अंग
267
राग Gauree
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ਇਹੁ ਨਿਰਗੁਨੁ ਗੁਨੁ ਕਛੂ ਨ ਬੂਝੈ ॥
ਬਖਸਿ ਲੇਹੁ ਤਉ ਨਾਨਕ ਸੀਝੈ ॥੧॥
ਬਖਸਿ ਲੇਹੁ ਤਉ ਨਾਨਕ ਸੀਝੈ ॥੧॥
इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥
बखसि लेहु तउ नानक सीझै ॥१॥
बखसि लेहु तउ नानक सीझै ॥१॥
हिन्दी अर्थ: (उस प्रभ को चेते कर)। (पर) हे नानक ! (कह। हे प्रभू !) ये गुणहीन जीव (तेरा) कोई उपकार नहीं समझता। (अगर) तू खुद मेहर करे। तो (ये जन्म उद्देश्य में) सफल हो। 1।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਧਰ ਊਪਰਿ ਸੁਖਿ ਬਸਹਿ ॥
ਸੁਤ ਭ੍ਰਾਤ ਮੀਤ ਬਨਿਤਾ ਸੰਗਿ ਹਸਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪੀਵਹਿ ਸੀਤਲ ਜਲਾ ॥
ਸੁਖਦਾਈ ਪਵਨੁ ਪਾਵਕੁ ਅਮੁਲਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭੋਗਹਿ ਸਭਿ ਰਸਾ ॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਸੰਗਿ ਸਾਥਿ ਬਸਾ ॥
ਦੀਨੇ ਹਸਤ ਪਾਵ ਕਰਨ ਨੇਤ੍ਰ ਰਸਨਾ ॥
ਤਿਸਹਿ ਤਿਆਗਿ ਅਵਰ ਸੰਗਿ ਰਚਨਾ ॥
ਐਸੇ ਦੋਖ ਮੂੜ ਅੰਧ ਬਿਆਪੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਢਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਆਪੇ ॥੨॥
ਸੁਤ ਭ੍ਰਾਤ ਮੀਤ ਬਨਿਤਾ ਸੰਗਿ ਹਸਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪੀਵਹਿ ਸੀਤਲ ਜਲਾ ॥
ਸੁਖਦਾਈ ਪਵਨੁ ਪਾਵਕੁ ਅਮੁਲਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭੋਗਹਿ ਸਭਿ ਰਸਾ ॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਸੰਗਿ ਸਾਥਿ ਬਸਾ ॥
ਦੀਨੇ ਹਸਤ ਪਾਵ ਕਰਨ ਨੇਤ੍ਰ ਰਸਨਾ ॥
ਤਿਸਹਿ ਤਿਆਗਿ ਅਵਰ ਸੰਗਿ ਰਚਨਾ ॥
ਐਸੇ ਦੋਖ ਮੂੜ ਅੰਧ ਬਿਆਪੇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਢਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਆਪੇ ॥੨॥
जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥
सुत भ्रात मीत बनिता संगि हसहि ॥
जिह प्रसादि पीवहि सीतल जला ॥
सुखदाई पवनु पावकु अमुला ॥
जिह प्रसादि भोगहि सभि रसा ॥
सगल समग्री संगि साथि बसा ॥
दीने हसत पाव करन नेत्र रसना ॥
तिसहि तिआगि अवर संगि रचना ॥
ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे ॥
नानक काढि लेहु प्रभ आपे ॥२॥
सुत भ्रात मीत बनिता संगि हसहि ॥
जिह प्रसादि पीवहि सीतल जला ॥
सुखदाई पवनु पावकु अमुला ॥
जिह प्रसादि भोगहि सभि रसा ॥
सगल समग्री संगि साथि बसा ॥
दीने हसत पाव करन नेत्र रसना ॥
तिसहि तिआगि अवर संगि रचना ॥
ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे ॥
नानक काढि लेहु प्रभ आपे ॥२॥
