अंग 286

अंग
286
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਤਾ ਕਉ ਰਾਖਤ ਦੇ ਕਰਿ ਹਾਥ ॥
ਮਾਨਸ ਜਤਨ ਕਰਤ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥
ਤਿਸ ਕੇ ਕਰਤਬ ਬਿਰਥੇ ਜਾਤਿ ॥
ਮਾਰੈ ਨ ਰਾਖੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸਰਬ ਜੀਆ ਕਾ ਰਾਖਾ ਸੋਇ ॥
ਕਾਹੇ ਸੋਚ ਕਰਹਿ ਰੇ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਅਲਖ ਵਿਡਾਣੀ ॥੫॥
ता कउ राखत दे करि हाथ ॥
मानस जतन करत बहु भाति ॥
तिस के करतब बिरथे जाति ॥
मारै न राखै अवरु न कोइ ॥
सरब जीआ का राखा सोइ ॥
काहे सोच करहि रे प्राणी ॥
जपि नानक प्रभ अलख विडाणी ॥५॥

हिन्दी अर्थ: उसको हाथ दे कर रखता है। मनुष्य कई किस्मों के यतन करता है (पर अगर प्रभू सहायता ना करे तो) उसके काम व्यर्थ जाते हैं। (प्रभू के बिना जीवों को) ना कोई मार सकता है, ना रख सकता है। (प्रभू जितना) और कोई नहीं। सारे जीवों का रक्षक प्रभू खुद है। हे प्राणी ! तू क्यूँ फिक्र करता है? हे नानक ! अलॅख व आश्चर्यजनक प्रभू को सिमर। 5।
ਬਾਰੰ ਬਾਰ ਬਾਰ ਪ੍ਰਭੁ ਜਪੀਐ ॥
ਪੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤਨੁ ਧ੍ਰਪੀਐ ॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਿਸੁ ਕਿਛੁ ਅਵਰੁ ਨਾਹੀ ਦ੍ਰਿਸਟਾਇਆ ॥
ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਨਾਮੋ ਰੂਪੁ ਰੰਗੁ ॥
ਨਾਮੋ ਸੁਖੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਾ ਸੰਗੁ ॥
ਨਾਮ ਰਸਿ ਜੋ ਜਨ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੇ ॥
ਮਨ ਤਨ ਨਾਮਹਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਨੇ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਨਾਮ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਨ ਕੈ ਸਦ ਕਾਮ ॥੬॥
बारं बार बार प्रभु जपीऐ ॥
पी अंम्रितु इहु मनु तनु ध्रपीऐ ॥
नाम रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ॥
तिसु किछु अवरु नाही द्रिसटाइआ ॥
नामु धनु नामो रूपु रंगु ॥
नामो सुखु हरि नाम का संगु ॥
नाम रसि जो जन त्रिपताने ॥
मन तन नामहि नामि समाने ॥
ऊठत बैठत सोवत नाम ॥
कहु नानक जन कै सद काम ॥६॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) घड़ी-मुड़ी प्रभू को सिमरें। और (नाम-) अमृत पी कर इस मन को और शरीरिक इंद्रियों को तृप्त कर लें। जिस गुरमुख ने नाम रूपी रतन पा लिया है। उसे प्रभू के बिना और कहीं कुछ नहीं दिखता। नाम (उस गुरमुख का) धन है। और प्रभू के नाम का वह सदा संग करता है। जो मनुष्य नाम के स्वाद में तृप्त हो गए हैं। उनके मन तन केवल प्रभू नाम में जुड़े रहते हैं। उठते-बैठते सोते-जागते (हर समय) प्रभू का नाम सिमरना ही हे नानक ! कह- सेवकों का सदा आहर होता है। 6।
ਬੋਲਹੁ ਜਸੁ ਜਿਹਬਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਜਨ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥
ਕਰਹਿ ਭਗਤਿ ਆਤਮ ਕੈ ਚਾਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੇ ਸਿਉ ਰਹਹਿ ਸਮਾਇ ॥
ਜੋ ਹੋਆ ਹੋਵਤ ਸੋ ਜਾਨੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੇ ਕਾ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਨੈ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਉਨ ਬਖਾਨਉ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਗੁਨੁ ਕਹਿ ਏਕ ਨ ਜਾਨਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭ ਬਸਹਿ ਹਜੂਰੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੇਈ ਜਨ ਪੂਰੇ ॥੭॥
