अंग
265
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਨ ਕਉ ਭੋਗ ਜੋਗ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਕਛੁ ਨਾਹਿ ਬਿਓਗੁ ॥
ਜਨੁ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪੂਜੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਦੇਵਾ ॥੬॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਕਛੁ ਨਾਹਿ ਬਿਓਗੁ ॥
ਜਨੁ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪੂਜੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਦੇਵਾ ॥੬॥
हरि का नामु जन कउ भोग जोग ॥
हरि नामु जपत कछु नाहि बिओगु ॥
जनु राता हरि नाम की सेवा ॥
नानक पूजै हरि हरि देवा ॥६॥
हरि नामु जपत कछु नाहि बिओगु ॥
जनु राता हरि नाम की सेवा ॥
नानक पूजै हरि हरि देवा ॥६॥
हिन्दी अर्थ: (त्यागी की) योग (-साधना) और गृहस्ती का माया का भोग। भक्तजन के वास्ते प्रभू का नाम (ही) है। प्रभू का नाम जपते हुए (उसे) कोई दुख-कलेश नहीं होता। (प्रभू का) भक्त (सदा) प्रभू के नाम की सेवा (सिमरन) में मस्त रहता है; हे नानक ! (भक्त सदा) प्रभू-देव को ही पूजता है।6।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਨ ਕੈ ਮਾਲੁ ਖਜੀਨਾ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਨ ਕਉ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭਿ ਦੀਨਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਨ ਕੈ ਓਟ ਸਤਾਣੀ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਤਾਪਿ ਜਨ ਅਵਰ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਜਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਰਾਤੇ ॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਨਾਮ ਰਸ ਮਾਤੇ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਨੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪੈ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਭਗਤੁ ਪ੍ਰਗਟ ਨਹੀ ਛਪੈ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਬਹੁ ਕਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨ ਸੰਗਿ ਕੇਤੇ ਤਰੇ ॥੭॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਨ ਕਉ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭਿ ਦੀਨਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਨ ਕੈ ਓਟ ਸਤਾਣੀ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਤਾਪਿ ਜਨ ਅਵਰ ਨ ਜਾਣੀ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਜਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਰਾਤੇ ॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਨਾਮ ਰਸ ਮਾਤੇ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਨੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪੈ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਭਗਤੁ ਪ੍ਰਗਟ ਨਹੀ ਛਪੈ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਮੁਕਤਿ ਬਹੁ ਕਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨ ਸੰਗਿ ਕੇਤੇ ਤਰੇ ॥੭॥
हरि हरि जन कै मालु खजीना ॥
हरि धनु जन कउ आपि प्रभि दीना ॥
हरि हरि जन कै ओट सताणी ॥
हरि प्रतापि जन अवर न जाणी ॥
ओति पोति जन हरि रसि राते ॥
सुंन समाधि नाम रस माते ॥
आठ पहर जनु हरि हरि जपै ॥
