अंग 318

अंग
318
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਕੀ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੫ ਰਾਇ ਕਮਾਲਦੀ ਮੋਜਦੀ ਕੀ ਵਾਰ ਕੀ ਧੁਨਿ ਉਪਰਿ ਗਾਵਣੀ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜੋ ਜਨੁ ਜਪੈ ਸੋ ਆਇਆ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਜਿਨਿ ਭਜਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰਬਾਣੁ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੁਖੁ ਕਟਿਆ ਹਰਿ ਭੇਟਿਆ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਣੁ ॥
ਸੰਤ ਸੰਗਿ ਸਾਗਰੁ ਤਰੇ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਤਾਣੁ ॥੧॥
गउड़ी की वार महला ५ राइ कमालदी मोजदी की वार की धुनि उपरि गावणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ५ ॥
हरि हरि नामु जो जनु जपै सो आइआ परवाणु ॥
तिसु जन कै बलिहारणै जिनि भजिआ प्रभु निरबाणु ॥
जनम मरन दुखु कटिआ हरि भेटिआ पुरखु सुजाणु ॥
संत संगि सागरु तरे जन नानक सचा ताणु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी की वार महला ५ राइ कमालदी मोजदी की वार की धुनि उपरि गावणी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला ५ ॥ जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है उसका (जगत में) आना सफल (समझो)। जिस मनुष्य ने वासना-रहित प्रभू को सिमरा है। मैं उससे सदके जाता हूँ। उसे सुजान अकाल-पुरख मिल गया है। और उसका सारी उम्र का दुख-कलेश दूर हो गया है। हे दास नानक ! उसे एक सच्चे प्रभू का ही आसरा है। उसने सत्संग में रहके संसार समुंद्र तैर लिया है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਭਲਕੇ ਉਠਿ ਪਰਾਹੁਣਾ ਮੇਰੈ ਘਰਿ ਆਵਉ ॥
ਪਾਉ ਪਖਾਲਾ ਤਿਸ ਕੇ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਿਤ ਭਾਵਉ ॥
ਨਾਮੁ ਸੁਣੇ ਨਾਮੁ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਨਾਮੇ ਲਿਵ ਲਾਵਉ ॥
ਗ੍ਰਿਹੁ ਧਨੁ ਸਭੁ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਹੋਇ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਉ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮ ਵਾਪਾਰੀ ਨਾਨਕਾ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਵਉ ॥੨॥
मः ५ ॥
भलके उठि पराहुणा मेरै घरि आवउ ॥
पाउ पखाला तिस के मनि तनि नित भावउ ॥
नामु सुणे नामु संग्रहै नामे लिव लावउ ॥
ग्रिहु धनु सभु पवित्रु होइ हरि के गुण गावउ ॥
हरि नाम वापारी नानका वडभागी पावउ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ अगर सवेरे उठ के कोई (गुरमुख) अतिथि मेरे घर आए। मैं उस गुरमुख के पैर धोऊँ; मेरे मन में। मेरे तन में वह सदा प्यारा लगे। वह गुरमुख (नित्य) नाम सुने। नाम-धन इकट्ठा करे और नाम में ही सुरति जोड़ के रखे। (उसके आने से मेरा) सारा घर पवित्र हो जाए। मैं भी (उसकी बरकति से) प्रभू के गुण गाने लग जाऊँ। (पर) हे नानक ! ऐसे प्रभू नाम का व्यापारी बड़े भाग्यों से ही कहीं मुझे मिल सकता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਭਲਾ ਸਚੁ ਤੇਰਾ ਭਾਣਾ ॥
ਤੂ ਸਭ ਮਹਿ ਏਕੁ ਵਰਤਦਾ ਸਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣਾ ॥
ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਜੀਅ ਅੰਦਰਿ ਜਾਣਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਪਾਈਐ ਮਨਿ ਸਚੇ ਭਾਣਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਗਤੀ ਸਦ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣਾ ॥੧॥