बोलहु जसु जिहबा दिनु राति ॥
प्रभि अपनै जन कीनी दाति ॥
करहि भगति आतम कै चाइ ॥
प्रभ अपने सिउ रहहि समाइ ॥
जो होआ होवत सो जानै ॥
प्रभ अपने का हुकमु पछानै ॥
तिस की महिमा कउन बखानउ ॥
तिस का गुनु कहि एक न जानउ ॥
आठ पहर प्रभ बसहि हजूरे ॥
कहु नानक सेई जन पूरे ॥७॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) दिन रात अपनी जीभ से प्रभू के गुण गाओ। सिफत सालाह की ये बख्शिश प्रभू ने अपने सेवकों पर (ही) की है। (सेवक) अंदरूनी उत्साह से भक्ति करते हैं और अपने प्रभू के साथ जुड़े रहते हैं। जो कुछ हो रहा है उसको (रजा में) जानता है और (सेवक) अपने प्रभू का हुकम पहिचान लेता है। ऐसे सेवक की कौन सी महिमा मैं बताऊँ? मैं उस सेवक का एक गुण भी बयान करना नहीं जानता। जो आठों पहर प्रभू की हजूरी में बसते हैं। हे नानक ! कह,वह मनुष्य संपूर्ण पात्र हैं 7।
ਮਨ ਮੇਰੇ ਤਿਨ ਕੀ ਓਟ ਲੇਹਿ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਪਨਾ ਤਿਨ ਜਨ ਦੇਹਿ ॥
ਜਿਨਿ ਜਨਿ ਅਪਨਾ ਪ੍ਰਭੂ ਪਛਾਤਾ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਸਰਬ ਥੋਕ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਸਰਨਿ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਦਰਸਿ ਸਭ ਪਾਪ ਮਿਟਾਵਹਿ ॥
ਅਵਰ ਸਿਆਨਪ ਸਗਲੀ ਛਾਡੁ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਤੂ ਸੇਵਾ ਲਾਗੁ ॥
ਆਵਨੁ ਜਾਨੁ ਨ ਹੋਵੀ ਤੇਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੇ ਪੂਜਹੁ ਸਦ ਪੈਰਾ ॥੮॥੧੭॥
मन मेरे तिन की ओट लेहि ॥
मनु तनु अपना तिन जन देहि ॥
जिनि जनि अपना प्रभू पछाता ॥
सो जनु सरब थोक का दाता ॥
तिस की सरनि सरब सुख पावहि ॥
तिस कै दरसि सभ पाप मिटावहि ॥
अवर सिआनप सगली छाडु ॥
तिसु जन की तू सेवा लागु ॥
आवनु जानु न होवी तेरा ॥
नानक तिसु जन के पूजहु सद पैरा ॥८॥१७॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! (जो मनुष्य सदा प्रभू की हजूरी में बसते हैं) उनकी शरण पड़ और अपना तन मन उनके सदके कर दे। जिस मनुष्य ने अपने प्रभू को पहचान लिया है। वह मनुष्य सारे पदार्थ देने के स्मर्थ हो जाता है। (हे मन !) उसकी शरण पड़ने से तू सारे सुख पाएगा। उसके दीदार से तू सारे पाप दूर कर लेगा। और चतुराई त्याग दे। और उस सेवक की सेवा में जुट जा। (इस तरह बार बार जगत में) तेरा आना-जाना नहीं होगा। हे नानक ! उस संत जन के सदा पैर पूज। 8। 17।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸਤਿ ਪੁਰਖੁ ਜਿਨਿ ਜਾਨਿਆ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤਿਸ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਿਖੁ ਉਧਰੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥੧॥
सलोकु ॥
सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥
तिस कै संगि सिखु उधरै नानक हरि गुन गाउ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जिस ने सदा स्थिर और व्यापक प्रभू को पहिचान लिया है। उस का नाम सतिगुरू है। उसकी संगति में (रह के) सिख (विकारों से) बच जाता है। (इसलिए) हे नानक ! (तू भी गुरू की संगति में रह कर) अकाल पुरख के गुण गा। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਖ ਕੀ ਕਰੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਸੇਵਕ ਕਉ ਗੁਰੁ ਸਦਾ ਦਇਆਲ ॥
