अंग 204

अंग
204
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਕਵਨ ਗੁਨ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਮਿਲਉ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰੂਪ ਹੀਨ ਬੁਧਿ ਬਲ ਹੀਨੀ ਮੋਹਿ ਪਰਦੇਸਨਿ ਦੂਰ ਤੇ ਆਈ ॥੧॥
ਨਾਹਿਨ ਦਰਬੁ ਨ ਜੋਬਨ ਮਾਤੀ ਮੋਹਿ ਅਨਾਥ ਕੀ ਕਰਹੁ ਸਮਾਈ ॥੨॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਭਈ ਬੈਰਾਗਨਿ ਪ੍ਰਭ ਦਰਸਨ ਕਉ ਹਉ ਫਿਰਤ ਤਿਸਾਈ ॥੩॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮੇਰੀ ਜਲਨਿ ਬੁਝਾਈ ॥੪॥੧॥੧੧੮॥
रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन गुन प्रानपति मिलउ मेरी माई ॥१॥ रहाउ ॥
रूप हीन बुधि बल हीनी मोहि परदेसनि दूर ते आई ॥१॥
नाहिन दरबु न जोबन माती मोहि अनाथ की करहु समाई ॥२॥
खोजत खोजत भई बैरागनि प्रभ दरसन कउ हउ फिरत तिसाई ॥३॥
दीन दइआल क्रिपाल प्रभ नानक साधसंगि मेरी जलनि बुझाई ॥४॥१॥११८॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरी माँ !मैं कौन से गुणों के बल पर अपनी जीवात्मा के मालिक प्रभू को मिल सकूँ? (मेरे में तो कोई भी गुण नहीं)। 1। रहाउ। (हे मेरी माँ !) मैं आत्मिक रूप से खाली हूँ~ बुद्धि हीन हूँ~ (मेरे अंदर आत्मिक) शक्ति भी नहीं है (फिर) मैं परदेसन हूँ (मैंने प्रभू चरणों को कभी भी अपनी घर नहीं बनाया) अनेको जूनियों की यात्रा पार कर के (इस मानस जन्म में) आई हूँ। 1। (हे मेरे प्राणपति !) मेरे पास तेरा नाम-धन नहीं है~ मेरे अंदर आत्मिक गुणों का जोबन भी नहीं जिसका मुझे हुलारा आ सके (और मैं गर्व कर सकूँ)। मुझ अनाथ को अपने चरणों में जोड़ ले। (हे मेरी माँ !) अपने प्राणपति प्रभू के दर्शनों के लिए मैं प्यासी फिर रही हूँ~ उसे ढूँढती-ढूँढती मैं कमली हुई पड़ी हूँ। हे नानक ! (कह,) हे दीनों पर दया करने वाले ! हे कृपा के घर ! हे प्रभू ! (तेरी मेहर से) साध-संगति ने मेरी ये विछोड़े की जलन बुझा दी है। 4। 1। 118।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਭ ਮਿਲਬੇ ਕਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਮਨਿ ਲਾਗੀ ॥
ਪਾਇ ਲਗਉ ਮੋਹਿ ਕਰਉ ਬੇਨਤੀ ਕੋਊ ਸੰਤੁ ਮਿਲੈ ਬਡਭਾਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਅਰਪਉ ਧਨੁ ਰਾਖਉ ਆਗੈ ਮਨ ਕੀ ਮਤਿ ਮੋਹਿ ਸਗਲ ਤਿਆਗੀ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਹਰਿ ਕਥਾ ਸੁਨਾਵੈ ਅਨਦਿਨੁ ਫਿਰਉ ਤਿਸੁ ਪਿਛੈ ਵਿਰਾਗੀ ॥੧॥
ਪੂਰਬ ਕਰਮ ਅੰਕੁਰ ਜਬ ਪ੍ਰਗਟੇ ਭੇਟਿਓ ਪੁਰਖੁ ਰਸਿਕ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਮਿਟਿਓ ਅੰਧੇਰੁ ਮਿਲਤ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਸੋਈ ਜਾਗੀ ॥੨॥੨॥੧੧੯॥
गउड़ी महला ५ ॥
प्रभ मिलबे कउ प्रीति मनि लागी ॥
पाइ लगउ मोहि करउ बेनती कोऊ संतु मिलै बडभागी ॥१॥ रहाउ ॥
मनु अरपउ धनु राखउ आगै मन की मति मोहि सगल तिआगी ॥
जो प्रभ की हरि कथा सुनावै अनदिनु फिरउ तिसु पिछै विरागी ॥१॥
पूरब करम अंकुर जब प्रगटे भेटिओ पुरखु रसिक बैरागी ॥
