अंग 227

अंग
227
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਉਮੈ ਬੰਧਨ ਬੰਧਿ ਭਵਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੮॥੧੩॥
हउमै बंधन बंधि भवावै ॥
नानक राम भगति सुखु पावै ॥८॥१३॥

हिन्दी अर्थ: अहंकार (जीवों को मोह के) बंधनों में बाँध के जनम मरण के चक्कर में डालती है। जो मनुष्य परमात्मा की भगती करता है (वह अहंकार से बचा रहता है~ और) सुख पाता है। 8। 13।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਪ੍ਰਥਮੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਕਾਲੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਕਮਲੁ ਪਇਆਲਿ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਆਗਿਆ ਨਹੀ ਲੀਨੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਆ ॥੧॥
ਜੋ ਉਪਜੈ ਸੋ ਕਾਲਿ ਸੰਘਾਰਿਆ ॥
ਹਮ ਹਰਿ ਰਾਖੇ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੇ ਦੇਵੀ ਸਭਿ ਦੇਵਾ ॥
ਕਾਲੁ ਨ ਛੋਡੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ॥੨॥
ਸੁਲਤਾਨ ਖਾਨ ਬਾਦਿਸਾਹ ਨਹੀ ਰਹਨਾ ॥
ਨਾਮਹੁ ਭੂਲੈ ਜਮ ਕਾ ਦੁਖੁ ਸਹਨਾ ॥
ਮੈ ਧਰ ਨਾਮੁ ਜਿਉ ਰਾਖਹੁ ਰਹਨਾ ॥੩॥
ਚਉਧਰੀ ਰਾਜੇ ਨਹੀ ਕਿਸੈ ਮੁਕਾਮੁ ॥
ਸਾਹ ਮਰਹਿ ਸੰਚਹਿ ਮਾਇਆ ਦਾਮ ॥
ਮੈ ਧਨੁ ਦੀਜੈ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ॥੪॥
ਰਯਤਿ ਮਹਰ ਮੁਕਦਮ ਸਿਕਦਾਰੈ ॥
ਨਿਹਚਲੁ ਕੋਇ ਨ ਦਿਸੈ ਸੰਸਾਰੈ ॥
ਅਫਰਿਉ ਕਾਲੁ ਕੂੜੁ ਸਿਰਿ ਮਾਰੈ ॥੫॥
ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਸਾਜੀ ਤਿਨਹਿ ਸਭ ਗੋਈ ॥
ਓਹੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਪੈ ਤਾਂ ਪਤਿ ਹੋਈ ॥੬॥
ਕਾਜੀ ਸੇਖ ਭੇਖ ਫਕੀਰਾ ॥
ਵਡੇ ਕਹਾਵਹਿ ਹਉਮੈ ਤਨਿ ਪੀਰਾ ॥
ਕਾਲੁ ਨ ਛੋਡੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਧੀਰਾ ॥੭॥
ਕਾਲੁ ਜਾਲੁ ਜਿਹਵਾ ਅਰੁ ਨੈਣੀ ॥
ਕਾਨੀ ਕਾਲੁ ਸੁਣੈ ਬਿਖੁ ਬੈਣੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੂਠੇ ਦਿਨੁ ਰੈਣੀ ॥੮॥
ਹਿਰਦੈ ਸਾਚੁ ਵਸੈ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥ ਕਾਲੁ ਨ ਜੋਹਿ ਸਕੈ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥੯॥੧੪॥
गउड़ी महला १ ॥
प्रथमे ब्रहमा कालै घरि आइआ ॥
ब्रहम कमलु पइआलि न पाइआ ॥
आगिआ नही लीनी भरमि भुलाइआ ॥१॥
जो उपजै सो कालि संघारिआ ॥
हम हरि राखे गुर सबदु बीचारिआ ॥१॥ रहाउ ॥
माइआ मोहे देवी सभि देवा ॥
कालु न छोडै बिनु गुर की सेवा ॥
ओहु अबिनासी अलख अभेवा ॥२॥
सुलतान खान बादिसाह नही रहना ॥
नामहु भूलै जम का दुखु सहना ॥
मै धर नामु जिउ राखहु रहना ॥३॥
चउधरी राजे नही किसै मुकामु ॥
साह मरहि संचहि माइआ दाम ॥
मै धनु दीजै हरि अंम्रित नामु ॥४॥
रयति महर मुकदम सिकदारै ॥
निहचलु कोइ न दिसै संसारै ॥
अफरिउ कालु कूड़ु सिरि मारै ॥५॥
निहचलु एकु सचा सचु सोई ॥
जिनि करि साजी तिनहि सभ गोई ॥
ओहु गुरमुखि जापै तां पति होई ॥६॥
काजी सेख भेख फकीरा ॥
वडे कहावहि हउमै तनि पीरा ॥
कालु न छोडै बिनु सतिगुर की धीरा ॥७॥
कालु जालु जिहवा अरु नैणी ॥
कानी कालु सुणै बिखु बैणी ॥
बिनु सबदै मूठे दिनु रैणी ॥८॥
हिरदै साचु वसै हरि नाइ ॥ कालु न जोहि सकै गुण गाइ ॥