हिन्दी अर्थ: (हे जीव !) जिस (प्रभू) की कृपा से तू धरती पर सुखी बसता है। पुत्र भाई स्त्री के साथ हसता है; जिसकी मेहर से तू ठंडा पानी पीता है। सुख देने वाली हवा व अमुल्य आग (इस्तेमाल करता है); जिसकी कृपा से सारे रस भोगता है। सारे पदार्थों के साथ तू रहता है (भाव। सारे पदार्थ बरतने के लिए तुझे मिलते हैं); (जिस ने) तुझे हाथ पैर कान नाक जीभ दिए हैं। उस (प्रभू) को विसार के (हे जीव !) तू औरों के साथ मगन है। (ये) मूर्ख अंधे जीव (भलाई भुला देने वाले) ऐसे अवगुणों में फंसे हुए हैं। हे नानक ! (इन जीवों के लिए प्रार्थना कर। और कह) – हे प्रभू ! (इन्हें) स्वयं (इन अवगुणों में से) निकाल ले।2।
ਆਦਿ ਅੰਤਿ ਜੋ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ॥
ਤਿਸ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਕਰੈ ਗਵਾਰੁ ॥
ਜਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ਨਵ ਨਿਧਿ ਪਾਵੈ ॥
ਤਾ ਸਿਉ ਮੂੜਾ ਮਨੁ ਨਹੀ ਲਾਵੈ ॥
ਜੋ ਠਾਕੁਰੁ ਸਦ ਸਦਾ ਹਜੂਰੇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਅੰਧਾ ਜਾਨਤ ਦੂਰੇ ॥
ਜਾ ਕੀ ਟਹਲ ਪਾਵੈ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ॥
ਤਿਸਹਿ ਬਿਸਾਰੈ ਮੁਗਧੁ ਅਜਾਨੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਇਹੁ ਭੂਲਨਹਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ਅਪਾਰੁ ॥੩॥
ਤਿਸ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਕਰੈ ਗਵਾਰੁ ॥
ਜਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ਨਵ ਨਿਧਿ ਪਾਵੈ ॥
ਤਾ ਸਿਉ ਮੂੜਾ ਮਨੁ ਨਹੀ ਲਾਵੈ ॥
ਜੋ ਠਾਕੁਰੁ ਸਦ ਸਦਾ ਹਜੂਰੇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਅੰਧਾ ਜਾਨਤ ਦੂਰੇ ॥
ਜਾ ਕੀ ਟਹਲ ਪਾਵੈ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ॥
ਤਿਸਹਿ ਬਿਸਾਰੈ ਮੁਗਧੁ ਅਜਾਨੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਇਹੁ ਭੂਲਨਹਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ਅਪਾਰੁ ॥੩॥
आदि अंति जो राखनहारु ॥
तिस सिउ प्रीति न करै गवारु ॥
जा की सेवा नव निधि पावै ॥
ता सिउ मूड़ा मनु नही लावै ॥
जो ठाकुरु सद सदा हजूरे ॥
ता कउ अंधा जानत दूरे ॥
जा की टहल पावै दरगह मानु ॥
तिसहि बिसारै मुगधु अजानु ॥
सदा सदा इहु भूलनहारु ॥
नानक राखनहारु अपारु ॥३॥
तिस सिउ प्रीति न करै गवारु ॥
जा की सेवा नव निधि पावै ॥
ता सिउ मूड़ा मनु नही लावै ॥
जो ठाकुरु सद सदा हजूरे ॥
ता कउ अंधा जानत दूरे ॥
जा की टहल पावै दरगह मानु ॥
तिसहि बिसारै मुगधु अजानु ॥
सदा सदा इहु भूलनहारु ॥
नानक राखनहारु अपारु ॥३॥
