अंग
270
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੁਖਿ ਤਾ ਕੋ ਜਸੁ ਰਸਨ ਬਖਾਨੈ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੋ ਰਹਤਾ ਧਰਮੁ ॥
ਮਨ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ਕੇਵਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਜਪਤ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਪਤਿ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਵਹਿ ॥੨॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੋ ਰਹਤਾ ਧਰਮੁ ॥
ਮਨ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ਕੇਵਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਜਪਤ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਪਤਿ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਵਹਿ ॥੨॥
मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥
नानक पति सेती घरि जावहि ॥२॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥
नानक पति सेती घरि जावहि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: उसकी वडिआई (अपने) मुंह से जीभ से (सदा) कर। जिस (प्रभू) की कृपा से तेरा धर्म (कायम) रहता है। हे मन ! तू सदा उस परमेश्वर को सिमर। हे नानक ! परमात्मा का भजन करने से (उसकी) दरगाह में मान पाएगा। और (यहाँ से) इज्जत के साथ अपने (परलोक के) घर में जाएगा।2।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਆਰੋਗ ਕੰਚਨ ਦੇਹੀ ॥
ਲਿਵ ਲਾਵਹੁ ਤਿਸੁ ਰਾਮ ਸਨੇਹੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰਾ ਓਲਾ ਰਹਤ ॥
ਮਨ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਤ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੇ ਸਗਲ ਛਿਦ੍ਰ ਢਾਕੇ ॥
ਮਨ ਸਰਨੀ ਪਰੁ ਠਾਕੁਰ ਪ੍ਰਭ ਤਾ ਕੈ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੁਝੁ ਕੋ ਨ ਪਹੂਚੈ ॥
ਮਨ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਊਚੇ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਾਈ ਦ੍ਰੁਲਭ ਦੇਹ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰੇਹ ॥੩॥
ਲਿਵ ਲਾਵਹੁ ਤਿਸੁ ਰਾਮ ਸਨੇਹੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰਾ ਓਲਾ ਰਹਤ ॥
ਮਨ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਤ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੇ ਸਗਲ ਛਿਦ੍ਰ ਢਾਕੇ ॥
ਮਨ ਸਰਨੀ ਪਰੁ ਠਾਕੁਰ ਪ੍ਰਭ ਤਾ ਕੈ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੁਝੁ ਕੋ ਨ ਪਹੂਚੈ ॥
ਮਨ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਊਚੇ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਾਈ ਦ੍ਰੁਲਭ ਦੇਹ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰੇਹ ॥੩॥
जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा ओला रहत ॥
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ॥
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ॥
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह ॥
नानक ता की भगति करेह ॥३॥
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा ओला रहत ॥
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ॥
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ॥
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई द्रुलभ देह ॥
नानक ता की भगति करेह ॥३॥
हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से सोने जैसा तेरा रोग-रहित जिस्म है। उस प्यारे राम से लिव जोड़। जिसकी मेहर से तेरा पर्दा बना रहता है। हे मन ! जिसकी दया से तेरे सारे ऐब ढके रहते हैं। हे मन ! उस प्रभू ठाकुर की शरण पड़। जिस की कृपा से कोई तेरी बराबरी नहीं कर सकता। हे मन ! उस उच्च प्रभू को सांस सांस याद कर। हे नानक ! जिसकी कृपा से तुझे ये मानस शरीर मिला है जो बड़ा मुश्किल से मिलता है। उस प्रभू की भक्ति कर। 3।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਆਭੂਖਨ ਪਹਿਰੀਜੈ ॥
ਮਨ ਤਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਕਿਉ ਆਲਸੁ ਕੀਜੈ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਅਸ੍ਵ ਹਸਤਿ ਅਸਵਾਰੀ ॥
ਮਨ ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਸਾਰੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬਾਗ ਮਿਲਖ ਧਨਾ ॥
ਰਾਖੁ ਪਰੋਇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨੇ ਮਨਾ ॥
ਜਿਨਿ ਤੇਰੀ ਮਨ ਬਨਤ ਬਨਾਈ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸਦ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਈ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਇ ਜੋ ਏਕ ਅਲਖੈ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਰਖੈ ॥੪॥
ਮਨ ਤਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਕਿਉ ਆਲਸੁ ਕੀਜੈ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਅਸ੍ਵ ਹਸਤਿ ਅਸਵਾਰੀ ॥
