अंग 192

अंग
192
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਰਾਖੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਿ ਚਿੰਤਾ ਸਭ ਜਾਹਿ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਭਗਵੰਤ ਨਾਹੀ ਅਨ ਕੋਇ ॥
ਮਾਰੈ ਰਾਖੈ ਏਕੋ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਰਿਦੈ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਜਪਿ ਉਤਰਹਿ ਪਾਰਿ ॥੨॥
ਗੁਰ ਮੂਰਤਿ ਸਿਉ ਲਾਇ ਧਿਆਨੁ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਪਾਵਹਿ ਮਾਨੁ ॥੩॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਗੁਰ ਸਰਣੀ ਆਇਆ ॥
ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸੇ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੬੧॥੧੩੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
गुर का सबदु राखु मन माहि ॥
नामु सिमरि चिंता सभ जाहि ॥१॥
बिनु भगवंत नाही अन कोइ ॥
मारै राखै एको सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
गुर के चरण रिदै उरि धारि ॥
अगनि सागरु जपि उतरहि पारि ॥२॥
गुर मूरति सिउ लाइ धिआनु ॥
ईहा ऊहा पावहि मानु ॥३॥
सगल तिआगि गुर सरणी आइआ ॥
मिटे अंदेसे नानक सुखु पाइआ ॥४॥६१॥१३०॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! अगर उस भगवान का आसरा मन में दृढ़ करना है~ तो) गुरू का शबद (अपने) मन में टिकाए रख। (गुरू-शबद की सहायता से भगवान का) नाम सिमर~ तेरे सारे चिंता-फिक्र दूर हो जाएंगे। 1। हे भाई !) भगवान के बिना (जीवों का) और कोई आसरा नहीं। वह भगवान ही (जीवों को) मारता है। वह भगवान ही (जीवों को) पालता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! अगर भगवान का आसरा लेना है तो) अपने हृदय में दिल में गुरू के चरण बसा (भाव~ निम्रता से गुरू की शरण पड़)। (गुरू के बताए हुए राह पर चल के परमात्मा का नाम) जप के तू (तृष्णा की) आग के समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 2। (हे भाई ! गुरू का शबद ही गुरू की मूरति है~ गुरू का स्वरूप है) गुरू के शबद से अपनी सुरति जोड़~ तू इस लोक में और परलोक में आदर हासिल करेगा। 3। हे नानक ! जो मनुष्य अन्य सारे आसरे छोड़ के गुरू की शरण आता है~ उसके सारे चिंता-फिक्र समाप्त हो जाते हैं~ वह आत्मिक आनंद भोगता है। 4। 61। 130।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਦੂਖੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੧॥
ਜਪਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਸਾਧੂ ਜਨ ਰਾਮੁ ਰਸਨ ਵਖਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਕਸੁ ਬਿਨੁ ਨਾਹੀ ਦੂਜਾ ਕੋਇ ॥
ਜਾ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੨॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਸਖਾ ਕਰਿ ਏਕੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅਖਰ ਮਨ ਮਹਿ ਲੇਖੁ ॥੩॥
ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਰਬਤ ਸੁਆਮੀ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਾਨਕੁ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੪॥੬੨॥੧੩੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
जिसु सिमरत दूखु सभु जाइ ॥
नामु रतनु वसै मनि आइ ॥१॥
जपि मन मेरे गोविंद की बाणी ॥
साधू जन रामु रसन वखाणी ॥१॥ रहाउ ॥
इकसु बिनु नाही दूजा कोइ ॥
जा की द्रिसटि सदा सुखु होइ ॥२॥
साजनु मीतु सखा करि एकु ॥
हरि हरि अखर मन महि लेखु ॥३॥
रवि रहिआ सरबत सुआमी ॥