ਸਿਖ ਕੀ ਗੁਰੁ ਦੁਰਮਤਿ ਮਲੁ ਹਿਰੈ ॥
ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਚਰੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਖ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਾਟੈ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਿਖੁ ਬਿਕਾਰ ਤੇ ਹਾਟੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਖ ਕਉ ਨਾਮ ਧਨੁ ਦੇਇ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਿਖੁ ਵਡਭਾਗੀ ਹੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਖ ਕਾ ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਸਵਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਖ ਕਉ ਜੀਅ ਨਾਲਿ ਸਮਾਰੈ ॥੧॥
असटपदी ॥
सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥
सेवक कउ गुरु सदा दइआल ॥
सिख की गुरु दुरमति मलु हिरै ॥
गुर बचनी हरि नामु उचरै ॥
सतिगुरु सिख के बंधन काटै ॥
गुर का सिखु बिकार ते हाटै ॥
सतिगुरु सिख कउ नाम धनु देइ ॥
गुर का सिखु वडभागी हे ॥
सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै ॥
नानक सतिगुरु सिख कउ जीअ नालि समारै ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। सतिगुरू सिख की रक्षा करता है। सतिगुरू अपने सेवक पर सदा मेहर करता है। सतिगुरू अपने सिख की बुरी मति रूपी मैल दूर कर देता है। क्योंकि सिख अपने सतिगुरू के उपदेश के द्वारा प्रभू का नाम सिमरता है। सतिगुरू अपने सिख के (माया के) बंधन काट देता है (और) गुरू का सिख विकारों से हट जाता है। (क्योंकि) सतिगुरू अपने सिख को प्रभू का नाम रूपी धन देता है (और इस तरह) सतिगुरू का सिख बहुत भाग्यशाली बन जाता है। सतिगुरू अपने सिख के लोक परलोक सवार देता है। हे नानक ! सतिगुरू अपने सिख को अपनी जिंद के साथ याद रखता है। 1।
ਗੁਰ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਸੇਵਕੁ ਜੋ ਰਹੈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਆਗਿਆ ਮਨ ਮਹਿ ਸਹੈ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਕਰਿ ਕਛੁ ਨ ਜਨਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਸਦ ਧਿਆਵੈ ॥
ਮਨੁ ਬੇਚੈ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥
ਤਿਸੁ ਸੇਵਕ ਕੇ ਕਾਰਜ ਰਾਸਿ ॥
ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै ॥
गुर की आगिआ मन महि सहै ॥
आपस कउ करि कछु न जनावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
मनु बेचै सतिगुर कै पासि ॥
तिसु सेवक के कारज रासि ॥
सेवा करत होइ निहकामी ॥
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥

हिन्दी अर्थ: जो सेवक (शिक्षा की खातिर) गुरू के घर में (भाव गुरू के दर पर) रहता है। और गुरू का हुकम मन में मानता है। जो अपने आप को बड़ा नहीं जताता। प्रभू का नाम सदा हृदय में ध्याता है। जो अपना मन सतिगुरू के आगे बेच देता है (भाव-गुरू के हवाले कर देता है) उस सेवक के सारे काम सिरे चढ़ जाते हैं। जो सेवक (गुरू की) सेवा करता हुआ किसी फल की इच्छा नहीं रखता। उसे मालिक प्रभू मिल जाता है।

संदर्भ: यह अंग 286 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 286” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 287 →, पीछे का: ← अंग 285

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।