हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥
जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥8॥1॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥1॥
मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥2॥
मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥
परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥3॥
मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥
उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥4॥
मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥
घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥5॥
मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥
पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥6॥
मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥
हरि अंम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥7॥
मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥
इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥8॥
मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥9॥
मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥
गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥10॥1॥
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
बन फिरि थके बन वासीआ पिरु गुरमति रिदै निहालि ॥1॥
मन करहला गुर गोविंदु समालि ॥1॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ मनमुख फाथिआ महा जालि ॥
गुरमुखि प्राणी मुकतु है हरि हरि नामु समालि ॥2॥
मन करहला मेरे पिआरिआ सतसंगति सतिगुरु भालि ॥
सतसंगति लगि हरि धिआईऐ हरि हरि चलै तेरै नालि ॥3॥
मन करहला वडभागीआ हरि एक नदरि निहालि ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य गुरू के शबद (के रंग) में रंगे जाते हैं, वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं, वे गुरू के बताए हुकम के अनुसार चलते हैं, (जीवन बिताते हैं)।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।