
कल्पना कीजिए, आज से कोई ढाई-तीन हज़ार बरस पहले के उत्तर भारत की एक सुबह। बारह बरस गुरुकुल में बिताकर एक नौजवान घर लौटा है। नाम है श्वेतकेतु। चारों वेद, सारे शास्त्र वह कंठस्थ करके आया है, और इसी विद्या का अभिमान उसके सिर चढ़कर बोल रहा है। वह इतना अकड़ा हुआ है कि अपने पिता से ढंग से बात तक नहीं करता। पिता उद्दालक आरुणि, एक प्रकांड आचार्य, यह सब देखते हैं और एक दिन बेटे को पास बिठाकर बस एक सवाल पूछते हैं, “बेटा, क्या आपने गुरु से वह एक चीज़ सीखी, जिसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है? वह, जिसके जान लेने पर अनसुना भी सुन लिया जाता है, अनसोचा भी सोच लिया जाता है, और जो समझ में नहीं आता वह भी समझ में आ जाता है?” और यहीं नौजवान का सारा गर्व पिघल जाता है, क्योंकि इतना पढ़कर भी उसने यह कभी सुना ही नहीं था। यही सवाल इस पूरे ग्रंथ का प्राण है।

नाम है छान्दोग्य उपनिषद्, और नाम ही इसका मिज़ाज खोल देता है। यह उपनिषद् साम वेद से निकला है, उस वेद से जिसकी ऋचाएँ बोली नहीं, गाई जाती हैं (छन्दोग का अर्थ ही है साम का गायक)। इसीलिए यह उपनिषद् ॐ की उपासना से शुरू होता है, जिसे यहाँ उद्गीथ (वह ऊँचा, परम गान जिससे सृष्टि का तार बँधा है) कहा गया है। इसके पन्नों पर एक के बाद एक दृश्य खुलते हैं, कभी वन की कुटिया का गुरुकुल, कभी राजा का दरबार, कभी पिता और पुत्र का संवाद, और हर कथा गुरु और शिष्य को उसी एक सत्य की ओर ले चलती है। उद्दालक श्वेतकेतु को बताते हैं कि आरम्भ में केवल एक ही सत् (शुद्ध अस्तित्व, होना मात्र) था, एक और अद्वितीय, जिसका न कोई कारण है न कोई दूसरा; और इसी से वह महावाक्य फूटता है, तत्त्वमसि (वह तत्त्व आप ही हैं)। आगे ऋषि सनत्कुमार सिखाते हैं कि सुख न मन में टिकता है न किसी वस्तु में, सुख तो भूमा (वह असीम जिसमें और कुछ चाहना बचता ही नहीं) में ही है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार इस पूरे उपनिषद् का सार यही है कि हमारा दुख किसी बाहरी चीज़ से नहीं आता; वह इस झूठे भाव से जन्मता है कि “हम औरों से अलग, एक छोटी-सी जुदा हस्ती हैं”; और साधना का काम केवल इतना है कि चेतना को इस अलगाव से उठाकर उस एक में जोड़ दे, जहाँ हर वस्तु में पूरा विश्व दिखाई देने लगता है।
इस उपनिषद् के मुख्य किरदार
उद्दालक आरुणि: एक प्रकांड आचार्य, श्वेतकेतु के पिता, जिन्होंने नमक और बरगद के बीज से वह सिखाया जो शब्दों से परे है।
श्वेतकेतु: उद्दालक के पुत्र, बारह बरस गुरुकुल में पढ़कर लौटे एक अहंकारी युवक, जिनका घमंड पिता ने एक सवाल से तोड़ दिया।
सनत्कुमार और नारद: सनत्कुमार देवर्षि गुरु; नारद वह शिष्य जो सारी विद्याएँ जानकर भी भीतर से अशांत थे।
सत्यकाम जाबाल: एक बालक जिसने अपने कुल का सच कह दिया, और उसी सच ने उसे ब्राह्मण ठहराया।
प्रजापति और इन्द्र: सृष्टि के रचयिता प्रजापति, और देवराज इन्द्र, जो असली आत्मा की खोज में बार-बार लौटे।
राजा अश्वपति कैकेय: वह राजा जिसने छह बड़े पंडितों को वैश्वानर (सर्वव्यापी आत्मा) का पूरा रूप समझाया।
उपासना, और मृत्यु के पार
सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला ही ब्राह्मण है
एक छोटा-सा बालक अपनी माँ के पास खड़ा है और एक भारी बात पूछ रहा है। उसका नाम है सत्यकाम, और माँ का नाम है जबाला। उन दिनों गुरुकुल में पढ़ने जाने के लिए अपना गोत्र (पिता के कुल का वंश-नाम) बताना पड़ता था। बालक माँ से पूछता है, “मैं ब्रह्मचर्य (गुरु के घर रहकर वेद-विद्या का अध्ययन) के लिए जाना चाहता हूँ। हमारा गोत्र क्या है, यह मुझे बता दीजिए।” माँ का उत्तर इस पूरे प्रसंग की जड़ है, और वही इसकी असली शोभा भी।
जबाला सीधी और निडर होकर कहती हैं, “बेटा, हमें यह मालूम ही नहीं कि आपका गोत्र क्या है। अपनी जवानी में अनेक घरों में सेवा-टहल करते हुए हमने आपको पाया था, इसलिए हम नहीं जानते कि आप किस कुल के हैं। पर हमारा नाम जबाला है और आपका नाम सत्यकाम है, इसलिए आप अपने को सत्यकाम जाबाल (जबाला का पुत्र सत्यकाम) ही कहिएगा।” बालक यह सच लेकर गुरु हरिद्रुमत गौतम (एक प्रतिष्ठित आचार्य) के पास पहुँचता है। गुरु जब गोत्र पूछते हैं, तो बालक रत्ती भर भी न दबता है, न कुछ गढ़ता है। वह माँ की पूरी बात ज्यों-की-त्यों दोहरा देता है, “मेरी माँ को यह ज्ञात नहीं कि मैं किस गोत्र का हूँ; उन्होंने यही कहा कि मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।”
गुरु यह सुनकर प्रसन्न हो उठते हैं और कहते हैं, “ऐसा निष्कपट सच एक ब्राह्मण ही बोल सकता है। आप ब्रह्मचारी होने के योग्य हैं, क्योंकि आप सत्य से नहीं डिगे।” स्वामी कृष्णानन्द यहीं पर बल देते हैं कि असली कुलीनता जन्म या वंश के काग़ज़ों में नहीं, सत्य पर अडिग रहने में है। ब्राह्मणत्व (ब्रह्म की ओर झुका हुआ शुद्ध स्वभाव) उस मन का लक्षण है जो लज्जा या भय में पड़कर भी झूठ का सहारा नहीं लेता। बालक के पास न पिता का नाम था, न कुल का गौरव, पर उसके पास सत्य था, और वही उसका परम परिचय बन गया।
फिर गुरु एक अनोखी परीक्षा रचते हैं। वे चार सौ दुबली-पतली गायें बालक को सौंपकर कहते हैं, “इन्हें वन में ले जाइए और चराइए।” सत्यकाम संकल्प करता है कि जब तक ये एक हज़ार न हो जाएँ, वह लौटेगा नहीं। वर्षों वह जंगल में अकेला रहता है, गायों की सेवा में डूबा हुआ, मन निर्मल और धैर्य गहरा। जब झुंड एक हज़ार का हो जाता है, तब वही प्रकृति, जिसे वह चुपचाप निहारता रहा, उसकी गुरु बन जाती है।

