भागवतम् की कथाएँ

भागवतम् की कथाएँ · The Sixty Stories of the Bhagavatam
श्रीमद्भागवत महापुराण · वेदव्यास
श्रीमद्भागवत महापुराण, बारह स्कन्ध, लगभग 18,000 श्लोक। वेदव्यास की रचना, शुकदेव की वाणी से बहती हुई, परीक्षित के जीवन के अन्तिम सात दिनों में सुनाई गई। एक राजा जिसके पास सात दिन बचे थे, और एक प्रश्न: “इस आख़िरी समय में मनुष्य को क्या सुनना चाहिए?”
॥ निगमकल्पतरोर्गलितं फलम् ॥
यह निगम-रूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है। भागवतम् का स्वयं अपने बारे में कहा हुआ वचन।

परिचय

परीक्षित अर्जुन का पोता था। हस्तिनापुर का राजा। एक दिन शिकार पर निकला, थका हुआ। प्यासा। एक ऋषि-आश्रम में पहुँचा। ऋषि ध्यान में थे। उन्होंने आँख नहीं खोली। परीक्षित को क्रोध आ गया, एक मरा हुआ साँप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया, और चला गया। ऋषि के बेटे को यह बात पता चली। उसने शाप दिया, “सात दिन में तक्षक नाग तुझे डँसेगा।”

परीक्षित को जब यह ख़बर मिली, तो वो राज्य के बाहर निकल आया। गंगा किनारे बैठ गया। शुकदेव वहाँ आए, व्यासजी के पुत्र, जो जन्म से ही जागे हुए थे। परीक्षित ने एक सवाल पूछा, “जिस आदमी के पास सात दिन हों, उसे क्या सुनना चाहिए, क्या करना चाहिए?” शुकदेव सात दिन तक भागवतम् सुनाते रहे। आठवें दिन तक्षक आया। पर तब तक राजा जा चुका था, उस जगह पर जहाँ साँप-काटना मायने नहीं रखता।

यह भागवतम् का framing है। एक पूरा शास्त्र, सात दिन में, एक मरते हुए आदमी के लिए। और इसी वजह से इसकी हर पंक्ति में urgency है। कोई बेकार detour नहीं। हर कथा एक ऐसी बात कहती है जो मरने से पहले याद रखने लायक है।

योग वसिष्ठ और भागवतम् में एक खास फ़र्क़ है। वसिष्ठ चेतना के experiments से सिखाता है, “तुम कौन हो?” यह सवाल केन्द्र में है। भागवतम् रिश्तों से सिखाता है, “तुम किसके हो?” यह सवाल केन्द्र में है। दोनों रास्ते एक ही जगह जाते हैं, उसी silence में। पर एक ‘मैं’ को घोलकर, दूसरा ‘मैं’ को ‘तुम्हारा’ बनाकर।

भागवतम् की एक और खास बात यह है कि यह philosophy को महसूस कराता है, सिर्फ़ समझाता नहीं। यशोदा का अपने बच्चे के लिए प्यार, सुदामा का चुपचाप कृष्ण से मिलकर लौट जाना, हाथी का डूबते-डूबते भगवान को पुकारना, इन सब में उतनी ही गहरी philosophy है जितनी कपिल मुनि के सांख्य-शास्त्र में। शायद ज़्यादा।

भागवतम् मूल रूप से एक भक्ति-शास्त्र है, मगर अंदर अद्वैत वेदान्त बैठा है। शुकदेव, जो जन्म से ही मुक्त थे, इस शास्त्र की तरफ़ खिंचे चले आए। ख़ुद भागवतम् कहता है, “आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम्।” वो मुनि जो अपने-आप में संतुष्ट हैं, जिनकी कोई गाँठ नहीं बची, वो भी इस अहैतुकी भक्ति (बिना किसी कारण के प्रेम) की तरफ़ खिंचे आते हैं। यह वो text है जहाँ जिज्ञासा और प्रेम एक ही door से अंदर आते हैं।

