अंग
177
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਉਕਤਿ ਸਿਆਣਪ ਸਗਲੀ ਤਿਆਗੁ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੨॥
ਸਰਬ ਜੀਅ ਹਹਿ ਜਾ ਕੈ ਹਾਥਿ ॥
ਕਦੇ ਨ ਵਿਛੁੜੈ ਸਭ ਕੈ ਸਾਥਿ ॥
ਉਪਾਵ ਛੋਡਿ ਗਹੁ ਤਿਸ ਕੀ ਓਟ ॥
ਨਿਮਖ ਮਾਹਿ ਹੋਵੈ ਤੇਰੀ ਛੋਟਿ ॥੩॥
ਸਦਾ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਤਿਸ ਨੋ ਜਾਣੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਆਗਿਆ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮਿਟਾਵਹੁ ਆਪੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਜਪਿ ਜਾਪੁ ॥੪॥੪॥੭੩॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੨॥
ਸਰਬ ਜੀਅ ਹਹਿ ਜਾ ਕੈ ਹਾਥਿ ॥
ਕਦੇ ਨ ਵਿਛੁੜੈ ਸਭ ਕੈ ਸਾਥਿ ॥
ਉਪਾਵ ਛੋਡਿ ਗਹੁ ਤਿਸ ਕੀ ਓਟ ॥
ਨਿਮਖ ਮਾਹਿ ਹੋਵੈ ਤੇਰੀ ਛੋਟਿ ॥੩॥
ਸਦਾ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਤਿਸ ਨੋ ਜਾਣੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਆਗਿਆ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਮਿਟਾਵਹੁ ਆਪੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਜਪਿ ਜਾਪੁ ॥੪॥੪॥੭੩॥
उकति सिआणप सगली तिआगु ॥
संत जना की चरणी लागु ॥२॥
सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥
कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥
उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥
निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥३॥
सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥
प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥
गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥
हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥४॥४॥७३॥
संत जना की चरणी लागु ॥२॥
सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥
कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥
उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥
निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥३॥
सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥
प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥
गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥
हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥४॥४॥७३॥
हिन्दी अर्थ: अपनी दलीलें अपनी समझदारिआं सारी छोड़ दे~ और गुरमुखों की शरण पड़ । 2। (हे भाई !) सारे जीव जंतु जिस परमात्मा के वश में (हाथ में) है~ जो प्रभू कभी भी (जीवों से) अलग नहीं होता~ (सदा) सब जीवों के साथ रहता है~ अपने प्रयत्नों-कोशिशों को छोड़ के उस परमात्मा का आसरा-परना पकड़। आँख की एक झपक में (माया के मोह के बंधनों से) तेरी मुक्ति हो जाएगी। 3। हे नानक ! उस परमात्मा को सदा अपने नजदीक बसता समझ। ये दृढ़ करके मान कि परमात्मा की रजा अटॅल है। गुरू के बचन में (जुड़ के अपने अंदर से) स्वैभाव दूर कर~ सदा परमात्मा का नाम जप~ सदा प्रभू (के गुणों) का जाप जप। 4। 4। 73।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਸਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਕਟੀ ਜਮ ਫਾਸੀ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਰਚੈ ਰਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੧॥
ਜੋ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਸੁ ਮਨ ਕੈ ਕਾਮਿ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਕੀਆ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਅਟਲ ਅਛੇਦ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਕਟੇ ਭ੍ਰਮ ਭੇਦ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਕਤਹੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸਾਥ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਨਰਕਿ ਨ ਪਵੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਰਸਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਰਵੈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਪਰਗਟੁ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਨ ਆਵੈ ਹਾਰਿ ॥
ਜਿਸੁ ਜਨ ਹੋਏ ਆਪਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥ ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਸਦਾ ਦਇਆਲ ॥੪॥੫॥੭੪॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਸਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਕਟੀ ਜਮ ਫਾਸੀ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਰਚੈ ਰਾਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੧॥
ਜੋ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਸੁ ਮਨ ਕੈ ਕਾਮਿ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਕੀਆ ਸਤਿ ਕਰਿ ਮਾਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਅਟਲ ਅਛੇਦ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਕਟੇ ਭ੍ਰਮ ਭੇਦ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਕਤਹੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸਾਥ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਨਰਕਿ ਨ ਪਵੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਰਸਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਰਵੈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਾ ਬਚਨੁ ਪਰਗਟੁ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਨ ਆਵੈ ਹਾਰਿ ॥
ਜਿਸੁ ਜਨ ਹੋਏ ਆਪਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥ ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਸਦਾ ਦਇਆਲ ॥੪॥੫॥੭੪॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥
गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥
गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥१॥
जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥
संत का कीआ सति करि मानि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर का बचनु अटल अछेद ॥
गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥
गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥
गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥२॥
गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥
गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥
गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥
गुर कै बचनि रसना अंम्रितु रवै ॥३॥
गुर का बचनु परगटु संसारि ॥
गुर कै बचनि न आवै हारि ॥
जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥४॥५॥७४॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥
गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥
गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥१॥
जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥
संत का कीआ सति करि मानि ॥१॥ रहाउ ॥
गुर का बचनु अटल अछेद ॥
गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥
गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥
गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥२॥
गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥
गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥
गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥
गुर कै बचनि रसना अंम्रितु रवै ॥३॥
गुर का बचनु परगटु संसारि ॥
गुर कै बचनि न आवै हारि ॥
जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥४॥५॥७४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ गुरू का वचन (उपदेश) हमेशा आत्मिक जीवन के काम आने वाला है सदा अविनाशी है। गुरू के वचन से आत्मिक मौत लाने वाला मोह रूपी फंदा कट जाता है। गुरू का वचन हमेशा जीव के संग है। गुरू के उपदेश से आदमी परमात्मा के प्रेम-रंग में जुड़ा रहता है। 1। (हे भाई !) जो (उपदेश) गुरू ने दिया है~ वह (हरेक मनुष्य के) मन के काम आता है। (इस वास्ते हे भाई !) गुरू के किए हुए इस उपकार को सदा साथ निभने वाला समझ। 1। रहाउ। वाला (पुराना होने वाला) नहीं। गुरू के उपदेश के द्वारा मनुष्य की भटकना मनुष्य के भेदभाव कट जाते हैं। गुरू का उपदेश कभी व्यर्थ नहीं जाता। गुरू के उपदेश (की बरकति) से मनुष्य परमात्मा के गुण गाता (रहता) है। 2। गुरू का उपदेश जीवात्मा के साथ निभता है। गुरू का उपदेश निआसरी जीवात्माओं का सहारा बनता है। गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य नर्क में नहीं जाता~ और~ गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य अपनी जीभ से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। 3। गुरू का उपदेश मनुष्य को संसार में प्रसिद्ध कर देता है। गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य जीवन-बाजी हार के नहीं आता। हे नानक ! जिस मनुष्य पर परमात्मा खुद मेहरबान होता है उस पर सतिगुरू सदैव दया-दृष्टि करता रहता है। 4। 5। 74।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਮਾਟੀ ਤੇ ਰਤਨੁ ॥
ਗਰਭ ਮਹਿ ਰਾਖਿਆ ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਜਤਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਦੀਨੀ ਸੋਭਾ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਆਠ ਪਹਰ ਧਿਆਈ ॥੧॥
ਰਮਈਆ ਰੇਨੁ ਸਾਧ ਜਨ ਪਾਵਉ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਅਪੁਨਾ ਖਸਮੁ ਧਿਆਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਮੂੜ ਤੇ ਬਕਤਾ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਬੇਸੁਰਤ ਤੇ ਸੁਰਤਾ ॥
ਜਿਸੁ ਪਰਸਾਦਿ ਨਵੈ ਨਿਧਿ ਪਾਈ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨ ਤੇ ਬਿਸਰਤ ਨਾਹੀ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਦੀਆ ਨਿਥਾਵੇ ਕਉ ਥਾਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਦੀਆ ਨਿਮਾਨੇ ਕਉ ਮਾਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਨੀ ਸਭ ਪੂਰਨ ਆਸਾ ॥
ਸਿਮਰਉ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਸਾਸ ਗਿਰਾਸਾ ॥੩॥
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮਾਇਆ ਸਿਲਕ ਕਾਟੀ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬਿਖੁ ਖਾਟੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਸ ਤੇ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
ਰਾਖਨਹਾਰੇ ਕਉ ਸਾਲਾਹੀ ॥੪॥੬॥੭੫॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਮਾਟੀ ਤੇ ਰਤਨੁ ॥
ਗਰਭ ਮਹਿ ਰਾਖਿਆ ਜਿਨਿ ਕਰਿ ਜਤਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਦੀਨੀ ਸੋਭਾ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਆਠ ਪਹਰ ਧਿਆਈ ॥੧॥
ਰਮਈਆ ਰੇਨੁ ਸਾਧ ਜਨ ਪਾਵਉ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਅਪੁਨਾ ਖਸਮੁ ਧਿਆਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਮੂੜ ਤੇ ਬਕਤਾ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤਾ ਬੇਸੁਰਤ ਤੇ ਸੁਰਤਾ ॥
ਜਿਸੁ ਪਰਸਾਦਿ ਨਵੈ ਨਿਧਿ ਪਾਈ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨ ਤੇ ਬਿਸਰਤ ਨਾਹੀ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਦੀਆ ਨਿਥਾਵੇ ਕਉ ਥਾਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਦੀਆ ਨਿਮਾਨੇ ਕਉ ਮਾਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਨੀ ਸਭ ਪੂਰਨ ਆਸਾ ॥
ਸਿਮਰਉ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਸਾਸ ਗਿਰਾਸਾ ॥੩॥
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮਾਇਆ ਸਿਲਕ ਕਾਟੀ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬਿਖੁ ਖਾਟੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਸ ਤੇ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
ਰਾਖਨਹਾਰੇ ਕਉ ਸਾਲਾਹੀ ॥੪॥੬॥੭੫॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥
जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥
तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥१॥
रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥
गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥
जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥
जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥
सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥२॥
जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥
जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥
जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥
सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥३॥
जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥
गुर प्रसादि अंम्रितु बिखु खाटी ॥
कहु नानक इस ते किछु नाही ॥
राखनहारे कउ सालाही ॥४॥६॥७५॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥
जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥
तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥१॥
रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥
गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥
जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥
जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥
सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥२॥
जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥
जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥
जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥
सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥३॥
जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥
गुर प्रसादि अंम्रितु बिखु खाटी ॥
कहु नानक इस ते किछु नाही ॥
राखनहारे कउ सालाही ॥४॥६॥७५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस (प्रभू) ने मिट्टी से (मेरा) अमुल्य मानव शरीर बना दिया है। जिसने यतन करके माँ के पेट में मेरी रक्षा की है~ जिसने मुझे शोभा दी है~ आदर बख्शी है~ उस प्रभू को मैं (उसकी मेहर से) आठों पहर सिमरता हूँ। 1। हे सुंदर राम ! (कृपा कर) मैं गुरमुखों के चरणों की धूड़ प्राप्त कर लूँ~ और गुरू को मिल के (तुझे) अपने पति को सिमरता रहूँ। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस (करतार) ने (मुझ) मूर्ख-अंजान को सुंदर बोल बोलने वाला बना दिया है~ जिसने (मुझे) बेसमझ से समझदार बना दिया है~ जिस (प्रभू) की कृपा से मैं (धरती के सारे) नौ ही खजाने हासिल कर रहा हूँ~ वह प्रभू मेरे मन से भूलता नहीं। 2। (हे भाई !) जिस (प्रभू) ने (मुझ) निआसरे को आसरा दिया है~ जिसने (मुझ) निमाणे को मान-आदर दिया है~ जिस (करतार) ने मेरी हरेक आस (अब तक) पूरी की है~ उसे मैं दिन रात हरेक श्वास-ग्रास सिमरता रहता हूँ। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) जिस (प्रभू) की कृपा से (मेरे गले से) माया (के मोह) की फांसी कॅट गयी है~ (जिसके कारण) गुरू की कृपा से (मुझे) अमृत (जैसी मीठी लगने वाली माया अब) कड़वी जहर प्रतीत हो रही है~ इस जीव के वश कुछ नहीं कि (अपने प्रयासों से प्रभू की सिफत सालाह कर सके) मैं उस प्रतिपालक प्रभू की सिफत सालाह करता हूँ । 4। 6। 75।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਸਰਣਿ ਨਾਹੀ ਭਉ ਸੋਗੁ ॥
ਉਸ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਛੂ ਨ ਹੋਗੁ ॥
ਤਜੀ ਸਿਆਣਪ ਬਲ ਬੁਧਿ ਬਿਕਾਰ ॥
ਦਾਸ ਅਪਨੇ ਕੀ ਰਾਖਨਹਾਰ ॥੧॥
ਜਪਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਰਾਮ ਰਾਮ ਰੰਗਿ ॥
ਘਰਿ ਬਾਹਰਿ ਤੇਰੈ ਸਦ ਸੰਗਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਟੇਕ ਮਨੈ ਮਹਿ ਰਾਖੁ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਸਰਣਿ ਨਾਹੀ ਭਉ ਸੋਗੁ ॥
ਉਸ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਛੂ ਨ ਹੋਗੁ ॥
ਤਜੀ ਸਿਆਣਪ ਬਲ ਬੁਧਿ ਬਿਕਾਰ ॥
ਦਾਸ ਅਪਨੇ ਕੀ ਰਾਖਨਹਾਰ ॥੧॥
ਜਪਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਰਾਮ ਰਾਮ ਰੰਗਿ ॥
ਘਰਿ ਬਾਹਰਿ ਤੇਰੈ ਸਦ ਸੰਗਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਟੇਕ ਮਨੈ ਮਹਿ ਰਾਖੁ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
उस ते बाहरि कछू न होगु ॥
तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥
दास अपने की राखनहार ॥१॥
जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥
घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥१॥ रहाउ ॥
तिस की टेक मनै महि राखु ॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
उस ते बाहरि कछू न होगु ॥
तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥
दास अपने की राखनहार ॥१॥
जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥
घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥१॥ रहाउ ॥
तिस की टेक मनै महि राखु ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे भाई !) उस राम की शरण पड़ने से कोई भय छू नहीं सकता। कोई चिंता नहीं व्याप सकती। (क्योंकि कोई डर कोई चिंता) कुछ भी उस राम से आकी नहीं हो सकते। (इस वास्ते हे भाई !) मैंने अपनी अक्ल का आसरा रखने की बुराई त्याग दी है (और उस राम का दास बन गया हूँ~ वह राम) अपने दास की इज्जत रखने के स्मर्थ है। 1। हे मेरे मन ! प्रेम से राम का नाम जप। वह नाम तेरे घर में (हृदय में) और बाहर हर जगह सदा तेरे साथ रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) अपने मन में उस परमात्मा का आसरा रख।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 177 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 177” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 178 →, पीछे का: ← अंग 176।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।