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गीताएँ

अवधूत गीता

अद्वैत वेदान्त का सबसे प्रत्यक्ष और बिना अलंकार वाला गायन।

अवधूत गीता एक अवधूत। न वस्त्र, न ठिकाना, न पीछे मुड़ना। बस सीधा एक रास्ता और सूर्यास्त।
  • 8अध्याय
  • 264श्लोक

अवधूत दत्तात्रेय का अपना गायन, जिसका हर श्लोक एक ही केन्द्र पर लौटता है: मैं हूँ, मैं वही हूँ। कुल 8 अध्याय, 264 श्लोक।

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अवधूत गीता एक अवधूत। न वस्त्र, न ठिकाना, न पीछे मुड़ना। बस सीधा एक रास्ता और सूर्यास्त।

गीताएँ समूह में अवधूत गीता, अपने 4 साथी संग्रहों के बीच

आठ अध्याय

  1. 1आत्म-स्वरूप (1)76 श्लोक · आत्म-स्वरूप (1) आत्मा क्या है, अद्वैत क्या है, समूचे ग्रंथ का आधार। ईश्वर के अनुग्रह से जागी अद्वैत की चाह से आरम्भ करके दत्तात्रेय अपने ही आत्म-साक्षात्कार का गायन करते हैं, और श्लोक बार-बार उसी “मैं” की पहचान पर लौटते हैं।
  2. 2आत्म-स्वरूप (2)38 श्लोक · आत्म-स्वरूप (2) गुरु बालक हो, विषयी हो, मूर्ख, सेवक या गृहस्थ, रत्न अशुद्ध जगह पड़ा हो तो भी कोई उसे छोड़ता नहीं। पहले अध्याय का “मैं” यहाँ “वह” कहकर अपनी ओर संकेत करता है, और अन्त के श्लोक एक ही टेक लौटाते हैं: तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्।
  3. 3वंदना-निरसन और गगन-समानता45 श्लोक · वंदना-निरसन और गगन-समानता “ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्” की टेक श्लोक 3 से 41 तक हर श्लोक के अन्त में लौटती है और हर बार एक भेद गिराती है। यहाँ वंदना भी निरस्त होती है, क्योंकि वंदना करने वाला और वंदित दो हो जाते हैं।
  4. 4सर्व-निरसन और स्वरूप-निर्वाण24 श्लोक · सर्व-निरसन और स्वरूप-निर्वाण आवाहन-विसर्जन, ध्यान-मंत्र, पूजा, गुरु-शिष्य, माता-पिता, संध्या-कर्म और समाधि तक, एक-एक का निरसन। हर श्लोक की टेक: स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम्।
  5. 5ओंकार-निरूपण और “सर्वसम” मन्त्र32 श्लोक · ओंकार-निरूपण और “सर्वसम” मन्त्र अध्याय ओम् से उठता है, “तत्त्वमसि” पर ठहरता है, फिर एक टेक लौटाता है: “किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम्”, हे मन, जब सब-कुछ सम है तो रुदन किसके लिए।
  6. 6सर्व-शिव-निरूपण और स्वरूप-स्थिति26 श्लोक · सर्व-शिव-निरूपण और स्वरूप-स्थिति आरम्भ के बीस श्लोकों की टेक “एकनिरन्तरसर्वशिवम्” है, एक, निरन्तर, सर्वत्र शिव। इक्कीसवें श्लोक से स्वर बदलता है: “अहमेव शिवः परमार्थः”।
  7. 7अवधूत-लक्षण14 श्लोक · अवधूत-लक्षण रास्ते के चीथड़ों की गुदड़ी, सिर पर छत नहीं, और भीतर शुद्ध निरंजन समरस में डूबा चित्त। दत्तात्रेय अवधूत की समता के लक्षण एक-एक कर गिनाते हैं।
  8. 8अवधूत-समापन और “अ-व-धू-त” का अक्षर-अर्थ9 श्लोक · अवधूत-समापन और “अ-व-धू-त” का अक्षर-अर्थ तीर्थ-यात्रा, ध्यान और स्तुति के तीन अपराधों की क्षमा-याचना, अवधूत-मुनि के लक्षण, नाम के अक्षरों का अर्थ, और पाठ-श्रवण का फल।

दत्तात्रेय-विरचित · आठ अध्याय, 264 श्लोक

पाठ का समय: डेढ़-दो घंटे। बैठ कर समझने का समय: आठ से दस घंटे।

एक स्व-गायन

परम्परा कहती है कि दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और अनसूया के पुत्र थे, और बचपन से ही असाधारण थे। पुराण उन्हें ब्रह्मा-विष्णु-शिव तीनों का साझा अवतार बताते हैं, एक तरह की दिव्य-संगति जो हिंदू कथा-साहित्य में और कहीं नहीं मिलती। उनकी ख्याति का सबसे लम्बा संदर्भ श्रीमद्भागवत के एकादश-स्कंध में है, जहाँ राजा यदु उनसे पूछते हैं कि उनकी स्थिर शांति का स्रोत क्या है।

दत्तात्रेय का उत्तर एक सूची की शक्ल में आता है, जिसे आज भी “चौबीस गुरुओं की कथा” के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी से वे सहनशीलता सीखे, समुद्र से धैर्य, मधुमक्षिका से संग्रह न करने का अनुशासन। प्रत्येक के पास से उठाई गयी कोई एक बात, जिसे उन्होंने अपने जीवन-व्यवहार में बैठा लिया।

