

परिचय
परीक्षित अर्जुन का पोता था। हस्तिनापुर का राजा। एक दिन शिकार पर निकला, थका हुआ। प्यासा। एक ऋषि-आश्रम में पहुँचा। ऋषि ध्यान में थे। उन्होंने आँख नहीं खोली। परीक्षित को क्रोध आ गया, एक मरा हुआ साँप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया, और चला गया। ऋषि के बेटे को यह बात पता चली। उसने शाप दिया, “सात दिन में तक्षक नाग आपको डँसेगा।”
परीक्षित को जब यह ख़बर मिली, तो वो राज्य के बाहर निकल आया। गंगा किनारे बैठ गया। शुकदेव वहाँ आए, व्यासजी के पुत्र, जो जन्म से ही जागे हुए थे। परीक्षित ने एक सवाल पूछा, “जिस आदमी के पास सात दिन हों, उसे क्या सुनना चाहिए, क्या करना चाहिए?” शुकदेव सात दिन तक भागवतम् सुनाते रहे। आठवें दिन तक्षक आया। पर तब तक राजा जा चुका था, उस जगह पर जहाँ साँप-काटना मायने नहीं रखता।
यही भागवतम् का कथा-परिवेश है। एक सम्पूर्ण ग्रंथ सात दिनों में मृत्यु की प्रतीक्षा करते राजा को सुनाया गया। इसलिए हर कथा उस बात पर ठहरती है जिसे जीवन की अन्तिम घड़ी में भी स्मरण रखना सार्थक हो।
योग वसिष्ठ और भागवतम् में एक खास फ़र्क़ है। वसिष्ठ चेतना के प्रयोगों से सिखाता है, “आप कौन हैं?” यह सवाल केन्द्र में है। भागवतम् रिश्तों से सिखाता है, “आप किसके हैं?” यह सवाल केन्द्र में है। दोनों रास्ते एक ही जगह जाते हैं, उसी मौन में। पर एक ‘मैं’ को घोलकर, दूसरा ‘मैं’ को ‘आपका’ बनाकर।
भागवतम् में दर्शन अनुभूति का रूप लेता है। यशोदा का वात्सल्य, सुदामा का मौन स्नेह और संकट में गजेन्द्र की पुकार कपिल मुनि के सांख्य-विवेचन जितनी ही गहरी दार्शनिक दृष्टि रखते हैं।
यहाँ पैंसठ कहानियाँ हैं, हिन्दी में, रोज़मर्रा की भाषा में। हर एक की अपनी मन्थन-खण्ड है। पढ़ने का कोई क्रम ज़रूरी नहीं। जो शीर्षक खींचे, वहीं से शुरू कीजिए।
पृष्ठभूमि
भागवतम् की रचना का अनुमानित काल अधिकांश विद्वान नौवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी मानते हैं, हालाँकि इसमें अधिक प्राचीन सामग्री भी सम्मिलित है। मूल भाषा संस्कृत है। इसमें बारह स्कन्ध, तीन सौ पैंतीस अध्याय और लगभग अठारह हज़ार श्लोक हैं।
रचना का श्रेय वेदव्यास को दिया जाता है। कथा यह है कि व्यासजी ने महाभारत और बाक़ी सब पुराण पूरे करने के बाद भी एक खालीपन महसूस किया। नारद उनके पास आए और कहा, “आपने धर्मअर्थ, काम, मोक्षसब लिखा। पर भगवान की लीलाओं का वर्णन ठीक से नहीं किया। यही आपकी अधूरी रचना है।” व्यासजी ने तब भागवतम् लिखा। उन्होंने इसे अपने बेटे शुकदेव को सिखाया, जो खुद जन्मजात मुक्त थे, मगर इसी शास्त्र के लिए कुछ देर इस संसार में रुक गए।
भागवतम् की कथा कई परतों में खुलती है। सूत गोस्वामी नैमिषारण्य के ऋषियों को वही सुनाते हैं जो शुकदेव ने परीक्षित से कहा था। इनके भीतर कृष्ण और उद्धव, कपिल और देवहूति, नारद और व्यास, जय और विजय तथा ध्रुव और नारायण के संवाद आते हैं। प्रत्येक प्रसंग अगले प्रसंग को उचित सन्दर्भ देता है।
बारह स्कन्धों को पद्म-पुराण कृष्ण के शरीर के अंग बताता है। पहला स्कन्ध उनके पैर, दूसरा जाँघें, तीसरा नाभि, चौथा छाती, और ऐसे ही ऊपर। दसवाँ स्कन्ध, जिसमें कृष्ण की पूरी लीला है, उनका मुख माना जाता है। बारहवाँ स्कन्ध सिर।
भागवतम् का प्रभाव हर भारतीय भाषा में फैला है। कथक, लघुचित्र, हरिकथा, यक्षगान और कुचिपुड़ी, सबने इससे सामग्री पाई है। यह पहला पुराण भी है जिसका किसी यूरोपीय भाषा में अनुवाद हुआ; इसका फ़्रांसीसी अनुवाद सन् सत्रह सौ अठासी में प्रकाशित हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भागवतम् और भगवद् गीता में क्या फ़र्क़ है?
