संकटि नही परै जोनि नही आवै नामु निरंजन जा को रे ॥ कबीर को सुआमी ऐसो ठाकुरु जा कै माई न बापो रे ॥2॥19॥70॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (दरअसल बात ये है कि जिस प्रभू) का नाम है निरंजन (भाव। जो प्रभू कभी माया के असर तले नहीं आ सकता)। वह जूनियों में भी नहीं आता। वह (जनम-मरण के) दुख में नहीं पड़ता। कबीर का स्वामी (सारे जगत का) पालनहार ऐसा है जिसकी ना कोई माँ है। ओर ना ही पिता। 2। 19। 70।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ जगत बेशक मेरी निंदा करे। बेशक मेरे अवगुण भंडे; प्रभू के सेवक को अपनी निंदा होती अच्छी लगती है। क्योंकि निंदा सेवक की माँ-बाप है (भाव। जैसे माँ-बाप अपने बच्चे में शुभ गुण बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। वैसे ही निंदा भी अवगुणों को सामने ला के भले गुणों के लिए सहायता करती है)। 1। रहाउ। अगर लोग अवगुण सामने लाएं तभी बैकुंठ जा सकते हैं (क्योंकि इस तरह अपने अवगुण छोड़ के) प्रभू का नाम रूपी धन मन में बसा सकते हैं। अगर हृदय शुद्ध होते हुए हमारी निंदा हो (अगर शुद्ध भावना से हम अपने अवगुण नश्र होते सुनें) तो निंदक हमारे मन को पवित्र करने में सहायता करता है। 1। (इसलिए) जो मनुष्य हमें भंडता है। वह हमारा मित्र है। क्योंकि हमारी सुरति अपने निंदक में रहती है (भाव। हम अपने निंदक की बात बड़े ध्यान से सुनते हैं)। (दरअसल) हमारा बुरा चितवने वाला मनुष्य वह है। जो हमारे ऐब नश्र होने से रोकता है। निंदक तो बल्कि ये चाहता है कि हमारा जीवन अच्छा बने। 2। ज्यों-ज्यों हमारी निंदा होती है। त्यो-त्यों हमारे अंदर प्रभू का प्रेम प्यार पैदा होता है। क्योंकि हमारी निंदा हमें अवगुणों से बचाती है। सो। दास कबीर के लिए तो उसके अवगुणों का प्रचार सबसे बढ़िया बात है। पर (बिचारा) निंदक (सदा दूसरों के अवगुणों की बातें कर करके खुद उन अवगुणों में) डूब जाता है। और हम (अपने अवगुणों की चेतावनी से उनसे) बच निकलते हैं। 3। 20। 71।
राजा राम तूं ऐसा निरभउ तरन तारन राम राइआ ॥1॥ रहाउ ॥ जब हम होते तब तुम नाही अब तुम हहु हम नाही ॥ अब हम तुम एक भए हहि एकै देखत मनु पतीआही ॥1॥ जब बुधि होती तब बलु कैसा अब बुधि बलु न खटाई ॥ कहि कबीर बुधि हरि लई मेरी बुधि बदली सिधि पाई ॥2॥21॥72॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे सब के मालिक प्रभू ! हे सब जीवों को तारने के समर्थ राम ! हे सब में व्यापक प्रभू ! आप किसी से डरता नहीं है; आपका स्वभाव कुछ अनोखा है। 1। रहाउ। जब तक हम कुछ बनें फिरते हैं (भाव। अहम्-अहंकार करते हैं) तब तक (हे प्रभू !) आप हमारे अंदर प्रकट नहीं होता (अपना प्रकाश नहीं करता)। पर जब अब तूने खुद (हममें) निवास किया है तो हमारे में वह पहले वाला अहंकार नहीं रहा। अब (हे प्रभू !) तूम और हम एक-रूप हो गए हैं। अब आपको देख के हमारा मन मान गया है (कि आप ही आप है। तूझसे अलग हम कुछ भी नहीं हैं)। 1। (हे प्रभू !) जितने समय तक हम जीवों में अपनी अक्ल (का अहंकार) होता है तब तक हमारे में कोई आत्मिक बल नहीं होता (भाव। सहमे ही रहते हैं)। पर अब (जब आप खुद हमारे में आ प्रगट हुआ है) हमें अपनी अकल और बल पे मान नहीं रहा। कबीर कहता है, (हे प्रभू !) तूने मेरी (अहंकार वाली) बुद्धि छीन ली है। अब वह बुद्धि बदल गई है (भाव। “मैं मैं’ छोड़ के “आप ही आप” करने वाली हो गई है। इस वास्ते मानस जन्म के मनोरथ की) सिद्धि हासिल हो गई है। 2। 21। 72।
