अंग 288

अंग
288
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਰਚਿ ਰਚਨਾ ਅਪਨੀ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥
ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥੮॥੧੮॥
रचि रचना अपनी कल धारी ॥
अनिक बार नानक बलिहारी ॥८॥१८॥

हिन्दी अर्थ: सृष्टि रच के प्रभू ने अपनी सक्ता (इस सृष्टि में) टिकाई है। हे नानक ! (कह) मैं कई बार (ऐसे प्रभू से) सदके हूँ। 8। 18।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸਾਥਿ ਨ ਚਾਲੈ ਬਿਨੁ ਭਜਨ ਬਿਖਿਆ ਸਗਲੀ ਛਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਕਮਾਵਨਾ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਧਨੁ ਸਾਰੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (प्रभू के) भजन के बिना (और कोई चीज मनुष्य के) साथ नहीं जाती। सारी माया (जो मनुष्श् कमाता रहता है। जगत से चलने के वक्त इसके वास्ते) राख के समान है। हे नानक ! अकाल-पुरख का नाम (सिमरन) की कमाई करना ही (सबसे) बढ़िया धन है (यही मनुष्य के साथ निभता है)। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਮਿਲਿ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਏਕੁ ਸਿਮਰਿ ਨਾਮ ਆਧਾਰੁ ॥
ਅਵਰਿ ਉਪਾਵ ਸਭਿ ਮੀਤ ਬਿਸਾਰਹੁ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਰਿਦ ਮਹਿ ਉਰਿ ਧਾਰਹੁ ॥
ਕਰਨ ਕਾਰਨ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਮਰਥੁ ॥
ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਗਹਹੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਵਥੁ ॥
ਇਹੁ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਹੋਵਹੁ ਭਗਵੰਤ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤ ॥
ਏਕ ਆਸ ਰਾਖਹੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਸਰਬ ਰੋਗ ਨਾਨਕ ਮਿਟਿ ਜਾਹਿ ॥੧॥
असटपदी ॥
संत जना मिलि करहु बीचारु ॥
एकु सिमरि नाम आधारु ॥
अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥
चरन कमल रिद महि उरि धारहु ॥
करन कारन सो प्रभु समरथु ॥
द्रिड़ु करि गहहु नामु हरि वथु ॥
इहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥
संत जना का निरमल मंत ॥
एक आस राखहु मन माहि ॥
सरब रोग नानक मिटि जाहि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ संतों से मिल के (प्रभू के गुणों का) विचार करो। एक प्रभू को सिमरो और प्रभू के नाम का आसरा (लो)। हे मित्र ! और सारे उपाय छोड़ दो और प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरण हृदय में टिकाओ। वह प्रभू (सब कुछ खुद) करने (और जीवों से) करवाने की क्षमता रखता है। उस प्रभू का नाम-रूपी (खूबसूरत) पदार्थ अच्छी तरह से संभाल लो। (हे भाई !) (नाम-रूप) ये धन संचित करो और भाग्यशाली बनो। संतों का यही पवित्र उपदेश है। अपने मन में एक (प्रभू की) आस रखो। हे नानक ! (इस प्रकार) सारे रोग मिट जाएंगे। 1।
ਜਿਸੁ ਧਨ ਕਉ ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਉਠਿ ਧਾਵਹਿ ॥
ਸੋ ਧਨੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਤੇ ਪਾਵਹਿ ॥
ਜਿਸੁ ਸੁਖ ਕਉ ਨਿਤ ਬਾਛਹਿ ਮੀਤ ॥
ਸੋ ਸੁਖੁ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਪਰੀਤਿ ॥
ਜਿਸੁ ਸੋਭਾ ਕਉ ਕਰਹਿ ਭਲੀ ਕਰਨੀ ॥
ਸਾ ਸੋਭਾ ਭਜੁ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਨੀ ॥
ਅਨਿਕ ਉਪਾਵੀ ਰੋਗੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਰੋਗੁ ਮਿਟੈ ਹਰਿ ਅਵਖਧੁ ਲਾਇ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਮਹਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਦਰਗਹਿ ਪਰਵਾਨੁ ॥੨॥
जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥
सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥
