अंग
307
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਗੁਰੂ ਧਿਆਇਦਾ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤੁਸਿ ਦਿਤੀ ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਘਟੈ ਨਾਹੀ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਕਿਸੈ ਦੀ ਘਟਾਈ ॥
ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੈ ਵਲਿ ਹੈ ਤਾਂ ਝਖਿ ਝਖਿ ਮਰੈ ਸਭ ਲੋੁਕਾਈ ॥
ਨਿੰਦਕਾ ਕੇ ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਕਰੇ ਹਰਿ ਕਰਤੈ ਆਪਿ ਵਧਾਈ ॥
ਜਿਉ ਜਿਉ ਨਿੰਦਕ ਨਿੰਦ ਕਰਹਿ ਤਿਉ ਤਿਉ ਨਿਤ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਆਰਾਧਿਆ ਤਿਨਿ ਪੈਰੀ ਆਣਿ ਸਭ ਪਾਈ ॥੧॥
ਤੁਸਿ ਦਿਤੀ ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਘਟੈ ਨਾਹੀ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਕਿਸੈ ਦੀ ਘਟਾਈ ॥
ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੈ ਵਲਿ ਹੈ ਤਾਂ ਝਖਿ ਝਖਿ ਮਰੈ ਸਭ ਲੋੁਕਾਈ ॥
ਨਿੰਦਕਾ ਕੇ ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਕਰੇ ਹਰਿ ਕਰਤੈ ਆਪਿ ਵਧਾਈ ॥
ਜਿਉ ਜਿਉ ਨਿੰਦਕ ਨਿੰਦ ਕਰਹਿ ਤਿਉ ਤਿਉ ਨਿਤ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਆਰਾਧਿਆ ਤਿਨਿ ਪੈਰੀ ਆਣਿ ਸਭ ਪਾਈ ॥੧॥
अंतरि हरि गुरू धिआइदा वडी वडिआई ॥
तुसि दिती पूरै सतिगुरू घटै नाही इकु तिलु किसै दी घटाई ॥
सचु साहिबु सतिगुरू कै वलि है तां झखि झखि मरै सभ लोुकाई ॥
निंदका के मुह काले करे हरि करतै आपि वधाई ॥
जिउ जिउ निंदक निंद करहि तिउ तिउ नित नित चड़ै सवाई ॥
जन नानक हरि आराधिआ तिनि पैरी आणि सभ पाई ॥१॥
तुसि दिती पूरै सतिगुरू घटै नाही इकु तिलु किसै दी घटाई ॥
सचु साहिबु सतिगुरू कै वलि है तां झखि झखि मरै सभ लोुकाई ॥
निंदका के मुह काले करे हरि करतै आपि वधाई ॥
जिउ जिउ निंदक निंद करहि तिउ तिउ नित नित चड़ै सवाई ॥
जन नानक हरि आराधिआ तिनि पैरी आणि सभ पाई ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की वडिआई बड़ी है (महिमा अपार है) (क्योंकि वह) हरी को हृदय में सिमरता है; पूरे प्रभू ने सतिगुरू को प्रसन्न हो के (इही वडिआई) बख्शी है (इस करके) किसी के घटाने से रक्ती भर भी नहीं घटती। जब सच्चा पति प्रभू सतिगुरू का अंग पालता है। तो सारी दुनिया (भले ही) पड़ी झक्खें मारे (सतिगुरू का कुछ बिगाड़ नहीं सकती); सतिगुरू की महिमा सृजनहार ने खुद बढ़ाई है और दोखियों के मुँह काले किए हैं। ज्यों-ज्यों निंदक मनुष्य। सतिगुरू की निंदा करते हैं। त्यों-त्यों सतिगुरू की महिमा बढ़ती है। हे दास नानक ! (सतिगुरू ने जिस) प्रभू का सिमरन किया है। उस (प्रभू) ने सारी सृष्टि ला के सतिगुरू के पैरों पर डाल दी है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਤੀ ਗਣਤ ਜਿ ਰਖੈ ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ਗਇਆ ॥
ਨਿਤ ਝਹੀਆ ਪਾਏ ਝਗੂ ਸੁਟੇ ਝਖਦਾ ਝਖਦਾ ਝੜਿ ਪਇਆ ॥
ਨਿਤ ਉਪਾਵ ਕਰੈ ਮਾਇਆ ਧਨ ਕਾਰਣਿ ਅਗਲਾ ਧਨੁ ਭੀ ਉਡਿ ਗਇਆ ॥
ਕਿਆ ਓਹੁ ਖਟੇ ਕਿਆ ਓਹੁ ਖਾਵੈ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਸਹਸਾ ਦੁਖੁ ਪਇਆ ॥
ਨਿਰਵੈਰੈ ਨਾਲਿ ਜਿ ਵੈਰੁ ਰਚਾਏ ਸਭੁ ਪਾਪੁ ਜਗਤੈ ਕਾ ਤਿਨਿ ਸਿਰਿ ਲਇਆ ॥
