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भगत कबीर
1398-1518 (परंपरा) · बनारस · 224 शबद + 243 सलोक
लालता-घाट, बनारस। एक जुलाहा मुस्लिम परिवार में जन्मा, हिंदू गुरु रामानंद का शिष्य बना। कबीर ने जान-बूझ कर हर खाँचा तोड़ा, जाति, मज़हब, शास्त्रीय दर्शन। उनका ढंग: "कागद कारे करते-करते किसी ने हरि नहीं पाया।"

दिल्ली के लोग कबीर को ज़्यादातर दोहों से जानते हैं, वो "कबीर साहब के दोहे।" मगर आदि ग्रंथ में 224 शबद और 243 सलोक हैं, बहुत बड़ा संग्रह। गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में संकलन के समय सोच-समझ कर इतना कुछ शामिल किया।
कबीर का स्वर पैना है, कभी व्यंग्य भरा, कभी सीधा और भावुक। उनकी एक पंक्ति: "जो सोता है सो खोता है, जो जागत है वही पावत है।" यह काम के बीच भी जागते रहना है, सिर्फ़ सुबह की नींद का मसला नहीं।
कबीर के बिम्ब
अंगों के पाठ में बार-बार लौटने वाले बिम्ब।










कबीर वाणी आदि ग्रंथ में मुख्यत: इन हिस्सों में:
- कबीर सलोक (समापन वाला हिस्सा)अंग 1364-1377
- कबीर शबद गउड़ी मेंअंग 324-344
- कबीर शबद आसा मेंअंग 475-484
- कबीर शबद भैरों मेंअंग 1158-1167
आदि ग्रंथ में इनके शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।
सिरी राग (2)
गउड़ी (77)
- अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥अंग 323
- माधउ जल की पिआस न जाइ ॥अंग 323
- जब हम एको एकु करि जानिआ ॥अंग 324
- नगन फिरत जौ पाईऐ जोगु ॥अंग 324
- संधिआ प्रात इस्नानु कराही ॥अंग 324
- कबीर जी गउड़ी ॥अंग 324
- गरभ वास महि कुलु नही जाती ॥अंग 324
- अंधकार सुखि कबहि न सोई है ॥अंग 325
- जोति की जाति जाति की जोती ॥अंग 325
- जो जन परमिति परमनु जाना ॥अंग 325
- उपजै निपजै निपजि समाई ॥अंग 325
- अवर मूए किआ सोगु करीजै ॥अंग 325
- असथावर जंगम कीट पतंगा ॥अंग 325
- जिउ जल छोडि बाहरि भइओ मीना ॥अंग 326
- चोआ चंदन मरदन अंगा ॥अंग 326
- जम ते उलटि भए है राम ॥अंग 326
- सबदि अतीति अनाहदि राता ॥अंग 327
- कंचन सिउ पाईऐ नही तोलि ॥अंग 327
- जिह मरनै सभु जगतु तरासिआ ॥अंग 327
- कत नही ठउर मूलु कत लावउ ॥अंग 327
- जा कै हरि सा ठाकुरु भाई ॥अंग 328
- बिनु सत सती होइ कैसे नारि ॥अंग 328
- बिखिआ बिआपिआ सगल संसारु ॥अंग 328
- जिह कुलि पूतु न गिआन बीचारी ॥अंग 328
- जो जन लेहि खसम का नाउ ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥1॥अंग 328
- गगनि रसाल चुऐ मेरी भाठी ॥अंग 328
- मन का सुभाउ मनहि बिआपी ॥अंग 328
- ओइ जु दीसहि अंबरि तारे ॥अंग 329
- बेद की पुत्री सिंम्रिति भाई ॥अंग 329
- देइ मुहार लगामु पहिरावउ ॥अंग 329
- जिह मुखि पांचउ अंम्रित खाए ॥अंग 329
- आपे पावकु आपे पवना ॥अंग 329
- ना मै जोग धिआन चितु लाइआ ॥अंग 329
- जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥अंग 330
- गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥अंग 330
- गउड़ी गुआरेरी ॥अंग 330
- गउड़ी भी सोरठि भी ॥अंग 330
- कउनु को पूतु पिता को का को ॥अंग 331
- अब मो कउ भए राजा राम सहाई ॥अंग 331
- जलि है सूतकु थलि है सूतकु सूतक ओपति होई ॥अंग 331
- झगरा एकु निबेरहु राम ॥अंग 331
- देखौ भाई ग्यान की आई आंधी ॥अंग 331
- हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥अंग 332
- जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥अंग 332
- जीवत मरै मरै फुनि जीवै ऐसे सुंनि समाइआ ॥अंग 332
- उलटत पवन चक्र खटु भेदे सुरति सुंन अनरागी ॥अंग 333
- तह पावस सिंधु धूप नही छहीआ तह उतपति परलउ नाही ॥अंग 333