सो सुखु साधू संगि परीति ॥
जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥
सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
अनिक उपावी रोगु न जाइ ॥
रोगु मिटै हरि अवखधु लाइ ॥
सरब निधान महि हरि नामु निधानु ॥
जपि नानक दरगहि परवानु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: (हे मित्र !) जिस धन की खातिर (तू) चारों तरफ उठ दौड़ता है वह धन प्रभू की सेवा से मिलेगा। हे मित्र ! जिस सुख की तुझे सदा चाहत रहती है। वह सुख संतों की संगति में प्यार करने से (मिलता है)। जिस शोभा के लिए तू नेक कमाई करता है। वह शोभा (कमाने के लिए) तू हरी की शरण पड़। (जो अहंकार का) रोग अनेकों तरीकों से दूर नहीं होता वह रोग प्रभू के नाम-रूपी दवाई के इस्तेमाल से मिट जाता है। सारे (दुनियावी) खजानों में प्रभू का नाम (बढ़िया) खजाना है। हे नानक ! (नाम) जप, दरगाह में कबूल (होगा)। 2।
ਮਨੁ ਪਰਬੋਧਹੁ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਇ ॥
ਦਹ ਦਿਸਿ ਧਾਵਤ ਆਵੈ ਠਾਇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਬਸੈ ਹਰਿ ਸੋਇ ॥
ਕਲਿ ਤਾਤੀ ਠਾਂਢਾ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਦਾ ਸੁਖ ਪਾਉ ॥
ਭਉ ਬਿਨਸੈ ਪੂਰਨ ਹੋਇ ਆਸ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਆਤਮ ਪਰਗਾਸ ॥
ਤਿਤੁ ਘਰਿ ਜਾਇ ਬਸੈ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਾਟੀ ਜਮ ਫਾਸੀ ॥੩॥
मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥
दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
ता कउ बिघनु न लागै कोइ ॥
जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
कलि ताती ठांढा हरि नाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुख पाउ ॥
भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥
भगति भाइ आतम परगास ॥
तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥
कहु नानक काटी जम फासी ॥३॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! अपने) मन को प्रभू के नाम से जगाओ। (नाम की बरकति से) दसों दिशाओं में दौड़ता (ये मन) ठिकाने आ जाता है। उस मनुष्य को कोई मुश्किल नहीं आती। जिसके हृदय में वह प्रभू बसता है। कलियुग गर्म (आग) है (भाव। विकार जीवों को जला रहे हैं) प्रभू का नाम ठंडा है। उसे सदा सिमरो और सुख पाओ। (नाम सिमरने से) डर उड़ जाता है। और आस पूरी हो जाती है (भाव- ना ही मनुष्य आशाएं बाँधता फिरता है ना ही उन आशाओं के टूटने का कोई डर होता है) (क्योंकि) प्रभू की भक्ति से प्यार करके आत्मा चमक जाती है। (जो सिमरता है) उसके (हृदय) घर में अविनाशी प्रभू आ बसता है। हे नानक ! कह (कि नाम जपने से) जमों की फाही कट जाती है। ३।
ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੁ ਕਹੈ ਜਨੁ ਸਾਚਾ ॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਸੋ ਕਾਚੋ ਕਾਚਾ ॥
ਆਵਾ ਗਵਨੁ ਮਿਟੈ ਪ੍ਰਭ ਸੇਵ ॥
ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਸਰਨਿ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਇਉ ਰਤਨ ਜਨਮ ਕਾ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪ੍ਰਾਨ ਆਧਾਰੁ ॥
ਅਨਿਕ ਉਪਾਵ ਨ ਛੂਟਨਹਾਰੇ ॥
ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇ ॥
ਮਨਿ ਬੰਛਤ ਨਾਨਕ ਫਲ ਪਾਇ ॥੪॥
ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥
जनमि मरै सो काचो काचा ॥
आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥
आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥
हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥
अनिक उपाव न छूटनहारे ॥
सिंम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥
मनि बंछत नानक फल पाइ ॥४॥