यहाँ साठ कहानियाँ हैं, हिन्दी में, रोज़मर्रा की भाषा में। हर एक की अपनी मन्थन-section है। पढ़ने का कोई क्रम ज़रूरी नहीं। जो शीर्षक खींचे, वहीं से शुरू कीजिए।

Background

भागवतम् की रचना का अनुमानित काल ज़्यादातर विद्वान 9वीं से 10वीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं, हालाँकि इसमें इससे पुराना material भी शामिल है। मूल भाषा संस्कृत है। कुल बारह स्कन्ध, 335 अध्याय, लगभग 18,000 श्लोक।

रचना का श्रेय वेदव्यास को दिया जाता है। कथा यह है कि व्यासजी ने महाभारत और बाक़ी सब पुराण पूरे करने के बाद भी एक खालीपन महसूस किया। नारद उनके पास आए और कहा, “आपने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सब लिखा। पर भगवान की लीलाओं का वर्णन ठीक से नहीं किया। यही आपकी अधूरी रचना है।” व्यासजी ने तब भागवतम् लिखा। उन्होंने इसे अपने बेटे शुकदेव को सिखाया, जो खुद जन्मजात मुक्त थे, मगर इसी शास्त्र के लिए कुछ देर इस संसार में रुक गए।

भागवतम् की narrative-layers एक के अंदर एक हैं। सूत गोस्वामी नैमिषारण्य के ऋषियों को सुना रहे हैं। वो वही सुना रहे हैं जो शुकदेव ने परीक्षित को सुनाया। उसके अंदर और भी कई संवाद हैं, कृष्ण-उद्धव, कपिल-देवहूति, नारद-व्यास, जय-विजय की कथा, ध्रुव-नारायण, और कई। हर layer एक ऐसा frame है जो अगले frame को होल्ड करता है।

बारह स्कन्धों को पद्म-पुराण कृष्ण के शरीर के अंग बताता है। पहला स्कन्ध उनके पैर, दूसरा जाँघें, तीसरा नाभि, चौथा छाती, और ऐसे ही ऊपर। दसवाँ स्कन्ध, जिसमें कृष्ण की पूरी लीला है, उनका मुख माना जाता है। बारहवाँ स्कन्ध सिर।

भागवतम् का असर हर भारतीय भाषा में फैला है। कथक, miniature painting, Harikatha, Yakshagana, Kuchipudi, सब इसी पर खड़ा है। यह पहला पुराण भी है जिसका European भाषा में अनुवाद हुआ, 1788 में फ़्रेंच में।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भागवतम् और भगवद् गीता में क्या फ़र्क़ है?

गीता महाभारत का एक हिस्सा है, सिर्फ़ 700 श्लोक, और इसका setting एक युद्ध-मैदान है, जहाँ कृष्ण अर्जुन को कर्तव्य सिखाते हैं। भागवतम् एक स्वतंत्र पुराण है, 18,000 श्लोक, जिसका setting एक मरते हुए राजा का आख़िरी हफ़्ता है। गीता में कृष्ण उपदेशक हैं। भागवतम् में कृष्ण ख़ुद कथा हैं। एक तर्क है, दूसरा प्रेम।

भागवतम् कब लिखा गया?

अधिकांश विद्वान इसकी रचना 9वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी की मानते हैं, हालाँकि कुछ हिस्से इससे काफ़ी पुराने हैं। दक्षिण भारत में इसके सबसे पुराने संदर्भ मिलते हैं, और इसका final form शायद वहीं तय हुआ। पर ध्यान दीजिए, “लिखा जाना” और “रचा जाना” एक नहीं हैं। यह श्रुति-परंपरा में कई पीढ़ियों तक बहता रहा, फिर कलमबद्ध हुआ।

क्या भागवतम् सिर्फ़ वैष्णवों के लिए है?

