अंग
226
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਰ ਘਰਿ ਚੀਤੁ ਮਨਮੁਖਿ ਡੋਲਾਇ ॥
ਗਲਿ ਜੇਵਰੀ ਧੰਧੈ ਲਪਟਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਛੂਟਸਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੫॥
ਜਿਉ ਤਨੁ ਬਿਧਵਾ ਪਰ ਕਉ ਦੇਈ ॥
ਕਾਮਿ ਦਾਮਿ ਚਿਤੁ ਪਰ ਵਸਿ ਸੇਈ ॥
ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਕਬਹੂੰ ਹੋਈ ॥੬॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੋਥੀ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਪਾਠਾ ॥ ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਪੜੈ ਸੁਣਿ ਥਾਟਾ ॥
ਬਿਨੁ ਰਸ ਰਾਤੇ ਮਨੁ ਬਹੁ ਨਾਟਾ ॥੭॥
ਜਿਉ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਜਲ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਸਾ ॥
ਜਿਉ ਮੀਨਾ ਜਲ ਮਾਹਿ ਉਲਾਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸਾ ॥੮॥੧੧॥
ਗਲਿ ਜੇਵਰੀ ਧੰਧੈ ਲਪਟਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਛੂਟਸਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੫॥
ਜਿਉ ਤਨੁ ਬਿਧਵਾ ਪਰ ਕਉ ਦੇਈ ॥
ਕਾਮਿ ਦਾਮਿ ਚਿਤੁ ਪਰ ਵਸਿ ਸੇਈ ॥
ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਕਬਹੂੰ ਹੋਈ ॥੬॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੋਥੀ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਪਾਠਾ ॥ ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਪੜੈ ਸੁਣਿ ਥਾਟਾ ॥
ਬਿਨੁ ਰਸ ਰਾਤੇ ਮਨੁ ਬਹੁ ਨਾਟਾ ॥੭॥
ਜਿਉ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਜਲ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਸਾ ॥
ਜਿਉ ਮੀਨਾ ਜਲ ਮਾਹਿ ਉਲਾਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸਾ ॥੮॥੧੧॥
पर घरि चीतु मनमुखि डोलाइ ॥
गलि जेवरी धंधै लपटाइ ॥
गुरमुखि छूटसि हरि गुण गाइ ॥५॥
जिउ तनु बिधवा पर कउ देई ॥
कामि दामि चितु पर वसि सेई ॥
बिनु पिर त्रिपति न कबहूं होई ॥६॥
पड़ि पड़ि पोथी सिंम्रिति पाठा ॥ बेद पुराण पड़ै सुणि थाटा ॥
बिनु रस राते मनु बहु नाटा ॥७॥
जिउ चात्रिक जल प्रेम पिआसा ॥
जिउ मीना जल माहि उलासा ॥
नानक हरि रसु पी त्रिपतासा ॥८॥११॥
गलि जेवरी धंधै लपटाइ ॥
गुरमुखि छूटसि हरि गुण गाइ ॥५॥
जिउ तनु बिधवा पर कउ देई ॥
कामि दामि चितु पर वसि सेई ॥
बिनु पिर त्रिपति न कबहूं होई ॥६॥
पड़ि पड़ि पोथी सिंम्रिति पाठा ॥ बेद पुराण पड़ै सुणि थाटा ॥
बिनु रस राते मनु बहु नाटा ॥७॥
जिउ चात्रिक जल प्रेम पिआसा ॥
जिउ मीना जल माहि उलासा ॥
नानक हरि रसु पी त्रिपतासा ॥८॥११॥
हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पराए घर में अपने चिक्त को डुलाता है (नतीजा ये निकलता है कि विकारों के) जंजाल में वह फंसता है और उसके गले में विकारों की जंजीर (पक्की होती जाती है)। जो मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चलता है~ वह परमात्मा की सिफत सालाह करके इस जंजाल में से बच निकलता है। 