गीता महाभारत का एक अंश है, जिसमें लगभग सात सौ श्लोक हैं और जिसका परिवेश युद्धभूमि है; वहीं कृष्ण अर्जुन को कर्तव्य का उपदेश देते हैं। भागवतम् बारह स्कन्धों और लगभग अठारह हज़ार श्लोकों वाला स्वतंत्र पुराण है, जिसे मृत्यु की प्रतीक्षा करते राजा को उसके अन्तिम सप्ताह में सुनाया गया। गीता में कृष्ण उपदेशक के रूप में सामने आते हैं। भागवतम् में उनका जीवन और उनकी लीलाएँ कथा का केन्द्र बनती हैं।
भागवतम् कब लिखा गया?
अधिकांश विद्वान इसकी रचना नौवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी की मानते हैं, हालाँकि कुछ हिस्से इससे काफ़ी पुराने हैं। दक्षिण भारत में इसके सबसे पुराने संदर्भ मिलते हैं, और इसका अन्तिम रूप शायद वहीं तय हुआ। पर ध्यान दीजिए, “लिखा जाना” और “रचा जाना” एक नहीं हैं। यह श्रुति-परंपरा में कई पीढ़ियों तक बहता रहा, फिर कलमबद्ध हुआ।
क्या भागवतम् सिर्फ़ वैष्णवों के लिए है?
इसमें कृष्ण और विष्णु की लीलाओं का विस्तार है, और वैष्णव परम्परा ने इसे विशेष रूप से अपनाया है। इसके भीतर अद्वैत, द्वैत और विशिष्टाद्वैत की अलग-अलग व्याख्याओं के लिए स्थान मिलता है। इसे सुनाने वाले शुकदेव को जीवन्मुक्त मुनि माना गया है, और शंकराचार्य ने इसके पद उद्धृत किए हैं। इस प्रकार इसकी पाठ-परम्परा किसी एक सम्प्रदाय तक सीमित नहीं रही।
शुकदेव कौन थे और उन्होंने यह कथा क्यों सुनाई?
शुकदेव व्यास के बेटे थे। कथा यह है कि वो माँ के गर्भ में बारह साल रहे, बाहर निकलने से इनकार करते रहे, क्योंकि बाहर माया का स्पर्श था। आख़िर कृष्ण ने ख़ुद आकर वचन दिया कि माया उन्हें छुएगी नहीं। तब वो बाहर आए, और तुरंत जंगल की तरफ़ चले गए। वो जन्म से ही जागे हुए थे। परीक्षित के सात-दिन-शेष राज्य को सुनकर वो खुद चलकर आए, क्योंकि भागवतम् सुनाने का मौक़ा एक मुक्त आत्मा के लिए भी अहैतुकी प्रेम का अवसर है।
बारह स्कन्ध किस क्रम में पढ़ने चाहिए?
