अंग
200
राग Gauree
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ਅਹੰਬੁਧਿ ਮਨ ਪੂਰਿ ਥਿਧਾਈ ॥
ਸਾਧ ਧੂਰਿ ਕਰਿ ਸੁਧ ਮੰਜਾਈ ॥੧॥
ਅਨਿਕ ਜਲਾ ਜੇ ਧੋਵੈ ਦੇਹੀ ॥
ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਸੁਧੁ ਨ ਤੇਹੀ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਓ ਸਦਾ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਕਾਟਿਆ ਭਉ ਕਾਲ ॥੩॥
ਮੁਕਤਿ ਭੁਗਤਿ ਜੁਗਤਿ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਨਾਨਕ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੪॥੧੦੦॥੧੬੯॥
ਸਾਧ ਧੂਰਿ ਕਰਿ ਸੁਧ ਮੰਜਾਈ ॥੧॥
ਅਨਿਕ ਜਲਾ ਜੇ ਧੋਵੈ ਦੇਹੀ ॥
ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਸੁਧੁ ਨ ਤੇਹੀ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਓ ਸਦਾ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਕਾਟਿਆ ਭਉ ਕਾਲ ॥੩॥
ਮੁਕਤਿ ਭੁਗਤਿ ਜੁਗਤਿ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਨਾਨਕ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੪॥੧੦੦॥੧੬੯॥
अहंबुधि मन पूरि थिधाई ॥
साध धूरि करि सुध मंजाई ॥१॥
अनिक जला जे धोवै देही ॥
मैलु न उतरै सुधु न तेही ॥२॥
सतिगुरु भेटिओ सदा क्रिपाल ॥
हरि सिमरि सिमरि काटिआ भउ काल ॥३॥
मुकति भुगति जुगति हरि नाउ ॥
प्रेम भगति नानक गुण गाउ ॥४॥१००॥१६९॥
साध धूरि करि सुध मंजाई ॥१॥
अनिक जला जे धोवै देही ॥
मैलु न उतरै सुधु न तेही ॥२॥
सतिगुरु भेटिओ सदा क्रिपाल ॥
हरि सिमरि सिमरि काटिआ भउ काल ॥३॥
मुकति भुगति जुगति हरि नाउ ॥
प्रेम भगति नानक गुण गाउ ॥४॥१००॥१६९॥
हिन्दी अर्थ: अहंकार वाली बुद्धि के कारण (मनुष्य के) मन को (अहम् की) चिकनाई लगी रहती है (उस चिकनाई के कारण मन पर किसी उपदेश का असर नहीं होता~ जैसे चिकने बरतन पर पानी नहीं ठहरता। जिस मनुष्य को ‘जन की धूरि’ मीठी लगती है) साधू की चरण-धूड़ से उसकी बुद्धि मांजी जाती है और शुद्ध हो जाती है। 1। अगर मनुष्य अनेकों (तीर्थों के) पानियों से अपने शरीर को धोता रहे~ तो भी उसके मन की मैल नहीं उतरती~ उस तरह (भाव~ तीर्थ-स्नानों से भी) वह मनुष्य पवित्र नहीं हो सकता। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य को सत्गुरू मिल जाता है~ जिस पे गुरू सदा दयावान रहता है~ वह मनुष्य परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (अपने अंदर से) मौत का डर (आत्मिक मौत का खतरा) दूर कर लेता है। 3। परमात्मा का नाम ही विकारों से निजात दिलवाता है। नाम ही आत्मिक जीवन की खुराक है~ नाम जपना ही जीवन की सही जुगति है। हे नानक ! प्रेम-भरी भक्ति से परमात्मा के गुण गाता रह। 4। 100। 169।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਵਨ ਪਦਵੀ ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ॥
ਜਿਨ ਮਿਲਿਆ ਆਤਮ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਸੁਨਿ ਮਨ ਕਾਨੀ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਦੁਆਰ ਪਰਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਧਿਆਈਐ ਗੋਪਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲੁ ॥੨॥੧੦੧॥੧੭੦॥
ਜੀਵਨ ਪਦਵੀ ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ॥
ਜਿਨ ਮਿਲਿਆ ਆਤਮ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਸੁਨਿ ਮਨ ਕਾਨੀ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਦੁਆਰ ਪਰਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਧਿਆਈਐ ਗੋਪਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲੁ ॥੨॥੧੦੧॥੧੭੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
