अंग
183
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਡੂਬਤ ਪਾਹਨ ਤਰੇ ॥੩॥
ਸੰਤ ਸਭਾ ਕਉ ਸਦਾ ਜੈਕਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰੀ ਸੁਣੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮੋ ਕਉ ਨਾਮ ਨਿਵਾਸਿ ॥੪॥੨੧॥੯੦॥
ਸੰਤ ਸਭਾ ਕਉ ਸਦਾ ਜੈਕਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰੀ ਸੁਣੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮੋ ਕਉ ਨਾਮ ਨਿਵਾਸਿ ॥੪॥੨੧॥੯੦॥
जिसु सिमरत डूबत पाहन तरे ॥३॥
संत सभा कउ सदा जैकारु ॥
हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥
कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥
संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥४॥२१॥९०॥
संत सभा कउ सदा जैकारु ॥
हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥
कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥
संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥४॥२१॥९०॥
हिन्दी अर्थ: जिसका नाम सिमरने से पत्थर दिल व्याक्ति (कठोरता के समुंद्र में) डूबने से बच जाते हैं~ (तू भी गुरू की शरण पड़ कर उसका नाम सिमर)। 3। (हे भाई !) साध-संगति के आगे हमेशा सिर झुकाओ~ क्योंकि परमात्मा का नाम साध जनों (गुरमुखों) की जिंदगी का आसरा होता है~ (उनकी संगति में तुझे भी नाम की प्राप्ति होगी)। हे नानक ! कह, (करतार ने) मेरी विनती सुन ली और उसने गुरू की कृपा से मुझे अपने नाम के घर में (टिका दिया) है। 4। 21। 90।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਦਰਸਨਿ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟਤ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਮਨੁ ਡੋਲੈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ॥੧॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਸਾਚਾ ਜਾ ਸਚ ਮਹਿ ਰਾਤੇ ॥
ਸੀਤਲ ਸਾਤਿ ਗੁਰ ਤੇ ਪ੍ਰਭ ਜਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਗਲ ਦੁਖ ਮਿਟੇ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬੰਧਨ ਤੇ ਛੁਟੇ ॥੨॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਮਿਟੇ ਮੋਹ ਭਰਮ ॥
ਸਾਧ ਰੇਣ ਮਜਨ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
ਸਾਧਾ ਮਹਿ ਇਹ ਹਮਰੀ ਜਿੰਦੁ ॥੩॥
ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਕਿਰਪਾਲ ਧਿਆਵਉ ॥ ਸਾਧਸੰਗਿ ਤਾ ਬੈਠਣੁ ਪਾਵਉ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਣ ਕਉ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੀ ਦਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥੪॥੨੨॥੯੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਦਰਸਨਿ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟਤ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਮਨੁ ਡੋਲੈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ॥੧॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਸਾਚਾ ਜਾ ਸਚ ਮਹਿ ਰਾਤੇ ॥
ਸੀਤਲ ਸਾਤਿ ਗੁਰ ਤੇ ਪ੍ਰਭ ਜਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਗਲ ਦੁਖ ਮਿਟੇ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬੰਧਨ ਤੇ ਛੁਟੇ ॥੨॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਮਿਟੇ ਮੋਹ ਭਰਮ ॥
ਸਾਧ ਰੇਣ ਮਜਨ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
ਸਾਧਾ ਮਹਿ ਇਹ ਹਮਰੀ ਜਿੰਦੁ ॥੩॥
ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਕਿਰਪਾਲ ਧਿਆਵਉ ॥ ਸਾਧਸੰਗਿ ਤਾ ਬੈਠਣੁ ਪਾਵਉ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਣ ਕਉ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੀ ਦਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥੪॥੨੨॥੯੧॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥
सतिगुर भेटत हउमै मारी ॥
सतिगुर संगि नाही मनु डोलै ॥
अंम्रित बाणी गुरमुखि बोलै ॥१॥
सभु जगु साचा जा सच महि राते ॥
सीतल साति गुर ते प्रभ जाते ॥१॥ रहाउ ॥
संत प्रसादि जपै हरि नाउ ॥