हरि का भगतु प्रगट नही छपै ॥
हरि की भगति मुकति बहु करे ॥
नानक जन संगि केते तरे ॥७॥
हरि धनु जन कउ आपि प्रभि दीना ॥
हरि हरि जन कै ओट सताणी ॥
हरि प्रतापि जन अवर न जाणी ॥
ओति पोति जन हरि रसि राते ॥
सुंन समाधि नाम रस माते ॥
आठ पहर जनु हरि हरि जपै ॥
हरि का भगतु प्रगट नही छपै ॥
हरि की भगति मुकति बहु करे ॥
नानक जन संगि केते तरे ॥७॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू का नाम भक्त के लिए माल धन है। ये नाम रूपी धन प्रभू ने खुद अपने भक्त को दिया है। भक्त के वास्ते प्रभू का नाम (ही) तगड़ा आसरा है। भक्तों ने प्रभू के प्रताप से किसी और आसरे को नहीं देखा। भक्तजन प्रभू-नाम-रस में पूरे तौर पर भीगे रहते हैं। और नाम-रस में मस्त हुए (मन के) टिकाव (का वे आनंद लेते हैं)। जो निर्विचार अवस्था होती है। (प्रभू का) भक्त आठों पहर प्रभू को जपता है। (जगत में) भगत प्रकट (हो जाता है) छुपा नहीं रहता। प्रभू की भक्ती बेअंत जीवों को (विकारों से) छुटकारा दिलाती है; हे नानक ! भगत की संगति में कई और भी पार हो जाते हैं।7।
ਪਾਰਜਾਤੁ ਇਹੁ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮ ॥
ਕਾਮਧੇਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਮ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਤਮ ਹਰਿ ਕੀ ਕਥਾ ॥
ਨਾਮੁ ਸੁਨਤ ਦਰਦ ਦੁਖ ਲਥਾ ॥
ਨਾਮ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਸੰਤ ਰਿਦ ਵਸੈ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਤਾਪਿ ਦੁਰਤੁ ਸਭੁ ਨਸੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਸੰਗੁ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਸੇਵਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਨਾਮ ਤੁਲਿ ਕਛੁ ਅਵਰੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਾਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥੮॥੨॥
ਕਾਮਧੇਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਮ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਤਮ ਹਰਿ ਕੀ ਕਥਾ ॥
ਨਾਮੁ ਸੁਨਤ ਦਰਦ ਦੁਖ ਲਥਾ ॥
ਨਾਮ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਸੰਤ ਰਿਦ ਵਸੈ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਤਾਪਿ ਦੁਰਤੁ ਸਭੁ ਨਸੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਸੰਗੁ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਸੇਵਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਨਾਮ ਤੁਲਿ ਕਛੁ ਅਵਰੁ ਨ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਾਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥੮॥੨॥
पारजातु इहु हरि को नाम ॥
कामधेन हरि हरि गुण गाम ॥
सभ ते ऊतम हरि की कथा ॥
नामु सुनत दरद दुख लथा ॥
नाम की महिमा संत रिद वसै ॥
संत प्रतापि दुरतु सभु नसै ॥
संत का संगु वडभागी पाईऐ ॥
संत की सेवा नामु धिआईऐ ॥
नाम तुलि कछु अवरु न होइ ॥
नानक गुरमुखि नामु पावै जनु कोइ ॥८॥२॥
कामधेन हरि हरि गुण गाम ॥
सभ ते ऊतम हरि की कथा ॥
नामु सुनत दरद दुख लथा ॥
नाम की महिमा संत रिद वसै ॥
संत प्रतापि दुरतु सभु नसै ॥
संत का संगु वडभागी पाईऐ ॥
संत की सेवा नामु धिआईऐ ॥
नाम तुलि कछु अवरु न होइ ॥
