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श्री गुरु ग्रंथ साहिब · 1430 अंग
वाणी के पास बैठिए। देवनागरी पाठ, हिन्दी अर्थ और मूल स्रोत के साथ अपनी गति से पढ़िए।

रचना चुनिए
आरम्भ की कड़ी रचना के पहले अंश तक पहुँचाती है। अन्त की कड़ी से उसका आख़िरी अंश देख सकते हैं। एक ही अंग पर अगली रचना भी शुरू हो सकती है; शीर्षक साथ देखिए।
अंग 1 से 8
जपु, जपजी साहिब
प्रारम्भिक वाणी; 38 पउड़ियाँ और अन्त का सलोक।
अंग 8 से 12
रहरासि के ग्रंथ-अंश
यहाँ रहरासि में पढ़े जाने वाले ग्रंथ के अंश हैं। सम्पूर्ण रहरासि का दैनिक पाठ अतिरिक्त रचनाओं सहित होता है।
अंग 12 से 13
सोहिला
पाँच शबदों की रचना। पहली पंक्ति से पूरा क्रम पढ़िए।
अंग 262 से 296
सुखमनी साहिब
24 अष्टपदियाँ, प्रत्येक से पहले एक सलोक।
अंग 462 से 475
आसा दी वार
24 पउड़ियों का क्रम और उनके साथ संकलित सलोक।
अंग 938 से 946
सिध गोसटि
सिद्धों से प्रश्न और उत्तर; 73 पदों की रचना।
अंग 133 से 136
बारह माहा, माझ
बारह महीनों के क्रम में प्रभु-मिलन की अभिलाषा। तुखारी में गुरु नानक देव जी की बारह माहा भी पढ़ सकते हैं।
अंग 773 से 774
लावाँ
सूही राग की चार लावाँ।
अंग 250 से 262
बावन अखरी
गउड़ी राग में अक्षरों के क्रम से खुलती वाणी।
अंग 1426 से 1429
सलोक महला 9
57 सलोकों का पूरा पाठ।
अंग 1429 से 1430
रागमाला
रागों, रागिनियों और उनके परिवारों का काव्यात्मक क्रम।
अंग 917 से 922
आनन्द साहिब
रामकली राग में 40 पउड़ियाँ।
राग के अनुसार पढ़िए
ग्रंथ के मुख्य राग-क्रम में 31 राग हैं। किसी नाम से उसकी वाणी की सूची तक पहुँचिए।
यह वाणी यहाँ क्यों
किसी पुस्तकालय में एक ग्रंथ के पास पहुँचना अपने साथ कई पुराने परिचय ले आना भी है। हमें राम का नाम परिचित हो सकता है, कबीर का कोई दोहा याद हो सकता है, किसी गुरुद्वारे से आती वाणी सुनकर हम ठहरे हो सकते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब खोलते समय इन स्मृतियों को साथ रखिए। फिर जिस पंक्ति तक पहुँचे हैं, उसके अपने शब्द सुनिए। यहाँ नाम, गुरु, हुकम और संगति की बात किस तरह उठती है, यह बात धीरे पढ़ने पर खुलती है।
सिख परम्परा में गुरु ग्रंथ साहिब शब्द-गुरु हैं। इस पुस्तकालय में उनकी वाणी को उसी पहचान के साथ स्थान दिया गया है। गुरु अर्जन देव जी के निर्देशन में 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन हुआ। गुरु तेग बहादुर जी की वाणी सहित ग्रंथ को 1708 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरुपद दिया। इस संक्षिप्त इतिहास का विस्तृत परिचय गुरु ग्रंथ साहिब परियोजना में पढ़ सकते हैं। पढ़ते हुए इस जीवित गुरु-परम्परा का स्मरण हमें पाठ के प्रति सावधान रखता है।
पूरा परिचय पढ़िए
हमारे यहाँ आने वाले बहुत से पाठक देवनागरी पढ़ते हैं। उनके लिए मूल वाणी का लिप्यन्तरण और उसके नीचे हिन्दी अर्थ साथ रखे गए हैं। परिचित अक्षरों में भी कोई शब्द पहली बार मिल सकता है। उसका अर्थ देख लेने के बाद पंक्ति पर लौटिए। किसी व्याख्या से प्रश्न उठे तो मूल गुरमुखी और दूसरी व्याख्या भी खोलिए। प्रत्येक अंग के अन्त में दिए स्रोत इसी लौटने और मिलाकर पढ़ने के काम आते हैं।