ਓਸੁ ਅਗੈ ਪਿਛੈ ਢੋਈ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਨਿੰਦਾ ਮੁਹਿ ਅੰਬੁ ਪਇਆ ॥
ਜੇ ਸੁਇਨੇ ਨੋ ਓਹੁ ਹਥੁ ਪਾਏ ਤਾ ਖੇਹੂ ਸੇਤੀ ਰਲਿ ਗਇਆ ॥
ਜੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣੀ ਫਿਰਿ ਓਹੁ ਆਵੈ ਤਾ ਪਿਛਲੇ ਅਉਗਣ ਬਖਸਿ ਲਇਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਕਿਲਵਿਖ ਪਾਪ ਗਇਆ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਤੀ ਗਣਤ ਜਿ ਰਖੈ ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ਗਇਆ ॥
ਨਿਤ ਝਹੀਆ ਪਾਏ ਝਗੂ ਸੁਟੇ ਝਖਦਾ ਝਖਦਾ ਝੜਿ ਪਇਆ ॥
ਨਿਤ ਉਪਾਵ ਕਰੈ ਮਾਇਆ ਧਨ ਕਾਰਣਿ ਅਗਲਾ ਧਨੁ ਭੀ ਉਡਿ ਗਇਆ ॥
ਕਿਆ ਓਹੁ ਖਟੇ ਕਿਆ ਓਹੁ ਖਾਵੈ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਸਹਸਾ ਦੁਖੁ ਪਇਆ ॥
ਨਿਰਵੈਰੈ ਨਾਲਿ ਜਿ ਵੈਰੁ ਰਚਾਏ ਸਭੁ ਪਾਪੁ ਜਗਤੈ ਕਾ ਤਿਨਿ ਸਿਰਿ ਲਇਆ ॥
ਓਸੁ ਅਗੈ ਪਿਛੈ ਢੋਈ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਨਿੰਦਾ ਮੁਹਿ ਅੰਬੁ ਪਇਆ ॥
ਜੇ ਸੁਇਨੇ ਨੋ ਓਹੁ ਹਥੁ ਪਾਏ ਤਾ ਖੇਹੂ ਸੇਤੀ ਰਲਿ ਗਇਆ ॥
ਜੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣੀ ਫਿਰਿ ਓਹੁ ਆਵੈ ਤਾ ਪਿਛਲੇ ਅਉਗਣ ਬਖਸਿ ਲਇਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਕਿਲਵਿਖ ਪਾਪ ਗਇਆ ॥੨॥
मः ४ ॥
सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥
नित झहीआ पाए झगू सुटे झखदा झखदा झड़ि पइआ ॥
नित उपाव करै माइआ धन कारणि अगला धनु भी उडि गइआ ॥
किआ ओहु खटे किआ ओहु खावै जिसु अंदरि सहसा दुखु पइआ ॥
निरवैरै नालि जि वैरु रचाए सभु पापु जगतै का तिनि सिरि लइआ ॥
ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अंबु पइआ ॥
जे सुइने नो ओहु हथु पाए ता खेहू सेती रलि गइआ ॥
जे गुर की सरणी फिरि ओहु आवै ता पिछले अउगण बखसि लइआ ॥
जन नानक अनदिनु नामु धिआइआ हरि सिमरत किलविख पाप गइआ ॥२॥
सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥
नित झहीआ पाए झगू सुटे झखदा झखदा झड़ि पइआ ॥
नित उपाव करै माइआ धन कारणि अगला धनु भी उडि गइआ ॥
किआ ओहु खटे किआ ओहु खावै जिसु अंदरि सहसा दुखु पइआ ॥
निरवैरै नालि जि वैरु रचाए सभु पापु जगतै का तिनि सिरि लइआ ॥
ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अंबु पइआ ॥
जे सुइने नो ओहु हथु पाए ता खेहू सेती रलि गइआ ॥
जे गुर की सरणी फिरि ओहु आवै ता पिछले अउगण बखसि लइआ ॥
जन नानक अनदिनु नामु धिआइआ हरि सिमरत किलविख पाप गइआ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४ ॥ जो मनुष्य सतिगुरू के साथ द्वैष रखता है। उसके लोक व परलोक समूचे ही व्यर्थ जाते हैं। (उसकी पेश तो चलती नहीं। इस करके वह) सदा दाँत पीसता है। झाग फेंकता है (और अंत को) खप-खप के नष्ट हो जाता है (आत्मिक मौत सहेड़ लेता है)। (सतिगुरू का वह दोखी) सदा माया के लिए उपाय करता है। पर उसका पहले का (कमाया हुआ) भी हाथों से जाता रहता है। जिस मनुष्य के हृदय में ये चिंता और जलन हो। उसने कमाना क्या और खाना क्या? (भाव। ना वह कुछ कमा सकता है ना ही कमाए हुए का आनंद ले सकता है)। जो मनुष्य निर्वैर के साथ वैर करता है वह सारे संसार के