अंग
234
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਚਲਹਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥੭॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਤੂੰ ਤੂੰ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਸਰਣਾਗਤੀ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਛਡਾਇ ॥੮॥੧॥੯॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਤੂੰ ਤੂੰ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਸਰਣਾਗਤੀ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਛਡਾਇ ॥੮॥੧॥੯॥
सबदि रते से निरमले चलहि सतिगुर भाइ ॥७॥
हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥
जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥८॥१॥९॥
हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥
जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥८॥१॥९॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के शबद (के रंग) में रंगे जाते हैं~ वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं~ वे गुरू के बताए हुकम के अनुसार चलते हैं~ (जीवन बिताते हैं)। 7। हे हरी ! हे प्रभू ! सिर्फ तू ही है जो (गुरू के द्वारा अपने नाम की) दात देने वाला है~ तू स्वयं ही मेहर करके मुझे अपने चरणों में जोड़। (मैं तेरा) दास नानक तेरी शरण आया हूँ~ जैसे तुझे ठीक लगे~ मुझे उसी तरह (इस माया के मोह के पँजे से) बचा ले। 8। 1। 9।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਮਹਲਾ ੪ ਕਰਹਲੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਕਰਹਲੇ ਮਨ ਪਰਦੇਸੀਆ ਕਿਉ ਮਿਲੀਐ ਹਰਿ ਮਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਭਾਗਿ ਪੂਰੈ ਪਾਇਆ ਗਲਿ ਮਿਲਿਆ ਪਿਆਰਾ ਆਇ ॥੧॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ਹਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਿਆਇ ॥
ਜਿਥੈ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਹਰਿ ਆਪੇ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੨॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲਾ ਮਲੁ ਲਾਗੀ ਹਉਮੈ ਆਇ ॥
ਪਰਤਖਿ ਪਿਰੁ ਘਰਿ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰਾ ਵਿਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥੩॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਹਰਿ ਰਿਦੈ ਭਾਲਿ ਭਾਲਾਇ ॥
ਉਪਾਇ ਕਿਤੈ ਨ ਲਭਈ ਗੁਰੁ ਹਿਰਦੈ ਹਰਿ ਦੇਖਾਇ ॥੪॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਘਰੁ ਜਾਇ ਪਾਵਹਿ ਰੰਗ ਮਹਲੀ ਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਮੇਲਾਇ ॥੫॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਤੂੰ ਮੀਤੁ ਮੇਰਾ ਪਾਖੰਡੁ ਲੋਭੁ ਤਜਾਇ ॥
ਪਾਖੰਡਿ ਲੋਭੀ ਮਾਰੀਐ ਜਮ ਡੰਡੁ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥੬॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ਤੂੰ ਮੈਲੁ ਪਾਖੰਡੁ ਭਰਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਗੁਰਿ ਪੂਰਿਆ ਮਿਲਿ ਸੰਗਤੀ ਮਲੁ ਲਹਿ ਜਾਇ ॥੭॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਇਕ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣਾਇ ॥
ਇਹੁ ਮੋਹੁ ਮਾਇਆ ਪਸਰਿਆ ਅੰਤਿ ਸਾਥਿ ਨ ਕੋਈ ਜਾਇ ॥੮॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਸਾਜਨਾ ਹਰਿ ਖਰਚੁ ਲੀਆ ਪਤਿ ਪਾਇ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪੈਨਾਇਆ ਹਰਿ ਆਪਿ ਲਇਆ ਗਲਿ ਲਾਇ ॥੯॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਗੁਰਿ ਮੰਨਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਆਗੈ ਕਰਿ ਜੋਦੜੀ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਮੇਲਾਇ ॥੧੦॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਕਰਹਲੇ ਮਨ ਪਰਦੇਸੀਆ ਕਿਉ ਮਿਲੀਐ ਹਰਿ ਮਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਭਾਗਿ ਪੂਰੈ ਪਾਇਆ ਗਲਿ ਮਿਲਿਆ ਪਿਆਰਾ ਆਇ ॥੧॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ਹਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਿਆਇ ॥
ਜਿਥੈ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਹਰਿ ਆਪੇ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੨॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲਾ ਮਲੁ ਲਾਗੀ ਹਉਮੈ ਆਇ ॥
ਪਰਤਖਿ ਪਿਰੁ ਘਰਿ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰਾ ਵਿਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥੩॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਹਰਿ ਰਿਦੈ ਭਾਲਿ ਭਾਲਾਇ ॥
ਉਪਾਇ ਕਿਤੈ ਨ ਲਭਈ ਗੁਰੁ ਹਿਰਦੈ ਹਰਿ ਦੇਖਾਇ ॥੪॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਾ ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਘਰੁ ਜਾਇ ਪਾਵਹਿ ਰੰਗ ਮਹਲੀ ਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਹਰਿ ਮੇਲਾਇ ॥੫॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਤੂੰ ਮੀਤੁ ਮੇਰਾ ਪਾਖੰਡੁ ਲੋਭੁ ਤਜਾਇ ॥
ਪਾਖੰਡਿ ਲੋਭੀ ਮਾਰੀਐ ਜਮ ਡੰਡੁ ਦੇਇ ਸਜਾਇ ॥੬॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ਤੂੰ ਮੈਲੁ ਪਾਖੰਡੁ ਭਰਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਗੁਰਿ ਪੂਰਿਆ ਮਿਲਿ ਸੰਗਤੀ ਮਲੁ ਲਹਿ ਜਾਇ ॥੭॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਇਕ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣਾਇ ॥
