अवधूत गीता | Avadhūta Gītā

दत्तात्रेय-विरचित · आठ अध्याय, दो-सौ-नब्बे श्लोक

अवधूत गीता

अद्वैत वेदान्त का सबसे प्रत्यक्ष और बिना अलंकार वाला गायन।

पाठ का समय: डेढ़-दो घंटे। बैठ कर समझने का समय: आठ से दस घंटे।

एक स्व-गायन

परम्परा कहती है कि दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और अनसूया के पुत्र थे, और बचपन से ही असाधारण थे। पुराण उन्हें ब्रह्मा-विष्णु-शिव तीनों का साझा अवतार बताते हैं, एक तरह की दिव्य-संगति जो हिंदू कथा-साहित्य में और कहीं नहीं मिलती। उनकी ख्याति का सबसे लम्बा संदर्भ श्रीमद्भागवत के एकादश-स्कंध में है, जहाँ राजा यदु उनसे पूछते हैं कि उनकी स्थिर शांति का स्रोत क्या है।

दत्तात्रेय का उत्तर एक सूची की शक्ल में आता है, जिसे आज भी “चौबीस गुरुओं की कथा” के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी से वो सहनशीलता सीखे, समुद्र से धैर्य, मधुमक्षी से संग्रह न करने का अनुशासन। प्रत्येक के पास से उठाई गयी कोई एक चीज़, जिसे उन्होंने अपने जीवन-व्यवहार में बैठा लिया।

अवधूत गीता वही दत्तात्रेय हैं, मगर एक भिन्न रूप में। यहाँ वो किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहे, किसी राजा को सलाह नहीं दे रहे। यह उनका अपना गायन है, अपनी realised-स्थिति का। पूरे आठ अध्यायों में, हर श्लोक एक ही केन्द्र पर लौटता है, “मैं हूँ”, “मैं वही हूँ”, “मैं सब हूँ”। और यह दोहराव बेमतलब नहीं है। यही ग्रंथ की पाठ-विधि है।

“अवधूत” शब्द के बारे में

“अवधूत” को व्याकरण-तौर पर तोड़ें तो “अव” + “धू”, यानी “नीचे” + “झाड़ देना”। जो सब कुछ झाड़ चुका है, समाज की पहचानें, परम्परा के नियम, अहंकार की कई परतें, यही अवधूत है। परम्परा पाँच लक्षण बताती है, अकुलीन (किसी वंश से नहीं), अनिकेत (किसी निवास से नहीं), अव्यङ्गित (इन्द्रिय-घात से अप्रभावित), अप्रबुद्ध (शास्त्रीय परिभाषाओं से बाहर), और निरंकुश (किसी नियम से बँधा हुआ नहीं)।

एक दूसरी व्याख्या “अ-वि-धू-त” चार अक्षरों को अलग-अलग पढ़ती है, “अ” अक्षर-तत्त्व का संकेत, “वि” विमुक्ति का, “धू” संशय-नाश का, “त” तत्त्व-निष्ठा का। दोनों व्याख्याएँ एक ही मनुष्य की तस्वीर खींचती हैं। बाहर से देखने वाले को वो शायद विक्षिप्त लगे, मगर भीतर एक पूर्ण संतुलन में बैठा है।

इस ग्रंथ का स्वर

अवधूत गीता तर्क-शास्त्र नहीं रचती। पूछती, समझाती, सिद्ध करती नहीं चलती। यह घोषणा-स्तर पर खड़ी है। पहले श्लोक से ही दत्तात्रेय शिखर पर बैठे हुए बोल रहे हैं, और पाठक से अपेक्षा यह है कि वो भी वहीं तक पहुँचने की कोशिश करे, या उस ऊँचाई की कल्पना तो कम-से-कम कर सके।

एक और विशेषता यह है कि यहाँ कोई शिष्य नहीं। भगवद् गीता में अर्जुन हैं, उद्धव-गीता में उद्धव, अष्टावक्र-गीता में जनक। अवधूत गीता में कोई नहीं। दत्तात्रेय अकेले बोल रहे हैं, और शायद इसीलिए स्वर बिना अलंकार का है, बिना सम्बोधन-शिष्टाचार के। एक ऋषि अपनी realised-स्थिति में बैठ कर जो भी कहना चाहता है, बस कहता जा रहा है।