5। जैसे विधवा अपना शरीर पराए मनुष्य के हवाले करती है~ काम वासना में (फस के) पैसे (के लालच) में (फस के) वह अपना मन (भी) पराए मनुष्य के वश में करती है~ पर पति के बिना उसे कभी भी शांति नसीब नहीं हो सकती (ऐसे ही पति प्रभू को भुलाने वाली जीव स्त्री अपना आप विकारों के अधीन करती है~ पर पति प्रभू के बिना आत्मिक सुख कभी नहीं मिल सकता)। 6। (विद्वान पंडित) वेद-पुराण-स्मृतियां आदिक धर्म पुस्तकें बारंबार पढ़ता है~ उनकी (काव्य) रचना बार बार सुनता है~ पर जब तक उसका मन परमात्मा के नाम रस का रसिया नहीं बनता~ तब तक (माया के हाथों पर ही) नाच करता है। 7। जैसे पपीहे का (वर्षा-) जल से प्रेम है~ (वर्षा-) जल की उसे प्यास है। जैसे मछली पानी में बहुत प्रसन्न रहती है~ वैसे ही~ हे नानक ! परमात्मा का भगत परमात्मा का नाम-रस पी के तृप्त हो जाता है। 8। 11।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਹਠੁ ਕਰਿ ਮਰੈ ਨ ਲੇਖੈ ਪਾਵੈ ॥
ਵੇਸ ਕਰੈ ਬਹੁ ਭਸਮ ਲਗਾਵੈ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਬਹੁਰਿ ਪਛੁਤਾਵੈ ॥੧॥
ਤੂੰ ਮਨਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੂੰ ਮਨਿ ਸੂਖ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਸਹਹਿ ਜਮ ਦੂਖ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨ ਅਗਰ ਕਪੂਰਿ ॥
ਮਾਇਆ ਮਗਨੁ ਪਰਮ ਪਦੁ ਦੂਰਿ ॥
ਨਾਮਿ ਬਿਸਾਰਿਐ ਸਭੁ ਕੂੜੋ ਕੂਰਿ ॥੨॥
ਨੇਜੇ ਵਾਜੇ ਤਖਤਿ ਸਲਾਮੁ ॥
ਅਧਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਵਿਆਪੈ ਕਾਮੁ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜਾਚੇ ਭਗਤਿ ਨ ਨਾਮੁ ॥੩॥
ਵਾਦਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਮੇਲਾ ॥
ਮਨੁ ਦੇ ਪਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਸੁਹੇਲਾ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਅਗਿਆਨੁ ਦੁਹੇਲਾ ॥੪॥
ਬਿਨੁ ਦਮ ਕੇ ਸਉਦਾ ਨਹੀ ਹਾਟ ॥
ਬਿਨੁ ਬੋਹਿਥ ਸਾਗਰ ਨਹੀ ਵਾਟ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਘਾਟੇ ਘਾਟਿ ॥੫॥
ਤਿਸ ਕਉ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿ ਵਾਟ ਦਿਖਾਵੈ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੬॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਤਿਸ ਕਉ ਜਿਸ ਕਾ ਇਹੁ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਥਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
ਨਾਮ ਵਡਾਈ ਤੁਧੁ ਭਾਣੈ ਦੀਉ ॥੭॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕਿਉ ਜੀਵਾ ਮਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਪਤੁ ਰਹਉ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਪਤਿ ਪਾਇ ॥੮॥੧੨॥
ਹਠੁ ਕਰਿ ਮਰੈ ਨ ਲੇਖੈ ਪਾਵੈ ॥
ਵੇਸ ਕਰੈ ਬਹੁ ਭਸਮ ਲਗਾਵੈ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਬਹੁਰਿ ਪਛੁਤਾਵੈ ॥੧॥
ਤੂੰ ਮਨਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੂੰ ਮਨਿ ਸੂਖ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਸਹਹਿ ਜਮ ਦੂਖ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨ ਅਗਰ ਕਪੂਰਿ ॥
ਮਾਇਆ ਮਗਨੁ ਪਰਮ ਪਦੁ ਦੂਰਿ ॥