नानक गुरमुखि सबदि समाइ ॥९॥१४॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ (और जीवों की तो बात ही क्या करनी है) सबसे पहले ब्रहमा ही आत्मिक मौत की जंजीर में फंस गया। (विष्णु की नाभि से उगे हुए जिस कमल में से ब्रहमा पैदा हुआ था~ उस का अंत लेने के लिए) पाताल में (जा पहुँचा) पर ब्रहम् कमल (का अंत) ना ढूँढ सका (और शर्मिंदा होना पड़ा। ये अहंकार ही मौत है)। उसने अपने गुरू की आज्ञा पर गौर ना किया~ (इस अहंकार में आ के मैं इतना बड़ा हूँ कि मैं कैसे कमल की डंडी में से पैदा हो सकता हूँ) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ गया । 1। (जगत में) जो जो जीव जनम लेता है (और गुरू का शबद अपने हृदय में नहीं बसाता) मौत (के सहम) ने उस उस का आत्मिक जीवन प्रफुल्लित नहीं होने दिया। मेरे आत्मिक जीवन को परमात्मा ने खुद बचा लिया~ (क्योंकि उसकी मेहर से) मैंने गुरू के शबद को अपने हृदय में बसा लिया। 1। रहाउ। सारे देवियां और देवते माया के मोह में फंसे हुए हैं (यही है आत्मिक मौत~ ये आत्मिक) मौत गुरू की बताई हुई सेवा किए बिना खलासी नहीं करती। (इस आत्मिक) मौत से बचा हुआ सिर्फ एक परमातमा है जिसके गुण बयान नहीं हो सकते~ जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। 2। (वैसे तो) सुल्तान हों~ खान हों~ बादशाह हों~ किसी ने भी सदा यहाँ टिके नहीं रहना~ पर परमातमा के नाम से जो जो वंचित रहता है वह जम का दुख सहता है (वह अपनी आत्मिक मौत भी सहेड़ लेता है~ इस करके~ हे प्रभू !) मुझे तेरा नाम ही सहारा है (मैं यही अरदास करता हूँ) जैसे हो सके मुझे अपने नाम में जोड़े रख~ मैं तेरे नाम में ही टिका रहूँ। 3। चौधरी हों~ राजे हों~ किसी का भी यहाँ पक्का डेरा नहीं। पर (जो) शाह निरी माया ही जोड़ते हैं~ सिर्फ पैसे ही एकत्र करते हैं~ वे आत्मिक मौत मर जाते हैं। हे हरी ! मुझे आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम-धन बख्श। 4। प्रजा~ प्रजा के मुखिए~ चौधरी~ सरदार – कोई भी ऐसा नहीं दिखता जो संसार में सदा टिका रह सके। पर बली काल उसके सिर पर चोट मारता है (उसे आत्मिक मौत मारता है) जिसके हृदय में माया का मोह है। 5। सदा अटॅल रहने वाला केवल एक ही एक परमात्मा ही है~ जिस ने यह सारी सृष्टि रची बनाई है~ वह खुद ही इसे (अपने अंदर) लय कर लेता है। जब गुरू की शरण पड़ने से वह परमात्मा हर जगह दिखाई दे जाए (तो जीव का आत्मिक जीवन प्रफुल्लित होता है) तब (इसे प्रभू की हजूरी में) आदर मिलता है। 6। काजी कहलाएं~ शेख कहलवाएं~ बड़े बड़े भेषों वाले फ़कीर कहलाएं~ (दुनिया में अपने आप को) बड़े बड़े कहलवाएं; पर अगर शरीर में अहंकार की पीड़ा है~ तो मौत खलासी नहीं करती (आत्मिक मौत खलासी नहीं करती~ आत्मिक जीवन प्रफुल्लित नहीं होता)। सतिगुरू से मिले (नाम-) आधार के बिना (ये आत्मिक मौत टिकी ही रहती है)। 