नहीं। हाँ, इसमें कृष्ण और विष्णु की लीलाओं का विस्तार है, और वैष्णव-परम्परा ने इसे सबसे ज़्यादा अपनाया है। पर भागवतम् ख़ुद अद्वैत, द्वैत, और विशिष्टाद्वैत, तीनों readings को अपने भीतर समा लेता है। शुकदेव, जो इसे सुनाते हैं, ख़ुद एक जीवन्मुक्त अद्वैती थे। शंकराचार्य ने इसके पद उद्धृत किए हैं। यह सम्प्रदाय से ऊपर का text है।

शुकदेव कौन थे और उन्होंने यह कथा क्यों सुनाई?

शुकदेव व्यास के बेटे थे। कथा यह है कि वो माँ के गर्भ में बारह साल रहे, बाहर निकलने से इनकार करते रहे, क्योंकि बाहर माया का स्पर्श था। आख़िर कृष्ण ने ख़ुद आकर वचन दिया कि माया उन्हें छुएगी नहीं। तब वो बाहर आए, और तुरंत जंगल की तरफ़ चले गए। वो जन्म से ही जागे हुए थे। परीक्षित के सात-दिन-शेष राज्य को सुनकर वो खुद चलकर आए, क्योंकि भागवतम् सुनाने का मौक़ा एक मुक्त आत्मा के लिए भी अहैतुकी प्रेम का अवसर है।

बारह स्कन्ध किस क्रम में पढ़ने चाहिए?

पारंपरिक क्रम पहले से बारहवें का है। पर actually, ज़्यादातर पाठक दसवें स्कन्ध से शुरू करते हैं, जिसमें कृष्ण की पूरी लीला है। फिर ग्यारहवाँ स्कन्ध, जिसमें उद्धव-गीता है। फिर वापस पहले की तरफ़, ताकि framing समझ में आए। इन साठ कहानियों में कोई एक क्रम नहीं है, हर कहानी अपने आप में पूरी है।

दसवाँ स्कन्ध सबसे प्रसिद्ध क्यों है?

क्योंकि उसमें कृष्ण-जन्म से लेकर मथुरा जाने तक की पूरी कथा है। पूतना, यशोदा का माखन-चोर बच्चा, गोवर्धन उठाना, रास-लीला, कंस-वध, सब इसी में हैं। यह वो स्कन्ध है जिसके बिना भारत की धार्मिक कल्पना अधूरी है। मीराबाई, सूरदास, चैतन्य, तुलसी, सब इसी से oxygen लेते हैं।

भागवतम् में अद्वैत है या भक्ति?

दोनों, बिना एक-दूसरे को घटाए। भागवतम् में सबसे subtle बात यही है कि वो भक्ति की भाषा में अद्वैत बोलता है। शुकदेव, उद्धव, कपिल, सबकी देशनाएँ अद्वैत-वेदान्त के साथ बैठती हैं। पर presentation भक्ति का है, जहाँ साधक खुद को कृष्ण से अलग रखता है ताकि प्रेम कर सके। आख़िर में दोनों एक ही जगह मिल जाते हैं।

ये साठ कहानियाँ कैसे चुनी गईं?

हर कहानी में तीन चीज़ें होनी चाहिए थीं। एक, एक नाटकीय arc, यानी शुरुआत-मध्य-अंत। दो, एक पात्र जो बदलता है। तीन, एक दार्शनिक बिंदु जो कहानी के बाद भी ठहरा रहे। बहुत सी कथाएँ छूट गईं, खासकर वंश-वर्णन वाली। यह एक curated पाठ है, exhaustive नहीं।

क्या इन कहानियों को बच्चों को सुनाया जा सकता है?

ज़्यादातर हाँ। कृष्ण-लीला वाली कहानियाँ तो बच्चों के लिए ही बनी हैं। प्रह्लाद, ध्रुव, गजेन्द्र, ये सब बच्चों के favourite हैं। कुछ हिस्से, जैसे कि सौभरि-मुनि या इला-सुद्युम्न, थोड़े वयस्क हैं, इन्हें थोड़ी edit के साथ बच्चों को सुनाया जा सकता है। पर पुराने ज़माने में ये कहानियाँ हर age को सुनाई जाती थीं, सब अपनी समझ का हिस्सा निकाल लेते थे।

भागवतम् पढ़ने के लिए कोई पूर्व-ज्ञान ज़रूरी है?

