धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥
नानक सेई तंन फुटंनि जिना सांई विसरै ॥1॥
परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥
सभे सिख उबारिअनु प्रभि काज सवारे ॥
निंदक पकड़ि पछाड़िअनु झूठे दरबारे ॥
नानक का प्रभु वडा है आपि साजि सवारे ॥2॥
प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥
अगम अगोचरु साहिबो जीआं का परणा ॥
हसत देइ प्रतिपालदा भरण पोखणु करणा ॥
मिहरवानु बखसिंदु आपि जपि सचे तरणा ॥
जो तुधु भावै सो भला नानक दास सरणा ॥20॥
तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥
नानक चरणी लगिआ उधरै सभो कोइ ॥1॥
जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥
नानक परमेसरु जजमानु तिसहि भुख न मूलि ॥2॥
मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥
प्रीति लगी हरि नाम सिउ ए हसती घोड़े ॥
राज मिलख खुसीआ घणी धिआइ मुखु न मोड़े ॥
ढाढी दरि प्रभ मंगणा दरु कदे न छोड़े ॥
नानक मनि तनि चाउ एहु नित प्रभ कउ लोड़े ॥21॥1॥ सुधु कीचे
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
गउड़ी गुआरेरी स्री कबीर जीउ के चउपदे 14 ॥
अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥
राम उदकि तनु जलत बुझाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मनु मारण कारणि बन जाईऐ ॥
सो जलु बिनु भगवंत न पाईऐ ॥1॥
जिह पावक सुरि नर है जारे ॥
राम उदकि जन जलत उबारे ॥2॥
भव सागर सुख सागर माही ॥
पीवि रहे जल निखुटत नाही ॥3॥
कहि कबीर भजु सारिंगपानी ॥
राम उदकि मेरी तिखा बुझानी ॥4॥1॥
माधउ जल की पिआस न जाइ ॥
जल महि अगनि उठी अधिकाइ ॥1॥ रहाउ ॥
तूं जलनिधि हउ जल का मीनु ॥
जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ॥1॥
तूं पिंजरु हउ सूअटा तोर ॥
जमु मंजारु कहा करै मोर ॥2॥
तूं तरवरु हउ पंखी आहि ॥
मंदभागी तेरो दरसनु नाहि ॥3॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! ऐसे बेअंत प्रभू को सिमर।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।