- पापु पुंनु दुइ बैल बिसाहे पवनु पूजी परगासिओ ॥अंग 333
- गउड़ी पंचपदा ॥अंग 333
- जोगी कहहि जोगु भल मीठा अवरु न दूजा भाई ॥अंग 334
- जह कछु अहा तहा किछु नाही पंच ततु तह नाही ॥अंग 334
- सुरति सिम्रिति दुइ कंनी मुंदा परमिति बाहरि खिंथा ॥अंग 334
- गज नव गज दस गज इकीस पुरीआ एक तनाई ॥अंग 335
- एक जोति एका मिली किंबा होइ महोइ ॥अंग 335
- जेते जतन करत ते डूबे भव सागरु नही तारिओ रे ॥अंग 335
- कालबूत की हसतनी मन बउरा रे चलतु रचिओ जगदीस ॥अंग 335
- अगनि न दहै पवनु नही मगनै तसकरु नेरि न आवै ॥अंग 336
- जिउ कपि के कर मुसटि चनन की लुबधि न तिआगु दइओ ॥अंग 336
- पानी मैला माटी गोरी ॥अंग 336
- राम जपउ जीअ ऐसे ऐसे ॥ ध्रू प्रहिलाद जपिओ हरि जैसे ॥1॥अंग 337
- गउड़ी 9 ॥अंग 337
- गउड़ी पूरबी ॥अंग 337
- रे मन तेरो कोइ नही खिंचि लेइ जिनि भारु ॥अंग 337
- पंथु निहारै कामनी लोचन भरी ले उसासा ॥अंग 337
- आस पास घन तुरसी का बिरवा माझ बना रसि गाऊं रे ॥अंग 338
- गउड़ी पूरबी 12 ॥अंग 338
- गउड़ी 12 ॥अंग 338
- गउड़ी 13 ॥अंग 338
- लख चउरासीह जीअ जोनि महि भ्रमत नंदु बहु थाको रे ॥अंग 338
- निंदउ निंदउ मो कउ लोगु निंदउ ॥अंग 339
- राजा राम तूं ऐसा निरभउ तरन तारन राम राइआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 339
- खट नेम करि कोठड़ी बांधी बसतु अनूपु बीच पाई ॥अंग 339
- माई मोहि अवरु न जानिओ आनानां ॥अंग 339
- बावन अछर लोक त्रै सभु कछु इन ही माहि ॥अंग 340
- पंद्रह थितंी सात वार ॥अंग 343
- अंमावस महि आस निवारहु ॥अंग 343
- बार बार हरि के गुन गावउ ॥अंग 344
आसा (36)
- कवन काजि जगु उपजै बिनसै कहहु मोहि समझाइआ ॥1॥अंग 475
- गज साढे तै तै धोतीआ तिहरे पाइनि तग ॥अंग 476
- बापि दिलासा मेरो कीन॑ा ॥ सेज सुखाली मुखि अंम्रितु दीन॑ा ॥अंग 476
- इकतु पतरि भरि उरकट कुरकट इकतु पतरि भरि पानी ॥अंग 476
- जोगी जती तपी संनिआसी बहु तीरथ भ्रमना ॥अंग 476
- फीलु रबाबी बलदु पखावज कऊआ ताल बजावै ॥अंग 477
- बटूआ एकु बहतरि आधारी एको जिसहि दुआरा ॥अंग 477
- हिंदू तुरक कहा ते आए किनि एह राह चलाई ॥अंग 477
- जब लगु तेलु दीवे मुखि बाती तब सूझै सभु कोई ॥अंग 477
- सनक सनंद अंतु नही पाइआ ॥अंग 478
- बाती सूकी तेलु निखूटा ॥अंग 478
- सुतु अपराध करत है जेते ॥अंग 478
- हज हमारी गोमती तीर ॥अंग 478
- भूली मालनी है एउ ॥अंग 479
- बारह बरस बालपन बीते बीस बरस कछु तपु न कीओ ॥अंग 479
- काहू दीन॑े पाट पटंबर काहू पलघ निवारा ॥अंग 479
- हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राजसु मनि भावै ॥अंग 480
- गगन नगरि इक बूंद न बरखै नादु कहा जु समाना ॥अंग 480
- सरपनी ते ऊपरि नही बलीआ ॥अंग 480
- कहा सुआन कउ सिम्रिति सुनाए ॥अंग 481
- लंका सा कोटु समुंद सी खाई ॥अंग 481
- पहिला पूतु पिछैरी माई ॥अंग 481
- बिंदु ते जिनि पिंडु कीआ अगनि कुंड रहाइआ ॥अंग 481
- तनु रैनी मनु पुन रपि करि हउ पाचउ तत बराती ॥अंग 482
- सासु की दुखी ससुर की पिआरी जेठ के नामि डरउ रे ॥अंग 482
- हम घरि सूतु तनहि नित ताना कंठि जनेऊ तुमारे ॥अंग 482
- जगि जीवनु ऐसा सुपने जैसा जीवनु सुपन समानं ॥अंग 482
- रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥अंग 483
- कीओ सिंगारु मिलन के ताई ॥अंग 483
- हीरै हीरा बेधि पवन मनु सहजे रहिआ समाई ॥अंग 483
- पहिली करूपि कुजाति कुलखनी साहुरै पेईऐ बुरी ॥अंग 483
- मेरी बहुरीआ को धनीआ नाउ ॥अंग 484
- रहु रहु री बहुरीआ घूंघटु जिनि काढै ॥अंग 484
- करवतु भला न करवट तेरी ॥अंग 484
- कोरी को काहू मरमु न जानां ॥अंग 484
- अंतरि मैलु जे तीरथ नावै तिसु बैकुंठ न जानां ॥अंग 484
गूजरी (2)
बिहागड़ा (1)