संत प्रसादि हरि कीरतनु गाउ ॥
संत प्रसादि सगल दुख मिटे ॥
संत प्रसादि बंधन ते छुटे ॥२॥
संत क्रिपा ते मिटे मोह भरम ॥
साध रेण मजन सभि धरम ॥
साध क्रिपाल दइआल गोविंदु ॥
साधा महि इह हमरी जिंदु ॥३॥
किरपा निधि किरपाल धिआवउ ॥ साधसंगि ता बैठणु पावउ ॥
मोहि निरगुण कउ प्रभि कीनी दइआ ॥
साधसंगि नानक नामु लइआ ॥४॥२२॥९१॥
सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥
सतिगुर भेटत हउमै मारी ॥
सतिगुर संगि नाही मनु डोलै ॥
अंम्रित बाणी गुरमुखि बोलै ॥१॥
सभु जगु साचा जा सच महि राते ॥
सीतल साति गुर ते प्रभ जाते ॥१॥ रहाउ ॥
संत प्रसादि जपै हरि नाउ ॥
संत प्रसादि हरि कीरतनु गाउ ॥
संत प्रसादि सगल दुख मिटे ॥
संत प्रसादि बंधन ते छुटे ॥२॥
संत क्रिपा ते मिटे मोह भरम ॥
साध रेण मजन सभि धरम ॥
साध क्रिपाल दइआल गोविंदु ॥
साधा महि इह हमरी जिंदु ॥३॥
किरपा निधि किरपाल धिआवउ ॥ साधसंगि ता बैठणु पावउ ॥
मोहि निरगुण कउ प्रभि कीनी दइआ ॥
साधसंगि नानक नामु लइआ ॥४॥२२॥९१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे भाई !) गुरू के दीदार की बरकति से (मनुष्य अपने अंदर से तृष्णा की आग) बुझा लेता है। गुरू को मिल के (अपने मन में से) अहम् को मार लेता है। गुरू की संगति में रह के (मनुष्य का) मन (विकारों की तरफ) डोलता नहीं (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ कर मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली गुरबाणी उचारता रहता है। 1। (हे भाई !) जब गुरू के द्वारा प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं~ जब सदा सिथर प्रभू के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं~ तब हृदय ठंडा-ठार हो जाता है~ तब (मन में) शांति पैदा हो जाती है~ तब सारा जगत सदा स्थिर परमात्मा का रूप दिखता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की कृपा से मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है~ गुरू की कृपा से हरि कीर्तन गायन करता है। (इसका परिणाम ये निकलता है कि) सतिगुरू की कृपा से मनुष्य के सारे दुख कलेश मिट जाते हैं (क्योंकि) गुरू की मेहर से मनुष्य (माया के मोह के) बंधनों से निजात पा लेता है। 2। (हे भाई !) गुरू की कृपा से माया का मोह और माया खातिर भटकना दूर हो जाती है। गुरू के चरणों की धूड़ी का स्नान ही सारे धर्मों का (सार) है। (जिस मनुष्य पर गुरू के सन्मुख रहने वाले) गुरमुख दयावान होते हैं~ उस पर परमात्मा भी दयावान हो जाता है। (हे भाई !) मेरी जीवात्मा भी गुरमुखों के चरणों पे वारी जाती है। 3। गुरू की मेहर से जब मैं कृपा के खजाने~ कृपा के घर का नाम सिमरता हूँ~ साध-संगति में मेरा जीअ लगता है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) मुझ गुणहीन पर प्रभू ने दया की~ साध-संगति में मैं प्रभू का नाम जपने लग पड़ा। 4। 22। 91।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਪਿਓ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਮੰਤੁ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨ ਭਏ ਨਿਰਵੈਰ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪੂਜਹੁ ਗੁਰ ਪੈਰ ॥੧॥
ਅਬ ਮਤਿ ਬਿਨਸੀ ਦੁਸਟ ਬਿਗਾਨੀ ॥
ਜਬ ਤੇ ਸੁਣਿਆ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜ ਸੂਖ ਆਨੰਦ ਨਿਧਾਨ ॥
ਰਾਖਨਹਾਰ ਰਖਿ ਲੇਇ ਨਿਦਾਨ ॥
ਦੂਖ ਦਰਦ ਬਿਨਸੇ ਭੈ ਭਰਮ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਖੇ ਕਰਿ ਕਰਮ ॥੨॥
ਪੇਖੈ ਬੋਲੈ ਸੁਣੈ ਸਭੁ ਆਪਿ ॥
ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਤਾ ਕਉ ਮਨ ਜਾਪਿ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਇਓ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਏਕੈ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥੩॥
ਕਹਤ ਪਵਿਤ੍ਰ ਸੁਣਤ ਪੁਨੀਤ ॥ ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਗਾਵਹਿ ਨਿਤ ਨੀਤ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਸਭ ਪੂਰਨ ਘਾਲ ॥੪॥੨੩॥੯੨॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਪਿਓ ਭਗਵੰਤੁ ॥
