अंग
198
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਰੂਪਵੰਤੁ ਸੋ ਚਤੁਰੁ ਸਿਆਣਾ ॥
ਜਿਨਿ ਜਨਿ ਮਾਨਿਆ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਭਾਣਾ ॥੨॥
ਜਗ ਮਹਿ ਆਇਆ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਅਪਣਾ ਸੁਆਮੀ ਜਾਣੁ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕੇ ਪੂਰਨ ਭਾਗ ॥
ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਤਾ ਕਾ ਮਨੁ ਲਾਗ ॥੪॥੯੦॥੧੫੯॥
ਜਿਨਿ ਜਨਿ ਮਾਨਿਆ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਭਾਣਾ ॥੨॥
ਜਗ ਮਹਿ ਆਇਆ ਸੋ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਅਪਣਾ ਸੁਆਮੀ ਜਾਣੁ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕੇ ਪੂਰਨ ਭਾਗ ॥
ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਤਾ ਕਾ ਮਨੁ ਲਾਗ ॥੪॥੯੦॥੧੫੯॥
रूपवंतु सो चतुरु सिआणा ॥
जिनि जनि मानिआ प्रभ का भाणा ॥२॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥
घटि घटि अपणा सुआमी जाणु ॥३॥
कहु नानक जा के पूरन भाग ॥
हरि चरणी ता का मनु लाग ॥४॥९०॥१५९॥
जिनि जनि मानिआ प्रभ का भाणा ॥२॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥
घटि घटि अपणा सुआमी जाणु ॥३॥
कहु नानक जा के पूरन भाग ॥
हरि चरणी ता का मनु लाग ॥४॥९०॥१५९॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) वही मनुष्य रूप वाला है~ वही तीक्ष्ण बुद्धि वाला है~ वही अक्लमंद है~ जिस मनुष्य ने परमातमा की रजा को (सदा सिर माथे पर) माना है। 2। (जिस मनुष्य ने मालिक प्रभू को हरेक शरीर में बसता पहिचान लिया है) वही मनुष्य जगत में आया सफल है (हे भाई !) अपने मालिक प्रभू को हरेक शरीर में बसता हुआ पहिचान।। 3। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं~ उसका मनपरमात्मा के चरणों में लगा रहता है। 4। 90। 159।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ਸਿਉ ਸਾਕਤ ਨਹੀ ਸੰਗੁ ॥
ਓਹੁ ਬਿਖਈ ਓਸੁ ਰਾਮ ਕੋ ਰੰਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਅਸਵਾਰ ਜੈਸੇ ਤੁਰੀ ਸੀਗਾਰੀ ॥
ਜਿਉ ਕਾਪੁਰਖੁ ਪੁਚਾਰੈ ਨਾਰੀ ॥੧॥
ਬੈਲ ਕਉ ਨੇਤ੍ਰਾ ਪਾਇ ਦੁਹਾਵੈ ॥
ਗਊ ਚਰਿ ਸਿੰਘ ਪਾਛੈ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਗਾਡਰ ਲੇ ਕਾਮਧੇਨੁ ਕਰਿ ਪੂਜੀ ॥
ਸਉਦੇ ਕਉ ਧਾਵੈ ਬਿਨੁ ਪੂੰਜੀ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਚੀਤ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਸਾ ਮੀਤ ॥੪॥੯੧॥੧੬੦॥
ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ਸਿਉ ਸਾਕਤ ਨਹੀ ਸੰਗੁ ॥
ਓਹੁ ਬਿਖਈ ਓਸੁ ਰਾਮ ਕੋ ਰੰਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨ ਅਸਵਾਰ ਜੈਸੇ ਤੁਰੀ ਸੀਗਾਰੀ ॥
ਜਿਉ ਕਾਪੁਰਖੁ ਪੁਚਾਰੈ ਨਾਰੀ ॥੧॥
ਬੈਲ ਕਉ ਨੇਤ੍ਰਾ ਪਾਇ ਦੁਹਾਵੈ ॥
ਗਊ ਚਰਿ ਸਿੰਘ ਪਾਛੈ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਗਾਡਰ ਲੇ ਕਾਮਧੇਨੁ ਕਰਿ ਪੂਜੀ ॥
ਸਉਦੇ ਕਉ ਧਾਵੈ ਬਿਨੁ ਪੂੰਜੀ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਚੀਤ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਸਾ ਮੀਤ ॥੪॥੯੧॥੧੬੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥
ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥१॥ रहाउ ॥
मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥
जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥१॥
बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥
गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥२॥
गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥
सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥३॥
नानक राम नामु जपि चीत ॥
सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥४॥९१॥१६०॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥
ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥१॥ रहाउ ॥
मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥
जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥१॥
बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥
गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥२॥
गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥
सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥३॥
नानक राम नामु जपि चीत ॥
सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥४॥९१॥१६०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा के भक्त के साथ माया-ग्रसित मनुष्य का जोड़ नहीं बन सकता (क्योंकि) वह साकत विषियों का प्यारा होता है और उस भगत को परमात्मा का प्रेम रंग चढ़ा होता है। 1। रहाउ। (हरी के दास और साकत का संग इस तरह है) जैसे किसी अनाड़ी सवार के वास्ते सजाई गई घोड़ी~ जैसे कोई हिजड़ा किसी स्त्री को प्यार करे। 1। (हे भाई ! हरी के दास और साकत का मेल यूँ ही है) जैसे कोई मनुष्य बछड़ा दे के बैल का दूध चूने की कोशिश करने लगे~ जैसे कोई मनुष्य गाय पर चढ़ कर उसे शेर के पीछे दौड़ाने लग पड़े। 2। (हे भाई !हरी के भक्त और साकत का मेल ऐसे है) जैसे कोई मनुष्य भेड़ लेकर उसे कामधेन समझ कर पूजने लग जाए~ जैसे कोई मनुष्य बगैर पूँजी के सौदा खरीदने उठ दौड़े। 3। हे नानक ! (हरी के दासों की संगति में टिक कर) परमात्मा का नाम अपने मन में सिमर~ परमात्मा जैसे मालिक व मित्र का सिमरन करा कर। 4। 91। 160।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾ ਮਤਿ ਨਿਰਮਲ ਕਹੀਅਤ ਧੀਰ ॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣੁ ਪੀਵਤ ਬੀਰ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ਹਿਰਦੈ ਕਰਿ ਓਟ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਤੇ ਹੋਵਤ ਛੋਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਜਿਤੁ ਉਪਜੈ ਨ ਪਾਪੁ ॥
ਰਾਮ ਰੰਗਿ ਨਿਰਮਲ ਪਰਤਾਪੁ ॥੨॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟਿ ਜਾਤ ਬਿਕਾਰ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਏਹੋ ਉਪਕਾਰ ॥੩॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਰਾਤੇ ਗੋਪਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਚੈ ਸਾਧ ਰਵਾਲ ॥੪॥੯੨॥੧੬੧॥
ਸਾ ਮਤਿ ਨਿਰਮਲ ਕਹੀਅਤ ਧੀਰ ॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣੁ ਪੀਵਤ ਬੀਰ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ਹਿਰਦੈ ਕਰਿ ਓਟ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਤੇ ਹੋਵਤ ਛੋਟ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਜਿਤੁ ਉਪਜੈ ਨ ਪਾਪੁ ॥
ਰਾਮ ਰੰਗਿ ਨਿਰਮਲ ਪਰਤਾਪੁ ॥੨॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟਿ ਜਾਤ ਬਿਕਾਰ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਏਹੋ ਉਪਕਾਰ ॥੩॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਰਾਤੇ ਗੋਪਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਚੈ ਸਾਧ ਰਵਾਲ ॥੪॥੯੨॥੧੬੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥
राम रसाइणु पीवत बीर ॥१॥
हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥
जनम मरण ते होवत छोट ॥१॥ रहाउ ॥
सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥
राम रंगि निरमल परतापु ॥२॥
साधसंगि मिटि जात बिकार ॥
सभ ते ऊच एहो उपकार ॥३॥
प्रेम भगति राते गोपाल ॥
नानक जाचै साध रवाल ॥४॥९२॥१६१॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥
राम रसाइणु पीवत बीर ॥१॥
हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥
जनम मरण ते होवत छोट ॥१॥ रहाउ ॥
सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥
राम रंगि निरमल परतापु ॥२॥
साधसंगि मिटि जात बिकार ॥
सभ ते ऊच एहो उपकार ॥३॥
प्रेम भगति राते गोपाल ॥
नानक जाचै साध रवाल ॥४॥९२॥१६१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे भाई ! वह बुद्धि पवित्र कही जाती है~ धैर्य वाली कही जाती है~ (जिसका आसरा लेकर मनुष्य) सब रसों से उत्तम प्रभू नाम का रस पीता है। 1। (हे भाई !) अपने हृदय में परमात्मा के चरणों का आसरा बना~ (ऐसा करने से) जन्म मरण के चक्र से निजात मिल जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) वह शरीर पवित्र है जिसमें कोई पाप नहीं पैदा होता। परमात्मा के प्रेम रंग की बरकति से पवित्र हुए मनुष्य का तेज-प्रताप (चमकता) है। 2। (हे भाई !साध-संगति किया कर) साध-संगति में रहने से (अंदर से) सारे विकार दूर हो जाते हैं। (साध-संगति का) सबसे उत्तम यही उपकार है। 3। जो मनुष्य परमात्मा की प्रेम भक्ति में लगे रहते हैं~ नानक उनके चरणों की धूड़ मांगता है। 4। 92। 161।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਐਸੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਗੋਵਿੰਦ ਸਿਉ ਲਾਗੀ ॥
ਮੇਲਿ ਲਏ ਪੂਰਨ ਵਡਭਾਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਰਤਾ ਪੇਖਿ ਬਿਗਸੈ ਜਿਉ ਨਾਰੀ ॥
ਤਿਉ ਹਰਿ ਜਨੁ ਜੀਵੈ ਨਾਮੁ ਚਿਤਾਰੀ ॥੧॥
ਪੂਤ ਪੇਖਿ ਜਿਉ ਜੀਵਤ ਮਾਤਾ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਜਨੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਾਤਾ ॥੨॥
ਲੋਭੀ ਅਨਦੁ ਕਰੈ ਪੇਖਿ ਧਨਾ ॥
ਜਨ ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਲਾਗੋ ਮਨਾ ॥੩॥
