अंग
266
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਨਿਕ ਜਤਨ ਕਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨ ਨਾ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਭੇਖ ਅਨੇਕ ਅਗਨਿ ਨਹੀ ਬੁਝੈ ॥
ਕੋਟਿ ਉਪਾਵ ਦਰਗਹ ਨਹੀ ਸਿਝੈ ॥
ਛੂਟਸਿ ਨਾਹੀ ਊਭ ਪਇਆਲਿ ॥
ਮੋਹਿ ਬਿਆਪਹਿ ਮਾਇਆ ਜਾਲਿ ॥
ਅਵਰ ਕਰਤੂਤਿ ਸਗਲੀ ਜਮੁ ਡਾਨੈ ॥
ਗੋਵਿੰਦ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਮਾਨੈ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਬੋਲੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੪॥
ਭੇਖ ਅਨੇਕ ਅਗਨਿ ਨਹੀ ਬੁਝੈ ॥
ਕੋਟਿ ਉਪਾਵ ਦਰਗਹ ਨਹੀ ਸਿਝੈ ॥
ਛੂਟਸਿ ਨਾਹੀ ਊਭ ਪਇਆਲਿ ॥
ਮੋਹਿ ਬਿਆਪਹਿ ਮਾਇਆ ਜਾਲਿ ॥
ਅਵਰ ਕਰਤੂਤਿ ਸਗਲੀ ਜਮੁ ਡਾਨੈ ॥
ਗੋਵਿੰਦ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਮਾਨੈ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਬੋਲੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੪॥
अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥
भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥
कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥
मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
अवर करतूति सगली जमु डानै ॥
गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
हरि का नामु जपत दुखु जाइ ॥
नानक बोलै सहजि सुभाइ ॥४॥
भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥
कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥
मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
अवर करतूति सगली जमु डानै ॥
गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
हरि का नामु जपत दुखु जाइ ॥
नानक बोलै सहजि सुभाइ ॥४॥
हिन्दी अर्थ: अनेकों यत्न करने से (माया की) प्यास नहीं बुझती। अनेकों (धार्मिक) भेख करने से (तृष्णा की) आग नहीं बुझती। (ऐसे) करोड़ों तरीके (बरतने से प्रभू की) दरगाह में सुर्खरू नहीं होते। (इन यत्नों से) जीव चाहे आकाश पे चढ़ जाए। चाहे पाताल में छुप जाए। (माया से) बच नहीं सकता। (बल्कि) जीव माया के जाल में व मोह में फंसते हैं। (नाम के बिना) और सारी करतूतों को यमराज दण्ड लगाता है। प्रभू के भजन के बिना रक्ती भर भी नहीं पतीजता। (उसका दुख प्रभू का नाम जपते ही दूर हो जाता है हे नानक ! (जो मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम से (हरी नाम) उच्चारता है । 4।
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਜੇ ਕੋ ਮਾਗੈ ॥
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਗੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਆਪੁਨਾ ਦੂਖੁ ਮਿਟਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਸਦ ਗਾਵੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਅਪੁਨੀ ਸੋਭਾ ਲੋਰੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਇਹ ਹਉਮੈ ਛੋਰੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਜਨਮ ਮਰਣ ਤੇ ਡਰੈ ॥
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰੈ ॥
ਜਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਦਰਸ ਪਿਆਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਸਾ ॥੫॥
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਗੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਆਪੁਨਾ ਦੂਖੁ ਮਿਟਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਸਦ ਗਾਵੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਅਪੁਨੀ ਸੋਭਾ ਲੋਰੈ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਇਹ ਹਉਮੈ ਛੋਰੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਜਨਮ ਮਰਣ ਤੇ ਡਰੈ ॥
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰੈ ॥
ਜਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਦਰਸ ਪਿਆਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਸਾ ॥੫॥
चारि पदारथ जे को मागै ॥
साध जना की सेवा लागै ॥
जे को आपुना दूखु मिटावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
जे को अपुनी सोभा लोरै ॥
साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