हिन्दी अर्थ: जो (इसके) जनम से ले कर मरने के समय तक (इसकी) सक्षा करने वाला है- मूर्ख मनुष्य उस प्रभू से प्यार नहीं करता। जिसकी सेवा करने से (इसे सृष्टि के) नौ ही खजाने मिल जाते हैं। मूर्ख जीव उस प्रभू के साथ चिक्त नहीं जोड़ता। जो हर समय इसके अंग-संग है- अंधा मनुष्य उस ठाकुर को (कहीं) दूर (बैठा) समझता है। जिसकी टहल करने से इसे (प्रभू की) दरगाह में आदर मिलता है। मूर्ख और अंजान जीव उस प्रभू को विसार बैठता है। (पर कौन कौन सा अवगुण चितारें?) ये जीव (तो) सदा ही भूलें करता रहता है; हे नानक ! रक्षा करने वाला प्रभू बेअंत है (वह इस जीव के अवगुणों की तरफ नहीं देखता)।3।
ਰਤਨੁ ਤਿਆਗਿ ਕਉਡੀ ਸੰਗਿ ਰਚੈ ॥
ਸਾਚੁ ਛੋਡਿ ਝੂਠ ਸੰਗਿ ਮਚੈ ॥
ਜੋ ਛਡਨਾ ਸੁ ਅਸਥਿਰੁ ਕਰਿ ਮਾਨੈ ॥
ਜੋ ਹੋਵਨੁ ਸੋ ਦੂਰਿ ਪਰਾਨੈ ॥
ਛੋਡਿ ਜਾਇ ਤਿਸ ਕਾ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰੈ ॥
ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਤਿਸੁ ਪਰਹਰੈ ॥
ਚੰਦਨ ਲੇਪੁ ਉਤਾਰੈ ਧੋਇ ॥
ਗਰਧਬ ਪ੍ਰੀਤਿ ਭਸਮ ਸੰਗਿ ਹੋਇ ॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਪਤਿਤ ਬਿਕਰਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਢਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਦਇਆਲ ॥੪॥
ਸਾਚੁ ਛੋਡਿ ਝੂਠ ਸੰਗਿ ਮਚੈ ॥
ਜੋ ਛਡਨਾ ਸੁ ਅਸਥਿਰੁ ਕਰਿ ਮਾਨੈ ॥
ਜੋ ਹੋਵਨੁ ਸੋ ਦੂਰਿ ਪਰਾਨੈ ॥
ਛੋਡਿ ਜਾਇ ਤਿਸ ਕਾ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰੈ ॥
ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਤਿਸੁ ਪਰਹਰੈ ॥
ਚੰਦਨ ਲੇਪੁ ਉਤਾਰੈ ਧੋਇ ॥
ਗਰਧਬ ਪ੍ਰੀਤਿ ਭਸਮ ਸੰਗਿ ਹੋਇ ॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਪਤਿਤ ਬਿਕਰਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾਢਿ ਲੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਦਇਆਲ ॥੪॥
रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥
साचु छोडि झूठ संगि मचै ॥
जो छडना सु असथिरु करि मानै ॥
जो होवनु सो दूरि परानै ॥
छोडि जाइ तिस का स्रमु करै ॥
संगि सहाई तिसु परहरै ॥
चंदन लेपु उतारै धोइ ॥
गरधब प्रीति भसम संगि होइ ॥
अंध कूप महि पतित बिकराल ॥
नानक काढि लेहु प्रभ दइआल ॥४॥
साचु छोडि झूठ संगि मचै ॥
जो छडना सु असथिरु करि मानै ॥
जो होवनु सो दूरि परानै ॥
छोडि जाइ तिस का स्रमु करै ॥
संगि सहाई तिसु परहरै ॥
चंदन लेपु उतारै धोइ ॥
गरधब प्रीति भसम संगि होइ ॥
अंध कूप महि पतित बिकराल ॥
नानक काढि लेहु प्रभ दइआल ॥४॥
