अंग
312
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤਿਸੁ ਅਗੈ ਪਿਛੈ ਢੋਈ ਨਾਹੀ ਗੁਰਸਿਖੀ ਮਨਿ ਵੀਚਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੋ ਮਿਲੇ ਸੇਈ ਜਨ ਉਬਰੇ ਜਿਨ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਸਮਾਰਿਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੇ ਗੁਰਸਿਖ ਪੁਤਹਹੁ ਹਰਿ ਜਪਿਅਹੁ ਹਰਿ ਨਿਸਤਾਰਿਆ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੋ ਮਿਲੇ ਸੇਈ ਜਨ ਉਬਰੇ ਜਿਨ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਸਮਾਰਿਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੇ ਗੁਰਸਿਖ ਪੁਤਹਹੁ ਹਰਿ ਜਪਿਅਹੁ ਹਰਿ ਨਿਸਤਾਰਿਆ ॥੨॥
तिसु अगै पिछै ढोई नाही गुरसिखी मनि वीचारिआ ॥
सतिगुरू नो मिले सेई जन उबरे जिन हिरदै नामु समारिआ ॥
जन नानक के गुरसिख पुतहहु हरि जपिअहु हरि निसतारिआ ॥२॥
सतिगुरू नो मिले सेई जन उबरे जिन हिरदै नामु समारिआ ॥
जन नानक के गुरसिख पुतहहु हरि जपिअहु हरि निसतारिआ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: उसे ना इस लोक में ना ही परलोक में कहीं आसरा मिलता है – सब गुरसिखों ने मन में ये विचार की है। जो मनुष्य सतिगुरू को जा के मिलते हैं। वह (संसार सागर से) बच जाते हैं। क्योंकि वह हृदय में नाम को संभालते हैं। (इसलिए प्रभू के) दास नानक के सिख पुत्रो ! प्रभू का नाम जपो। (क्योंकि) प्रभू (संसार से) पार उतारता है। 2।
ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਹਉਮੈ ਜਗਤੁ ਭੁਲਾਇਆ ਦੁਰਮਤਿ ਬਿਖਿਆ ਬਿਕਾਰ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਨਦਰਿ ਹੋਇ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧ ਅੰਧਿਆਰ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਜਿਸ ਨੋ ਸਬਦਿ ਲਾਏ ਪਿਆਰੁ ॥੩॥
ਹਉਮੈ ਜਗਤੁ ਭੁਲਾਇਆ ਦੁਰਮਤਿ ਬਿਖਿਆ ਬਿਕਾਰ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਨਦਰਿ ਹੋਇ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧ ਅੰਧਿਆਰ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਜਿਸ ਨੋ ਸਬਦਿ ਲਾਏ ਪਿਆਰੁ ॥੩॥
महला ३ ॥
हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥
सतिगुरु मिलै त नदरि होइ मनमुख अंध अंधिआर ॥
नानक आपे मेलि लए जिस नो सबदि लाए पिआरु ॥३॥
हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥
सतिगुरु मिलै त नदरि होइ मनमुख अंध अंधिआर ॥
नानक आपे मेलि लए जिस नो सबदि लाए पिआरु ॥३॥
हिन्दी अर्थ: महला ३॥ अहंकार ने जगत को कुमार्ग पर डाला हुआ है। खोटी मति और माया में (फस के) विकार किए जाता है। जिस मनुष्य को गुरू मिलता है उस पर (प्रभू की मेहर की) नजर होती है। मन के मुरीद मनुष्य नदार अंधे रहते हैं। हे नानक ! हरी जिस मनुष्य में शबद के प्रति प्यार पैदा करता है। उसे हरी खुद ही अपने साथ मिला लेता है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚੇ ਕੀ ਸਿਫਤਿ ਸਲਾਹ ਹੈ ਸੋ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰੁ ਭਿਜੈ ॥