परम्परा की कथा कहती है कि चार रूप एक-एक करके बालक के सामने आते हैं और हर एक उसे ब्रह्म का एक पाद (चौथाई, चार दिशाओं जैसा एक अंश) सिखाता है। पहले झुंड का बैल (ऋषभ) बोलता है और पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, इन चार दिशाओं को ब्रह्म का “प्रकाशवान” नामक एक पाद बताता है। फिर अग्नि उसे पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समुद्र वाला “अनन्तवान” पाद देती है। फिर एक हंस उसे अग्नि, सूर्य, चन्द्र और विद्युत वाला “ज्योतिष्मान” पाद सुनाता है। और अन्त में एक जलपक्षी (मद्गु) उसे प्राण, आँख, कान और मन वाला “आयतनवान” पाद बताता है। इस तरह बालक को सोलह कलाओं में पूरा ब्रह्म, बिना किसी मनुष्य-गुरु के, स्वयं सृष्टि के मुख से मिल जाता है।
इस प्रसंग का मर्म दो धागों से बुना है। एक यह कि सत्य ही वह कसौटी है जिस पर कुलीनता परखी जाती है; जो डरकर भी सच नहीं छोड़ता, वही भीतर से ब्राह्मण है, चाहे बाहर उसका कोई वंश-प्रमाण हो या न हो। दूसरा यह कि जब मन सच्चा और निर्मल हो जाता है, तो ब्रह्म को बताने के लिए किसी एक ही मुख की ज़रूरत नहीं रहती; बैल, अग्नि, पक्षी, दिशाएँ, सब उसके आचार्य बन जाते हैं। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार ये “देवता” वास्तव में बाहर का कोई तमाशा नहीं हैं; ये तो उस शुद्ध-हृदय साधक के सामने स्वयं प्रकट होती ब्रह्म-विद्या के ही रूप हैं, उस साधक के सामने जिसने अपने को सत्य में जमा रखा था।
सार: कुल का काग़ज़ नहीं, सच पर अडिग रहना ही असली कुलीनता है; और जब मन उतना सच्चा हो जाए, तो प्रकृति ख़ुद गुरु बनकर ब्रह्म का पूरा रूप दिखा देती है।
रैक्व गाड़ीवान: सब कुछ जिसमें समा जाता है
हालात यह हैं कि एक राजा हैं जानश्रुति पौत्रायण, यानी जनश्रुत वंश की संतान, बड़े दानी और बड़े श्रद्धालु। उनकी रसोई दिन-रात चलती रहती है, जगह-जगह धर्मशालाएँ खड़ी हैं, और राजा को इस बात का सुख है कि “मेरे नाम का अन्न लोग खाते हैं।” स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह राजा बाहर से ही महान न थे, भीतर से भी शुद्ध मन और भले हृदय वाले एक उन्नत आत्मा थे। पर एक गर्म रात राजा महल की छत पर लेटे थे कि ऊपर से हंस उड़ते निकले। पीछे वाले हंस ने आगे वाले को टोका, “ओ चौड़ी आँखों वाले (भल्लाक्ष, यानी जिसकी आँखें तो बड़ी हैं पर देखता ठीक से नहीं), सँभलकर! नीचे जानश्रुति का तेज आकाश तक उठ रहा है, कहीं उसमें जल न जाना।”
आगे वाले हंस ने हँसी उड़ाई, “यह जानश्रुति है कौन, जिसके तेज से मैं जलूँगा? आप ऐसे कह रहे हैं जैसे वह गाड़ी वाले रैक्व (सयुग्वन् रैक्व, अपनी गाड़ी के साथ रहने वाला रैक्व) जितना बड़ा हो। पासे के खेल में जो कृत (सारे अंकों को जीत लेने वाला परम ऊँचा दाँव) पड़ता है, उसमें बाक़ी सारे दाँव अपने-आप समा जाते हैं; वैसे ही दुनिया में लोग जो भी पुण्य करते हैं, सब उस रैक्व के पुण्य में समा जाता है।” स्वामी जी समझाते हैं कि यह तुलना ही चोट थी। राजा का सारा दान, उनकी सारी नेकी, उस एक ज्ञानी के सामने मानो समुद्र में गिरती नन्ही धाराएँ थीं। राजा सारी रात करवटें बदलते रहे, “जो कुछ मैं करता हूँ, अगर वह किसी और के आगे कुछ भी नहीं, तो मेरे दान का, मेरी नेकी का मोल ही क्या?”

सुबह जब चारण राजा का यशगान करने आए, तो पहली बार राजा को वह स्तुति काँटे-सी चुभी। उन्होंने अपने सारथी-सेवक (क्षत्ता) को बुलाकर वही हंस वाले शब्द दोहरा दिए और रैक्व को ढूँढ लाने भेजा। सेवक नगरों-बाज़ारों में भटका पर कोई न मिला। राजा ने डाँटा, “ऐसे महापुरुष नगर में नहीं रहते। नदी-तट, एकान्त, तीर्थ, जहाँ ब्रह्म के जानने वाले बसते हैं, वहाँ खोजिए।” आख़िर किसी गाँव के कोने में सेवक को एक दीन-सा आदमी मिला, अपनी गाड़ी के नीचे बैठा, खाल की खुजली खुजलाता, चारों ओर कोई नहीं। सेवक ने झुककर पूछा, “क्या आप गाड़ी वाले रैक्व हैं?” उन्होंने बेपरवाही से कहा, “हाँ जी, वही हूँ मैं।”
राजा छह सौ गायें, एक सोने का हार और खच्चरों का रथ लेकर पहुँचे और बोले, “हे महान्, यह सब लीजिए और जिस देवता की आप उपासना करते हैं, उस विद्या में मुझे दीक्षा दीजिए।” रैक्व ने कुछ न लिया, उल्टे फटकारा, “अरे शूद्र, यह सब वापस ले जाइए, अपनी गायों समेत यहाँ से जाइए।” स्वामी कृष्णानन्द यहाँ एक ज़रूरी बात खोलते हैं। ब्रह्मसूत्रों में इस “शूद्र” शब्द पर बहुत बहस हुई कि क्या शूद्र को ब्रह्मविद्या दी जा सकती है। पर व्याख्याकारों के अनुसार यहाँ शूद्र का अर्थ नीची जाति नहीं; यहाँ इसका मतलब वह है जो शोक में डूबा हो (शुच्, यानी शोक से बना प्रतीक-शब्द)। राजा क्षत्रिय थे, शोकग्रस्त होकर ज्ञान की दिशा में दौड़े चले आए थे, इसी से उन्हें “शूद्र” कहा गया।
राजा हारे नहीं। दूसरी बार और भी सब लेकर आए, एक हज़ार गायें, हार, रथ, और साथ अपनी पुत्री भी, रैक्व को अर्पित करने। स्वामी जी कहते हैं कि यहीं पंक्तियों के बीच कुछ छिपा है जिसके बारे में यह उपनिषद् चुप रहता है। अपनी बेटी देने को तैयार होना कोई साधारण बात नहीं; इसी में रैक्व ने राजा की सच्ची तड़प पहचानी। जो सच्चा न होता, वह पहली ठुकराहट पर लौट जाता। रैक्व का मन पिघला, “इतना सब लेकर आए हैं कि मैं बोलूँ? अच्छा, आपकी सच्चाई देखकर मैं कहूँगा।” राजा ने जिस गाँव में रैक्व बैठे थे वही गाँव, और कई गाँव, उन्हें भेंट कर दिए (वे रैक्वपर्ण कहलाए)। फिर रैक्व ने उन्हें संवर्ग-विद्या में दीक्षा दी, यानी उस तत्त्व का ज्ञान जो सब कुछ अपने में समेट लेता है (संवर्ग, वह सोख लेने वाला जिसमें सब प्रवेश कर जाता है)।
विद्या इस तरह है। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि बाहर के जगत् में यह समेटने वाला है वायु, कोई मामूली हवा नहीं; यह तो वह विराट प्राण-तत्त्व है जिसे सूत्रात्मा और हिरण्यगर्भ कहते हैं। जब आग बुझती है तो वायु में समा जाती है; सूरज डूबता है तो वायु में, चाँद ढलता है तो वायु में, पानी सूखता है तो वायु में। दीपक की लौ बुझाइए, वह जाती कहाँ है, कोई नहीं जानता। ग्रह, तारे, सूरज सब एक नियम में घूमते हैं तो इसी तत्त्व के “भय” से, मानो यही सबको चलाने वाली केन्द्रीय सत्ता है। और भीतर, व्यक्ति के भीतर, यही तत्त्व प्राण होकर काम करता है। जब हम सोते हैं तो प्राण ही मन को अपने में खींच लेता है, वाणी, आँख, कान, सब इन्द्रियाँ प्राण में समा जाती हैं। स्वामी जी ज़ोर देते हैं कि बाहर का वायु और भीतर का प्राण, ये दो समेटने वाले असल में एक ही हैं, ब्रह्माण्ड और पिण्ड (बड़ा विश्व और यह छोटी देह) का एक ही तत्त्व; ध्यान में इन दोनों को एक करके देखना ही इस विद्या का मर्म है। और वे यह भी कहते हैं कि असली दीक्षा शब्दों का दोहराना नहीं, गुरु की इच्छा-शक्ति का शिष्य में उतर आना है, तभी यह ज्ञान फलता है।