नानक गुरमुखि नामु पावै जनु कोइ ॥८॥२॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू का ये नाम (ही) ‘पारजात’ वृक्ष है। प्रभू के गुण गाने (ही इच्छा पूरक) ‘कामधेनु’ है। प्रभू की (सिफत सालाह की) बातें (और) सब (बातों) से अच्छी हैं (क्योंकि प्रभू का) नाम सुनने से सारे दुख-दर्द उतर जाते हैं। (प्रभू के) नाम की वडिआई संतों के हृदय में बसती है (और) संतों के प्रताप से सारे पाप दूर हो जाते हैं। बड़े भाग्यों से संतों की संगति मिलती है (और) संतों की सेवा (करने से) (प्रभू का) नाम सिमरा जाता है। प्रभू-नाम के बराबर और कोई (पदार्थ) नहीं। हे नानक ! गुरू के सन्मुख हो के कोई विरला मनुष्य नाम की दाति पाता है। 8। 2।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਬਹੁ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬਹੁ ਸਿਮ੍ਰਿਤੀ ਪੇਖੇ ਸਰਬ ਢਢੋਲਿ ॥
ਪੂਜਸਿ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਹਰੇ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਅਮੋਲ ॥੧॥
ਬਹੁ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬਹੁ ਸਿਮ੍ਰਿਤੀ ਪੇਖੇ ਸਰਬ ਢਢੋਲਿ ॥
ਪੂਜਸਿ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਹਰੇ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਅਮੋਲ ॥੧॥
सलोकु ॥
बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥
पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल ॥१॥
बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥
पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ बहुत से शास्त्र व बहुत सारी स्मृतियां सारे (हमने) खोज के देखे हैं; (ये पुस्तकें कई तरह की ज्ञान-चर्चाएं व कई धार्मिक व भाईचारक रस्में तो सिखाती हैं) (पर ये) अकाल-पुरख के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। हे नानक ! (प्रभू के) नाम का मूल नहीं पाया जा सकता। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਜਾਪ ਤਾਪ ਗਿਆਨ ਸਭਿ ਧਿਆਨ ॥
ਖਟ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਵਖਿਆਨ ॥
ਜੋਗ ਅਭਿਆਸ ਕਰਮ ਧ੍ਰਮ ਕਿਰਿਆ ॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਬਨ ਮਧੇ ਫਿਰਿਆ ॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਕੀਏ ਬਹੁ ਜਤਨਾ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਹੋਮੇ ਬਹੁ ਰਤਨਾ ॥
ਸਰੀਰੁ ਕਟਾਇ ਹੋਮੈ ਕਰਿ ਰਾਤੀ ॥
ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰੈ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ॥
ਨਹੀ ਤੁਲਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਬੀਚਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪੀਐ ਇਕ ਬਾਰ ॥੧॥
ਜਾਪ ਤਾਪ ਗਿਆਨ ਸਭਿ ਧਿਆਨ ॥
ਖਟ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਵਖਿਆਨ ॥
ਜੋਗ ਅਭਿਆਸ ਕਰਮ ਧ੍ਰਮ ਕਿਰਿਆ ॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਬਨ ਮਧੇ ਫਿਰਿਆ ॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਕੀਏ ਬਹੁ ਜਤਨਾ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਹੋਮੇ ਬਹੁ ਰਤਨਾ ॥
ਸਰੀਰੁ ਕਟਾਇ ਹੋਮੈ ਕਰਿ ਰਾਤੀ ॥
ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰੈ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ॥