गुण गावै नानकु अंतरजामी ॥४॥६२॥१३१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! उस गोबिंद की बाणी जप) जिसका सिमरन करने से हरेक किस्म के दुख दूर हो जाते हैं (और~ बाणी की बरकति से) परमात्मा का अमोलक नाम मन में आ बसता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी का उच्चारण कर। (इस बाणी से ही) संत जन अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! उस गोबिंद की सिफत सालाह करता रह) जिसके बराबर का कोई नहीं है और~ जिसकी मेहर की निगाह से सदा आत्मिक आनंद मिलता है~ । 2। (हे भाई ! उस) एक गोबिंद को अपना सज्जन-मित्र साथी बना~ और उस हरी की सिफत सालाह के अक्षर (संस्कार) अपने मन में उकर ले (लिख)। 3। (हे भाई ! सारे जगत का वह) मालिक हर जगह व्यापक है और हरेक के दिल की जानता है~ नानक (भी) उस अंतरजामी स्वामी के गुण गाता है। 4। 62। 131।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭੈ ਮਹਿ ਰਚਿਓ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਭਉ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰਾ ॥੧॥
ਭਉ ਨ ਵਿਆਪੈ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋਗ ਹਰਖ ਮਹਿ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
ਤਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਾ ॥੨॥
ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਮਹਾ ਵਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥
ਸੇ ਸੀਤਲ ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥੩॥
ਰਾਖਿ ਲੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਖਨਹਾਰਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਿਆ ਜੰਤ ਵਿਚਾਰਾ ॥੪॥੬੩॥੧੩੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
भै महि रचिओ सभु संसारा ॥
तिसु भउ नाही जिसु नामु अधारा ॥१॥
भउ न विआपै तेरी सरणा ॥
जो तुधु भावै सोई करणा ॥१॥ रहाउ ॥
सोग हरख महि आवण जाणा ॥
तिनि सुखु पाइआ जो प्रभ भाणा ॥२॥
अगनि सागरु महा विआपै माइआ ॥
से सीतल जिन सतिगुरु पाइआ ॥३॥
राखि लेइ प्रभु राखनहारा ॥
कहु नानक किआ जंत विचारा ॥४॥६३॥१३२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) सारा संसार (किसी न किसी) डर-सहम के नीचे दबा रहता है~ सिर्फ उस मनुष्य पर (कोई) डर अपना जोर नहीं डाल सकता जिसे (परमात्मा का) नाम (जीवन के वास्ते) सहारा मिला हुआ है। 1। हे प्रभू ! तेरी शरण पड़ने से (तेरा पल्ला पकड़ने से) कोई डर अपना जोर नहीं डाल सकता (क्योंकि~ फिर ये निष्चय बन जाता है कि) वही काम किया जा सकता है जो (हे प्रभू !) तुझे ठीक लगता है। 1। रहाउ। दुख मानने में या खुशी मनाने में (संसारी जीव के वास्ते डर-सहम का) आना जाना बना रहता है। सिर्फ उस मनुष्य ने (स्थाई) आत्मिक आनंद प्राप्त किया है जो प्रभू को प्यारा लगता है (जो प्रभू की रजा में चलता है)। 2। (हे भाई ! ये संसार तृष्णा की) आग का समुंद्र है (इस में जीवों पे) माया अपना जोर डाले रखती है। जिन (भाग्यशालियों) को सत्गुरू मिल जाता है~ वह (इस अग्नि सागर में विचरते हुए भी उनकी अंतरात्मा) शीतलता से (ठहराव) सहज में टिकी रहती है। 3। (पर) हे नानक ! (डर सहम से बचने के लिए) बचाने की ताकत रखने वाला परमात्मा स्वयं ही बचाता है (अग्नि सागर के विकारों के सेक से बचने के लिए) जीवों बिचारों की क्या बिसात है? (इस वास्ते हे नानक ! उस परमात्मा का पल्ला पकड़े रख)। 4। 63। 132।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਜਪੀਐ ਨਾਉ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਦਰਗਹ ਥਾਉ ॥੧॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਮ ਮਨਿ ਵਸੇ ਤਉ ਦੂਖੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥੨॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਪਰੰਪਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੩॥
ਕਰਉ ਅਰਦਾਸਿ ਅਪਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਰਾਸਿ ॥੪॥੬੪॥੧੩੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