मिटिओ अंधेरु मिलत हरि नानक जनम जनम की सोई जागी ॥२॥२॥११९॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे बहिन !) परमात्मा को मिलने के लिए मेरे मन में प्रीति पैदा हो गई है। (परमात्मा के साथ मिला सकने वाला अगर) बड़े भाग्यों वाला (गुरू-) संत मुझे मिल जाए तो मैं उसके पैर लगूँ। मैं उसके समक्ष बिनती करूँ (कि मुझे परमात्मा से मिला दे)। 1। रहाउ। मैं अपना मन उसके हवाले कर दूँ~ मैं अपना धन उसके आगे रख दूँ। (हे बहिन !) मैंने अपने मन की सारी चतुराई छोड़ दी है। (हे बहिन !) जो (बड़े भाग्य वाला संत मुझे) परमात्मा के सिफत सालाह की बातें मुझे सुनाता रहे~ मैं हर वक्त उसके पीछे-पीछे प्रेम में कमली हुई फिरती रहूँ। 1। हे नानक ! (कह,) पहले जन्मों में किए भले कर्मों के संस्कारों के अंगूर जिस जीव स्त्री के प्रकट हो गए~ उसको वह सर्व-व्यापक प्रभू मिल पड़ा है। जो सभी जीवों में बैठा सभी रस भोगने वाला है ओर जो रसों से निर्लिप भी है। परमात्मा को मिलते ही उस जीव स्त्री के अंदर से मोह का अंधकार दूर हो जाता है। वह अनेकों जन्मों से माया के मोह में सोई हुई जाग पड़ती है। 2। 2। 119।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਿਕਸੁ ਰੇ ਪੰਖੀ ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਪਾਂਖ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਗਹੁ ਪੂਰਨ ਰਾਮ ਰਤਨੁ ਹੀਅਰੇ ਸੰਗਿ ਰਾਖੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕੀ ਕੂਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਰਸ ਪੰਕਜ ਅਤਿ ਤੀਖੵਣ ਮੋਹ ਕੀ ਫਾਸ ॥
ਕਾਟਨਹਾਰ ਜਗਤ ਗੁਰ ਗੋਬਿਦ ਚਰਨ ਕਮਲ ਤਾ ਕੇ ਕਰਹੁ ਨਿਵਾਸ ॥੧॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਗੋਬਿੰਦ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰੀਤਮ ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਸੁਨਹੁ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੇਹੁ ਨਾਨਕ ਕੇ ਸੁਆਮੀ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੁਮਰੀ ਰਾਸਿ ॥੨॥੩॥੧੨੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
निकसु रे पंखी सिमरि हरि पांख ॥
मिलि साधू सरणि गहु पूरन राम रतनु हीअरे संगि राखु ॥१॥ रहाउ ॥
भ्रम की कूई त्रिसना रस पंकज अति तीखॵण मोह की फास ॥
काटनहार जगत गुर गोबिद चरन कमल ता के करहु निवास ॥१॥
करि किरपा गोबिंद प्रभ प्रीतम दीना नाथ सुनहु अरदासि ॥
करु गहि लेहु नानक के सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरी रासि ॥२॥३॥१२०॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे जीव-पक्षी ! (माया के मोह के घोंसले से बाहर) निकल। परमात्मा का सिमरन कर। (प्रभू का सिमरन) पंख हैं (इन पंखों की मदद से ही तू मोह के घोसले से उड़ के बाहर जा सकेगा)। (हे भाई !) गुरू को मिल के पूरन प्रभू का आसरा ले~ परमात्मा नाम-रत्न अपने हृदय में (संभाल के) रख। 1। रहाउ। (हे भाई ! माया की खातिर) भटकना का कूआँ है~ माया की तृष्णा और विकारों के चस्के (उस कूएं में) कीचड़ हैं~ (जीवों के गले में पड़ी हुई) मोह की फाही बड़ी पक्की (तीखी) है। इस फांसी के काटने के काबिल जगत का गुरू गोबिंद ही है। (हे भाई !) उस गोबिंद के चरन-कमलों में निवास किए रह। 1। हे गोबिंद ! हे प्रीतम प्रभू ! हे गरीबों के मालिक ! हे नानक के स्वामी ! मेहर कर~ मेरी बिनती सुन~ मेरा हाथ पकड़ ले (और मुझे इस कूएं में से निकाल ले) मेरी ये जीवात्मा तेरी दी हुई राशि है~ मेरा ये शरीर तेरी बख्शी हुई पूँजी है (इस राशि-पूँजी को मोह के हाथों उजड़ने से तू स्वयं ही बचा ले)। 2। 3। 120।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਪੇਖਨ ਕਉ ਸਿਮਰਤ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ॥