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਮੰਤੁ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨ ਭਏ ਨਿਰਵੈਰ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪੂਜਹੁ ਗੁਰ ਪੈਰ ॥੧॥
ਅਬ ਮਤਿ ਬਿਨਸੀ ਦੁਸਟ ਬਿਗਾਨੀ ॥
ਜਬ ਤੇ ਸੁਣਿਆ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜ ਸੂਖ ਆਨੰਦ ਨਿਧਾਨ ॥
ਰਾਖਨਹਾਰ ਰਖਿ ਲੇਇ ਨਿਦਾਨ ॥
ਦੂਖ ਦਰਦ ਬਿਨਸੇ ਭੈ ਭਰਮ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਖੇ ਕਰਿ ਕਰਮ ॥੨॥
ਪੇਖੈ ਬੋਲੈ ਸੁਣੈ ਸਭੁ ਆਪਿ ॥
ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਤਾ ਕਉ ਮਨ ਜਾਪਿ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਇਓ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਏਕੈ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥੩॥
ਕਹਤ ਪਵਿਤ੍ਰ ਸੁਣਤ ਪੁਨੀਤ ॥ ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਗਾਵਹਿ ਨਿਤ ਨੀਤ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਸਭ ਪੂਰਨ ਘਾਲ ॥੪॥੨੩॥੯੨॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥
केवल नामु दीओ गुरि मंतु ॥
तजि अभिमान भए निरवैर ॥
आठ पहर पूजहु गुर पैर ॥१॥
अब मति बिनसी दुसट बिगानी ॥
जब ते सुणिआ हरि जसु कानी ॥१॥ रहाउ ॥
सहज सूख आनंद निधान ॥
राखनहार रखि लेइ निदान ॥
दूख दरद बिनसे भै भरम ॥
आवण जाण रखे करि करम ॥२॥
पेखै बोलै सुणै सभु आपि ॥
सदा संगि ता कउ मन जापि ॥
संत प्रसादि भइओ परगासु ॥
पूरि रहे एकै गुणतासु ॥३॥
कहत पवित्र सुणत पुनीत ॥ गुण गोविंद गावहि नित नीत ॥
कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल ॥
तिसु जन की सभ पूरन घाल ॥४॥२३॥९२॥
साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥
केवल नामु दीओ गुरि मंतु ॥
तजि अभिमान भए निरवैर ॥
आठ पहर पूजहु गुर पैर ॥१॥
अब मति बिनसी दुसट बिगानी ॥
जब ते सुणिआ हरि जसु कानी ॥१॥ रहाउ ॥
सहज सूख आनंद निधान ॥
राखनहार रखि लेइ निदान ॥
दूख दरद बिनसे भै भरम ॥
आवण जाण रखे करि करम ॥२॥
पेखै बोलै सुणै सभु आपि ॥
सदा संगि ता कउ मन जापि ॥
संत प्रसादि भइओ परगासु ॥
पूरि रहे एकै गुणतासु ॥३॥
कहत पवित्र सुणत पुनीत ॥ गुण गोविंद गावहि नित नीत ॥
कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल ॥
तिसु जन की सभ पूरन घाल ॥४॥२३॥९२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों ने) साध-संगति में भगवान का सिमरन किया है~ जिन्हें गुरू ने परमात्मा के नाम का मंत्र दिया है (उस मंत्र की बरकति से) वे अहंकार त्याग के निर्वैर हो गए हैं (हे भाई !) आठों पहर (हर वक्त) गुरू के पैर पूजो। । 1। हे भाई ! तब से मेरी बुरी व बेसमझी वाली मति दूर हो गई है जब से परमात्मा की सिफत सालाह मैंने कानों से सुनी है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिन मनुष्यों ने हरी-जस कानों से सुना है) आत्मिक अडोलता~ सुख~ आनंद के खजाने रखने वाले परमात्मा ने आखिर उनकी सदा रक्षा की है। उनके दुख-दर्द-डर-वहिम सारे नाश हो जाते हैं। परमात्मा मेहर करके उनके जनम मरण के चक्र भी खत्म कर देता है। 2। हे (मेरे) मन ! जो परमात्मा हर जगह (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं देखता है~ खुद ही बोलता है~ खुद ही सुनता है~ जो हर वक्त तेरे अंग संग है~ उसका भजन कर। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन वाला प्रकाश पैदा होता है~ उसे गुणों का खजाना एक परमात्मा ही हर जगह व्यापक दिखाई देता है। 3। वे सिफत सालाह करने वाले और सिफत सालाह सुनने वाले सभी पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं ~ (हे भाई !) जो मनुष्य सदा ही गोबिंद के गुण गाते हैं । हे नानक ! कह, (हे प्रभू !) जिस मनुष्य पे तू दयावान होता है (वह तेरी सिफत सालाह करता है) उसकी सारी ये मेहनत सफल हो जाती है। 4। 23। 92।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜਿ ਬੋਲਾਵੈ ਰਾਮੁ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਲਾਗੈ ਸਾਚੁ ਧਿਆਨੁ ॥ ਮਿਟਹਿ ਕਲੇਸ ਸੁਖੀ ਹੋਇ ਰਹੀਐ ॥
