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अंग 288

अंग
288
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
रचि रचना अपनी कल धारी ॥
अनिक बार नानक बलिहारी ॥8॥18॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सृष्टि रच के प्रभू ने अपनी सक्ता (इस सृष्टि में) टिकाई है। हे नानक ! (कह) मैं कई बार (ऐसे प्रभू से) सदके हूँ। 8। 18।
सलोकु ॥
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (प्रभू के) भजन के बिना (और कोई चीज मनुष्य के) साथ नहीं जाती। सारी माया (जो मनुष्श् कमाता रहता है। जगत से चलने के वक्त इसके वास्ते) राख के समान है। हे नानक ! अकाल-पुरख का नाम (सिमरन) की कमाई करना ही (सबसे) बढ़िया धन है (यही मनुष्य के साथ निभता है)। 1।
असटपदी ॥
संत जना मिलि करहु बीचारु ॥
एकु सिमरि नाम आधारु ॥
अवरि उपाव सभि मीत बिसारहु ॥
चरन कमल रिद महि उरि धारहु ॥
करन कारन सो प्रभु समरथु ॥
द्रिड़ु करि गहहु नामु हरि वथु ॥
इहु धनु संचहु होवहु भगवंत ॥
संत जना का निरमल मंत ॥
एक आस राखहु मन माहि ॥
सरब रोग नानक मिटि जाहि ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ संतों से मिल के (प्रभू के गुणों का) विचार करो। एक प्रभू को सिमरो और प्रभू के नाम का आसरा (लो)। हे मित्र ! और सारे उपाय छोड़ दो और प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरण हृदय में टिकाओ। वह प्रभू (सब कुछ खुद) करने (और जीवों से) करवाने की क्षमता रखता है। उस प्रभू का नाम-रूपी (खूबसूरत) पदार्थ अच्छी तरह से संभाल लो। (हे भाई !) (नाम-रूप) ये धन संचित करो और भाग्यशाली बनो। संतों का यही पवित्र उपदेश है। अपने मन में एक (प्रभू की) आस रखो। हे नानक ! (इस प्रकार) सारे रोग मिट जाएंगे। 1।
जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥
सो धनु हरि सेवा ते पावहि ॥
जिसु सुख कउ नित बाछहि मीत ॥
सो सुखु साधू संगि परीति ॥
जिसु सोभा कउ करहि भली करनी ॥
सा सोभा भजु हरि की सरनी ॥
अनिक उपावी रोगु न जाइ ॥
रोगु मिटै हरि अवखधु लाइ ॥
सरब निधान महि हरि नामु निधानु ॥
जपि नानक दरगहि परवानु ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे मित्र !) जिस धन की खातिर (आप) चारों तरफ उठ दौड़ता है वह धन प्रभू की सेवा से मिलेगा। हे मित्र ! जिस सुख की आपको सदा चाहत रहती है। वह सुख संतों की संगति में प्यार करने से (मिलता है)। जिस शोभा के लिए आप नेक कमाई करता है। वह शोभा (कमाने के लिए) आप हरी की शरण पड़। (जो अहंकार का) रोग अनेकों तरीकों से दूर नहीं होता वह रोग प्रभू के नाम-रूपी दवाई के इस्तेमाल से मिट जाता है। सारे (दुनियावी) खजानों में प्रभू का नाम (बढ़िया) खजाना है। हे नानक ! (नाम) जप, दरगाह में कबूल (होगा)। 2।
मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥
दह दिसि धावत आवै ठाइ ॥
ता कउ बिघनु न लागै कोइ ॥
जा कै रिदै बसै हरि सोइ ॥
कलि ताती ठांढा हरि नाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुख पाउ ॥
भउ बिनसै पूरन होइ आस ॥
भगति भाइ आतम परगास ॥
तितु घरि जाइ बसै अबिनासी ॥