ਬਿਸਰੁ ਨਹੀ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਦਾਤਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਕੇ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ॥੪॥੯੩॥੧੬੨॥
ਐਸੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਗੋਵਿੰਦ ਸਿਉ ਲਾਗੀ ॥
ਮੇਲਿ ਲਏ ਪੂਰਨ ਵਡਭਾਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਰਤਾ ਪੇਖਿ ਬਿਗਸੈ ਜਿਉ ਨਾਰੀ ॥
ਤਿਉ ਹਰਿ ਜਨੁ ਜੀਵੈ ਨਾਮੁ ਚਿਤਾਰੀ ॥੧॥
ਪੂਤ ਪੇਖਿ ਜਿਉ ਜੀਵਤ ਮਾਤਾ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਜਨੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਾਤਾ ॥੨॥
ਲੋਭੀ ਅਨਦੁ ਕਰੈ ਪੇਖਿ ਧਨਾ ॥
ਜਨ ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਲਾਗੋ ਮਨਾ ॥੩॥
ਬਿਸਰੁ ਨਹੀ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਦਾਤਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਕੇ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ॥੪॥੯੩॥੧੬੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥
मेलि लए पूरन वडभागी ॥१॥ रहाउ ॥
भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥
तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥१॥
पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥
ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥२॥
लोभी अनदु करै पेखि धना ॥
जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥३॥
बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥
नानक के प्रभ प्रान अधार ॥४॥९३॥१६२॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥
मेलि लए पूरन वडभागी ॥१॥ रहाउ ॥
भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥
तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥१॥
पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥
ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥२॥
लोभी अनदु करै पेखि धना ॥
जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥३॥
बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥
नानक के प्रभ प्रान अधार ॥४॥९३॥१६२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा से जिन मनुष्यों को ऐसी प्रीति (जिसका जिक्र यहाँ किया जा रहा है) बनती है~ वह मनुष्य भाग्यशाली हो जाते हैं~ वे सारे गुणों से भरपूर हो जाते हैं~ परमात्मा उन्हें अपने साथ मिला लेता है। 1। रहाउ। जैसे स्त्री अपने पति को देख के खुश होती है~ वैसे ही हरी का दास हरी का नाम याद कर के अंतरात्मे विभोर (हिलोरे मारता है) में आता है। 1। जैसे माँ अपने पुत्रों को देख-देख के जीती है~ वैसे ही परमात्मा का भक्त परमात्मा के साथ ओत-प्रोत रहता है (ताने-पेटे के सूत्र में बंधा)। 2। (जैसे~ हे भाई !) लालची मनुष्य धन देख के आनंदित होता है~ वैसे ही परमात्मा के भक्त का मन परमात्मा के सुंदर चरणों से लिपटा रहता है। 3। हे दातार ! (मुझ नानक को) एक रत्ती जितना समय भी ना भूल। हे नानक के प्राणों के आसरे प्रभू ! । 4। 93। 162
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਜੋ ਜਨ ਗੀਧੇ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤੀ ਬੀਧੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਦੀਸਹਿ ਸਭਿ ਛਾਰੁ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਿਹਫਲ ਸੰਸਾਰ ॥੧॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਕਾਢੇ ਆਪਿ ॥
ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਅਚਰਜ ਪਰਤਾਪ ॥੨॥
ਵਣਿ ਤ੍ਰਿਣਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਪੂਰਨ ਗੋਪਾਲ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਪਸਾਰੁ ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਦਇਆਲ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਾ ਕਥਨੀ ਸਾਰੁ ॥
ਮਾਨਿ ਲੇਤੁ ਜਿਸੁ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥੪॥੯੪॥੧੬੩॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਜੋ ਜਨ ਗੀਧੇ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤੀ ਬੀਧੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਦੀਸਹਿ ਸਭਿ ਛਾਰੁ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਿਹਫਲ ਸੰਸਾਰ ॥੧॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਕਾਢੇ ਆਪਿ ॥
ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਅਚਰਜ ਪਰਤਾਪ ॥੨॥