ਨਹੀ ਤੁਲਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਬੀਚਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪੀਐ ਇਕ ਬਾਰ ॥੧॥
असटपदी ॥
जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥
खट सासत्र सिम्रिति वखिआन ॥
जोग अभिआस करम ध्रम किरिआ ॥
सगल तिआगि बन मधे फिरिआ ॥
अनिक प्रकार कीए बहु जतना ॥
पुंन दान होमे बहु रतना ॥
सरीरु कटाइ होमै करि राती ॥
वरत नेम करै बहु भाती ॥
नही तुलि राम नाम बीचार ॥
नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार ॥१॥
जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥
खट सासत्र सिम्रिति वखिआन ॥
जोग अभिआस करम ध्रम किरिआ ॥
सगल तिआगि बन मधे फिरिआ ॥
अनिक प्रकार कीए बहु जतना ॥
पुंन दान होमे बहु रतना ॥
सरीरु कटाइ होमै करि राती ॥
वरत नेम करै बहु भाती ॥
नही तुलि राम नाम बीचार ॥
नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (यदि कोई) (वेद मंत्रों के) जाप करे। (शरीर को धुनी रमा के) तपाए। (और) कई ज्ञान (की बातें करे) और (देवतों के) ध्यान धरे। छे शास्त्रों व स्मृतियों का उपदेश करे; योग के साधन करे। कर्म काण्डी धर्म की क्रिया करे। (अथवा) सारे (काम) छोड़ के जंगलों में भटकता फिरे; अनेकों किस्म के बड़े बड़े यत्न करे। पुंन-दान करके बहुत सारा घी हवन करे। अपने शरीर को रक्ती रक्ती करके कटाए और आग में जला दे। कई किस्मों के वर्तों के बंधन करे; (पर ये सारे ही) प्रभू के नाम की विचार के बराबर नहीं हैं। (चाहे) हे नानक ! ये नाम एक बार भी गुरू के सन्मुख हो के जपा जाए।1।
ਨਉ ਖੰਡ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਫਿਰੈ ਚਿਰੁ ਜੀਵੈ ॥
ਮਹਾ ਉਦਾਸੁ ਤਪੀਸਰੁ ਥੀਵੈ ॥
ਅਗਨਿ ਮਾਹਿ ਹੋਮਤ ਪਰਾਨ ॥
ਕਨਿਕ ਅਸ੍ਵ ਹੈਵਰ ਭੂਮਿ ਦਾਨ ॥
ਨਿਉਲੀ ਕਰਮ ਕਰੈ ਬਹੁ ਆਸਨ ॥
ਜੈਨ ਮਾਰਗ ਸੰਜਮ ਅਤਿ ਸਾਧਨ ॥
ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਕਰਿ ਸਰੀਰੁ ਕਟਾਵੈ ॥
ਤਉ ਭੀ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਸਮਸਰਿ ਕਛੁ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਗਤਿ ਪਾਹਿ ॥੨॥
ਮਹਾ ਉਦਾਸੁ ਤਪੀਸਰੁ ਥੀਵੈ ॥
ਅਗਨਿ ਮਾਹਿ ਹੋਮਤ ਪਰਾਨ ॥
ਕਨਿਕ ਅਸ੍ਵ ਹੈਵਰ ਭੂਮਿ ਦਾਨ ॥
ਨਿਉਲੀ ਕਰਮ ਕਰੈ ਬਹੁ ਆਸਨ ॥
ਜੈਨ ਮਾਰਗ ਸੰਜਮ ਅਤਿ ਸਾਧਨ ॥
ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਕਰਿ ਸਰੀਰੁ ਕਟਾਵੈ ॥
ਤਉ ਭੀ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਸਮਸਰਿ ਕਛੁ ਨਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਗਤਿ ਪਾਹਿ ॥੨॥
नउ खंड प्रिथमी फिरै चिरु जीवै ॥
महा उदासु तपीसरु थीवै ॥
अगनि माहि होमत परान ॥
कनिक अस्व हैवर भूमि दान ॥
निउली करम करै बहु आसन ॥
जैन मारग संजम अति साधन ॥
निमख निमख करि सरीरु कटावै ॥
तउ भी हउमै मैलु न जावै ॥
हरि के नाम समसरि कछु नाहि ॥
नानक गुरमुखि नामु जपत गति पाहि ॥२॥
महा उदासु तपीसरु थीवै ॥
अगनि माहि होमत परान ॥
कनिक अस्व हैवर भूमि दान ॥
निउली करम करै बहु आसन ॥
जैन मारग संजम अति साधन ॥
निमख निमख करि सरीरु कटावै ॥
तउ भी हउमै मैलु न जावै ॥
हरि के नाम समसरि कछु नाहि ॥
