला है, लेकिन नानक कहते हैं, रक्षा करने वाला अपार (असीम) है। ये आख़िरी पंक्ति बड़ी तसल्ली देने वाली है: हम भूलते रहते हैं, लेकिन वो बचाता रहता है। हमारी भूल से उसकी रक्षा कम नहीं होती।
पउड़ी 4
ये पउड़ी इंसान की उलटी बुद्धि का वर्णन है, और इसकी उपमाएँ तीखी हैं:
“रतनु तिआगि कउडी संगि रचै”: रत्न (नाम) छोड़कर कौड़ी (माया) से लिपटा है। “साचु छोडि झूठ संगि मचै”: सच छोड़कर झूठ के साथ मस्त है। “जो छडना सु असथिरु करि मानै”: जो छोड़ना है (दुनिया), उसे स्थिर (शाश्वत) मान लिया। “जो होवनु सो दूरि परानै”: जो होना है (ईश्वर की कृपा), उसे दूर जानता है।
“चंदन लेपु उतारै धोइ, गरधब प्रीति भसम संगि होइ”: चंदन का लेप धो डालता है (जो सुगंध और शीतलता देता है), और गधे (गरधब) की तरह भस्म (राख, मिट्टी) में लोटता है। ये उपमा बहुत सटीक है। गधे को चंदन लगा दो तो वो धूल में लोट लगाएगा। ठीक वैसे ही, इंसान को ईश्वर ने इतनी सुंदर ज़िंदगी दी, लेकिन वो माया की धूल में लोट लगा रहा है।
पउड़ी 5
“करतूति पसू की मानस जाति”: करतूत (काम) पशु जैसे, जाति (पैदाइश) मनुष्य की। ये कड़ी बात है। गुरु जी कहते हैं, जन्म तो इंसान का लिया, लेकिन काम पशुओं जैसे करता है।
“बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ”: बाहर से धार्मिक वेश, अंदर माया का मैल। “बाहरि गिआन धिआन इसनान, अंतरि बिआपै लोभु सुआनु”: बाहर ज्ञान, ध्यान, स्नान, लेकिन अंदर लोभ का कुत्ता (“सुआनु”) सता रहा है। ये “सुआनु” (कुत्ता) उपमा बहुत तीखी है। लोभ कुत्ते जैसा है: कभी संतुष्ट नहीं होता, हर हड्डी के पीछे भागता है।
“गलि पाथर कैसे तरै अथाह”: गले में पत्थर बाँधकर गहरे पानी में कैसे तैरोगे? ये दोहरी ज़िंदगी (बाहर संत, अंदर विकारी) गले का पत्थर है।
लेकिन अंत सकारात्मक है: “जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि, नानक ते जन सहजि समाति”: जिसके अंदर प्रभु ख़ुद बसता है, वो सहज ही समा जाता है। बाहरी दिखावा नहीं, अंदरूनी उपस्थिति चाहिए।
पउड़ी 6
ये पउड़ी चार उपमाओं पर बनी है:
अंधा (नेत्रहीन) रास्ता कैसे पाए? किसी को हाथ पकड़कर ले जाना होंगे। मूर्ख (डोरा) पहेली कैसे बूझे? उसे रात कहो तो सुबह समझता है। गूँगा विष्णुपद (भजन) कैसे गाए? कोशिश करे तो भी सुर टूटता है। लँगड़ा (पिंगुल) पर्वत पर कैसे चढ़े? संभव ही नहीं।
गुरु जी कह रहे हैं: हम सब इन्हीं की तरह हैं। हम आध्यात्मिक रूप से अंधे, मूर्ख, गूँगे, और लँगड़े हैं। अपने बल पर ईश्वर तक पहुँचना असंभव है। “करतार करुणा मै दीन बेनती करै”: हे करुणामय करतार, ये दीन (निर्बल) विनती करता है। “नानक तुमरी किरपा तरै”: सिर्फ़ आपकी कृपा से ही पार होंगे।
ये समर्पण का क्षण है। जब इंसान अपनी सीमा पहचान लेता है, तभी कृपा का दरवाज़ा खुलता है।
पउड़ी 7
“संगि सहाई सु आवै न चीति”: जो साथी (ईश्वर) सदा साथ है, वो याद नहीं आता। “जो बैराई ता सिउ प्रीति”: जो दुश्मन हैं (विकार), उनसे प्रीति है। “बलूआ के गृह भीतरि बसै”: रेत के घर में बसता है (यानी ऐसी चीज़ों पर भरोसा करता है जो पल में ढह जाएँगी)।
“द्रिड़ करि मानै मनहि प्रतीति, कालु न आवै मूड़े चीति”: मन में पक्का विश्वास कर रखा है (कि ये सब टिकेगा), मूर्ख को काल (मृत्यु) का ध्यान ही नहीं आता।
“बैर बिरोध काम क्रोध मोह, झूट बिकार महा लोभ धरोह”: ये पाँच विकारों (और उनके साथियों) की सूची है जो इंसान को जकड़े रखती है। “इआहू जुगति बिहाने कई जनम”: इसी तरीक़े से कई जन्म गँवा दिए। “नानक राखि लेहु आपन करि करम”: नानक कहते हैं, हे प्रभु, अपनी करम (कृपा) करके बचा लो।
पउड़ी 8
चौथी अष्टपदी का समापन एक सुंदर प्रार्थना से होता है:
“आप ठाकुरु आप पहि अरदासि”: आप मालिक है, आपसे ही अरदास (प्रार्थना) है। “जीउ पिंडु सभु आपकी रासि”: जीव और शरीर, सब आपकी पूँजी (रासि) है। “आप मात पिता हम बारिक आपके”: आप माता-पिता हैं, हम आपके बच्चे हैं। “तुमरी कृपा मह सूख घनेरे”: आपकी कृपा में बहुत सुख हैं।
“सगल समगरी तुमरै सूत्र धारी”: सारी सामग्री (सृष्टि) आपके सूत्र (धागे) में पिरोई हुई है। ये वैसा ही है जैसे माला के मोती अलग-अलग दिखते हैं लेकिन एक ही धागा सबको जोड़े रखता है। सारी सृष्टि, सारे जीव, सारे ग्रह, एक ही सूत्र में पिरोए हैं।
“नानक दास सदा कुरबानी”: नानक का दास सदा कुर्बान (बलिदान, समर्पित) है।
अष्टपदी 5
श्लोक
नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ ॥1॥
पउड़ी 1
ये पउड़ी एक व्यापारिक उदाहरण से शुरू होती है: “दस बसआप ले पाछै पावै, एक बसतु कारनि बिखोटि गवावै”: ईश्वर दस वस्तुएँ देता है, इंसान उन्हें पीछे (बेक़दर) रख देता है, और एक वस्तु (जो ईश्वर ने नहीं दी) के लिए सब कुछ गँवा देता है। “एक भी न दए दस भी हिरि लए”: वो एक भी नहीं देता (ईश्वर को), और ईश्वर दसों भी वापस ले ले, तो मूर्ख क्या करेगा?
ये बात हर इंसान पर लागू है। हमारे पास जो कुछ भी है, सेहत, परिवार, बुद्धि, ये सब उसका दिया हुआ है। लेकिन हम उन चीज़ों के पीछे भागते हैं जो हमारे पास नहीं हैं, और जो हैं उनकी क़दर नहीं करते।
“जा कै मनि लागा प्रभु मीठा, सभल सूख ताहू मनि वूठा”: जिसके मन को प्रभु मीठा लगने लगा, उसके मन में सारे सुख बरस पड़ते हैं।
पउड़ी 2
गुरु जी एक साहूकार (बैंकर) की उपमा देते हैं: “अगनत साहु अपनी दे रासि”: अनंत साहूकार (ईश्वर) अपनी पूँजी देता है। “खात पीत बरतै अंद उलासि”: इंसान खाता है, पीता है, इस्तेमाल करता है, आनंद मनाता है। “अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लए”: अपनी अमानत (जो उसने दी थी) कुछ वापस ले ले, तो “अगिआनी मनि रोसु करए”: अज्ञानी मन में ग़ुस्सा करता है।
ये गहरी बात है। जब कोई हमसे छिन जाता है, कोई चीज़ खो जाती है, सेहत बिगड़ती है, तो हम ग़ुस्सा करते हैं ईश्वर पर। लेकिन गुरु जी कहते हैं: ये सब उसकी अमानत थी, उसने दी थी, उसे वापस लेने का हक़ है।
“जिस की बसतु तिसु आगै राखै”: जिसकी वस्तु है, उसके सामने रख दे (समर्पण कर दे)। “उस ते चउगुन करै निहालु”: वो चौगुना कर देता है, और निहाल (प्रसन्न) करता है। ये शर्त है: पहले समर्पण करो, फिर चौगुना मिलेगा।
पउड़ी 3
गुरु जी दो सुंदर उपमाएँ देते हैं:
“बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै”: पेड़ की छाँव से प्यार कर ले, लेकिन शाम को छाँव चली जाएगी, और मन पछताएगा। छाँव अस्थायी है। ज़िंदगी के सारे सुख ऐसे ही हैं: सुबह की छाँव शाम को नहीं रहती।
“बटाऊ सिउ जो लावै नेह”: राहगीर (बटाऊ, मुसाफ़िर) से जो प्यार कर ले, उसके हाथ कुछ नहीं आता। राहगीर आता है, थोड़ी देर रुकता है, और चला जाता है। ये दुनिया के सारे रिश्तों का रूपक है: सब राहगीर हैं, कोई हमेशा नहीं रहता। सिर्फ़ नाम शाश्वत है।
पउड़ी 4
ये “मिथिआ” (मिथ्या, झूठा, नश्वर) पउड़ी सुखमनी साहिब की प्रसिद्ध पउड़ियों में से है। गुरु जी एक-एक करके सब कुछ “मिथिआ” बताते हैं:
शरीर मिथ्या। धन मिथ्या। परिवार मिथ्या। अहंकार मिथ्या। ममता मिथ्या। राज, जवानी, संपत्ति मिथ्या। काम-क्रोध मिथ्या। रथ, हाथी, घोड़े, कपड़े मिथ्या। द्रोह, मोह, अभिमान मिथ्या।
और फिर एक पंक्ति में सब उलट देते हैं: “असथिरु भगति साध की सरन”: स्थिर (शाश्वत) सिर्फ़ भक्ति है और साधू की शरण है। बाक़ी सब बहता पानी है, सिर्फ़ भक्ति चट्टान है।
ध्यान दें: गुरु जी ये नहीं कह रहे कि शरीर, धन, परिवार “बुरे” हैं। वो कह रहे हैं कि ये “मिथिआ” (अस्थायी, नश्वर) हैं। इनसे लगाव रखना वैसा ही है जैसे बर्फ़ के टुकड़े को हमेशा के लिए पकड़ रखना चाहो। वो पिघलेगा। इस सत्य को स्वीकार करना ही ज्ञान है।
पउड़ी 5
अब गुरु जी शरीर के हर अंग को “मिथिआ” बताते हैं, लेकिन शर्त के साथ: जब वो ग़लत काम में लगें, तब मिथ्या हैं।
कान मिथ्या जब दूसरों की निंदा सुनें। हाथ मिथ्या जब दूसरे का धन चुराएँ। आँखें मिथ्या जब पराई स्त्री/पुरुष के रूप देखें। जीभ मिथ्या जब ग़ैर-ज़रूरी स्वादों में लिपटी रहे। पैर मिथ्या जब विकार की तरफ़ दौड़ें। मन मिथ्या जब दूसरों के लोभ में फँसे। शरीर मिथ्या जब परोपकार न करे। नाक मिथ्या जब विकारों की गंध ले।
“सफल देह नानक हरि हरि नाम लए”: शरीर तब सफल होता है जब हरि हरि नाम लिया जाए। यानी ये सारे अंग मिथ्या नहीं हैं, ये तब मिथ्या बनते हैं जब इनका इस्तेमाल ग़लत हो। सही इस्तेमाल करो तो ये सफल हैं।
पउड़ी 6
“बिरथी साकत की आरजा”: ईश्वर से विमुख (साकत) इंसान की ज़िंदगी व्यर्थ है। “बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ, मेघ बिना जिउ खेती जाइ”: बिना सिमरन के दिन-रात ऐसे गुज़रते हैं जैसे बिना बारिश के खेती बर्बाद हो जाती है। ये उपमा सीधी और ताक़तवर है। किसान मेहनत करता है, बीज बोता है, खेत जोतता है, लेकिन अगर बारिश नहीं हुई तो सब बेकार। ठीक वैसे ही, बिना सिमरन के ज़िंदगी की सारी मेहनत सूख जाती है।
“जिउ किरपन के निरारथ दाम”: जैसे कंजूस के पैसे बेकार हैं (न ख़ुद खाए, न किसी को दे), वैसे ही बिना भजन के सारे काम बेकार हैं।
पउड़ी 7
“रहत अवर कछु अवर कमावत”: कहता कुछ है, करता कुछ और है। “मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत”: मन में प्रीत नहीं, मुँह से (झूठी) गाँठ लगाता है (बातें बनाता है)।
ये दोहरेपन (hypocrisy) की सीधी पहचान है। “जाननहार प्रभू परबीन”: लेकिन जानने वाला प्रभु बहुत चतुर है, उसे सब पता है। “बाहरि भेख न काहू भीन”: बाहरी वेश से कोई भी उसे बेवक़ूफ़ नहीं बना सकता।
“अवर उपदेसै आपि न करै”: दूसरों को उपदेश देता है, ख़ुद नहीं करता। ये लाइन हम सबके लिए आईना है। “जिस कै अंतरि बसै निरंकारु, तिस की सीख तरै संसारु”: जिसके अंदर निरंकार बसता है, उसकी सीख से संसार तरता है। सिखाने का हक़ उसे है जो ख़ुद जीता है।
पउड़ी 8
पाँचवीं अष्टपदी का समापन। “करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै”: मैं विनती करता हूँ, पारब्रह्म सब जानता है। “आपहि आप आपि करत निबेरा”: वो ख़ुद ही सब फ़ैसले करता है। किसी को दूर दिखाता है, किसी को पास बुलाता है। वो सारे उपायों और चतुराइयों से परे है। वो हर आत्मा की हालत जानता है।
“जिसु भावै तिसु ले लड़ि लाइ”: जो उसे भाए (अच्छा लगे), उसे अपने दामन से लगा ले। “थान थनंतरि रहिआ समाइ”: हर जगह, हर कण में समाया हुआ है।
“निमख निमख जपि नानक हरी”: पल-पल हरि को जपो। ये पाँचवीं अष्टपदी का सार है: कृतघ्न मत बनो, जो मिला है उसकी क़दर करो, और पल-पल उसे याद रखो।
अष्टपदी 6
श्लोक
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥1॥
पउड़ी 1
“जिह प्रसादि” की लय यहाँ से शुरू होती है और पूरी अष्टपदी में चलती है। ये एक कृतज्ञता का अभ्यास है, gratitude meditation है।
जिसकी कृपा से आप छत्तीस प्रकार के अमृत (स्वादिष्ट भोजन) खाता है, उस ठाकुर को मन में रख। जिसकी कृपा से शरीर पर सुगंध लगाता है, उसे सिमरकर परम गति पा। जिसकी कृपा से सुख के महल में बसता है, उसे सदा मन में ध्या। जिसकी कृपा से घर-परिवार के संग सुख से रहता है, आठ पहर (24 घंटे) उसे जीभ से सिमर। जिसकी कृपा से रंग, रस, भोग मिलते हैं, उसे सदा ध्याओ।