हिन्दी अर्थ: (माया धारी जीव) (नाम-) रत्न छोड़ के (माया रूपी) कौड़ी से खुश रहता है। सच्चे (प्रभू) को छोड़ के नाशवंत (पदार्थों) के साथ जलता रहता है। जो (माया) छोड़ जानी है। उसे सदा अटल समझता है; जो (मौत) जरूर घटित होनी है। उसे (कहीं) दूर (बैठी) ख्याल करता है। उस (धन पदार्थ) की खातिर (नित्य) मुशक्कत करता (फिरता) है जो (आखिर में) छोड़ जानी है; जो (प्रभू) (इस) के साथ रक्षक है उसे विसार बैठा है। चंदन का लेप धो के उतार देता है। गधे का प्यार (सदा) राख से (ही) होता है। (जीव माया के) अंधेरे भयानक कूएं में गिरे पड़े हैं; हे नानक ! (अरदास कर और कह,) हे दयालु प्रभू ! (इन्हें स्वयं इस कूएं में से) निकाल ले।4।
ਕਰਤੂਤਿ ਪਸੂ ਕੀ ਮਾਨਸ ਜਾਤਿ ॥
ਲੋਕ ਪਚਾਰਾ ਕਰੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਅੰਤਰਿ ਮਲੁ ਮਾਇਆ ॥
ਛਪਸਿ ਨਾਹਿ ਕਛੁ ਕਰੈ ਛਪਾਇਆ ॥
ਬਾਹਰਿ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਇਸਨਾਨ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਆਪੈ ਲੋਭੁ ਸੁਆਨੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਬਾਹਰਿ ਤਨੁ ਸੁਆਹ ॥
ਗਲਿ ਪਾਥਰ ਕੈਸੇ ਤਰੈ ਅਥਾਹ ॥
ਜਾ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਬਸੈ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸਹਜਿ ਸਮਾਤਿ ॥੫॥
ਲੋਕ ਪਚਾਰਾ ਕਰੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਅੰਤਰਿ ਮਲੁ ਮਾਇਆ ॥
ਛਪਸਿ ਨਾਹਿ ਕਛੁ ਕਰੈ ਛਪਾਇਆ ॥
ਬਾਹਰਿ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਇਸਨਾਨ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਆਪੈ ਲੋਭੁ ਸੁਆਨੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਬਾਹਰਿ ਤਨੁ ਸੁਆਹ ॥
ਗਲਿ ਪਾਥਰ ਕੈਸੇ ਤਰੈ ਅਥਾਹ ॥
ਜਾ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਬਸੈ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸਹਜਿ ਸਮਾਤਿ ॥੫॥
करतूति पसू की मानस जाति ॥
लोक पचारा करै दिनु राति ॥
बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ ॥
छपसि नाहि कछु करै छपाइआ ॥
बाहरि गिआन धिआन इसनान ॥
अंतरि बिआपै लोभु सुआनु ॥
अंतरि अगनि बाहरि तनु सुआह ॥
गलि पाथर कैसे तरै अथाह ॥
जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि ॥
नानक ते जन सहजि समाति ॥५॥
लोक पचारा करै दिनु राति ॥
बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ ॥
छपसि नाहि कछु करै छपाइआ ॥
बाहरि गिआन धिआन इसनान ॥
अंतरि बिआपै लोभु सुआनु ॥
अंतरि अगनि बाहरि तनु सुआह ॥
गलि पाथर कैसे तरै अथाह ॥
जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि ॥
नानक ते जन सहजि समाति ॥५॥