ਵਣਿ ਤ੍ਰਿਣਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਪੂਰਨ ਗੋਪਾਲ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਪਸਾਰੁ ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਦਇਆਲ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਾ ਕਥਨੀ ਸਾਰੁ ॥
ਮਾਨਿ ਲੇਤੁ ਜਿਸੁ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥੪॥੯੪॥੧੬੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥
चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥१॥ रहाउ ॥
आन रसा दीसहि सभि छारु ॥
नाम बिना निहफल संसार ॥१॥
अंध कूप ते काढे आपि ॥
गुण गोविंद अचरज परताप ॥२॥
वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥
ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥३॥
कहु नानक सा कथनी सारु ॥
मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥४॥९४॥१६३॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥
चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥१॥ रहाउ ॥
आन रसा दीसहि सभि छारु ॥
नाम बिना निहफल संसार ॥१॥
अंध कूप ते काढे आपि ॥
गुण गोविंद अचरज परताप ॥२॥
वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥
ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥३॥
कहु नानक सा कथनी सारु ॥
मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥४॥९४॥१६३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य सबसे श्रेष्ठ हरी-नाम-रस में मस्त रहते हैं वह मनुष्य परमात्मा के सुंदर चरणों की प्रेमा-भक्ति में लीन रहते हैं (जैसे भौरा कमल फूल में अभेद हो जाता है)। 1। रहाउ। (हे भाई ! उन मनुष्यों को दुनिया के) और सारे रस (प्रभू-नाम-रस के मुकाबले में) राख दिखते हैं। परमात्मा के नाम के बिना संसार के सारे पदार्थ उन्हें व्यर्थ प्रतीत होते हैं। 1। (हे भाई !) (उन्हें परमात्मा) खुद (माया के मोह के) अंधे कूएं में से निकाल लेता है (जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते हैं) गोबिंद के गुण आश्चर्यजनक प्रताप वाले हैं । 2। (हे भाई ! हरी-नाम-रस में मस्त लोगों को) सृष्टि का पालणहार प्रभू~ बन में~ त्रिण में~ तीन भवनीय संसार में व्यापक दिखता है। उन्हें ये सारा जगत परमात्मा का पसारा दिखता है~ परमात्मा सब जीवों के अंग-संग प्रतीत होता है~ और दया का घर दिखता है। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई ! तू भी अपने हृदय में) वह सिफत सालाह संभाल~ जिस (सिफत सालाह रूप कथनी) को सृजनहार प्रभू आदर-सत्कार देता है। 4। 94। 163।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਿਤਪ੍ਰਤਿ ਨਾਵਣੁ ਰਾਮ ਸਰਿ ਕੀਜੈ ॥
ਝੋਲਿ ਮਹਾ ਰਸੁ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਮਲ ਉਦਕੁ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ਨਾਮ ॥
ਮਜਨੁ ਕਰਤ ਪੂਰਨ ਸਭਿ ਕਾਮ ॥੧॥
ਨਿਤਪ੍ਰਤਿ ਨਾਵਣੁ ਰਾਮ ਸਰਿ ਕੀਜੈ ॥
ਝੋਲਿ ਮਹਾ ਰਸੁ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਮਲ ਉਦਕੁ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ਨਾਮ ॥
ਮਜਨੁ ਕਰਤ ਪੂਰਨ ਸਭਿ ਕਾਮ ॥੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥
झोलि महा रसु हरि अंम्रितु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥
निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥
मजनु करत पूरन सभि काम ॥१॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥
झोलि महा रसु हरि अंम्रितु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥
निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥
मजनु करत पूरन सभि काम ॥१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा के नाम रूपी सरोवर में सदा ही स्नान करना चाहिए। (परमात्मा के नाम का रस) सबसे श्रेष्ठ रस है~ आत्मिक जीवन देने वाले इस हरी नाम रस को बड़े प्रेम से पीना चाहिए। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम पवित्र जल है~ (इस जल में) स्नान करने से सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं (सारी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं)। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 198 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
मानसून की पहली बारिश, दिल्ली के पुराने मोहल्ले में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 198” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 199 →, पीछे का: ← अंग 197।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।