गुरु जी भोजन, सुगंध, घर, परिवार, भोग, इन सब सांसारिक सुखों को बुरा नहीं कह रहे। ये सब ईश्वर की कृपा हैं। बुराई तब है जब इन्हें भोगते हुए देने वाले को भूल जाएँ।
पउड़ी 2
जिसकी कृपा से रेशमी (पाट-पटंबर) कपड़े पहनता है, उसे छोड़कर और किसमें लुभाता है? जिसकी कृपा से सुख की सेज पर सोता है, आठ पहर उसका यश गा। जिसकी कृपा से सब आपको मान देते हैं, उसका यश मुँह से बखान। जिसकी कृपा से आपका धर्म (जीवन-व्यवस्था) क़ायम है, सदा केवल पारब्रह्म को ध्या।
“नानक पति सेती घरि जावहि”: नानक कहते हैं, इज़्ज़त के साथ घर (ईश्वर के दरबार) जाएँगे। “पति सेती” (इज़्ज़त के साथ) बड़ा ख़ूबसूरत शब्द है। ये “घर” ईश्वर का दरबार है, और वहाँ इज़्ज़त से पहुँचने का रास्ता कृतज्ञता है।
पउड़ी 3
जिसकी कृपा से निरोग सोने जैसा शरीर मिला, उस राम स्नेही में लिव लगा। जिसकी कृपा से आपकी इज़्ज़त (ओला, ढक्कन, छिपाव) क़ायम है, हरि का यश कहकर मन में सुख पा। जिसकी कृपा से आपके सगल छिद्र (कमियाँ, दोष) ढक दिए गए, उस ठाकुर की शरण में पड़। जिसकी कृपा से आपको कोई नहीं पहुँच सकता (कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता), साँस-साँस उस ऊँचे प्रभु को सिमर।
“जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह”: जिसकी कृपा से ये दुर्लभ (बहुत मुश्किल से मिलने वाला) मनुष्य शरीर पाया, उसकी भक्ति कर। “द्रुलभ देह” पर ज़ोर है: गुरु जी कहते हैं ये शरीर आसानी से नहीं मिलता, ये बड़ा वरदान है, इसे बर्बाद मत करो।
पउड़ी 4
जिसकी कृपा से आभूषण (गहने) पहनते हैं, उसे सिमरने में आलस क्यों? जिसकी कृपा से घोड़ों, हाथियों की सवारी है, उस प्रभु को कभी मत बिसारो। जिसकी कृपा से बाग़, ज़मीन, धन है, उसे अपने मन में प्रोई (पिरोकर) रखो। जिसने आपकी मन की बनत (रचना, सजावट) बनाई, उठते-बैठते उसे ध्या।
“ईहा ऊहा नानक आपकी रखै”: इधर भी (इस लोक में) और उधर भी (परलोक में) वो आपकी रक्षा करेगा। ये वायदा है: अगर आप उसे याद रखे, तो वो दोनों जहानों में आपकी रक्षा करेगा।
पउड़ी 5
जिसकी कृपा से पुण्य-दान करता है, उसे आठ पहर ध्या। जिसकी कृपा से आपका आचार-व्यवहार अच्छा है, उसे साँस-साँस याद कर। जिसकी कृपा से सुंदर रूप मिला, उस अनूप (अनुपम, बेमिसाल) प्रभु को सिमर। जिसकी कृपा से अच्छी जाति (कुल, हैसियत) मिली, उसे दिन-रात सिमर। जिसकी कृपा से आपकी पत (इज़्ज़त) क़ायम है, गुरु की कृपा से उसका यश कह।
गुरु जी ने “जाति” (कुल) को भी ईश्वर की कृपा बताया। अक्सर लोग अपनी जाति पर गर्व करते हैं जैसे ये उनकी अपनी कमाई हो। गुरु जी कहते हैं: ये भी उसकी देन है, गर्व की कोई जगह नहीं।
पउड़ी 6
अब गुरु जी शरीर की इंद्रियों की तरफ़ मुड़ते हैं: जिसकी कृपा से कान संगीत सुनते हैं, आँखें विस्मय (आश्चर्य) देखती हैं, जीभ अमृत-वाणी बोलती है, सुख-सहज से बसते हैं, हाथ-पैर काम करते हैं, सब फल मिलते हैं, परम गति मिलती है, सुख-सहज में समा जाते हैं।
“ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु”: ऐसे प्रभु को छोड़कर और किसमें लग रहे हैं? “गुर प्रसादि नानक मनि जागहु”: गुरु की कृपा से मन में जागो। ये “जागहु” (जागो) बहुत ज़ोरदार आदेश है। गुरु जी कह रहे हैं: आप सो रहे हैं, एक तरह की नींद में हो जहाँ आपको वो दिखता नहीं जो सब दे रहा है। जागो।
पउड़ी 7
जिसकी कृपा से आप संसार में प्रकट (प्रसिद्ध, मौजूद) है, उसे मूल से (बिल्कुल) मत बिसार। जिसकी कृपा से आपका प्रताप (रौब, असर) है, हे मूर्ख मन, उसे जप। जिसकी कृपा से आपके सारे काम पूरे होते हैं, उसे सदा पास (हजूरे) जान। जिसकी कृपा से आप सत्य पाता है, हे मेरे मन, उसमें रच (डूब जा)।
“रे मन मूड़ आप ता कउ जापु”: “रे मूर्ख मन” कहकर गुरु जी मन को सीधे संबोधित करते हैं। ये तकनीक पूरी सुखमनी साहिब में बार-बार आती है: गुरु जी किसी और को उपदेश नहीं दे रहे, वो अपने मन से बात कर रहे हैं। और यही सबसे प्रभावी उपदेश है।
पउड़ी 8
छठी अष्टपदी का समापन एक गहरे सत्य से होता है: “आपि जपाइ जपै सो नाउ”: वो ख़ुद जपवाता है, तभी कोई नाम जपता है। “आपि गावाइ”: वो ख़ुद गवाता है, तभी कोई गुण गाता है।जपना और गाना भी उसकी कृपा है।
“सभल निधान प्रभ आपकी मइआ, आपहु कछू न किनहू लइआ”: सारे ख़ज़ाने आपकी मेहर हैं, अपने से किसी ने कुछ नहीं लिया (कमाया)। “जितु जितु लावहु तितु लगहि”: जिधर-जिधर आप लगाए, उधर ही लगते हैं। “नानक इन कै कछू न हाथ”: इनके (जीवों के) हाथ में कुछ नहीं।
ये अंतिम पंक्ति पूर्ण समर्पण है। कुछ भी मेरा नहीं, कुछ भी मेरे वश में नहीं। जो है, जो मिला, जो होंगे, सब उसकी मर्ज़ी से। ये भाव जब मन में बैठ जाए, तो अहंकार का कोई आधार नहीं बचता।
अष्टपदी 7

श्लोक
सुनि मीता नानकै बिनवंता ॥ साध जना की अचरज कथा ॥1॥
पउड़ी 1
“साध कै संगि” से हर पंक्ति शुरू होती है, और हर पंक्ति एक अलग फ़ायदा बताती है: संत की संगत से चेहरा उजला (रोशन) होता है। सारा मैल धुलता है। अभिमान मिटता है। सुज्ञान (सच्चा ज्ञान) प्रकट होता है। प्रभु पास लगने लगता है। सारे मामले सुलझ जाते हैं। नाम-रत्न मिलता है। और बस एक (ईश्वर) पर ध्यान लगता है।
“साध की सोभा प्रभ माहि समानी”: संत की शोभा प्रभु में ही समाई हुई है, यानी संत और प्रभु में कोई फ़र्क़ नहीं। संत प्रभु का दर्पण है।
पउड़ी 2
संत की संगत से अगोचर (इंद्रियों से परे) ईश्वर मिलता है। सदा खिले रहते हैं। पाँच (विकार: काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) वश में आ जाते हैं। अमृत रस चखने को मिलता है। सबके चरणों की धूल बन जाते हैं। मनोहर (सुंदर) बोल बोलने लगते हैं। मन कहीं नहीं भटकता। मन को स्थिरता (असथिति) मिलती है। माया से अलग हो जाते हैं। और प्रभु प्रसन्न हो जाता है।
“आवहि बसि पंचा” पर ध्यान दें: पाँच विकार वश में आ जाते हैं। गुरु जी ये नहीं कह रहे कि विकार मर जाते हैं, कह रहे हैं कि वो “बसि” (क़ाबू में) आ जाते हैं। वो रहते हैं, लेकिन अब आपके ग़ुलाम हैं, आप उनके नहीं।
पउड़ी 3
संत की संगत से दुश्मन भी मित्र हो जाते हैं। महा पवित्र हो जाते हैं। किसी से बैर नहीं रहता। पैर भटकता (बीगा) नहीं। कोई बुरा नहीं दिखता। परमानंद का अनुभव होता है। किसी तरह का ताप (कष्ट) नहीं रहता। और सारा “आपु” (अहंकार, मैं-पन) छूट जाता है।
“नानक साध प्रभू बिनु नाई”: संत और प्रभु में कोई अंतर नहीं। ये गहरा वक्तव्य है। गुरु जी सीधे कह रहे हैं: संत प्रभु ही है। जो संत से मिला, वो प्रभु से मिला।
पउड़ी 4
मन भटकना बंद करता है। सदा सुख पाता है। अगोचर (अदृश्य) वस्तु (ईश्वर) प्राप्त होती है। जो सहन नहीं हो सकता (“अजरु”), वो सहन होने लगता है। ऊँचे स्थान पर बसता है। महल (ईश्वर के दरबार) तक पहुँचता है। सारे धर्म दृढ़ होते हैं। केवल पारब्रह्म दिखता है। नाम-निधान (नाम का ख़ज़ाना) मिलता है।
“नानक साधू कै कुरबान”: नानक संत पर कुर्बान है। हर पउड़ी के अंत में गुरु जी संतों पर बलिहारी जाते हैं,असली भाव है।
पउड़ी 5
आपका पूरा कुल (वंश) उधर जाता है। साजन, मित्र, परिवार सब तरते हैं। ऐसा धन मिलता है जिससे सबको बरसा सको (बाँट सको)। धर्मराज तक सेवा करता है। देवताओं जैसी शोभा मिलती है। पाप भाग जाते हैं। अमृत गुण गाने को मिलते हैं। सारे स्थान (लोक) सुलभ हो जाते हैं।
“नानक साध कै संगि सफल जनंम”: संत की संगत से जन्म सफल हो जाता है। “सफल जनंम” (सफल जन्म), ये दो शब्द पूरी ज़िंदगी का लेखा-जोखा समेट लेते हैं।
पउड़ी 6
“नही कछु घाल”: कोई मेहनत नहीं लगती, बस दर्शन (भेटत) करते ही निहाल (आनंदित) हो जाता है। कलंक (कलूखत) हटते हैं। नरक छूटता है। इधर और उधर (इस जन्म और अगले) दोनों जगह सुखी। बिछड़ा हुआ हरि से मिलन हो जाता है। जो इच्छा हो, वो फल मिलता है। संत की संगत में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
“पारब्रहमु साध रिद बसै”: पारब्रह्म संत के हृदय में बसता है। “नानक उधरै साध सुनि रसै”: नानक कहते हैं, संत की बात सुनकर, उसके रस में डूबकर, उद्धार होता है।
पउड़ी 7
संत की संगत में हरि का नाम सुनो, हरि के गुण गाओ, मन से नहीं बिसरता (भूलता), ज़रूर (सरपर) पार होते हैं, प्रभु मीठा लगने लगता है, हर हृदय में दिखने लगता है, आज्ञाकारी बन जाते हैं, गति (मुक्ति) मिलती है, और सारे रोग मिटते हैं।
“नानक साध भेटे संजोग”: संत से मिलना संयोग (किस्मत, भाग्य) से होता है। संत की संगत ढूँढने से नहीं मिलती, ये ईश्वर की मेहर है कि आपका रास्ता किसी संत से मिलवा दे।
पउड़ी 8
सातवीं अष्टपदी का समापन। “साध की महिमा बेद न जानहि”: संत की महिमा वेद भी नहीं जानते। “साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि”: संत की उपमा तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से परे है। “साध की सोभा ऊच ते ऊची, मूच ते मूची”: ऊँचे से ऊँची, बड़ी से बड़ी।
“नानक साध प्रभू बेदु न भाई”: संत और प्रभु में कोई भेद (फ़र्क़) नहीं। ये सातवीं अष्टपदी का मुख्य बिंदु है, वही बात जो तीसरी पउड़ी में कही थी, अब पूरे ज़ोर से दोहराई: संत प्रभु का ही रूप है।
अष्टपदी 8

श्लोक
नानक एह लछण ब्रह्म गिआनी होइ ॥1॥
पउड़ी 1
ये पउड़ी पाँच प्रकृति-उपमाओं से बनी है:
ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप (लिप्त नहीं) है, जैसे कमल पानी में रहकर भी भीगता नहीं। ब्रह्मज्ञानी सदा निर्दोष है, जैसे सूरज सबका (अच्छे-बुरे, ऊँचे-नीचे का) सोखता (सुखाता) है, भेद नहीं करता। ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि समान है, जैसे हवा (पवन) राजा और रंक (ग़रीब) दोनों को एक समान छूती है। ब्रह्मज्ञानी का धीरज (धैर्य) एक-सा है, जैसे धरती (बसुधा) को कोई खोदे, कोई चंदन का लेप करे, धरती को फ़र्क़ नहीं पड़ता।
“ब्रहम गिआनी का इहै गुनाउ, नानक जिउ पावक का सहज सुभाउ”: ब्रह्मज्ञानी का यही गुण है, जैसे अग्नि (पावक) का सहज स्वभाव है, जलाना। अग्नि को सिखाना नहीं पड़ता कि कैसे जलना है। वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को अच्छा होने की कोशिश नहीं करनी पड़ती, वो सहज ही ऐसा है।
पउड़ी 2
ब्रह्मज्ञानी निर्मल से निर्मल (शुद्ध से शुद्ध) है, जैसे पानी पर मैल नहीं टिकती (पानी ख़ुद को साफ़ कर लेता है)। उसके मन में प्रकाश है, जैसे धरती के ऊपर आकाश (खुला, असीम, हर जगह)। उसके लिए मित्र और शत्रु समान हैं। उसमें अभिमान नहीं।
और फिर वो ख़ूबसूरत विरोधाभास: “ब्रहम गिआनी ऊच ते ऊचा, मनि अपने है सभ ते नीचा”: ब्रह्मज्ञानी ऊँचे से ऊँचा है, लेकिन अपने मन में सबसे नीचा है। ये वही बात है जो तीसरी अष्टपदी की छठी पउड़ी में कही थी: “आपस कउ जो जाणै नीचा, सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा।”
“ब्रहम गिआनी से जन भए, नानक जिन प्रभु आपि करए”: ब्रह्मज्ञानी वो बनते हैं जिन्हें प्रभु ख़ुद बनाए। ये कोई डिग्री नहीं जो कमाई जाए, ये ईश्वर की कृपा है।
पउड़ी 3
ब्रह्मज्ञानी सबके चरणों की धूल (रीना) है। उसने आत्म-रस (अपने भीतर का रस) पहचान लिया है। सब पर उसकी मया (करुणा) है। उससे कभी कुछ बुरा नहीं होता। वो सदा समदर्शी (सबको बराबर देखने वाला) है। उसकी दृष्टि से अमृत बरसता है। वो बंधनों से मुक्त है। उसकी जुगति (जीवन-विधि) निर्मल है।
“ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन”: उसका भोजन ज्ञान है। “ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआन”: उसका ध्यान ब्रह्म है। खाता ज्ञान, पीता ध्यान। शरीर को भोजन चाहिए, मन को ज्ञान चाहिए, आत्मा को ब्रह्म चाहिए।
पउड़ी 4
ब्रह्मज्ञानी की एक ही आस (आशा) है: ईश्वर। उसका कभी विनाश नहीं होता। उसमें गरीबी (विनम्रता) का समुद्र है। परोपकार का उत्साह (उमाहा) है। उसे कोई धंधा (सांसारिक उलझन) नहीं। उसने भटकते मन को बाँध लिया है। उसके साथ जो भी होता है, अच्छा ही होता है। उसका फल सदा सफल है।
“ब्रहम गिआनी संगि सगल उधारु”: ब्रह्मज्ञानी की संगत में सबका उद्धार होता है। “ब्रहम गिआनी जपै सगल संसारु”: सारा संसार ब्रह्मज्ञानी को जपता है (उसकी महिमा गाता है)।
पउड़ी 5
ब्रह्मज्ञानी का एक ही रंग है (एकाग्र, एकरस)। प्रभु उसके संग बसता है। नाम ही उसका आधार है। नाम ही उसका परिवार है। वो सदा जागृत है। अहंकार-बुद्धि का त्याग कर चुका है। उसके मन में परमानंद है। उसके घर में सदा आनंद है। वो सुख-सहज में बसता है। उसका कभी विनाश नहीं होता।
“ब्रहम गिआनी कै नामु परवारु”: नाम ही उसका परिवार है। ये बड़ी गहरी बात है। इसका मतलब ये नहीं कि उसने सांसारिक परिवार छोड़ दिया। मतलब यह है कि उसकी गहरी पहचान और गहरा रिश्ता नाम से है। बाक़ी रिश्ते भी हैं, लेकिन जड़ नाम है।
पउड़ी 6
ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म का जानने वाला (बेता) है। एक (ईश्वर) से ही उसका प्रेम (हेता) है। वो अचिंत (चिंता-रहित) है। उसका मंत्र निर्मल है। उसे प्रभु ख़ुद बनाता है। उसका बड़ा प्रताप है। उसका दर्शन बड़भागी (बड़े भाग्यशाली) को मिलता है। उस पर बलिहारी जाना चाहिए।
“ब्रहम गिआनी कउ खोजहि महेसुर”: शिव (महेसुर) भी ब्रह्मज्ञानी को खोजते हैं। “नानक ब्रहम गिआनी आपि परमेसुर”: नानक कहते हैं, ब्रह्मज्ञानी ख़ुद परमेश्वर है। ये गहरा वक्तव्य है: ब्रह्मज्ञानी और परमेश्वर में कोई भेद नहीं। जो ब्रह्म को जान लेता है, वो ब्रह्म ही हो जाता है।
पउड़ी 7
ब्रह्मज्ञानी की कीमत लगाई नहीं जा सकती। सबके मन में वो बसता है। उसका भेद कौन जाने? उसे सदा नमस्कार (अदेसु) है। उसका आधा अक्षर भी बयान नहीं हो सकता। वो सबका ठाकुर (मालिक) है। उसकी मिति (सीमा) कौन बखाने? ब्रह्मज्ञानी की गति (अवस्था) सिर्फ़ ब्रह्मज्ञानी जानता है। उसका अंत नहीं, पार नहीं।
“ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै”: ये बड़ी ज़रूरी बात है। गुरु जी कह रहे हैं: बाहर से देखकर, शास्त्र पढ़कर, तर्क लगाकर ब्रह्मज्ञानी को नहीं समझा जा सकता। उसे सिर्फ़ वही समझ सकता है जो ख़ुद उस अवस्था में हो। ये अनुभव की बात है, बुद्धि की नहीं।
पउड़ी 8
आठवीं अष्टपदी का समापन, और ये सुखमनी साहिब के ऊँचे शिखरों में से है। ब्रह्मज्ञानी सारी सृष्टि का कर्ता है। वो सदा जीवित है, कभी मरता नहीं। वो मुक्ति और जीवन-विधि (जुगति) का दाता है। वो पूर्ण पुरुष, विधाता है। अनाथों का नाथ है। सब पर उसका हाथ (रक्षा) है। सारा आकार (दृश्य जगत) उसका है। और वो ख़ुद निराकार है।
“ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी”: ब्रह्मज्ञानी की शोभा ख़ुद ब्रह्मज्ञानी को ही शोभती है, दूसरा उसका वर्णन नहीं कर सकता। “नानक ब्रहम गिआनी सबल का धनी”: ब्रह्मज्ञानी सबका मालिक (धनी) है।
ये अष्टपदी इसलिए इतनी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये मनुष्य की ऊँची संभावना का चित्र खींचती है। गुरु जी कह रहे हैं कि इंसान के लिए ये मुमकिन है कि वो ब्रह्म को इतनी गहराई से जान ले कि ब्रह्म और वो एक हो जाएँ। ये दूर का सपना सुनाई दे सकता है, मगर गुरु की कृपा से संभव है।
अष्टपदी 9

श्लोक
निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥ नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥1॥
पउड़ी 1
गुरु जी इंद्रियों को एक-एक करके लेते हैं और बताते हैं कि सच्चे सेवक की इंद्रियाँ कैसे काम करती हैं:
जीभ (रसना) झूठ नहीं बोलती। मन में निरंजन (निर्मल ईश्वर) के दर्शन की प्रीत है। आँखें (नेत्र) पराई स्त्री/पुरुष का रूप नहीं देखतीं। संतों की सेवा और सत्संग से प्रेम है। कान किसी की निंदा नहीं सुनते। सबसे अपने आप को कमतर (मंदा) जानता है। गुरु की कृपा से विषय-विकार छोड़ देता है। मन की वासना मन से ही टरती (हटती) है।
“इंद्री जित पंच दोख ते रहत”: इंद्रियों को जीत लिया, पाँच दोषों से मुक्त है। “नानक कोटि मधे को ऐसा अपरसु”: करोड़ों में कोई एक ऐसा अपरस (विकारों से अछूता) होता है।
पउड़ी 2
“बैसनो” (वैष्णव, भक्त) वो है जिस पर ईश्वर प्रसन्न है और जो माया से अलग है। “करम करत होवै निहकरम”: कर्म करते हुए भी निष्कर्म है। ये गीता का भी केंद्रीय विचार है: काम करो, लेकिन फल की चिंता मत करो। गुरु जी इसे अपने शब्दों में कहते हैं।
“काहू फल की इछा नही बाछै”: किसी फल की इच्छा नहीं रखता। “केवल भगति कीरतन संगि राचै”: केवल भक्ति और कीर्तन में रचा रहता है। “आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै”: ख़ुद जपता है और दूसरों को भी जपवाता है। सच्चा भक्त सिर्फ़ अपने लिए नहीं जपता, वो दूसरों को भी जोड़ता है।
पउड़ी 3
“भगउती” (भगवती, देवी का उपासक, या यहाँ शक्ति-भक्त) वो है जिसमें भगवंत की भक्ति का रंग चढ़ा है। दुष्टों की संगत छोड़ दी है। मन से सारा भ्रम मिट गया है। सारे पारब्रह्म की पूजा करता है (किसी एक देवता की नहीं, सबमें एक को देखता है)।
साधसंगत में पापों का मैल धोता है। भगवंत की टहल (सेवा) नित्य-नियम से करता है। मन-तन अर्पित कर देता है। हरि के चरण हृदय में बसाता है। ऐसा भक्त भगवंत को पाता है।
पउड़ी 4
अब गुरु जी “पंडित” (विद्वान) की परिभाषा बदलते हैं। असली पंडित वो नहीं जिसने बहुत किताबें पढ़ी हैं। असली पंडित वो है जो मन को परबोधे (जगाए, समझाए)। जो राम नाम को अपनी आत्मा में खोजे। जो नाम-रस पीए। जिसके उपदेश से जगत जीवित हो। जो हरि की कथा हृदय में बसाए। जो फिर जन्म-मरण के चक्र में न आए।
“सूखम मह जानै असथूलु”: सूक्ष्म में स्थूल को जाने, यानी छोटी-से-छोटी चीज़ में उस विशाल सत्य को देखे। “चहु वरना कउ दे उपदेसु”: चारों वर्णों को उपदेश दे, यानी भेदभाव न करे, सबको सिखाए।
पउड़ी 5
“बीज मंत्रु सरब को गिआनु”: बीज-मंत्र (मूल मंत्र) सबका ज्ञान है, सबके लिए उपलब्ध है। “चहु वरना मह जपै कोऊ नामु”: चारों वर्णों में से कोई भी नाम जप सकता है। ये बड़ी महत्वपूर्ण बात है।सबका है।
“पसु प्रेत मुगध पाथर कउ तारै”: पशु, प्रेत, मूर्ख, पत्थर तक को तार देता है। “सबल रोग का अउखदु नामु”: सारे रोगों की औषधि नाम है। “काहू जुगति किते न पाईऐ धरमि”: किसी युक्ति (तरीक़े) या किसी धर्म (कर्मकांड) से नहीं पाया जाता। “नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि”: जिसकी तक़दीर में शुरू से (धुर से) लिखा है, उसे मिलता है।
पउड़ी 6
जिसके मन में पारब्रह्म का निवास है, उसका सच्चा नाम “रामदास” (राम का दास) है। उसने आत्मा-राम को देख लिया है। दास-
दसांतण (दासों के दास) के भाव से उसने पाया है। वो सदा हरि को पास जानता है। वो दरगाह (ईश्वर के दरबार) में मान्य है।
“सगल संगि आतम उदासु”: सबके संग (साथ) रहते हुए भी आत्मा से उदास (विरक्त, अनासक्त) है। ये बड़ी बारीक बात है। उदासी का मतलब दुखी होना नहीं, उदासी का मतलब है लिपटना नहीं। वो सबके साथ है, हँसता है, काम करता है, लेकिन अंदर से चिपकता नहीं।
पउड़ी 7
ये पउड़ी “जीवन मुक्त” (जीते-जी मुक्त) इंसान का वर्णन करती है। “प्रभ की आगिआ आतम हितावै”: प्रभु की आज्ञा को आत्मा का हित (भला) मानता है। वैसा ही हर्ष, वैसा ही शोक (यानी दोनों बराबर)। सदा आनंद, कभी वियोग नहीं। सोना और मिट्टी बराबर। अमृत और ज़हर बराबर। मान और अपमान बराबर। रंक (ग़रीब) और राजा बराबर।
ये “बराबर” होना दरअसल एक गहरी होशियारी की निशानी है। इंसान तब सब कुछ बराबर देखता है जब उसे पता चल जाता है कि सब कुछ एक ही स्रोत से । सोना भी उसी का, मिट्टी भी उसी की। सुख भी उसी का, दुख भी उसी का। तो फ़र्क़ क्या?
“जो वरताए साई जुगति”: जो (ईश्वर) करवाए, वही जीवन-विधि। “नानक ओहु पुरखु कहीऐ जीवन मुकति”: ऐसा पुरुष जीवन-मुक्त कहलाता है।
पउड़ी 8
नवीं अष्टपदी का समापन। पारब्रह्म के सारे स्थान हैं (वो हर जगह है)। जिस-जिस घर (शरीर, जीव) में जैसा रखे, वैसा उसका नाम (स्वभाव) है। वो ख़ुद करने और करवाने योग्य है। जो प्रभु को भाए, वही होंगे। वो अनंत तरंगों में फैला हुआ है। उसके रंग (लीलाएँ) लाखों में भी नहीं देखे जा सकते।
“जैसी मति दे तैसा परगास”: जैसी बुद्धि देता है, वैसा प्रकाश (समझ) होता है। “सदा सदा सदा दइआल”: सदा, सदा, सदा दयालु है। “सदा” तीन बार, जैसे पहली अष्टपदी में “सिमरउ” तीन बार। गुरु जी जब कोई बात तीन बार कहें, तो वो हृदय में गहरी उतारनी है।
अष्टपदी 10

श्लोक
नानक रचना प्रभि रची बहु बिधि अनिक प्रकार ॥1॥
पउड़ी 1
“कई कोटि” (करोड़ों) की लय शुरू होती है। करोड़ों पूजारी हैं। करोड़ों आचार-व्यवहार वाले हैं। करोड़ों तीर्थवासी हैं। करोड़ों वन में भ्रमण करने वाले संन्यासी हैं। करोड़ों वेद के श्रोता हैं। करोड़ों तपस्वी हैं। करोड़ों आत्म-ध्यान धारते हैं। करोड़ों कवि काव्य-विचार करते हैं। करोड़ों नित-नये नाम ध्याते हैं।
“नानक करते का अंतु न पावहि”: लेकिन नानक कहते हैं, कर्ता (ईश्वर) का अंत कोई नहीं पाता। इतने सारे लोग, इतने तरीक़ों से, इतनी साधना करते हैं, फिर भी वो अनंत रहता है। ये विनम्रता का पाठ है: आप कितना भी कर लो, वो आपसे बड़ा रहेगा।
पउड़ी 2
पहली पउड़ी में भक्तों की गिनती थी, अब विपरीत दिशा: करोड़ों अभिमानी हैं। करोड़ों अंधे अज्ञानी हैं। करोड़ों कृपण (कंजूस) और कठोर हैं। करोड़ों निर्दय हैं। करोड़ों पराया धन चुराते हैं। करोड़ों दूसरों को दुख देते हैं। करोड़ों माया के श्रम (मेहनत) में फँसे हैं। करोड़ों परदेश में भटकते हैं।
गुरु जी भेद नहीं कर रहे। वो कह रहे हैं: ये सब भी ईश्वर की रचना है। भक्त भी, पापी भी, सब उसी के बनाए हैं। “जितु जितु लावहु तितु तितु लगना”: जिधर लगाए, उधर लगते हैं। “नानक करते कि जानै करता रचना”: कर्ता की रचना कर्ता ही जानता है। हम न्याय करने की स्थिति में नहीं हैं।
पउड़ी 3
अब सृष्टि का विस्तार: करोड़ों सिद्ध, जती, योगी। करोड़ों राजा, रस-भोगी। करोड़ों पक्षी, सर्प। करोड़ों पत्थर, वृक्ष। करोड़ों वायु, जल, अग्नि। करोड़ों देश, भू-मंडल। करोड़ों चंद्रमा, सूर्य, नक्षत्र। करोड़ों देव, दानव, इंद्र।
ये गुरबाणी की cosmic vision है। 1602 में, जब यूरोप में गैलिलियो अभी दूरबीन बना रहा था, गुरु अर्जन देव जी “कई कोटि ससीअर सूर नखत्र” (करोड़ों चंद्रमा, सूर्य, तारे) कह रहे थे।
“सगल समगरी अपने सूति धारै”: सारी सामग्री अपने सूत (धागे) में धारण किए हुए है। ये वही माला-मोती वाला रूपक है जो चौथी अष्टपदी में आया था। एक धागा, करोड़ों मोती।
पउड़ी 4