सार: सच्चा ज्ञान न पद से तौला जाता है न दान की गिनती से; जिस दिन हमें अपनी कमी का गहरा शोक होता है, उसी दिन हम शूद्र (शोक वाले) बनकर ज्ञान की ओर सच में दौड़ते हैं। और जिस तत्त्व को रैक्व ने पकड़ा था वह यही है, जैसे आग, सूरज, चाँद और जल वायु में समा जाते हैं, वैसे हमारी सारी इन्द्रियाँ प्राण में समा जाती हैं; बाहर का समेटने वाला और भीतर का समेटने वाला, दोनों एक ही परम सत्ता हैं।
राजा अश्वपति और छह पंडित: एक ही विराट के छह अंग
हालात कुछ यूँ हैं कि पाँच बड़े विद्वान, सब के सब बरसों से ध्यान करने वाले, बड़े-बड़े यज्ञ रचाने वाले, एक उलझन लेकर आपस में बैठे हैं। हर एक अपने ढंग से आत्मा का ध्यान करता है, हर एक को फल भी ख़ूब मिला है, फिर भी मन के किसी कोने में काँटा-सा चुभता रहता है। प्राचीनशाल औपमन्यव, सत्ययज्ञ पौलुषि, इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय, जन शार्कराक्ष्य और बुडिल आश्वतराश्वि, ये पाँचों आपस में पूछते हैं, “आत्मा क्या है? ब्रह्म क्या है? हमारे ध्यानों में मेल क्यों नहीं बैठता?” कोई किसी को संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाता। तब वे तय करते हैं कि उद्दालक आरुणि के पास चलें, जो उपनिषद्-प्रसिद्ध एक प्रकांड आचार्य हैं।
उद्दालक आरुणि इतने सारे दिग्गजों को एक साथ अपनी कुटिया की ओर आता देखकर भीतर ही भीतर घबरा जाते हैं। वह सोचते हैं, “ये कोई साधारण लोग नहीं। ज़रूर कोई कठिन प्रश्न लेकर आ रहे हैं, और हो सकता है मैं उत्तर न दे पाऊँ। बेहतर है इन्हें किसी और के पास भेज दूँ।” स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि उद्दालक की यह विनम्रता बनावटी नहीं थी, उन्हें भी अपने ध्यान में वही कमी खटकती थी जो औरों को। इसलिए वह कहते हैं, “हे महानुभावो, मैं भी आप ही की नाव में सवार हूँ। चलिए, हम सब मिलकर उस राजा अश्वपति कैकेय के पास चलें, जो वैश्वानर-विद्या (सर्वव्यापी विराट आत्मा का ध्यान) के सिद्ध साधक हैं।” इस तरह छह जिज्ञासु राजा के द्वार पर पहुँचते हैं।
राजा अश्वपति समझते हैं कि ब्राह्मण लोग दान-दक्षिणा की आस में आए हैं। वह बड़े आदर से उनका स्वागत करते हैं और कहते हैं, “मेरे राज्य में न कोई चोर है, न कंजूस, न शराबी, न कोई अनपढ़, न कोई व्यभिचारी। मैं यज्ञ करने जा रहा हूँ, ऋत्विजों (यज्ञ कराने वाले पुरोहितों) को जितना दूँगा उतना ही आपको भी दूँगा।” पर पंडित हाथ जोड़कर कहते हैं, “हम धन के लिए नहीं आए। जो जिस प्रयोजन से आता है, उसे वही कह देना चाहिए। हम तो आपके पास उस वैश्वानर-आत्मा के ज्ञान के विद्यार्थी बनकर आए हैं, जिसे हम नहीं जानते।” फिर वे, उम्र में राजा से बड़े होते हुए भी, समिधा (हवन की पवित्र लकड़ी) हाथ में लेकर, शिष्य की तरह उनके सामने झुक जाते हैं।
राजा एक-एक से पूछते हैं, “आप किस आत्मा का ध्यान करते हैं?” औपमन्यव कहते हैं, “मैं स्वर्ग (द्युलोक, ऊपर का परम प्रकाशमान लोक) को ही परम मानकर ध्यान करता हूँ।” राजा उत्तर देते हैं, “यह तो विराट का सिर है, पूरा शरीर नहीं। आपने अंश को पूरा मान लिया, इसीलिए घर में धन-धान्य की कमी नहीं, पर समय रहते न आते तो किसी दिन आपका सिर ही गिर पड़ता।” सत्ययज्ञ सूर्य का ध्यान करते हैं, राजा कहते हैं वह तो विराट की आँख है, आप अंधे हो सकते थे। इन्द्रद्युम्न वायु को परम मानते हैं, वह विराट की साँस है। जन शार्कराक्ष्य आकाश को, वह विराट का धड़ है। बुडिल जल को, वह विराट का निचला उदर है। और उद्दालक स्वयं पृथ्वी का ध्यान करते हैं, राजा कहते हैं वह तो विराट के पाँव हैं, सब अंगों में नीचे का अंग, समय रहते न आते तो आपके पैर ही सूख जाते।
फिर राजा सबको एक साथ संबोधित करते हैं। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार राजा यहाँ ठीक दो भूलें गिनाते हैं। पहली, इन सबने सीमित को असीम मान लिया, मन तो हमेशा किसी न किसी सीमित वस्तु को ही पकड़ पाता है, चाहे वह कितनी भी फैली हुई क्यों न लगे। दूसरी, और इससे गहरी भूल, इन्होंने आत्मा को अपने बाहर की कोई चीज़ मान लिया, “वह सूरज है, वह जल है, वह आकाश है।” स्वामी जी कहते हैं, राजा का प्रश्न मार्मिक है, “अनात्मा (जो आत्मा से इतर है) भला आत्मा कैसे हो सकता है? आपका अपना स्वरूप आपसे बाहर कैसे होगा? आत्मा अपने आप का विषय नहीं बन सकता, अपने को किसी दूसरे की तरह नहीं देख सकता।” राजा इसे हाथी और छह अंधों की कथा से समझाते हैं, हर अंधा हाथी के एक अंग को छूकर उसी को पूरा हाथी मान बैठा था।

तब राजा वह सुंदर दृष्टान्त देते हैं जिसे स्वामी कृष्णानन्द बार-बार दोहराते हैं। “बड़े पेड़ को सींचना हो तो क्या आप ऊपर चढ़कर हर पत्ते, हर फूल पर अलग-अलग पानी और खाद डालते हैं? ऐसा कोई नहीं करता, सयाना तो जड़ सींचता है, और सारा पेड़ अपने आप लहलहा उठता है।” राजा कहते हैं, जो फल आपने अलग-अलग टुकड़ों के ध्यान से थोड़ा-थोड़ा पाया, वही समूचा फल एक ही चोट में मिल जाएगा यदि आप विराट को एक साथ, पृथ्वी से स्वर्ग तक, ऊँचे से नीचे तक, बिना एक भी कड़ी छोड़े, अपनी आत्मा के रूप में देख लें। स्वामी जी जोड़ते हैं कि यह कठिन है, मन फिसलकर बार-बार टुकड़ों में लौट आता है, पर जो ऐसा कर लेता है वह हर लोक की, हर प्राणी की आत्मा बन जाता है, और उसका हर काम विराट का ही यज्ञ बन जाता है।