सोरठ (11)
- बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥अंग 654
- जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥अंग 654
- बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥अंग 654
- दुइ दुइ लोचन पेखा ॥अंग 655
- जा के निगम दूध के ठाटा ॥अंग 655
- जिह बाझु न जीआ जाई ॥अंग 655
- किआ पड़ीऐ किआ गुनीऐ ॥अंग 655
- ह्रिदै कपटु मुख गिआनी ॥अंग 656
- बहु परपंच करि पर धनु लिआवै ॥अंग 656
- संतहु मन पवनै सुखु बनिआ ॥अंग 656
- भूखे भगति न कीजै ॥अंग 656
धनासरी (5)
तिलंग (1)
सूही (5)
बिलावल (12)
- ऐसो इहु संसारु पेखना रहनु न कोऊ पईहै रे ॥अंग 855
- बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥अंग 855
- ग्रिहु तजि बन खंड जाईऐ चुनि खाईऐ कंदा ॥अंग 855
- ताना बाना कछू न सूझै हरि हरि रसि लपटिओ ॥1॥अंग 856
- कोऊ हरि समानि नही राजा ॥अंग 856
- राखि लेहु हम ते बिगरी ॥अंग 856
- दरमादे ठाढे दरबारि ॥अंग 856
- डंडा मुंद्रा खिंथा आधारी ॥अंग 856
- इनि॑ माइआ जगदीस गुसाई तुम॑रे चरन बिसारे ॥अंग 857
- सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥अंग 857
- जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥अंग 857
- चरन कमल जा कै रिदै बसहि सो जनु किउ डोलै देव ॥अंग 857
गोंड (11)
- संतु मिलै किछु सुनीऐ कहीऐ ॥अंग 870
- नरू मरै नरु कामि न आवै ॥अंग 870
- आकासि गगनु पातालि गगनु है चहु दिसि गगनु रहाइले ॥अंग 870
- भुजा बांधि भिला करि डारिओ ॥अंग 870
- ना इहु मानसु ना इहु देउ ॥अंग 871
- तूटे तागे निखुटी पानि ॥अंग 871
- खसमु मरै तउ नारि न रोवै ॥अंग 871
- ग्रिहि सोभा जा कै रे नाहि ॥अंग 872
- जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥अंग 872
- कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥अंग 872
- धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥अंग 873
रामकली (14)
- कबीर महिदी करि कै घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥अंग 947
- कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥अंग 948
- काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥अंग 968
- गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥अंग 969
- तूं मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥अंग 969
- संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥अंग 969
- जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रहमनु बिसरु करै ॥अंग 970
- तरवरु एकु अनंत डार साखा पुहप पत्र रस भरीआ ॥अंग 970
- मुंद्रा मोनि दइआ करि झोली पत्र का करहु बीचारु रे ॥अंग 970
- कवन काज सिरजे जग भीतरि जनमि कवन फलु पाइआ ॥अंग 970
- जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥अंग 971
- बंधचि बंधनु पाइआ ॥अंग 971
- चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥अंग 972
- दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥अंग 972
मारू (12)
- पडीआ कवन कुमति तुम लागे ॥अंग 1102
- बनहि बसे किउ पाईऐ जउ लउ मनहु न तजहि बिकार ॥अंग 1103
- रिधि सिधि जा कउ फुरी तब काहू सिउ किआ काज ॥अंग 1103
- उदक समुंद सलल की साखिआ नदी तरंग समावहिगे ॥अंग 1103
- जउ तुम॑ मो कउ दूरि करत हउ तउ तुम मुकति बतावहु ॥अंग 1104
- जिनि गड़ कोट कीए कंचन के छोडि गइआ सो रावनु ॥1॥अंग 1104
- नैनू नकटू स्रवनू रसपति इंद्री कहिआ न माना ॥1॥अंग 1104
- अनभउ किनै न देखिआ बैरागीअड़े ॥अंग 1104
- राजन कउनु तुमारै आवै ॥अंग 1105
- गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥अंग 1105
- दीनु बिसारिओ रे दिवाने दीनु बिसारिओ रे ॥अंग 1105
- कबीरु ॥ मारू ॥अंग 1106
केदारा (6)
भैरों (13)
- इहु धनु मेरे हरि को नाउ ॥अंग 1157
- नांगे आवनु नांगे जाना ॥अंग 1157
- मैला ब्रहमा मैला इंदु ॥अंग 1158
- मनु करि मका किबला करि देही ॥अंग 1158
- गंगा कै संगि सलिता बिगरी ॥ सो सलिता गंगा होइ निबरी ॥1॥अंग 1158
- माथे तिलकु हथि माला बानां ॥अंग 1158
- उलटि जाति कुल दोऊ बिसारी ॥अंग 1158
- निरधन आदरु कोई न देइ ॥अंग 1159
- गुर सेवा ते भगति कमाई ॥अंग 1159
- सिव की पुरी बसै बुधि सारु ॥अंग 1159
- सो मुलां जो मन सिउ लरै ॥अंग 1159
- अगम द्रुगम गड़ि रचिओ बास ॥अंग 1162
- कोटि सूर जा कै परगास ॥अंग 1162
बसंत (8)
- मउली धरती मउलिआ अकासु ॥अंग 1193
- पंडित जन माते पड़ि॑ पुरान ॥अंग 1193
- जोइ खसमु है जाइआ ॥अंग 1194
- प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥अंग 1194
- इसु तन मन मधे मदन चोर ॥अंग 1194
- नाइकु एकु बनजारे पाच ॥अंग 1194
- माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥अंग 1195
- सुरह की जैसी तेरी चाल ॥अंग 1196
सारंग (3)
- कहा नर गरबसि थोरी बात ॥अंग 1251
- राजास्रम मिति नही जानी तेरी ॥अंग 1252
- हरि बिनु कउनु सहाई मन का ॥अंग 1253
प्रभाती (5)
सलोक और अन्य वाणी (235)
- कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥अंग 1364
- कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥अंग 1364
- सरब सूख को नाइको राम नाम रसु पीउ ॥3॥अंग 1364
- कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥अंग 1364
- कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥अंग 1364
- कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥अंग 1364
- कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥अंग 1364
- कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥अंग 1364
- कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥अंग 1364
- कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥अंग 1364
- कबीर चंदन का बिरवा भला बेड़ि॑ओ ढाक पलास ॥अंग 1365
- कबीर बांसु बडाई बूडिआ इउ मत डूबहु कोइ ॥अंग 1365
- कबीर दीनु गवाइआ दुनी सिउ दुनी न चाली साथि ॥अंग 1365
- कबीर जह जह हउ फिरिओ कउतक ठाओ ठाइ ॥अंग 1365
- कबीर संतन की झुंगीआ भली भठि कुसती गाउ ॥अंग 1365
- कबीर संत मूए किआ रोईऐ जो अपुने ग्रिहि जाइ ॥अंग 1365
- कबीर साकतु ऐसा है जैसी लसन की खानि ॥अंग 1365
- कबीर माइआ डोलनी पवनु झकोलनहारु ॥अंग 1365
- कबीर माइआ डोलनी पवनु वहै हिव धार ॥अंग 1365
- कबीर माइआ चोरटी मुसि मुसि लावै हाटि ॥अंग 1365
- कबीर सूखु न एंह जुगि करहि जु बहुतै मीत ॥अंग 1365
- कबीर जिसु मरने ते जगु डरै मेरे मनि आनंदु ॥अंग 1365
- राम पदारथु पाइ कै कबीरा गांठि न खोल॑ ॥अंग 1365
- कबीर ता सिउ प्रीति करि जा को ठाकुरु रामु ॥अंग 1365
- कबीर प्रीति इक सिउ कीए आन दुबिधा जाइ ॥अंग 1365
- कबीर जगु काजल की कोठरी अंध परे तिस माहि ॥अंग 1365
- कबीर इहु तनु जाइगा सकहु त लेहु बहोरि ॥अंग 1365
- कबीर इहु तनु जाइगा कवनै मारगि लाइ ॥अंग 1365
- कबीर मरता मरता जगु मूआ मरि भी न जानिआ कोइ ॥अंग 1365
- कबीर मानस जनमु दुलंभु है होइ न बारै बार ॥अंग 1366
- कबीरा तुही कबीरु तू तेरो नाउ कबीरु ॥अंग 1366
- कबीर झंखु न झंखीऐ तुमरो कहिओ न होइ ॥अंग 1366
- कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥अंग 1366
- कबीर ऊजल पहिरहि कापरे पान सुपारी खाहि ॥अंग 1366
- कबीर बेड़ा जरजरा फूटे छेंक हजार ॥अंग 1366
- कबीर हाड जरे जिउ लाकरी केस जरे जिउ घासु ॥अंग 1366
