अंग
229
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੂਝਿ ਲੇ ਤਉ ਹੋਇ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਘਰਿ ਘਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨਾ ਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਛੂਟੀਐ ਦੇਖਹੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਜੇ ਲਖ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹੀ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਧੇ ਅਕਲੀ ਬਾਹਰੇ ਕਿਆ ਤਿਨ ਸਿਉ ਕਹੀਐ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੰਥੁ ਨ ਸੂਝਈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਨਿਰਬਹੀਐ ॥੨॥
ਖੋਟੇ ਕਉ ਖਰਾ ਕਹੈ ਖਰੇ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਅੰਧੇ ਕਾ ਨਾਉ ਪਾਰਖੂ ਕਲੀ ਕਾਲ ਵਿਡਾਣੈ ॥੩॥
ਸੂਤੇ ਕਉ ਜਾਗਤੁ ਕਹੈ ਜਾਗਤ ਕਉ ਸੂਤਾ ॥
ਜੀਵਤ ਕਉ ਮੂਆ ਕਹੈ ਮੂਏ ਨਹੀ ਰੋਤਾ ॥੪॥
ਆਵਤ ਕਉ ਜਾਤਾ ਕਹੈ ਜਾਤੇ ਕਉ ਆਇਆ ॥
ਪਰ ਕੀ ਕਉ ਅਪੁਨੀ ਕਹੈ ਅਪੁਨੋ ਨਹੀ ਭਾਇਆ ॥੫॥
ਮੀਠੇ ਕਉ ਕਉੜਾ ਕਹੈ ਕੜੂਏ ਕਉ ਮੀਠਾ ॥
ਰਾਤੇ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਐਸਾ ਕਲਿ ਮਹਿ ਡੀਠਾ ॥੬॥
ਚੇਰੀ ਕੀ ਸੇਵਾ ਕਰਹਿ ਠਾਕੁਰੁ ਨਹੀ ਦੀਸੈ ॥
ਪੋਖਰੁ ਨੀਰੁ ਵਿਰੋਲੀਐ ਮਾਖਨੁ ਨਹੀ ਰੀਸੈ ॥੭॥
ਇਸੁ ਪਦ ਜੋ ਅਰਥਾਇ ਲੇਇ ਸੋ ਗੁਰੂ ਹਮਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਚੀਨੈ ਆਪ ਕਉ ਸੋ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ॥੮॥
ਸਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਆਪੇ ਭਰਮਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਬੂਝੀਐ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਸਮਾਇਆ ॥੯॥੨॥੧੮॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੂਝਿ ਲੇ ਤਉ ਹੋਇ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਘਰਿ ਘਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨਾ ਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਛੂਟੀਐ ਦੇਖਹੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਜੇ ਲਖ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹੀ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਧੇ ਅਕਲੀ ਬਾਹਰੇ ਕਿਆ ਤਿਨ ਸਿਉ ਕਹੀਐ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੰਥੁ ਨ ਸੂਝਈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਨਿਰਬਹੀਐ ॥੨॥
ਖੋਟੇ ਕਉ ਖਰਾ ਕਹੈ ਖਰੇ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਅੰਧੇ ਕਾ ਨਾਉ ਪਾਰਖੂ ਕਲੀ ਕਾਲ ਵਿਡਾਣੈ ॥੩॥
ਸੂਤੇ ਕਉ ਜਾਗਤੁ ਕਹੈ ਜਾਗਤ ਕਉ ਸੂਤਾ ॥
ਜੀਵਤ ਕਉ ਮੂਆ ਕਹੈ ਮੂਏ ਨਹੀ ਰੋਤਾ ॥੪॥
ਆਵਤ ਕਉ ਜਾਤਾ ਕਹੈ ਜਾਤੇ ਕਉ ਆਇਆ ॥
ਪਰ ਕੀ ਕਉ ਅਪੁਨੀ ਕਹੈ ਅਪੁਨੋ ਨਹੀ ਭਾਇਆ ॥੫॥
ਮੀਠੇ ਕਉ ਕਉੜਾ ਕਹੈ ਕੜੂਏ ਕਉ ਮੀਠਾ ॥
ਰਾਤੇ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਐਸਾ ਕਲਿ ਮਹਿ ਡੀਠਾ ॥੬॥
ਚੇਰੀ ਕੀ ਸੇਵਾ ਕਰਹਿ ਠਾਕੁਰੁ ਨਹੀ ਦੀਸੈ ॥
ਪੋਖਰੁ ਨੀਰੁ ਵਿਰੋਲੀਐ ਮਾਖਨੁ ਨਹੀ ਰੀਸੈ ॥੭॥
ਇਸੁ ਪਦ ਜੋ ਅਰਥਾਇ ਲੇਇ ਸੋ ਗੁਰੂ ਹਮਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਚੀਨੈ ਆਪ ਕਉ ਸੋ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ॥੮॥
ਸਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਆਪੇ ਭਰਮਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਬੂਝੀਐ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਸਮਾਇਆ ॥੯॥੨॥੧੮॥
गउड़ी महला १ ॥