अवधूत गीता वही दत्तात्रेय हैं, मगर एक भिन्न रूप में। यहाँ वे किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहे, किसी राजा को परामर्श नहीं दे रहे। यह उनका अपना गायन है, अपनी सिद्ध-स्थिति का गायन। पूरे आठ अध्यायों में, हर श्लोक एक ही केन्द्र पर लौटता है, “मैं हूँ”, “मैं वही हूँ”, “मैं सब हूँ”। और यह दोहराव बेमतलब नहीं है। यही ग्रंथ की पाठ-विधि है।

“अवधूत” शब्द के बारे में

“अवधूत” को व्याकरण की दृष्टि से तोड़ें तो “अव” और “धू”, अर्थात् “नीचे” और “झाड़ देना”। जो सब कुछ झाड़ चुका है, समाज की पहचानें, परम्परा के नियम, अहंकार की कई परतें, वही अवधूत है।

दूसरी व्याख्या स्वयं इस गीता के आठवें अध्याय में है, जो नाम के अक्षरों को अलग-अलग खोलता है: “अ” वह जो आशा के बंधन से छूटा है, आदि, मध्य और अन्त में निर्मल है और सदा आनन्द में रहता है; “व” वह जिसने वासनाएँ त्याग दीं, जिसका वचन निर्मल है और जो वर्तमान में स्थित है; “त” वह जो तत्त्व-चिन्तन में टिका है, चिन्ता और चेष्टा से रहित है, तमस् और अहंकार से मुक्त है। “धू” का श्लोक इस पाठ में नहीं छपा; प्रचलित पाठ उसे धूल से धूसर देह और धुले चित्त वाले अवधूत का लक्षण बताता है। दोनों व्याख्याएँ एक ही मनुष्य का चित्र खींचती हैं। बाहर से देखने वाले को वह शायद विक्षिप्त लगे, मगर भीतर एक पूर्ण संतुलन में बैठा है।

इस ग्रंथ का स्वर

अवधूत गीता तर्क-शास्त्र नहीं रचती। पूछती, समझाती, सिद्ध करती हुई नहीं चलती। यह घोषणा के स्तर पर खड़ी है। पहले श्लोक से ही दत्तात्रेय शिखर पर बैठे हुए बोल रहे हैं, और पाठक से अपेक्षा यह है कि वह भी वहीं तक पहुँचने का यत्न करे, या उस ऊँचाई की कल्पना तो कम-से-कम कर सके।

एक और विशेषता यह है कि यहाँ कोई शिष्य प्रश्न नहीं पूछता। भगवद् गीता में अर्जुन हैं, उद्धव-गीता में उद्धव, अष्टावक्र-गीता में जनक। अवधूत गीता में श्रोता बस “सुमित्र”, “तात” और “वत्स” जैसे सम्बोधनों में झलकता है। दत्तात्रेय अपनी ही धुन में बोलते चले जाते हैं, और शायद इसीलिए स्वर बिना अलंकार का है। एक ऋषि अपनी सिद्ध-स्थिति में बैठ कर जो भी कहना चाहता है, बस कहता चला जाता है।

तीसरी विशेषता है दोहराव। हर अध्याय का कोई एक केन्द्रीय वाक्य है जो अनेक बार लौटता है। तीसरे अध्याय में “ज्ञानामृतं समरसं गगन-उपमो अहम्” क़रीब चालीस बार। चौथे में “स्वरूप-निर्वाण अनामय अहम्”। यह पाठ उच्चारण और ग्रहण के लिए लिखा गया है, ताकि श्वास-प्रश्वास के साथ शब्द भीतर बैठ सकें।

पढ़ने के बारे में

एक स्पष्ट प्रवेश-बिन्दु पहले अध्याय का प्रारम्भ है, जहाँ ईश्वर-अनुग्रह से अद्वैत-वासना की बात होती है। दो पंक्तियों का यह श्लोक समूचे ग्रंथ का प्रवेश-द्वार है। सातवाँ अध्याय अवधूत के लक्षणों का सबसे स्पष्ट चित्र है, और जो पाठक नहीं जानते कि वे किस तरह के व्यक्ति को पढ़ रहे हैं, उन्हें वहीं से आरम्भ करना चाहिए।

पाठ की पारम्परिक विधि एक ही श्लोक को बार-बार दोहराने की है, कभी मुँह से बोल कर, कभी मन में। संस्कृत में जो पंक्ति है, उसकी ध्वनि-लय अपनी जगह बैठती है, और हिन्दी अनुवाद के साथ अर्थ भी क्रम से खुलता चला जाता है।

साथ में पढ़ें

मूल संस्कृत पाठ sanskritdocuments.org के “avadhutagiitaa.itx” से। यह ग्रंथ पारम्परिक रूप से दत्तात्रेय की वाणी माना गया है। शंकराचार्य ने इस पर भाष्य नहीं लिखा, मगर बाद के अद्वैत-आचार्यों ने इसे शंकर-परम्परा की सीधी संगति माना है।

लाइसेंस: मूल संस्कृत सार्वजनिक-डोमेन। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।