जे को जनम मरण ते डरै ॥
साध जना की सरनी परै ॥
जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥
नानक ता कै बलि बलि जासा ॥५॥
साध जना की सेवा लागै ॥
जे को आपुना दूखु मिटावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
जे को अपुनी सोभा लोरै ॥
साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
जे को जनम मरण ते डरै ॥
साध जना की सरनी परै ॥
जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥
नानक ता कै बलि बलि जासा ॥५॥
हिन्दी अर्थ: अगर कोई मनुष्य (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) चार पदार्थों का अभिलाशी हो। (तो उसे चाहिए कि) गुरमुखों की सेवा में लगे। अगर कोई मनुष्य अपना दुख मिटाना चाहे तो प्रभू का नाम सदा हृदय में सिमरे। अगर कोई मनुष्य अपनी शोभा चाहता हो तो सत्संगि में (रह के) इस अहंकार का त्याग करे। अगर कोई मनुष्य जनम मरन के चक्कर से डरता हो। तो वह संतों की चरणीं लगे। हे नानक ! (कह कि) जिस मनुष्य को प्रभू के दीदार की चाहत है। मैं उससे सदा सदके जाऊँ। 5।
ਸਗਲ ਪੁਰਖ ਮਹਿ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਧਾਨੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਾ ਕਾ ਮਿਟੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਜੋ ਜਾਣੈ ਨੀਚਾ ॥
ਸੋਊ ਗਨੀਐ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ॥
ਜਾ ਕਾ ਮਨੁ ਹੋਇ ਸਗਲ ਕੀ ਰੀਨਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤਿਨਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਚੀਨਾ ॥
ਮਨ ਅਪੁਨੇ ਤੇ ਬੁਰਾ ਮਿਟਾਨਾ ॥
ਪੇਖੈ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸਾਜਨਾ ॥
ਸੂਖ ਦੂਖ ਜਨ ਸਮ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਨਹੀ ਲੇਪਾ ॥੬॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਾ ਕਾ ਮਿਟੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਜੋ ਜਾਣੈ ਨੀਚਾ ॥
ਸੋਊ ਗਨੀਐ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ॥
ਜਾ ਕਾ ਮਨੁ ਹੋਇ ਸਗਲ ਕੀ ਰੀਨਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤਿਨਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਚੀਨਾ ॥
ਮਨ ਅਪੁਨੇ ਤੇ ਬੁਰਾ ਮਿਟਾਨਾ ॥
ਪੇਖੈ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸਾਜਨਾ ॥
ਸੂਖ ਦੂਖ ਜਨ ਸਮ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਨਹੀ ਲੇਪਾ ॥੬॥
सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥
साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥
सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥
हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥
पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥
नानक पाप पुंन नही लेपा ॥६॥
साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥
सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥
हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
मन अपुने ते बुरा मिटाना ॥
पेखै सगल स्रिसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम द्रिसटेता ॥
नानक पाप पुंन नही लेपा ॥६॥
हिन्दी अर्थ: (वह) मनुष्य सारे मनुष्यों में बड़ा है। सत्संग में (रह के) जिस मनुष्य का अहंकार मिट जाता है जो मनुष्य अपने आप को (सब से) बुरे कामों वाला मानता है। उसे सभी से बढ़िया समझना चाहिए। जिस मनुष्य का मन सबके चरणों की धूड़ होता है (भाव- जो सबसे गरीबी-भाव बरतता है) उस मनुष्य ने हरेक शरीर में प्रभू की सक्ता पहिचान ली है। जिसने अपने मन में से बुराई मिटा दी है। वह सारी सृष्टि (के जीवों को अपना) मित्र देखता है। हे नानक ! (ऐसे) मनुष्य सुखों और दुखों को एक जैसा समझते हैं। (तभी तो) पाप और पुंन का उनपे असर नहीं होता (भाव। ना कोई बुरा कर्म उनके मन को फसा सकता है। और ना ही स्वर्ग आदि का लालच करके या दुख-कलेश से डरके वे पुंन-कर्म करते हैं। उनका स्वभाव ही नेकी करना बन जाता है)। 6।
ਨਿਰਧਨ ਕਉ ਧਨੁ ਤੇਰੋ ਨਾਉ ॥
ਨਿਥਾਵੇ ਕਉ ਨਾਉ ਤੇਰਾ ਥਾਉ ॥
ਨਿਮਾਨੇ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੋ ਮਾਨੁ ॥