जीवन पदवी हरि के दास ॥
जिन मिलिआ आतम परगासु ॥१॥
हरि का सिमरनु सुनि मन कानी ॥
सुखु पावहि हरि दुआर परानी ॥१॥ रहाउ ॥
आठ पहर धिआईऐ गोपालु ॥
नानक दरसनु देखि निहालु ॥२॥१०१॥१७०॥
जीवन पदवी हरि के दास ॥
जिन मिलिआ आतम परगासु ॥१॥
हरि का सिमरनु सुनि मन कानी ॥
सुखु पावहि हरि दुआर परानी ॥१॥ रहाउ ॥
आठ पहर धिआईऐ गोपालु ॥
नानक दरसनु देखि निहालु ॥२॥१०१॥१७०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं~ वे हरी के दास हैं) हरी के दासों को उच्च आत्मिक दर्जा प्राप्त है। उन (हरी के दासों) को मिलके आत्मा को (ज्ञान का) प्रकाश मिल जाता है। 1। हे मेरे मन ! ध्यान से परमात्मा का नाम सुना कर। हे प्राणी ! (सिमरन की बरकति से) तू हरी के दर पर सुख प्राप्त करेगा। 1। रहाउ। हे नानक ! (हरी के दासों की संगति में रह के) आठों पहर सृष्टि के पालनहार प्रभू को सिमरना चाहिए। (सिमरन की बरकति से हर जगह परमात्मा का) दर्शन करके (मन) खिला रहता है। 2। 101। 170।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਂਤਿ ਭਈ ਗੁਰ ਗੋਬਿਦਿ ਪਾਈ ॥
ਤਾਪ ਪਾਪ ਬਿਨਸੇ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨਿਤ ਰਸਨ ਬਖਾਨ ॥
ਬਿਨਸੇ ਰੋਗ ਭਏ ਕਲਿਆਨ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਗੁਣ ਅਗਮ ਬੀਚਾਰ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਮਿ ਹੈ ਨਿਸਤਾਰ ॥੨॥
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਨਿਤ ਨੀਤ ॥
ਗਈ ਬਿਆਧਿ ਉਬਰੇ ਜਨ ਮੀਤ ॥੩॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਧਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥੪॥੧੦੨॥੧੭੧॥
ਸਾਂਤਿ ਭਈ ਗੁਰ ਗੋਬਿਦਿ ਪਾਈ ॥
ਤਾਪ ਪਾਪ ਬਿਨਸੇ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨਿਤ ਰਸਨ ਬਖਾਨ ॥
ਬਿਨਸੇ ਰੋਗ ਭਏ ਕਲਿਆਨ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਗੁਣ ਅਗਮ ਬੀਚਾਰ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਮਿ ਹੈ ਨਿਸਤਾਰ ॥੨॥
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਨਿਤ ਨੀਤ ॥
ਗਈ ਬਿਆਧਿ ਉਬਰੇ ਜਨ ਮੀਤ ॥੩॥
ਮਨ ਬਚ ਕ੍ਰਮ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਧਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥੪॥੧੦੨॥੧੭੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥
ताप पाप बिनसे मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥
राम नामु नित रसन बखान ॥
बिनसे रोग भए कलिआन ॥१॥
पारब्रहम गुण अगम बीचार ॥
साधू संगमि है निसतार ॥२॥
निरमल गुण गावहु नित नीत ॥
गई बिआधि उबरे जन मीत ॥३॥
मन बच क्रम प्रभु अपना धिआई ॥
नानक दास तेरी सरणाई ॥४॥१०२॥१७१॥
सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥
ताप पाप बिनसे मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥
राम नामु नित रसन बखान ॥
बिनसे रोग भए कलिआन ॥१॥
पारब्रहम गुण अगम बीचार ॥
साधू संगमि है निसतार ॥२॥
निरमल गुण गावहु नित नीत ॥
गई बिआधि उबरे जन मीत ॥३॥
मन बच क्रम प्रभु अपना धिआई ॥