ਮਨ ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਸਾਰੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬਾਗ ਮਿਲਖ ਧਨਾ ॥
ਰਾਖੁ ਪਰੋਇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨੇ ਮਨਾ ॥
ਜਿਨਿ ਤੇਰੀ ਮਨ ਬਨਤ ਬਨਾਈ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸਦ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਈ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਇ ਜੋ ਏਕ ਅਲਖੈ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਰਖੈ ॥੪॥
जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि अस्व हसति असवारी ॥
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥
राखु परोइ प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ॥
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइ जो एक अलखै ॥
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥४॥
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि अस्व हसति असवारी ॥
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥
राखु परोइ प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ॥
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइ जो एक अलखै ॥
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥४॥
हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से गहने पहनते हैं। हे मन ! उसे सिमरते हुए आलस क्यूँ किया जाय? जिसकी मेहर से घोड़े और हाथियों की सवारी करता है। हे मन ! उस प्रभू को कभी ना विसारना। जिसकी दया से बाग-जमीनें व धन (तुझे नसीब हैं) उस प्रभू को अपने मन में परो के रख। हे मन ! जिस (प्रभू) ने तुझे सजाया है। उठते बैठते (भाव। हर समय) उसी को सदा सिमर। हे नानक ! उस प्रभू को सिमर। जो एक है। और बेअंत है। लोक और परलोक में (वही) तेरी लाज रखने वाला है। 4।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕਰਹਿ ਪੁੰਨ ਬਹੁ ਦਾਨ ॥
ਮਨ ਆਠ ਪਹਰ ਕਰਿ ਤਿਸ ਕਾ ਧਿਆਨ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੂ ਆਚਾਰ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਚਿਤਾਰੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰਾ ਸੁੰਦਰ ਰੂਪੁ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰਹੁ ਸਦਾ ਅਨੂਪੁ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੀ ਨੀਕੀ ਜਾਤਿ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰਿ ਸਦਾ ਦਿਨ ਰਾਤਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੀ ਪਤਿ ਰਹੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਜਸੁ ਕਹੈ ॥੫॥
ਮਨ ਆਠ ਪਹਰ ਕਰਿ ਤਿਸ ਕਾ ਧਿਆਨ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੂ ਆਚਾਰ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਚਿਤਾਰੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰਾ ਸੁੰਦਰ ਰੂਪੁ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰਹੁ ਸਦਾ ਅਨੂਪੁ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੀ ਨੀਕੀ ਜਾਤਿ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰਿ ਸਦਾ ਦਿਨ ਰਾਤਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੀ ਪਤਿ ਰਹੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਜਸੁ ਕਹੈ ॥੫॥
जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ॥
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रूपु ॥
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरी नीकी जाति ॥
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ॥
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥५॥
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ॥
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रूपु ॥
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरी नीकी जाति ॥
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ॥
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥५॥
हिन्दी अर्थ: जिस (प्रभू) की कृपा से बहुत दान-पुंन करता है। हे मन ! आठों पहर उसे याद कर। जिसकी मेहर तू रीतें-रस्में करने के लायक हुआ है। उस प्रभू को श्वास-श्वास याद कर। जिसकी दया से तेरी सुंदर शकल है। उस सुंदर मालिक को सदा सिमर। जिस प्रभू की कृपा से तूझे अच्छी (मनुष्य) जाति मिली है। उसे सदा दिन रात याद कर। जिसकी मेहर से तेरी इज्जत (जगत में) बनी हुई है (उस का नाम सिमर)। गुरू की बरकति लेकर (भाग्यशाली मनुष्य) उसकी सिफत सालाह करता है। 5।