सार: अंश को पूरा मानकर की गई उपासना फल तो देती है, पर अधूरी रह जाती है, और किसी दिन ठोकर भी पहुँचाती है। आत्मा को बाहर की कोई वस्तु बनाकर खोजने में ही चूक है, क्योंकि जिसे आप खोज रहे हैं वही आप हैं। पत्ते-पत्ते को सींचना छोड़िए, जड़ सींचिए, समूचे विराट को एक साथ अपना स्वरूप जान लीजिए, बाक़ी सब अपने आप लहलहा उठेगा।
पंचाग्नि-विद्या: मरने के बाद की दो राहें
दृश्य एक राजसभा का है। श्वेतकेतु, आचार्य उद्दालक आरुणि के पुत्र, बड़े पढ़े-लिखे और इसी बात पर बड़े मगन। विद्वानों की मण्डली में, राजाओं के दरबारों में अपनी विद्या का परचम लहराना उनकी आदत थी। ऐसे ही वह पाँचाल देश के राजा प्रवाहण जैवलि के दरबार में जा पहुँचते हैं। राजा उनका आदर-सत्कार करते हैं, फिर पूछते हैं, “आपकी शिक्षा पूरी हो गई? पिता ने सब सिखा दिया?” युवक का जवाब था, “जी हाँ, मैं सब जानता हूँ।”
तब राजा पाँच प्रश्न रखते हैं। मरने के बाद जीव कहाँ जाता है? लौटकर इस लोक में फिर कहाँ से आता है? देवयान (देवताओं की उत्तर वाली राह) और पितृयान (पितरों की दक्षिण वाली राह), इन दोनों राहों का भेद क्या है? परलोक कभी भर क्यों नहीं जाता, चाहे जितने लोग वहाँ जाएँ? और वह पाँचवीं आहुति कौन-सी है जिससे जल मानो मनुष्य बन जाता है? एक भी उत्तर श्वेतकेतु से न बना। जो अहंकार विद्या का ओढ़े बैठे थे, वह उतर गया, और वह रोते हुए पिता के पास भागे। उद्दालक ने सच कहा, “बेटा, ये बातें हम भी नहीं जानते। चलिए, हम दोनों राजा के पास शिष्य बनकर चलते हैं।” पुत्र की लाज आड़े आई, सो आचार्य अकेले गए। राजा ने धन देना चाहा, पर आचार्य ने केवल यही ज्ञान माँगा। तब राजा ने उन्हें कुछ काल (परम्परा कहती है, लगभग एक वर्ष) ठहराया, क्योंकि यह विद्या अब तक क्षत्रियों के पास गुप्त रही थी, और तभी यह रहस्य खोला।
स्वामी कृष्णानन्द पहले एक चेतावनी देते हैं। पंचाग्नि-विद्या में जिन पाँच अग्नियों की बात है, वे कोई असली आग नहीं हैं। ये ध्यान की युक्तियाँ हैं, चिन्तन के सोपान हैं। उपनिषद् यहाँ यज्ञ का रूपक लेकर पूरी सृष्टि को ही एक यज्ञ की तरह देखना सिखाता है। उनके अनुसार किसी बच्चे का जन्म केवल माँ के गर्भ की घटना नहीं है। एक नन्हे शिशु के आने में पूरा ब्रह्माण्ड हिलता है, सारा विश्व उसका माता-पिता है। इसीलिए वे कहते हैं, इस जगत में कोई निजी घटना है ही नहीं; हर जन्म एक “वैश्विक दबाव का बिन्दु” है। यह जानना ही बन्धन से छूटने की कुंजी है।
अब वे पाँच अग्नियों का खुलासा करते हैं। पहली अग्नि है द्युलोक, यानी वह ऊपर का दिव्य लोक, जिसमें देवता श्रद्धा (आस्था की आहुति) होमते हैं, और उससे सोम (अमृतमय सूक्ष्म तत्त्व) उपजता है। दूसरी अग्नि है पर्जन्य (वर्षा का देवता), जिसमें सोम होमा जाता है और वर्षा जन्म लेती है। तीसरी अग्नि है यह पृथ्वी, जिसमें वर्षा होमी जाती है और अन्न उपजता है। चौथी अग्नि स्वयं पुरुष है, जो अन्न खाकर वीर्य रचता है, और पाँचवीं अग्नि स्त्री है, जिसके संयोग से शिशु जन्मता है। स्वामी जी समझाते हैं कि हमारे कर्म इस महायज्ञ की आहुतियाँ हैं। हर कर्म एक सूक्ष्म असर छोड़ जाता है जिसे वे अपूर्व (कर्म से जन्मा नया, अनदेखा परिणाम) कहते हैं, और यही अपूर्व तय करता है कि मरने के बाद हमारे साथ क्या होगा।
इसके बाद आती हैं वे दो राहें, जो प्रश्न के मर्म थीं। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार पहली है देवयान, जिसे अर्चिरादि-मार्ग (प्रकाश से शुरू होने वाली राह) या उत्तरायण की राह भी कहते हैं, प्रकाश की राह। जो इस विद्या को केवल पढ़ते नहीं, अपने जीवन में जीते हैं, तप और श्रद्धा से भरे रहते हैं, मरने पर वे अग्नि-देवता के पास, फिर दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण के छह मास, संवत्सर (वर्ष), सूर्य, चन्द्रमा और अन्त में विद्युत (बिजली, जो यहाँ ज्ञान की चमक का प्रतीक है) के लोक तक चढ़ते जाते हैं। वहाँ, सृष्टिकर्ता की दहलीज़ पर, व्यक्ति का अपना यत्न थम जाता है और एक अमानव पुरुष (मानवों से परे एक दिव्य सत्ता) हाथ थामने आ जाता है। स्वामी जी इस क्षण को बड़े स्नेह से कहते हैं, मानो देवता पुकार उठते हैं, “देखो, निर्वासित लौट आया, बिछड़ा हुआ पुत्र घर आ गया।” यह पुरुष उसे ब्रह्मलोक तक ले जाता है, और वहाँ से लौटना नहीं होता।
दूसरी राह है पितृयान, धूम-मार्ग या दक्षिण की राह। स्वामी जी के अनुसार जो लोग ज्ञान की यह गहराई तो नहीं जीते, पर इष्ट-पूर्त (यज्ञ और लोक-कल्याण के पुण्य कर्म) करते हैं, दानी और परोपकारी रहते हैं, वे धुएँ के देवता से होते हुए रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन के छह मास से गुज़रते हैं। पर ध्यान रहे, वे संवत्सर के देवता को छूते नहीं; यहीं दोनों राहें बँट जाती हैं। फिर वे पितृलोक, आकाश और चन्द्रलोक पहुँचते हैं। स्वामी जी का मार्मिक दृष्टान्त यह है कि वहाँ जीव अतिथि की तरह रहता है, नागरिक नहीं। सारी सुख-सुविधा मिलती है पर अधिकार कोई नहीं; जन्मजात देवताओं के सामने वह नीचे दर्जे का है, मानो उनका “भोजन” हो। पुण्य का बल चुकते ही उसे लौटना पड़ता है, उसी राह से उतरते हुए, आकाश, वायु, धुआँ, बादल, वर्षा और अन्त में अन्न के साथ मिलकर, और उसी अन्न से किसी नए गर्भ में। उपनिषद् कहता है, इस उतार को रोकना बड़ा कठिन है।
अन्त में स्वामी कृष्णानन्द उस गाँठ को खोलते हैं जो पूरे प्रसंग में बँधी थी। बार-बार दोहराया गया “जो यह जानता है” (य एवं वेद, अर्थात् जो इसे इस तरह जान ले) का अर्थ किताब पढ़ लेना नहीं है। उनके अनुसार उपनिषद् में ज्ञान का अर्थ है स्वयं जीवन; ज्ञान वही है जो आपका अस्तित्व बन जाए। बन्धन वस्तुओं से नहीं, उनके बारे में हमारी भूल से है। नियम की अनभिज्ञता ही बेड़ी है, और जिसने नियम को इस तरह जान लिया कि वह उसका स्वभाव बन गया, उस पर कर्म का नियम चलता ही नहीं।
