अंग 190

अंग
190
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਚਰਨ ਠਾਕੁਰ ਕੈ ਮਾਰਗਿ ਧਾਵਉ ॥੧॥
ਭਲੋ ਸਮੋ ਸਿਮਰਨ ਕੀ ਬਰੀਆ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਭੈ ਪਾਰਿ ਉਤਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨੇਤ੍ਰ ਸੰਤਨ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਪੇਖੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਵਿਨਾਸੀ ਮਨ ਮਹਿ ਲੇਖੁ ॥੨॥
ਸੁਣਿ ਕੀਰਤਨੁ ਸਾਧ ਪਹਿ ਜਾਇ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੀ ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟਾਇ ॥੩॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਠਾਕੁਰ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਨਾਨਕ ਨਿਸਤਾਰਿ ॥੪॥੫੧॥੧੨੦॥
चरन ठाकुर कै मारगि धावउ ॥१॥
भलो समो सिमरन की बरीआ ॥
सिमरत नामु भै पारि उतरीआ ॥१॥ रहाउ ॥
नेत्र संतन का दरसनु पेखु ॥
प्रभ अविनासी मन महि लेखु ॥२॥
सुणि कीरतनु साध पहि जाइ ॥
जनम मरण की त्रास मिटाइ ॥३॥
चरण कमल ठाकुर उरि धारि ॥
दुलभ देह नानक निसतारि ॥४॥५१॥१२०॥

हिन्दी अर्थ: और पैरों से मैं परमात्मा के रास्ते पे चल रहा हूँ। 1। (हे मेरे मन ! मानस जनम का ये) सुंदर समय (तुझे मिला है। ये मानस जनम ही परमात्मा के) सिमरन की बेला है। (इस मनुष्य जन्म में ही) परमात्मा का नाम सिमरते हुए (संसार के अनेकों) डरों से पार लांघ सकते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! तू भी) अपनी आँखों से गुरमुखों के दर्शन कर~ (गुरमुखों की संगति में रह के) अपने मन में अविनाशी परमात्मा के सिमरन का लेख लिखता रह। 2। (हे भाई !) गुरू की संगति में जा के तू परमात्मा के सिॅफत सालाह के गीत सुना कर और इस तरह जनम मरण में पड़ने वाली आत्मिक मौत का डर (अपने अंदर से) दूर कर ले। 3। हे नानक ! (कह,हे भाई !) परमात्मा के सुंदर चरण अपने हृदय में टिकाए रख। ये मानस शरीर बड़ी मुश्किल से मिला है~ इसे (सिमरन की बरकति से संसार समुंद्र के विकारों से) पार लंघा ले। 4। 51। 120।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕਉ ਅਪਨੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੈ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਉਚਾਰੈ ॥੧॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਸਹਸਾ ਦੁਖੁ ਬਿਆਪੈ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਭਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਸੁਣੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਵੈ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਦੂਖੁ ਨਿਕਟਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥੨॥
ਹਰਿ ਕੀ ਟਹਲ ਕਰਤ ਜਨੁ ਸੋਹੈ ॥
ਤਾ ਕਉ ਮਾਇਆ ਅਗਨਿ ਨ ਪੋਹੈ ॥੩॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦਇਆਲ ॥
ਨਾਨਕ ਤਜੀਅਲੇ ਅਵਰਿ ਜੰਜਾਲ ॥੪॥੫੨॥੧੨੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ अपनी किरपा धारै ॥
सो जनु रसना नामु उचारै ॥१॥
हरि बिसरत सहसा दुखु बिआपै ॥
सिमरत नामु भरमु भउ भागै ॥१॥ रहाउ ॥
हरि कीरतनु सुणै हरि कीरतनु गावै ॥
तिसु जन दूखु निकटि नही आवै ॥२॥
हरि की टहल करत जनु सोहै ॥
ता कउ माइआ अगनि न पोहै ॥३॥
मनि तनि मुखि हरि नामु दइआल ॥