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਨਹਿ ਕਰਨ ਨਾਦ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪੇਖਹਿ ਬਿਸਮਾਦ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸਨਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਖਿ ਸਹਜੇ ਬਸਨਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਸਤ ਕਰ ਚਲਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੰਪੂਰਨ ਫਲਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਐਸਾ ਪ੍ਰਭੁ ਤਿਆਗਿ ਅਵਰ ਕਤ ਲਾਗਹੁ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਜਾਗਹੁ ॥੬॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪੇਖਹਿ ਬਿਸਮਾਦ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸਨਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਖਿ ਸਹਜੇ ਬਸਨਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਸਤ ਕਰ ਚਲਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੰਪੂਰਨ ਫਲਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
ਐਸਾ ਪ੍ਰਭੁ ਤਿਆਗਿ ਅਵਰ ਕਤ ਲਾਗਹੁ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਜਾਗਹੁ ॥੬॥
जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥६॥
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥६॥
हिन्दी अर्थ: जिसकी कृपा से तू (अपने) कानों से आवाज सुनता है (भाव। तुझे सुनने की ताकत मिली है)। जिसकी मेहर से आश्चर्यजनक नजारे देखता है; जिसकी बरकति पा के जीभ से मीठे बोल बोलता है; जिसकी कृपा से स्वाभाविक ही सुखी बस रहा है; जिसकी दया से तेरे हाथ (आदि सारे अंग) काम कर रहे हैं। जिसकी मेहर से तू हरेक कार्य-व्यवहार में कामयाब होता है; जिसकी बख्शिश से तुझे ऊँचा दर्जा मिलता है। और तू सुख और बे-फिक्री में मस्त है; ऐसे प्रभू को विसार के तू और किस तरफ लग रहा है? हे नानक ! गुरू की बरकति ले के मन में जागृत हो।6।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੂੰ ਪ੍ਰਗਟੁ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਮੂਲਿ ਨ ਮਨਹੁ ਬਿਸਾਰਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰਾ ਪਰਤਾਪੁ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੂੜ ਤੂ ਤਾ ਕਉ ਜਾਪੁ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੇ ਕਾਰਜ ਪੂਰੇ ॥
ਤਿਸਹਿ ਜਾਨੁ ਮਨ ਸਦਾ ਹਜੂਰੇ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੂੰ ਪਾਵਹਿ ਸਾਚੁ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਸਿਉ ਰਾਚੁ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਭ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਪੁ ਜਪੈ ਜਪੁ ਸੋਇ ॥੭॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਮੂਲਿ ਨ ਮਨਹੁ ਬਿਸਾਰਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰਾ ਪਰਤਾਪੁ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੂੜ ਤੂ ਤਾ ਕਉ ਜਾਪੁ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੇ ਕਾਰਜ ਪੂਰੇ ॥
ਤਿਸਹਿ ਜਾਨੁ ਮਨ ਸਦਾ ਹਜੂਰੇ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੂੰ ਪਾਵਹਿ ਸਾਚੁ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਸਿਉ ਰਾਚੁ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਭ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਪੁ ਜਪੈ ਜਪੁ ਸੋਇ ॥੭॥
जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ॥
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेरे कारज पूरे ॥
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥७॥
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ॥
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेरे कारज पूरे ॥
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रभू की कृपा से तू जगत में शोभा वाला है x हे नानक ! गुरू की बरकति ले के मन में जागृत हो। जिसकी मेहर से तुझे आदर-सम्मान मिला हुआ है। हे मूर्ख मन ! तू उस प्रभू को जप। जिस की कृपा से तेरे (सारे) काम सिरे चढ़ते हैं। हे मन ! तू उस (प्रभू) को सदा अंग-संग जान। जिसकी बरकति से तुझे सत्य प्राप्त होता है। हे मेरे मन ! तू उस (प्रभू) के साथ जुड़ा रह। जिस (परमात्मा) की दया से हरेक (जीव) की (उस तक) पहुँच हो जाती है।(उसे जप)। हे नानक ! (जिसको ये दाति मिलती है) वह (हरी-) जाप ही जपता है। 7।
ਆਪਿ ਜਪਾਏ ਜਪੈ ਸੋ ਨਾਉ ॥
ਆਪਿ ਗਾਵਾਏ ਸੁ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥
ਆਪਿ ਗਾਵਾਏ ਸੁ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥
आपि जपाए जपै सो नाउ ॥
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥
हिन्दी अर्थ: वही मनुष्य प्रभू का नाम जपता है जिससे आप जपाता है। वही मनुष्य हरी के गुण गाता है जिसे गाने के लिए प्रेरता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 270 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 270” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 271 →, पीछे का: ← अंग 269।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।