ਇਹੁ ਮੋਹੁ ਮਾਇਆ ਪਸਰਿਆ ਅੰਤਿ ਸਾਥਿ ਨ ਕੋਈ ਜਾਇ ॥੮॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਸਾਜਨਾ ਹਰਿ ਖਰਚੁ ਲੀਆ ਪਤਿ ਪਾਇ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪੈਨਾਇਆ ਹਰਿ ਆਪਿ ਲਇਆ ਗਲਿ ਲਾਇ ॥੯॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਗੁਰਿ ਮੰਨਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰ ਆਗੈ ਕਰਿ ਜੋਦੜੀ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਮੇਲਾਇ ॥੧੦॥੧॥
रागु गउड़ी पूरबी महला ४ करहले
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥१॥
मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥२॥
मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥
परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥३॥
मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥
उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥४॥
मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥
घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥५॥
मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥
पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥६॥
मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥
हरि अंम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥७॥
मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥
इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥८॥
मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥९॥
मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥
गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥१०॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥
गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥१॥
मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥
जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥२॥
मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥
परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥३॥
मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥
उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥४॥
मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥
घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥५॥
मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥
पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥६॥
मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥
हरि अंम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥७॥
मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥
इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥८॥
मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥९॥
मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥
गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥१०॥१॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला ४ करहले ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे बे-मुहारे मन ! हे (यहाँ) परदेस में रहने वाले मन ! (तूने सदा इस वतन में ही नहीं टिके रहना। कभी सोच कि उस) परमात्मा को कैसे मिला जाए (जो) माँ (की तरह हमें पालता है)। (हे बे-मुहारे मन ! जिस मनुष्य को) पूरी किस्मत से गुरू मिल जाता है~ प्यारा परमात्मा उसके गले से आ लगता है। 1। हे ऊँठ के बच्चे की तरह बे-मुहारे (मेरे) मन ! परमात्मा के रूप गुरू को याद रख। 1। रहाउ। हे बे-मुहार मन ! विचारवान बन~ और~ परमात्मा का नाम सिमरता रह~ (अगर सिमरता रहेगा तो) परमात्मा खुद ही (वहाँ) सुर्खरू करवा लेगा जहाँ (किए कर्मों का) हिसाब मांगा जाता है। 2। हे बे’मुहार मन ! तू (अस्लियत में) बहुत पवित्र था~ पर तुझे अहंकार की मैल चिपकी हुई है। (क्या अजीब दुर्भाग्य है कि) पति-प्रभू प्रत्यक्ष तौर पर हृदय में बस रहा है~ (जिंद के) साथ बस रहा है~ (पर जिंद माया के मोह के कारण उससे) विछड़ के दुखी हो रही है। 3। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! अपने हृदय में परमात्मा की खोज कर~ तलाश कर। वह परमात्मा किसी और तरीके से नहीं मिलता। गुरू (ही) हृदय में (बसता) दिखा देता है। 4। हे बे-मुहार मन ! हे मेरे प्यारे मन ! दिन रात परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़। (इस तरह उस) आनंदी के महल में जा के ठिकाना ढूँढ लेगा। पर गुरू ही परमात्मा से मिला सकता है। 5। हे मेरे बे-मुहार मन !तू मेरा मित्र है (मैं तुझे समझाता हूँ) माया का लालच छोड़ के पाखण्ड छोड़ दे। पाखण्डी और लालची का आत्मिक जीवन खत्म हो जाता है। आत्मिक मौत का सहम सदा उसके सिर पर रहता है, परमात्मा उसे ये सजा देता है। 6। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! तू (अपने अंदर से विकारों की) मैल दूर कर~ पाखण्ड छोड़ दे और (माया के पीछे) भटकना त्याग दे। (देख ! साध-संगति में) पूरे गुरू ने हरी नाम अमृत का सरोवर लबा लब भरा हुआ है~ साध-संगति में मिल के (उस सरोवर में स्नान कर~ तेरी विकारों की) मैल उतर जाएगी। 