ਜਿਨੀ ਇਕ ਮਨਿ ਇਕੁ ਅਰਾਧਿਆ ਤਿਨ ਕਾ ਕੰਧੁ ਨ ਕਬਹੂ ਛਿਜੈ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਪੁਰਖ ਸਾਬਾਸਿ ਹੈ ਜਿਨ ਸਚੁ ਰਸਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਿਜੈ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਜਿਨ ਮਨਿ ਭਾਵਦਾ ਸੇ ਮਨਿ ਸਚੀ ਦਰਗਹ ਲਿਜੈ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਜਨਮੁ ਸਚਿਆਰੀਆ ਮੁਖ ਉਜਲ ਸਚੁ ਕਰਿਜੈ ॥੨੦॥
ਸਚੁ ਸਚੇ ਕੀ ਸਿਫਤਿ ਸਲਾਹ ਹੈ ਸੋ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰੁ ਭਿਜੈ ॥
ਜਿਨੀ ਇਕ ਮਨਿ ਇਕੁ ਅਰਾਧਿਆ ਤਿਨ ਕਾ ਕੰਧੁ ਨ ਕਬਹੂ ਛਿਜੈ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਪੁਰਖ ਸਾਬਾਸਿ ਹੈ ਜਿਨ ਸਚੁ ਰਸਨਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਿਜੈ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਜਿਨ ਮਨਿ ਭਾਵਦਾ ਸੇ ਮਨਿ ਸਚੀ ਦਰਗਹ ਲਿਜੈ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਜਨਮੁ ਸਚਿਆਰੀਆ ਮੁਖ ਉਜਲ ਸਚੁ ਕਰਿਜੈ ॥੨੦॥
पउड़ी ॥
सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥
जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन का कंधु न कबहू छिजै ॥
धनु धनु पुरख साबासि है जिन सचु रसना अंम्रितु पिजै ॥
सचु सचा जिन मनि भावदा से मनि सची दरगह लिजै ॥
धनु धंनु जनमु सचिआरीआ मुख उजल सचु करिजै ॥२०॥
सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥
जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन का कंधु न कबहू छिजै ॥
धनु धनु पुरख साबासि है जिन सचु रसना अंम्रितु पिजै ॥
सचु सचा जिन मनि भावदा से मनि सची दरगह लिजै ॥
धनु धंनु जनमु सचिआरीआ मुख उजल सचु करिजै ॥२०॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सच्चे प्रभू की (की हुई) सिफत सालाह सदा स्थिर रहने वाली है; (ये सिफत सालाह) वह मनुष्य कर सकता है जिसका हृदय (भी) (सिफत में) भीगा हो। जो मनुष्य एकाग्रचिक्त हो के एक हरी का सिमरन करते हैं। उनका शरीर कभी जर-जर नहीं होता (विकारों में खचित नहीं होता)। वे मनुष्य धन्य हैं। शाबाश है उनको जो जीभ से सच्चा नाम अमृत पीते हैं। जिनके मन को सच्चा हरी सचमुच प्यारा लगता है वह सच्ची दरगाह में सतिकारे जाते हैं। सच के व्यापारियों का मानस जनम सफला है (क्योंकि दरगाह में) वह सुर्खरू किए जाते हैं। 2।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਾਕਤ ਜਾਇ ਨਿਵਹਿ ਗੁਰ ਆਗੈ ਮਨਿ ਖੋਟੇ ਕੂੜਿ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
ਜਾ ਗੁਰੁ ਕਹੈ ਉਠਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਬਹਿ ਜਾਹਿ ਘੁਸਰਿ ਬਗੁਲਾਰੇ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਅੰਦਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਵਰਤੈ ਚੁਣਿ ਕਢੇ ਲਧੋਵਾਰੇ ॥
ਓਇ ਅਗੈ ਪਿਛੈ ਬਹਿ ਮੁਹੁ ਛਪਾਇਨਿ ਨ ਰਲਨੀ ਖੋਟੇਆਰੇ ॥
ਓਨਾ ਦਾ ਭਖੁ ਸੁ ਓਥੈ ਨਾਹੀ ਜਾਇ ਕੂੜੁ ਲਹਨਿ ਭੇਡਾਰੇ ॥
ਜੇ ਸਾਕਤੁ ਨਰੁ ਖਾਵਾਈਐ ਲੋਚੀਐ ਬਿਖੁ ਕਢੈ ਮੁਖਿ ਉਗਲਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਸਾਕਤ ਸੇਤੀ ਸੰਗੁ ਨ ਕਰੀਅਹੁ ਓਇ ਮਾਰੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰੇ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਇਹੁ ਖੇਲੁ ਸੋਈ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਰੇ ॥੧॥
ਸਾਕਤ ਜਾਇ ਨਿਵਹਿ ਗੁਰ ਆਗੈ ਮਨਿ ਖੋਟੇ ਕੂੜਿ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