नानक तजीअले अवरि जंजाल ॥४॥५२॥१२१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ जिस मनुष्य पे परमात्मा अपनी मेहर करता है वह मनुष्य (अपनी) जीभ से परमात्मा का नाम उचारता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा को भुलाने से (दुनिया का) सहम-दुख (अपना) जोर डाल लेता है~ (पर प्रभू का) नाम सिमरने से हरेक भटकना दूर हो जाती है~ हरेक किस्म का डर भाग जाता है। 1। रहाउ। (प्रभू की कृपा से जो मनुष्य) प्रभू की सिफत सालाह सुनता है~ प्रभू की सिफत सालाह गाता है~ कोई दुख उस मनुष्य के समीप नहीं फटकता। 2। (हे भाई !) परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हुए मनुष्य सुंदर जीवन वाला बन जाता है~ (क्योंकि) उस मनुष्य को माया (की तृष्णा की) आग सता नहीं सकती (उसके आत्मिक जीवन को जला नहीं सकती)। 3। हे नानक ! दया के घर परमात्मा का नाम जिस मनुष्य के मन में दिल में व मुंह में बस जाता है~ उस मनुष्य ने (अपने मन में से माया के मोह के) और सारे जंजाल उतार दिए होते हैं। 4। 42। 121।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਛਾਡਿ ਸਿਆਨਪ ਬਹੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਟੇਕ ਟਿਕਾਈ ॥੧॥
ਦੁਖ ਬਿਨਸੇ ਸੁਖ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਆ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ॥
ਮਿਟੇ ਵਿਸੂਰੇ ਉਤਰੀ ਚਿੰਤ ॥੨॥
ਅਨਦ ਭਏ ਗੁਰ ਮਿਲਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਾਟੇ ਜਮ ਜਾਲ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥
ਤਾ ਤੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਬਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥੪॥੫੩॥੧੨੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
छाडि सिआनप बहु चतुराई ॥
गुर पूरे की टेक टिकाई ॥१॥
दुख बिनसे सुख हरि गुण गाइ ॥
गुरु पूरा भेटिआ लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि का नामु दीओ गुरि मंत्रु ॥
मिटे विसूरे उतरी चिंत ॥२॥
अनद भए गुर मिलत क्रिपाल ॥
करि किरपा काटे जम जाल ॥३॥
कहु नानक गुरु पूरा पाइआ ॥
ता ते बहुरि न बिआपै माइआ ॥४॥५३॥१२२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ ये ख्याल छोड़ दे कि तू बहुत अक्लमंद और चतुर है (और जीवन-मार्ग को खुद ही समझ सकता है) (हे भाई ! तू भी) पूरे गुरू का आसरा ले।। 1। परमात्मा के गुण गा के उसे सुख (ही सुख) मिलते हैं और उसके सारे (के सारे) दुख दूर हो जाते हैं (हे भाई ! जिस मनुष्य को) पूरा गुरू मिल जाता है (और गुरू की मेहर से जो प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू ने (जिस मनुष्य को) परमात्मा का नाम मंत्र दिया है (उस मंत्र की बरकति से उसके सारे) झोरे (चिंता-फिक्र) मिट गए हैं उसकी (हरेक किस्म की) चिंता उतर गई है। 2। (हे भाई !) दया के श्रोत गुरू को मिल के आत्मिक शांति पैदा हो जाती है। गुरू कृपा करके (मनुष्य के अंदर से) आत्मिक मौत लाने वाली माया के मोह के फंदे कट जाते हैं। 3। हे नानक ! कह, (जिस मनुष्य को) पूरा गुरू मिल जाता है~ उस गुरू की बरकति से (उस मनुष्य पर) माया (अपना) जोर नहीं डाल सकती। 4। 53। 122।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਾਖਿ ਲੀਆ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਆਪਿ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਉ ਲਾਗੋ ਸੰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਗੁਰੂ ਗੁਰੂ ਜਪਿ ਮੀਤ ਹਮਾਰੇ ॥
ਮੁਖ ਊਜਲ ਹੋਵਹਿ ਦਰਬਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਇ ॥
ਦੁਖ ਦੁਸਮਨ ਤੇਰੀ ਹਤੈ ਬਲਾਇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਤੇਰੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ॥
ਦਇਆਲ ਭਏ ਸਗਲੇ ਜੀਅ ਭਾਈ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਜਬ ਕਿਰਪਾ ਕਰੀ ॥
ਭਨਤਿ ਨਾਨਕ ਮੇਰੀ ਪੂਰੀ ਪਰੀ ॥੪॥੫੪॥੧੨੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
राखि लीआ गुरि पूरै आपि ॥
मनमुख कउ लागो संतापु ॥१॥
गुरू गुरू जपि मीत हमारे ॥
मुख ऊजल होवहि दरबारे ॥१॥ रहाउ ॥
गुर के चरण हिरदै वसाइ ॥