शुरुआत के लिए जपु का पहला अंग खोल सकते हैं। उसमें उठता सचियार होने का प्रश्न आगे के पाठ में साथ बना रहता है। पहले परिचय के लिए किसी लम्बी रचना को एक बैठक में पूरा करने का दबाव रखने की ज़रूरत नहीं है। एक पउड़ी पढ़िए, उसका अर्थ देखिए और ठहरिए। दूसरी बार लौटने पर वही पंक्ति किसी दूसरे शब्द की ओर ध्यान खींच सकती है। अपनी पढ़ाई में उस ठहराव के लिए जगह रखिए।
ग्रंथ के अंग पढ़ते हुए एक व्यावहारिक बात याद रखिए: अंग बदलने पर रचना जारी रह सकती है। इसीलिए किसी पन्ने की पहली पंक्ति पर पहुँचकर उसका शीर्षक और पिछले अंग का संकेत देखना उपयोगी है। राग का नाम, महला का अंक, घर का संकेत और किसी भगत का नाम पाठ की पहचान के अलग-अलग सूत्र हैं। पन्ने पर दिए छोटे परिचय इन सूत्रों को सामने रखते हैं। उनका अर्थ समझकर पढ़ने से हम रचना का आरम्भ और उसकी आगे की गति पहचान पाते हैं।
एक ही अंग पर कई रचयिताओं की वाणी मिल सकती है। फ़रीद जी के सलोकों के क्रम में गुरु-वाणी भी आती है; वहाँ पाठ में दिया महला-संकेत ध्यान माँगता है। ऐसा अंश पढ़ते हुए उसके आसपास के सलोक और स्वयं उसका शीर्षक साथ देखिए। अंग 1381 पर महला 5 का सलोक इसका एक उदाहरण है। किसी संग्रह के नाम से उसके हर अंश का रचयिता तय कर देने पर यह अन्तर छूट सकता है।
जिसे किसी राग से लगाव है, वह राग-सूची से भीतर आ सकता है। किसी रचयिता को पढ़ने का मन हो तो वाणी-सूची खोलिए। जपु, सुखमनी, बारह माहा और सिध गोसटि जैसी रचनाओं के लिए नीचे अलग रास्ते दिए हैं। इनके पास समय लेकर लौट सकते हैं। कोई अंक पहले से मालूम हो तो अंग चुनने का छोटा खाना सीधे वहाँ पहुँचा देगा। पढ़ते समय उपयोगी लगे पन्ने की कड़ी अपने पास सहेज लीजिए।
निजी अध्ययन में हम एक प्रश्न लिखकर भी रख सकते हैं: इस पंक्ति में किससे बात हो रही है? किस बात की चाह है, और किससे छुटकारे की प्रार्थना है? उत्तर तुरन्त मिलना आवश्यक नहीं। पहले इतना देखिए कि पूरी रचना उस प्रश्न को कहाँ ले जाती है। परिचित शब्दों का अर्थ भी प्रसंग के साथ गहरा होता है। अपनी पहली समझ को अगली पंक्तियों के सामने खुला रखने से पढ़ाई में विनम्रता आती है।
यही इस वाणी को यहाँ रखने का प्रयोजन है: हिन्दी पढ़ने वाले पाठक को पूरा पाठ, अर्थ और स्रोत तक पहुँच मिले, और वह अपनी गति से उस पर लौट सके। नियमित पाठ या गुरुद्वारे की सेवा की मर्यादा जाननी हो तो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी की सिख रहित मर्यादा देखिए। इस पन्ने से आप अध्ययन का अपना आरम्भ चुन सकते हैं।
पाठ और स्रोत
देवनागरी लिप्यन्तरण मूल गुरमुखी पढ़ने में सहायक है। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। अर्थ पढ़कर मूल पंक्ति पर लौट सकते हैं।
साथ रखिए: गुरु ग्रंथ दर्पन की पंजाबी व्याख्या, संत सिंह खालसा का अंग्रेज़ी अनुवाद और गुरु ग्रंथ साहिब परियोजना। प्रत्येक अंग पर उस अंग के स्रोत भी दिए हैं।