ਨਾਮਿ ਬਿਸਾਰਿਐ ਸਭੁ ਕੂੜੋ ਕੂਰਿ ॥੨॥
ਨੇਜੇ ਵਾਜੇ ਤਖਤਿ ਸਲਾਮੁ ॥
ਅਧਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਵਿਆਪੈ ਕਾਮੁ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜਾਚੇ ਭਗਤਿ ਨ ਨਾਮੁ ॥੩॥
ਵਾਦਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਮੇਲਾ ॥
ਮਨੁ ਦੇ ਪਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਸੁਹੇਲਾ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਅਗਿਆਨੁ ਦੁਹੇਲਾ ॥੪॥
ਬਿਨੁ ਦਮ ਕੇ ਸਉਦਾ ਨਹੀ ਹਾਟ ॥
ਬਿਨੁ ਬੋਹਿਥ ਸਾਗਰ ਨਹੀ ਵਾਟ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਘਾਟੇ ਘਾਟਿ ॥੫॥
ਤਿਸ ਕਉ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿ ਵਾਟ ਦਿਖਾਵੈ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੬॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਤਿਸ ਕਉ ਜਿਸ ਕਾ ਇਹੁ ਜੀਉ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਥਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਉ ॥
ਨਾਮ ਵਡਾਈ ਤੁਧੁ ਭਾਣੈ ਦੀਉ ॥੭॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕਿਉ ਜੀਵਾ ਮਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਪਤੁ ਰਹਉ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਪਤਿ ਪਾਇ ॥੮॥੧੨॥
गउड़ी महला १ ॥
हठु करि मरै न लेखै पावै ॥
वेस करै बहु भसम लगावै ॥
नामु बिसारि बहुरि पछुतावै ॥१॥
तूं मनि हरि जीउ तूं मनि सूख ॥
नामु बिसारि सहहि जम दूख ॥१॥ रहाउ ॥
चोआ चंदन अगर कपूरि ॥
माइआ मगनु परम पदु दूरि ॥
नामि बिसारिऐ सभु कूड़ो कूरि ॥२॥
नेजे वाजे तखति सलामु ॥
अधकी त्रिसना विआपै कामु ॥
बिनु हरि जाचे भगति न नामु ॥३॥
वादि अहंकारि नाही प्रभ मेला ॥
मनु दे पावहि नामु सुहेला ॥
दूजै भाइ अगिआनु दुहेला ॥४॥
बिनु दम के सउदा नही हाट ॥
बिनु बोहिथ सागर नही वाट ॥
बिनु गुर सेवे घाटे घाटि ॥५॥
तिस कउ वाहु वाहु जि वाट दिखावै ॥
तिस कउ वाहु वाहु जि सबदु सुणावै ॥
तिस कउ वाहु वाहु जि मेलि मिलावै ॥६॥
वाहु वाहु तिस कउ जिस का इहु जीउ ॥
गुर सबदी मथि अंम्रितु पीउ ॥
नाम वडाई तुधु भाणै दीउ ॥७॥
नाम बिना किउ जीवा माइ ॥
अनदिनु जपतु रहउ तेरी सरणाइ ॥
नानक नामि रते पति पाइ ॥८॥१२॥
हठु करि मरै न लेखै पावै ॥
वेस करै बहु भसम लगावै ॥
नामु बिसारि बहुरि पछुतावै ॥१॥
तूं मनि हरि जीउ तूं मनि सूख ॥
नामु बिसारि सहहि जम दूख ॥१॥ रहाउ ॥
चोआ चंदन अगर कपूरि ॥
माइआ मगनु परम पदु दूरि ॥
नामि बिसारिऐ सभु कूड़ो कूरि ॥२॥
नेजे वाजे तखति सलामु ॥
अधकी त्रिसना विआपै कामु ॥
बिनु हरि जाचे भगति न नामु ॥३॥
वादि अहंकारि नाही प्रभ मेला ॥
मनु दे पावहि नामु सुहेला ॥
दूजै भाइ अगिआनु दुहेला ॥४॥
बिनु दम के सउदा नही हाट ॥
बिनु बोहिथ सागर नही वाट ॥
बिनु गुर सेवे घाटे घाटि ॥५॥
तिस कउ वाहु वाहु जि वाट दिखावै ॥
तिस कउ वाहु वाहु जि सबदु सुणावै ॥
तिस कउ वाहु वाहु जि मेलि मिलावै ॥६॥
वाहु वाहु तिस कउ जिस का इहु जीउ ॥
गुर सबदी मथि अंम्रितु पीउ ॥
नाम वडाई तुधु भाणै दीउ ॥७॥
