अंग
217
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਕਾਟਿ ਕੀਏ ਨਿਰਵੈਰੇ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਮਨ ਕੀ ਆਸ ਪੂਰਾਈ ਜੀਉ ॥੪॥
ਜਿਨਿ ਨਾਉ ਪਾਇਆ ਸੋ ਧਨਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਇਆ ਸੁ ਸੋਭਾਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਜਿਸੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਤਿਸੁ ਸਭ ਸੁਕਰਣੀ ਜੀਉ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ਜੀਉ ॥੫॥੧॥੧੬੬॥
ਗੁਰ ਮਨ ਕੀ ਆਸ ਪੂਰਾਈ ਜੀਉ ॥੪॥
ਜਿਨਿ ਨਾਉ ਪਾਇਆ ਸੋ ਧਨਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਇਆ ਸੁ ਸੋਭਾਵੰਤਾ ਜੀਉ ॥
ਜਿਸੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਤਿਸੁ ਸਭ ਸੁਕਰਣੀ ਜੀਉ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ਜੀਉ ॥੫॥੧॥੧੬੬॥
भ्रमु भउ काटि कीए निरवैरे जीउ ॥
गुर मन की आस पूराई जीउ ॥४॥
जिनि नाउ पाइआ सो धनवंता जीउ ॥
जिनि प्रभु धिआइआ सु सोभावंता जीउ ॥
जिसु साधू संगति तिसु सभ सुकरणी जीउ ॥
जन नानक सहजि समाई जीउ ॥५॥१॥१६६॥
गुर मन की आस पूराई जीउ ॥४॥
जिनि नाउ पाइआ सो धनवंता जीउ ॥
जिनि प्रभु धिआइआ सु सोभावंता जीउ ॥
जिसु साधू संगति तिसु सभ सुकरणी जीउ ॥
जन नानक सहजि समाई जीउ ॥५॥१॥१६६॥
हिन्दी अर्थ: गुरू (उनके अंदर से माया की) भटकना दूर करके (हरेक किस्म का मलीन) डर दूर कर के उन मनुष्यों को निर्वेर बना देता है। हे गुरू ! तूने ही मेरे मन की भी (सिमरन की) आस पूरी की है। 4। हे दास नानक ! (कह,) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम धन ढूँढ लिया~ वह धनाढ बन गया। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरन किया वह (लोक परलोक में) शोभा वाला हो गया। जिस मनुष्य को गुरू की संगति मिल गई~ उसकी सारी करनी श्रेष्ठ बन गई। उस मनुष्य को आत्मिक अडोलता में लीनता प्राप्त हो गई। 5। 1। 166।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ਮਾਝ ॥
ਆਉ ਹਮਾਰੈ ਰਾਮ ਪਿਆਰੇ ਜੀਉ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਚਿਤਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਸੰਤ ਦੇਉ ਸੰਦੇਸਾ ਪੈ ਚਰਣਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਤਰੀਐ ਜੀਉ ॥੧॥
ਸੰਗਿ ਤੁਮਾਰੈ ਮੈ ਕਰੇ ਅਨੰਦਾ ਜੀਉ ॥
ਵਣਿ ਤਿਣਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੁਖ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ਜੀਉ ॥
ਸੇਜ ਸੁਹਾਵੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਬਿਗਸੰਦਾ ਜੀਉ ॥
ਪੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਲਹੀਐ ਜੀਉ ॥੨॥
ਚਰਣ ਪਖਾਰਿ ਕਰੀ ਨਿਤ ਸੇਵਾ ਜੀਉ ॥
ਪੂਜਾ ਅਰਚਾ ਬੰਦਨ ਦੇਵਾ ਜੀਉ ॥
ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੁ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਲੇਵਾ ਜੀਉ ॥
ਬਿਨਉ ਠਾਕੁਰ ਪਹਿ ਕਹੀਐ ਜੀਉ ॥੩॥
ਇਛ ਪੁੰਨੀ ਮੇਰੀ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿਆ ਜੀਉ ॥
