हिन्दू धर्म क्या है
पहले यह कि यह है क्या, फिर साफ़ मन से इसके कठिन हिस्से, दोनों अलग-अलग रख कर
हिन्दू धर्म एक बड़ी नदी है, जिसके किनारे अनगिनत घाट हैं और हर घाट का अपना ढंग। पहले हम यह देखेंगे कि यह नदी है क्या, और फिर उन जगहों पर भी रुकेंगे जहाँ पानी मैला हुआ। दोनों बातें एक ही साँस में, पर अलग-अलग।
भाग एक · यह क्या है
हिन्दू धर्म को एक परिभाषा में बाँधना बहुत कठिन है। यहाँ कोई एक संस्थापक नहीं, कोई एक जन्म-तिथि नहीं, कोई एक केंद्रीय संस्था नहीं, कोई एक पंथ नहीं, और कोई एक किताब नहीं। फिर भी यह सदियों से एक जीवित परंपरा है, और इसका कोई न कोई सूत्र है जो इसे जोड़े रखता है।
नाम कहाँ से आया
शुरू में हिन्दू एक भूगोल का शब्द था, सिन्धु के पार रहने वालों के लिए। उपनिवेश के दौर में यही शब्द एक धर्म का नाम बन कर ठहरा, और जनगणना ने बिखरी हुई स्थानीय परंपराओं को इसी एक नाम के नीचे गिन लिया; ब्रायन पेनिंगटन ने 2005 में छपी अपनी किताब वॉज़ हिन्दूइज़्म इन्वेंटेड? में इसी ठहराव की कहानी खोली है। रोमिला थापर का पद सिंडिकेटेड हिन्दूइज़म इसके बाद की एक चीज़ का नाम है। इसी नाम के अपने निबंध में, जो 1989 में हिन्दूइज़्म रीकंसिडर्ड में छपा और जिसकी पहली रूपरेखा 1985 में सेमिनार पत्रिका में आई थी, वे एक आधुनिक, संगठित और एकरूप हिन्दू धर्म की बात करती हैं, जो सामी धर्मों के ढाँचे पर गढ़ा गया और जिसे आधुनिक राजनीति और उभरते मध्यवर्ग ने आगे बढ़ाया।
जो जोड़ता है
जो सूत्र इसे क़रीब-क़रीब जोड़ता है, ब्रायन के. स्मिथ के अनुसार, वह है वेद को नाम-भर के लिए मान लेना, उसे प्रमाण मानना। साझा शब्दावली है धर्म, कर्म, संसार और मोक्ष। साझा अभ्यास है पूजा, सुनी हुई (श्रुति) और याद रखी हुई (स्मृति) वाणी का आदर, और परम तक अनेक रूपों और नामों से पहुँचना। यही पतला-सा धागा इतनी विविधता को एक नाम देता है।
भीतर की विविधता
भीतर का फैलाव बड़ा है। जूलियस लिपनर इसके लिए बरगद का चित्र देते हैं, एक ही पेड़, पर अनेक तने, ज़मीन में उतरती जड़ों से उठते हुए। प्रमुख परंपराएँ हैं वैष्णव, शैव और शाक्त, जिनके केंद्र में विष्णु, शिव और देवी हैं, और स्मार्त, जो वैदिक आचार की मर्यादा पर चलती है और पाँच देवताओं की एक साथ उपासना करती है। दर्शन के छह शास्त्रीय स्कूल हैं, सांख्य के द्वैतवाद से ले कर शंकर से जुड़े अद्वैत वेदांत तक। और अभ्यास संन्यासी के त्याग से ले कर उत्सव की रौनक तक फैला है।
भाग दो · कठिन हिस्से
अब उन हिस्सों पर, जिन्हें अदब से, पर बिना आँख चुराए कहना ज़रूरी है। इनमें से हर एक दर्ज की हुई बात है, तारीख़ और स्रोत के साथ, और हर एक के साथ वह भीतरी सुधार भी खड़ा है जो परंपरा के भीतर से ही इनके विरुद्ध उठा।
जाति और छुआछूत
वर्ण की योजना पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10.90) में दिखती है, और धर्मशास्त्र में, ख़ास कर मनुस्मृति में, कठोर होती जाती है। इसके भीतर से जो तीखी आलोचना उठी, वह बी. आर. आम्बेडकर की है, एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936)। छुआछूत अब भारत के संविधान में अवैध है, और सामाजिक व्यवहार में अब भी बची हुई है। विद्वानों में इस पर बहस है कि जाति कितनी ख़ास हिन्दू सिद्धांत है और कितनी एक चौड़ी दक्षिण एशियाई सामाजिक बनावट; सूज़न बेली ने 1999 में छपी अपनी किताब कास्ट, सोसाइटी ऐंड पॉलिटिक्स इन इंडिया में इस सवाल को तौला है।
स्त्रियों के साथ बरताव
सती, यानी विधवा का चिता पर जल जाना, एक सच्चाई रही, विवादित और कभी-कभी बलपूर्वक कराई गई (लता मनी, कन्टेन्शस ट्रेडिशन्स)। देवदासी प्रथा अपने गिरे हुए रूपों में। बाल-विवाह, और विधवाओं पर कठोर बंदिशें। इन्हीं के विरुद्ध भीतर से सुधारक उठे, राममोहन राय, और ब्रह्म समाज तथा आर्य समाज, जिन्होंने हिन्दू स्रोतों को ही हिन्दू रिवाज के सामने रख दिया।
सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा
हिन्दुत्व की विचारधारा, जिसे वी. डी. सावरकर ने 1920 के दशक में रखा, धर्म के रूप में हिन्दू धर्म से अलग है और उससे सामग्री लेती है। दर्ज की हुई घटनाओं में 1992 में बाबरी मस्जिद का गिराया जाना और 2002 की गुजरात हिंसा शामिल हैं (क्रिस्तोफ़ ज़ाफ़्रलो)। ये घटनाएँ और यह विद्वत्ता दर्ज की हुई बातें हैं; इन पर चलती बड़ी राजनीतिक बहस अब भी खुली है।
गुरुओं के बार-बार आते क़िस्से
जीवित गुरु को मिली गहरी सत्ता का दुरुपयोग भी बार-बार सामने आया है। आसाराम बापू, 2018 में बलात्कार के दोषी। गुरमीत राम रहीम सिंह, डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख (यह कई धर्मों से रस लेने वाला एक समन्वयवादी डेरा है), 2017 में बलात्कार के और 2019 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के दोषी। स्वामी नित्यानंद, जिन पर दुर्व्यवहार के आरोप लगे और जो देश छोड़ कर निकल गए। ये उस अधिकार का दुरुपयोग हैं जो एक जीवित गुरु को सौंप दिया जाता है।
परंपरा के भीतर की उलटी धाराएँ
इन्हीं के साथ परंपरा के भीतर की वे धाराएँ भी हैं जो इनके विरुद्ध बहीं। मध्यकाल के भक्ति आंदोलनों ने, कबीर, रैदास और मीराबाई ने, जाति और कर्मकांड पर चोट की। एक चुनौती परंपरा के बाहर से भी आई, और उसका उत्तर परंपरा के भीतर से दिया गया। सदियों पहले बुद्ध ने वैदिक यज्ञ और जन्म से तय ऊँच-नीच को ठुकरा दिया था; मीमांसा और वेदान्त के आचार्यों ने, शंकराचार्य समेत, सदियों तक बौद्ध मतों से शास्त्रार्थ किया, और आगे चल कर पुराणों ने बुद्ध को विष्णु के अवतारों में गिन लिया। हर बड़ी परंपरा अपने साथ इस तरह की कमज़ोरियाँ ढोती है, और यह बात इनमें से किसी को माफ़ नहीं करती।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हिन्दू धर्म की एक किताब कौन-सी है?
कोई एक किताब नहीं। वेद को प्रमाण माना जाता है, पर साथ में उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत, पुराण और बहुत-सी वाणियाँ चलती हैं। परंपरा के पास एक पूरा पुस्तकालय है।
क्या हिन्दू धर्म और सनातन धर्म अलग हैं?
रोज़मर्रा में दोनों एक जैसे चलते हैं। फ़र्क़ इतना कि हिन्दू नाम भूगोल से आया और सनातन धर्म नाम परंपरा ने अपने भीतर से दिया।
जाति क्या हिन्दू धर्म का ही हिस्सा है?
इसकी जड़ें वर्ण की योजना में दिखती हैं, और यह धर्मशास्त्र में कठोर होती गई। सूज़न बेली और दूसरे विद्वान यह भी कहते हैं कि जाति एक चौड़ी दक्षिण एशियाई सामाजिक बनावट है। आम्बेडकर की आलोचना इसी परंपरा के भीतर से आई।
इन कठिन हिस्सों को यहाँ क्यों रखा गया है?
क्योंकि किसी परंपरा को समझना हो तो उसकी रौनक और उसके घाव, दोनों देखने पड़ते हैं। जाति की व्यवस्था, सती, दंगे और दोषी ठहराए गए गुरु दर्ज की हुई बातें हैं, और इनके विरुद्ध उठे सुधारक भी उसी दर्ज इतिहास का हिस्सा हैं। साथ रख कर देखें तो ये केवल समझ के काम आती हैं।
पढ़ने के लिए
- गैविन फ़्लड, ऐन इंट्रोडक्शन टु हिन्दूइज़्म
- वेंडी डॉनिगर, द हिन्दूज़: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री
- रोमिला थापर, सिंडिकेटेड हिन्दूइज़्म (हिन्दूइज़्म रीकंसिडर्ड, संपा. ज़ोंटहाइमर और कुल्के, 1989)
- बी. आर. आम्बेडकर, एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट
- लता मनी, कन्टेन्शस ट्रेडिशन्स
- क्रिस्तोफ़ ज़ाफ़्रलो, द हिन्दू नैशनलिस्ट मूवमेंट इन इंडिया
- जूलियस लिपनर, हिन्दूज़: देयर रिलीजस बिलीफ़्स ऐंड प्रैक्टिसेज़
- क्लाउस क्लोस्टरमायर, अ सर्वे ऑफ़ हिन्दूइज़्म
- सूज़न बेली, कास्ट, सोसाइटी ऐंड पॉलिटिक्स इन इंडिया फ़्रॉम द एटीन्थ सेंचुरी टु द मॉडर्न एज (1999)
- ब्रायन के. पेनिंगटन, वॉज़ हिन्दूइज़्म इन्वेंटेड? ब्रिटन्स, इंडियन्स, ऐंड द कोलोनियल कन्स्ट्रक्शन ऑफ़ रिलीजन (2005)
हिन्दू धर्म को परंपराओं के एक ढीले-ढाले संग्रह की तरह पढ़िए, जिसमें साझा शब्दावली और वेद को मान लेना ही जोड़ है। और किसी परंपरा को परखते समय उसके दावे और उसके इतिहास, दोनों को एक ही मेज़ पर रखिए। यही आदत बहस को प्रचार बनने से रोक देती है।