Lulla Family

अंग 323

अंग
323
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक लड़ि लाइ उधारिअनु दयु सेवि अमिता ॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! ऐसे बेअंत प्रभू को सिमर। जिसने अपने साथ लगा के (अनेकों जीव) बचाए हैं। 19।
सलोक मः 5 ॥
धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥
नानक सेई तंन फुटंनि जिना सांई विसरै ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ वे कोझे धंधे घाटे वाले हैं जिनके कारण एक परमात्मा चित्त में ना आए। (क्योंकि) हे नानक ! वे शरीर विकारों से गंदे हो जाते हैं जिन्हें मालिक प्रभू भूल जाता है। 1।
मः 5 ॥
परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥
सभे सिख उबारिअनु प्रभि काज सवारे ॥
निंदक पकड़ि पछाड़िअनु झूठे दरबारे ॥
नानक का प्रभु वडा है आपि साजि सवारे ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उस सृजनहार ने (नाम की दाति दे के जीव को) प्रेत से देवते बना दिया है। प्रभू ने स्वयं काज सँवारे हैं और सारे सिख (विकारों से) बचा लिए हैं। झूठे और निंदकों को पकड़ के अपनी हजूरी में उसने (जैसे) पटका के धरती पे दे मारा है। नानक का प्रभू सबसे बड़ा है। उसने जीव पैदा करके खुद ही (‘नाम’ में जोड़ के) सँवार दिए हैं। 2।
पउड़ी ॥
प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥
अगम अगोचरु साहिबो जीआं का परणा ॥
हसत देइ प्रतिपालदा भरण पोखणु करणा ॥
मिहरवानु बखसिंदु आपि जपि सचे तरणा ॥
जो तुधु भावै सो भला नानक दास सरणा ॥20॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ परमात्मा बेअंत है। उसका कोई अंत नहीं पा सकता। सारा जगत उसी ने बनाया है। वह मालिक अपहुँच है। जीवों की इंद्रियों की पहुँच से परे है। सब जीवों का आसरा है। हाथ दे के सब की रक्षा करता है। सब को पालता है। वह प्रभू मेहर करने वाला है। बख्शिश करने वाला है। जीव उसको सिमर के पार हो जाता है। हे दास नानक ! (कह) ‘जो कुछ आपकी रजा में हैं रहा है। वह ठीक है। हम जीव आपकी शरण में हैं’। 20।
सलोक मः 5 ॥
तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥
नानक चरणी लगिआ उधरै सभो कोइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जिस-जिस मनुष्य के सिर पर रक्षक वह प्रभू है उन्हें (माया की) कोई भूख नहीं रह जाती। हे नानक ! परमात्मा के चरणों में लग के हरेक जीव माया की भूख से बच जाता है। 1।
मः 5 ॥
जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥
नानक परमेसरु जजमानु तिसहि भुख न मूलि ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ (जो मनुष्य) मंगता (बन के मालिक प्रभू से) सदा नाम मांगता है (उसकी अर्ज) मालिक कबूल करता है। हे नानक ! जिस मनुष्य का जजमान (खुद) परमेश्वर है उसे रक्ती भी (माया की) भूख नहीं रहती। 2।
पउड़ी ॥
मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥
प्रीति लगी हरि नाम सिउ ए हसती घोड़े ॥
राज मिलख खुसीआ घणी धिआइ मुखु न मोड़े ॥
ढाढी दरि प्रभ मंगणा दरु कदे न छोड़े ॥
नानक मनि तनि चाउ एहु नित प्रभ कउ लोड़े ॥21॥1॥ सुधु कीचे