ਜਾ ਗੁਰੁ ਕਹੈ ਉਠਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਬਹਿ ਜਾਹਿ ਘੁਸਰਿ ਬਗੁਲਾਰੇ ॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਅੰਦਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਵਰਤੈ ਚੁਣਿ ਕਢੇ ਲਧੋਵਾਰੇ ॥
ਓਇ ਅਗੈ ਪਿਛੈ ਬਹਿ ਮੁਹੁ ਛਪਾਇਨਿ ਨ ਰਲਨੀ ਖੋਟੇਆਰੇ ॥
ਓਨਾ ਦਾ ਭਖੁ ਸੁ ਓਥੈ ਨਾਹੀ ਜਾਇ ਕੂੜੁ ਲਹਨਿ ਭੇਡਾਰੇ ॥
ਜੇ ਸਾਕਤੁ ਨਰੁ ਖਾਵਾਈਐ ਲੋਚੀਐ ਬਿਖੁ ਕਢੈ ਮੁਖਿ ਉਗਲਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਸਾਕਤ ਸੇਤੀ ਸੰਗੁ ਨ ਕਰੀਅਹੁ ਓਇ ਮਾਰੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰੇ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਇਹੁ ਖੇਲੁ ਸੋਈ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਰੇ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥
जा गुरु कहै उठहु मेरे भाई बहि जाहि घुसरि बगुलारे ॥
गुरसिखा अंदरि सतिगुरु वरतै चुणि कढे लधोवारे ॥
ओइ अगै पिछै बहि मुहु छपाइनि न रलनी खोटेआरे ॥
ओना दा भखु सु ओथै नाही जाइ कूड़ु लहनि भेडारे ॥
जे साकतु नरु खावाईऐ लोचीऐ बिखु कढै मुखि उगलारे ॥
हरि साकत सेती संगु न करीअहु ओइ मारे सिरजणहारे ॥
जिस का इहु खेलु सोई करि वेखै जन नानक नामु समारे ॥१॥
साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥
जा गुरु कहै उठहु मेरे भाई बहि जाहि घुसरि बगुलारे ॥
गुरसिखा अंदरि सतिगुरु वरतै चुणि कढे लधोवारे ॥
ओइ अगै पिछै बहि मुहु छपाइनि न रलनी खोटेआरे ॥
ओना दा भखु सु ओथै नाही जाइ कूड़ु लहनि भेडारे ॥
जे साकतु नरु खावाईऐ लोचीऐ बिखु कढै मुखि उगलारे ॥
हरि साकत सेती संगु न करीअहु ओइ मारे सिरजणहारे ॥
जिस का इहु खेलु सोई करि वेखै जन नानक नामु समारे ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ अगर साकत मनुष्य सतिगुरू के आगे जा के झुक भी जाएं। (तो भी) उनके मन में खोट (रहता है) और खोट होने के कारण झूठ के व्यापारी बने रहते हैं। जब सतिगुरू (सब सिखों को) कहता है – ‘हे मेरे भाईयो ! सचेत हो जाओ !’ (तो ये साकत भी) बगुलों की तरह (सिखों में) मिल के बैठ जाते हैं। (पर साकतों के हृदय में झूठ बसता है) और गुरसिखों के दिल में सतिगुरू बसता है। (इस करके सिखों में मिल के बैठे हुए भी साकत) परख के समय चुन के निकाल दिए जाते हैं। वे आगे-पीछे हो के मुँह तो बहुत छुपाते हैं। पर झूठ के व्यापारी (सिखों में) मिल नहीं सकते। साकतों का खाना वहाँ (गुरसिखों के संग में) नहीं होता। (इस वास्ते) भेड़ों की तरह (किसी और जगह) जा के झूठ को तलाशते हैं। अगर साकत मनुष्य को (नाम-रूपी) बढ़िया पदार्थ खिलाना भी चाहें तो भी वह मुँह से (निंदा-रूपी) विष ही उगलता है। (हे संत जनों !) ईश्वर से टूटे हुए का संग ना करना। (क्योंकि) सृजनहार ने स्वयं उनको (नाम से) मुर्दा किया हुआ है। (उन्हें सीधे राह पर लाना किसी जीव के वश नहीं)। जिस प्रभू का ये खेल है वह खुद इस खेल को रच के देख रहा है। हे दास नानक ! तू प्रभू का नाम संभाल। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਅਗੰਮੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਹਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੋ ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕਈ ਜਿਸੁ ਵਲਿ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਕਾ ਖੜਗੁ ਸੰਜੋਉ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਹੈ ਜਿਤੁ ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਵਿਡਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਕਾ ਰਖਣਹਾਰਾ ਹਰਿ ਆਪਿ ਹੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੈ ਪਿਛੈ ਹਰਿ ਸਭਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਜੋ ਮੰਦਾ ਚਿਤਵੈ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕਾ ਸੋ ਆਪਿ ਉਪਾਵਣਹਾਰੈ ਮਾਰਿਆ ॥
ਏਹ ਗਲ ਹੋਵੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸਚੇ ਕੀ ਜਨ ਨਾਨਕ ਅਗਮੁ ਵੀਚਾਰਿਆ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਅਗੰਮੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਹਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੋ ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕਈ ਜਿਸੁ ਵਲਿ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਕਾ ਖੜਗੁ ਸੰਜੋਉ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਹੈ ਜਿਤੁ ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਵਿਡਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਕਾ ਰਖਣਹਾਰਾ ਹਰਿ ਆਪਿ ਹੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੈ ਪਿਛੈ ਹਰਿ ਸਭਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਜੋ ਮੰਦਾ ਚਿਤਵੈ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕਾ ਸੋ ਆਪਿ ਉਪਾਵਣਹਾਰੈ ਮਾਰਿਆ ॥
ਏਹ ਗਲ ਹੋਵੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸਚੇ ਕੀ ਜਨ ਨਾਨਕ ਅਗਮੁ ਵੀਚਾਰਿਆ ॥੨॥
मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु अगंमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥
सतिगुरू नो अपड़ि कोइ न सकई जिसु वलि सिरजणहारिआ ॥
सतिगुरू का खड़गु संजोउ हरि भगति है जितु कालु कंटकु मारि विडारिआ ॥
सतिगुरू का रखणहारा हरि आपि है सतिगुरू कै पिछै हरि सभि उबारिआ ॥
जो मंदा चितवै पूरे सतिगुरू का सो आपि उपावणहारै मारिआ ॥
एह गल होवै हरि दरगह सचे की जन नानक अगमु वीचारिआ ॥२॥
सतिगुरु पुरखु अगंमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥
सतिगुरू नो अपड़ि कोइ न सकई जिसु वलि सिरजणहारिआ ॥
सतिगुरू का खड़गु संजोउ हरि भगति है जितु कालु कंटकु मारि विडारिआ ॥
सतिगुरू का रखणहारा हरि आपि है सतिगुरू कै पिछै हरि सभि उबारिआ ॥
जो मंदा चितवै पूरे सतिगुरू का सो आपि उपावणहारै मारिआ ॥
एह गल होवै हरि दरगह सचे की जन नानक अगमु वीचारिआ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ सतिगुरू अगम पुरख है जिसने हृदय में प्रभू को परोया हुआ है। सतिगुरू की बराबरी कोई नहीं कर सकता। क्योंकि सृजनहार उसीकी ओर है। सतिगुरू की खड़ग और संजोअ प्रभू की भक्ति है जिससे उसने काल (-रूपी) काँटे को (भाव मौत के डर को) मार के किनारे फेंका है। सतिगुरू का रक्षक प्रभू स्वयं है और सतिगुरू के पद्चिन्हों पर चलने वाले सभी को भी प्रभू बचा लेता है। जो मनुष्य पूरे सतिगुरू का बुरा लोचता है उसे खुद करतार मारता है। सच्चे हरी की दरगाह में ये न्याय होता है। और हे नानक ! अगम हरी का सिमरन करने से (ये समझ पड़ती है)। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਚੁ ਸੁਤਿਆ ਜਿਨੀ ਅਰਾਧਿਆ ਜਾ ਉਠੇ ਤਾ ਸਚੁ ਚਵੇ ॥