7। (निंदा आदि के कारण) जीभ से~ (पराया रूप देखने के कारण) आँखों द्वारा~ और कानों से (क्योंकि जीव) आत्मिक मौत लाने वाले (निंदा आदि के) बचन सुनता है आत्मिक मौत (का) जाल (जीवों के सिर पर सदैव तना रहता है)। गुरू के शबद (का आसरा लिए) बिना जीव दिन रात (आत्मिक जीवन के गुणों से) लूटे जा रहे हैं। 8। जिस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू (सदा) बसा रहता है~ जो मनुष्य परमात्मा के नाम में (सदा) टिका रहता है~ आत्मिक मौत (मौत का सहम) उसकी तरफ कभी देख भी नहीं सकती (क्योंकि वह सदा प्रभू के) गुण गाता है। हे नानक ! वह मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के गुरू के शबद के द्वारा (प्रभू के चरणों में सदा) लीन रहता है। 9। 14।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਬੋਲਹਿ ਸਾਚੁ ਮਿਥਿਆ ਨਹੀ ਰਾਈ ॥
ਚਾਲਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ॥
ਰਹਹਿ ਅਤੀਤ ਸਚੇ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥
ਸਚ ਘਰਿ ਬੈਸੈ ਕਾਲੁ ਨ ਜੋਹੈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਉ ਆਵਤ ਜਾਵਤ ਦੁਖੁ ਮੋਹੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਪਿਉ ਪੀਅਉ ਅਕਥੁ ਕਥਿ ਰਹੀਐ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਬੈਸਿ ਸਹਜ ਘਰੁ ਲਹੀਐ ॥
ਹਰਿ ਰਸਿ ਮਾਤੇ ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਕਹੀਐ ॥੨॥
ਗੁਰਮਤਿ ਚਾਲ ਨਿਹਚਲ ਨਹੀ ਡੋਲੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਸਾਚਿ ਸਹਜਿ ਹਰਿ ਬੋਲੈ ॥
ਪੀਵੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਤਤੁ ਵਿਰੋਲੈ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦੇਖਿਆ ਦੀਖਿਆ ਲੀਨੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿਓ ਅੰਤਰ ਗਤਿ ਕੀਨੀ ॥
ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਪਾਈ ਆਤਮੁ ਚੀਨੀ ॥੪॥
ਭੋਜਨੁ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਸਾਰੁ ॥
ਪਰਮ ਹੰਸੁ ਸਚੁ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
ਜਹ ਦੇਖਉ ਤਹ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥੫॥
ਰਹੈ ਨਿਰਾਲਮੁ ਏਕਾ ਸਚੁ ਕਰਣੀ ॥
ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਸੇਵਾ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ॥
ਮਨ ਤੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਚੂਕੀ ਅਹੰ ਭ੍ਰਮਣੀ ॥੬॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਕਉਣੁ ਕਉਣੁ ਨਹੀ ਤਾਰਿਆ ॥
ਹਰਿ ਜਸਿ ਸੰਤ ਭਗਤ ਨਿਸਤਾਰਿਆ ॥
गउड़ी महला १ ॥
बोलहि साचु मिथिआ नही राई ॥
चालहि गुरमुखि हुकमि रजाई ॥
रहहि अतीत सचे सरणाई ॥१॥
सच घरि बैसै कालु न जोहै ॥
मनमुख कउ आवत जावत दुखु मोहै ॥१॥ रहाउ ॥
अपिउ पीअउ अकथु कथि रहीऐ ॥
निज घरि बैसि सहज घरु लहीऐ ॥
हरि रसि माते इहु सुखु कहीऐ ॥२॥
गुरमति चाल निहचल नही डोलै ॥
गुरमति साचि सहजि हरि बोलै ॥
पीवै अंम्रितु ततु विरोलै ॥३॥
सतिगुरु देखिआ दीखिआ लीनी ॥
मनु तनु अरपिओ अंतर गति कीनी ॥
गति मिति पाई आतमु चीनी ॥४॥
भोजनु नामु निरंजन सारु ॥
परम हंसु सचु जोति अपार ॥
जह देखउ तह एकंकारु ॥५॥
रहै निरालमु एका सचु करणी ॥
परम पदु पाइआ सेवा गुर चरणी ॥