गउड़ी ॥ खट नेम करि कोठड़ी बांधी बसतु अनूपु बीच पाई ॥ कुंजी कुलफु प्रान करि राखे करते बार न लाई ॥1॥ अब मन जागत रहु रे भाई ॥ गाफलु होइ कै जनमु गवाइओ चोरु मुसै घरु जाई ॥1॥ रहाउ ॥ पंच पहरूआ दर महि रहते तिन का नही पतीआरा ॥ चेति सुचेत चित होइ रहु तउ लै परगासु उजारा ॥2॥ नउ घर देखि जु कामनि भूली बसतु अनूप न पाई ॥ कहतु कबीर नवै घर मूसे दसवैं ततु समाई ॥3॥22॥73॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ छे चक्र बना के (प्रभू ने) ये (मानस-शरीर रूपी) छोटा सा घर रच दिया है और (इस घर) में (अपनी आत्मिक जोति रूप) आश्चर्य वस्तु रख दी है; (इस घर की) ताला चाभी (प्रभू ने) प्राणों को ही बना दिया है। और (ये खेल) बनाते हुए वह देर नहीं लगाता। 1। (इस घर में रहने वाले) हे प्यारे मन ! अब जागता रह। बेपरवाह हो के तूने (अब तक) जीवन व्यर्थ गवा लिया है; (जो कोई भी गाफ़िल होता है) चोर जा के उसका घर लूट लेता है। 1। रहाउ। (ये जो) पाँचों पहरेदार (इस घर के) दरवाजों पे रहते हैं। इनका कोई भरोसा नहीं। होशियार हो के रह और (मालिक को) याद रख तब (आपके अंदर आत्मिक जोति का) प्रकाश निखर आएगा। 2। जो जीव-स्त्री (शरीर के) नौ घरों (नौ गोलकों दरवाजों। जो शरीर की क्रिया चलाने के लिए हैं) को देख के (अपने असल मनोरथ से) रह जाती है। उसे (ज्योति रूप) आश्चर्य चीज (अंदर) नहीं मिलती (भाव। उसका ध्यान अंदर बसती आत्मिक ज्योति की ओर नहीं जाता)। कबीर कहता है जब ये नौ ही घर बस में आ जाते हैं। तो प्रभू की ज्योति दसवें घर में टिक जाती है (भाव। तब अंदर बसते प्रभू के अस्तित्व का विचार जीव को आता है। तभी सुरति प्रभू की याद में टिकती है)। 3। 22। 73।
गउड़ी ॥ माई मोहि अवरु न जानिओ आनानां ॥ सिव सनकादि जासु गुन गावहि तासु बसहि मोरे प्रानानां ॥ रहाउ ॥ हिरदे प्रगासु गिआन गुर गंमित गगन मंडल महि धिआनानां ॥ बिखै रोग भै बंधन भागे मन निज घरि सुखु जानाना ॥1॥ एक सुमति रति जानि मानि प्रभ दूसर मनहि न आनाना ॥ चंदन बासु भए मन बासन तिआगि घटिओ अभिमानाना ॥2॥ जो जन गाइ धिआइ जसु ठाकुर तासु प्रभू है थानानां ॥ तिह बड भाग बसिओ मनि जा कै करम प्रधान मथानाना ॥3॥ काटि सकति सिव सहजु प्रगासिओ एकै एक समानाना ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ हे (मेरी) माँ ! मैंने किसी और को (अपने जीवन का आसरा) नहीं समझा। (क्योंकि) मेरे प्राण (तो) उस (प्रभू) में बस रहे हैं जिसके गुण शिव और सनक आदि गाते हैं। 1। रहाउ। जब से सतिगुरू ने ऊँची सूझ बख्शी है। मेरे हृदय में। (मानो) प्रकाश हो गया है। और मेरा ध्यान ऊँचे मण्डलों में (भाव। प्रभू चरणों में) टिका रहता है। विषौ-विकार आदिक आत्मिक रोगों और सहम की जंजीरें टूट गई हैं। मुझे मन के अंदर ही सुख मिल गया है। 1। मेरी बुद्धि का प्यार एक प्रभू में ही बन गया है। एक प्रभू को (आसरा) समझ के (और उस में) पतीज के। मैं किसी और को अब मन में नहीं लगाता (भाव। किसी और की ओट नहीं ताकता)। मन की वासनाएं त्याग के (मेरे अंदर जैसे) चंदन की सुगंधि पैदा हो गई है। (मेरे अंदर से) अहंकार कम हो गया है (भाव। मिट गया है)। 2। जो मनुष्य ठाकुर का यश गाता है। प्रभू को ध्याता है। प्रभू का निवास उसके हृदय में हो जाता है। और। जिसके मन में प्रभू बस गया। उसके बड़े भाग्य समझो। उसके माथे पर ऊँचे लेख उभर आए (जानो)। 3। माया का प्रभाव दूर करके। जब रॅबी ज्योति का प्रकाश हो गया। तो सदा सिर्फ एक प्रभू में ही मन लीन रहता है।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (दरअसल बात ये है कि जिस प्रभू) का नाम है निरंजन (भाव।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।