गुर परसादी बूझि ले तउ होइ निबेरा ॥
घरि घरि नामु निरंजना सो ठाकुरु मेरा ॥१॥
बिनु गुर सबद न छूटीऐ देखहु वीचारा ॥
जे लख करम कमावही बिनु गुर अंधिआरा ॥१॥ रहाउ ॥
अंधे अकली बाहरे किआ तिन सिउ कहीऐ ॥
बिनु गुर पंथु न सूझई कितु बिधि निरबहीऐ ॥२॥
खोटे कउ खरा कहै खरे सार न जाणै ॥
अंधे का नाउ पारखू कली काल विडाणै ॥३॥
सूते कउ जागतु कहै जागत कउ सूता ॥
जीवत कउ मूआ कहै मूए नही रोता ॥४॥
आवत कउ जाता कहै जाते कउ आइआ ॥
पर की कउ अपुनी कहै अपुनो नही भाइआ ॥५॥
मीठे कउ कउड़ा कहै कड़ूए कउ मीठा ॥
राते की निंदा करहि ऐसा कलि महि डीठा ॥६॥
चेरी की सेवा करहि ठाकुरु नही दीसै ॥
पोखरु नीरु विरोलीऐ माखनु नही रीसै ॥७॥
इसु पद जो अरथाइ लेइ सो गुरू हमारा ॥
नानक चीनै आप कउ सो अपर अपारा ॥८॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे भरमाइआ ॥
गुर किरपा ते बूझीऐ सभु ब्रहमु समाइआ ॥९॥२॥१८॥
गुर परसादी बूझि ले तउ होइ निबेरा ॥
घरि घरि नामु निरंजना सो ठाकुरु मेरा ॥१॥
बिनु गुर सबद न छूटीऐ देखहु वीचारा ॥
जे लख करम कमावही बिनु गुर अंधिआरा ॥१॥ रहाउ ॥
अंधे अकली बाहरे किआ तिन सिउ कहीऐ ॥
बिनु गुर पंथु न सूझई कितु बिधि निरबहीऐ ॥२॥
खोटे कउ खरा कहै खरे सार न जाणै ॥
अंधे का नाउ पारखू कली काल विडाणै ॥३॥
सूते कउ जागतु कहै जागत कउ सूता ॥
जीवत कउ मूआ कहै मूए नही रोता ॥४॥
आवत कउ जाता कहै जाते कउ आइआ ॥
पर की कउ अपुनी कहै अपुनो नही भाइआ ॥५॥
मीठे कउ कउड़ा कहै कड़ूए कउ मीठा ॥
राते की निंदा करहि ऐसा कलि महि डीठा ॥६॥
चेरी की सेवा करहि ठाकुरु नही दीसै ॥
पोखरु नीरु विरोलीऐ माखनु नही रीसै ॥७॥
इसु पद जो अरथाइ लेइ सो गुरू हमारा ॥
नानक चीनै आप कउ सो अपर अपारा ॥८॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे भरमाइआ ॥
गुर किरपा ते बूझीऐ सभु ब्रहमु समाइआ ॥९॥२॥१८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ (हे भाई !) माया के प्रभाव से पैदा हुए आत्मिक अंधेरे में से तुझे निजात मिल जाएगी, अगर तू गुरू की कृपा से ये बात समझ ले कि- माया रहित प्रभू का नाम हरेक हृदय-घर में बसता है और वही निरंजन मेरा भी पालनहार मालिक है । 1। (माया के मोह ने जीवों की आत्मिक आँखों के आगे अंधकार खड़ा कर दिया है~ हे भाई !) विचार करके देख लो~ गुरू के शबद के बिना (इस आत्मिक अंधेरे से) खलासी नहीं हो सकती। (हे भाई !) अगर तू लाखों ही धर्म-कर्म करता रहे~ तो भी गुरू की शरण आए बिना ये आत्मिक अंधेरा (टिका ही रहेगा)। 1। रहाउ। जिन लोगों को माया के मोह ने अंधा कर दिया है और बुद्धि हीन कर दिया है~ उन्हें ये समझाने का कोई लाभ नहीं। गुरू की शरण के बिना उन्हे जीवन का सही रास्ता मिल नहीं सकता~ सही जीवन-राह के राही का उनके साथ किसी तरह का भी साथ नहीं निभ सकता। 2। माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य उस धन को जिसका प्रभू की दरगाह में कोई मूल्य नहीं है~ असल धन कहता है। पर (जो नाम-धन) असल धन (है उस) की कद्र ही नहीं समझता। माया में अंधे हुए मनुष्य को समझदार कहा जा रहा है – ये आश्चर्यजनक चाल है दुनिया के समय की। 