करोड़ों राजस, तामस, सात्विक गुण। करोड़ों वेद, पुराण, स्मृति, शास्त्र। करोड़ों रत्न-समुद्र। करोड़ों प्रकार के जंतु। करोड़ों चिरंजीवी (बहुत लंबा जीने वाले)। करोड़ों पर्वत, मेरु, सुवर्णमय। करोड़ों यक्षकिन्नर, पिशाच। करोड़ों भूत, प्रेत, सूकर (सुअर), म्रिगाच (शिकारी जानवर)।
“सभ ते नेरै सभहू ते दूरि”: सबसे पास, सबसे दूर। “नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि”: ख़ुद अलिप्त (निर्लेप) रहता हुआ भरपूर (सर्वव्यापक) है। ये विरोधाभास है: वो हर चीज़ में भरा है लेकिन किसी चीज़ से लिपटा नहीं। जैसे आकाश हर जगह है लेकिन किसी चीज़ से चिपकता नहीं।
पउड़ी 5
करोड़ों पाताल (निचले लोकों) के निवासी। करोड़ों नरक-स्वर्ग के निवासी। करोड़ों जन्मते, जीते, मरते हैं। करोड़ों योनियों में घूमते हैं। करोड़ों बैठे-बैठे खाते हैं (बिना मेहनत)। करोड़ों मेहनत करके थककर पाते हैं। करोड़ों धनवंत बनाए। करोड़ों माया में चिंतित हैं।
“जह जह भाणा तह तह राखे”: जहाँ-जहाँ चाहा, वहाँ-वहाँ रखा। “नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे”: सब कुछ प्रभु के हाथ में है। ये एक ही वाक्य पूरी दसवीं अष्टपदी का सार है।
पउड़ी 6
अब सकारात्मक दिशा: करोड़ों वैरागी हुए, जिनकी लिव राम नाम में लगी। करोड़ों प्रभु को खोजते हैं, आत्मा में ही पारब्रह्म को पाते हैं। करोड़ों दर्शन के प्यासे हैं, उन्हें अविनाशी प्रभु मिला। करोड़ों सत्संग माँगते हैं, उन पर पारब्रह्म का रंग चढ़ा।
“आतम मह पारब्रहमु लहंते”: आत्मा में ही पारब्रह्म को पाते हैं। बाहर नहीं, अंदर। ये बात बार-बार आती है। “नानक ते जन सदा धनि धनि”: ऐसे जन सदा धन्य-धन्य हैं।
पउड़ी 7
करोड़ों खाणी (जन्म के स्रोत: अंडज, जेरज, सेतज, उत्भुज) और खंड (भौगोलिक क्षेत्र)। करोड़ों आकाश और ब्रह्मांड। करोड़ों अवतार हुए। कई युक्तियों से विस्तार किया। कई बार पसारा (सृष्टि) फैलाया (ये Big Bang और Big Crunch जैसी बात है, सदियों पहले)। सदा-सदा एक ही एकंकार है।
“प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति”: प्रभु से उत्पन्न हुए, प्रभु में ही समा जाते हैं। जैसे लहरें समुद्र से उठती हैं और समुद्र में ही गिरती हैं। “ता का अंतु न जानै कोइ”: उसका अंत कोई नहीं जानता। “आपे आपि नानक प्रभु सोइ”: वो ख़ुद ही ख़ुद है।
पउड़ी 8
दसवीं अष्टपदी का समापन। करोड़ों पारब्रह्म के दास हैं, जिनकी आत्मा में प्रकाश है। करोड़ों तत्व के जानने वाले हैं, जो सदा एक ही को देखते हैं। करोड़ों नाम-रस पीते हैं, अमर हो गए, सदा-सदा जीते हैं। करोड़ों नाम-गुण गाते हैं, आत्म-रस में सुख-सहज समा जाते हैं।
“अपुने जन कउ सासि सासि समारे”: अपने जनों (भक्तों) को साँस-साँस याद रखता है। “नानक ओइ परमेसुर के पिआरे”: वो परमेश्वर के प्यारे हैं। ये आख़िरी पंक्ति तसल्ली देती है: करोड़ों की भीड़ में भी, ईश्वर अपने हर एक भक्त को साँस-साँस याद रखता है। आप भीड़ में गुम नहीं हैं।
अष्टपदी 11

श्लोक
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥1॥
पउड़ी 1
“करन करावन करनै जोगु”: करने वाला, करवाने वाला, और करने योग्य, सब वो ही है। “जो तिसु भावै सोई होगु”: जो उसे भाए, वही होंगे। ये सुखमनी साहिब का सबसे बुनियादी सिद्धांत है: हुकम।
“खिन मह थापि उथापनहारा”: पल भर में स्थापित करने और उखाड़ने वाला। “हुकमे धारि अधर रहावै”: हुकम से ही धरती को आधार (अधर) के बिना (अंतरिक्ष में) टिकाए रखता है। “हुकमे उपजै हुकमि समावै”: हुकम से उत्पन्न, हुकम में ही समा जाता है। “हुकमे ऊच नीच बिउहार”: ऊँच-नीच का सारा व्यवहार भी हुकम से है।
“करि करि देखै अपनी वडिआई”: करके-करके (रचकर-रचकर) अपनी बड़ाई देखता है। ये बड़ा गहरा है: ईश्वर सृष्टि रचता है और फिर उसे देखकर प्रसन्न होता है, जैसे कोई कलाकार अपनी कृति देखकर।
पउड़ी 2
“प्रभ भावै” (अगर प्रभु को भाए) से हर पंक्ति शुरू होती है: प्रभु चाहे तो इंसान को मनुष्य-गति (ऊँची अवस्था) दे दे। प्रभु चाहे तो पत्थर भी तैरा दे। प्रभु चाहे तो बिना साँस के भी रखे। प्रभु चाहे तो हरि-गुण बोलवा दे। प्रभु चाहे तो पतित (गिरे हुए) का उद्धार कर दे।
“दुहा सिरिआ का आपि सुआमी”: दोनों छोरों (सृष्टि और प्रलय, जन्म और मृत्यु, सुख और दुख) का वो ख़ुद मालिक है। “खेलै बिगसै अंतरजामी”: खेलता है और प्रसन्न होता है, वो अंतर्यामी। “नानक द्रिसटी अवरु न आवै”: नानक की दृष्टि में दूसरा कोई नहीं आता।
पउड़ी 3
“कहु मानुख ते किआ होइ आवै”: कहो, इंसान से क्या हैं सकता है? ये सवाल कड़ा है। गुरु जी कह रहे हैं: इंसान अपने बल पर कुछ नहीं कर सकता।
“अनजानत बिखिआ मह रचै”: अनजाने में (बिना समझे) विषय-विकारों में रचा (फँसा) रहता है। “जे जानत आपन आप बचै”: अगर जान ले (सच्चाई पहचान ले), तो अपने आप बच जाए। ये बड़ी उम्मीद की बात है: ज्ञान ही मुक्ति है। “भरमे भूला दह दिसि धावै, निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै”: भ्रम में भटका हुआ दसों दिशाओं में दौड़ता है, पल भर में चारों कोनों में घूम आता है। मन की बेचैनी का इससे अच्छा वर्णन शायद ही कोई हो।
पउड़ी 4
“खिन मह नीच कीट कउ राज”: पल भर में नीच कीट (कीड़े) को राज दे दे। “पारब्रहम गरीब निवाज”: पारब्रह्म ग़रीबों को नवाज़ने वाला (इज़्ज़त देने वाला) है। “जा का द्रिसटि कछू न आवै, तिसु ततकाल दह दिसि प्रगटावै”: जिसकी दृष्टि में कुछ नहीं आता (जो बिल्कुल अदृश्य, अनजान है), उसे तत्काल दसों दिशाओं में प्रसिद्ध कर दे।
ये बात उन सब लोगों के लिए है जो सोचते हैं “मैं कुछ नहीं हूँ, मेरी कोई क़ीमत नहीं।” गुरु जी कहते हैं: ईश्वर चाहे तो एक पल में आपको कीड़े से राजा बना सकता है। आपकी हैसियत आप नहीं तय करते, वो तय करता है।
पउड़ी 5
“इस का बलु नाही इसु हाथ”: इसका (जीव का) बल नहीं, इसके हाथ में (कुछ) नहीं। ये कठोर सत्य है। “आगिआकारी बपुरा जीउ”: बेचारा जीव आज्ञाकारी (ईश्वर की आज्ञा का पालक) है। “बपुरा” (बेचारा) शब्द में करुणा है, गुरु जी जीव पर दया कर रहे हैं।
कभी ऊँचे में, कभी नीचे में बसता है। कभी शोक, कभी हर्ष। कभी निंदा-चिंता के व्यवहार। कभी ऊपर आकाश, कभी पाताल। कभी ब्रह्म-विचार का ज्ञाता। ये ज़िंदगी का चित्र है: ऊपर-नीचे, ख़ुशी-ग़म, ज्ञान-अज्ञान, सब बदलता रहता है। “नानक आपि मिलावणहार”: मिलाने वाला वो ख़ुद है।
पउड़ी 6
कभी नृत्य (नाच-गाना) करता है। कभी दिन-रात सोता रहता है। कभी भयंकर क्रोध में। कभी सबके चरणों की धूल। कभी बड़ा राजा बनता है। कभी नीच भिखारी का रूप। कभी बदनामी में। कभी “भला-भला” कहलाता है।
“जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै”: जैसे प्रभु रखे, वैसे ही रहता है। ये समर्पण है। ये “जिउ प्रभु राखै” स्वीकार करना कठिन काम है, क्योंकि इंसान का मन कहता है “मैं अपनी ज़िंदगी चला रहा हूँ।वो चला रहा है। आप सिर्फ़ कठपुतली नहीं हैं, लेकिन डोर उसके हाथ में है।
पउड़ी 7
कभी पंडित बनकर व्याख्या करता है। कभी मौनी (मौन-धारी) बनकर ध्यान लगाता है। कभी तीर्थ-स्नान। कभी सिद्ध-साधक के मुँह से ज्ञान। कभी कीड़ा, कभी हाथी, कभी पतंगा। अनेक योनियों में भ्रमता रहता है।
“नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै”: अनेक रूप, जैसे नाटक करने वाला (स्वांगी) दिखाता है। “जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै”: जैसे प्रभु को भाए, वैसे नचाता है। ये सृष्टि एक रंगमंच है, और ईश्वर निर्देशक है। हम सब अभिनेता हैं। भूमिकाएँ बदलती रहती हैं, लेकिन निर्देशक एक ही है।
पउड़ी 8
ग्यारहवीं अष्टपदी का समापन, और ये सुखमनी साहिब के सुंदर समापनों में से है।
“कबहू साधसंगति इहु पावै, उसु असथान ते बहुरि न आवै”: कभी (किसी जन्म में, किसी पल में) ये जीव साधसंगत पा लेता है। उस स्थान (अवस्था) से फिर कभी नहीं लौटता। “अंतरि होइ गिआन परगासु”: अंदर ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। “उसु असथान का नही बिनासु”: उस स्थान (अवस्था) का कभी विनाश नहीं होता।
“जिउ जल मह जलु आइ खटाना, तिउ जोती संगि जोति समाना”: जैसे पानी में पानी आकर मिल जाता है (फिर अलग नहीं किया जा सकता), वैसे ही ज्योति (आत्मा) ज्योति (परमात्मा) में समा जाती है। ये मिलन का सुंदर रूपक है। पानी पानी में मिलकर एक हो जाता है, कोई सीमा नहीं रहती, कोई भेद नहीं रहता।
“मिटि गए गवन पाए बिसराम”: भटकना मिट गया, विश्राम पाया। ये पूरी ग्यारहवीं अष्टपदी का सार है: जब तक हुकम नहीं समझा, भटकना है। जब हुकम समझ आया, विश्राम है।
अष्टपदी 12

श्लोक
बड़े बड़े अहंकारीआ नानक गरबि गले ॥1॥
पउड़ी 1
गुरु जी एक-एक करके अहंकार के रूप बताते हैं और उनका अंजाम:
जिसके अंदर राज (सत्ता) का अभिमान है, वो नरक का अधिकारी, कुत्ते (सुआनु) जैसा है। जो सोचे “मैं जवान हूँ (जोबनवंतु)”, वो विष्ठा (मल) का कीड़ा बनता है। जो अपने आप को कर्मवंत (कर्मों वाला, पुण्यात्मा) कहलाए, वो जन्म-मरण में भटकता है। जो धन-भूमि पर गुमान करे, वो मूर्ख, अंधा, अज्ञानी है।
ये कड़ी भाषा है। गुरु जी जानबूझकर तीखे शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि अहंकार एक ऐसी बीमारी है जो मीठी दवाई से ठीक नहीं होती। “करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै”: कृपा करके जिसके हृदय में गरीबी (विनम्रता) बसा दे, वो इधर भी मुक्त, उधर भी सुखी।
पउड़ी 2
“धनवंता होइ करि गरबावै, त्रिण समानि कछु संगि न जावै”: धनवान बनकर गर्व करता है, लेकिन तिनके (त्रिण) जितना भी साथ नहीं जाता। ये सीधी बात है: आप कितना भी कमा लो, मरने के बाद एक पैसा भी साथ नहीं जाएगा।
“बहु लसकर मानुख ऊपरि करे आस”: बड़ी-बड़ी फ़ौजें, इंसानों पर आस लगाता है। “पल भीतरि ता का होइ बिनास”: पल भर में सब नष्ट। “सभ ते आप जानै बलवंतु, खिन मह होइ जाइ भसमंतु”: ख़ुद को सबसे बलवान जानता है, पल भर में भस्म (राख) हो जाता है।
“गुर प्रसादि जा का मिटै अभिमानु, सो जनु नानक दरगह परवानु”: गुरु की कृपा से जिसका अभिमान मिटे, वो दरगाह में परवान (स्वीकार) है।
पउड़ी 3
“कोटि करम करै हउ धारे, स्रमु पावै सगले बिरथारे”: करोड़ों कर्म करे, लेकिन अगर “हउ” (अहंकार) धारे हुए है, तो सारी मेहनत बेकार है। ये बड़ी कड़वी दवाई है। इंसान सोचता है “मैंने इतना किया” और वो “मैंने” ही सारा काम बर्बाद कर देता है।
“आपस कउ जो भला कहावै, तिसहि भलाई निकटि न आवै”: जो अपने आप को भला कहलवाए, उसके पास भलाई आती ही नहीं। और इसके विपरीत: “सबल की रेन जा का मनु होइ, कहु नानक ता की निरमल सोइ”: जिसका मन सबके चरणों की धूल (रेन) बन जाए, उसकी शोभा (सोइ) निर्मल है। फल से लदा हुआ पेड़ झुक जाता है। खाली पेड़ अकड़ा खड़ा रहता है। जो इंसान गुणों से भरा है, वो झुका हुआ दिखता है। जो खाली है, वो अकड़ दिखाता है। गुरु जी कहते हैं: झुकना भरे होने की निशानी है।
पउड़ी 4
ये पउड़ी “जब लगु” (जब तक) की लय पर चलती है, हर पंक्ति एक शर्त बताती है:
जब तक जाने “मुझसे कुछ होता है”, तब तक सुख नहीं। जब तक जाने “मैं कुछ करता हूँ”, तब तक गर्भ-योनि में घूमता रहता है। जब तक किसी को बैरी और किसी को मित्र माने, तब तक चित्त अस्थिर है। जब तक माया के मोह में मग्न है, तब तक धर्मराज सज़ा देता है।