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਉ ਦੇਵਹੁ ਦਾਨੁ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਅਪਨੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਜਾਨਹੁ ਆਪੇ ॥
ਆਪਨ ਸੰਗਿ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭ ਰਾਤੇ ॥
ਤੁਮੑਰੀ ਉਸਤਤਿ ਤੁਮ ਤੇ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਨਸਿ ਕੋਇ ॥੭॥
ਨਿਥਾਵੇ ਕਉ ਨਾਉ ਤੇਰਾ ਥਾਉ ॥
ਨਿਮਾਨੇ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੋ ਮਾਨੁ ॥
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਉ ਦੇਵਹੁ ਦਾਨੁ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕੇ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਅਪਨੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਜਾਨਹੁ ਆਪੇ ॥
ਆਪਨ ਸੰਗਿ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭ ਰਾਤੇ ॥
ਤੁਮੑਰੀ ਉਸਤਤਿ ਤੁਮ ਤੇ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਨਸਿ ਕੋਇ ॥੭॥
निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥
निथावे कउ नाउ तेरा थाउ ॥
निमाने कउ प्रभ तेरो मानु ॥
सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
अपनी गति मिति जानहु आपे ॥
आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
तुम॑री उसतति तुम ते होइ ॥
नानक अवरु न जानसि कोइ ॥७॥
निथावे कउ नाउ तेरा थाउ ॥
निमाने कउ प्रभ तेरो मानु ॥
सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
अपनी गति मिति जानहु आपे ॥
आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
तुम॑री उसतति तुम ते होइ ॥
नानक अवरु न जानसि कोइ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) कंगाल के लिए तेरा नाम ही धन है। निआसरे को तेरा आसरा है। निमाणे के वास्ते तेरा (नाम)। हे प्रभू ! आदर मान है। तू सारे जीवों को दातें देता है। तू खुद ही सब कुछ करता है और स्वयं ही कराता है। हे स्वामी ! हे सारे प्राणियों के दिल की जानने वाले ! हे प्रभू ! तू अपनी हालत और अपनी (वडिआई) की मर्यादा आप ही जानता है; तू अपने आप में खुद ही मगन है। हे नानक ! (कह कि। हे प्रभू !) तेरी महिमा (वडिआई) तुझसे ही (बयान) हो सकती है। कोई और तेरी महिमा नहीं जानता। 7।
ਸਰਬ ਧਰਮ ਮਹਿ ਸ੍ਰੇਸਟ ਧਰਮੁ ॥
ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਨਿਰਮਲ ਕਰਮੁ ॥
ਸਗਲ ਕ੍ਰਿਆ ਮਹਿ ਊਤਮ ਕਿਰਿਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਦੁਰਮਤਿ ਮਲੁ ਹਿਰਿਆ ॥
ਸਗਲ ਉਦਮ ਮਹਿ ਉਦਮੁ ਭਲਾ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜੀਅ ਸਦਾ ॥
ਸਗਲ ਬਾਨੀ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਨੀ ॥
ਹਰਿ ਕੋ ਜਸੁ ਸੁਨਿ ਰਸਨ ਬਖਾਨੀ ॥
ਸਗਲ ਥਾਨ ਤੇ ਓਹੁ ਊਤਮ ਥਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਹ ਘਟਿ ਵਸੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੮॥੩॥
ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਨਿਰਮਲ ਕਰਮੁ ॥
ਸਗਲ ਕ੍ਰਿਆ ਮਹਿ ਊਤਮ ਕਿਰਿਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਦੁਰਮਤਿ ਮਲੁ ਹਿਰਿਆ ॥
ਸਗਲ ਉਦਮ ਮਹਿ ਉਦਮੁ ਭਲਾ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜੀਅ ਸਦਾ ॥
ਸਗਲ ਬਾਨੀ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਨੀ ॥
ਹਰਿ ਕੋ ਜਸੁ ਸੁਨਿ ਰਸਨ ਬਖਾਨੀ ॥
ਸਗਲ ਥਾਨ ਤੇ ਓਹੁ ਊਤਮ ਥਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਹ ਘਟਿ ਵਸੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੮॥੩॥
सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥
हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ ॥
साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
सगल उदम महि उदमु भला ॥
हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
सगल बानी महि अंम्रित बानी ॥
हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
सगल थान ते ओहु ऊतम थानु ॥
नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥८॥३॥
हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ ॥
साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