सार: मरने के बाद दो राहें हैं। पुण्य की राह चन्द्रलोक तक ले जाती है, पर वहाँ हम मेहमान भर हैं, पुण्य चुका कि लौट आए। ज्ञान की राह वह है जहाँ से लौटना नहीं। पर वह ज्ञान पढ़ा हुआ नहीं, जिया हुआ होता है; जब समझ हमारा अपना अस्तित्व बन जाए, तभी राह की वह बिजली अपने आप कौंध उठती है।
महावाक्य की ओर
शाण्डिल्य-विद्या: हृदय में बैठा वह, जो कण से छोटा और लोकों से बड़ा
छान्दोग्य उपनिषद् के तीसरे अध्याय के चौदहवें खंड में ऋषि शाण्डिल्य, एक प्रकांड द्रष्टा (वह जिसने सत्य को आँख से नहीं, भीतर के अनुभव से देखा हो), अपनी एक प्राप्ति हमारे सामने रखते हैं। यह कोई शुष्क सिद्धांत नहीं, यह उनकी ध्यान-साधना का निचोड़ है, इसीलिए परम्परा इसे शाण्डिल्य-विद्या कहती है। विद्या यहाँ केवल जानकारी नहीं, यह परम लक्ष्य पर मन को टिकाने की एक कला है, उपासना का एक ढंग। और शाण्डिल्य इसकी शुरुआत एक घोषणा से करते हैं, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (यह सब कुछ, जो दिख रहा है, वास्तव में ब्रह्म ही है)।
इसी एक वाक्य के साथ वह आगे का सूत्र देते हैं, “तज्जलान्”। स्वामी कृष्णानन्द इसे यूँ खोलते हैं कि यह सारा संसार उसी से जन्मा है, उसी में टिका हुआ है, और अन्त में उसी में लौट जाता है। जो सबका उद्गम है, सबका आधार है, और सबका विलय है, वही ब्रह्म है। और चूँकि वह सबका कारण है, तो हर कार्य, यह पूरी सृष्टि, उसी में समाई हुई है। हम भी तो इसी सृष्टि का एक कार्य हैं, इसलिए हम भी उसी में हैं। कारण और कार्य के बीच कोई दरार नहीं, कोई खाई नहीं। इसी कारण शाण्डिल्य कहते हैं, इसी सत्य को शांत होकर, स्थिर मन से, चुपचाप इसकी उपासना करनी चाहिए।
स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यही इस ध्यान की कठिनतम बात है। हम संसार की कोई भी वस्तु बाहर रखकर उस पर सोच सकते हैं, पूरे ब्रह्मांड पर भी सोच सकते हैं, परन्तु उस वस्तु पर नहीं सोच पाते जिसमें हम ख़ुद डूबे हुए हैं। यहाँ ध्यान करने वाला स्वयं उसी का अंश है जिसका ध्यान करना है। मन यहाँ काम करने से इनकार कर देता है, क्योंकि मन कभी ख़ुद अपने आपको नहीं सोच सकता, वह सदा कोई दूसरी चीज़ ही सोचता है। इसीलिए यह कोई साधारण ध्यान नहीं, इसके लिए असाधारण मन-शुद्धि चाहिए, क्योंकि यहाँ आप किसी और को नहीं, अपने ही असली स्वरूप को निहार रहे हैं।
फिर आता है एक और गहरा शब्द, “क्रतु” (मन का संकल्प, इच्छा का बल, निश्चय)। स्वामी जी इस पर ठहरकर कहते हैं कि मनुष्य अपने संकल्प से किए कर्म का ही साकार रूप है। हम जीवन भर किसी न किसी रूप में संकल्प करते रहते हैं, और जैसा संकल्प हम तीव्रता से करते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं। हमारे आज के अनुभव हमारी पुरानी इच्छाओं का ही फल हैं। तो यहाँ एक चेतावनी छिपी है: यदि हमें ब्रह्म ही बनना है, तो जीवन भर हमारा संकल्प, हमारा सोच किस ढंग का होना चाहिए? इसी से शाण्डिल्य कहते हैं, श्रद्धा से, पूरे विश्वास के साथ उसी में मन को घोलते रहना चाहिए।
अब वह असली रहस्य कहते हैं। हृदय के भीतर बैठा यह आत्मा (हमारा गहरा-से-गहरा स्वरूप) चावल या जौ के दाने से भी छोटा है, उससे भी सूक्ष्म जो उसके भीतर का कण हो, राई के दाने से भी महीन। स्वामी कृष्णानन्द पूछते हैं, तो क्या वह राई जितना छोटा ही है? और तुरंत उत्तर देते हैं कि नहीं, वही एक साथ इस पूरी सृष्टि जितना विशाल भी है। वह इस धरती से बड़ा है, इस अंतरिक्ष से बड़ा है, आकाश और स्वर्ग से बड़ा है, इन चौदह लोकों से भी बड़ा, इतना असीम कि कोई लोक उसकी विशालता को नाप ही नहीं सकता। और फिर भी वह विशाल असीम हमारे, आपके, हर एक के हृदय में किसी नन्ही ज्योति की तरह बैठा है।
स्वामी जी समझाते हैं कि यह छोटे-बड़े का चित्रण केवल ध्यान के लिए है, ताकि हमें यह बात भीतर तक उतर जाए कि वह परम सत्ता न तो केवल हमसे दूर बाहर फैली कोई असीमता है, न केवल हमारे भीतर बैठा कोई कण; वह दोनों है। उपनिषद् यही एक बात बार-बार हमारे मन में ठोक-ठोककर बैठाता है: वह सत्ता बाहर से असीम है, और भीतर से हर किसी की अपनी आत्मा है। उसी कारण आत्मा को ब्रह्म कहते हैं, क्योंकि वह सबकी आत्मा है; अकेले में वह आत्मा है, सबमें फैलकर वही ब्रह्म है। इसलिए जो एक के भीतर आत्मा है, वही हर जगह का ब्रह्म है।

शाण्डिल्य अपनी विद्या यहाँ बाँधते हैं, “एतद् ब्रह्म” (यही ब्रह्म है), और “अहं ब्रह्मास्मि” के स्वर में कहते हैं, यही ब्रह्म मैं हूँ, इसी भाव से ध्यान करना चाहिए। स्वामी कृष्णानन्द जोड़ते हैं कि यह बस सुबह उठते ही मन में आने वाला पहला विचार बन जाना चाहिए, और यह तब तक चलता रहे जब तक आत्म-साक्षात्कार न हो जाए। पर एक शर्त सब पर भारी पड़ती है, श्रद्धा। शाण्डिल्य कहते हैं, जिसके मन में इस सत्य पर ज़रा भी संदेह न रहे (“क्या मैं इसके योग्य हूँ”, “क्या मुझे यह मिलेगा”), जो डगमगाए बिना अटल विश्वास रखे, वही इसे अवश्य पा लेता है, इसमें कोई संशय नहीं।
सार: हम जैसा गहराई से, लगातार सोचते और चाहते हैं, अन्ततः वही बन जाते हैं। तो शाण्डिल्य की सीख यही है, उस परम को बाहर असीम और भीतर अपना ही गहरा स्वरूप मानकर, बिना किसी संदेह की दरार के, श्रद्धा से ध्यान करते रहिए; क्योंकि जिसे आप खोज रहे हैं, वह राई से भी महीन होकर आपके ही हृदय में बैठा है, और लोकों से बड़ा होकर सब जगह आप ही हैं।
उद्दालक और श्वेतकेतु: वह तत्त्व आप ही हैं