पारंपरिक क्रम पहले से बारहवें स्कन्ध तक है। बहुत से पाठक कृष्ण-लीला वाले दसवें स्कन्ध से आरम्भ करते हैं, फिर उद्धव-गीता वाले ग्यारहवें स्कन्ध पर जाते हैं और कथा का परिवेश समझने के लिए आरम्भिक स्कन्धों की ओर लौटते हैं। यहाँ प्रत्येक कहानी अपने आप में पूरी है।
दसवाँ स्कन्ध सबसे प्रसिद्ध क्यों है?
क्योंकि उसमें कृष्ण-जन्म से लेकर मथुरा जाने तक की पूरी कथा है। पूतना, यशोदा का माखन-चोर बच्चा, गोवर्धन उठाना, रास-लीला और कंस-वध, सब इसी में हैं। इस स्कन्ध ने भारत की धार्मिक कल्पना को गहराई से आकार दिया है। मीराबाई, सूरदास, चैतन्य और तुलसी की भक्ति-काव्य परम्पराओं ने भी इसी कथालोक से पोषण पाया।
भागवतम् में अद्वैत है या भक्ति?
भागवतम् भक्ति की भाषा में अद्वैत की सूक्ष्म दृष्टि भी रखता है। शुकदेव, उद्धव और कपिल की शिक्षाएँ अद्वैत-वेदान्त के साथ संवाद करती हैं। इसकी प्रस्तुति भक्ति की है, जहाँ साधक प्रेम और समर्पण के माध्यम से कृष्ण से सम्बन्ध बनाता है। अन्ततः ये दृष्टियाँ एक ही आध्यात्मिक अनुभूति में मिलती हैं।
ये पैंसठ कहानियाँ कैसे चुनी गईं?
हर कहानी में तीन गुण देखे गए: स्पष्ट आरम्भ, मध्य और अन्त वाला नाटकीय क्रम; परिवर्तन से गुज़रता पात्र; और कथा के बाद भी ठहरने वाला दार्शनिक बिंदु। वंश-वर्णन जैसी बहुत-सी सामग्री इस चयन में सम्मिलित नहीं हुई। यह भागवतम् की चुनिंदा कथाओं का संग्रह है।
क्या इन कहानियों को बच्चों को सुनाया जा सकता है?
अधिकांश कथाएँ बच्चों को सुनाई जा सकती हैं। कृष्ण-लीला, प्रह्लाद, ध्रुव और गजेन्द्र की कथाएँ बच्चों में विशेष प्रिय हैं। सौभरि मुनि या इला-सुद्युम्न जैसे कुछ प्रसंग वयस्क विषय रखते हैं और बच्चों के लिए सुनाते समय संयमित संपादन माँगते हैं। परम्परागत कथा-वाचन में इन्हें अलग-अलग आयु के श्रोताओं ने अपनी समझ के अनुसार ग्रहण किया है।
भागवतम् पढ़ने के लिए कोई पूर्व-ज्ञान ज़रूरी है?
इन कथाओं के लिए किसी पूर्व-ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। महाभारत की मुख्य कथा का परिचय कुछ सन्दर्भों को अधिक स्पष्ट कर सकता है। प्रत्येक कहानी अपनी आवश्यक पृष्ठभूमि साथ लेकर चलती है।
पैंसठ कहानियाँ
हर परिचय-पत्र एक स्वतंत्र कथा पर ले जाता है। कथाएँ सहज विषयगत क्रम में रखी गई हैं, जिसकी दिशा सरल प्रसंगों से गहरे प्रसंगों की ओर जाती है। पाठक किसी भी कथा से आरम्भ कर सकते हैं।
साथ में पढ़ें
- भगवद् गीता कृष्ण का औपचारिक दार्शनिक स्वर।
- योग वासिष्ठ की कथाएँ कथा के माध्यम से ज्ञान की समान पद्धति।
- हनुमान चालीसा भक्ति का सघन रूप और भागवत् कथाओं का सार।
यही कथा वहाँ भी
- शुक की मुक्ति
योग वासिष्ठ: युवा शुक की मुक्ति की खोज