अंग 181

अंग
181
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਇਸ ਹੀ ਮਧੇ ਬਸਤੁ ਅਪਾਰ ॥
ਇਸ ਹੀ ਭੀਤਰਿ ਸੁਨੀਅਤ ਸਾਹੁ ॥
ਕਵਨੁ ਬਾਪਾਰੀ ਜਾ ਕਾ ਊਹਾ ਵਿਸਾਹੁ ॥੧॥
ਨਾਮ ਰਤਨ ਕੋ ਕੋ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਭੋਜਨੁ ਕਰੇ ਆਹਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪੀ ਸੇਵ ਕਰੀਜੈ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਜੁਗਤਿ ਜਿਤੁ ਕਰਿ ਭੀਜੈ ॥
ਪਾਇ ਲਗਉ ਤਜਿ ਮੇਰਾ ਤੇਰੈ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਜਨੁ ਜੋ ਸਉਦਾ ਜੋਰੈ ॥੨॥
ਮਹਲੁ ਸਾਹ ਕਾ ਕਿਨ ਬਿਧਿ ਪਾਵੈ ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਬਿਧਿ ਜਿਤੁ ਭੀਤਰਿ ਬੁਲਾਵੈ ॥
ਤੂੰ ਵਡ ਸਾਹੁ ਜਾ ਕੇ ਕੋਟਿ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਦਾਤਾ ਲੇ ਸੰਚਾਰੇ ॥੩॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਨਿਜ ਘਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਅਮੋਲ ਰਤਨੁ ਸਾਚੁ ਦਿਖਲਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਬ ਮੇਲੇ ਸਾਹਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕੈ ਵੇਸਾਹਿ ॥੪॥੧੬॥੮੫॥
इस ही मधे बसतु अपार ॥
इस ही भीतरि सुनीअत साहु ॥
कवनु बापारी जा का ऊहा विसाहु ॥१॥
नाम रतन को को बिउहारी ॥
अंम्रित भोजनु करे आहारी ॥१॥ रहाउ ॥
मनु तनु अरपी सेव करीजै ॥
कवन सु जुगति जितु करि भीजै ॥
पाइ लगउ तजि मेरा तेरै ॥
कवनु सु जनु जो सउदा जोरै ॥२॥
महलु साह का किन बिधि पावै ॥
कवन सु बिधि जितु भीतरि बुलावै ॥
तूं वड साहु जा के कोटि वणजारे ॥
कवनु सु दाता ले संचारे ॥३॥
खोजत खोजत निज घरु पाइआ ॥
अमोल रतनु साचु दिखलाइआ ॥
करि किरपा जब मेले साहि ॥
कहु नानक गुर कै वेसाहि ॥४॥१६॥८५॥

हिन्दी अर्थ: इस मन-मंदिर के अंदर ही बेअंत प्रभू की नाम-पूँजी है। इस मन-मंदिर में ही वह प्रभू शाहूकार बसता सुना जाता है। कोई विरला नाम-वणजारा है~ जिसका उस शाह की हजूरी में विश्वास बना हुआ है। 1। जो कोई परमात्मा के नाम-रत्न का (असल) व्यापारी है~ वह आत्मिक जीवन देने वाले नाम-भोजन को अपनी जिंदगी का आहार बनाता है। 1। रहाउ। मैं अपना मन तन उसे भेट करता हूँ। उसकी सेवा करने को तैयार हूँ। (मैं उस हरी-जन से पूछना चाहता हूँ कि) वह कौन सा तरीका है जिससे प्रभू प्रसन्न हो जाए? मेर-तेर छोड़ के मैं उसके पाँव लगता हूं। वह कौन सा (विरला प्रभू का) सेवक है जो (मुझे भी) नाम का सौदा करा दे? 2। (मैं उस नाम-रतन व्यापारी से पूछता हूँ कि) नाम-रस के शाह का महल मनुष्य किस ढंग से ढूँढ सकता है? वह कौन सा तरीका है जिस करके वह शाह वणजारे को अपनी हजूरी में बुलाता है? हे प्रभू ! तू सबसे बड़ा है~करोड़ों जीव तेरे वणजारे हैं। नाम की दाति करने वाला वह कौन है जो मुझे पकड़ के तेरे चरणों तक पहुँचा दे?। 