तुमरी क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥
तुमरी क्रिपा ते दरगह थाउ ॥१॥
तुझ बिनु पारब्रहम नही कोइ ॥
तुमरी क्रिपा ते सदा सुखु होइ ॥१॥ रहाउ ॥
तुम मनि वसे तउ दूखु न लागै ॥
तुमरी क्रिपा ते भ्रमु भउ भागै ॥२॥
पारब्रहम अपरंपर सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥३॥
करउ अरदासि अपने सतिगुर पासि ॥
नानक नामु मिलै सचु रासि ॥४॥६४॥१३३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे पारब्रह्म प्रभू !) तेरी मेहर से ही (तेरा) नाम जपा जा सकता है। तेरी कृपा से ही तेरी दरगाह में (जीव को) आदर मिल सकता है। 1। हे पारब्रह्म प्रभू ! तरे बगैर (जीवों का और) कोई (आसरा) नहीं। तेरी कृपा से ही (जीव को) सदा के लिए आत्मिक आनंद मिल सकता है। 1। रहाउ। (हे पारब्रह्म प्रभू !) अगर तू (जीव के) मन में आ बसे तो (जीवों को कोई) दुख छू नहीं सकता। तेरी मेहर से जीव की भटकना दूर हो जाती है~ जीव का डर सहम भाग जाता है। 2। हे पारब्रह्म प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! हे जगत के मालिक प्रभू ! हे सारे जीवों के दिल की जानने वाले प्रभू !। 3। (अगर तेरी मेहर हो तो ही) मैं अपने गुरू के आगे (ये) अरदास कर सकता हूँ कि मुझे नानक को प्रभू का नाम मिले (नानक वास्ते नाम ही) सदा कायम रहने वाला सरमाया है। 4। 64। 133।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਣ ਬਿਨਾ ਜੈਸੇ ਥੋਥਰ ਤੁਖਾ ॥
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨ ਸੂਨੇ ਸੇ ਮੁਖਾ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਨਿਤ ਪ੍ਰਾਣੀ ॥
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨ ਧ੍ਰਿਗੁ ਦੇਹ ਬਿਗਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਾਹੀ ਮੁਖਿ ਭਾਗੁ ॥
ਭਰਤ ਬਿਹੂਨ ਕਹਾ ਸੋਹਾਗੁ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਲਗੈ ਅਨ ਸੁਆਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਆਸ ਨ ਪੂਜੈ ਕਾਇ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੀ ਦਾਤਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਦਿਨ ਰਾਤਿ ॥੪॥੬੫॥੧੩੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
कण बिना जैसे थोथर तुखा ॥
नाम बिहून सूने से मुखा ॥१॥
हरि हरि नामु जपहु नित प्राणी ॥
नाम बिहून ध्रिगु देह बिगानी ॥१॥ रहाउ ॥
नाम बिना नाही मुखि भागु ॥
भरत बिहून कहा सोहागु ॥२॥
नामु बिसारि लगै अन सुआइ ॥
ता की आस न पूजै काइ ॥३॥
करि किरपा प्रभ अपनी दाति ॥
नानक नामु जपै दिन राति ॥४॥६५॥१३४॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जैसे दानों के बगैर खाली तोह (किसी काम नहीं आते~ इसी तरह) वो मुँह सूने हैं जो परमात्मा का नाम जपने के बिना हैं। 1। अर्थ: हे प्राणी ! सदा परमात्मा का नाम सिमरते रहो। परमात्मा के नाम के बिना ये शरीर जो आखिर पराया हो जाता है (जो मौत आने पर छोड़ना पड़ता है) धिक्कार-योग (कहा जाता) है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम जपे बिना किसी के माथे के भाग्य नहीं खुलते। पति के बिना (स्त्री का) सुहाग नहीं हो सकता। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का नाम भुला के और ही स्वादों में उलझा रहता है~ उसकी कोई उम्मीद सिरे नहीं चढ़ती। 3। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! मेहर करके तू जिस मनुष्य को अपने नाम की दाति बख्शता है वही दिन रात तेरा नाम जपता है। 4। 65। 134।

संदर्भ: यह अंग 192 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 192” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 193 →, पीछे का: ← अंग 191

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।