ਦਰਸਨ ਪੇਖਤ ਸਭ ਦੁਖ ਪਰਹਰਿਆ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੇ ਜਪਿ ਤਰਿਆ ਜੀਉ ॥
ਇਹੁ ਅਜਰੁ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਸਹੀਐ ਜੀਉ ॥੪॥੨॥੧੬੭॥
ਆਉ ਹਮਾਰੈ ਰਾਮ ਪਿਆਰੇ ਜੀਉ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਚਿਤਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਸੰਤ ਦੇਉ ਸੰਦੇਸਾ ਪੈ ਚਰਣਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਤਰੀਐ ਜੀਉ ॥੧॥
ਸੰਗਿ ਤੁਮਾਰੈ ਮੈ ਕਰੇ ਅਨੰਦਾ ਜੀਉ ॥
ਵਣਿ ਤਿਣਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੁਖ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ਜੀਉ ॥
ਸੇਜ ਸੁਹਾਵੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਬਿਗਸੰਦਾ ਜੀਉ ॥
ਪੇਖਿ ਦਰਸਨੁ ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਲਹੀਐ ਜੀਉ ॥੨॥
ਚਰਣ ਪਖਾਰਿ ਕਰੀ ਨਿਤ ਸੇਵਾ ਜੀਉ ॥
ਪੂਜਾ ਅਰਚਾ ਬੰਦਨ ਦੇਵਾ ਜੀਉ ॥
ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੁ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਲੇਵਾ ਜੀਉ ॥
ਬਿਨਉ ਠਾਕੁਰ ਪਹਿ ਕਹੀਐ ਜੀਉ ॥੩॥
ਇਛ ਪੁੰਨੀ ਮੇਰੀ ਮਨੁ ਤਨੁ ਹਰਿਆ ਜੀਉ ॥
ਦਰਸਨ ਪੇਖਤ ਸਭ ਦੁਖ ਪਰਹਰਿਆ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੇ ਜਪਿ ਤਰਿਆ ਜੀਉ ॥
ਇਹੁ ਅਜਰੁ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਸਹੀਐ ਜੀਉ ॥੪॥੨॥੧੬੭॥
गउड़ी महला ५ माझ ॥
आउ हमारै राम पिआरे जीउ ॥
रैणि दिनसु सासि सासि चितारे जीउ ॥
संत देउ संदेसा पै चरणारे जीउ ॥
तुधु बिनु कितु बिधि तरीऐ जीउ ॥१॥
संगि तुमारै मै करे अनंदा जीउ ॥
वणि तिणि त्रिभवणि सुख परमानंदा जीउ ॥
सेज सुहावी इहु मनु बिगसंदा जीउ ॥
पेखि दरसनु इहु सुखु लहीऐ जीउ ॥२॥
चरण पखारि करी नित सेवा जीउ ॥
पूजा अरचा बंदन देवा जीउ ॥
दासनि दासु नामु जपि लेवा जीउ ॥
बिनउ ठाकुर पहि कहीऐ जीउ ॥३॥
इछ पुंनी मेरी मनु तनु हरिआ जीउ ॥
दरसन पेखत सभ दुख परहरिआ जीउ ॥
हरि हरि नामु जपे जपि तरिआ जीउ ॥
इहु अजरु नानक सुखु सहीऐ जीउ ॥४॥२॥१६७॥
आउ हमारै राम पिआरे जीउ ॥
रैणि दिनसु सासि सासि चितारे जीउ ॥
संत देउ संदेसा पै चरणारे जीउ ॥
तुधु बिनु कितु बिधि तरीऐ जीउ ॥१॥
संगि तुमारै मै करे अनंदा जीउ ॥
वणि तिणि त्रिभवणि सुख परमानंदा जीउ ॥
सेज सुहावी इहु मनु बिगसंदा जीउ ॥
पेखि दरसनु इहु सुखु लहीऐ जीउ ॥२॥
चरण पखारि करी नित सेवा जीउ ॥
पूजा अरचा बंदन देवा जीउ ॥
दासनि दासु नामु जपि लेवा जीउ ॥
बिनउ ठाकुर पहि कहीऐ जीउ ॥३॥
इछ पुंनी मेरी मनु तनु हरिआ जीउ ॥
दरसन पेखत सभ दुख परहरिआ जीउ ॥
हरि हरि नामु जपे जपि तरिआ जीउ ॥
इहु अजरु नानक सुखु सहीऐ जीउ ॥४॥२॥१६७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ माझ ॥ हे मेरे प्यारे राम जी ! मेरे हृदय घर में आ बस। मैं रात दिन हरेक सांस के साथ तुझे याद करता हूँ। (तेरे) संत जनों के चरणों में पड़ कर मैं (तेरे को) संदेश भेजता हूँ (कि~ हे मेरे प्यारे राम जी !) मैं तेरे बगैर किसी तरह भी (इस संसार समुंद्र को) पार नहीं लांघ सकता। 