नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: अहंकार (जीवों को मोह के) बंधनों में बाँध के जनम मरण के चक्कर में डालती है। जो मनुष्य परमात्मा की भगती करता है (वह अहंकार से बचा रहता है, और) सुख पाता है। 8। 13।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (और जीवों की तो बात ही क्या करनी है) सबसे पहले ब्रहमा ही आत्मिक मौत की जंजीर में फंस गया। (विष्णु की नाभि से उगे हुए जिस कमल में से ब्रहमा पैदा हुआ था, उस का अंत लेने के लिए) पाताल में (जा पहुँचा) पर ब्रहम् कमल (का अंत) ना ढूँढ सका (और शर्मिंदा होना पड़ा। ये अहंकार ही मौत है)। उसने अपने गुरू की आज्ञा पर गौर ना किया, (इस अहंकार में आ के मैं इतना बड़ा हूँ कि मैं कैसे कमल की डंडी में से पैदा हो सकता हूँ) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ गया । 1। (जगत में) जो जो जीव जनम लेता है (और गुरू का शबद अपने हृदय में नहीं बसाता) मौत (के सहम) ने उस उस का आत्मिक जीवन प्रफुल्लित नहीं होने दिया। मेरे आत्मिक जीवन को परमात्मा ने खुद बचा लिया, (क्योंकि उसकी मेहर से) मैंने गुरू के शबद को अपने हृदय में बसा लिया। 1। रहाउ। सारे देवियां और देवते माया के मोह में फंसे हुए हैं (यही है आत्मिक मौत, ये आत्मिक) मौत गुरू की बताई हुई सेवा किए बिना खलासी नहीं करती। (इस आत्मिक) मौत से बचा हुआ सिर्फ एक परमातमा है जिसके गुण बयान नहीं हो सकते, जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। 2। (वैसे तो) सुल्तान हों, खान हों, बादशाह हों, किसी ने भी सदा यहाँ टिके नहीं रहना, पर परमातमा के नाम से जो जो वंचित रहता है वह जम का दुख सहता है (वह अपनी आत्मिक मौत भी सहेड़ लेता है, इस करके, हे प्रभू !) मुझे आपका नाम ही सहारा है (मैं यही अरदास करता हूँ) जैसे हैं सके मुझे अपने नाम में जोड़े रख, मैं आपके नाम में ही टिका रहूँ। 3। चौधरी हों, राजे हों, किसी का भी यहाँ पक्का डेरा नहीं। पर (जो) शाह निरी माया ही जोड़ते हैं, सिर्फ पैसे ही एकत्र करते हैं, वे आत्मिक मौत मर जाते हैं। हे हरी ! मुझे आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम-धन बख्श। 4। प्रजा, प्रजा के मुखिए, चौधरी, सरदार – कोई भी ऐसा नहीं दिखता जो संसार में सदा टिका रह सके। पर बली काल उसके सिर पर चोट मारता है (उसे आत्मिक मौत मारता है) जिसके हृदय में माया का मोह है। 5। सदा अटॅल रहने वाला केवल एक ही एक परमात्मा ही है, जिस ने यह सारी सृष्टि रची बनाई है, वह खुद ही इसे (अपने अंदर) लय कर लेता है। जब गुरू की शरण पड़ने से वह परमात्मा हर जगह दिखाई दे जाए (तो जीव का आत्मिक जीवन प्रफुल्लित होता है) तब (इसे प्रभू की हजूरी में) आदर मिलता है। 6। काजी कहलाएं, शेख कहलवाएं, बड़े बड़े भेषों वाले फ़कीर कहलाएं, (दुनिया में अपने आप को) बड़े बड़े कहलवाएं; पर अगर शरीर में अहंकार की पीड़ा है, तो मौत खलासी नहीं करती (आत्मिक मौत खलासी नहीं करती, आत्मिक जीवन प्रफुल्लित नहीं होता)। सतिगुरू से मिले (नाम-) आधार के बिना (ये आत्मिक मौत टिकी ही रहती है)। 7। (निंदा आदि के कारण) जीभ से, (पराया रूप देखने के कारण) आँखों द्वारा, और कानों से (क्योंकि जीव) आत्मिक मौत लाने वाले (निंदा आदि के) बचन सुनता है आत्मिक मौत (का) जाल (जीवों के सिर पर सदैव तना रहता है)। गुरू के शबद (का आसरा लिए) बिना जीव दिन रात (आत्मिक जीवन के गुणों से) लूटे जा रहे हैं। 