“प्रभ किरपा ते बंधन तूटै, गुर प्रसादि नानक हउ छूटै”: प्रभु की कृपा से बंधन टूटते हैं, गुरु की कृपा से “हउ” (मैं-पन, अहंकार) छूटता है। बंधन प्रभु की कृपा से टूटते हैं, अहंकार गुरु की कृपा से। गुरु का काम विशेष रूप से अहंकार तोड़ना है।
पउड़ी 5
“सहस खटे लख कउ उठि धावै”: हज़ार कमाए तो लाख के लिए दौड़ पड़ता है। “त्रिपति न आवै”: तृप्ति नहीं आती। ये आज की consumer culture का बिल्कुल सटीक वर्णन है, चार सौ साल पहले लिखा हुआ। नया फ़ोन लिया, तो अगले मॉडल की इच्छा। बड़ा घर लिया, तो और बड़े का सपना।
“बिना संतोख नही कोऊ राजै”: बिना संतोष के कोई राज़ी (संतुष्ट) नहीं। “सुपन मनोरथ ब्रिंथे सभ काजै”: सपने जैसी इच्छाओं में सारे काम व्यर्थ चले जाते हैं।
“नाम रंगि सभु सुखु होइ, बडभागी किसै परापति होइ”: नाम के रंग में सारा सुख है, लेकिन ये बड़भागी (बड़े भाग्यशाली) को ही प्राप्त होता है।
पउड़ी 6
“करन करावन करनैहारु, इस कै हाथि कहा बीचारु”: करने वाला, करवाने वाला वो ख़ुद है, इसके (जीव के) हाथ में कौन-सा विचार (क्या अधिकार) है? “सभ ते दूरि सभहू कै संगि”: सबसे दूर, सबके संग। ये विरोधाभास बार-बार आता है और हर बार नई गहराई देता है।
“आपहि एक आपहि अनेक”: वो ख़ुद एक है, ख़ुद ही अनेक है। “मरै न बिनसै आवै न जाइ”: न मरता, न नष्ट होता, न आता, न जाता। “नानक सद ही रहिआ समाइ”: सदा ही समाया हुआ है।
पउड़ी 7
ये पउड़ी अद्वैत (non-duality) का शिखर है: वो ख़ुद उपदेश देता है, ख़ुद समझता है। ख़ुद सबके साथ रचा है। ख़ुद ही अपना विस्तार किया। सब कुछ उसका, वो ही करने वाला। उससे अलग (भिंन) कुछ हो ही नहीं सकता। हर जगह वही एक।
“कउतक करै रंग आपार”: अपार (असीम) रंगों के कौतुक (तमाशे, खेल) करता है। “मन मह आपि मन अपुने माहि”: मन में वो है, और मन उसमें है। “नानक कीमति कहनु न जाइ”: कीमत बताई नहीं जा सकती।
पउड़ी 8
बारहवीं अष्टपदी का समापन एक स्तुति से होता है, और हर पंक्ति में एक शब्द तीन बार दोहराया गया है:
“सति सति सति” (सत्य, सत्य, सत्य)। “सचु सचु सचु” (सच, सच, सच)। “भला भला भला” (अच्छा, अच्छा, अच्छा)। “निरमल निरमल निरमल” (शुद्ध, शुद्ध, शुद्ध)। “पवित्र पवित्र पवित्र” (पवित्र, पवित्र, पवित्र)।
ये तीन-बार का दोहराव पहली पउड़ी के “सिमरउ सिमरि सिमरि” की याद दिलाता है। जब गुरु जी किसी बात को तीन बार कहें, वो बात हृदय में उतारनी है। “कोटि मधे किनै बिरलै चीना”: करोड़ों में किसी विरले ने ही पहचाना। ये अष्टपदी अहंकार के विनाश से शुरू हुई और ईश्वर की स्तुति पर समाप्त हुई, क्योंकि जहाँ अहंकार मिटता है, वहाँ स्तुति प्रकट होती है।
अष्टपदी 13
श्लोक
संत की निंदा नानकहा बहुरि बहुरि अवतार ॥1॥
पउड़ी 1
“संत कै दूखनि” (संत को दुख देने से) की लय से हर पंक्ति शुरू होती है: आयु घटती है। यम से छुटकारा नहीं। सारा सुख चला जाता है। नरक में पड़ता है। बुद्धि मलिन (गंदी) हो जाती है। शोभा से हीन हो जाता है। संत को मारने वाले को कोई नहीं बचाता। स्थान भ्रष्ट हो जाता है।
लेकिन अंत में एक उम्मीद की किरण: “संत क्रिपाल क्रिपा जे करै, नानक संतसंगि निंदकु भी तरै”: अगर कृपालु संत कृपा करे, तो संत-संगत में निंदक भी तर जाता है। संत की कृपा इतनी विशाल है कि वो अपने निंदक को भी तार सकती है।
पउड़ी 2
संत की निंदा के और परिणाम: मुँह फिर जाता है (बदनामी)। कौवे जैसा बोलने लगता है (कर्कश, अशुभ)। सर्प-योनि पाता है। कीड़े-मकोड़ों की योनि मिलती है। तृष्णा में जलता है। सबको छलता है। तेज (ओज, प्रभाव) सब चला जाता है। नीच से नीच हो जाता है। संत-द्रोही को कोई स्थान नहीं।
फिर वही उम्मीद: “नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि”: अगर संत को भाए (संत चाहें), तो वो भी गति (मुक्ति) पा सकते हैं। गुरु जी बार-बार ये दरवाज़ा खुला रख रहे हैं: चाहे कितना भी पतन हो, संत की कृपा से उद्धार संभव है।
पउड़ी 3
संत का निंदक महा अत्याचारी है। उसे पल-भर भी टिकने की जगह नहीं मिलती। वो महा हत्यारा है (क्योंकि निंदा एक तरह की हत्या है, किसी की इज़्ज़त और भावना की हत्या)। परमेश्वर ने ख़ुद उसे मारा है। वो राज से हीन, दुखी और दीन है। उसे सारे रोग लगते हैं, सदा वियोग (बिछड़ना) रहता है। संत की निंदा सारे दोषों में गंभीर दोष है। लेकिन फिर वही दरवाज़ा: “नानक संत भावै तउ उस कउ भी मोखु”, अगर संत चाहे, तो उसे भी मोक्ष मिल सकता है।
पउड़ी 4
संत का दोषी सदा अपवित्र है। किसी का मित्र नहीं। सबकी डाँट (डानु) खाता है। सब उसे त्याग देते हैं। वो महा अहंकारी है, सदा विकारी है। जन्मता-मरता रहता है। संत को दुख देने से सुख से दूर हो जाता है। उसे कोई ठिकाना नहीं। लेकिन अगर संत चाहे, तो मिला ले।
गुरु जी “निंदक” और “दोखी” दोनों शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। “निंदक” वो जो पीठ पीछे बुराई करे, “दोखी” वो जो सामने दुश्मनी करे। दोनों का अंजाम एक है।
पउड़ी 5
“अध बीच ते टूटै”: बीच रास्ते से टूट जाता है (कोई काम पूरा नहीं होता)। किसी काम में नहीं पहुँचता (सफल नहीं होता)। जंगलों (उदिआन) में भटकाया जाता है। उलटे रास्ते (उझड़ि) पर डाल दिया जाता है। “अंतर ते थोथा, जिउ सास बिना मिरतक कि लोथा”: अंदर से खोखला है, जैसे बिना साँस के मुर्दे का शव। ये उपमा बहुत कड़ी है: निंदक ज़िंदा दिखता है, लेकिन अंदर से मुर्दा है।
“आपन बीजि आपे ही खाहि”: अपना बोया हुआ ख़ुद ही खाता है। ये कर्म-सिद्धांत है: जो बोओगे, वो काटोगे।
पउड़ी 6
ये पउड़ी तीन तीखी उपमाओं पर बनी है:
निंदक ऐसे तड़पता है “जिउ जल बिहून मछुली”, जैसे बिना पानी की मछली। भूखा रहता है, तृप्त नहीं होता, “जिउ पावकु ईधनि नही धरापै”, जैसे अग्नि कितना भी ईंधन डालो, भरती नहीं। अकेला छूटता है, “जिउ बूआड़ि तिलु खेत मह दुहेला”, जैसे खेत में तिल का पौधा अकेला (बिना साथी) दुखी खड़ा रहता है।
धर्म से दूर हो जाता है। सदा झूठ (मिथिआ) बोलता है। “किरतु निंदक कउ धुरि ही पइआ”: निंदक का ये कर्म (किरत) शुरू (धुर) से ही लिखा था। “जो तिसु भावै सोई थिआ”: जो ईश्वर को भाया, वही हुआ।
पउड़ी 7
निंदक का रूप बिगड़ जाता है (भीतर की कुरूपता बाहर आती है)। दरगाह में सज़ा मिलती है। सदा शक (सहकाईऐ, संदेह) में रहता है। न ठीक से मरता है, न ठीक से जीता (एक तरह की त्रिशंकु अवस्था)। उसकी आशा पूरी नहीं होती। निराश उठकर चला जाता है। संत-दोषी पर कोई भरोसा (त्रिसटै) नहीं करता।
“पइआ किरतु न मेटै कोइ”: लिखा हुआ कर्म कोई नहीं मिटाता। “नानक जानै सचा सोइ”: सच्चा (ईश्वर) ही जानता है। एक बात समझने लायक़ है: गुरु जी “संत” से किसी ख़ास इंसान का मतलब नहीं ले रहे। “संत” वो हर इंसान है जिसमें ईश्वर बसता है। और “निंदा” का दायरा गाली-गलौज से कहीं बड़ा है: इसमें पीठ पीछे बुराई करना, अच्छाई को नकारना, और रास्ते में अड़चन डालना भी आता है।
पउड़ी 8
सारे शरीर उसके हैं, वो ही करने वाला है। सदा उसे नमस्कार। दिन-रात उसकी स्तुति करो। साँस-ग्रास (साँस लेते, खाना खाते) उसे ध्याओ। सब कुछ उसका किया हुआ चल रहा है। जैसा करे, वैसा कोई बनता है। अपना खेल ख़ुद ही खेल रहा है, दूसरा कौन विचार करे? जिसे कृपा करे, उसे अपना नाम दे। ऐसे बड़भागी जन धन्य हैं।
अष्टपदी 14

श्लोक
एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु भउ जाइ ॥1॥
पउड़ी 1
“मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु”: इंसानों का सहारा (टेक) व्यर्थ (ब्रिथी) है, ये जान लो। “देवन का एकै भगवानु”: देने वाला सिर्फ़ एक भगवान है। ये बात सुनने में कड़ी लगती है, लेकिन गुरु जी ये नहीं कह रहे कि लोगों से रिश्ता मत रखो। कह रहे हैं कि अंतिम भरोसा, आख़िरी टेक, सिर्फ़ ईश्वर पर रखो।
“मारै राखै एको आपि, मानुख कै किछु नाही हाथि”: मारना और बचाना, दोनों उसी एक के हाथ में है। इंसान के हाथ में कुछ नहीं। “तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ”: उसका हुकम समझो, तो सुख होंगे।
“सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ”: तीन बार “सिमरि”, वही लय जो पहली पउड़ी में थी। पूरी सुखमनी साहिब एक वृत्त (circle) है, बार-बार उसी केंद्र पर लौटती है।
पउड़ी 2
ये पउड़ी इंद्रियों को “सही दिशा” देती है: मन में निरंकार की स्तुति करो। सत्य का व्यवहार करो। जीभ से अमृत पीओ (नाम जपो)। आँखों से ठाकुर का रंग देखो। पैरों से गोबिंद (ईश्वर) के मार्ग पर चलो। हाथों से हरि का कर्म करो। कानों से हरि कथा सुनो।
“हरि दरगह नानक ऊजल मथा”: हरि के दरबार में नानक का माथा उज्ज्वल (रोशन) होंगे। “ऊजल मथा” (रोशन माथा) बड़ा सुंदर प्रतीक है: पंजाबी में कहते हैं “माथा ऊँचा”, यानी इज़्ज़तदार। गुरु जी कहते हैं: अगर इंद्रियों का सही इस्तेमाल करो, तो ईश्वर के दरबार में माथा ऊँचा होंगे।
पउड़ी 3
जग में बड़भागी वो जन हैं जो सदा हरि के गुण गाएँ। राम नाम का विचार करने वाले ही असली धनवंत हैं। जो मन, तन, मुँह से हरि बोलें, वो सदा सुखी हैं। जो एक ही एक को पहचाने, वो इधर-उधर (इत-उत, इस लोक और उस लोक) दोनों की सोझी (समझ) जानता है।
“नाम संगि जिस कउ मनु मानिआ, नानक तिनहि निरंजनु जानिआ”: जिसका मन नाम के संग मान गया (राज़ी हो गया, टिक गया), उसने निरंजन (निर्मल ईश्वर) को जान लिया।
पउड़ी 4
गुरु की कृपा से अपना आप सूझता है, तृष्णा बुझती है। साधसंगत में हरि का यश कहने से सारे रोग छूट जाते हैं। “अनदिनु कीरतनु केवल बखिआनु, गृहसत मह सोई निरबानु”: दिन-रात कीर्तन और बखान (वर्णन) करता है, गृहस्थ (घर-बार) में रहते हुए ही निर्वाण (मुक्त) है।गृहस्थ में रहकर भी निर्वाण पाया जा सकता है।
“एक ऊपरि जिसु जन की आसा, तिस कि कटीऐ जम की फासा”: जो एक पर आशा रखे, उसकी जम (मृत्यु) की फाँसी कटती है।
पउड़ी 5
जिसे हरि प्रभु मन-चित्त में आ जाए, वो संत सुखी है, डोलता नहीं। जिस पर प्रभु कृपा करे, वो सेवक किससे डरे? “जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ”: जैसा है, वैसा ही दिखता है (भीतर-बाहर एक)। “सोधत सोधत सोधत सीझिआ”: खोजते-खोजते-खोजते सिद्ध हो गया। “सोधत” तीन बार कहा, जैसे “सिमरउ” तीन बार कहा था। खोज लगातार होनी चाहिए, एक बार से काम नहीं चलता।
“जब देखउ तब सभु किछु मूलु”: जब देखता हूँ तो सब कुछ मूल (ईश्वर) ही दिखता है। “नानक सो सूखमु सोई असथूलु”: वो सूक्ष्म भी है, वो ही स्थूल भी है। परमाणु में भी वही, पर्वत में भी वही।
पउड़ी 6
अपनी लीला ख़ुद खेल रहा है। आना-जाना, दिखना-अदिखना, सब उसका है। सारी सृष्टि उसकी आज्ञाकारी है। सबमें वो ही, अनेक युक्तियों से स्थापित और उखाड़ता रहता है। अविनाशी, कोई खंड (टुकड़ा, कमी) नहीं। ब्रह्मांड को धारण किए हुए है। अलख (अदृश्य), अभेव (रहस्यमय), पुरुष का प्रताप। “आपि जपाइ त नानक जाप”: वो ख़ुद जपवाए तभी नानक जप सकता है।
पउड़ी 7
जिन्होंने प्रभु को जाना, वो शोभावान हैं। उनके मंत्र से सारा संसार उधरता है। प्रभु के सेवक सबके उद्धारक हैं, दुख बिसारने वाले हैं। कृपालु ने ख़ुद मिला लिया। गुरु का शबद जपकर निहाल हुए। उनकी सेवा वही कर पाता है जिसे कृपा मिली (बड़भागा)। नाम जपते विश्राम पाते हैं। नानक कहते हैं, ऐसे पुरुष को उत्तम मानो।