1। (हे मेरे प्यारे राम जी !) तेरी संगति में रह के मैं आनंद लेता हूँ। सारी बनस्पति में और तीन भवनों वाले संसार में (तुझे देख के) मैं परम सुख परम आनंद (अनुभव करता हूँ)। मेरे हृदय की सेज सुंदर बन गई है~ मेरा ये मन खिल गया है। (हे मेरे प्यारे राम जी !) तेरा दर्शन करके ये (आत्मिक) सुख मिलता है। 2। (हे मेरे राम जी ! मेहर कर~ मैं तेरे संत जनों के) चरण धो के उनकी सदा सेवा करता रहूँ- यही मेरे वास्ते देव-पूजा है~ यही मेरे लिए देवताओं के लिए फूल भेट है और यही देवताओं के आगे नमस्कार है मुझे अपने दासों का दास बना ले जिससे में नाम जप प्राप्त कर सकूं (हे मेरे प्यारे राम जी ! तेरे संत जनों के पास मैं विनती करता हूँ कि) मालिक प्रभू के पास मेरी ये विनती कहना । 3। (हे भाई ! प्यारे राम की किरपा से) मेरी (उससे मिलाप की) अभिलाषा पूरी हो गई है~ मेरा मन आत्मिक जीवन वाला हो गया है~ मेरा शरीर (भाव~ हरेक ज्ञानेंद्रिय) हरा हो गया है~ (प्यारे राम का) दर्शन करके मेरा सारा दुख दूर हो गया है~ प्यारे राम जी का नाम जप जप के मैंने (संसार-समुंद्र को) पार कर लिया है। हे नानक ! (उस प्यारे राम जी का दर्शन करने से) ये एक ऐसा सुख पा लेते हैं जो कभी कम होने वाला नहीं। 4। 2। 167।
ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਸਾਜਨ ਮਨ ਮਿਤ ਪਿਆਰੇ ਜੀਉ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤੇਰਾ ਇਹੁ ਜੀਉ ਭਿ ਵਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਵਿਸਰੁ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਸਦਾ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥
ਜਿਸੁ ਮਿਲਿਐ ਮਨੁ ਜੀਵੈ ਭਾਈ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸੋ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਈ ਜੀਉ ॥
ਸਭ ਕਿਛੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਪ੍ਰਭ ਕੀਆ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥੨॥
ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ਜਪੈ ਵਡਭਾਗੀ ਜੀਉ ॥
ਨਾਮ ਨਿਰੰਜਨ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਮਿਟਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ਜੀਉ ॥੩॥
ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਜੀਉ ॥
ਤੂੰ ਸਚਾ ਸਾਹੁ ਭਗਤੁ ਵਣਜਾਰਾ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ਜੀਉ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਾ ਜੀਉ ॥੪॥੩॥੧੬੮॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਸਾਜਨ ਮਨ ਮਿਤ ਪਿਆਰੇ ਜੀਉ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤੇਰਾ ਇਹੁ ਜੀਉ ਭਿ ਵਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਵਿਸਰੁ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੇ ਜੀਉ ॥
ਸਦਾ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥
ਜਿਸੁ ਮਿਲਿਐ ਮਨੁ ਜੀਵੈ ਭਾਈ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸੋ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਈ ਜੀਉ ॥