नाम बिना किउ जीवा माइ ॥
अनदिनु जपतु रहउ तेरी सरणाइ ॥
नानक नामि रते पति पाइ ॥८॥१२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ (अगर कोई मनुष्य मन का हठ करके धूणियां आदि तपा के) शारीरिक मुश्कलें बर्दाश्त करता है~ तो उसका ये कष्ट सहना किसी गिनती में नहीं गिना जाता। अगर कोई मनुष्य (शरीर पर) राख मलता है और (योग आदि के) कई भेस करता है (ये भी व्यर्थ जाते हैं)। परमात्मा का नाम भुला के वह अंत को पछताता है (कि इन उद्यमों में जीवन व्यर्थ गवाया)। 1। (हे भाई !) तू (अपने) मन में प्रभू जी को (बसा ले~ और इस तरह) तू (अपने) मन में (आत्मिक) आनंद (ले)। (याद रख) परमात्मा के नाम को भुला के तू जमों के दुख सहेगा। 1। रहाउ। (दूसरी तरफ अगर कोई मनुष्य) इत्र~ चंदन~ अगर~ कपूर (आदि सुगंधियों के प्रयोग में) मस्त है~ माया के मोह में मस्त है~ तो उच्च आत्मिक अवस्था (उससे भी) दूर है। अगर प्रभू का नाम भुला दिया जाय~ तो ये सारा (दुनिया वाली ऐश भी) व्यर्थ है (सुख नहीं मिलता~ मनुष्य सुख के) व्यर्थ प्रयत्नों में रहता है। 2। (अगर कोई मनुष्य राजा भी बन जाए) तख्त पर (बैठे हुए को) नेजा-बरदार फौजी व बाजे वाले सलामें करें~ तो भी माया की तृष्णा ही बढ़ती है~ काम-वासना जोर डालती है (इनमें आत्मिक सुख नहीं है ! सुख है केवल प्रभू के नाम में भक्ति में)। पर प्रभू के दर से मांगे बिना ना तो भक्ति मिलती है ना ही नाम मिलता है। 3। (विद्या के बल पर धार्मिक पुस्तकों की चर्चा के) झगड़े में (पड़ने से) (व विद्या के) अहंकार में (भी) परमात्मा का मिलाप नहीं होता। (हे भाई !) अपना मन दे के (ही~ अहंकार गवा के ही) सुखों का श्रोत प्रभू नाम प्राप्त करेगा। (प्रभू को बिसार के) और ही प्यार में रहने से दुखद अज्ञान ही बढ़ेगा। 4। जैसे रास पूंजी के बिना दुकान का सौदा नहीं लिया जा सकता~ वैसे ही जहाज के बिना समुंद्र का सफर नहीं हो सकता~ वैसे ही गुरू की शरण पड़े बिना (जीवन सफर में आत्मिक राशि-पूँजी की तरफ से) घाटे ही घाटे में रहना पड़ता है। 5। (हे भाई !) उस पूरे गुरू को धन्य-धन्य कह जो सही जीवन राह दिखाता है~ जो परमात्मा की सिफत सालाह के शबद सुनाता है~ और (इस तरह) जो परमात्मा के मिलाप में मिला देता है। 6। हे भाई ! उस परमात्मा की सिफत सालाह कर जिसकी (दी हुई) ये जिंद है। गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के गुणों को) बार बार विचार के आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस पी। वह प्रभू तुझे अपनी रजा में नाम जपने का बड़प्पन देगा। 7। हे मेरी माँ ! परमात्मा के नाम के बिना मैं (आत्मिक जीवन) जी नहीं सकता। हे प्रभू ! मैं तेरी शरण आया हूँ~ (मेहर कर) मैं दिन रात तेरा ही नाम जपता रहूँ। हे नानक ! अगर प्रभू के नाम-रंग में रंगे रहें~ तभी (लोक-परलोक में) आदर-मान मिलता है। 8। 12।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਹਉਮੈ ਕਰਤ ਭੇਖੀ ਨਹੀ ਜਾਨਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਵਿਰਲੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤ ਨਹੀ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਰਾਜੇ ਬਹੁ ਧਾਵਹਿ ॥