पउड़ी 8
जो कुछ करता है, प्रभु के रंग (इच्छा) में करता है। सदा हरि के संग बसता है। “सहज सुभाइ होवै सो होइ”: सहज स्वभाव से जो होता है, होने दो। “करणैहारु पछाणै सोइ”: करने वाले (ईश्वर) को पहचानो।
“प्रभ का कीआ जन मीठ लगाना”: प्रभु का किया हुआ भक्त को मीठा लगता है। ये वो पंक्ति है जो चौबीसवीं अष्टपदी के शीर्षक (“आपका कीआ मीठा लागै”) में गूँजेगी। “जैसा सा तैसा द्रिसटाना”: जैसा है, वैसा ही दिखता है (कोई छिपाव नहीं)। “जिस ते उपजे तिसु माहि समाइ”: जिससे उपजा, उसी में समा जाता है। “नानक प्रभ जनु एको जानु”: नानक कहते हैं, प्रभु और भक्त को एक ही जानो।
अष्टपदी 15

श्लोक
जा कै सिमरनि उधरीऐ नानक तिसु बलिहार ॥1॥
पउड़ी 1
“टूटी गाढनहार गोपाल”: टूटी हुई चीज़ों को जोड़ने वाला (गाँठने वाला) गोपाल (ईश्वर) है। ये पहली पंक्ति ही बड़ी तसल्ली देती है। ज़िंदगी में बहुत कुछ टूटता है: रिश्ते, सेहत, उम्मीदें, भरोसा। गुरु जी कहते हैं कि जोड़ने वाला एक ही है। “सबल जीआ आपे प्रतिपाल”: सब जीवों का वो ख़ुद पालन करता है।
“सगल की चिंता जिसु मनि माहि, तिस ते बिरथा कोई नाहि”: जिसके मन में सबकी चिंता है, उससे कोई व्यर्थ (बेकार, अनदेखा) नहीं। हर इंसान, हर जीव, उसकी चिंता में शामिल है।
“आपन कीआ कछू न होइ, जे सउ प्रानी लोचै कोइ”: अपने किए कुछ नहीं होता, चाहे सौ बार प्राणी चाहे। “तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम”: उसके बिना आपके कुछ काम नहीं।
पउड़ी 2
गुरु जी चार तरह के गर्व को तोड़ते हैं: रूपवान हो तो मोह मत करो, प्रभु की ज्योति हर शरीर में सोहती (शोभती) है। धनवान हो तो गर्व किस बात का, सब कुछ उसी का दिया हुआ है। बड़ा वीर (सूरा) कहलाओ, प्रभु की कला (शक्ति) के बिना कहाँ दौड़ोगे? बड़ा दानी बनो, तो जानो कि असली देने वाला वो है, आप तो बस माध्यम हैं।
“जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु, नानक सो जनु सदा अरोगु”: गुरु की कृपा से जिसका “हउ रोगु” (अहंकार का रोग) टूटे, वो सदा निरोग (अरोगु) है। गुरु जी अहंकार को “रोग” कह रहे हैं। ये बीमारी है, और इसका इलाज गुरु के पास है।
पउड़ी 3
ये पउड़ी चार सुंदर उपमाओं पर बनी है:
जैसे मंदिर को खंभा (थंमनु) थामता है, वैसे गुरु का शबद मन को थामता (आधार देता) है। जैसे पत्थर नाव पर चढ़कर तैर जाता है (अकेला डूबता, लेकिन नाव पर तैरता है), वैसे प्राणी गुरु के चरणों में लगकर तर जाता है। जैसे अँधेरे में दीपक प्रकाश करता है, वैसे गुरु का दर्शन मन में प्रकाश करता है। जैसे महा जंगल (उदिआन) में रास्ता मिल जाए, वैसे साधू की संगत में ज्योति प्रकट होती है।
ये चारों उपमाएँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी से हैं: खंभा, नाव, दीपक, जंगल का रास्ता। गुरु जी जटिल आध्यात्मिक सत्य को बिल्कुल सरल चित्रों में समझाते हैं।
पउड़ी 4
“मन मूरख काहे बिललाईऐ”: हे मूर्ख मन, क्यों बिलखता है? तक़दीर में जो लिखा है, वो पाएँगे। दुख-सुख देने वाला प्रभु है, और सब छोड़कर उसी को याद कर। “कउन बसतु आई तेरै संगि”: कौन-सी चीज़ आपके साथ आई है (जन्म के वक़्त)? “लपटि रहिओ रसि लोभी पतंगि”: लोभी पतंगे की तरह रस में लिपटा है (जैसे पतंगा रोशनी पर जलता है)। राम नाम हृदय में जपो, इज़्ज़त से घर (ईश्वर के दरबार) जाएँगे।
पउड़ी 5
“जिसु वखर कउ लैनि आप आइआ”: जिस माल (वखर) को लेने आप (इस दुनिया में) आया है, वो राम नाम है, संतों के घर मिलता है। “तजि अभिमानु लेहु मन मोलि”: अभिमान छोड़, मन को “मोल” (दाम) दे, यानी गुरु को बेच दे। “लादि खेपु संतह संगि चालु”: खेप (माल) लादकर संतों के संग चलो। “इहु वापारु विरला वापारै”: ये व्यापार कोई विरला ही करता है। ये पूरी पउड़ी व्यापारिक भाषा में है: वखर, मोल, लादि, खेपु, वापारु। गुरु जी कहते हैं कि ज़िंदगी एक बाज़ार है, और सबसे अच्छा सौदा नाम है।
पउड़ी 6
संतों के चरण धो-धोकर पीओ। अपना प्राण संत को अर्पित करो। संत की धूल से स्नान करो। संत पर कुर्बान जाएँ। संत की सेवा बड़े भाग्य से मिलती है। साधसंगत में हरि कीर्तन गाओ। अनेक विघ्नों से संत रक्षा करते हैं। हरि गुण गाकर अमृत-रस चखो। संतों के दर में आ गिरे, सारे सुख पा लिए।
पउड़ी 7
मुर्दे को जिलाने वाला, भूखे को सहारा देने वाला। सब ख़ज़ाने जिसकी दृष्टि में हैं। पूर्व लिखा लहना (पाना) पाते हैं। सब कुछ उसका, वो ही करने योग्य, उसके बिना कुछ न हुआ, न होंगे। दिन-रात सदा जपो, ये सबसे ऊँची, निर्मल करनी है। कृपा करके जिसे नाम दिया, वो निर्मल हो गया।
पउड़ी 8
जिसके मन में गुरु की प्रतीति (विश्वास) है, उसे हरि प्रभु याद आता है। तीनों लोकों में “भगत-भगत” सुनाई देता है (सब उसे भक्त कहते हैं)। जिसके हृदय में एक ही (ईश्वर) बसे। सच्ची करनी, सच्ची रहत, हृदय में सत्य, मुँह से सत्य। सच्ची दृष्टि, सच्चा आकार, सत्य चल रहा है, सच्चा पसारा। “पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता, नानक सो जनु सचि समाता”: जिसने पारब्रह्म को सच मानकर जाना, वो सत्य में समा गया।
अष्टपदी 16
श्लोक
तिसहि बुझाइ नानका जिसु होवै सुप्रसंन ॥1॥
पउड़ी 1
“अबिनासी प्रभु मन मह राखु, मानुख की आप प्रीति तिआगु”: अविनाशी प्रभु को मन में रख, इंसानों से प्रीत (लगाव) त्याग दे। ये चौदहवीं अष्टपदी का ही विस्तार है। “तिस ते परै नाही किछु कोइ”: उससे परे (बाहर) कुछ भी नहीं। “सबल निरंतरि एको सोइ”: सबके अंदर वही एक है।
“गहिर गंभीर गहीर सुजाना”: गहीर (गहरा), गंभीर (गंभीर), गहीर (और गहरा), सुजाना (बुद्धिमान)। ये शब्द एक के बाद एक गहराई बढ़ाते जाते हैं, जैसे समुद्र में उतरते जाएँ।
“साध आपके की चरनी पाउ, नानक कै मनि इहु अनराउ”: आपके साधू के चरणों में गिरूँ, नानक के मन में यही अनुराग (इच्छा) है।
पउड़ी 2
“मनसा पूरन”: मनोकामना पूर्ण करने वाला। “सरना जोग”: शरण देने योग्य। “हरन भरन जा कउ नेत्र फोर”: हरने (लेने) और भरने (देने) में जिसे पलक झपकने (नेत्र फोर) भर लगे।
“राज मह राज जोग मह जोगी, तप मह तपीसुर गृहसत मह भोगी”: राजाओं में राजा, योगियों में योगी, तपस्वियों में तपस्वी, और गृहस्थों में भोगी। वो हर रूप में श्रेष्ठ है। ये सुंदर पंक्ति है: ईश्वर मंदिर या जंगल तक सीमित नहीं रहता, वो राजमहल में भी राजा है और गृहस्थी में भी सबसे बड़ा भोगी है।
पउड़ी 3
जिसकी लीला की कोई सीमा नहीं, सारे देवता उसे नापने में थक-हारकर बैठ गए। पिता का जन्म पुत्र नहीं जानता (ईश्वर का मूल कोई नहीं जान सकता)। सारी रचना उसके सूत (धागे) में पिरोई है। जिसे सुमति, ज्ञान, ध्यान दिया, वो दास नाम ध्याते हैं। जिसे तीन गुणों में भटकाया, वो जन्मता-मरता, आता-जाता रहता है। ऊँचे-नीचे सब उसके स्थान हैं। जैसा जनवाए (दिखाए), वैसा नानक जानता है।
पउड़ी 4
अनेक रूप, अनेक रंग, अनेक भेष, लेकिन एक ही सार। अनेक विधियों से विस्तार, लेकिन प्रभु अविनाशी एकंकार। पल भर में अनेक लीलाएँ, पूर्ण रूप से हर जगह भरा। अनेक विधियों से बनावट बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। सब शरीर उसके, सब ठिकाने उसके। जप-जपकर जीता है नानक, हरि नाम।
पउड़ी 5
ये “नाम के धारे” पउड़ी पूरी सृष्टि को नाम पर टिका हुआ दिखाती है: जंतु, खंड-ब्रह्मांड, स्मृति-वेद-पुराण, सुनना-ज्ञान-ध्यान, आकाश-पाताल, सारे आकार, सारी पुरियाँ (लोक) और भवन, सब नाम के सहारे। कानों से सुनकर नाम के संग उद्धार। कृपा करके जिसे नाम में लगाए, वो चौथे पद (तुरीयावस्था, सत्-रज-तम से परे) में गति पाता है।
पउड़ी 6
“सति” (सत्य) की लय: रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य पुरुष सबमें समाया। सत्य करनी निर्मल। जिसे समझाए, उसे सब भली (अच्छी) लगे। सत्य नाम प्रभु का सुखदायी। विश्वास सत्य, नानक गुरु से पाई।
पउड़ी 7
संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में प्रवेश कर गया। सत्य-रीति समझे जो कोई, नाम जपने से उसकी गति हो। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। अपनी सीमा (मिति) और गति ख़ुद जानता है। जिसकी सृष्टि है, वही करने वाला, दूसरा विचार करने लायक़ नहीं। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती। जो उसे भाए, वो चलता है।
पउड़ी 8
विस्मय ही विस्मय, विस्मित हो गए। जिसने समझा, उसे स्वाद आया। प्रभु के रंग में रचे-बसे भक्त, गुरु के वचन से चार पदार्थ पाए। वो दाता हैं, दुख काटने वाले, उनकी संगत में संसार तरता है। भक्तों का सेवक बड़भागी है, उनकी संगत में एक (ईश्वर) की लिव (ध्यान) लगी। गोबिंद के गुण-कीर्तन गाता है, गुरु की कृपा से फल पाता है।
अष्टपदी 17
है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥1॥
पउड़ी 1
ये पउड़ी “सति” (सत्य) शब्द को हर पंक्ति में दोहराती है, एक विशिष्ट लय बनाते हुए:
चरण सत्य, उन्हें छूने वाला सत्य। पूजा सत्य, सेवादार सत्य। दर्शन सत्य, देखने वाला सत्य। नाम सत्य, ध्यान करने वाला सत्य। वो ख़ुद सत्य, सबको धारण करने वाला सत्य। शबद (वाणी) सत्य, बोलने वाला प्रभु सत्य। सुरति (चेतना) सत्य, यश सुनने वाला सत्य।
“बुझनहार कउ सति सभ होइ”: जो समझ ले, उसके लिए सब कुछ सत्य हो जाता है। ये गहरी बात है: जब तक नहीं समझा, सब मिथ्या (झूठा) दिखता है (जैसा पाँचवीं अष्टपदी में बताया)। जब समझ आ जाए, तो वही सब सत्य हो जाता है।
पउड़ी 2
जिसने सत्य-स्वरूप को हृदय में माना, उसने मूल (जड़, स्रोत) पहचान लिया। जिसके हृदय में प्रभु का विश्वास आया, उसके मन में तत्व-ज्ञान प्रकट हुआ। भय से निर्भय हो गया। जिससे उत्पन्न हुआ, उसी में समा गया।
“बसतु माहि ले बसतु गडाई, ता कउ भिंन न कहना जाई”: वस्तु (आत्मा) को वस्तु (परमात्मा) में गाड़ दिया (मिला दिया), अब उसे अलग कहा ही नहीं जा सकता। ये ग्यारहवीं अष्टपदी के “जल मह जल” (पानी में पानी) वाले रूपक जैसा ही है, लेकिन एक और कोण से।
पउड़ी 3
ठाकुर (मालिक) का सेवक आज्ञाकारी है, सदा पूजारी है। सेवक के मन में प्रतीति (विश्वास), उसकी रीति निर्मल। सेवक ठाकुर को संग (साथ) जानता है, नाम के रंग में रँगा है। प्रभु सेवक का पालन करता है, निरंकार रक्षा करता है। जिस पर दया करे, वो सेवक, नानक उसे साँस-साँस याद करता है।
पउड़ी 4
अपने भक्त का पर्दा (दोष) ढक लेता है। ज़रूर रक्षा करता है। बड़ाई और नाम जपवाता है। सेवक की पत (इज़्ज़त) ख़ुद रखता है। प्रभु के सेवक को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता, वो ऊँचे-से-ऊँचा है। जिसे प्रभु ने अपनी सेवा में लगाया, उसे दसों दिशाओं में प्रकट किया।
पउड़ी 5
“नीकी कीरी मह कल राखै, भसम करै लसकर कोटि लाखै”: छोटी-सी चींटी में शक्ति रखता है, और करोड़ों-लाखों की फ़ौज को भस्म कर देता है। ये ईश्वर की विचित्र शक्ति है: वो कमज़ोर को ताक़तवर और ताक़तवर को कमज़ोर बना सकता है। जिसकी साँस ख़ुद न निकाले, उसकी हाथ देकर रक्षा करता है। इंसान के उपाय व्यर्थ। मारने-बचाने वाला और कोई नहीं। “काहे सोच करहि रे प्रानी”: हे प्राणी, क्यों चिंता करता है?