पउड़ी ॥
जो तुधु भावै सो भला सचु तेरा भाणा ॥
तू सभ महि एकु वरतदा सभ माहि समाणा ॥
थान थनंतरि रवि रहिआ जीअ अंदरि जाणा ॥
साधसंगि मिलि पाईऐ मनि सचे भाणा ॥
नानक प्रभ सरणागती सद सद कुरबाणा ॥१॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ! जो मनुष्य तुझे भाता है जिसे तेरी रजा भाती है वह भला है। तू ही सब जीवों में व्यापक है। सब में समाया हुआ है। तू हरेक जगह पर मौजूद है। सब जीवों में तू ही जाना जाता है (भाव। सब जानते हैं कि सब जीवों में तू ही है)। उस सदा स्थिर रहने वाले की रज़ा मान के सत्संग में मिल के उसको ढूँढ सकते हैं। हे नानक ! उस प्रभू की शरण आ। उससे सदा ही कुर्बान हो। 1।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਚੇਤਾ ਈ ਤਾਂ ਚੇਤਿ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚਾ ਸੋ ਧਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਚੜਿ ਬੋਹਿਥਿ ਭਉਜਲੁ ਪਾਰਿ ਪਉ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
चेता ई तां चेति साहिबु सचा सो धणी ॥
नानक सतिगुरु सेवि चड़ि बोहिथि भउजलु पारि पउ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ हे नानक ! अगर तुझे याद है कि वह प्रभू सालिक सदा स्थिर रहने वाला है तो उस मालिक को सदा सिमर (भाव। तुझे पता भी है कि सिर्फ वह प्रभू मालिक ही सदा स्थिर रहने वाला है। फिर उसे क्यूँ नहीं सिमरता?)। गुरू के हुकम में चल (गुरू के हुकम रूप) जहाज में चढ़ के संसार समुंद्र को पार कर। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਵਾਊ ਸੰਦੇ ਕਪੜੇ ਪਹਿਰਹਿ ਗਰਬਿ ਗਵਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲਨੀ ਜਲਿ ਬਲਿ ਹੋਏ ਛਾਰੁ ॥੨॥
मः ५ ॥
वाऊ संदे कपड़े पहिरहि गरबि गवार ॥
नानक नालि न चलनी जलि बलि होए छारु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ मूर्ख मनुष्य सुंदर-सुंदर बारीक कपड़े बड़ी अकड़ से पहनते हैं। पर हे नानक ! (मरने पर ये कपड़े जीव के) साथ नहीं जाते। (यहीं) जल के राख हो जाते हैं। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸੇਈ ਉਬਰੇ ਜਗੈ ਵਿਚਿ ਜੋ ਸਚੈ ਰਖੇ ॥
ਮੁਹਿ ਡਿਠੈ ਤਿਨ ਕੈ ਜੀਵੀਐ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਚਖੇ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਸੰਗਿ ਸਾਧਾ ਭਖੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਣੀ ਹਰਿ ਆਪਿ ਪਰਖੇ ॥
ਨਾਨਕ ਚਲਤ ਨ ਜਾਪਨੀ ਕੋ ਸਕੈ ਨ ਲਖੇ ॥੨॥
पउड़ी ॥
सेई उबरे जगै विचि जो सचै रखे ॥
मुहि डिठै तिन कै जीवीऐ हरि अंम्रितु चखे ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु संगि साधा भखे ॥
करि किरपा प्रभि आपणी हरि आपि परखे ॥
नानक चलत न जापनी को सकै न लखे ॥२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (कामादिक विकारों से) जगत में वही मनुष्य बचे हैं जिन्हें सच्चे प्रभू ने (बचा के) रखा है। ऐसे मनुष्यों का दर्शन करके हरी-नाम अमृत चख सकते हैं और (असल) जिंदगी मिलती है। ऐसे साधु-जनों की संगति में (रहने से) काम-क्रोध-लोभ-मोह (आदि विकार) नाश हो जाते हैं। जिन पर प्रभू ने अपनी मेहर की है। उनको उसने खुद ही प्रवान कर लिया है। हे नानक ! परमात्मा के करिश्मे समझे नहीं जा सकते। कोई जीव समझ नहीं सकता।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਦਿਨਸੁ ਸੁਹਾਵੜਾ ਜਿਤੁ ਪ੍ਰਭੁ ਆਵੈ ਚਿਤਿ ॥