3। माया की मोह की नींद में सोए हुए को जगत कहता है कि ये जागता है सुचेत है~ पर जो मनुष्य (परमातमा की याद में) जागता है सुचेत है~ उसको कहता है कि ये सोया हुआ है। प्रभू की भक्ति की बरकति से जीते आत्मिक जीवन वाले को जगत कहता है कि हमारे लिए तो मरा हुआ है। पर आत्मिक मौत मरे हुए को देख के कोई अफसोस नहीं करता। 4। परमात्मा के रास्ते पर आने वाले को जगत कहता है कि ये गया गुजरा है~ पर प्रभू की ओर से गए गुजरे को जगत समझता है कि इसी का जगत में आना सफल हुआ है। जिस माया ने दूसरे की बन जाना है उसे जगत अपनी कहता है~ पर जो नाम-धन असल में अपना है वह अच्छा नहीं लगता। 5। नाम-रस और सारे रसों से मीठा है~ इसको जगत कड़वा कहता है। विषियों का रस (अंत को) कड़वा (दुखदाई साबत होता) है~ इसे जगत स्वादिष्ट कह रहा है। प्रभू के नाम-रंग में रंगे हुए की लोग निंदा करते हैं। जगत में ये आश्चर्यजनक तमाशा देखने में आ रहा है। 6। लोग परमात्मा की दासी (माया) की तो सेवा खुशामद कर रहे हैं~ पर (माया का) मालिक किसी को दिखता ही नहीं। (माया में से सुख ढूँढना इस तरह है जैसे पानी मथ के उसमें से मक्खन ढूँढना)। यदि छप्पड़ को मथें~ अगर पानी को मथें~ उसमें से मक्खन नहीं निकल सकता। 7। हे नानक ! जो मनुष्य अपनी अस्लियत को पहिचान लेता है~ वह उस परमात्मा का रूप बन जाता है जो माया के प्रभाव से परे है और जिसके गुणों का परला छोर नहीं मिल सकता। स्वै-पहिचान के आत्मिक दर्जे को मनुष्य प्राप्त कर लेता है~ मैं उसके आगे अपना सिर झुकाता हूँ। 8। (पर माया में और जीवों में) हर जगह परमात्मा स्वयं ही स्वयं व्यापक है~ खुद ही जीवों को गलत राह पर डालता है। गुरू की मेहर से ही ये समझ पड़ती है कि परमातमा हरेक जगह मौजूद है। 9। 2। 18।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀਆ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮਨ ਕਾ ਸੂਤਕੁ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲੇ ਆਵਉ ਜਾਉ ॥੧॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸੂਤਕੁ ਕਬਹਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜਿਚਰੁ ਸਬਦਿ ਨ ਭੀਜੈ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੋ ਸੂਤਕੁ ਜੇਤਾ ਮੋਹੁ ਆਕਾਰੁ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥੨॥
ਸੂਤਕੁ ਅਗਨਿ ਪਉਣੈ ਪਾਣੀ ਮਾਹਿ ॥
ਸੂਤਕੁ ਭੋਜਨੁ ਜੇਤਾ ਕਿਛੁ ਖਾਹਿ ॥੩॥
ਸੂਤਕਿ ਕਰਮ ਨ ਪੂਜਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਸੂਤਕੁ ਜਾਇ ॥
ਮਰੈ ਨ ਜਨਮੈ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥੫॥
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸੋਧਿ ਦੇਖਹੁ ਕੋਇ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕੋ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥੬॥
ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਨਾਮੁ ਉਤਮੁ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਕਲਿ ਮਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰਿ ॥੭॥
ਸਾਚਾ ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੮॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮਨ ਕਾ ਸੂਤਕੁ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲੇ ਆਵਉ ਜਾਉ ॥੧॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸੂਤਕੁ ਕਬਹਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜਿਚਰੁ ਸਬਦਿ ਨ ਭੀਜੈ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੋ ਸੂਤਕੁ ਜੇਤਾ ਮੋਹੁ ਆਕਾਰੁ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥੨॥
