लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

सुखमनी साहिब

॥
सुख की मणि: मन की शांति का शब्द
श्री गुरु अर्जन देव जी, पाँचवें गुरु
श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 262-296.
सिख परंपरा में ग्रंथ साहिब के पृष्ठ को अंग कहा जाता है, क्योंकि ग्रंथ को जीवित गुरु का शरीर माना जाता है, कोई किताब नहीं। हर पृष्ठ गुरु का एक अंग है।

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एक ही अकाल पुरख है, जो सतगुरु की कृपा से मिलता है।
↓ सुखमनी साहिब (देवनागरी पीडीएफ़, छापने योग्य)

सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ ॥

हम सिमरन करें, बार-बार सिमरन कर के सुख पाएँ।

सुखमनी, पहली अष्टपदी की पहली पंक्ति

रचना और शहादत का इतिहास पढ़िए → गुरु अर्जन देव जी, आदि ग्रंथ का संकलन, 1606 की शहादत, और सुखमनी की रचना का समय।

परिचय

सुखमनी साहिब सिख धर्म की गहरी और सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली बाणी है। इसे पाँचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी ने लगभग 1602-03 में अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे लिखा था, वही जगह जो आज भी हरिमंदिर साहिब के पास मौजूद है। उस वक़्त वो जगह घने जंगल से घिरी हुई थी।

"सुखमनी" शब्द दो हिस्सों से बना है: "सुख" यानी शान्ति, आराम, चैन; और "मनी" यानी मन, या मणि (रत्न)। तो सुखमनी का मतलब है "मन को शान्ति देने वाला रत्न" या "मन की सांत्वना"। अंग्रेज़ी में इसे "सॉम ऑफ़ पीस" या "ज्वेल ऑफ़ पीस" कहा गया है।

इसकी संरचना बड़ी व्यवस्थित है। कुल 24 अष्टपदी हैं। हर अष्टपदी की शुरुआत एक श्लोक (दोहे) से होती है, जो उस पूरी अष्टपदी का सार बताता है। फिर उसके बाद 8 पउड़ियाँ (छंद) आती हैं। हर पउड़ी में 10 पंक्तियाँ हैं, यानी 5 दोहे। पूरी रचना में 24 श्लोक और 192 पउड़ियाँ हैं।

पूरी रचना में कुछ बुनियादी विषय बार-बार लौटते हैं:

  1. ईश्वर की सर्वव्यापकता,
  2. नाम सिमरन की शक्ति,
  3. साध-संगत का महत्व,
  4. अहंकार का त्याग, और
  5. ब्रह्मज्ञानी की पहचान।

अन्त में

सुखमनी साहिब सिमरन से शुरू होती है और पूरे गुरु के उपदेश पर पूरी होती है: चौबीसवीं अष्टपदी का अंतिम शब्द है कि जिसके मन में यह वाणी बसे और जो प्रेम से इसे सुने, उसकी शोभा सबसे ऊँची बनती है, और इन्हीं गुणों के कारण नाम ही सुखमनी है। बीच की चौबीस अष्टपदियाँ इंसान को हर कोण से, हर तरीक़े से, बार-बार एक ही बात समझाती हैं: नाम जपो, संगत करो, अहंकार छोड़ो, हुकम मानो।

गुरु अर्जन देव जी ने ये रचना उस दौर में लिखी जब वो ख़ुद बहुत कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहे थे। कुछ ही साल बाद उन्होंने अपना बलिदान दिया। इस संदर्भ में सुखमनी साहिब का हर शब्द और गहरा हो जाता है: ये अग्नि-परीक्षा से गुज़रते हुए इंसान का सीधा अनुभव है, जो किसी विद्वान की किताबी थ्योरी से बहुत आगे की चीज़ है।

"तेरा कीआ मीठा लागै" (राग आसा, अंग 394) कहना आसान है। लेकिन जब सब कुछ छिन रहा है, जब शरीर तपाया जा रहा है, तब भी यह कहना कि जो आपने किया, वह मीठा है, यह गुरु अर्जन देव जी की शान है। सुखमनी साहिब वह तैयारी है जो उस अंतिम परीक्षा से पहले की गई।

गुरबाणी की गहराई किसी एक टीके में नहीं आ सकती। यहाँ दिया गया अर्थ और टीका बस एक दरवाज़ा है। अंदर जाना आपका काम है।

परिशिष्ट की सीख, “सुखमनी क्या सिखाती है?”: चार खाने, सुख (हथेली पर जलता दीया), नाम (हथेली पर लिखा जाता वाहिगुरु), संगत (एक दीये से जलता दूसरा दीया), और हुकम (घिरते बादलों के नीचे पौधा रोपता किसान)

 

साथ में पढ़ें

  • आनंद साहिब महला 3 की 40 पउड़ियों वाली रचना, मिलता-जुलता ढाँचा।
  • जपजी साहिब महला 1 की बुनियादी बाणी, सुखमनी से पहले की।
  • सलोक महला 9 महला 9 की संक्षिप्त, सादी वाणी, सुखमनी के बरअक्स।