छान्दोग्य उपनिषद्
महावाक्य “तत् त्वम् असि” का मूल-स्रोत, और भारतीय कथा-साहित्य के कई शिखर-संवाद।
एक उपनिषद्, आठ अध्याय, अनगिनत कथाएँ
छान्दोग्य उपनिषद् साम वेद की मुख्य उपनिषद् है, और दस प्रमुख उपनिषदों में सबसे विस्तृत। “छन्दोग” का अर्थ है साम-वेद-गायक, और इसी समुदाय के बीच यह पाठ कई शताब्दियों तक मौखिक रूप से जीवित रहा। छान्दोग्य-ब्राह्मण नामक एक बड़े वैदिक पाठ के अंतिम आठ अध्याय इस उपनिषद् का रूप लेते हैं। बाक़ी दो अध्याय यज्ञ-कर्म-काण्ड हैं।

आदि शंकराचार्य ने इस पर अपनी सबसे विस्तृत उपनिषद्-टीका लिखी। ब्रह्म-सूत्र के पाँच-सौ-पचपन सूत्रों में से सौ से अधिक इसी एक उपनिषद् पर तर्क करते हैं। पाठक यह जान कर हैरान हो सकते हैं कि वैदिक साहित्य का इतना बड़ा हिस्सा अंततः एक ही पाठ की पुनर्व्याख्या है।
तीन वाक्य जो भारतीय दर्शन के स्थायी संदर्भ बन गए
पहला, “तत् त्वम् असि” (तू वो है)। चार महावाक्यों में से एक, छठे अध्याय में नौ बार दोहराया गया। उद्दालक-आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु से, जो बारह साल का होने पर गुरुकुल भेजा गया था और चौबीस साल का हो कर वापस आया, सब वेद पढ़ कर, मगर अहंकार-भरा। पिता ने एक सरल प्रश्न पूछा, “बेटा, क्या तूने वो जान लिया जिसको जान कर सब-कुछ जाना जाता है?” श्वेतकेतु उत्तर नहीं दे पाया। उसके बाद के पन्द्रह खण्ड पिता का उत्तर हैं।
दूसरा, “सर्वम् खल्विदम् ब्रह्म” (यह सब निश्चय ब्रह्म है)। तीसरे अध्याय की शाण्डिल्य-विद्या से। यह वाक्य पूरे वेदान्त-दर्शन का संक्षिप्त सूत्र बन गया।
तीसरा, “यो वै भूमा तत् सुखम्” (जो असीम है, वही सुख है)। सातवें अध्याय में, जब महान ज्ञानी नारद अपने से भी बड़े ज्ञानी सनत्कुमार के पास जा कर कहते हैं कि उन्होंने सब-वेद-पुराण पढ़ लिए हैं, मगर शोक से मुक्ति नहीं मिली। सनत्कुमार उन्हें छब्बीस कदमों की एक सीढ़ी पर ले जाते हैं, हर कदम पर एक नया तत्त्व, अंत में भूमा।
कथाओं की मात्रा
अन्य उपनिषदों की तुलना में छान्दोग्य कथाओं से भरा है। उद्दालक-श्वेतकेतु, नारद-सनत्कुमार, इन्द्र-विरोचन, सत्यकाम-जाबाल, रैक्व-जानश्रुति, उपकोसल-कामलायन। हर कथा अपने-आप में एक मनुष्य की यात्रा है, जो किसी एक प्रश्न से शुरू होती है और एक तत्त्व-दर्शन पर पहुँचती है। सत्यकाम-जाबाल विशेष रूप से उल्लेखनीय है, एक ऐसा बालक जिसे पिता का नाम नहीं पता, मगर माँ ने सिखाया है कि सत्य ही सब-कुछ है। वो गौतम-ऋषि से कहता है, “मैं नहीं जानता मेरा गोत्र क्या है, मगर मेरी माँ ने कहा था कि उन्हें भी नहीं पता।” गौतम तुरंत उत्तर देते हैं, “यह कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता। तू सत्य से नहीं गिरा।”
आठ अध्याय
पढ़ने के बारे में
एक पाठक के लिए स्पष्ट प्रवेश-बिन्दु छठा अध्याय है, उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद। यह स्व-संगठित है, सोलह खण्डों में, और पूरे अद्वैत वेदान्त का foundation। पहले पाँच अध्याय अधिक तकनीकी हैं, साम-वेद-गायन-तत्त्व, ब्राह्मण-कर्म-काण्ड, मधु-विद्या इत्यादि।
दूसरा अनुशंसित प्रवेश-बिन्दु सातवाँ अध्याय है, नारद-सनत्कुमार-संवाद। यह संरचना में स्पष्ट है, और भूमा-विद्या का तर्क बहुत ही clean है। आठवाँ अध्याय इन्द्र-विरोचन-संवाद का है, जो चार जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति-तुरीय अवस्थाओं की पहली व्यवस्थित चर्चा है।
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