पउड़ी 6
बार-बार-बार प्रभु को जपो। अमृत पीकर मन-तन तृप्त करो। नाम-रत्न जिसने गुरमुख से पाया, उसे कुछ और नहीं दिखता। नाम ही धन, नाम ही रूप-रंग, नाम ही सुख, हरि नाम का संग ही सब कुछ।
पउड़ी 7
जीभ से दिन-रात यश बोलो। प्रभु ने अपने जनों को ये दात दी है। आत्मा के चाव (उत्साह) से भक्ति करते हैं। प्रभु में समाए रहते हैं। आठ पहर प्रभु को पास (हजूरे) जानते हैं। नानक कहते हैं, ऐसे ही जन पूरे (सम्पूर्ण) हैं।
पउड़ी 8
हे मेरे मन, उन (संतों) का आसरा ले। मन-तन उन जनों को दे दे। जिस जन ने अपने प्रभु को पहचाना, वो सारी चीज़ों का दाता है। उसकी शरण में सारे सुख, उसके दर्शन से सारे पाप मिटते हैं। और सारी चतुराई छोड़कर उसकी सेवा में लगो। “आवनु जावनु न होवी आपका”: आपका आना-जाना (जन्म-मरण) नहीं रहेगा। “नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा”: ऐसे जन के सदा पैर पूजो।
अष्टपदी 18
श्लोक
तिस कै संगि सिखु उधरै नानक हरि गुन गाउ ॥1॥
पउड़ी 1
ये पउड़ी गुरु-सिख के रिश्ते का blueprint है:
सतगुरु सिख की प्रतिपाल (पालन-पोषण) करता है। सेवक पर सदा दयालु है। सिख की दुर्मति (बुरी बुद्धि) का मैल हरता (धोता) है। गुरु के वचनों से हरि नाम उच्चारण होता है। सतगुरु सिख के बंधन काटता है। गुरु का सिख विकारों से हटता (दूर होता) है। सतगुरु सिख को नाम-धन देता है। गुरु का सिख बड़भागी है।
“सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै”: सतगुरु सिख का इहलोक (हलतु) और परलोक (पलतु) दोनों सँवारता है। “जीअ नालि समारै”: जीव के साथ (नालि) याद रखता है, यानी कभी नहीं भूलता।
पउड़ी 2
“गुर कै गृहि सेवकु जो रहै”: जो सेवक गुरु के घर (संगत, शरण) में रहे। “गुर की आगिआ मन मह सहै”: गुरु की आज्ञा मन में सहे (स्वीकार करे, धारण करे)। “आपस कउ करि कछु न जनावै”: अपने बारे में कुछ नहीं जताए (दिखावा न करे)।
“मनु बेचै सतिगुर कै पासि”: मन को बेच दे सतगुरु के पास। ये “बेचना” बड़ा तीखा शब्द है। जैसे कोई दुकान पर सामान बेचता है तो फिर उसका मालिक नहीं रहता, वैसे ही मन गुरु को दे दो, अब आपका नहीं रहा, गुरु का है। “तिसु सेवक के कारज रासि”: ऐसे सेवक के सारे काम रास (पूरे) होते हैं।
“सेवा करत होइ निहकामी”: सेवा करते हुए निष्काम (बिना इच्छा के) हो। “तिस कउ होत प्रापति सुआमी”: उसे स्वामी (ईश्वर) की प्राप्ति होती है।
पउड़ी 3
“बीस बिसवे गुर का मनु मानै”: बीस बिसवे (सौ प्रतिशत, पूरी तरह) गुरु का मन माने (गुरु पर पूरा भरोसा हो)। “सो सेवकु परमेसुर की गति जानै”: वो सेवक परमेश्वर की गति (अवस्था) जानता है।
“ब्रहम मह जनु जन मह पारब्रहमु”: ब्रह्म में जन (भक्त) है, जन में पारब्रह्म है। “एकहि आपि नही कछु भरमु”: एक ही है, कोई भ्रम नहीं। ये अद्वैत (non-duality) का फिर से दोहराव: गुरु, सिख, और ईश्वर, तीनों अलग नहीं हैं।
“सहस सिआणप लइआ न जाईऐ”: हज़ार चतुराइयों से (गुरु) पाया नहीं जा सकता। “नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ”: ऐसा गुरु बड़े भाग्य से मिलता है।
पउड़ी 4
सफल दर्शन, देखते ही पवित्र। चरण छूने से गति और निर्मल रीति। संग बैठने से राम गुण रचने लगते हैं। पारब्रह्म की दरगाह में पहुँचते हैं। वचन सुनकर कान तृप्त, मन में संतोष, आत्मा प्रतीत (संतुष्ट)। पूरे गुरु का मंत्र अटल, अमृत-दृष्टि से देखकर संत बना देता है। गुण अनंत, कीमत नहीं लगती। जिसे भाए, उसे मिला ले।
पउड़ी 5
एक जीभ, स्तुति अनेक। सत्य पुरुष, पूर्ण विवेक। कोई बोल प्राणी की पहुँच नहीं। अगम, अगोचर, निर्वाण-स्वरूप प्रभु। निर्आहार (बिना भोजन), निर्वैर (बिना वैर), सुखदायी। उसकी कीमत किसी ने नहीं पाई।
पउड़ी 6
ये हरि-रस कोई विरला पाता है। अमृत पीता है, अमर हो जाता है। ऐसे पुरुष का कभी विनाश नहीं, जिसके मन में गुणों का ख़ज़ाना (गुनतास) प्रकट हो। आठ पहर हरि नाम ले, सच्चा उपदेश सेवक को दे। “अंधकार दीपक प्रगासे”: अँधेरे में दीपक जल गया। “नानक भ्रम मोह दुख तह ते नासे”: भ्रम, मोह, दुख वहाँ से नष्ट।
पउड़ी 7
तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे। जन्म-मरण की चिंता मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिस पर कृपा धारी, साधसंगत में मुरारी का नाम जपा। स्थिति (ठहराव) पाई, भ्रम और भटकना बंद। कानों से हरि-हरि यश सुनो।
पउड़ी 8
निर्गुण ख़ुद, सगुण भी वही। कला धारण करके सारी सृष्टि को मोह लिया। अपनी लीला ख़ुद बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। हरि के बिना दूसरा कोई नहीं, सबके अंदर वही एक। ओत-पोत (ताने-बाने) में, सारे रूप-रंगों में व्याप्त। प्रकाश साधू की संगत में हुआ। रचना रचकर अपनी शक्ति धारी, अनेक बार नानक बलिहारी।
अष्टपदी 19

श्लोक
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥1॥
गुरु जी सीधे निर्देश देते हैं: संत जनों से मिलकर विचार करो। एक (ईश्वर) को सिमरो, नाम का आधार रखो। बाक़ी सारे उपाय और मित्रों को बिसारो। चरण-कमल हृदय में धारो। नाम हरि की “वथु” (वस्तु, सामान) है, उसे दृढ़ता से पकड़ो। ये धन इकट्ठा करो, भगवंत बनो। ये संत जनों का निर्मल मंत्र है। एक ही आशा मन में रखो, सारे रोग मिट जाएँगे।
“इहु धनु संचहु होवहु भगवंत”: ये धन जमा करो और भगवंत (भगवान वाले, ईश्वर से जुड़े) बनो। “संचहु” (जमा करो) शब्द ध्यान देने लायक़ है। गुरु जी धन-संचय की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन धन नाम है।
पउड़ी 2
जिस धन के लिए चारों कोनों में दौड़ते हैं, वो हरि की सेवा से मिलता है। जिस सुख को रोज़ चाहते हैं मित्रो, वो साधसंगत में प्रीति से मिलता है। जिस शोभा के लिए अच्छे काम करते हैं, वो हरि की शरण में मिलती है। अनगिनत उपायों से रोग नहीं जाता, हरि की औषधि लगाओ तो मिटता है। सारे ख़ज़ानों में हरि नाम सबसे बड़ा ख़ज़ाना है। जपो, दरगाह में परवान (स्वीकार) होंगे।
पउड़ी 3
मन को हरि के नाम से जगाओ। दसों दिशाओं में भागता मन ठिकाने आ जाता है। जिसके हृदय में हरि बसे, उसे कोई विघ्न नहीं लगता। कलियुग की तपिश में खड़ा है हरि का नाम (शीतलता का स्रोत)। भय मिटता है, आशा पूरी होती है, भक्ति-भाव से आत्मा में प्रकाश होता है। उस घर (ठिकाने, अवस्था) में अविनाशी बसता है। नानक कहते हैं, जम (मृत्यु) की फाँसी कट गई।
पउड़ी 4
“ततु बीचारु कहै जनु साचा”: तत्व-विचार (मूल सत्य का चिंतन) सच्चा जन कहता है। “जनमि मरै सो काचो काचा”: जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चे-से-कच्चा है (अपक्व, अधूरा)। आवा-गवन प्रभु की सेवा से मिटता है। अपना आप त्यागकर गुरुदेव की शरण लो। ऐसे ही इस रत्न-जन्म (बहुमूल्य मनुष्य शरीर) का उद्धार होता है। हरि सिमरन ही प्राणों का आधार है।
“अनिक उपाव न छूटनहारे, सिम्रिति सासत बेद बीचारे”: अनगिनत उपाय, स्मृतियाँ, शास्त्र, वेद विचारने से भी छुटकारा नहीं। हरि की भक्ति मन लगाकर करो, मन की इच्छा का फल मिलेगा।
पउड़ी 5
“संगि न चालसि तेरै धना”: आपका धन आपके साथ नहीं चलेगा। “तूं किआ लपटावहि मूरख मना”: हे मूर्ख मन, आप क्यों लिपट रहा है? बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? राज, रंग, माया का विस्तार, इनसे कौन-सा छुटकारा? घोड़े, हाथी, रथ, सवारी, झूठा दिखावा, झूठा पसारा। “जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना”: जिसने ये सब दिए, उसे अनजान (बिगाना) नहीं पहचानता। “नामु बिसारि नानक पछुताना”: नाम बिसारकर पछताता है।
पउड़ी 6
“गुर की मति तूं लेहि इआने”: हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। “भगति बिना बहु डूबे सिआने”: भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। हरि की भक्ति करो, चित्त निर्मल होंगे। चरण-कमल मन में रखो, जन्मों-जन्मों के पाप जाएँगे। ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। सुनते, कहते, रहते (जीवन जीते) गति (मुक्ति) पाएँगे। “सार भूत सति हरि को नाउ”: सारतत्व, सच, हरि का नाम है। सहज स्वभाव से गुण गाओ।
पउड़ी 7
गुण गाते-गाते मैल उतरेगा। अहंकार-विष का फैलाव नष्ट होंगे। अचिंत (चिंता-मुक्त) होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। “छाडि सिआणप सगली मना”: हे मन, सारी चतुराई छोड़। साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे। हरि की पूँजी इकट्ठी करो और व्यापार करो। इधर (इस जन्म में) सुख, दरगाह में जयकार (विजय)। सबके अंदर एक ही को देखो। नानक कहते हैं, जिसके माथे पर लेख (तक़दीर) हो (वो ही ये देख पाता है)।
पउड़ी 8
उन्नीसवीं अष्टपदी का समापन “एक” शब्द की आवृत्ति से होता है: एक को जपो, एक की प्रशंसा करो, एक को सिमरो, एक ही मन में रखो। एक के अनंत गुण गाओ। मन-तन से एक भगवंत जपो। एक ही एक, हरि ख़ुद, पूर्ण रूप से व्याप्त। अनेक विस्तार एक से हुए, एक की आराधना से सारे बंधन गए। मन-तन में एक ही प्रभु रचा-बसा। गुरु की कृपा से नानक ने एक ही को जाना। ये “एक” का जाप पूरी उन्नीसवीं अष्टपदी का निचोड़ है: सब अनेकता एक से निकली है, एक में ही लौटती है।
अष्टपदी 20
श्लोक
नानक की प्रभ बेनती अपनी भगती लाइ ॥1॥
पउड़ी 1
“जाचकु जनु जाचै प्रभ दानु”: याचक (माँगने वाला) जन प्रभु से दान माँचता है। “करि किरपा देवहु हरि नामु”: कृपा करके हरि नाम दो। “साध जना की मागउ धूरि”: संत जनों की (चरणों की) धूल माँगता हूँ। “पारब्रहम मेरी सरधा पूरि”: हे पारब्रह्म, मेरी श्रद्धा पूरी करो।
गुरु जी क्या माँग रहे हैं: नाम, संतों की धूल, गुण गाने का मौक़ा, चरण-कमल से प्रीत, भक्ति। ये सब “अंदरूनी” चीज़ें हैं। कोई बाहरी सुख नहीं माँगा, कोई धन नहीं, कोई सत्ता नहीं।
पउड़ी 2
प्रभु की दृष्टि से महासुख होता है। हरि-रस कोई विरला पाता है। जिन्होंने चखा, वो तृप्त हो गए, पूर्ण पुरुष, कभी नहीं डोलते। प्रेम-रस-रंग में लबालब (सुभर) भरे हैं। साधू की संगत में चाव (उत्साह) उपजता है। और सब छोड़कर शरण में आ गए। अंदर प्रकाश है, दिन-रात लिव (ध्यान) लगी रहती है। बड़भागी ने उस प्रभु को जपा, नाम में रँगे हुओं को सुख मिलता है।
पउड़ी 3
सेवक की मनोकामना पूरी हुई। सतगुरु से निर्मल बुद्धि ली। प्रभु दयालु हुआ, सेवक को सदा निहाल (प्रसन्न) किया। बंधन काटकर मुक्त हो गया। जन्म-मरण का दुख और भ्रम चला गया। इच्छा पूरी, श्रद्धा पूरी। सदा संग (साथ) हज़ूर (पास) रहता है। जिसे अपनाना था, उसे मिला लिया। नानक कहते हैं, भक्ति और नाम में समा गया।
पउड़ी 4
ये पउड़ी “सो किउ बिसरै” (उसे कैसे भूलें?) की लय पर चलती है, और हर पंक्ति एक वजह देती है:
उसे कैसे भूलें जो (भक्त की) मेहनत को अस्वीकार नहीं करता? जो किए हुए को जानता है? जिसने सब कुछ दिया? जो जीवन का जीवन है? जिसने (गर्भ की) अग्नि में रक्षा की? जो विष (ज़हर, विकार) से निकालता है? जो जन्मों-जन्मों के टूटे हुए (रिश्ते, कर्म) जोड़ता (गाढ़ता) है?
“गुरि पूरै ततु इहै बुझाइआ”: पूरे गुरु ने यही तत्व समझाया। “प्रभु अपना नानक जन धिआइआ”: नानक के जन ने अपना प्रभु ध्याया।
पउड़ी 5
“साजन संत करहु इहु कामु, आन तिआगि जपहु हरि नामु”: मित्रो, संतो, ये काम करो, और सब छोड़कर हरि नाम जपो। “सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पावहु”: सिमर-सिमर-सिमर सुख पाओ। ये “सिमरि” तीन बार, पहली अष्टपदी की प्रतिध्वनि। “आपि जपहु अवरह नामु जपावहु”: ख़ुद जपो, दूसरों को जपवाओ। “भगति भाइ तरीऐ संसारु, बिनु भगती तनु होसी छारु”: भक्ति-भाव से संसार तरो, भक्ति के बिना शरीर राख हो जाएगा। “छारु” (राख) वही शब्द है जो श्लोक में आया था। सारे दुखों का नाश होता है। गुणों के ख़ज़ाने (गुणतासु) का नाम जपो।
पउड़ी 6
प्रीत उपजी, प्रेम-रस का चाव उठा। मन-तन में यही मक़सद है। आँखों से दर्शन देखकर सुख, मन खिलता है संत के चरण धोकर। भक्तों के मन-तन में रंग चढ़ा है, कोई विरला ही संगत पाता है। “एक बसतु दीजै करि मइआ”: एक वस्तु (नाम) दो कृपा करके। उसकी उपमा कही नहीं जा सकती, सबमें समाया हुआ है।
पउड़ी 7
ईश्वर के नामों की माला: बख़्शने वाला, दीनों पर दयालु, भक्ति-वत्सल, सदा कृपालु, अनाथों का नाथ, गोबिंद, गोपाल, सबका पालनहार, आदि-पुरुष, कारण-करतार, भक्तों के प्राणों का आधार। जो जपे, पुनीत हो जाए। “हम निरगुनीआर नीच अजान”: हम गुणहीन, नीच, अज्ञानी। आपकी शरण में, हे पुरुष भगवान।
पउड़ी 8
सारे बैकुंठ, मुक्ति, मोक्ष, एक पल हरि के गुण गाने से मिल जाते हैं। अनेक राज, भोग, बड़ाई, ये सब तब हैं जब हरि के नाम की कथा मन को भाई। जीभ हरि-हरि नित्य जपती रहे। भली करनी, शोभा, धनवंत, ये तब जब हृदय में पूरे गुरु का मंत्र बसा हो। “साधसंगि प्रभ देहु निवासु, सबल सूख नानक परगासु”: साधसंगत में निवास दो, सारे सुख प्रकाश हो जाएँगे।
अष्टपदी 21
श्लोक
आपन कीआ नानका आपे ही फिरि जापि ॥1॥
पउड़ी 1
गुरु जी सृष्टि से पहले की अवस्था की कल्पना करवाते हैं:
जब कोई आकार (दृश्य जगत) नहीं दिखता था, तब पाप-पुण्य कहाँ से होते? जब वो अपनी शून्य-समाधि में था, तब बैर-विरोध किसके साथ? जब उसका न वर्ण (रंग) था, न चिह्न (पहचान), तब हर्ष-शोक किसे होता? जब वो ख़ुद ही पारब्रह्म था (और कुछ नहीं था), तब मोह किसे, भ्रम किसका?