नानक गुरमुखि नामु जपत गति पाहि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: (अगर कोई मनुष्य) सारी धरती पर फिरे। लम्बी उम्र तक जीता रहे। (जगत से) बहुत उपराम हो के बड़ा तपस्वी बन जाए; आग में (अपनी) जान हवन कर दे; सोना,घोड़े, बढ़िया घोड़े और जमीन दान करे; न्योली कर्म व अन्य बहुत सारे (योग) आसन करे। जैनियों के रास्ते (चल के) बड़े कठिन साधन व संजम करे; शरीर को रता रता के कटा देवे। तो भी (मन के) अहंकार की मैल दूर नहीं होती। (ऐसा) कोई (उद्यम) प्रभू के नाम के बराबर नहीं है; हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के नाम जपते हैं वे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल करते हैं।2।
ਮਨ ਕਾਮਨਾ ਤੀਰਥ ਦੇਹ ਛੁਟੈ ॥
ਗਰਬੁ ਗੁਮਾਨੁ ਨ ਮਨ ਤੇ ਹੁਟੈ ॥
ਸੋਚ ਕਰੈ ਦਿਨਸੁ ਅਰੁ ਰਾਤਿ ॥
ਮਨ ਕੀ ਮੈਲੁ ਨ ਤਨ ਤੇ ਜਾਤਿ ॥
ਇਸੁ ਦੇਹੀ ਕਉ ਬਹੁ ਸਾਧਨਾ ਕਰੈ ॥
ਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਖਿਆ ਟਰੈ ॥
ਜਲਿ ਧੋਵੈ ਬਹੁ ਦੇਹ ਅਨੀਤਿ ॥
ਸੁਧ ਕਹਾ ਹੋਇ ਕਾਚੀ ਭੀਤਿ ॥
ਮਨ ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਊਚ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਉਧਰੇ ਪਤਿਤ ਬਹੁ ਮੂਚ ॥੩॥
ਗਰਬੁ ਗੁਮਾਨੁ ਨ ਮਨ ਤੇ ਹੁਟੈ ॥
ਸੋਚ ਕਰੈ ਦਿਨਸੁ ਅਰੁ ਰਾਤਿ ॥
ਮਨ ਕੀ ਮੈਲੁ ਨ ਤਨ ਤੇ ਜਾਤਿ ॥
ਇਸੁ ਦੇਹੀ ਕਉ ਬਹੁ ਸਾਧਨਾ ਕਰੈ ॥
ਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਖਿਆ ਟਰੈ ॥
ਜਲਿ ਧੋਵੈ ਬਹੁ ਦੇਹ ਅਨੀਤਿ ॥
ਸੁਧ ਕਹਾ ਹੋਇ ਕਾਚੀ ਭੀਤਿ ॥
ਮਨ ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਊਚ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਉਧਰੇ ਪਤਿਤ ਬਹੁ ਮੂਚ ॥੩॥
मन कामना तीरथ देह छुटै ॥
गरबु गुमानु न मन ते हुटै ॥
सोच करै दिनसु अरु राति ॥
मन की मैलु न तन ते जाति ॥
इसु देही कउ बहु साधना करै ॥
मन ते कबहू न बिखिआ टरै ॥
जलि धोवै बहु देह अनीति ॥
सुध कहा होइ काची भीति ॥
मन हरि के नाम की महिमा ऊच ॥
नानक नामि उधरे पतित बहु मूच ॥३॥
गरबु गुमानु न मन ते हुटै ॥
सोच करै दिनसु अरु राति ॥
मन की मैलु न तन ते जाति ॥
इसु देही कउ बहु साधना करै ॥
मन ते कबहू न बिखिआ टरै ॥
जलि धोवै बहु देह अनीति ॥
सुध कहा होइ काची भीति ॥
मन हरि के नाम की महिमा ऊच ॥
नानक नामि उधरे पतित बहु मूच ॥३॥
हिन्दी अर्थ: (कई प्राणियों के) मन की इच्छा (होती है कि) तीर्थों पर (जा के) शरीरिक चोला छोड़ा जाय। (पर इस तरह भी) गर्व, अहंकार मन में कम नहीं होता। (मनुष्य) दिन और रात (भाव। सदा) (तीर्थों पर) स्नान करे। (फिर भी) मन की मैल शरीर धोने से नहीं जाती। (अगर) इस शरीर को (साधने की खातिर) कई यतन भी करें। (तो भी) कभी मन से माया (का प्रभाव) नहीं टलता। (यदि) इस नाशवंत शरीर को कई बार पानी से भी धोएं (तो भी इस शरीर रूपी) कच्ची दीवार कहाँ पवित्र हो सकती है ? हे मन ! प्रभू के नाम की महिमा बहुत बड़ी है। हे नानक ! नाम की बरकति से अनगिनत बुरे कामों वाले जीव (विकारों से) बच जाते हैं।3।
ਬਹੁਤੁ ਸਿਆਣਪ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਬਿਆਪੈ ॥
बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥
हिन्दी अर्थ: (जीव की) बहुती चतुराई (के कारण) जमों का डर (जीव को) आ दबाता है (क्योंकि चतुराई के)
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 265 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 265” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 266 →, पीछे का: ← अंग 264।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।