नानक दास तेरी सरणाई ॥४॥१०२॥१७१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे भाई ! गोबिंद के रूप गुरू ने (जिस मनुष्य को नाम की दाति) बख्श दी~ उसके अंदर ठंढ पड़ गई~ उसके सारे दुख-कलेश और पाप नाश हो गए। 1। रहाउ। (हे भाई !) जो मनुष्य अपनी जीभ से सदा परमात्मा का नाम उच्चारण करता है~ उसके सारे रोग दूर हो जाते हैं~ उसके अंदर आनंद ही आनंद बने रहते हैं। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य अपहुँच पारब्रहम् प्रभू के गुणों का विचार करता रहता है~ गुरू की संगति में रह के उस का (संसार-समुंद्र से) पार उतारा हो जाता है। 2। हे (मेरे) मित्र ! सदा परमात्मा के गुण गाते रहो। (जो मनुष्य गुण गाते हैं~ उनका हरेक) रोग दूर हो जाता है~ वह मनुष्य (रोगों-विकारों से) बचे रहते हैं। 3। हे नानक ! (प्रभू-चरणों में प्रार्थना करके कह, हे प्रभू !) मैं तेरा दास तेरी शरण आया हूँ। (मेहर कर) मैं अपने मन से बचनों से और कर्मों से सदा अपने मालिक प्रभू को सिमरता रहूँ। 4। 102। 171।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨੇਤ੍ਰ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਕੀਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਭਰਮ ਗਏ ਪੂਰਨ ਭਈ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੀਤਲਾ ਤੇ ਰਖਿਆ ਬਿਹਾਰੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੧॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਸੋ ਜੀਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ॥੨॥੧੦੩॥੧੭੨॥
ਨੇਤ੍ਰ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਕੀਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਭਰਮ ਗਏ ਪੂਰਨ ਭਈ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੀਤਲਾ ਤੇ ਰਖਿਆ ਬਿਹਾਰੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੧॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਸੋ ਜੀਵੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ॥੨॥੧੦੩॥੧੭੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥
भरम गए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥
सीतला ते रखिआ बिहारी ॥
पारब्रहम प्रभ किरपा धारी ॥१॥
नानक नामु जपै सो जीवै ॥
साधसंगि हरि अंम्रितु पीवै ॥२॥१०३॥१७२॥
नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥
भरम गए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥
सीतला ते रखिआ बिहारी ॥
पारब्रहम प्रभ किरपा धारी ॥१॥
नानक नामु जपै सो जीवै ॥
साधसंगि हरि अंम्रितु पीवै ॥२॥१०३॥१७२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे गुरदेव ! जिस मनुष्य की (आत्मिक) आँखों को तूने (ज्ञान का) प्रकाश बख्शा~ उसके सारे वहम (जगह जगह की भटकना) दूर हो गई। तेरे दर पर टिक के की हुई उसकी सेवा सफल हो गई। 1। रहाउ। हे प्रभू ! तूने ही शीतला (माता का रोग~ चेचक।) से बचाया है (और कोई देवी आदि तेरे बराबर की नहीं है)। हे सुंदर स्वरूप ! हे पारब्रहम् ! तूने ही कृपा की । 1। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जो मनुष्य (और सारे आसरे छोड़ के) परमात्मा का नाम जपता है~ वह आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है (क्योंकि) वह साध-संगति में रह के आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-रस पीता रहता है। 2। 103। 172।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਧਨੁ ਓਹੁ ਮਸਤਕੁ ਧਨੁ ਤੇਰੇ ਨੇਤ ॥