ਸੂਤਕੁ ਅਗਨਿ ਪਉਣੈ ਪਾਣੀ ਮਾਹਿ ॥
ਸੂਤਕੁ ਭੋਜਨੁ ਜੇਤਾ ਕਿਛੁ ਖਾਹਿ ॥੩॥
ਸੂਤਕਿ ਕਰਮ ਨ ਪੂਜਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਸੂਤਕੁ ਜਾਇ ॥
ਮਰੈ ਨ ਜਨਮੈ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥੫॥
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸੋਧਿ ਦੇਖਹੁ ਕੋਇ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕੋ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥੬॥
ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਨਾਮੁ ਉਤਮੁ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਕਲਿ ਮਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰਿ ॥੭॥
ਸਾਚਾ ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥੮॥੧॥
रागु गउड़ी गुआरेरी महला ३ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन का सूतकु दूजा भाउ ॥
भरमे भूले आवउ जाउ ॥१॥
मनमुखि सूतकु कबहि न जाइ ॥
जिचरु सबदि न भीजै हरि कै नाइ ॥१॥ रहाउ ॥
सभो सूतकु जेता मोहु आकारु ॥
मरि मरि जंमै वारो वार ॥२॥
सूतकु अगनि पउणै पाणी माहि ॥
सूतकु भोजनु जेता किछु खाहि ॥३॥
सूतकि करम न पूजा होइ ॥
नामि रते मनु निरमलु होइ ॥४॥
सतिगुरु सेविऐ सूतकु जाइ ॥
मरै न जनमै कालु न खाइ ॥५॥
सासत सिंम्रिति सोधि देखहु कोइ ॥
विणु नावै को मुकति न होइ ॥६॥
जुग चारे नामु उतमु सबदु बीचारि ॥
कलि महि गुरमुखि उतरसि पारि ॥७॥
साचा मरै न आवै जाइ ॥
नानक गुरमुखि रहै समाइ ॥८॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन का सूतकु दूजा भाउ ॥
भरमे भूले आवउ जाउ ॥१॥
मनमुखि सूतकु कबहि न जाइ ॥
जिचरु सबदि न भीजै हरि कै नाइ ॥१॥ रहाउ ॥
सभो सूतकु जेता मोहु आकारु ॥
मरि मरि जंमै वारो वार ॥२॥
सूतकु अगनि पउणै पाणी माहि ॥
सूतकु भोजनु जेता किछु खाहि ॥३॥
सूतकि करम न पूजा होइ ॥
नामि रते मनु निरमलु होइ ॥४॥
सतिगुरु सेविऐ सूतकु जाइ ॥
मरै न जनमै कालु न खाइ ॥५॥
सासत सिंम्रिति सोधि देखहु कोइ ॥
विणु नावै को मुकति न होइ ॥६॥
जुग चारे नामु उतमु सबदु बीचारि ॥
कलि महि गुरमुखि उतरसि पारि ॥७॥
साचा मरै न आवै जाइ ॥
नानक गुरमुखि रहै समाइ ॥८॥१॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी महला ३ असटपदीआ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !परमात्मा को भुला के माया आदि) के साथ डाला प्यार मन की अपवित्रता (का कारण बनता) है (इस अपवित्रता के कारण माया की) भटकना में गलत रास्ते पर पड़े हुए मनुष्य को जनम मरण का चक्र बना रहता है। 1। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (के मन) की अपवित्रता कभी दूर नहीं होती। जब तक (मनुष्य गुरू के) शबद में नहीं पतीजता~ परमात्मा के नाम में नहीं जुड़ता (तब तक मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है ।1। रहाउ। (हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के लिए) ये जितना ही जगत है~ जितना ही जगत का मोह है ये सारा अपवित्रता (का मूल) है~ वह मनुष्य (इस आत्मिक मौत में) मर मर के बारंबार पैदा होता रहता है। 