ਹਉਮੈ ਖਪਹਿ ਜਨਮਿ ਮਰਿ ਆਵਹਿ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਨਿਵਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ॥
ਚੰਚਲ ਮਤਿ ਤਿਆਗੈ ਪੰਚ ਸੰਘਾਰੈ ॥੩॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਸਹਜ ਘਰਿ ਆਵਹਿ ॥
ਰਾਜਨੁ ਜਾਣਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ॥੪॥
ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਗੁਰੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਵੈ ॥
ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਵੈ ॥੫॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਿ ਮਰਣਾ ਕਿਆ ਪਾਵੈ ॥
ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਸੋ ਝਗਰੁ ਚੁਕਾਵੈ ॥੬॥
ਜੇਤੀ ਹੈ ਤੇਤੀ ਕਿਹੁ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨ ਭੇਟਿ ਗੁਣ ਗਾਹੀ ॥੭॥
ਹਉਮੈ ਕਰਤ ਭੇਖੀ ਨਹੀ ਜਾਨਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਵਿਰਲੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਤ ਨਹੀ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉਮੈ ਕਰਿ ਰਾਜੇ ਬਹੁ ਧਾਵਹਿ ॥
ਹਉਮੈ ਖਪਹਿ ਜਨਮਿ ਮਰਿ ਆਵਹਿ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਨਿਵਰੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ॥
ਚੰਚਲ ਮਤਿ ਤਿਆਗੈ ਪੰਚ ਸੰਘਾਰੈ ॥੩॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਸਹਜ ਘਰਿ ਆਵਹਿ ॥
ਰਾਜਨੁ ਜਾਣਿ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ॥੪॥
ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਗੁਰੁ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਵੈ ॥
ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਵੈ ॥੫॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਿ ਮਰਣਾ ਕਿਆ ਪਾਵੈ ॥
ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਸੋ ਝਗਰੁ ਚੁਕਾਵੈ ॥੬॥
ਜੇਤੀ ਹੈ ਤੇਤੀ ਕਿਹੁ ਨਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨ ਭੇਟਿ ਗੁਣ ਗਾਹੀ ॥੭॥
गउड़ी महला १ ॥
हउमै करत भेखी नही जानिआ ॥
गुरमुखि भगति विरले मनु मानिआ ॥१॥
हउ हउ करत नही सचु पाईऐ ॥
हउमै जाइ परम पदु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
हउमै करि राजे बहु धावहि ॥
हउमै खपहि जनमि मरि आवहि ॥२॥
हउमै निवरै गुर सबदु वीचारै ॥
चंचल मति तिआगै पंच संघारै ॥३॥
अंतरि साचु सहज घरि आवहि ॥
राजनु जाणि परम गति पावहि ॥४॥
सचु करणी गुरु भरमु चुकावै ॥
निरभउ कै घरि ताड़ी लावै ॥५॥
हउ हउ करि मरणा किआ पावै ॥
पूरा गुरु भेटे सो झगरु चुकावै ॥६॥
जेती है तेती किहु नाही ॥
गुरमुखि गिआन भेटि गुण गाही ॥७॥
हउमै करत भेखी नही जानिआ ॥
गुरमुखि भगति विरले मनु मानिआ ॥१॥
हउ हउ करत नही सचु पाईऐ ॥
हउमै जाइ परम पदु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