आश्रम से लौटे बेटे को पिता एक नज़र देखते हैं और कुछ खटक जाता है। उद्दालक आरुणि, एक प्रकांड आचार्य, ने श्वेतकेतु को बारह बरस की उमर में गुरुकुल भेजा था इस सोच के साथ कि हमारे कुल में कोई केवल नाम का ब्राह्मण न रह जाए, भीतर से भी वैसा ही हो। चौबीस का होकर बेटा बारह वर्ष में सारे वेद पढ़कर लौटा है, पर साथ में एक और चीज़ भी लाया है, अकड़। वह तनकर बैठता है, मानो उसने सब जान लिया हो। पिता पूछते हैं, “क्या आपने अपने गुरु से वह आदेश (वह मूल ज्ञान) भी माँगा, जिसे जान लेने पर अनसुना सुन लिया जाता है, अनसोचा सोच लिया जाता है, अनजाना जान लिया जाता है?” बेटा चुप रह जाता है। ऐसी कोई बात उसने सुनी ही न थी।
उद्दालक एक सीधा-सा दृष्टांत रखते हैं। मिट्टी का एक लोंदा जान लीजिए, तो मिट्टी से बने सारे बर्तन जान लिए, क्योंकि घड़ा, कटोरा, थाली, यह सब केवल नाम हैं, आकार हैं। बर्तन की असलियत मिट्टी ही है। स्वामी कृष्णानन्द इसे वाचारम्भण (केवल वाणी से उठा हुआ, नाम भर) कहते हैं, यानी “घड़ा है” कहना एक धोखा है, वहाँ घड़ा है ही नहीं, केवल मिट्टी है। सोने की एक डली से सारे गहने, लोहे के एक औज़ार से सारे लोहे के काम, उसी तरह जान लिए जाते हैं। स्वामी जी इससे एक चौंका देने वाली बात निकालते हैं, कि जगत् की सारी विविधता असल में नामों का खेल है; मूल वस्तु एक ही है, और हम आकारों के फेर में पड़कर एक को दूसरे से अलग मान बैठते हैं।
फिर पिता उस मूल तक ले जाते हैं। “आरम्भ में सत् (शुद्ध होना, जो सदा है) ही था, एक ही, अद्वितीय (जिसके सिवा दूसरा कुछ नहीं)।” कुछ लोग कहते हैं आरम्भ में असत् (नहीं-होना) था और उसी से होना निकल आया, पर उद्दालक इसे हँसी में उड़ा देते हैं। स्वामी कृष्णानन्द उनके तर्क को यों खोलते हैं, कि न-कुछ से कुछ कभी नहीं निकल सकता; होना केवल होने से ही आ सकता है, इसलिए सत् किसी का कार्य नहीं, वह तो सबका मूल कारण है, जिसके आगे कोई बड़ा कारण बचता ही नहीं। यही सत् इंद्रियों की पकड़ और मन की कल्पना से परे है, क्योंकि स्वामी जी के अनुसार जिस चेतना से हम जानते हैं, वही तो यह सत् है; जानने वाला अपने को वस्तु बनाकर कैसे जाने।

अब उद्दालक उसी सत् को हर घूँट में दिखाते हैं। वह श्वेतकेतु से रात को एक डली नमक पानी में डलवाते हैं। सुबह कहते हैं, “वह नमक निकाल लाइए।” बेटा देखता है, नमक तो घुल गया, दिखता ही नहीं। पिता कहते हैं, “ऊपर से एक घूँट चखिए।” खारा। “बीच से।” खारा। “नीचे से।” खारा। नमक आँख से ओझल है, पर हर बूँद में मौजूद है। स्वामी कृष्णानन्द इसे ठीक उसी सत् का रूपक मानते हैं जो सारी सृष्टि में घुल गया है, आँख से न दीखता हुआ पर हर कण में बसा हुआ; और जैसे नमक को चखकर जाना जाता है, देखकर नहीं, वैसे ही यह सत् इंद्रियों से नहीं, किसी और ही भीतरी दृष्टि से पहचाना जाता है, जो गुरु की कृपा और संकेत से जागती है।

फिर वह बरगद का दृष्टांत देते हैं। बेटे से एक फल मँगवाकर कहते हैं, “तोड़िए।” भीतर नन्हे-नन्हे बीज। “एक बीज तोड़िए।” “तोड़ दिया, पिताजी।” “अब इसमें क्या दिखता है?” “कुछ नहीं दिखता।” तब उद्दालक कहते हैं, यह जो सूक्ष्म-सा कुछ आपको दिखता तक नहीं, उसी अणिमा (वह बारीक-से-बारीक सार) से यह विशाल बरगद खड़ा हुआ है। स्वामी जी समझाते हैं कि वही अदृश्य सूक्ष्म तत्त्व पूरे वृक्ष का आत्मा (मूल स्वरूप) है; उसके बाहर पेड़ का कोई अलग अस्तित्व है ही नहीं। और जैसे शहद में सैकड़ों फूलों का रस घुलकर एक हो जाता है, या जैसे गंगा-यमुना सागर में मिलकर अपना अलग नाम भूल जाती हैं पर मिटती नहीं, वैसे ही सारे जीव उसी सत् में लौटते हैं, अपनी अलग-अलग पहचान खोकर, पर नष्ट हुए बिना।
इन सब उदाहरणों के सिरे पर उद्दालक वही एक वाक्य बार-बार रखते हैं, “जो यह बारीक-से-बारीक सार है, वही सबका स्वरूप है, वही सत्य है, वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु, वह तत्त्व आप ही हैं, तत्त्वमसि (वह तत्त्व आप ही हैं)।” यह बात नौ बार दोहराई जाती है, हर नये दृष्टांत के बाद एक बार, क्योंकि स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह कानों से सुन लेने भर की बात नहीं; इसे एक-एक उदाहरण से मन में उतरना होता है, परत-दर-परत। बेटे की अकड़ अब प्रश्न में बदल चुकी है, “और बताइए, पिताजी।” जो पहले सब जान लेने के घमंड से चुप था, वह अब सीखने की प्यास से बोल रहा है।
सार: घड़ा एक नाम है, असली मिट्टी है; जगत् एक नाम है, असली वह सत् है। जैसे नमक हर घूँट में घुला है पर आँख से ओझल, और जैसे अनदेखे बीज में पूरा बरगद छिपा है, वैसे ही वह सूक्ष्म तत्त्व हर चीज़ का मूल है। उसे एक बार जान लीजिए, सब जान लिया; और वह कहीं दूर नहीं, वह तत्त्व आप ही हैं, तत्त्वमसि।
भीतर का असीम
सनत्कुमार और नारद: भूमा, वह असीम जहाँ कोई कमी नहीं

दृश्य यों है। नारद, देवर्षि, तीनों लोकों में आते-जाते रहने वाले, जिनके लिए धरती, आकाश और देवलोक सब खुले हैं, एक दिन सनत्कुमार के पास आते हैं। सनत्कुमार ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं, एक ऐसे आचार्य जिन्हें यह उपनिषद् पार उतार देने वाला गुरु मानता है। नारद विनम्र होकर बैठ जाते हैं और कहते हैं, “भगवन्, हमें सिखाइए।” आचार्य पूछते हैं, “आप जो जानते हैं, पहले वह बता दीजिए; फिर जो आगे रहेगा, वह हम कहेंगे।”
नारद एक लम्बी सूची गिनाते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण, व्याकरण, गणित, निधि-विद्या, तर्क, नीति, ज्योतिष, भूत-विद्या, देव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, और भी न जाने कितनी विद्याएँ। फिर वह जोड़ते हैं, “भगवन्, हम मन्त्र-वित् (शब्दों के, सूत्रों के जानकार) हैं, आत्म-वित् (अपने स्वरूप के ज्ञाता) नहीं। हमने आप जैसों से सुना है कि जो आत्मा को जानता है वह शोक के पार उतर जाता है। हम शोक में हैं। इतनी विद्या के बाद भी मन को चैन नहीं। आप हमें इस शोक के समुद्र से पार लगा दीजिए।” सनत्कुमार सारी सूची पर मानो धूल फेर देते हैं और कहते हैं, “यह सब केवल नाम है।”