कहु नानक काटी जम फासी ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! अपने) मन को प्रभू के नाम से जगाओ। (नाम की बरकति से) दसों दिशाओं में दौड़ता (ये मन) ठिकाने आ जाता है। उस मनुष्य को कोई मुश्किल नहीं आती। जिसके हृदय में वह प्रभू बसता है। कलियुग गर्म (आग) है (भाव। विकार जीवों को जला रहे हैं) प्रभू का नाम ठंडा है। उसे सदा सिमरो और सुख पाओ। (नाम सिमरने से) डर उड़ जाता है। और आस पूरी हो जाती है (भाव- ना ही मनुष्य आशाएं बाँधता फिरता है ना ही उन आशाओं के टूटने का कोई डर होता है) (क्योंकि) प्रभू की भक्ति से प्यार करके आत्मा चमक जाती है। (जो सिमरता है) उसके (हृदय) घर में अविनाशी प्रभू आ बसता है। हे नानक ! कह (कि नाम जपने से) जमों की फाही कट जाती है। 3।
ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥
जनमि मरै सो काचो काचा ॥
आवा गवनु मिटै प्रभ सेव ॥
आपु तिआगि सरनि गुरदेव ॥
इउ रतन जनम का होइ उधारु ॥
हरि हरि सिमरि प्रान आधारु ॥
अनिक उपाव न छूटनहारे ॥
सिंम्रिति सासत बेद बीचारे ॥
हरि की भगति करहु मनु लाइ ॥
मनि बंछत नानक फल पाइ ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जा मनुष्य पारब्रहम की सिफति-रूप सोच सोचता है वह सचमुच मनुष्य है। पर जो पैदा हो के (सिर्फ) मर जाता है (और बंदगी नहीं करता) वह बिल्कुल कच्चा है। प्रभू का सिमरन करने से जनम मरन के चक्र समाप्त हो जाते हैं। स्वैभाव त्याग के सतिगुरू की शरण पड़ इस तरह कीमती मानस जन्म सफल हो जाता है (इसलिए। हे भाई !) प्रभू को सिमर (यही) प्राणों का आसरा है। अनेको उपाय करनेसे (आवगवन से) बच नहीं सकते। स्मृतियां-शास्त्र-वेद (आदिक) विचारने से (और ऐसे ही) मन लगा के केवल प्रभू की ही भक्ति करो। (जो भगती करता है) हे नानक ! उसको मन-इच्छित फल मिल जाते हैं। 4।
संगि न चालसि तेरै धना ॥
तूं किआ लपटावहि मूरख मना ॥
सुत मीत कुटंब अरु बनिता ॥
इन ते कहहु तुम कवन सनाथा ॥
राज रंग माइआ बिसथार ॥
इन ते कहहु कवन छुटकार ॥
असु हसती रथ असवारी ॥
झूठा डंफु झूठु पासारी ॥
जिनि दीए तिसु बुझै न बिगाना ॥
नामु बिसारि नानक पछुताना ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे मूर्ख मन ! धन आपके साथ नहीं जा सकता। आप क्यों इससे लिपटा बैठा है? पुत्र-मित्र-परिवार व स्त्री इनमें से। बता- कौन आपका साथ देने वाला है? माया के आडंबर, राज और रंग-रलीयां – बता इनमें से किस के साथ (मोह डालने से) सदा के लिए (माया से) मुक्ति मिल सकती है? घोड़े, हाथी, रथों की सवारी करनी -ये सब झूठा दिखावा है। ये आडंबर रचाने वाला भी बिनसनहार है (विनाशवान है)। मूर्ख मनुष्य उस प्रभू को नहीं पहिचानता जिसने ये सारे पदार्थ दिए हैं। और। नाम को भुला के, हे नानक ! (आखिर) पछताता है। 5।
गुर की मति तूं लेहि इआने ॥
भगति बिना बहु डूबे सिआने ॥
हरि की भगति करहु मन मीत ॥
निरमल होइ तुम॑ारो चीत ॥
चरन कमल राखहु मन माहि ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे अंजान ! सतिगुरू की मति ले (भाव – शिक्षा पर चल) बड़े समझदार-समझदार लोग भी भक्ती के बिना (विकारों में ही) डूब जाते हैं। हे मित्र मन ! प्रभू की भगती कर। इस तरह आपकी सुरति पवित्र होगी। (हे भाई !) प्रभू के कमल (जैसे सुंदर) चरण अपने मन में परो के रख।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सृष्टि रच के प्रभू ने अपनी सक्ता (इस सृष्टि में) टिकाई है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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