2। (मनमुखों के वास्ते) आग में~ हवा में~ पानी में भी अपवित्रता ही है~ जितना कुछ भोजन आदि वो खाते हैं वह भी (उनके मन के वास्ते) अपवित्रता (का कारण ही बनता) है। 3। (हे भाई !) सूतक (के भ्रम में ग्रसे हुए मन को) कोई कर्म-कांड पवित्र नहीं कर सकते। कोई देव-पूजा पवित्र नहीं कर सकती। परमात्मा के नाम में रंगे जा के ही मन पवित्र होता है। 4। (हे भाई !) अगर सतिगुरू का आसरा लिया जाए तो मन की अपवित्रता दूर हो जाती है~ (गुरू की शरण में रहने वाला मनुष्य) ना मरता है ना पैदा होता है~ ना ही उसे आत्मिक मौत खाती है। 5। (हे भाई !बेशक) कोई स्मृतियों-शास्त्रों को भी विचार के देख लो। परमात्मा के नाम के बिना कोई मनुष्य मानसिक अपवित्रता से खलासी नहीं पा सकता। 6। (हे भाई !) चारों युगों में गुरू के शबद को विचार के (परमात्मा का) नाम (जप के ही मनुष्य) उत्तम बन सकता है। इस युग में भी जिसे कलियुग कहा जा रहा है वही मनुष्य (विकारों के समुंद्रों से) पार लांघता है जो गुरू की शरण पड़ता है। 7। जो सदा कायम रहने वाला है और जो कभी पैदा होता मरता नहीं (इस तरह उस मनुष्य को कोई अपवित्रता छू नहीं सकती) हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य उस परमात्मा में सदा लीन रहता है । 8। 1।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਾ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖਹੁ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਭਾ ਸਾਚ ਦੁਆਰਾ ॥੧॥
ਪੰਡਿਤ ਹਰਿ ਪੜੁ ਤਜਹੁ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਉਜਲੁ ਉਤਰਹੁ ਪਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਾ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਰਾਖਹੁ ਹਿਰਦੈ ਉਰ ਧਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਭਾ ਸਾਚ ਦੁਆਰਾ ॥੧॥
ਪੰਡਿਤ ਹਰਿ ਪੜੁ ਤਜਹੁ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਉਜਲੁ ਉਤਰਹੁ ਪਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
गुरमुखि सेवा प्रान अधारा ॥
हरि जीउ राखहु हिरदै उर धारा ॥
गुरमुखि सोभा साच दुआरा ॥१॥
पंडित हरि पड़ु तजहु विकारा ॥
गुरमुखि भउजलु उतरहु पारा ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखि सेवा प्रान अधारा ॥
हरि जीउ राखहु हिरदै उर धारा ॥
गुरमुखि सोभा साच दुआरा ॥१॥
पंडित हरि पड़ु तजहु विकारा ॥
गुरमुखि भउजलु उतरहु पारा ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ (हे पंडित !) गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा की सेवा भक्ति को अपने जीवन का आसरा बना। परमात्मा को अपने हृदय में अपने मन में टिका के रख~ (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ कर तू सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर आदर मान हासिल करेगा। 1। हे पंडित !परमात्मा की सिफत सालाह पढ़ (और इसकी बरकति से अपने अंदर से) विकार छोड़। (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ कर तू संसार समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 229 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 229” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 230 →, पीछे का: ← अंग 228।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।