मन ते मनु मानिआ चूकी अहं भ्रमणी ॥६॥
इन बिधि कउणु कउणु नही तारिआ ॥
हरि जसि संत भगत निसतारिआ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ वे सदा अटॅल रहने वाले बोल ही बोलते हैं, इस वास्ते वो रत्ती भर भी झूठ नहीं बोलते~ जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के रजा के मालिक प्रभू के हुकम में चलते हैं~ वे सदा स्थिर प्रभू की शरण में रह के माया के प्रभाव से ऊपर रहते हैं । 1। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के चरणों में टिका रहता है~ उसे मौत का सहम छू नहीं सकता (उसके आत्मिक जीवन को कोई खतरा नहीं होता) पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को मोह (में फंसे होने) के कारण जनम मरण का दुख (दबाए रखता) है। 1। रहाउ। कोई भी जीव नाम-रस पीए (और पी के देख ले)~ बेअंत गुणों के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करके (“निज घर में”) टिके रह सकते हैं~ और उस स्वै-स्वरूप में बैठ के आत्मिक अडोलता का ठिकाना ढूँढ सकते हैं। हरि-नाम-रस में मस्त होने से ये कह सकते हैं कि यही है असल आत्मिक सुख। 2। गुरू की मति पर चलने वाली जीवन-जुगति (ऐसी है कि इसे) माया का मोह हिला नहीं सकता~ माया के मोह में ये डोल नहीं सकती। जो मनुष्य गुरू की मति धारण करके सहजता से परमेश्वर का नाम लेता है वह नाम-रस पीता है~ वह अस्लियत को मथ कर तलाश लेता है। 3। जिस मनुष्य ने (पूरे) गुरू के दर्शन कर लिए और गुरू की शिक्षा ग्रहण कर ली~ अपने अंतरात्मे बसा ली और (उस शिक्षा की खातिर) अपना मन और अपना तन भेट कर दिया~ (और जिस मनुष्य ने इस शिक्षा की बरकति से सदा स्थिर प्रभू के चरणों में जुड़ना आरम्भ कर दिया) उसने अपनी अस्लियत को पहिचान लिया~ उसे समझ आ गई कि परमात्मा सबसे उच्च आत्मिक अवस्था वाला है और बेअंत वडियाई वाला है। 4। जो मनुष्य (सदा स्थिर प्रभू के चरणों में जुड़ता है) निरंजन के श्रेष्ठ नाम को अपनी आत्मिक खुराक बनाता है~ वह सदा स्थिर रहने वाला परम हंस बन जाता है। बेअंत (प्रभू) की ज्योति (उसके अंदर चमक पड़ती है)। बेशक किसी भी तरफ वह देख ले~ उसे हर जगह वह एक परमात्मा ही दिखाई देता है। 5। (‘सच घर’ में बैठने वाला) वह मनुष्य माया (के प्रभाव) से निर्लिप रहता है~ सदा स्थिर प्रभू का सिमरन ही उसकी नित्य की करनी हो जाती है। गुरू की बताई सेवा करके गुरू के चरणों में टिका रह के वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। अंदर अंदर से उसका मन सिमरन में रच-मिच जाता है~ अहंकार वाली उसकी भटकना समाप्त हो जाती है। 6। (‘सच घर’ में बैठे रहने की) इस विधी ने किस किस को (संसार समुंद्र से) पार नहीं लंघाया? परमात्मा की सिफत सालाह ने सारे संतों को भक्तों को पार लंघा दिया है।

संदर्भ: यह अंग 227 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 227” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 228 →, पीछे का: ← अंग 226

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।