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कल्पना कीजिए, आज से कोई ढाई-तीन हज़ार बरस पहले के उत्तर भारत की एक सुबह। बारह बरस गुरुकुल में बिताकर एक नौजवान घर लौटा है। नाम है श्वेतकेतु। चारों वेद, सारे शास्त्र वह कंठस्थ करके आया है, और इसी विद्या का अभिमान उसके सिर चढ़कर बोल रहा है। वह इतना अकड़ा हुआ है कि अपने पिता से ढंग से बात तक नहीं करता। पिता उद्दालक आरुणि, एक प्रकांड आचार्य, यह सब देखते हैं और एक दिन बेटे को पास बिठाकर बस एक सवाल पूछते हैं, “बेटा, क्या आपने गुरु से वह एक चीज़ सीखी, जिसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है? वह, जिसके जान लेने पर अनसुना भी सुन लिया जाता है, अनसोचा भी सोच लिया जाता है, और जो समझ में नहीं आता वह भी समझ में आ जाता है?” और यहीं नौजवान का सारा गर्व पिघल जाता है, क्योंकि इतना पढ़कर भी उसने यह कभी सुना ही नहीं था। यही सवाल इस पूरे ग्रंथ का प्राण है।

नाम है छान्दोग्य उपनिषद्, और नाम ही इसका मिज़ाज खोल देता है। यह उपनिषद् साम वेद से निकला है, उस वेद से जिसकी ऋचाएँ बोली नहीं, गाई जाती हैं (छन्दोग का अर्थ ही है साम का गायक)। इसीलिए यह उपनिषद् ॐ की उपासना से शुरू होता है, जिसे यहाँ उद्गीथ (वह ऊँचा, परम गान जिससे सृष्टि का तार बँधा है) कहा गया है। इसके पन्नों पर एक के बाद एक दृश्य खुलते हैं, कभी वन की कुटिया का गुरुकुल, कभी राजा का दरबार, कभी पिता और पुत्र का संवाद, और हर कथा गुरु और शिष्य को उसी एक सत्य की ओर ले चलती है। उद्दालक श्वेतकेतु को बताते हैं कि आरम्भ में केवल एक ही सत् (शुद्ध अस्तित्व, होना मात्र) था, एक और अद्वितीय, जिसका न कोई कारण है न कोई दूसरा; और इसी से वह महावाक्य फूटता है, तत्त्वमसि (वह तत्त्व आप ही हैं)। आगे ऋषि सनत्कुमार सिखाते हैं कि सुख न मन में टिकता है न किसी वस्तु में, सुख तो भूमा (वह असीम जिसमें और कुछ चाहना बचता ही नहीं) में ही है।
इस उपनिषद् के मुख्य किरदार
उद्दालक आरुणि: एक प्रकांड आचार्य, श्वेतकेतु के पिता, जिन्होंने नमक और बरगद के बीज से वह सिखाया जो शब्दों से परे है।
श्वेतकेतु: उद्दालक के पुत्र, बारह बरस गुरुकुल में पढ़कर लौटे एक अहंकारी युवक, जिनका घमंड पिता ने एक सवाल से तोड़ दिया।
सनत्कुमार और नारद: सनत्कुमार देवर्षि गुरु; नारद वह शिष्य जो सारी विद्याएँ जानकर भी भीतर से अशांत थे।
सत्यकाम जाबाल: एक बालक जिसने अपने कुल का सच कह दिया, और उसी सच ने उसे ब्राह्मण ठहराया।
प्रजापति और इन्द्र: सृष्टि के रचयिता प्रजापति, और देवराज इन्द्र, जो असली आत्मा की खोज में बार-बार लौटे।
राजा अश्वपति कैकेय: वह राजा जिसने छह बड़े पंडितों को वैश्वानर (सर्वव्यापी आत्मा) का पूरा रूप समझाया।
उपासना, और मृत्यु के पार
अध्याय-दर-अध्याय पढ़िए
हर अध्याय अपना पूरा पन्ना है: कथा, संवाद, सार और मूल पाठ के संकेत। पहली बार पढ़ रहे हों तो अध्याय 6 (उद्दालक और श्वेतकेतु) से शुरू कीजिए।
- अध्याय 1: ॐ, रसों का रस और उद्गीथ की उपासनारसों का रस कहा गया वह अक्षर, देव-असुरों की होड़ में अछूता रह गया प्राण, भूखे उषस्ति चाक्रायण का यज्ञ, और कुत्तों का वह उद्गीथ जिस पर हँसी भी आती है और सिहरन भी।
- अध्याय 2: साम के पाँच और सात टुकड़ेचौबीस खण्डों में यह अध्याय गान के पाँच और सात टुकड़ों को धरती, वर्षा, ऋतु, पशु, प्राण और सूर्य पर बिछाकर दिखाता है।