हिन्दी अर्थ: जा मनुष्य पारब्रहम की सिफति-रूप सोच सोचता है वह सचमुच मनुष्य है। पर जो पैदा हो के (सिर्फ) मर जाता है (और बंदगी नहीं करता) वह बिल्कुल कच्चा है। प्रभू का सिमरन करने से जनम मरन के चक्र समाप्त हो जाते हैं। स्वैभाव त्याग के सतिगुरू की शरण पड़ इस तरह कीमती मानस जन्म सफल हो जाता है (इसलिए। हे भाई !) प्रभू को सिमर (यही) प्राणों का आसरा है। अनेको उपाय करनेसे (आवगवन से) बच नहीं सकते। स्मृतियां-शास्त्र-वेद (आदिक) विचारने से (और ऐसे ही) मन लगा के केवल प्रभू की ही भक्ति करो। (जो भगती करता है) हे नानक ! उसको मन-इच्छित फल मिल जाते हैं। 4।
ਸੰਗਿ ਨ ਚਾਲਸਿ ਤੇਰੈ ਧਨਾ ॥
ਤੂੰ ਕਿਆ ਲਪਟਾਵਹਿ ਮੂਰਖ ਮਨਾ ॥
ਸੁਤ ਮੀਤ ਕੁਟੰਬ ਅਰੁ ਬਨਿਤਾ ॥
ਇਨ ਤੇ ਕਹਹੁ ਤੁਮ ਕਵਨ ਸਨਾਥਾ ॥
ਰਾਜ ਰੰਗ ਮਾਇਆ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਇਨ ਤੇ ਕਹਹੁ ਕਵਨ ਛੁਟਕਾਰ ॥
ਅਸੁ ਹਸਤੀ ਰਥ ਅਸਵਾਰੀ ॥
ਝੂਠਾ ਡੰਫੁ ਝੂਠੁ ਪਾਸਾਰੀ ॥
ਜਿਨਿ ਦੀਏ ਤਿਸੁ ਬੁਝੈ ਨ ਬਿਗਾਨਾ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਨਾਨਕ ਪਛੁਤਾਨਾ ॥੫॥
संगि न चालसि तेरै धना ॥
तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥
इन ते कहहु तुम कवन सनाथा ॥
राज रंग माइआ बिसथार ॥
इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
असु हसती रथ असवारी ॥
झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥
नामु बिसारि नानक पछुताना ॥५॥

हिन्दी अर्थ: हे मूर्ख मन ! धन तेरे साथ नहीं जा सकता। तू क्यों इससे लिपटा बैठा है? पुत्र-मित्र-परिवार व स्त्री इनमें से। बता- कौन तेरा साथ देने वाला है? माया के आडंबर, राज और रंग-रलीयां – बता इनमें से किस के साथ (मोह डालने से) सदा के लिए (माया से) मुक्ति मिल सकती है? घोड़े, हाथी, रथों की सवारी करनी -ये सब झूठा दिखावा है। ये आडंबर रचाने वाला भी बिनसनहार है (विनाशवान है)। मूर्ख मनुष्य उस प्रभू को नहीं पहिचानता जिसने ये सारे पदार्थ दिए हैं। और। नाम को भुला के, हे नानक ! (आखिर) पछताता है। 5।
ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਤੂੰ ਲੇਹਿ ਇਆਨੇ ॥
ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਬਹੁ ਡੂਬੇ ਸਿਆਨੇ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਮਨ ਮੀਤ ॥
ਨਿਰਮਲ ਹੋਇ ਤੁਮੑਾਰੋ ਚੀਤ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਰਾਖਹੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
गुर की मति तूं लेहि इआने ॥
भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
हरि की भगति करहु मन मीत ॥
निरमल होइ तुम॑ारो चीत ॥
चरन कमल राखहु मन माहि ॥

हिन्दी अर्थ: हे अंजान ! सतिगुरू की मति ले (भाव – शिक्षा पर चल) बड़े समझदार-समझदार लोग भी भक्ती के बिना (विकारों में ही) डूब जाते हैं। हे मित्र मन ! प्रभू की भगती कर। इस तरह तेरी सुरति पवित्र होगी। (हे भाई !) प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरण अपने मन में परो के रख।

संदर्भ: यह अंग 288 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 288” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 289 →, पीछे का: ← अंग 287

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।