बिल्कुल नहीं। यह text जान-बूझकर ऐसा बनाया गया है कि कोई भी इसे पकड़ सके। हाँ, अगर महाभारत की मुख्य कहानी पता हो, तो कुछ references ज़्यादा resonate करेंगे। पर ज़रूरी नहीं। हर कहानी अपने अंदर अपनी पूरी दुनिया साथ लेकर आती है।

साठ कहानियाँ

हर card एक स्वतंत्र कहानी पर ले जाता है। इनका क्रम मूल भागवतम् के स्कन्ध-क्रम से नहीं है, बल्कि एक ढीले thematic धागे पर है, सुलभ से गहरी की तरफ़। कहीं से भी शुरू कर सकते हैं।

01
गजेन्द्र मोक्ष
हाथी मगरमच्छ के पकड़ में फँसा। हज़ार साल बाद, अपनी ताक़त ख़त्म होने पर पुकारा। भगवान दौड़े आए।
02
सुदामा की यात्रा
ग़रीब ब्राह्मण बचपन के दोस्त कृष्ण से मिलने गया। माँगने की हिम्मत नहीं हुई। चुपचाप लौट आया।
03
ध्रुव की तपस्या
पाँच साल का बच्चा सौतेली माँ के ताने से आहत, जंगल में जाकर तपस्या में बैठ गया।
04
दामोदर लीला
यशोदा माखन-चोर कृष्ण को बाँधने की कोशिश। रस्सी हमेशा दो अंगुल छोटी।
05
कुन्ती की प्रार्थना
माँ कृष्ण से कहती है, “मुझे और कष्ट दो, ताकि तुम्हारा दर्शन होता रहे।”
06
गोवर्धन
इन्द्र की भयानक बारिश। सात साल के कृष्ण ने पर्वत को छोटी उंगली पर उठा लिया।
07
प्रह्लाद का विद्रोह
राक्षस-गुरु शक्ति सिखाते। प्रह्लाद अपने सहपाठियों को भक्ति सिखाने लगा।
08
नृसिंह अवतार
खम्भे से निकले आधे सिंह, आधे मनुष्य। न दिन, न रात। हर शर्त को तोड़ने वाला अवतार।
09
कंस का भय और कृष्ण का जन्म
देवकी-वसुदेव कारागार में। आठवाँ पुत्र। ताले अपने आप खुले, पहरेदार सो गए।
10
पूतना
सुन्दर रूप में आई राक्षसी ने ज़हरीला दूध पिलाया। कृष्ण ने प्राण चूस लिए, पर मातृ-गति दी।
11
भीष्म का अन्तिम उपदेश
बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म, कृष्ण की उपस्थिति में, धर्म की अन्तिम बात कहते हैं।
12
भागवतम् की राम-कथा
पूरी रामायण एक अध्याय में। संक्षिप्त, तीखी, और भक्ति-रस में डूबी।
13
वामन और बलि
तीन पग भूमि माँगने वाला बौना ब्राह्मण, जो दो पग में ब्रह्माण्ड नाप गया।
14
कालिय नाग
यमुना में ज़हरीला नाग। कृष्ण ने उसके फनों पर नृत्य किया।
15
रास लीला
शरद पूर्णिमा की रात। बाँसुरी। गोपियाँ सब छोड़कर आ गईं। हर एक के साथ अलग नृत्य।
16
गोपी गीत
कृष्ण ग़ायब हैं। गोपियाँ पेड़ों से, लताओं से, हिरणों से पूछती हैं। भागवतम् की सबसे गहरी विरह-कविता।
17
समुद्र मन्थन
देवता-राक्षस मिलकर समुद्र मथते। मन्दराचल मथानी, वासुकि रस्सी। पहले विष, फिर अमृत।
18
अजामिल की मुक्ति
