अंग
207
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਤੁਮਰੇ ਰੰਗਾ ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਸੁਖਦਾਤੇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਪ੍ਰਭ ਅਬਿਨਾਸੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਜਾਤੇ ॥੨॥
ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਕਾਟਿ ਕੀਏ ਨਿਹਕੇਵਲ ਜਬ ਤੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੋ ਚੂਕੋ ਸਹਸਾ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਦਰਸਾਰੀ ॥੩॥
ਚਰਣ ਪਖਾਰਿ ਕਰਉ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਾਰਿ ਜਾਉ ਲਖ ਬਰੀਆ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਇਹੁ ਭਉਜਲੁ ਤਰਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਿਅ ਸੰਗਿ ਮਿਰੀਆ ॥੪॥੭॥੧੨੮॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਪ੍ਰਭ ਅਬਿਨਾਸੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਜਾਤੇ ॥੨॥
ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਕਾਟਿ ਕੀਏ ਨਿਹਕੇਵਲ ਜਬ ਤੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੋ ਚੂਕੋ ਸਹਸਾ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਦਰਸਾਰੀ ॥੩॥
ਚਰਣ ਪਖਾਰਿ ਕਰਉ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਾਰਿ ਜਾਉ ਲਖ ਬਰੀਆ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਇਹੁ ਭਉਜਲੁ ਤਰਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਿਅ ਸੰਗਿ ਮਿਰੀਆ ॥੪॥੭॥੧੨੮॥
बरनि न साकउ तुमरे रंगा गुण निधान सुखदाते ॥
अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥२॥
भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥
जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति दरसारी ॥३॥
चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥
जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक प्रिअ संगि मिरीआ ॥४॥७॥१२८॥
अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥२॥
भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥
जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति दरसारी ॥३॥
चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥
जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक प्रिअ संगि मिरीआ ॥४॥७॥१२८॥
हिन्दी अर्थ: हे गुणों के खजाने प्रभू ! हे सुख देने वाले प्रभू ! तुम्हारे रंग (खेल) वर्णन नहीं किये जा सकते हे अपहुँच प्रभू ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे प्रभू ! हे अविनाशी प्रभू ! पूरे गुरू के द्वारा ही तेरे साथ गहरी सांझ डल सकती है। 2। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे गुरू की शरण पड़ कर) जब से (अपने अंदर से अहंकार दूर करते हैं)~ गुरू उनकी भटकना व डर दूर करके उन्हें पवित्र जीवन वाला बना देता है। साध-संगति में (गुरू के) दर्शन की बरकति से उनके जनम मरण के चक्कर का सहम खत्म हो जाता है। 3। हे दास नानक ! (कह,) मैं (गुरू के) चरण धो के गुरू की सेवा करता हूँ। मैं (गुरू से) लाखों बार कुर्बान जाता हूँ~ क्योंकि उस (गुरू) की कृपा से ही इस संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं और प्रीतम प्रभू (के चरणों) में जुड़ सकते हैं। 4। 7। 128।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕਵਨੁ ਰੀਝਾਵੈ ਤੋਹੀ ॥
ਤੇਰੋ ਰੂਪੁ ਸਗਲ ਦੇਖਿ ਮੋਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਰਗ ਪਇਆਲ ਮਿਰਤ ਭੂਅ ਮੰਡਲ ਸਰਬ ਸਮਾਨੋ ਏਕੈ ਓਹੀ ॥
ਸਿਵ ਸਿਵ ਕਰਤ ਸਗਲ ਕਰ ਜੋਰਹਿ ਸਰਬ ਮਇਆ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਦੋਹੀ ॥੧॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਠਾਕੁਰ ਨਾਮੁ ਤੁਮਰਾ ਸੁਖਦਾਈ ਨਿਰਮਲ ਸੀਤਲੋਹੀ ॥
ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਨਾਨਕ ਵਡਿਆਈ ਸੰਤ ਤੇਰੇ ਸਿਉ ਗਾਲ ਗਲੋਹੀ ॥੨॥੮॥੧੨੯॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕਵਨੁ ਰੀਝਾਵੈ ਤੋਹੀ ॥