पापों (का भार) अपने सिर पर लेता है। उसे लोक-परलोक में कोई आसरा नहीं देता। जिसके हृदय में तो निंदा हो। पर मुँह में आम पड़ा हो (अर्थात। जो मुँह से मीठा बोले)। ऐसा खोटा मनुष्य अगर सोने को हाथ डाले तो वह भी राख में मिल जाता है। फिर भी (अर्थात ऐसा पापी होते हुए भी) अगर वह सतिगुरू के चरणों में गिर पड़े तो सतिगुरू उसके पिछले अवगुणों को बख्श देता है। हे नानक ! जो मनुष्य (सतिगुरू की शरण पड़ कर) हर रोज नाम जपता है। प्रभू को सिमरते हुए उसके सारे पाप दूर हो जाते हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂਹੈ ਸਚਾ ਸਚੁ ਤੂ ਸਭ ਦੂ ਉਪਰਿ ਤੂ ਦੀਬਾਣੁ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸਚੁ ਧਿਆਇਦੇ ਸਚੁ ਸੇਵਨਿ ਸਚੇ ਤੇਰਾ ਮਾਣੁ ॥
ਓਨਾ ਅੰਦਰਿ ਸਚੁ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਸਚੁ ਬੋਲਨਿ ਸਚੇ ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ॥
ਸੇ ਭਗਤ ਜਿਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਲਾਹਿਆ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥
ਸਚੁ ਜਿ ਸਚੇ ਸੇਵਦੇ ਤਿਨ ਵਾਰੀ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੧੩॥
ਤੂਹੈ ਸਚਾ ਸਚੁ ਤੂ ਸਭ ਦੂ ਉਪਰਿ ਤੂ ਦੀਬਾਣੁ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸਚੁ ਧਿਆਇਦੇ ਸਚੁ ਸੇਵਨਿ ਸਚੇ ਤੇਰਾ ਮਾਣੁ ॥
ਓਨਾ ਅੰਦਰਿ ਸਚੁ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਸਚੁ ਬੋਲਨਿ ਸਚੇ ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ॥
ਸੇ ਭਗਤ ਜਿਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਲਾਹਿਆ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥
ਸਚੁ ਜਿ ਸਚੇ ਸੇਵਦੇ ਤਿਨ ਵਾਰੀ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੧੩॥
पउड़ी ॥
तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥
जो तुधु सचु धिआइदे सचु सेवनि सचे तेरा माणु ॥
ओना अंदरि सचु मुख उजले सचु बोलनि सचे तेरा ताणु ॥
से भगत जिनी गुरमुखि सालाहिआ सचु सबदु नीसाणु ॥
सचु जि सचे सेवदे तिन वारी सद कुरबाणु ॥१३॥
तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥
जो तुधु सचु धिआइदे सचु सेवनि सचे तेरा माणु ॥
ओना अंदरि सचु मुख उजले सचु बोलनि सचे तेरा ताणु ॥
से भगत जिनी गुरमुखि सालाहिआ सचु सबदु नीसाणु ॥
सचु जि सचे सेवदे तिन वारी सद कुरबाणु ॥१३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सच्चे प्रभू ! तू ही सबसे बड़ा (जीवों का) आसरा है। जो तेरा सिमरन करते हैं। तेरी सेवा करते हैं। उनको तेरा ही मान है। उनके हृदय में सच है (इस करके उनके) माथे खिले रहते हैं। और। हे सच्चे हरी ! वह तेरा सदा स्थिर रहने वाला नाम उचारते हैं। और तेरा उन्हें भरोसा है (ताण है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख रहके हरी की सिफत-सालाह करते हैं। वही सच्चे भक्त हैं और उनके पास सच्चा शबद-रूप निशान है। मैं सदके हूँ कुर्बान हूँ उन पर से जो सच्चे प्रभू को तन से-मन से सिमरते हैं। 13।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਧੁਰਿ ਮਾਰੇ ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੇਈ ਹੁਣਿ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਾਰੇ ॥