हउमै करि राजे बहु धावहि ॥
हउमै खपहि जनमि मरि आवहि ॥२॥
हउमै निवरै गुर सबदु वीचारै ॥
चंचल मति तिआगै पंच संघारै ॥३॥
अंतरि साचु सहज घरि आवहि ॥
राजनु जाणि परम गति पावहि ॥४॥
सचु करणी गुरु भरमु चुकावै ॥
निरभउ कै घरि ताड़ी लावै ॥५॥
हउ हउ करि मरणा किआ पावै ॥
पूरा गुरु भेटे सो झगरु चुकावै ॥६॥
जेती है तेती किहु नाही ॥
गुरमुखि गिआन भेटि गुण गाही ॥७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ (“मैं धर्मी हूँ मैं धर्मी हूँ” ये) मैं मैं करते हुए (निरे) धार्मिक भेष से कभी किसी ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं डाली। गुरू की शरण पड़ कर ही (भाव~ गुरू के आगे स्वैभाव त्याग के ही) परमात्मा की भक्ति में मन रमता है। पर~ ऐसा स्वैभाव त्यागने वाला कोई एक-आध ही होता है। 1। (मैं बड़ा धर्मी हूँ~ मैं बड़ा राजा हूँ~ ऐसी) मैं मैं करते हुए (कभी) सदा कायम रहने वाला परमात्मा मिल नहीं सकता। जब ये अहंकार दूर हो~ तब ही सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर सकते हैं। 1। रहाउ। (‘हम बड़े राजा है”~ इसी) अहंकार के कारण ही राजे एक दूसरे के (देशों पर) कई बार हमले करते रहते हैं अपने बड़प्पन के गुमान में दुखी होते हैं (नतीजा ये निकलता है कि प्रभू की याद भुला के) जनम मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। 2। जो (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू का शबद विचारता है (अपने सोच मण्डल में टिकाता है) उसका अहंकार दूर हो जाता है~ वह (भटकना में डालने वाली अपनी) होछी मति त्यागता है~ और कामादिक पाँचों वैरियों का नाश करता है। 3। जिन लोगों के हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा (बसता) है~ वे अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहते हैं। सारी सृष्टि के मालिक प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल के वे सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल करते हैं। 4। जिस मनुष्य के मन की भटकन गुरू दूर करता है~ सदा स्थिर प्रभू का सिमरन उस का नित्य कर्म बन जाता है~ वह निर्भव प्रभू के चरणों में सदा अपनी सुरति जोड़े रखता है। 5। “हउ हउ~ मैं मैं” के कारण आत्मिक मौत ही मिलती है~ इससे और कोई आत्मिक गुण नहीं मिलता। जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है~ वह अहंकार के इस मसले को अंदर से खत्म कर लेता है। 6। अहंकार के आसरे जितनी भी दौड़ भाग है ये सारी दौड़भाग कोई आत्मिक लाभ नहीं पहुँचाती। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (गुरू से) ज्ञान प्राप्त करके परमात्मा के गुण गाते हैं। 7।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 226 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 226” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 227 →, पीछे का: ← अंग 225।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।