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मृत्यु और उसके पार

मृत्यु हमारे हर प्रश्न में सबसे शान्त और सबसे गहरा है। हम उससे नज़र चुराते हैं, पर वही हमें बताती है कि जीवन में क्या सचमुच अपना है। यह रास्ता उस दरवाज़े के सामने बैठने के लिए है, बिना घबराए, बिना भागे, बस देखते हुए कि वहाँ है क्या।

यहाँ एक बालक यमराज से आमने-सामने प्रश्न करता है, एक राजा को सात दिन में मरने का श्राप मिलता है और वह उन्हीं दिनों में मुक्ति पा लेता है, और एक भक्त मृत्यु के क्षण एक नाम लेकर तर जाता है। हर कथा मृत्यु को अन्त नहीं, एक द्वार मानती है, जिसके उस पार कुछ और शुरू होता है।

क्रम को हमने प्रश्न से शान्ति की ओर रखा है। पहले उपनिषद और गीता उस साक्षी की ओर इशारा करते हैं जो मरता नहीं, फिर कथाएँ हमें उस पार का भरोसा देती हैं, ताकि यह विषय भारी नहीं, हल्का लगने लगे।

  1. कठोपनिषद्
    नचिकेता स्वयं यमराज से यही पूछते हैं कि मृत्यु के बाद क्या बचता है, और उनका निडर प्रश्न ही इस पूरे रास्ते का द्वार है, जहाँ डर की जगह जिज्ञासा ले लेती है।
  2. भगवद्गीता · अध्याय 2: सांख्य योग
    यहीं वह अमर वचन है कि आत्मा न जन्मती है न मरती, और यह अध्याय हमारे भीतर के उस भाग की ओर उँगली रखता है जिसे मृत्यु छू भी नहीं सकती, और वही हमारा असली पता है।
  3. ईशावास्य उपनिषद्
    यह उपनिषद अन्त में एक प्रार्थना पर ठहरता है, कि प्राण जाते समय मन सही मार्ग पर स्थिर रहे, और यही किसी भी जीवन का सबसे कोमल समापन है, एक शान्त विदाई।
  4. यक्ष-प्रश्न · वन पर्व
    यक्ष का सबसे प्रसिद्ध प्रश्न यही है कि सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, और युधिष्ठिर का उत्तर हमारी अपनी उस भूल को पकड़ता है जिसमें हम स्वयं को अमर मान बैठते हैं, रोज़ मरते देखकर भी।
  5. अजामिल की मुक्ति
    अजामिल जीवन भर भटकते हैं, पर अन्तिम क्षण एक नाम उन्हें तार देता है, और यह कथा बताती है कि करुणा किसी की सबसे अँधेरी घड़ी में भी दरवाज़ा खुला रखती है।
  6. परीक्षित् की परमगति
    पूरा भागवत एक मरते हुए राजा को सुनाया गया है, और परीक्षित की सात दिन की तैयारी हमें दिखाती है कि मृत्यु का ज्ञान होने पर जीवन कैसे सघन और साफ़ हो जाता है।
  7. महाभारत · स्वर्ग-नरक की परीक्षा और अन्तिम मिलन
    यात्रा के अन्त में युधिष्ठिर को स्वर्ग और नरक दोनों दिखाए जाते हैं, और यह पन्ना उस पार के भ्रम और सत्य को अलग करके एक शान्त विश्राम पर छोड़ जाता है।

इस रास्ते को शोक में नहीं, ठहराव में पढ़िए। मृत्यु को समझ लेना जीवन से भागना नहीं, उसे और गहराई से जीना है, क्योंकि जो अन्त को देख लेता है वही हर पल को पूरा जीता है।