ਤੇਰੋ ਰੂਪੁ ਸਗਲ ਦੇਖਿ ਮੋਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਰਗ ਪਇਆਲ ਮਿਰਤ ਭੂਅ ਮੰਡਲ ਸਰਬ ਸਮਾਨੋ ਏਕੈ ਓਹੀ ॥
ਸਿਵ ਸਿਵ ਕਰਤ ਸਗਲ ਕਰ ਜੋਰਹਿ ਸਰਬ ਮਇਆ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਦੋਹੀ ॥੧॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਠਾਕੁਰ ਨਾਮੁ ਤੁਮਰਾ ਸੁਖਦਾਈ ਨਿਰਮਲ ਸੀਤਲੋਹੀ ॥
ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਨਾਨਕ ਵਡਿਆਈ ਸੰਤ ਤੇਰੇ ਸਿਉ ਗਾਲ ਗਲੋਹੀ ॥੨॥੮॥੧੨੯॥
गउड़ी महला ५ ॥
तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥
तेरो रूपु सगल देखि मोही ॥१॥ रहाउ ॥
सुरग पइआल मिरत भूअ मंडल सरब समानो एकै ओही ॥
सिव सिव करत सगल कर जोरहि सरब मइआ ठाकुर तेरी दोही ॥१॥
पतित पावन ठाकुर नामु तुमरा सुखदाई निरमल सीतलोही ॥
गिआन धिआन नानक वडिआई संत तेरे सिउ गाल गलोही ॥२॥८॥१२९॥
तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥
तेरो रूपु सगल देखि मोही ॥१॥ रहाउ ॥
सुरग पइआल मिरत भूअ मंडल सरब समानो एकै ओही ॥
सिव सिव करत सगल कर जोरहि सरब मइआ ठाकुर तेरी दोही ॥१॥
पतित पावन ठाकुर नामु तुमरा सुखदाई निरमल सीतलोही ॥
गिआन धिआन नानक वडिआई संत तेरे सिउ गाल गलोही ॥२॥८॥१२९॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ तेरी मेहर के बिना तुझे कोई जीव प्रसन्न नहीं कर सकता। हे प्रभू !तेरा (सुंदर सर्व-व्यापक) रूप देख के सारी सृष्टि मस्त हो जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) स्वर्गलोक~ पाताल लोक~ मातृ लोक~ सारा ब्रहमण्ड~ सब में एक वह परमात्मा ही समाया हुआ है। हे सब पर दया करने वाले सबके ठाकुर सारे जीव तुझे ‘सुखों का दाता’ कह कह के (तेरे आगे) दोनों हाथ जोड़ते हैं~ और तेरे दर पर ही सहायता के लिए पुकार करते हैं। 1। हे ठाकुर ! तेरा नाम है ‘विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाला’। तू सबको सुख देने वाला है~ तू पवित्र हस्ती वाला है~ तू शांति-स्वरूप है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) तेरे संत जनों से तेरी सिफत सालाह की बातें ही (तेरे सेवकों के वास्ते) ज्ञान-चर्चा है~ समाधियां हैं~ (लोक-परलोक की) इज्ज़त है। 2। 8। 129।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਿਲਹੁ ਪਿਆਰੇ ਜੀਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀਆ ਤੁਮਾਰਾ ਥੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਜਨਮ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਭ੍ਰਮਿਆ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਮਾਨੁਖ ਦੇਹ ਪਾਈ ਹੈ ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੧॥
ਸੋਈ ਹੋਆ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕਿਨ ਹੀ ਕੀਤਾ ॥
ਤੁਮਰੈ ਭਾਣੈ ਭਰਮਿ ਮੋਹਿ ਮੋਹਿਆ ਜਾਗਤੁ ਨਾਹੀ ਸੂਤਾ ॥੨॥
ਬਿਨਉ ਸੁਨਹੁ ਤੁਮ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਪਿਆਰੇ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਦਇਆਲਾ ॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਅਨਾਥਹ ਕਰਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥੩॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੁਮਹਿ ਦਿਖਾਇਓ ਦਰਸਨੁ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਪਾਛੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧੂਰਿ ਦੇਹੁ ਸੰਤਨ ਕੀ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕੁ ਇਹੁ ਬਾਛੈ ॥੪॥੯॥੧੩੦॥
ਮਿਲਹੁ ਪਿਆਰੇ ਜੀਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀਆ ਤੁਮਾਰਾ ਥੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਜਨਮ ਬਹੁ ਜੋਨੀ ਭ੍ਰਮਿਆ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਮਾਨੁਖ ਦੇਹ ਪਾਈ ਹੈ ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੧॥
ਸੋਈ ਹੋਆ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕਿਨ ਹੀ ਕੀਤਾ ॥
ਤੁਮਰੈ ਭਾਣੈ ਭਰਮਿ ਮੋਹਿ ਮੋਹਿਆ ਜਾਗਤੁ ਨਾਹੀ ਸੂਤਾ ॥੨॥
ਬਿਨਉ ਸੁਨਹੁ ਤੁਮ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਪਿਆਰੇ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਦਇਆਲਾ ॥
ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਅਨਾਥਹ ਕਰਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥੩॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੁਮਹਿ ਦਿਖਾਇਓ ਦਰਸਨੁ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਪਾਛੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧੂਰਿ ਦੇਹੁ ਸੰਤਨ ਕੀ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕੁ ਇਹੁ ਬਾਛੈ ॥੪॥੯॥੧੩੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
मिलहु पिआरे जीआ ॥
प्रभ कीआ तुमारा थीआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक जनम बहु जोनी भ्रमिआ बहुरि बहुरि दुखु पाइआ ॥
तुमरी क्रिपा ते मानुख देह पाई है देहु दरसु हरि राइआ ॥१॥
सोई होआ जो तिसु भाणा अवरु न किन ही कीता ॥
तुमरै भाणै भरमि मोहि मोहिआ जागतु नाही सूता ॥२॥
बिनउ सुनहु तुम प्रानपति पिआरे किरपा निधि दइआला ॥
राखि लेहु पिता प्रभ मेरे अनाथह करि प्रतिपाला ॥३॥
जिस नो तुमहि दिखाइओ दरसनु साधसंगति कै पाछै ॥
करि किरपा धूरि देहु संतन की सुखु नानकु इहु बाछै ॥४॥९॥१३०॥
मिलहु पिआरे जीआ ॥
प्रभ कीआ तुमारा थीआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक जनम बहु जोनी भ्रमिआ बहुरि बहुरि दुखु पाइआ ॥
तुमरी क्रिपा ते मानुख देह पाई है देहु दरसु हरि राइआ ॥१॥
सोई होआ जो तिसु भाणा अवरु न किन ही कीता ॥
तुमरै भाणै भरमि मोहि मोहिआ जागतु नाही सूता ॥२॥
बिनउ सुनहु तुम प्रानपति पिआरे किरपा निधि दइआला ॥
राखि लेहु पिता प्रभ मेरे अनाथह करि प्रतिपाला ॥३॥
जिस नो तुमहि दिखाइओ दरसनु साधसंगति कै पाछै ॥
करि किरपा धूरि देहु संतन की सुखु नानकु इहु बाछै ॥४॥९॥१३०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे सब जीवों से प्यार करने वाले प्रभू !मुझे मिल। हे प्रभू ! (जगत में) तेरा किया ही हो रहा है (वही होता है जो तू करता है)। 1। रहाउ। हे प्रभू पातशाह ! (माया से ग्रसा हुआ जीव) अनेक जन्मों में बहुत जूनियों में भटकता चला आता है~ (जनम मरन का) दुख मुड़ मुड़ के सहता है। तेरी मेहर से (इसने अब) मानव शरीर प्राप्त किया है (इसे अपना) दर्शन दे (और इसकी विकारों से रक्षा कर)। 1। हे भाई ! जगत में वही कुछ बीतता है~ जो कुछ परमात्मा को पसंद आता है। कोई और जीव (उसकी रजा के उलट कुछ) नहीं कर सकता। हे प्रभू ! जीव तेरी रजा के अनुसार ही माया की भटकना में माया के मोह में फंसा रहता है~ सदा मोह में सोया रहता है और इस नींद में से सुचेत नहीं होता। 2। हे मेरी जीवात्मा के पति ! हे प्यारे प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! हे दयालु प्रभू ! तू (मेरी) विनती सुन। हे मेरे पिता प्रभू ! अनाथ जीवों की पालना कर (इन्हे विकारों के हमलों से) बचा ले। 3। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तूने अपना दर्शन दिया है~ साध-संगति के आसरे रख के दिया है। (हे प्रभू ! तेरा दास) नानक (तेरे दर से) ये सुख मांगता है कि मुझे नानक को भी अपने संत जनों के चरणों की धूड़ बख्श। 4। 9। 130।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਉ ਤਾ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਜਾ ਕੈ ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਿਮਾ ਤਾ ਕੀ ਕੇਤਕ ਗਨੀਐ ਜਨ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਤਿਨਾ ਸੰਗਿ ਉਨ ਸਮਸਰਿ ਅਵਰ ਨ ਦਾਤੇ ॥੧॥
ਜਗਤ ਉਧਾਰਣ ਸੇਈ ਆਏ ਜੋ ਜਨ ਦਰਸ ਪਿਆਸਾ ॥
ਉਨ ਕੀ ਸਰਣਿ ਪਰੈ ਸੋ ਤਰਿਆ ਸੰਤਸੰਗਿ ਪੂਰਨ ਆਸਾ ॥੨॥
ਤਾ ਕੈ ਚਰਣਿ ਪਰਉ ਤਾ ਜੀਵਾ ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਿਹਾਲਾ ॥
ਭਗਤਨ ਕੀ ਰੇਣੁ ਹੋਇ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਹੋਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥੩॥
ਰਾਜੁ ਜੋਬਨੁ ਅਵਧ ਜੋ ਦੀਸੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਘਾਟਿਆ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਦ ਨਵਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਇਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਾਟਿਆ ॥੪॥੧੦॥੧੩੧॥