ਐਸਾ ਦਾਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਕਹੀਐ ॥੧॥
ਸੋ ਸੁਖਦਾਤਾ ਜਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤਿਸੁ ਸੰਗਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਸੁ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ਤਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਵੈ ॥
ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਮਿਟੈ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਾ ॥੨॥
ਜਨ ਊਪਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਦਇਆਲ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜਿ ਬੋਲਾਵੈ ਰਾਮੁ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਲਾਗੈ ਸਾਚੁ ਧਿਆਨੁ ॥ ਮਿਟਹਿ ਕਲੇਸ ਸੁਖੀ ਹੋਇ ਰਹੀਐ ॥
ਐਸਾ ਦਾਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਕਹੀਐ ॥੧॥
ਸੋ ਸੁਖਦਾਤਾ ਜਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤਿਸੁ ਸੰਗਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਸੁ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ਤਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਵੈ ॥
ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਮਿਟੈ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਾ ॥੨॥
ਜਨ ਊਪਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਦਇਆਲ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥
मन महि लागै साचु धिआनु ॥ मिटहि कलेस सुखी होइ रहीऐ ॥
ऐसा दाता सतिगुरु कहीऐ ॥१॥
सो सुखदाता जि नामु जपावै ॥
करि किरपा तिसु संगि मिलावै ॥१॥ रहाउ ॥
जिसु होइ दइआलु तिसु आपि मिलावै ॥
सरब निधान गुरू ते पावै ॥
आपु तिआगि मिटै आवण जाणा ॥
साध कै संगि पारब्रहमु पछाणा ॥२॥
जन ऊपरि प्रभ भए दइआल ॥
बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥
मन महि लागै साचु धिआनु ॥ मिटहि कलेस सुखी होइ रहीऐ ॥
ऐसा दाता सतिगुरु कहीऐ ॥१॥
सो सुखदाता जि नामु जपावै ॥
करि किरपा तिसु संगि मिलावै ॥१॥ रहाउ ॥
जिसु होइ दइआलु तिसु आपि मिलावै ॥
सरब निधान गुरू ते पावै ॥
आपु तिआगि मिटै आवण जाणा ॥
साध कै संगि पारब्रहमु पछाणा ॥२॥
जन ऊपरि प्रभ भए दइआल ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे भाई !) गुरू (मनुष्य के माया के मोह के) बंधन तोड़ के (उससे) परमात्मा का सिमरन करवाता है। (जिस मनुष्य पर गुरू मेहर करता है उसके) मन में (प्रभू चरणों की) अॅटल सुरति बंध जाती है। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से मन के सारे) कलेश मिट जाते हैं~ सुखी जीवन वाले हो जाते हैं। सो~ गुरू ऐसी ऊँची दाति बख्शने वाला कहा जाता है। 1। (हे भाई !) वह सत्गुरू आत्मिक आनंद की दाति बख्शने वाला है क्योंकि वह परमात्मा का नाम जपाता है~ और मेहर करके उस परमात्मा के साथ जोड़ता है। 1। रहाउ। (पर) परमात्मा जिस मनुष्य पर दयावान हो उसे खुद (ही) गुरू मिलाता है~ वह मनुष्य (फिर) गुरू से (आत्मिक जीवन के) सारे खजाने हासिल कर लेता है। वह (गुरू की शरण पड़ कर) स्वैभाव त्याग देता है~ और उसके जनम मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। गुरू की संगति में (रह के) वह मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण की बरकति से) प्रभू जी सेवक पर दयावान हो जाते हैं~
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 183 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 52 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 183” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 184 →, पीछे का: ← अंग 182।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।