ਧਨੁ ਓਇ ਭਗਤ ਜਿਨ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਹੇਤ ॥੧॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਸੁਖੁ ਲਹੀਐ ॥
ਰਸਨਾ ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਸੁ ਕਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਨ ਊਪਰਿ ਜਾਈਐ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਜਪਿਆ ਨਿਰਬਾਣੁ ॥੨॥੧੦੪॥੧੭੩॥
ਧਨੁ ਓਹੁ ਮਸਤਕੁ ਧਨੁ ਤੇਰੇ ਨੇਤ ॥
ਧਨੁ ਓਇ ਭਗਤ ਜਿਨ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਹੇਤ ॥੧॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਸੁਖੁ ਲਹੀਐ ॥
ਰਸਨਾ ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਸੁ ਕਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਨ ਊਪਰਿ ਜਾਈਐ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਜਪਿਆ ਨਿਰਬਾਣੁ ॥੨॥੧੦੪॥੧੭੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥
धनु ओइ भगत जिन तुम संगि हेत ॥१॥
नाम बिना कैसे सुखु लहीऐ ॥
रसना राम नाम जसु कहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
तिन ऊपरि जाईऐ कुरबाणु ॥
नानक जिनि जपिआ निरबाणु ॥२॥१०४॥१७३॥
धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥
धनु ओइ भगत जिन तुम संगि हेत ॥१॥
नाम बिना कैसे सुखु लहीऐ ॥
रसना राम नाम जसु कहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
तिन ऊपरि जाईऐ कुरबाणु ॥
नानक जिनि जपिआ निरबाणु ॥२॥१०४॥१७३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे प्रभू !) भाग्यशाली है वह माथा (जो तेरे दर पर झुकता है)~ भाग्यशाली हैं वे आँखें (जो) तेरे (दीदार में मस्त रहती हैं)। भाग्यशाली हें वे भक्तजन जिनका तेरे नाम से प्रेम बना रहता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरे बिना कभी सुख नहीं मिल सकता। (इस वास्ते सदैव) जीभ से परमात्मा का नाम जपना चाहिए~ परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह, हे भाई !) उनपे से (सदा) सदके जाना चाहिए जिस जिस ने वासना रहित प्रभू का नाम जपा है। 2। 104। 173।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੂੰਹੈ ਮਸਲਤਿ ਤੂੰਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਤੂਹੈ ਰਾਖਹਿ ਸਾਰਿ ਸਮਾਲਿ ॥੧॥
ਐਸਾ ਰਾਮੁ ਦੀਨ ਦੁਨੀ ਸਹਾਈ ॥
ਦਾਸ ਕੀ ਪੈਜ ਰਖੈ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਗੈ ਆਪਿ ਇਹੁ ਥਾਨੁ ਵਸਿ ਜਾ ਕੈ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਮਨੁ ਹਰਿ ਕਉ ਜਾਪੈ ॥੨॥
ਪਤਿ ਪਰਵਾਣੁ ਸਚੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥
ਜਾ ਕਉ ਆਪਿ ਕਰਹਿ ਫੁਰਮਾਨੁ ॥੩॥
ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਆਪਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ॥
ਨਿਤ ਨਿਤ ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੪॥੧੦੫॥੧੭੪॥
ਤੂੰਹੈ ਮਸਲਤਿ ਤੂੰਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਤੂਹੈ ਰਾਖਹਿ ਸਾਰਿ ਸਮਾਲਿ ॥੧॥
ਐਸਾ ਰਾਮੁ ਦੀਨ ਦੁਨੀ ਸਹਾਈ ॥
ਦਾਸ ਕੀ ਪੈਜ ਰਖੈ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਗੈ ਆਪਿ ਇਹੁ ਥਾਨੁ ਵਸਿ ਜਾ ਕੈ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਮਨੁ ਹਰਿ ਕਉ ਜਾਪੈ ॥੨॥
ਪਤਿ ਪਰਵਾਣੁ ਸਚੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥
ਜਾ ਕਉ ਆਪਿ ਕਰਹਿ ਫੁਰਮਾਨੁ ॥੩॥
ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਆਪਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ॥