ਜੇ ਮੇਲਣ ਨੋ ਬਹੁਤੇਰਾ ਲੋਚੀਐ ਨ ਦੇਈ ਮਿਲਣ ਕਰਤਾਰੇ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਢੋਈ ਨਾ ਲਹਨਿ ਵਿਚਿ ਸੰਗਤਿ ਗੁਰਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਕੋਈ ਜਾਇ ਮਿਲੈ ਹੁਣਿ ਓਨਾ ਨੋ ਤਿਸੁ ਮਾਰੇ ਜਮੁ ਜੰਦਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਬਾਬੈ ਫਿਟਕੇ ਸੇ ਫਿਟੇ ਗੁਰਿ ਅੰਗਦਿ ਕੀਤੇ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਤੀਜੀ ਪੀੜੀ ਵੀਚਾਰਿਆ ਕਿਆ ਹਥਿ ਏਨਾ ਵੇਚਾਰੇ ॥
ਗੁਰੁ ਚਉਥੀ ਪੀੜੀ ਟਿਕਿਆ ਤਿਨਿ ਨਿੰਦਕ ਦੁਸਟ ਸਭਿ ਤਾਰੇ ॥
ਕੋਈ ਪੁਤੁ ਸਿਖੁ ਸੇਵਾ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੀ ਤਿਸੁ ਕਾਰਜ ਸਭਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਜੋ ਇਛੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਇਸੀ ਪੁਤੁ ਧਨੁ ਲਖਮੀ ਖੜਿ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥
ਸਭਿ ਨਿਧਾਨ ਸਤਿਗੁਰੂ ਵਿਚਿ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਹਰਿ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਸੋ ਪਾਏ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਲਿਖਤੁ ਲਿਲਾਰੇ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਗੈ ਧੂੜਿ ਤਿਨ ਜੋ ਗੁਰਸਿਖ ਮਿਤ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥
ਧੁਰਿ ਮਾਰੇ ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੇਈ ਹੁਣਿ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਾਰੇ ॥
ਜੇ ਮੇਲਣ ਨੋ ਬਹੁਤੇਰਾ ਲੋਚੀਐ ਨ ਦੇਈ ਮਿਲਣ ਕਰਤਾਰੇ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਢੋਈ ਨਾ ਲਹਨਿ ਵਿਚਿ ਸੰਗਤਿ ਗੁਰਿ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਕੋਈ ਜਾਇ ਮਿਲੈ ਹੁਣਿ ਓਨਾ ਨੋ ਤਿਸੁ ਮਾਰੇ ਜਮੁ ਜੰਦਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਬਾਬੈ ਫਿਟਕੇ ਸੇ ਫਿਟੇ ਗੁਰਿ ਅੰਗਦਿ ਕੀਤੇ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਤੀਜੀ ਪੀੜੀ ਵੀਚਾਰਿਆ ਕਿਆ ਹਥਿ ਏਨਾ ਵੇਚਾਰੇ ॥
ਗੁਰੁ ਚਉਥੀ ਪੀੜੀ ਟਿਕਿਆ ਤਿਨਿ ਨਿੰਦਕ ਦੁਸਟ ਸਭਿ ਤਾਰੇ ॥
ਕੋਈ ਪੁਤੁ ਸਿਖੁ ਸੇਵਾ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੀ ਤਿਸੁ ਕਾਰਜ ਸਭਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਜੋ ਇਛੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਇਸੀ ਪੁਤੁ ਧਨੁ ਲਖਮੀ ਖੜਿ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥
ਸਭਿ ਨਿਧਾਨ ਸਤਿਗੁਰੂ ਵਿਚਿ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਹਰਿ ਉਰ ਧਾਰੇ ॥
ਸੋ ਪਾਏ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਲਿਖਤੁ ਲਿਲਾਰੇ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਗੈ ਧੂੜਿ ਤਿਨ ਜੋ ਗੁਰਸਿਖ ਮਿਤ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥
जे मेलण नो बहुतेरा लोचीऐ न देई मिलण करतारे ॥
सतसंगति ढोई ना लहनि विचि संगति गुरि वीचारे ॥
कोई जाइ मिलै हुणि ओना नो तिसु मारे जमु जंदारे ॥
गुरि बाबै फिटके से फिटे गुरि अंगदि कीते कूड़िआरे ॥