ਆਸ ਪਿਆਸੀ ਚਿਤਵਉ ਦਿਨੁ ਰੈਨੀ ਹੈ ਕੋਈ ਸੰਤੁ ਮਿਲਾਵੈ ਨੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੇਵਾ ਕਰਉ ਦਾਸ ਦਾਸਨ ਕੀ ਅਨਿਕ ਭਾਂਤਿ ਤਿਸੁ ਕਰਉ ਨਿਹੋਰਾ ॥
ਤੁਲਾ ਧਾਰਿ ਤੋਲੇ ਸੁਖ ਸਗਲੇ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਦਰਸ ਸਭੋ ਹੀ ਥੋਰਾ ॥੧॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਗਾਏ ਗੁਨ ਸਾਗਰ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੋ ਜਾਤ ਬਹੋਰਾ ॥
ਆਨਦ ਸੂਖ ਭੇਟਤ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਜਨਮੁ ਕ੍ਰਿਤਾਰਥੁ ਸਫਲੁ ਸਵੇਰਾ ॥੨॥੪॥੧੨੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि पेखन कउ सिमरत मनु मेरा ॥
आस पिआसी चितवउ दिनु रैनी है कोई संतु मिलावै नेरा ॥१॥ रहाउ ॥
सेवा करउ दास दासन की अनिक भांति तिसु करउ निहोरा ॥
तुला धारि तोले सुख सगले बिनु हरि दरस सभो ही थोरा ॥१॥
संत प्रसादि गाए गुन सागर जनम जनम को जात बहोरा ॥
आनद सूख भेटत हरि नानक जनमु क्रितारथु सफलु सवेरा ॥२॥४॥१२१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे बहिन !) प्रभू पति का दर्शन करने के लिए मेरा मन उसका सिमरन कर रहा है। उसके दर्शन की आस से व्याकुल हुई मैं दिन रात उसका नाम याद करती रहती हूँ। (हे बहिन ! मुझे) कोई ऐसा संत (मिल जाए~ जो मुझे उस प्रभू-पति से) नजदीक ही मिला दे। 1। रहाउ। (हे बहिन ! अगर वह गुरू संत मिल जाए तो) मैं उसके दासों की सेवा करूँ~ मैं अनकों तरीकों से उसके आगे मिन्नतें करूँ। (हे बहिन !) तराजू पे रख के मैंने (दुनिया के) सारे सुख तोले हैं~ प्रभू-पति के दर्शनों के बिना ये सारे ही सुख (तेरे दर्शन के सुख से) हल्के हैं। 1। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की कृपा से गुणों के समुंद्र परमात्मा के गुण गाता है (गुरू परमेश्वर उसे) अनेकों जन्मों के भटकते को (जनम-जनम के चक्करों में से) वापस ले आता है। हे नानक ! परमात्मा को मिलने से बेअंत सुख आनंद प्राप्त हो जाते हैं~ मानस जनम का मनोरथ पूरा हो जाता है। जनम समय रहते (इसी जन्म में) सफल हो जाता है। 2। 4। 121।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਕਿਨ ਬਿਧਿ ਮਿਲੈ ਗੁਸਾਈ ਮੇਰੇ ਰਾਮ ਰਾਇ ॥
ਕੋਈ ਐਸਾ ਸੰਤੁ ਸਹਜ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮੋਹਿ ਮਾਰਗੁ ਦੇਇ ਬਤਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि मिलै गुसाई मेरे राम राइ ॥
कोई ऐसा संतु सहज सुखदाता मोहि मारगु देइ बताई ॥१॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरे प्रभू बादशाह ! मुझे धरती का पति प्रभू किन तरीकों से मिल सकता है? आत्मिक अडोलता का आनंद देने वाला कोई ऐसा संत मुझे मिल जाए~ जो मुझे रास्ता बता दे। 1। रहाउ।

संदर्भ: यह अंग 204 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 32 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 204” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 205 →, पीछे का: ← अंग 203

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।