ਨਿਤ ਨਿਤ ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੪॥੧੦੫॥੧੭੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥
तूहै राखहि सारि समालि ॥१॥
ऐसा रामु दीन दुनी सहाई ॥
दास की पैज रखै मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥
आगै आपि इहु थानु वसि जा कै ॥
आठ पहर मनु हरि कउ जापै ॥२॥
पति परवाणु सचु नीसाणु ॥
जा कउ आपि करहि फुरमानु ॥३॥
आपे दाता आपि प्रतिपालि ॥
नित नित नानक राम नामु समालि ॥४॥१०५॥१७४॥
तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥
तूहै राखहि सारि समालि ॥१॥
ऐसा रामु दीन दुनी सहाई ॥
दास की पैज रखै मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥
आगै आपि इहु थानु वसि जा कै ॥
आठ पहर मनु हरि कउ जापै ॥२॥
पति परवाणु सचु नीसाणु ॥
जा कउ आपि करहि फुरमानु ॥३॥
आपे दाता आपि प्रतिपालि ॥
नित नित नानक राम नामु समालि ॥४॥१०५॥१७४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे प्रभू ! तू (हर जगह मेरा) सलाहकार है~ तू ही (हर जगह) मेरे साथ बसता है। तू ही (जीवों की) सार ले के संभाल करके रक्षा करता है। 1। हे मेरे वीर ! परमात्मा इस लोक में और परलोक में ऐसा साथी है कि वह अपने सेवक की इज्जत (हर जगह) रखता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस परमात्मा के वश में हमारा ये लोक है~ वही खुद परलोक में भी (हमारा रक्षक) है। (हे भाई !) मेरा मन तो आठों पहर उस परमात्मा का नाम जपता है। 2। उसे (तेरे दरबार में) आदर-सत्कार मिलता है~ वह (तेरे दर पर) कबूल होता है~ उसको (जीवन यात्रा में) तेरा सदा स्थिर रहने वाला नाम~ (बतौर) राहदारी मिलता है हे प्रभू ! जिस (सेवक) के वास्ते तू खुद हुकम करता है~। 3। हे नानक ! परमात्मा खुद ही (सब जीवों को) दातें देने वाला है~ स्वयं ही (सबकी) पालना करने वाला है। तू सदा ही उस परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) संभाल के रख। 4। 105। 174।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭਇਆ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ॥
ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਸਦਾ ਗੁਪਾਲੁ ॥੧॥
ਰਾਮੁ ਰਵਤ ਸਦ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭਇਆ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ॥
ਹਿਰਦੈ ਵਸਿਆ ਸਦਾ ਗੁਪਾਲੁ ॥੧॥
ਰਾਮੁ ਰਵਤ ਸਦ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥
हिरदै वसिआ सदा गुपालु ॥१॥
रामु रवत सद ही सुखु पाइआ ॥
सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥
हिरदै वसिआ सदा गुपालु ॥१॥
रामु रवत सद ही सुखु पाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) अभॅुल गुरू जिस मनुष्य पर दयावान होता है~ सृष्टि के रक्षक परमात्मा (का नाम) सदा उसके हृदय में बसा रहता है। 1। परमात्मा का नाम सिमरते हुए उसने सदा ही आत्मिक आनंद पाया है
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 200 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के सुबह 5 बजे के gurdwara में जब रागी पहली पंक्ति गाता है, हवा में एक specific quietness आती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 200” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 201 →, पीछे का: ← अंग 199।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।