ਸੇ ਵਿਰਲੇ ਜੁਗ ਮਹਿ ਜਾਣੀਅਹਿ ਜੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਰਵੇ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਿਨ ਕਉ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੁ ਲਵੇ ॥
ਜਿਨ ਮਨਿ ਤਨਿ ਸਚਾ ਭਾਵਦਾ ਸੇ ਸਚੀ ਦਰਗਹ ਗਵੇ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਦਾ ਨਵੇ ॥੨੧॥
ਸਚੁ ਸੁਤਿਆ ਜਿਨੀ ਅਰਾਧਿਆ ਜਾ ਉਠੇ ਤਾ ਸਚੁ ਚਵੇ ॥
ਸੇ ਵਿਰਲੇ ਜੁਗ ਮਹਿ ਜਾਣੀਅਹਿ ਜੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਰਵੇ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਿਨ ਕਉ ਜਿ ਅਨਦਿਨੁ ਸਚੁ ਲਵੇ ॥
ਜਿਨ ਮਨਿ ਤਨਿ ਸਚਾ ਭਾਵਦਾ ਸੇ ਸਚੀ ਦਰਗਹ ਗਵੇ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਦਾ ਨਵੇ ॥੨੧॥
पउड़ी ॥
सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥
से विरले जुग महि जाणीअहि जो गुरमुखि सचु रवे ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जि अनदिनु सचु लवे ॥
जिन मनि तनि सचा भावदा से सची दरगह गवे ॥
जनु नानकु बोलै सचु नामु सचु सचा सदा नवे ॥२१॥
सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥
से विरले जुग महि जाणीअहि जो गुरमुखि सचु रवे ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जि अनदिनु सचु लवे ॥
जिन मनि तनि सचा भावदा से सची दरगह गवे ॥
जनु नानकु बोलै सचु नामु सचु सचा सदा नवे ॥२१॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य सोए हुए भी सच्चे हरी को सिमरते हैं और उठ के भी उसी का नाम उचारते हैं। मानस जनम में ऐसे मनुष्य दुर्लभ ही मिलते हैं जो गुरू के सन्मुख रहके इस तरह सच्चे नाम का आनंद लेते हैं। मैं उनके सदके हूँ जो रोज (अर्थात हर समय) सच्चे प्रभू का नाम उच्चारते हैं। जिन मनुष्यों को मन से और तन से सच्चा प्रभू प्यारा लगता है (भाव। जिनको हरी की याद भी और हरी की कार भी प्यारी लगती है) वह सच्ची दरगाह में पहुँचते हैं। दास नानक भी उस हरी का नाम उचारता है। जो सदा स्थिर रहने वाला है (भाव। हर समय प्यारा लगने वाला है)। 21।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੪ ॥
ਕਿਆ ਸਵਣਾ ਕਿਆ ਜਾਗਣਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਕਿਆ ਸਵਣਾ ਕਿਆ ਜਾਗਣਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥
सलोकु मः ४ ॥
किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥
किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४ ॥ सोना क्या और जागना क्या, जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हैं उनके लिए ये दोनों हालात एक जैसे हैं – कि
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 312 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 312” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 313 →, पीछे का: ← अंग 311।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।