ਸਭ ਕਿਛੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਪ੍ਰਭ ਕੀਆ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥੨॥
ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ਜਪੈ ਵਡਭਾਗੀ ਜੀਉ ॥
ਨਾਮ ਨਿਰੰਜਨ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਮਿਟਾਇਆ ਜੀਉ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ਜੀਉ ॥੩॥
ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਜੀਉ ॥
ਤੂੰ ਸਚਾ ਸਾਹੁ ਭਗਤੁ ਵਣਜਾਰਾ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ਜੀਉ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਾ ਜੀਉ ॥੪॥੩॥੧੬੮॥
गउड़ी माझ महला ५ ॥
सुणि सुणि साजन मन मित पिआरे जीउ ॥
मनु तनु तेरा इहु जीउ भि वारे जीउ ॥
विसरु नाही प्रभ प्राण अधारे जीउ ॥
सदा तेरी सरणाई जीउ ॥१॥
जिसु मिलिऐ मनु जीवै भाई जीउ ॥
गुर परसादी सो हरि हरि पाई जीउ ॥
सभ किछु प्रभ का प्रभ कीआ जाई जीउ ॥
प्रभ कउ सद बलि जाई जीउ ॥२॥
एहु निधानु जपै वडभागी जीउ ॥
नाम निरंजन एक लिव लागी जीउ ॥
गुरु पूरा पाइआ सभु दुखु मिटाइआ जीउ ॥
आठ पहर गुण गाइआ जीउ ॥३॥
रतन पदारथ हरि नामु तुमारा जीउ ॥
तूं सचा साहु भगतु वणजारा जीउ ॥
हरि धनु रासि सचु वापारा जीउ ॥
जन नानक सद बलिहारा जीउ ॥४॥३॥१६८॥
सुणि सुणि साजन मन मित पिआरे जीउ ॥
मनु तनु तेरा इहु जीउ भि वारे जीउ ॥
विसरु नाही प्रभ प्राण अधारे जीउ ॥
सदा तेरी सरणाई जीउ ॥१॥
जिसु मिलिऐ मनु जीवै भाई जीउ ॥
गुर परसादी सो हरि हरि पाई जीउ ॥
सभ किछु प्रभ का प्रभ कीआ जाई जीउ ॥
प्रभ कउ सद बलि जाई जीउ ॥२॥
एहु निधानु जपै वडभागी जीउ ॥
नाम निरंजन एक लिव लागी जीउ ॥
गुरु पूरा पाइआ सभु दुखु मिटाइआ जीउ ॥
आठ पहर गुण गाइआ जीउ ॥३॥
रतन पदारथ हरि नामु तुमारा जीउ ॥
तूं सचा साहु भगतु वणजारा जीउ ॥
हरि धनु रासि सचु वापारा जीउ ॥
जन नानक सद बलिहारा जीउ ॥४॥३॥१६८॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ माझ ॥ हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू ! हे मेरे मन के मित्र प्रभू ! (मेरी विनती) ध्यान से सुन। (मेरा ये) मन तेरा दिया हुआ है~ मेरी ये जीवात्मा भी तेरी ही दी हुई है। मैं (ये सब कुछ तुझ पर से) कुर्बान करता हूँ। मुझे भूलना नहीं~ हे मेरी जिंद के आसरे प्रभू ! मैं सदा तेरी शरण पड़ा रहूँ। 1। हे भाई ! जिस हरी प्रभू को मिलने से आत्मिक जीवन प्राप्त हो जाता है~ वह हरी प्रभू गुरू की किरपा से ही मिल सकता है। (हे भाई ! मेरा मन तन) सब कुछ प्रभू का ही दिया हुआ है~ (जगत की) सभी जगहें प्रभू की ही हैं। मैं सदा उस प्रभू से ही सदके जाता हूँ। 2। (हे भाई ! परमात्मा का) ये (नाम सारे पदार्थों का) खजाना (है~ कोई) भाग्यशाली मनुष्य ही ये नाम जपता है। पवित्र स्वरूप प्रभू के नाम से (उस भाग्यशाली मनुष्य की लगन लग जाती है~ जिस भाग्यशाली मनुष्य को) पूरा गुरू मिल जाता है~ वह हरेक किस्म का दुख दूर कर लेता है~ वह आठों पहर परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। 