स्वामी कृष्णानन्द इस पहले उत्तर को बड़े मार्के की बात मानते हैं। उनके अनुसार नारद के पास हर वस्तु का नाम है, सूचना है, पर वस्तु स्वयं उनके वश में नहीं। सूरज की भीतरी बनावट का ज्ञान होने से सूरज हमारी सम्पत्ति नहीं हो जाता। यही हाल हर किताबी विद्या का है, वह नाम पर अटकी रहती है, उस सत्ता तक नहीं पहुँचती जिसकी ओर नाम इशारा भर करता है। फिर भी स्वामी जी कहते हैं कि सनत्कुमार नाम को बेकार नहीं ठहराते; यह तो ज्ञान की पहली सीढ़ी है, इसलिए वह कहते हैं, “नाम की ही उपासना कीजिए,” अर्थात् जिस लोक में आप खड़े हैं उसी का पूरा स्वामी पहले बन जाइए।
यहीं से वह एक के बाद एक चढ़ती सीढ़ियों वाली खोज शुरू होती है। हर बार नारद पूछते हैं “क्या इससे ऊँचा कुछ और भी है?” और हर बार आचार्य “हाँ” कहकर आगे ले जाते हैं। नाम से ऊपर वाणी (बोली, जो नाम को जन्म देती है), वाणी से ऊपर मन (जो दो छोटे फलों को मुट्ठी में थामने की तरह नाम और वाणी दोनों को अपने में समेटे रहता है), फिर संकल्प (इरादा), स्मर (आत्म-चेतना, अपने होने का बोध, जो आकाश के बोध से भी पहले है), फिर आशा (अपने से आगे बढ़ने की वह भीतरी पुकार जिसके बिना जीवन का कोई मोल नहीं), और प्राण (जीवन, वह अबूझ तत्त्व जिसमें पहिये की नाभि में टिकी तीलियों की तरह सब कुछ टिका है)। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि स्मर पर पहुँचते ही दिशा पलट जाती है, अब तक खोज बाहर थी, अब वह भीतर, विषय से विषयी (जो देखता-जानता है उस ओर) मुड़ जाती है।
प्राण के बाद आचार्य सत्य, विज्ञान, मति, श्रद्धा, निष्ठा और क्रिया से होते हुए सुख पर आते हैं। स्वामी जी के अनुसार यहाँ एक गहरा सत्य खुलता है: कोई भी काम तब तक होता ही नहीं जब तक उसके पीछे सुख की चाह न हो; सारी सृष्टि की हलचल असल में सुख की अपने को पा लेने की पुकार है। पर सुख कहाँ है? न अकेले मन में, क्योंकि मन स्वयं से अधूरा रहकर ही बाहर भागता है; न किसी वस्तु में, क्योंकि कोई एक वस्तु सबको, या एक को भी हर समय, नहीं रिझाती। स्वामी जी की दलील यह है कि दो परिमित (सीमित) वस्तुओं के मेल से भी परिमित ही बनता है; करोड़ों सीमित चीज़ें जोड़ दीजिए, सीमा फिर भी नहीं मिटती। इसलिए सुख किसी सीमित में हो ही नहीं सकता।
और यहीं सनत्कुमार वह वचन कहते हैं जो पूरे प्रसंग का हृदय है, “यो वै भूमा तत्सुखम्, नाल्पे सुखमस्ति।” जो भूमा (वह असीम, वह पूर्णता जिसमें कोई कमी नहीं, जिसमें और कुछ चाहना ही नहीं बचता) है, वही सुख है; अल्प (छोटे, सीमित) में सुख है ही नहीं। नारद पूछते हैं कि भूमा है क्या, तो आचार्य परिभाषा देते हैं: “जहाँ और कुछ देखने को न बचे, और कुछ सुनने को न बचे, और कुछ जानने को न बचे, वही भूमा है; और जहाँ अपने से बाहर कुछ देखा-सुना-जाना जाए, वह अल्प है।” स्वामी कृष्णानन्द इसे एक ही वाक्य में पूरी बात बाँध देना कहते हैं: भूमा ही अमृत (अमर) है, अल्प ही मर्त्य (नश्वर)। “वह किस पर टिका है?” नारद के इस प्रश्न पर आचार्य हँसते-से उत्तर देते हैं, “अपनी ही महिमा में, और सच कहें तो किसी पर नहीं टिका, क्योंकि वही तो सबका आधार है। आप संसार की चीज़ों की तरह उसके लिए कोई टेक खोज रहे हैं; वह असीम है, आपका ‘कहाँ’ वाला प्रश्न ही अनगढ़ है।”
अन्त में आचार्य वह पर्दा भी हटा देते हैं। नीचे वही है, ऊपर वही, आगे-पीछे, दायें-बायें वही; यह सारा विश्व उसी का रूप है। और जो “अहम्” यहाँ बोला जा रहा है, स्वामी कृष्णानन्द सावधान करते हैं कि वह छोटा अहंकार, वह जीव नहीं; वही आत्मा है जो भूमा से अभिन्न है, जैसे घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का आकाश सच में दो हैं ही नहीं, बँटवारा हमारी कल्पना का है। ऐसा जानने वाला आत्म-रति, आत्म-क्रीड़ा, आत्म-आनन्द में रमता है, अपना स्वराट् (अपना स्वामी, अपना सम्राट्) हो जाता है; और जो इसे नहीं जानते, वे बाहरी चीज़ों के अधीन रहकर क्षयशील लोकों में डोलते रहते हैं। इसी विद्या से सनत्कुमार नारद को शोक के पार उतार देते हैं, और इसीलिए उपनिषद् उन्हें स्कन्द कहता है, वह जो पार छलाँग लगा गया।
सार: जिसे हम सुख कहते हैं, वह असल में पूर्णता की प्यास है, और पूर्णता किसी सीमित चीज़ में, चाहे करोड़ों जोड़ दें, कभी पूरी नहीं होती। सुख वहीं है जहाँ और कुछ देखने-सुनने-जानने को बचता ही नहीं; वह असीम भूमा कोई दूर की वस्तु नहीं, वही आत्मा आप ख़ुद हैं।
प्रजापति और इन्द्र: असली “मैं” की खोज
दृश्य एक भरी सभा का है। प्रजापति (सृष्टि के रचयिता, जिन्हें यहाँ ब्रह्मा भी कहा गया है) अपने दरबार में खड़े होकर ऊँचे स्वर में एक घोषणा करते हैं, जिसे वहाँ बैठा हर प्राणी सुन लेता है। वह कहते हैं, “एक आत्मा (वह चेतन तत्त्व जो हम सबके भीतर बैठा है) ऐसी है जिसे कोई पाप छू नहीं सकता, जो न बूढ़ी होती है न मरती है, जिसे न शोक है न भूख न प्यास; जिसकी इच्छा सच्ची है और संकल्प तुरन्त फलित। जो इस आत्मा को खोज ले, जान ले, वह सारे लोक पा लेता है और सारी कामनाएँ। इसी को ढूँढ़ना चाहिए, इसी को जानना चाहिए।” स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह घोषणा खुली सभा में, सबके सामने हुई, और इसने अनगिनत मनों में जिज्ञासा जगा दी।
सुनने वालों में दो खेमे थे। देवता अपने राजा इन्द्र (देवराज, देवताओं के मुखिया) को आगे करके बैठक करते हैं, और तय करते हैं कि इन्द्र जाकर प्रजापति से यह विद्या सीखें। उधर असुर भी यही सुनते हैं और अपने मुखिया विरोचन (असुरों के राजा) को भेजते हैं। दोनों रास्ते में मिलते भी हैं, पर एक-दूसरे को अपना मक़सद नहीं बताते, क्योंकि वे जन्म के बैरी हैं। स्वामी जी बताते हैं कि दोनों समिधा (हवन की लकड़ी, शिष्य बनकर आने का चिह्न) हाथ में लिए प्रजापति के पास पहुँचते हैं और पूरे बत्तीस वर्ष बिना कुछ माँगे, इन्द्रियों को साधते हुए, अनुशासन में रहते हैं। तब कहीं प्रजापति पूछते हैं, “आप यहाँ इतने वर्षों से क्या चाहते हुए रह रहे हैं?”