“आपन खेलु आपि वरतीजा”: अपना खेल ख़ुद ही खेल रहा है। “करनैहारु न दूजा”: करने वाला दूसरा कोई नहीं। ये सृष्टि-पूर्व की शून्य अवस्था का चित्र है, जहाँ सिर्फ़ “वो” था, और कुछ नहीं। अच्छा-बुरा, सुख-दुख, कोई द्वंद्व नहीं उठा था, चारों ओर शून्य पसरा हुआ था।
पउड़ी 2
जब प्रभु केवल (अकेला) स्वामी था, तब बंधन-मुक्ति किसकी गिनती? जब एक ही हरि अगम, अपार था, तब नरक-स्वर्ग-अवतार कहाँ? जब निर्गुण प्रभु सहज स्वभाव में था, तब शिव-शक्ति कहाँ? जब ख़ुद अपनी ज्योति ख़ुद धारण करता, तब कौन निडर, कौन किससे डरता? ये सब सवाल “जब-तब” की लय पर हैं, और हर सवाल का जवाब एक ही है: जब सिर्फ़ “वो” था, तो ये सारे द्वंद्व थे ही नहीं।
पउड़ी 3
ये पौराणिक “जब-तब” का विस्तार है। जब ख़ुद ही अपनी ज्योति धारे, तो डर किसका? अपनी लीला ख़ुद रचता है, अपार (असीम) रंगों के कौतुक (तमाशे) करता है।
पउड़ी 4
जब ईश्वर ने ज्योति फैलाई, तब सृष्टि प्रकट हुई। अनेक रूप, रंग, भेष, लेकिन एक ही सार। अनेक विधियों से विस्तार किया, लेकिन प्रभु अविनाशी एक ओंकार ही है।
पउड़ी 5
सारे जीव नाम के सहारे, सारे ब्रह्मांड नाम से टिके। आकाश-पाताल, सारे आकार, सब नाम पर टिके हैं। ये “नाम के धारे” की लय पूरी सृष्टि को नाम पर टिका हुआ दिखाती है।
पउड़ी 6
रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य पुरुष सबमें समाया।
पउड़ी 7
संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में प्रवेश। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती।
पउड़ी 8
“बिसमन बिसम भए बिसमाद”: विस्मय ही विस्मय, विस्मित हो गए। “जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद”: जिसने समझा, उसे स्वाद आ गया। प्रभु के रंग में रचे-बसे भक्त, गुरु के वचन से पदार्थ (चार पदार्थ) पाए। वो दाता हैं, दुख काटने वाले, उनकी संगत में संसार तरता है। गोबिंद के गुण-कीर्तन गाता है, गुरु की कृपा से फल पाता है।
अष्टपदी 22
श्लोक
कह माइआ जालु इहु कता ॥ आपन आपु किआ जानता ॥
आपनै रंगि ता आपु चलाइओ ॥ ना कोइ मंदु न कोइ भलाइओ ॥
ये श्लोक सवाल पूछता है: जब कुछ दिखता ही नहीं था, तब ये (सृष्टि) कहाँ से उपजी? ये कहाँ जाएगी? माया का जाल कहाँ था? वो (ईश्वर) अपने आप को ख़ुद क्या जानता? अपने रंग (इच्छा) में ख़ुद ही चलता था। न कोई बुरा, न कोई भला। ये प्रश्न पूछने का ही अपने-आप में एक साधना है: इन सवालों पर ध्यान लगाना मन को शून्य की तरफ़ ले जाता है।
पउड़ी 1
जब कुछ दिखता ही नहीं था, तब ये कहाँ से उपजी, कहाँ जाएगी? जब एक ही हरि अगम अपार था, तब कौन छूटा, कौन पार गया? ये सवाल ध्यान की तरफ़ ले जाते हैं: इन सवालों पर चिंतन मन को शून्य की तरफ़ खींचता है।
पउड़ी 2
जब शून्य-समाधि धारी, तब बैर-विरोध किसके संग? ख़ुद ही ख़ुद को ख़ुद परवान (स्वीकार)। ख़ुद ही सबके साथ रचा।
पउड़ी 3
जब हवा, पानी, अग्नि नहीं थी, तब कौन उपजा, कौन बिला (नष्ट हुआ)? जब धर्म-कर्म-वर्ण नहीं, तब कौन जपता? ये सारे प्रश्न एक ही ओर इशारा करते हैं: सृष्टि से पहले भी वही, सृष्टि के दौरान भी वही, सृष्टि के बाद भी वही।
पउड़ी 4
अनेक रूप जैसे नाटक करने वाला (स्वांगी) दिखाता है। जैसे प्रभु को भाए, वैसे नचाता है। ये सृष्टि एक रंगमंच है।
पउड़ी 5
ये “नाम के धारे” पउड़ी शक्तिशाली है: सारे जीव नाम के सहारे। खंड-ब्रह्मांड नाम से टिके। स्मृति-वेद-पुराण नाम से टिके। सुनना-ज्ञान-ध्यान नाम से। आकाश-पाताल नाम से। सारे आकार नाम से। सारी पुरियाँ (लोक) और भवन नाम से। कान से सुनकर नाम के संग उद्धार। कृपा करके जिसे अपने नाम में लगाए, वो चौथे पद (तुरीयावस्था, परम अवस्था) में गति पाता है।
पउड़ी 6
“सति” (सत्य) की लय, 17वीं अष्टपदी की प्रतिध्वनि: रूप सत्य, स्थान सत्य। पुरुष सत्य, केवल प्रधान। करतूत सत्य, बाणी सत्य। सत्य करनी निर्मल, शुद्ध।
पउड़ी 7
संतों का उपदेश सत्य-वचन। सत्य वो जन जिसके हृदय में ईश्वर प्रवेश कर गया। वो ख़ुद सत्य, उसका बनाया सब सत्य। कर्ता की सीमा रचना नहीं जानती। जो उसे भाए, वो चलता है।
पउड़ी 8
अपनी लीला ख़ुद बनाई, अपनी कीमत ख़ुद जानता है। सारे रूप-रंगों में व्याप्त, प्रकाश संत की संगत से होता है। रचना रचकर अपनी कला (शक्ति) धारी, अनेक बार नानक बलिहारी।
अष्टपदी 23
श्लोक
बिनु गुण कीते भगति न होइ ॥
सुरसती सिधि पीहि मँत्रु ॥
करमे बवनू फेरू जँत्रु ॥
ये श्लोक सारे गुण आपके हैं, मेरा कोई गुण नहीं। गुण के बिना भक्ति नहीं होती। गुरु जी ख़ुद को गुणहीन कहते हैं, और ये कहकर गुणों की पराकाष्ठा दिखाते हैं।
पउड़ी 1
संत जनों से मिलकर राम बोलो। सारे ख़ज़ाने पूरे, सारे काम पूरे। मन की वासना मन से जाती है, हरि का प्रताप मन में आता है। अनेक विघ्नों से छुटकारा मिलता है, साधू ही रखवाले (रक्षक) हैं।
पउड़ी 2
विनती करता हूँ, सुनो मेरे मित्र। संतों की सेवा का यही वक़्त (ईता) है। यहाँ (इस जन्म में) हरि का लाभ कमाकर चलो, आगे (परलोक में) सुख से बसोगे। “ईहा खाटि” (यहाँ कमाओ) में व्यापार की भाषा है: ये जन्म एक बाज़ार है, और सबसे अच्छा सौदा नाम है।
पउड़ी 3
गुण गाते मैल उतरेगा, अहंकार-विष मिटेगा। “छाडि सिआणप सगली मना”: हे मन, सारी चतुराई छोड़। साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे। हरि की पूँजी जमा करो, व्यापार करो। इधर सुख, दरगाह में जयकार।
पउड़ी 4
तत्व-विचार सच्चा जन कहता है। जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चे-से-कच्चा। इस रत्न-जन्म का उद्धार ऐसे होता है: हरि-हरि सिमरो, वही प्राणों का आधार।
पउड़ी 5
आपका धन साथ नहीं चलेगा, हे मूर्ख मन। बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। ये उन्नीसवीं अष्टपदी का ही भाव है, अंतिम अष्टपदियों में पूरी सुखमनी साहिब की recap हो रही है।
पउड़ी 6
गुण गाते मैल उतरेगा, अहंकार-विष मिटेगा। अचिंत होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। सारी चतुराई छोड़ो, साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे।
पउड़ी 7
तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे। जन्म-मरण की चिंता मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिस पर कृपा धारी, साधसंगत में मुरारी का नाम जपा। “थिति पाई चूके भ्रम गवन”: ठहराव पाया, भ्रम और भटकना बंद। कानों से हरि-हरि यश सुनो।
पउड़ी 8
तेईसवीं अष्टपदी का समापन “एक” की लय से: एक को जपो, एक की प्रशंसा, एक को सिमरो, एक मन में। एक के अनंत गुण गाओ। मन-तन से एक भगवंत जपो। एक ही, पूर्ण, व्याप्त। अनेक विस्तार एक से हुए। एक की आराधना से बंधन गए। मन-तन में एक ही प्रभु रचा। गुरु की कृपा से नानक ने एक ही को जाना। “सभु गुण आपके मै किछु नाहि”: ये पहली अष्टपदी के “सिमरउ सिमरि सिमरि” का पूरा वृत्त बंद करता है।
अष्टपदी 24

श्लोक
हरि सरणाई छुटीऐ हरि बिना मुकति न होइ ॥
करने का कारण (शक्ति) उसके पास है, (उसके बिना) कुछ नहीं हो सकता। हरि की शरण में छुटकारा मिलता है, हरि के बिना मुक्ति नहीं। ये पूरी सुखमनी साहिब का अंतिम श्लोक है, और ये पहले श्लोक (“आदि गुरए नमः”) की ही प्रतिध्वनि है: शुरुआत शरण में, अंत भी शरण में।
पउड़ी 1
ये पहली अष्टपदी की सातवीं पउड़ी के शब्द लगभग वही हैं। पूरी सुखमनी साहिब एक वृत्त है जो अपने शुरुआती बिंदु पर लौट आया। 24 अष्टपदियों, 192 पउड़ियों की यात्रा के बाद, गुरु जी वहीं खड़े हैं जहाँ से चले थे: सिमरन। लेकिन अब ये शब्द पहले से कहीं ज़्यादा गहरे गूँजते हैं, क्योंकि अब हम जानते हैं कि सिमरन क्या है, क्यों है, और कैसे है।
पउड़ी 2
ये दूसरी अष्टपदी की दूसरी पउड़ी की लगभग शब्दश: पुनरावृत्ति है। सारी सृष्टि का राजा भी दुखी, लेकिन नाम जपने से सुखी। लाखों-करोड़ों बंधन नहीं छूटते, नाम से छूटते हैं। माया प्यास नहीं बुझाती, नाम बुझाता है। जिस रास्ते पर अकेला जाता है, वहाँ भी नाम साथी। 24 अष्टपदियों बाद ये शब्द वही हैं, लेकिन अब इनका वज़न बढ़ गया है क्योंकि बीच में 22 अष्टपदियों ने इसी बात को हर कोण से समझाया।
पउड़ी 3
तत्व-विचार सच्चा जन कहता है: जो जन्मता-मरता रहे, वो कच्चा। आवा-गवन प्रभु की सेवा से मिटता है। अपना आप त्यागकर गुरुदेव की शरण लो। ऐसे ही रत्न-जन्म का उद्धार, हरि सिमरन ही प्राणों का आधार।
पउड़ी 4
आपका धन साथ नहीं चलेगा, हे मूर्ख मन। बेटे, मित्र, परिवार, पत्नी, इनसे क्या सहारा? जिसने दिए,नाम बिसारकर पछताता है। ये उन्नीसवीं अष्टपदी से लगभग वही शब्द हैं। गुरु जी जानबूझकर दोहरा रहे हैं, जैसे कोई शिक्षक परीक्षा से पहले ज़रूरी बातें दोबारा-तिबारा कहता है।
पउड़ी 5
हे अज्ञानी, गुरु की बुद्धि ले। भक्ति के बिना बड़े-बड़े सयाने डूब गए। हरि की भक्ति करो मन-मित्र, चित्त निर्मल होंगे। चरण-कमल मन में रखो, जन्मों-जन्मों के पाप (किलबिख) जाएँगे।
पउड़ी 6
गुण गाते मैल उतरेगा, अहंकार-विष नष्ट होंगे। अचिंत होकर सुख के साथ बसोगे। साँस-ग्रास हरि नाम सँभालो। सारी चतुराई छोड़ो, साधसंगत में सच्चा धन पाएँगे।
पउड़ी 7
तपिश में ठंडक बरसाई। आनंद हुआ, दुख भागे भाई। जन्म-मरण की चिंता (अंदेसे) मिटी, संतों के पूर्ण उपदेश से। भय गया, निर्भय होकर बसा। सारे रोग मन से नष्ट। जिसका था, उसने कृपा धारी। साधसंगत में मुरारी (ईश्वर) का नाम जपा। स्थिति (ठहराव) पाई, भ्रम और भटकना चूका। सुनो नानक, कानों से हरि-हरि यश सुनो।
“थिति पाई चूके भ्रम गवन”: ठहराव पाया, भटकना बंद हुआ। ये “थिति” (स्थिरता) शब्द पूरी सुखमनी साहिब का लक्ष्य है: मन को ठहराव दिलाना। सुखमनी (मन की शान्ति) यही तो है: भटकना रुके, ठहराव आए।
पउड़ी 8: अंतिम पउड़ी
सुखमनी साहिब की अंतिम पउड़ी।
“निरगुणु आपि सरगुणु भी ओही”: निर्गुण ख़ुद, सगुण भी वही। “कला धारि जिनि सगली मोही”: कला (शक्ति) धारण करके सारी सृष्टि को मोह लिया। “अपने चरित प्रभि आपि बनाए”: अपनी लीला ख़ुद बनाई। “अपनी कीमति आपे पाए”: अपनी कीमत ख़ुद ही पाता है (कोई और नहीं जानता)।
“हरि बिनु दूजा नाही कोइ”: हरि के बिना दूसरा कोई नहीं। “सबल निरंतरि एको सोइ”: सबके अंदर वही एक। “ओटि पोटि रविआ रूप रंग”: ताने-बाने (ओत-पोत) में, सारे रूप और रंगों में व्याप्त। “भए प्रगास साध कै संग”: प्रकाश साधू की संगत में हुआ।
“रचि रचना अपनी कल धारी, अनिक बार नानक बलिहारी”: रचना रचकर अपनी शक्ति धारी, अनेक बार नानक बलिहारी जाता है।
ये अंतिम दो पंक्तियाँ पूरी सुखमनी साहिब का सार हैं: एक ने सब रचा, सब में वो ही है, और हम बस बलिहारी जा सकते हैं। 24 अष्टपदियों में जो कहा, वो इन दो पंक्तियों में समा गया। “रचि रचना” (रचना रची) में सारी सृष्टि है। “अनिक बार बलिहारी” में सारा समर्पण।
In Conclusion
सुखमनी साहिब एक वृत्त (circle) है। शुरू “सिमरन” से होती है, अंत “सिमरन” पर। बीच में 24 अष्टपदियाँ इंसान को हर कोण से, हर तरीक़े से, बार-बार एक ही बात समझाती हैं: नाम जपो, संगत करो, अहंकार छोड़ो, हुकम मानो।
गुरु अर्जन देव जी ने ये रचना उस दौर में लिखी जब वो ख़ुद बहुत कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहे थे। कुछ ही साल बाद उन्होंने अपना बलिदान दिया। इस संदर्भ में सुखमनी साहिब का हर शब्द और गहरा हो जाता है: ये अग्नि-परीक्षा से गुज़रते हुए इंसान का सीधा अनुभव है, जो किसी विद्वान की किताबी थ्योरी से बहुत आगे की चीज़ है।
“आपका कीआ मीठा लागै” कहना आसान है। लेकिन जब सब कुछ छिन रहा हैं, जब शरीर तपाया जा रहा हैं, तब भी कहना कि “जो तूने किया, वो मीठा है”, ये गुरु अर्जन देव जी की शान है। सुखमनी साहिब वो तैयारी है जो उस अंतिम परीक्षा से पहले की गई।
इस पृष्ठ पर प्रस्तुत अर्थ और टीका एक विनम्र प्रयास है। गुरबाणी की गहराई किसी एक टीके में नहीं आ सकती। ये बस एक दरवाज़ा है। अंदर जाना आपका काम है।

साथ में पढ़ें · Companion Texts
- आनंद साहिब M3 की 40-पउड़ी रचना, similar format।
- जपजी साहिब M1 का foundational text, सुखमनी का predecessor।
- सलोक महला 9 M9 की spare वाणी, सुखमनी के contrast में।
पहली पंक्ति में गुरु जी “सिमरउ” तीन बार दोहराते हैं। ये दोहराव बिना वजह नहीं। जैसे कोई माँ बच्चे को कहती है “पढ़, पढ़, पढ़”, उसमें ज़ोर है, तड़प है। सिमरन एक बार का काम होता तो दोहराने की क्या ज़रूरत, ये असल में जीने का तरीक़ा है। “सिमरन” का मतलब सिर्फ़ माला फेरना समझ लेना अधूरा है, असली अर्थ है याद रखना, उस चेतना में डूब जाना।
“बिसुंभर” संस्कृत के “विश्वम्भर” से आया है, जो पूरे विश्व को धारण करता है। उसका नाम अनगिनत लोग जपते हैं, चाहे कोई “राम” कहे, कोई “अल्लाह”, कोई “वाहेगुरु”, सब उसी एक को पुकार रहे हैं।
“बेद पुरान सिम्रिति सुधाखर, कीने राम नाम इक आखर”: हज़ारों पन्ने, सैकड़ों ग्रंथ, युगों का ज्ञान, इन सबने मिलकर बस एक बात कही है: राम का नाम लो। जैसे एक बड़ा पेड़ एक छोटे-से बीज से निकलता है, वैसे ही सारा ज्ञान एक नाम से निकलता है।
“किनका एक”: एक ज़र्रा-भर भी अगर कोई इस नाम को दिल में बसा ले, तो उसकी महिमा अनगिनत हो जाती है। गुरु जी ये नहीं कहते कि तपस्वी बनो, जंगलों में जाएँ। कहते हैं, एक कण भी सच्चे दिल से रख लो, काफ़ी है।
पउड़ी का अंत निजी प्रार्थना से होता है: जो आपके दर्शन के लिए तड़पते हैं, उनकी संगत में मुझे भी तार दो। गुरु जी, जो पाँचवें गुरु हैं, ख़ुद कहते हैं “मुझे भी उनकी संगत में रख दो।” जब गुरु ख़ुद याचक ((यानी – applicant या request करने वाला) बने, तो हमारा अहंकार कहाँ ठहरेगा?