- अध्याय 3: सूर्य का मधु और हृदय का आकाशसूर्य को छत्ते की तरह देखता हुआ यह अध्याय वेदों को मधुमक्खियाँ बनाता है, फिर गायत्री से होता हुआ हृदय के भीतर उतर आता है।
- अध्याय 4: रैक्व, सत्यकाम और बोलती अग्नियाँहंसों की एक रात की बात, गाड़ी के नीचे बैठा एक ज्ञानी, अपना गोत्र न जानने वाला बालक, और वे अग्नियाँ जो बारह बरस बाद बोल पड़ीं।
- अध्याय 5: पाँच आगें और बालिश्त भर का विराटप्राणों की होड़ से लेकर एक बालिश्त भर के विराट तक, यह अध्याय जन्म, मृत्यु और भोजन तीनों को एक ही यज्ञ की आहुतियाँ बनाकर दिखा देता है।
- अध्याय 6: उद्दालक, श्वेतकेतु और तत् त्वम् असिबारह बरस पढ़कर लौटे बेटे से पिता एक प्रश्न पूछते हैं, और फिर मिट्टी, शहद, नदी, बीज और नमक से नौ बार वही एक बात कहते हैं।
- अध्याय 7: नारद, सनत्कुमार और भूमासारी विद्याएँ पढ़ चुके नारद अपना शोक लेकर सनत्कुमार के पास आते हैं, और वहाँ से एक सीढ़ी शुरू होती है जो नाम से उठकर भूमा तक जाती है।
- अध्याय 8: हृदय का आकाश और इन्द्र की वापसीहृदय के भीतर के छोटे आकाश से शुरू होकर यह अध्याय प्रजापति के द्वार तक जाता है, जहाँ इन्द्र तीन बार लौटते हैं और विरोचन एक बार भी नहीं।
और अन्त में, अपनी ओर
नारद, जो चारों वेद और सारी विद्याएँ पढ़ चुके थे, सनत्कुमार (एक परम सिद्ध आचार्य) के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए और बोले, “मैं सब जानता हूँ, फिर भी शोक से मुक्त नहीं हो पाता।” तब आचार्य ने उन्हें एक-एक करके ऊपर चढ़ाते हुए भूमा (वह असीम जिसमें और कुछ चाहना बचता ही नहीं) तक पहुँचाया, और कहा कि जहाँ कोई और दिखता नहीं, सुनाई नहीं देता, समझ में नहीं आता, वही असीम है, और जो अल्प है, छोटा है, वह तो मरण-धर्मा है। वहीं उद्दालक आरुणि (एक प्रकांड आचार्य) अपने पुत्र श्वेतकेतु से नौ बार दुहराते हैं, “तत्त्वमसि” (वह आप ही हैं)। और आठवें अध्याय में यह उपनिषद् हृदय के भीतर के उस नन्हे-से आकाश (दहर-आकाश) की बात कहता है, जिसमें वही समाया है जो आकाश-धरती, अग्नि-वायु, सारे लोक भर देता है।
स्वामी जी कहते हैं कि शोक और भय का मूल यही है कि हमने अपने आपको अल्प मान लिया, एक छोटी-सी देह में, एक छोटे-से “मैं” में बन्द कर लिया, और फिर बाहर भटकते रहे, कभी विद्या में, कभी सम्पत्ति में, कभी सम्बन्धों में, उस पूर्णता को खोजते जो भीतर बैठी हमारी ओर ताक रही थी। इस उपनिषद् का न्योता बस इतना है कि एक पल के लिए वह सारी खोज ठहर जाए, और जो खोज रहा है, जिसके भीतर हृदय का वह नन्हा आकाश धड़क रहा है, आप उसी की ओर मुड़ जाइए। बाहर जितना भी ढूँढ़ लीजिए, वह असीम आपसे एक क़दम भी दूर नहीं, क्योंकि वह आप ही हैं, और उसी को पहचान लेने पर न कोई शोक रहता है, न कोई और चाहना।
सार: जिस असीम (भूमा) को हम जीवन-भर बाहर ढूँढ़ते हैं, वही हृदय के भीतर के छोटे-से आकाश में हमारी अपनी आत्मा बनकर बसा है। तत्त्वमसि, वह आप ही हैं, और खोज को बाहर से मोड़कर अपनी ओर ले आना ही इस उपनिषद् की पुकार है।
यही कथा वहाँ भी
- महावाक्य
चारों महावाक्यों का एक साथ परिचय - बृहदारण्यक उपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद्: अहं ब्रह्मास्मि का स्रोत - ऐतरेय उपनिषद्
ऐतरेय उपनिषद्: प्रज्ञानं ब्रह्म का स्रोत - माण्डूक्य उपनिषद्
माण्डूक्य उपनिषद्: अयम् आत्मा ब्रह्म का स्रोत