सगल उदम महि उदमु भला ॥
हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
सगल बानी महि अंम्रित बानी ॥
हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
सगल थान ते ओहु ऊतम थानु ॥
नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥८॥३॥
हिन्दी अर्थ: ये धर्म सारे धर्मों से बढ़िया है- (हे मन !) प्रभू का नाम जप (और) पवित्र आचरण (बना) ये काम और सारे धार्मिक रस्मों से उक्तम है – सत्संग में (रहके) बुरी मति (रूपी) मैल दूर की जाए ये उद्यम (और) सारे उद्यमों से भला है – हे मन ! सदा प्रभू का नाम जप (प्रभू के यश की ये) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी और सब बाणियों से सुंदर है – प्रभू का यश (कानों से) सुन (और) जीभ से बोल वह (हृदय-रूपी) जगह और सभी जगहों (तीर्थों) स्थानों से पवित्र है। हे नानक ! जिस हृदय में प्रभू का नाम बसता है । 8। 3।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਨਿਰਗੁਨੀਆਰ ਇਆਨਿਆ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਦਾ ਸਮਾਲਿ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਸੁ ਚੀਤਿ ਰਖੁ ਨਾਨਕ ਨਿਬਹੀ ਨਾਲਿ ॥੧॥
ਨਿਰਗੁਨੀਆਰ ਇਆਨਿਆ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਦਾ ਸਮਾਲਿ ॥
ਜਿਨਿ ਕੀਆ ਤਿਸੁ ਚੀਤਿ ਰਖੁ ਨਾਨਕ ਨਿਬਹੀ ਨਾਲਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि ॥१॥
निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे अंजान ! हे गुणहीन (मनुष्य) ! उस मालिक को सदा याद कर। हे नानक ! जिस ने तुझे पैदा किया है। उसे चिक्त में (परो के) रख। वही (तेरा) साथ निभाएगा। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਰਮਈਆ ਕੇ ਗੁਨ ਚੇਤਿ ਪਰਾਨੀ ॥
ਕਵਨ ਮੂਲ ਤੇ ਕਵਨ ਦ੍ਰਿਸਟਾਨੀ ॥
ਜਿਨਿ ਤੂੰ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿ ਸੀਗਾਰਿਆ ॥
ਗਰਭ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਜਿਨਹਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਬਾਰ ਬਿਵਸਥਾ ਤੁਝਹਿ ਪਿਆਰੈ ਦੂਧ ॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨ ਭੋਜਨ ਸੁਖ ਸੂਧ ॥
ਬਿਰਧਿ ਭਇਆ ਊਪਰਿ ਸਾਕ ਸੈਨ ॥ ਮੁਖਿ ਅਪਿਆਉ ਬੈਠ ਕਉ ਦੈਨ ॥
ਰਮਈਆ ਕੇ ਗੁਨ ਚੇਤਿ ਪਰਾਨੀ ॥
ਕਵਨ ਮੂਲ ਤੇ ਕਵਨ ਦ੍ਰਿਸਟਾਨੀ ॥
ਜਿਨਿ ਤੂੰ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿ ਸੀਗਾਰਿਆ ॥
ਗਰਭ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਜਿਨਹਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਬਾਰ ਬਿਵਸਥਾ ਤੁਝਹਿ ਪਿਆਰੈ ਦੂਧ ॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨ ਭੋਜਨ ਸੁਖ ਸੂਧ ॥
ਬਿਰਧਿ ਭਇਆ ਊਪਰਿ ਸਾਕ ਸੈਨ ॥ ਮੁਖਿ ਅਪਿਆਉ ਬੈਠ ਕਉ ਦੈਨ ॥
असटपदी ॥
रमईआ के गुन चेति परानी ॥
कवन मूल ते कवन द्रिसटानी ॥
जिनि तूं साजि सवारि सीगारिआ ॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
बार बिवसथा तुझहि पिआरै दूध ॥
भरि जोबन भोजन सुख सूध ॥
बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन ॥ मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥
रमईआ के गुन चेति परानी ॥
कवन मूल ते कवन द्रिसटानी ॥
जिनि तूं साजि सवारि सीगारिआ ॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
बार बिवसथा तुझहि पिआरै दूध ॥
भरि जोबन भोजन सुख सूध ॥
बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन ॥ मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ हे जीव ! सुंदर राम के गुण याद कर। (देख) किस आदि से (तुझे) कितना (सुंदर बना के उसने) दिखाया है। जिस प्रभू ने बना सँवार के सुंदर किया है। जिसने तुझे पेट की आग में (भी) बचाया; जो बाल उम्र में तुझे दूध पिलाता है। भरी जवानी में भोजन व सुखों की सूझ (देता है); (जब तू) बॅुढा हो जाता है (तो) सेवा करने को साक-सज्जन (तैयार कर देता है) जो बैठे हुए को मुंह में बढ़िया भोजन देते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 266 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 266” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 267 →, पीछे का: ← अंग 265।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।