हिन्दी अर्थ: जाति मनुष्य की है (भाव। मनुष्य श्रेणी में पैदा हुआ है) पर काम पशुओं वाले हैं। (वैसे) दिन रात लोगों के लिए दिखावा कर रहा है। बाहर (शरीर पर) धार्मिक पोशाक है पर मन में माया की मैल है। (बाहर के भेस से) छुपाने का यनत करने से (मन की मैल) छुपती नहीं। बाहर (दिखावे के लिए) (तीर्थ) स्नान व ज्ञान की बातें करता है। समाधियां भी लगाता है। पर मन में लोभ (रूपी) कुक्ता अपना जोर डाल रहा है। मन में (तृष्णा की) आग है। बाहर शरीर राख (से लिबड़ा हुआ है); (यदि) गले में (विकारों के) पत्थर (हों तो) अथाह (संसार समुंद्र को जीव) कैसे तैरे? जिस जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू आ बसता है। हे नानक ! वही अडोल अवस्था में टिके रहते हैं।5।
ਸੁਨਿ ਅੰਧਾ ਕੈਸੇ ਮਾਰਗੁ ਪਾਵੈ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੇਹੁ ਓੜਿ ਨਿਬਹਾਵੈ ॥
ਕਹਾ ਬੁਝਾਰਤਿ ਬੂਝੈ ਡੋਰਾ ॥
ਨਿਸਿ ਕਹੀਐ ਤਉ ਸਮਝੈ ਭੋਰਾ ॥
ਕਹਾ ਬਿਸਨਪਦ ਗਾਵੈ ਗੁੰਗ ॥
ਜਤਨ ਕਰੈ ਤਉ ਭੀ ਸੁਰ ਭੰਗ ॥
ਕਹ ਪਿੰਗੁਲ ਪਰਬਤ ਪਰ ਭਵਨ ॥
ਨਹੀ ਹੋਤ ਊਹਾ ਉਸੁ ਗਵਨ ॥
ਕਰਤਾਰ ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਦੀਨੁ ਬੇਨਤੀ ਕਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੀ ਕਿਰਪਾ ਤਰੈ ॥੬॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੇਹੁ ਓੜਿ ਨਿਬਹਾਵੈ ॥
ਕਹਾ ਬੁਝਾਰਤਿ ਬੂਝੈ ਡੋਰਾ ॥
ਨਿਸਿ ਕਹੀਐ ਤਉ ਸਮਝੈ ਭੋਰਾ ॥
ਕਹਾ ਬਿਸਨਪਦ ਗਾਵੈ ਗੁੰਗ ॥
ਜਤਨ ਕਰੈ ਤਉ ਭੀ ਸੁਰ ਭੰਗ ॥
ਕਹ ਪਿੰਗੁਲ ਪਰਬਤ ਪਰ ਭਵਨ ॥
ਨਹੀ ਹੋਤ ਊਹਾ ਉਸੁ ਗਵਨ ॥
ਕਰਤਾਰ ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਦੀਨੁ ਬੇਨਤੀ ਕਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਤੁਮਰੀ ਕਿਰਪਾ ਤਰੈ ॥੬॥
सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥
करु गहि लेहु ओड़ि निबहावै ॥
कहा बुझारति बूझै डोरा ॥
निसि कहीऐ तउ समझै भोरा ॥
कहा बिसनपद गावै गुंग ॥
जतन करै तउ भी सुर भंग ॥
कह पिंगुल परबत पर भवन ॥
नही होत ऊहा उसु गवन ॥
करतार करुणा मै दीनु बेनती करै ॥
नानक तुमरी किरपा तरै ॥६॥
करु गहि लेहु ओड़ि निबहावै ॥
कहा बुझारति बूझै डोरा ॥
निसि कहीऐ तउ समझै भोरा ॥
कहा बिसनपद गावै गुंग ॥
जतन करै तउ भी सुर भंग ॥
कह पिंगुल परबत पर भवन ॥
नही होत ऊहा उसु गवन ॥
करतार करुणा मै दीनु बेनती करै ॥
नानक तुमरी किरपा तरै ॥६॥