गुरि तीजी पीड़ी वीचारिआ किआ हथि एना वेचारे ॥
गुरु चउथी पीड़ी टिकिआ तिनि निंदक दुसट सभि तारे ॥
कोई पुतु सिखु सेवा करे सतिगुरू की तिसु कारज सभि सवारे ॥
जो इछै सो फलु पाइसी पुतु धनु लखमी खड़ि मेले हरि निसतारे ॥
सभि निधान सतिगुरू विचि जिसु अंदरि हरि उर धारे ॥
सो पाए पूरा सतिगुरू जिसु लिखिआ लिखतु लिलारे ॥
जनु नानकु मागै धूड़ि तिन जो गुरसिख मित पिआरे ॥१॥
धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥
जे मेलण नो बहुतेरा लोचीऐ न देई मिलण करतारे ॥
सतसंगति ढोई ना लहनि विचि संगति गुरि वीचारे ॥
कोई जाइ मिलै हुणि ओना नो तिसु मारे जमु जंदारे ॥
गुरि बाबै फिटके से फिटे गुरि अंगदि कीते कूड़िआरे ॥
गुरि तीजी पीड़ी वीचारिआ किआ हथि एना वेचारे ॥
गुरु चउथी पीड़ी टिकिआ तिनि निंदक दुसट सभि तारे ॥
कोई पुतु सिखु सेवा करे सतिगुरू की तिसु कारज सभि सवारे ॥
जो इछै सो फलु पाइसी पुतु धनु लखमी खड़ि मेले हरि निसतारे ॥
सभि निधान सतिगुरू विचि जिसु अंदरि हरि उर धारे ॥
सो पाए पूरा सतिगुरू जिसु लिखिआ लिखतु लिलारे ॥
जनु नानकु मागै धूड़ि तिन जो गुरसिख मित पिआरे ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ जो पहले से पूरे सतिगुरू ने धिक्कारे हैं। वह अब (फिर) सतिगुरू की ओर से मारे गए हैं (भाव। सतिगुरू की ओर से मनमुख हुए पड़े हैं)। अगर उन्हें (सतिगुरू से) मिलाने के लिए बहुत सारी चाहत (कोशिश) भी करें (तो भी) सृजनहार उन्हें मिलने नहीं देता। उन्हें सत्संग में भी राहत (जगह) नहीं मिलती – गुरू ने भी संगति में यही विचार की है। ऐसे वक्त पर अगर कोई उनका जा के साथी बने। उसे भी जमदूत दण्ड देता है (वह मनुष्य भी मन-मुखता वाले काम ही करेगा। जिस करके जम-मार्ग का भागी बनेगा)। जिन मनुष्यों को बाबे (गुरू नानक देव जी) ने मनमुख करार दिया। उन अहंकारियों को गुरू अंगद (देव जी) ने भी झूठा बताया। तीसरे स्थान पर बैठे गुरू ने विचार की कि इन कंगालों के क्या वश? जिसने चौथे स्थान पर बैठे को गुरू स्थापित किया, सो उस ने सारे निंदक और दुष्ट तार दिए (भाव। अहंकार और तिरस्कार से बचा लिए)। पुत्र हो या सिख। जो कोई (भी) सतिगुरू की सेवा करता है सतिगुरू उासके सारे काम सवारता है – पुत्र। धन। लक्ष्मी। जिस भी चीज की वह इच्छा करे। वही फल उसे मिलता है। (सतिगुरू) उसको ले जा के (प्रभू से) मिलाता है और प्रभू (उसको) पार उतारता है। (सिरे की बात)। जिस सतिगुरू के हृदय में प्रभू टिका हुआ है। उस में सारे खजाने हैं। जिस (मनुष्य) के माथे पर (पिछले किए अच्छे कर्मों के संस्कार रूपी) लेख लिखे हुए हैं। वह पूरे सतिगुरू को मिल जाता है। (इस तरह के) जो मित्र-प्यारे गुरू के सिख हैं। उनके चरणों की धूड़ दास नानक (भी) मांगता है। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 307 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 307” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 308 →, पीछे का: ← अंग 306।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।