8। जिस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू (सदा) बसा रहता है, जो मनुष्य परमात्मा के नाम में (सदा) टिका रहता है, आत्मिक मौत (मौत का सहम) उसकी तरफ कभी देख भी नहीं सकती (क्योंकि वह सदा प्रभू के) गुण गाता है। हे नानक ! वह मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के गुरू के शबद के द्वारा (प्रभू के चरणों में सदा) लीन रहता है। 9। 14।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ वे सदा अटॅल रहने वाले बोल ही बोलते हैं, इस वास्ते वो रत्ती भर भी झूठ नहीं बोलते, जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के रजा के मालिक प्रभू के हुकम में चलते हैं, वे सदा स्थिर प्रभू की शरण में रह के माया के प्रभाव से ऊपर रहते हैं । 1। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के चरणों में टिका रहता है, उसे मौत का सहम छू नहीं सकता (उसके आत्मिक जीवन को कोई खतरा नहीं होता) पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को मोह (में फंसे होने) के कारण जनम मरण का दुख (दबाए रखता) है। 1। रहाउ। कोई भी जीव नाम-रस पीए (और पी के देख ले), बेअंत गुणों के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करके (“निज घर में”) टिके रह सकते हैं, और उस स्वै-स्वरूप में बैठ के आत्मिक अडोलता का ठिकाना ढूँढ सकते हैं। हरि-नाम-रस में मस्त होने से ये कह सकते हैं कि यही है असल आत्मिक सुख। 2। गुरू की मति पर चलने वाली जीवन-जुगति (ऐसी है कि इसे) माया का मोह हिला नहीं सकता, माया के मोह में ये डोल नहीं सकती। जो मनुष्य गुरू की मति धारण करके सहजता से परमेश्वर का नाम लेता है वह नाम-रस पीता है, वह अस्लियत को मथ कर तलाश लेता है। 3। जिस मनुष्य ने (पूरे) गुरू के दर्शन कर लिए और गुरू की शिक्षा ग्रहण कर ली, अपने अंतरात्मे बसा ली और (उस शिक्षा की खातिर) अपना मन और अपना तन भेट कर दिया, (और जिस मनुष्य ने इस शिक्षा की बरकति से सदा स्थिर प्रभू के चरणों में जुड़ना आरम्भ कर दिया) उसने अपनी अस्लियत को पहिचान लिया, उसे समझ आ गई कि परमात्मा सबसे उच्च आत्मिक अवस्था वाला है और बेअंत वडियाई वाला है। 4। जो मनुष्य (सदा स्थिर प्रभू के चरणों में जुड़ता है) निरंजन के श्रेष्ठ नाम को अपनी आत्मिक खुराक बनाता है, वह सदा स्थिर रहने वाला परम हंस बन जाता है। बेअंत (प्रभू) की ज्योति (उसके अंदर चमक पड़ती है)। बेशक किसी भी तरफ वह देख ले, उसे हर जगह वह एक परमात्मा ही दिखाई देता है। 5। (‘सच घर’ में बैठने वाला) वह मनुष्य माया (के प्रभाव) से निर्लिप रहता है, सदा स्थिर प्रभू का सिमरन ही उसकी नित्य की करनी हो जाती है। गुरू की बताई सेवा करके गुरू के चरणों में टिका रह के वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। अंदर अंदर से उसका मन सिमरन में रच-मिच जाता है, अहंकार वाली उसकी भटकना समाप्त हो जाती है। 6। (‘सच घर’ में बैठे रहने की) इस विधी ने किस किस को (संसार समुंद्र से) पार नहीं लंघाया? परमात्मा की सिफत सालाह ने सारे संतों को भक्तों को पार लंघा दिया है।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अहंकार (जीवों को मोह के) बंधनों में बाँध के जनम मरण के चक्कर में डालती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।