हिन्दी अर्थ: अंधा मनुष्य (निरा) सुन के कैसे राह ढूँढ ले? (हे प्रभू ! स्वयं इसका) हाथ पकड़ लो (ता कि ये) आखिर तक (प्रीति) निबाह सके। बहरा मनुष्य (निरी) बुझारत को क्या समझे? (बुझारत से) कहें (ये) रात है तो वह समझ लेता है (ये) दिन (है)। गूँगा कैसे विष्णु-पद गा सके? (कई) यतन (भी) करे तो भी उसकी सुर टूटी रहती है। लंगड़ा कैसे पहाड़ों पे चढ़ सकता है? वहां उसकी पहुँच नहीं हो सकती। हे नानक ! (इस हालत में केवल अरदास कर और कह) हे करतार ! हे दया के सागर ! (ये) निमाणा दास विनती करता है। तेरी मेहर से (ही) तैर सकता है।6।
ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਸੁ ਆਵੈ ਨ ਚੀਤਿ ॥
ਜੋ ਬੈਰਾਈ ਤਾ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਬਲੂਆ ਕੇ ਗ੍ਰਿਹ ਭੀਤਰਿ ਬਸੈ ॥
ਅਨਦ ਕੇਲ ਮਾਇਆ ਰੰਗਿ ਰਸੈ ॥
ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਮਾਨੈ ਮਨਹਿ ਪ੍ਰਤੀਤਿ ॥
ਕਾਲੁ ਨ ਆਵੈ ਮੂੜੇ ਚੀਤਿ ॥
ਬੈਰ ਬਿਰੋਧ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮੋਹ ॥
ਝੂਠ ਬਿਕਾਰ ਮਹਾ ਲੋਭ ਧ੍ਰੋਹ ॥
ਜੋ ਬੈਰਾਈ ਤਾ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਬਲੂਆ ਕੇ ਗ੍ਰਿਹ ਭੀਤਰਿ ਬਸੈ ॥
ਅਨਦ ਕੇਲ ਮਾਇਆ ਰੰਗਿ ਰਸੈ ॥
ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਮਾਨੈ ਮਨਹਿ ਪ੍ਰਤੀਤਿ ॥
ਕਾਲੁ ਨ ਆਵੈ ਮੂੜੇ ਚੀਤਿ ॥
ਬੈਰ ਬਿਰੋਧ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮੋਹ ॥
ਝੂਠ ਬਿਕਾਰ ਮਹਾ ਲੋਭ ਧ੍ਰੋਹ ॥
संगि सहाई सु आवै न चीति ॥
जो बैराई ता सिउ प्रीति ॥
बलूआ के ग्रिह भीतरि बसै ॥
अनद केल माइआ रंगि रसै ॥
द्रिड़ु करि मानै मनहि प्रतीति ॥
कालु न आवै मूड़े चीति ॥
बैर बिरोध काम क्रोध मोह ॥
झूठ बिकार महा लोभ ध्रोह ॥
जो बैराई ता सिउ प्रीति ॥
बलूआ के ग्रिह भीतरि बसै ॥
अनद केल माइआ रंगि रसै ॥
द्रिड़ु करि मानै मनहि प्रतीति ॥
कालु न आवै मूड़े चीति ॥
बैर बिरोध काम क्रोध मोह ॥
झूठ बिकार महा लोभ ध्रोह ॥
हिन्दी अर्थ: जो प्रभू (इस मूर्ख का) संगी-साथी है। उस को (ये) याद नहीं करता। (पर) जो वैरी है उससे प्यार कर रहा है। रेत के घर में बसता है (भाव। रेत के कणों की भांति उम्र छिन छिन कर के किर रही है)। (फिर भी) माया की मस्ती में आनंद मौजें मना रहा है। (अपने आप को) अमर समझे बैठा है। मन में (यही) यकीन बना हुआ है; पर मूर्ख के चिक्त में (कभी) मौत (का ख्याल भी) नहीं आता। वैर विरोध, काम, गुस्सा, मोह, झूठ, बुरे कर्म, खूब लालच और दगा-
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 267 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 267” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 268 →, पीछे का: ← अंग 266।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।