पापी ब्राह्मण। मरते वक़्त बेटे को पुकारा, “नारायण!” यमदूत और विष्णुदूत में बहस।
19
कर्दम और देवहूति
ऋषि और राजकुमारी का विवाह। “मैं बच्चे होने तक रुकूँगा, फिर चला जाऊँगा।”
20
कपिल का सांख्य
माँ को बेटा दर्शन सिखाता है। कपिल मुनि अपनी माता देवहूति को मुक्ति का रास्ता बताते हैं।
21
नारद का पूर्वजन्म
दासी का पुत्र जो साधुओं की जूठन खाकर ऋषि बन गया। भक्ति की शुरुआत कहाँ से?
22
व्यास की असन्तुष्टि
सारे वेद-पुराण लिखने के बाद भी मन में खालीपन। नारद कहते हैं, “लीला नहीं लिखी।”
23
परीक्षित और कलि
नए राजा को मिलता है कलियुग, जो धर्म-रूपी बैल की तीन टाँगें तोड़ चुका है।
24
अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र
द्रोण के बेटे ने गर्भ में पल रहे बच्चे पर ब्रह्मास्त्र चलाया। अर्जुन का धर्मसंकट।
25
यमलार्जुन उद्धार
कुबेर के दो बेटे, शाप से वृक्ष बने। रस्सी में बँधे कृष्ण गुज़रे, पेड़ उखड़ गए।
26
ब्रह्मा विमोहन
ब्रह्मा ने सब ग्वालों-गायों को चुरा लिया। कृष्ण ने ख़ुद सबका रूप ले लिया।
27
अक्रूर का दर्शन
रास्ते में यमुना-स्नान करते अक्रूर को पानी के नीचे विष्णु का दर्शन हुआ।
28
कंस-वध
कृष्ण मथुरा पहुँचे। हाथी, पहलवान, और अंत में कंस। राज्य लौटा।
29
रुक्मिणी हरण
रुक्मिणी ने पत्र भेजा, “मुझे ले चलो।” कृष्ण ने स्वयंवर के बीच से उठा लिया।
30
वराह अवतार
पृथ्वी समुद्र में डूब गई। विष्णु ने वराह-रूप लेकर उसे दाँत पर उठाया।
31
हिरण्याक्ष का युद्ध
वराह और हिरण्याक्ष की लड़ाई। हज़ार वर्ष।
32
मत्स्य अवतार
प्रलय आने वाली है। एक छोटी मछली बढ़ती गई, बढ़ती गई।
33
मोहिनी अवतार
अमृत बँटना है। राक्षस झगड़ रहे। विष्णु स्त्री बने। सबकी अक्ल छिन गई।
34
शिव और मोहिनी
शिव ने मोहिनी-रूप माँगा। विष्णु ने दिखाया। महादेव भी विचलित।
35
दक्ष और सती
पिता ने पति का अपमान किया। सती ने यज्ञ-कुण्ड में देह त्यागी। शिव का ताण्डव।
36
राजा वेन और पृथु
दुष्ट राजा। ऋषियों ने मार डाला। जाँघ से पापी, भुजा से पृथु जिन्होंने पृथ्वी को उपजाऊ बनाया।
37
जय-विजय का शाप
वैकुण्ठ के दो द्वारपाल। सनकादि ऋषियों का शाप। तीन जन्म, भगवान के शत्रु रूप में।
38
पुरंजन का रूपक
नौ दरवाज़ों वाला नगर। एक राजा। पूरी कहानी शरीर और आत्मा का allegory।
39
प्रचेतागण
दस भाई, दस हज़ार साल समुद्र में तपस्या। बाहर आकर देखा, पेड़ों ने धरती ढक ली।
40
ऋषभदेव का त्याग
राजा नग्न, मल-मूत्र में लिपटे, जड़ पत्थर की तरह। दुनिया पागल समझती है।
41
भरत और हिरण: जड़भरत
संन्यासी राजा। हिरण के बच्चे से मोह। अगला जन्म हिरण। फिर जड़भरत।