7। हे बे-मुहार मन ! हे मेरे मन ! गुरू की ये शिक्षा (ध्यान से) सुन (ये सारे साक-संबंधी और धन-पदार्थ-) ये सारा माया का मोह (-जाल) बिखरा हुआ है~ और अंत के समय (इनमें से) कोई भी (तेरे) साथ नहीं जाएगा। 8। हे मेरे सज्जन मन ! हे मेरे बे-मुहार मन ! जिस मनुष्य ने (इस जीवन यात्रा में) परमात्मा (का नाम धन-) खर्च पल्ले बाँधा है~ वह (लोक परलोक में) इज्जत कमाता है~ परमात्मा की दरगाह में उसे आदर-सम्मान मिलता है~ परमात्मा स्वयं उसे अपने गले से लगा लेता है। 9। हे मेरे बे-मुहार मन ! गुरू में श्रद्धा धारण कर के गुरू की बताई हुई कार कर। हे दास नानक ! (कह, हे बे-मुहार मन !) गुरू के आगे अरजोई कर (हे गुरू मेहर कर~ मुझे) परमात्मा (के चरणों) में जोड़े रख। 10। 1।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ਵੀਚਾਰਿ ਦੇਖੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਬਨ ਫਿਰਿ ਥਕੇ ਬਨ ਵਾਸੀਆ ਪਿਰੁ ਗੁਰਮਤਿ ਰਿਦੈ ਨਿਹਾਲਿ ॥੧॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਗੁਰ ਗੋਵਿੰਦੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ਮਨਮੁਖ ਫਾਥਿਆ ਮਹਾ ਜਾਲਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਮੁਕਤੁ ਹੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੨॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭਾਲਿ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਲਗਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਹਰਿ ਹਰਿ ਚਲੈ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ॥੩॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵਡਭਾਗੀਆ ਹਰਿ ਏਕ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ਵੀਚਾਰਿ ਦੇਖੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਬਨ ਫਿਰਿ ਥਕੇ ਬਨ ਵਾਸੀਆ ਪਿਰੁ ਗੁਰਮਤਿ ਰਿਦੈ ਨਿਹਾਲਿ ॥੧॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਗੁਰ ਗੋਵਿੰਦੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ਮਨਮੁਖ ਫਾਥਿਆ ਮਹਾ ਜਾਲਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਮੁਕਤੁ ਹੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੨॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭਾਲਿ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਲਗਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਹਰਿ ਹਰਿ ਚਲੈ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ॥੩॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵਡਭਾਗੀਆ ਹਰਿ ਏਕ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
गउड़ी महला ४ ॥
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
बन फिरि थके बन वासीआ पिरु गुरमति रिदै निहालि ॥१॥
मन करहला गुर गोविंदु समालि ॥१॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ मनमुख फाथिआ महा जालि ॥
गुरमुखि प्राणी मुकतु है हरि हरि नामु समालि ॥२॥
मन करहला मेरे पिआरिआ सतसंगति सतिगुरु भालि ॥
सतसंगति लगि हरि धिआईऐ हरि हरि चलै तेरै नालि ॥३॥
मन करहला वडभागीआ हरि एक नदरि निहालि ॥
मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥
बन फिरि थके बन वासीआ पिरु गुरमति रिदै निहालि ॥१॥
मन करहला गुर गोविंदु समालि ॥१॥ रहाउ ॥
मन करहला वीचारीआ मनमुख फाथिआ महा जालि ॥
गुरमुखि प्राणी मुकतु है हरि हरि नामु समालि ॥२॥
मन करहला मेरे पिआरिआ सतसंगति सतिगुरु भालि ॥
सतसंगति लगि हरि धिआईऐ हरि हरि चलै तेरै नालि ॥३॥
मन करहला वडभागीआ हरि एक नदरि निहालि ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ४ ॥ हे मेरे बे-मुहार मन ! तू विचारवान बन~ तू विचार के देख~ तू होश करके देख। जंगलों में भटक-भटक के जंगलवासी (मन) ! (तेरा) मालिक प्रभू (तेरे) हृदय में (बस रहा है~ उसे) गुरू की मति ले कर (अपने अंदर) देख। 1। ऊँठ के बच्चे की तरह हे (मेरे) बे-मुहार मन ! तू परमात्मा (की याद) को (अपने अंदर) संभाल के रख। 1। रहाउ। हे बे-मुहार मन ! तू विचारवान बन। (देख) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (माया के मोह के) बड़े जाल में फंसे हुए हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ वह परमात्मा का नाम (हृदय में) संभाल के (इस जाल से) बच जाता है। 2। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! साध-संगति में जा~ (वहां) गुरू को तलाश। साध-संगति का आसरा लेकर परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए~ ये हरी नाम ही तेरे (सदा) साथ रहेगा। 3। हे बे-मुहार मन ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली बन जाता है जिस पर परमात्मा मिहर की निगाह करता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 234 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 234” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 235 →, पीछे का: ← अंग 233।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।