दुख दुसमन तेरी हतै बलाइ ॥२॥
गुर का सबदु तेरै संगि सहाई ॥
दइआल भए सगले जीअ भाई ॥३॥
गुरि पूरै जब किरपा करी ॥
भनति नानक मेरी पूरी परी ॥४॥५४॥१२३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के अनुसार रहता है) पूरे गुरू ने खुद उसे (सदैव कामादिक वैरियों से) बचा लिया है। पर~ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को (इनका) सेक लगता ही रहता है। 1। हे मेरे मित्रो ! सदा (अपने) गुरू को याद रखो। (गुरू का उपदेश याद रखने से) तुम्हारे मुंह परमात्मा की दरगाह में रौशन होंगे। 1। रहाउ। (हे भाई ! तू अपने) हृदय में गुरू के चरण बसाए रख (गुरू तेरे सारे) दुख-कलेश नाश करेगा। (कामादिक तेरे सारे) वैरियों को खत्म कर देगा (तेरे पर दबाव डालने वाली माया-) चुड़ैल को मार देगा।2। हे भाई ! गुरू का शबद ही तेरे साथ (सदैव साथ निभाने वाला) साथी है~ (गुरू का शबद हृदय में परोए रखने से) सारे लोग दयावान हो जाते हैं।3। नानक कहता है,जब पूरे गुरू ने (मेरे पर) मेहर की तो मेरे जीवन की मेहनत सफल हो गई (कामादिक वैरी मेरे पर हमला करने से हट गए)।4।54।123।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਨਿਕ ਰਸਾ ਖਾਏ ਜੈਸੇ ਢੋਰ ॥
ਮੋਹ ਕੀ ਜੇਵਰੀ ਬਾਧਿਓ ਚੋਰ ॥੧॥
ਮਿਰਤਕ ਦੇਹ ਸਾਧਸੰਗ ਬਿਹੂਨਾ ॥
ਆਵਤ ਜਾਤ ਜੋਨੀ ਦੁਖ ਖੀਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਬਸਤ੍ਰ ਸੁੰਦਰ ਪਹਿਰਾਇਆ ॥
ਜਿਉ ਡਰਨਾ ਖੇਤ ਮਾਹਿ ਡਰਾਇਆ ॥੨॥
ਸਗਲ ਸਰੀਰ ਆਵਤ ਸਭ ਕਾਮ ॥
ਨਿਹਫਲ ਮਾਨੁਖੁ ਜਪੈ ਨਹੀ ਨਾਮ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਭਜਹਿ ਗੋੁਪਾਲਾ ॥੪॥੫੫॥੧੨੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
अनिक रसा खाए जैसे ढोर ॥
मोह की जेवरी बाधिओ चोर ॥१॥
मिरतक देह साधसंग बिहूना ॥
आवत जात जोनी दुख खीना ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक बसत्र सुंदर पहिराइआ ॥
जिउ डरना खेत माहि डराइआ ॥२॥
सगल सरीर आवत सभ काम ॥
निहफल मानुखु जपै नही नाम ॥३॥
कहु नानक जा कउ भए दइआला ॥
साधसंगि मिलि भजहि गोुपाला ॥४॥५५॥१२४॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ जैसे पशु चारे से पेट भर लेते हैं~ (वैसे ही साध-संगति से वंचित रह के आत्मिक मौत मरा हुआ मनुष्य) अनेकों स्वादिष्ट पदार्थ खाता रहता है और (रंगे हाथ पकड़े हुए) चोर की तरह (माया) के मोह की रस्सियों में लगातार (कसता) जकड़ता चला जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति से वंचित रहता है~ उसका शरीर मुर्दा है (क्योंकि उसके अंदर आत्मिक मौत मरी हुई जीवात्मा है)~ वह मनुष्य जनम मरण के चक्र में पड़ा रहता है~ जूनियों के दुखों के कारण उसका आत्मिक जीवन लगातार कमजोर होता चला जाता है। 1। रहाउ। (आत्मिक मौत मरा मनुष्य) अनेकों सुंदर-सुंदर कपड़े पहनता है (गरीब मैले कपडों वाले लोग उससे डरते थोड़ा परे परे रहते हैं। इस तरह गरीबों के लिए वह ऐसे होता है) जैसे खेतों में (जानवरों को) डराने के लिए बनावटी रखवाला खड़ा किया होता है। 2। (अन्य पशु आदि के) सारे शरीर कोई ना कोई काम आ जाते हैं । अगर मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं जपता~ तो इसका जगत में आना व्यर्थ ही जाता है। 3। हे नानक ! कह,जिन मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है~ वह साध-संगति में (सत्संगियों के साथ) मिल के जगत के पालणहार प्रभू का भजन करते हैं। 4। 55। 124।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥

संदर्भ: यह अंग 190 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 190” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 191 →, पीछे का: ← अंग 189

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।