ਜਿਤੁ ਦਿਨਿ ਵਿਸਰੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਫਿਟੁ ਭਲੇਰੀ ਰੁਤਿ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
नानक सोई दिनसु सुहावड़ा जितु प्रभु आवै चिति ॥
जितु दिनि विसरै पारब्रहमु फिटु भलेरी रुति ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ हे नानक ! वही दिन अच्छा सोहाना है जिस दिन परमात्मा मन में बसे। जिस दिन परमात्मा बिसर जाता है। वह समय खराब जानो। वह वक्त धिक्कारयोग्य है। 1।
ਮਃ ੫ ॥
ਨਾਨਕ ਮਿਤ੍ਰਾਈ ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਸਭ ਕਿਛੁ ਜਿਸ ਕੈ ਹਾਥਿ ॥
ਕੁਮਿਤ੍ਰਾ ਸੇਈ ਕਾਂਢੀਅਹਿ ਇਕ ਵਿਖ ਨ ਚਲਹਿ ਸਾਥਿ ॥੨॥
मः ५ ॥
नानक मित्राई तिसु सिउ सभ किछु जिस कै हाथि ॥
कुमित्रा सेई कांढीअहि इक विख न चलहि साथि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ५॥ हे नानक ! उस (प्रभू) से दोस्ती (डालनी चाहिए) जिसके बस में हरेक बात है। पर जो एक कदम भी (हमारे) साथ नहीं जा सकते वह कुमित्र कहे जाते हैं (उनके साथ मोह ना बढ़ाते फिरो)। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਮਿਲਿ ਪੀਵਹੁ ਭਾਈ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਸਭ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਈ ॥
ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਗੁਰ ਭੁਖ ਰਹੈ ਨ ਕਾਈ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੁੰਨਿਆ ਅਮਰਾ ਪਦੁ ਪਾਈ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਤੂਹੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਾਨਕ ਸਰਣਾਈ ॥੩॥
पउड़ी ॥
अंम्रितु नामु निधानु है मिलि पीवहु भाई ॥
जिसु सिमरत सुखु पाईऐ सभ तिखा बुझाई ॥
करि सेवा पारब्रहम गुर भुख रहै न काई ॥
सगल मनोरथ पुंनिआ अमरा पदु पाई ॥
तुधु जेवडु तूहै पारब्रहम नानक सरणाई ॥३॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम अमृत (-रूप) खजाना है। (इस अमृत को सत्संग में) मिल के पीयो। उस नाम को सिमरने से सुख मिलता है। और (माया की) सारी तृष्णा मिट जाती है। (हे भाई !) गुरू अकाल-पुरख की सेवा कर। (माया की) कोई भूख नहीं रह जाएगी। (नाम सिमरने से) सो मनोरथ पूरे हो जाते हैं। वह उच्च आत्मिक अवस्था मिल जाती है जो कभी नाश नहीं होती। हे पारब्रहम ! तेरे बराबर का तू खुद ही है। हे नानक ! उस पारब्रहम की शरण पड़ो। 3।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
ਡਿਠੜੋ ਹਭ ਠਾਇ ਊਣ ਨ ਕਾਈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਲਧਾ ਤਿਨ ਸੁਆਉ ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ॥੧॥
सलोक मः ५ ॥
डिठड़ो हभ ठाइ ऊण न काई जाइ ॥
नानक लधा तिन सुआउ जिना सतिगुरु भेटिआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ५॥ मैंने (प्रभू को) हर जगह मौजूद देखा है। कोई भी जगह (प्रभू से) खाली नहीं है (भाव। हरेक जीव में प्रभू है) पर। हे नानक ! जीवन का मनोरथ (भाव। प्रभू का नाम सिमरन) उन मनुष्यों को ही मिला है जिन्हें सतिगुरू मिला है। 1।

संदर्भ: यह अंग 318 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 318” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 319 →, पीछे का: ← अंग 317

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।