ਹਉ ਤਾ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਜਾ ਕੈ ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਿਮਾ ਤਾ ਕੀ ਕੇਤਕ ਗਨੀਐ ਜਨ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਤਿਨਾ ਸੰਗਿ ਉਨ ਸਮਸਰਿ ਅਵਰ ਨ ਦਾਤੇ ॥੧॥
ਜਗਤ ਉਧਾਰਣ ਸੇਈ ਆਏ ਜੋ ਜਨ ਦਰਸ ਪਿਆਸਾ ॥
ਉਨ ਕੀ ਸਰਣਿ ਪਰੈ ਸੋ ਤਰਿਆ ਸੰਤਸੰਗਿ ਪੂਰਨ ਆਸਾ ॥੨॥
ਤਾ ਕੈ ਚਰਣਿ ਪਰਉ ਤਾ ਜੀਵਾ ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਿਹਾਲਾ ॥
ਭਗਤਨ ਕੀ ਰੇਣੁ ਹੋਇ ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਹੋਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥੩॥
ਰਾਜੁ ਜੋਬਨੁ ਅਵਧ ਜੋ ਦੀਸੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਘਾਟਿਆ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਦ ਨਵਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਇਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਾਟਿਆ ॥੪॥੧੦॥੧੩੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
हउ ता कै बलिहारी ॥
जा कै केवल नामु अधारी ॥१॥ रहाउ ॥
महिमा ता की केतक गनीऐ जन पारब्रहम रंगि राते ॥
सूख सहज आनंद तिना संगि उन समसरि अवर न दाते ॥१॥
जगत उधारण सेई आए जो जन दरस पिआसा ॥
उन की सरणि परै सो तरिआ संतसंगि पूरन आसा ॥२॥
ता कै चरणि परउ ता जीवा जन कै संगि निहाला ॥
भगतन की रेणु होइ मनु मेरा होहु प्रभू किरपाला ॥३॥
राजु जोबनु अवध जो दीसै सभु किछु जुग महि घाटिआ ॥
नामु निधानु सद नवतनु निरमलु इहु नानक हरि धनु खाटिआ ॥४॥१०॥१३१॥
हउ ता कै बलिहारी ॥
जा कै केवल नामु अधारी ॥१॥ रहाउ ॥
महिमा ता की केतक गनीऐ जन पारब्रहम रंगि राते ॥
सूख सहज आनंद तिना संगि उन समसरि अवर न दाते ॥१॥
जगत उधारण सेई आए जो जन दरस पिआसा ॥
उन की सरणि परै सो तरिआ संतसंगि पूरन आसा ॥२॥
ता कै चरणि परउ ता जीवा जन कै संगि निहाला ॥
भगतन की रेणु होइ मनु मेरा होहु प्रभू किरपाला ॥३॥
राजु जोबनु अवध जो दीसै सभु किछु जुग महि घाटिआ ॥
नामु निधानु सद नवतनु निरमलु इहु नानक हरि धनु खाटिआ ॥४॥१०॥१३१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) मैं उन (संत जनों) से सदके जाता हूँ जिनके हृदय में सिर्फ परमात्मा का नाम (ही जिंदगी का) आसरा है। 1। रहाउ। (हे भाई !) संत जन परमात्मा के प्यार-रंग में रंगे रहते हैं~ उनके आत्मिक बड़प्पन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। उनकी संगति में रहने से आत्मिक अडोलता के सुख आनंद प्राप्त होते हैं~ उनके बराबर का और कोई दानी नहीं हो सकता। 1। (हे भाई !) जिन (संत) जनों को स्वयं परमात्मा की चाहत लगी रहे~ वही जगत के जीवों को विकारों से बचाने आए समझो। उनकी शरण जो मनुष्य आ जाता है~ वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। (हे भाई !) संत जनों की संगति में रहने से सब आशाएं पूरी हो जाती हैं। (हे भाई !) संत जनों की संगति में रहने से मन खिल उठता है। मैं तो जब संत जनों के चरणों में आ गिरता हूँ~ मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। हे प्रभू ! मेरे पर कृपालु हुआ रह (ता कि तेरी कृपा से) मेरा मन तेरे संत जनों के चरणों की धूड़ बना रहे। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) हकूमत~ जवानी~ उम्र~ जो कुछ भी जगत में (संभालने लायक) दिखाई देता है ये घटता ही जाता है। परमात्मा का नाम (ही एक ऐसा) खजाना (है जो) सदा नया रहता है~ और है भी पवित्र (भाव~ इस खजाने से मन बिगड़ने की बजाय पवित्र होता जाता है)। (संत जन) ये नाम-धन ही सदा कमाते रहते हैं। 4। 10। 131।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 207 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 207” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 208 →, पीछे का: ← अंग 206।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।