- कबीर गरबु न कीजीऐ चाम लपेटे हाड ॥अंग 1366
- कबीर गरबु न कीजीऐ ऊचा देखि अवासु ॥अंग 1366
- कबीर गरबु न कीजीऐ रंकु न हसीऐ कोइ ॥अंग 1366
- कबीर गरबु न कीजीऐ देही देखि सुरंग ॥अंग 1366
- कबीर लूटना है त लूटि लै राम नाम है लूटि ॥अंग 1366
- कबीर ऐसा कोई न जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥अंग 1366
- को है लरिका बेचई लरिकी बेचै कोइ ॥अंग 1366
- कबीर इह चेतावनी मत सहसा रहि जाइ ॥अंग 1366
- कबीर मै जानिओ पड़िबो भलो पड़िबे सिउ भल जोगु ॥अंग 1366
- कबीर लोगु कि निंदै बपुड़ा जिह मनि नाही गिआनु ॥अंग 1366
- कबीर परदेसी कै घाघरै चहु दिसि लागी आगि ॥अंग 1366
- कबीर खिंथा जलि कोइला भई खापरु फूट मफूट ॥अंग 1366
- कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥अंग 1367
- कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥अंग 1367
- कबीर निगुसांएं बहि गए थांघी नाही कोइ ॥अंग 1367
- कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥अंग 1367
- कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥अंग 1367
- कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥अंग 1367
- कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥अंग 1367
- कबीर हरदी पीअरी चूंनां ऊजल भाइ ॥अंग 1367
- कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥अंग 1367
- कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥अंग 1367
- कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥अंग 1367
- कबीर ना मोुहि छानि न छापरी ना मोुहि घरु नही गाउ ॥अंग 1367
- कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥अंग 1367
- कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥अंग 1367
- कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥अंग 1367
- कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओु नाउ ॥अंग 1367
- कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥अंग 1367
- कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥अंग 1367
- कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥अंग 1367
- कबीर पापी भगति न भावई हरि पूजा न सुहाइ ॥अंग 1368
- कबीर बैदु मूआ रोगी मूआ मूआ सभु संसारु ॥अंग 1368
- कबीर रामु न धिआइओ मोटी लागी खोरि ॥अंग 1368
- कबीर ऐसी होइ परी मन को भावतु कीनु ॥अंग 1368
- कबीर रस को गांडो चूसीऐ गुन कउ मरीऐ रोइ ॥अंग 1368
- कबीर गागरि जल भरी आजु कालि॑ जैहै फूटि ॥अंग 1368
- कबीर कूकरु राम को मुतीआ मेरो नाउ ॥अंग 1368
- कबीर जपनी काठ की किआ दिखलावहि लोइ ॥अंग 1368
- कबीर बिरहु भुयंगमु मनि बसै मंतु न मानै कोइ ॥अंग 1368
- कबीर पारस चंदनै तिन॑ है एक सुगंध ॥अंग 1368
- कबीर जम का ठेंगा बुरा है ओहु नही सहिआ जाइ ॥अंग 1368
- कबीर बैदु कहै हउ ही भला दारू मेरै वसि ॥अंग 1368
- कबीर नउबति आपनी दिन दस लेहु बजाइ ॥अंग 1368
- कबीर सात समुंदहि मसु करउ कलम करउ बनराइ ॥अंग 1368
- कबीर जाति जुलाहा किआ करै हिरदै बसे गुपाल ॥अंग 1368
- कबीर ऐसा को नही मंदरु देइ जराइ ॥अंग 1368
- कबीर ऐसा को नही इहु तनु देवै फूकि ॥अंग 1368
- कबीर सती पुकारै चिह चड़ी सुनु हो बीर मसान ॥अंग 1368
- कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥अंग 1369
- कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥अंग 1369
- कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥अंग 1369
- कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥अंग 1369
- कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥अंग 1369
- कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥अंग 1369
- कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥अंग 1369
- कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥अंग 1369
- कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥अंग 1369
- कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥अंग 1369
- कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥अंग 1369
- कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥अंग 1369
- कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥अंग 1369
- कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥अंग 1369
- कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥अंग 1369
- कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥अंग 1369
- कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥अंग 1369
- कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥अंग 1369
- कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥अंग 1369
- कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥अंग 1370
- कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुटंबु ॥अंग 1370
- कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥अंग 1370
- कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥अंग 1370
- कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥अंग 1370
- कबीर सोुई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥अंग 1370
- कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥अंग 1370
- कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥अंग 1370
- कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥अंग 1370
- मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥अंग 1370
- बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥अंग 1370
- कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥अंग 1370
- कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥अंग 1370
- कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥अंग 1370
- कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥अंग 1370
- कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥अंग 1370
- कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥अंग 1370
- कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥अंग 1370
- कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥ जैसे बचरहि कूंज मन माइआ ममता रे ॥123॥अंग 1371
- कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥अंग 1371
- कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥अंग 1371
- कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥अंग 1371
- कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥अंग 1371
- कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥अंग 1371
- कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥अंग 1371
- कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥अंग 1371
- कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥अंग 1371
- कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूंचिओ आइ ॥अंग 1371
- कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥अंग 1371
- कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आंब ॥अंग 1371
- कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥अंग 1371
- कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥अंग 1371
- कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥अंग 1371
- कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥अंग 1371
- कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥अंग 1371
- कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥अंग 1371
- कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥अंग 1371
- कबीर गहगचि परिओ कुटंब कै कांठै रहि गइओ रामु ॥अंग 1372
- कबीर साकत ते सूकर भला राखै आछा गाउ ॥अंग 1372
- कबीर कउडी कउडी जोरि कै जोरे लाख करोरि ॥अंग 1372
- कबीर बैसनो हूआ त किआ भइआ माला मेलीं चारि ॥अंग 1372
- कबीर रोड़ा होइ रहु बाट का तजि मन का अभिमानु ॥अंग 1372
- कबीर रोड़ा हूआ त किआ भइआ पंथी कउ दुखु देइ ॥अंग 1372
- कबीर खेह हूई तउ किआ भइआ जउ उडि लागै अंग ॥अंग 1372
- कबीर पानी हूआ त किआ भइआ सीरा ताता होइ ॥अंग 1372
- ऊच भवन कनकामनी सिखरि धजा फहराइ ॥अंग 1372
- कबीर पाटन ते ऊजरु भला राम भगत जिह ठाइ ॥अंग 1372
- कबीर गंग जमुन के अंतरे सहज सुंन के घाट ॥अंग 1372
- कबीर जैसी उपजी पेड ते जउ तैसी निबहै ओड़ि ॥अंग 1372
- कबीरा एकु अचंभउ देखिओ हीरा हाट बिकाइ ॥अंग 1372
- कबीरा जहा गिआनु तह धरमु है जहा झूठु तह पापु ॥अंग 1372
- कबीर माइआ तजी त किआ भइआ जउ मानु तजिआ नही जाइ ॥अंग 1372
- कबीर साचा सतिगुरु मै मिलिआ सबदु जु बाहिआ एकु ॥अंग 1372
- कबीर साचा सतिगुरु किआ करै जउ सिखा महि चूक ॥अंग 1372
- कबीर है गै बाहन सघन घन छत्रपती की नारि ॥अंग 1372
- कबीर न्रिप नारी किउ निंदीऐ किउ हरि चेरी कउ मानु ॥अंग 1373
- कबीर थूनी पाई थिति भई सतिगुर बंधी धीर ॥अंग 1373
- कबीर हरि हीरा जन जउहरी ले कै मांडै हाट ॥अंग 1373
- कबीर काम परे हरि सिमरीऐ ऐसा सिमरहु नित ॥अंग 1373
- कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥अंग 1373
- कबीर जिह मारगि पंडित गए पाछै परी बहीर ॥अंग 1373
- कबीर दुनीआ के दोखे मूआ चालत कुल की कानि ॥अंग 1373
- कबीर डूबहिगो रे बापुरे बहु लोगन की कानि ॥अंग 1373
- कबीर भली मधूकरी नाना बिधि को नाजु ॥अंग 1373
- कबीर दावै दाझनु होतु है निरदावै रहै निसंक ॥अंग 1373
- कबीर पालि समुहा सरवरु भरा पी न सकै कोई नीरु ॥अंग 1373
- कबीर परभाते तारे खिसहि तिउ इहु खिसै सरीरु ॥अंग 1373
- कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥अंग 1373
- कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥अंग 1373
- कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥अंग 1373
- कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥अंग 1373
- कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥अंग 1373
- कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गइंी सभ भुलि ॥अंग 1373
- कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बांधी देह ॥अंग 1374
- कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥अंग 1374
- जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥अंग 1374
- कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥अंग 1374
- कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥अंग 1374
- कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥अंग 1374
- कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥अंग 1374
- सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥अंग 1374
- कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥अंग 1374
- कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥अंग 1374
- कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अंम्रितु लोनु ॥अंग 1374
- कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥अंग 1374
- कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥अंग 1374
- कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥अंग 1374
- कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥अंग 1374
- कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान ॥अंग 1374
- कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥अंग 1374
- कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥अंग 1374
- कबीर निरमल बूंद अकास की लीनी भूमि मिलाइ ॥अंग 1375
- कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥अंग 1375
- कबीर हज काबै होइ होइ गइआ केती बार कबीर ॥अंग 1375
- कबीर जीअ जु मारहि जोरु करि कहते हहि जु हलालु ॥अंग 1375
- कबीर जोरु कीआ सो जुलमु है लेइ जबाबु खुदाइ ॥अंग 1375
- कबीर लेखा देना सुहेला जउ दिल सूची होइ ॥अंग 1375
- कबीर धरती अरु आकास महि दुइ तूं बरी अबध ॥अंग 1375
- कबीर मेरा मुझ महि किछु नही जो किछु है सो तेरा ॥अंग 1375
- कबीर तूं तूं करता तू हूआ मुझ महि रहा न हूं ॥अंग 1375
- कबीर बिकारह चितवते झूठे करते आस ॥अंग 1375
- कबीर हरि का सिमरनु जो करै सो सुखीआ संसारि ॥अंग 1375
- कबीर घाणी पीड़ते सतिगुर लीए छडाइ ॥अंग 1375
- कबीर टालै टोलै दिनु गइआ बिआजु बढंतउ जाइ ॥अंग 1375
- नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत ॥अंग 1375
- कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥अंग 1376
- कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥अंग 1376
- कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥अंग 1376
- कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥अंग 1376
- कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥अंग 1376
- कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥अंग 1376
- कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥अंग 1376
- कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुंचरु मय मंतु ॥अंग 1376
- कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥अंग 1376
- कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥अंग 1376
- कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥अंग 1376
- छाइआ रूपी साधु है जिनि तजिआ बादु बिबादु ॥228॥अंग 1376
- कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥अंग 1376
- कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥अंग 1376
- कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥अंग 1376
- कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूं ते आध ॥अंग 1377
- कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥अंग 1377
- नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥अंग 1377
- नीचे लोइन किउ करउ सभ घट देखउ पीउ ॥235॥अंग 1377
- कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥अंग 1377
- हरि है खांडु रेतु महि बिखरी हाथी चुनी न जाइ ॥अंग 1377
- कबीर जउ तुहि साध पिरंम की सीसु काटि करि गोइ ॥अंग 1377
- कबीर जउ तुहि साध पिरंम की पाके सेती खेलु ॥अंग 1377
- ढूंढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥अंग 1377
- हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥अंग 1377
- बैरागी बंधनु करै ता को बडो अभागु ॥243॥अंग 1377