3। (हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू ! हे हरी ! तेरा नाम कीमती पदार्थों का श्रोत) है। हे हरी ! तू सदा कायम रहने वाला (उन रत्न पदार्थों का) शाहूकार है~ तेरा भक्त उन रत्न पदार्थों का व्यापार करने वाला है। हे हरी ! तेरा नाम-धन (तेरे भक्तों का) सरमाया है~ तेरा भक्त यही सदा स्थिर रहने वाला वणज करता है। हे दास नानक ! (कह, हे हरी !) मैं (तुझसे और तेरे भक्त से) सदा कुर्बान जाता हूँ। 4। 3। 168।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਬਹੁ ਮਾਣੁ ਕਰਤੇ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਬਹੁ ਮਾਣੁ ॥
ਜੋਰਿ ਤੁਮਾਰੈ ਸੁਖਿ ਵਸਾ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੇ ਗਲਾ ਜਾਤੀਆ ਸੁਣਿ ਕੈ ਚੁਪ ਕੀਆ ॥
ਕਦ ਹੀ ਸੁਰਤਿ ਨ ਲਧੀਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੜਿਆ ॥੧॥
ਦੇਇ ਬੁਝਾਰਤ ਸਾਰਤਾ ਸੇ ਅਖੀ ਡਿਠੜਿਆ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਬਹੁ ਮਾਣੁ ਕਰਤੇ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਬਹੁ ਮਾਣੁ ॥
ਜੋਰਿ ਤੁਮਾਰੈ ਸੁਖਿ ਵਸਾ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੇ ਗਲਾ ਜਾਤੀਆ ਸੁਣਿ ਕੈ ਚੁਪ ਕੀਆ ॥
ਕਦ ਹੀ ਸੁਰਤਿ ਨ ਲਧੀਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੜਿਆ ॥੧॥
ਦੇਇ ਬੁਝਾਰਤ ਸਾਰਤਾ ਸੇ ਅਖੀ ਡਿਠੜਿਆ ॥
रागु गउड़ी माझ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥
जोरि तुमारै सुखि वसा सचु सबदु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥
सभे गला जातीआ सुणि कै चुप कीआ ॥
कद ही सुरति न लधीआ माइआ मोहड़िआ ॥१॥
देइ बुझारत सारता से अखी डिठड़िआ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥
जोरि तुमारै सुखि वसा सचु सबदु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥
सभे गला जातीआ सुणि कै चुप कीआ ॥
कद ही सुरति न लधीआ माइआ मोहड़िआ ॥१॥
देइ बुझारत सारता से अखी डिठड़िआ ॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे करतार !तू मेरे वास्ते गर्व वाली जगह है~ तू मेरा मान है। हे करतार ! तेरे बल पर मैं सुखी बसता हूँ~ तेरी सदा स्थिर सिफत सालाह की बाणी (मेरे जीवन सफर में मेरे वास्ते) राहदारी है। 1। रहाउ। हे करतार ! माया में मोहित जीव पदार्थों की सारी बातें सुन के समझता भी है~ फिर भी परवाह नहीं करता~ और कभी भी (परमार्थ की तरफ) ध्यान नहीं देता। 1। अगर कोई गुरमुखि कोई इशारा अथवा संकेत देता भी है (कि यहां सदा स्थिर नहीं रहना~ फिर) ये बातें आँखों से भी देख लेते हैं (कि सब चले जा रहे हैं)
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 217 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 217” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 218 →, पीछे का: ← अंग 216।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।