दोनों अपनी इच्छा बताते हैं, और प्रजापति जो उत्तर देते हैं वह जान-बूझकर पहेली जैसा है। वह कहते हैं, “जो पुरुष (चेतन सत्ता) आपको अपनी आँख में दिखाई देता है, वही आत्मा है। यही अमृत है, यही अभय है, यही ब्रह्म है।” स्वामी कृष्णानन्द इस वाक्य को बहुत ध्यान से पढ़ते हैं। वह कहते हैं, प्रजापति अपनी जगह बिलकुल सही हैं, पर शब्द ऐसे हैं कि उन्हें इधर भी समझा जा सकता है, उधर भी। आँख में आख़िर दिखता क्या है? एक प्रतिबिम्ब, एक देह। तो दोनों शिष्य तुरन्त वही समझ बैठते हैं जो हम-आप भी समझ बैठते, कि जो पानी में, दर्पण में झलकता है, यह देह ही आत्मा है। प्रजापति उन्हें पानी से भरे पात्र में अपना रूप देखने को कहते हैं, और वे बाल से लेकर नख तक अपना पूरा प्रतिबिम्ब देखकर निश्चिंत हो जाते हैं।
विरोचन यहीं संतुष्ट होकर लौट जाता है। स्वामी जी कहते हैं कि वह असुरों को यही सिखाता है, कि यह देह ही असली है, इसे सजाओ-सँवारो, इसकी रक्षा करो, इसी के बल पर सारी कामनाएँ पूरी होंगी। यही स्थूल भोगवाद (देह को ही सब कुछ मानने वाली सोच) असुरों का सिद्धान्त बन जाता है; इतना कि मरे हुए शरीर तक को वे रेशम और स्वर्ण से सजाकर रखते हैं, यह भूलकर कि वह तो जा चुका है। स्वामी कृष्णानन्द एक मार्के की बात कहते हैं, “जो दिखता है वही ईश्वर है”, यह कथन एक तरह से सच है, और एक तरह से झूठ। इसका झूठा पहलू भटका देता है, सच्चा पहलू मुक्त करता है। विरोचन ने झूठा पहलू पकड़ लिया।
इन्द्र आधे रास्ते में ही ठिठक जाते हैं। उन्हें खटकता है, “अगर यह देह ही आत्मा है, तो देह अंधी हो तो आत्मा अंधी, देह लँगड़ी हो तो आत्मा लँगड़ी, देह मरे तो आत्मा भी मरी। फिर वह अमरता, वह अभय कहाँ रहा जिसकी प्रजापति ने घोषणा की थी?” वह लौट आते हैं। प्रजापति उन्हें बत्तीस वर्ष और रुकने को कहते हैं, फिर सिखाते हैं, “जो स्वप्न में आनन्द से विचरता है, वही आत्मा है।” इन्द्र संतुष्ट लौटते हैं, पर फिर रास्ते में शंका उठती है, “स्वप्न वाला भले देह के दोषों से अछूता हो, पर वह तो स्वप्न में भी भागता है, रोता है, मारा जाता है, दुख पाता है। यह अपूर्ण है, यह आत्मा कैसे?” तीसरी बार प्रजापति उन्हें गहरी नींद वाले की ओर ले जाते हैं, “जो सुषुप्ति में पूरी तरह शान्त है, कुछ नहीं जानता, कोई शोक नहीं, वही आत्मा है।” पर इन्द्र की पैनी बुद्धि यहाँ भी अटक जाती है, “यह तो मानो शून्य है, अपने को भी नहीं जानता कि ‘मैं हूँ’, दूसरों को भी नहीं। यह तो आत्मनाश जैसा है। ऐसी आत्मा का क्या लाभ?” स्वामी जी रेखांकित करते हैं कि इस ज्ञान की क़ीमत कितनी बड़ी है, इन्द्र जैसे प्रखर बुद्धि वाले को कुल मिलाकर एक सौ एक वर्ष का तप करना पड़ा।
अब प्रजापति अन्तिम सत्य खोलते हैं। वह कहते हैं, “हे इन्द्र, यह देह तो मरणधर्मा है, मृत्यु ने इसे चारों ओर से घेर रखा है। सुख और दुख उसी को छूते हैं जो देह से बँधा है; जो अशरीर (देह-रहित) है, उसे ये छू ही नहीं सकते।” स्वामी कृष्णानन्द इस अशरीर तत्त्व को बड़े यत्न से समझाते हैं। उनके अनुसार यह आत्मा न तो किसी व्यक्ति-जैसी चेतना है, न जड़ अचेतनता; यह कुछ और ही है, एक अवैयक्तिक (किसी एक “मैं” तक सीमित न रहने वाली) सत्ता, जैसे आकाश सबमें फैला है पर किसी एक देह में बँधा नहीं। यही स्वयं-प्रकाश परम ज्योति है, जिसे जलाने के लिए किसी और दीये की ज़रूरत नहीं; यही सबकी आत्मा है, इसी को वह आत्म-स्वराज्य (अपने ही असली स्वरूप में स्थित होने की स्वतंत्रता) कहते हैं। और स्वामी जी एक परम सुन्दर बात अन्त में जोड़ते हैं, कि जो आँख से देखता है वह आँख नहीं, जो कान से सुनता है वह कान नहीं; इन्द्रियाँ तो केवल झरोखे हैं, द्रष्टा तो उनके पीछे बैठा वही साक्षी है। यही प्रजापति का असली आशय था जब उन्होंने शुरू में कहा था, “आँख में जो दिखता है वही आत्मा है।” वह देह का प्रतिबिम्ब नहीं, वह देखने वाला कह रहे थे, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में मौजूद रहकर भी तीनों से परे है।
सार: असली “मैं” वह नहीं जो दर्पण में दिखता है, न वह जो सपने में भटकता है, न वह जो नींद में मिट-सा जाता है। वह तो इन तीनों को देखता हुआ साक्षी है, जो आँख के पीछे, कान के पीछे, हर अनुभव के पीछे चुपचाप मौजूद है। विरोचन पहली ही झलक पर रुक गया; इन्द्र बार-बार लौटते रहे, और इसी हठ ने उन्हें उस परम ज्योति तक पहुँचाया जो आप ख़ुद हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
नारद, जो चारों वेद और सारी विद्याएँ पढ़ चुके थे, सनत्कुमार (एक परम सिद्ध आचार्य) के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए और बोले, “मैं सब जानता हूँ, फिर भी शोक से मुक्त नहीं हो पाता।” तब आचार्य ने उन्हें एक-एक करके ऊपर चढ़ाते हुए भूमा (वह असीम जिसमें और कुछ चाहना बचता ही नहीं) तक पहुँचाया, और कहा कि जहाँ कोई और दिखता नहीं, सुनाई नहीं देता, समझ में नहीं आता, वही असीम है, और जो अल्प है, छोटा है, वह तो मरण-धर्मा है। वहीं उद्दालक आरुणि (एक प्रकांड आचार्य) अपने पुत्र श्वेतकेतु से नौ बार दुहराते हैं, “तत्त्वमसि” (वह आप ही हैं)। और आठवें अध्याय में यह उपनिषद् हृदय के भीतर के उस नन्हे-से आकाश (दहर-आकाश) की बात कहता है, जिसमें वही समाया है जो आकाश-धरती, अग्नि-वायु, सारे लोक भर देता है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यही इस पूरे ग्रन्थ का एक धागा है, कि जिस अनन्त को आप दूर, ऊपर, बाहर ढूँढ़ते आए हैं, वह आपकी अपनी आत्मा है, और भीतर का यह छोटा-सा आकाश और बाहर का विराट आकाश दो नहीं, एक ही हैं।
स्वामी जी कहते हैं कि शोक और भय का मूल यही है कि हमने अपने आपको अल्प मान लिया, एक छोटी-सी देह में, एक छोटे-से “मैं” में बन्द कर लिया, और फिर बाहर भटकते रहे, कभी विद्या में, कभी सम्पत्ति में, कभी सम्बन्धों में, उस पूर्णता को खोजते जो भीतर बैठी हमारी ओर ताक रही थी। इस उपनिषद् का न्योता बस इतना है कि एक पल के लिए वह सारी खोज ठहर जाए, और जो खोज रहा है, जिसके भीतर हृदय का वह नन्हा आकाश धड़क रहा है, आप उसी की ओर मुड़ जाइए। बाहर जितना भी ढूँढ़ लीजिए, वह असीम आपसे एक क़दम भी दूर नहीं, क्योंकि वह आप ही हैं, और उसी को पहचान लेने पर न कोई शोक रहता है, न कोई और चाहना।
सार: जिस असीम (भूमा) को हम जीवन-भर बाहर ढूँढ़ते हैं, वही हृदय के भीतर के छोटे-से आकाश में हमारी अपनी आत्मा बनकर बसा है। तत्त्वमसि, वह आप ही हैं, और खोज को बाहर से मोड़कर अपनी ओर ले आना ही इस उपनिषद् की पुकार है।
व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की छान्दोग्य-उपनिषद्-टीका पर आधारित।
यही कथा वहाँ भी
- महावाक्य
चारों महावाक्यों का एक साथ परिचय - बृहदारण्यक उपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद्: अहं ब्रह्मास्मि का स्रोत - ऐतरेय उपनिषद्
ऐतरेय उपनिषद्: प्रज्ञानं ब्रह्म का स्रोत - माण्डूक्य उपनिषद्
माण्डूक्य उपनिषद्: अयम् आत्मा ब्रह्म का स्रोत