तीसरी विशेषता है दोहराव। हर अध्याय का कोई एक केन्द्रीय वाक्य है जो दर्जनों बार लौटता है। तीसरे अध्याय में “ज्ञानामृतं समरसं गगन-उपमो अहम्” क़रीब चालीस बार। चौथे में “स्वरूप-निर्वाण अनामय अहम्”।उच्चारण-ग्रहण के लिए लिखा गया है, ताकि श्वास-प्रश्वास के साथ शब्द भीतर बैठ सकें।

आठ अध्याय

अध्याय 1

आत्म-तत्त्व

76 श्लोक · Self-tattva

आत्मा क्या है, अद्वैत क्या है, पूरे stotra का foundation। दत्तात्रेय यहाँ अपनी ही-realisation का गायन कर रहे हैं, हर verse ‘मैं हूँ’ से शुरू होता है।

अध्याय 2

रत्न-ग्रहण

40 श्लोक · Ratna-grahan

हर-स्थान से, हर-व्यक्ति से सार-ग्रहण। बच्चा, मूर्ख, गृहस्थ, सब-से सीखो। guruDom कोई एक-place में बँधा नहीं।

अध्याय 3

तुरीय-तत्त्व

46 श्लोक · Turiya-tattva

जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, और तुरीय (चौथी अवस्था) की detailed-treatment। माण्डूक्य-उपनिषद् के साथ deep-resonance।

अध्याय 4

अद्वैत-स्थिति

25 श्लोक · Advaita-sthiti

अद्वैत-realised yogi की अन्तर-स्थिति, द्वैत-disolved, अहम् ही सब-कुछ।

अध्याय 5

Avadhuta-lakshan

25 श्लोक · Avadhuta-laxan

अवधूत कौन? वो जो लोक-व्यवहार से ऊपर है, मगर compassion-rooted है। यह chapter avadhuta-archetype का portrait।

अध्याय 6

Sankhya-Yog-Vedanta unity

28 श्लोक · Trayee-aikya

सांख्य, योग, वेदान्त, तीनों एक ही सत्य को कहते हैं। दार्शनिक-divisions का transcending।

अध्याय 7

Brahma-aikya

15 श्लोक · Brahma-aikya

केवल ब्रह्म, आप भी वही, हम भी वही, सब वही। advaita की final-वाक्य।

अध्याय 8

Avadhuta-charya

10 श्लोक · Avadhuta-charya

Closing chapter, अवधूत का जीवन-conduct। नग्न, निरालंब, निर्द्वंद्व। एक पूरा-portrait one-image में।

पढ़ने के बारे में

एक स्पष्ट प्रवेश-बिन्दु पहले अध्याय का प्रारम्भ है, जहाँ ईश्वर-अनुग्रह से अद्वैत-वासना की बात होती है। यह श्लोक पाँच पंक्तियों का है, पूरे ग्रंथ का प्रवेश-द्वार। पाँचवाँ अध्याय अवधूत के लक्षणों का सबसे स्पष्ट चित्र है, और जो पाठक नहीं जानते कि वो किस तरह के व्यक्ति को पढ़ रहे हैं, उन्हें वहीं से शुरू करना चाहिए।

पाठ की पारम्परिक विधि एक ही श्लोक को बार-बार दोहराने की है, कभी मुँह से बोल कर, कभी मन में। संस्कृत में जो पंक्ति है, उसकी ध्वनि-लय अपनी जगह बैठती है, और हिन्दी अनुवाद के साथ अर्थ भी क्रम-से खुलता जाता है।

साथ में पढ़ें

मूल संस्कृत पाठ sanskritdocuments.org के “avadhutagiitaa.itx” से। यह ग्रंथ पद्म पुराण के सिंहाद्रि-खण्ड में संग्रहीत है, और पारम्परिक रूप से नाथ-संप्रदाय में foundational माना गया है। शंकराचार्य ने इस पर भाष्य नहीं लिखा, मगर बाद के अद्वैत-आचार्यों ने इसे शंकर-परम्परा की सीधी संगति माना है।

लाइसेंस: मूल संस्कृत public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।