42
रहूगण और जड़भरत का संवाद
राजा की पालकी उठाने वाला जड़भरत। राजा ने डाँटा। जो जवाब मिला, उसने राजा बदल दिया।
43
वृत्रासुर, भक्त राक्षस
इन्द्र का सबसे बड़ा शत्रु, युद्ध के बीच प्रार्थना करता, “मुझे मुक्ति नहीं, बस तुम्हारे चरण।”
44
प्रह्लाद की गर्भ-शिक्षा
हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु को नारद ने भक्ति सिखाई। गर्भ में बैठा प्रह्लाद सुन रहा था।
45
प्रह्लाद की प्रार्थना
नृसिंह का क्रोध शान्त नहीं। ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मी, कोई पास नहीं जा पाता। पाँच साल का बच्चा जाता है।
46
अम्बरीष और दुर्वासा
भक्त राजा का व्रत। दुर्वासा का क्रोध। सुदर्शन चक्र पीछे पड़ गया। ब्रह्मा-शिव-विष्णु भी न बचा सके।
47
परशुराम
ब्राह्मण जो क्षत्रिय-संहारक बना। पिता की हत्या का बदला। इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-शून्य किया।
48
ययाति का बुढ़ापा
शाप मिला बुढ़ापा। बेटों से जवानी माँगी। पुरु ने दी। हज़ार साल भोग के बाद ययाति बोले, “इच्छाएँ बढ़ती हैं।”
49
रन्तिदेव की करुणा
अड़तालीस दिन का उपवास। खाना आया, भूखे लोग आते गए। सब दे दिया। अंत में पानी भी।
50
सौभरि मुनि
बारह साल पानी में तपस्या। मछलियों का जोड़ा देखा। इच्छा जागी। पचास राजकुमारियाँ।
51
इला और सुद्युम्न
शिव-पार्वती के वन में जो भी पुरुष जाए, स्त्री बन जाता है। राजा सुद्युम्न की पहचान-यात्रा।
52
स्यमन्तक मणि
एक हीरे की कहानी। चोरी, गलतफ़हमी, और कृष्ण ख़ुद गुफा में जाम्बवान से लड़ने गए।
53
मुचुकुन्द
देवताओं की मदद करते-करते थका राजा। वर माँगा, “मुझे सोने दो।” हज़ारों साल बाद कालयवन ने जगाया।
54
नरकासुर
सोलह हज़ार एक सौ राजकुमारियाँ बन्दी। कृष्ण ने मारा, सबको सम्मान दिया।
55
बाणासुर और अनिरुद्ध
कृष्ण के पोते को बन्दी बनाया गया। कृष्ण आए, सामने शिव खड़े थे। द्वंद्व।
56
कुरु-सभा में विश्वरूप
दुर्योधन ने कृष्ण को बन्दी बनाने की कोशिश की। सभा में विश्वरूप प्रकट हुआ।
57
अवधूत के चौबीस गुरु
नंगा फ़कीर। राजा ने पूछा, “इतनी ख़ुशी कहाँ से?” अजगर, मधुमक्खी, वेश्या, बालक, सब गुरु।
58
उद्धव गीता
कृष्ण जा रहे हैं। अंतिम उपदेश, अंतिम मित्र उद्धव को। भागवतम् की अपनी गीता।
59
यदुवंश का अन्त
कृष्ण का अपना कुल, नशे में आपस में लड़कर नष्ट। मूसल का शाप। यह उनकी ही इच्छा थी।
60
मार्कण्डेय का प्रलय-दर्शन
प्रलय में तैरते ऋषि। कहीं कोई नहीं। फिर एक बरगद की पत्ती पर एक शिशु, हर साँस में ब्रह्माण्ड।