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क्रोध और शांति

क्रोध एक आग है, और हर आग की तरह वह जलाती भी है और राह भी दिखा सकती है। सवाल यह नहीं कि क्रोध आए या न आए, सवाल यह है कि उसके साथ हम क्या करें। यह रास्ता उसी अग्नि को देखने और फिर उसे शान्ति में ढालने के लिए है, बिना उसे दबाए और बिना उसमें जले।

यहाँ हम देवी की भ्रकुटि से जन्मी काली को देखेंगे, शिव की क्रोधाग्नि में जलते कामदेव को, और अश्वत्थामा के उस रात्रि-संहार को जहाँ बेक़ाबू क्रोध सब कुछ राख कर देता है। हर कथा हमें दिखाती है कि क्रोध की एक क़ीमत होती है, और वह क़ीमत अक्सर क्रोधी को ही चुकानी पड़ती है, किसी और को नहीं।

अन्त में हम शान्ति की ओर मुड़ते हैं, अम्बरीष के धैर्य में, जनक के जागरण में, और अष्टावक्र के उस प्रकरण में जो सीधे शान्ति को ही अपना विषय बनाता है। क्रम आग से जल की ओर बहता है, ताकि तपन के बाद ठंडक भी मिले।

  1. भगवद्गीता · अध्याय 2: सांख्य योग
    इसी अध्याय के अन्त में वह श्रृंखला है कि क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का नाश, और अन्त में पूरा पतन, और यही क्रोध का सबसे सटीक नक़्शा है, जो हर बार सच निकलता है।
  2. देवी माहात्म्य · चामुण्डा जन्म
    देवी की तनी हुई भ्रकुटि से काली प्रकट होती हैं, और यह कथा दिखाती है कि क्रोध भी जब धर्म की सेवा में हो तो वह विनाश नहीं, रक्षा बन जाता है, अगर उस पर होश का हाथ हो।
  3. शिवपुराण · कामदेव का दहन
    शिव के तीसरे नेत्र की आग में कामदेव भस्म हो जाते हैं, और यह क्षण हमें क्रोध की उस चरम शक्ति से मिलाता है जिसे केवल गहरी तपस्या ही थाम सकती है, और बाद में करुणा में बदल देती है।
  4. महाभारत · अश्वत्थामा का रात्रि-संहार
    बदले की आग में अश्वत्थामा वह कर बैठते हैं जो कोई धर्मयोद्धा नहीं करता, और यह पन्ना बेक़ाबू क्रोध का सबसे भयावह परिणाम हमारे सामने रख देता है, एक चेतावनी की तरह।
  5. अम्बरीष और दुर्वासा
    दुर्वासा का प्रचंड क्रोध अम्बरीष के शान्त धैर्य से टकराता है, और अन्त में हारता वही है जो क्रोध से भरा था, न कि वह जो ठहरा रहा, यही धैर्य की चुपचाप जीत है।
  6. राजा जनक का जागरण
    राजा जनक बीच राजकाज में एक भीतरी जागरण से गुज़रते हैं, और उनकी वह समता हमें दिखाती है कि शान्ति संसार छोड़ने में नहीं, भीतर ठहर जाने में है, काम करते हुए भी।
  7. अष्टावक्र गीता · प्रकरण 7: शान्ति
    अन्त में अष्टावक्र सीधे उस शान्ति की बात करते हैं जो किसी घटना पर नहीं टिकती, और यही वह ठंडा जल है जिसकी ओर यह पूरा रास्ता बहता रहा, जहाँ आकर आग अपने आप बुझ जाती है।

अगली बार जब भीतर आग उठे, इनमें से किसी एक पन्ने पर लौट आइए। क्रोध को दबाना नहीं है, उसे समझकर धीरे से शान्ति में बदलना है, और यह अभ्यास एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे सधता है।