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता है उसका) मन परमात्मा के साथ रंगा जाता है उस के लिए प्रभू का नाम ही बढ़िया भोजन व पोशाक है। परमात्मा के नाम के साथ उसका प्यार बन जाता है। यही उसके लिए हाथी घोड़े है। प्रभू के सिमरन से वह कभी अकता नहीं। यही उसके लिए राज-माल। जमीनें और बेअंत खुशियां हैं। वह ढाढी प्रभू के दर से ही सदा मांगता है। प्रभू का दर कभी नहीं छोड़ता। हे नानक ! सिफत सालाह करने वाले के मन में। तन में सदा ये चाव बना रहता है। वह सदा प्रभू को मिलने की तमन्ना रखता है। 21। 1।
रागु गउड़ी भगतां की बाणी
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
गउड़ी गुआरेरी स्री कबीर जीउ के चउपदे 14 ॥
अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥
राम उदकि तनु जलत बुझाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मनु मारण कारणि बन जाईऐ ॥
सो जलु बिनु भगवंत न पाईऐ ॥1॥
जिह पावक सुरि नर है जारे ॥
राम उदकि जन जलत उबारे ॥2॥
भव सागर सुख सागर माही ॥
पीवि रहे जल निखुटत नाही ॥3॥
कहि कबीर भजु सारिंगपानी ॥
राम उदकि मेरी तिखा बुझानी ॥4॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी भगतां की बाणी सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ गउड़ी गुआरेरी श्री कबीर जीउ के चउपदे 14 ॥ (ढूँढते-ढूँढते) अब मैंने प्रभू के नाम का अमृत ढूँढ लिया है। उस नाम-अमृत ने मेरे तपते शरीर को ठंडा कर दिया है। 1। रहाउ। जंगलों की ओर (तीर्थों आदि पर) मन को मारने के लिए (शांत करने के लिए) जाते हैं। पर वह (नाम-रूपी) अमृत (जो मन को शांत कर सके) प्रभू के बिना (प्रभू के सिमरन के बिना) नहीं मिल सकता। 1। (तृष्णा की) जिस आग ने देवते और मनुष्य जला डाले हैं। प्रभू के (नाम-) अमृत ने भगत जनों को जलने से बचा लिया है। 2। (वह भगत-जन जिनको ‘राम-उदक’ ने जलने से बचाया है) इस संसार समुंद्र में (जो अब उनके लिए) सुखों का समुंद्र (बन गया है) नाम-अमृत लगातार पी रहे हैं और वह अमृत कभी खत्म नहीं होता। 3। कबीर कहता है, (हे मन !) परमात्मा का सिमरन कर। परमात्मा के नाम-अमृत ने मेरी (माया की) तृष्णा मिटा दी है। 4। 1।
गउड़ी कबीर जी ॥
माधउ जल की पिआस न जाइ ॥
जल महि अगनि उठी अधिकाइ ॥1॥ रहाउ ॥
तूं जलनिधि हउ जल का मीनु ॥
जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ॥1॥
तूं पिंजरु हउ सूअटा तोर ॥
जमु मंजारु कहा करै मोर ॥2॥
तूं तरवरु हउ पंखी आहि ॥
मंदभागी तेरो दरसनु नाहि ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी कबीर जी ॥ हे माया के पति प्रभू ! आपके नाम-अमृत की प्यास मिटती नहीं (भाव। आपका नाम जप-जप के मैं तृप्त नहीं होता)। आपका नाम अमृत पीते पीते और अधिक चाहत पैदा हैं रही है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप जल का खजाना (समुंद्र) है। मैं उस जल की मछली हूँ। जल में ही मैं जीवित रह सकती हूँ। जल के बिना मैं मर जाती हूँ। 1। आप मेरा पिंजरा है। मैं आपका कमजोर सा तोता हूँ। (आपके आसरे रहने पर) जम-रूपी बिल्ला मेरा क्या बिगाड़ लेगा?। 2। हे प्रभू ! आप सुंदर वृक्ष है और मैं (उस वृक्ष पर आसरा लेने वाला) पंछी हूँ। (मुझ) अभागे को (अभी तक) आपके दर्शन नसीब नहीं हुए। 3।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! ऐसे बेअंत प्रभू को सिमर।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।