3। तलाश करते करते अपना (वह असली) घर ढूँढ लिया (जहां प्रभू शाह बसता है) (गुरू ने ही उस भाग्यशाली वणजारे को) सदा कायम रहने वाला (अमोलक नाम-रत्न) दिखा दिया है। जब भी शाह प्रभू ने कृपा करके (किसी जीव वणजारे को अपने चरणों में) मिलाया है। हे नानक ! कह, गुरु की सहमती से (ऐतबार से / हामी से उस वणजारे ने) ऐसा किया है । 4। 16। 85।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ਗੁਆਰੇਰੀ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਰਹੈ ਇਕ ਰੰਗਾ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਜਾਣੈ ਸਦ ਹੀ ਸੰਗਾ ॥
ਠਾਕੁਰ ਨਾਮੁ ਕੀਓ ਉਨਿ ਵਰਤਨਿ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਵਨੁ ਹਰਿ ਕੈ ਦਰਸਨਿ ॥੧॥
ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਰਾਤੇ ਮਨ ਤਨ ਹਰੇ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਆਤਮ ਆਧਾਰ ॥
ਏਕੁ ਨਿਹਾਰਹਿ ਆਗਿਆਕਾਰ ॥
ਏਕੋ ਬਨਜੁ ਏਕੋ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥
ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਨਹਿ ਬਿਨੁ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥੨॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਦੁਹਹੂੰ ਤੇ ਮੁਕਤੇ ॥
ਸਦਾ ਅਲਿਪਤੁ ਜੋਗ ਅਰੁ ਜੁਗਤੇ ॥
ਦੀਸਹਿ ਸਭ ਮਹਿ ਸਭ ਤੇ ਰਹਤੇ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕਾ ਓਇ ਧਿਆਨੁ ਧਰਤੇ ॥੩॥
ਸੰਤਨ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਵਨ ਵਖਾਨਉ ॥
ਅਗਾਧਿ ਬੋਧਿ ਕਿਛੁ ਮਿਤਿ ਨਹੀ ਜਾਨਉ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮੋਹਿ ਕਿਰਪਾ ਕੀਜੈ ॥
ਧੂਰਿ ਸੰਤਨ ਕੀ ਨਾਨਕ ਦੀਜੈ ॥੪॥੧੭॥੮੬॥
गउड़ी महला ५ गुआरेरी ॥
रैणि दिनसु रहै इक रंगा ॥
प्रभ कउ जाणै सद ही संगा ॥
ठाकुर नामु कीओ उनि वरतनि ॥
त्रिपति अघावनु हरि कै दरसनि ॥१॥
हरि संगि राते मन तन हरे ॥
गुर पूरे की सरनी परे ॥१॥ रहाउ ॥
चरण कमल आतम आधार ॥
एकु निहारहि आगिआकार ॥
एको बनजु एको बिउहारी ॥
अवरु न जानहि बिनु निरंकारी ॥२॥
हरख सोग दुहहूं ते मुकते ॥
सदा अलिपतु जोग अरु जुगते ॥
दीसहि सभ महि सभ ते रहते ॥
पारब्रहम का ओइ धिआनु धरते ॥३॥
संतन की महिमा कवन वखानउ ॥
अगाधि बोधि किछु मिति नही जानउ ॥
पारब्रहम मोहि किरपा कीजै ॥
धूरि संतन की नानक दीजै ॥४॥१७॥८६॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ गुआरेरी ॥ (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) दिन रात एक परमात्मा के प्रेम में (मस्त) रहता है। वह मनुष्य परमात्मा को सदा ही अपने अंग-संग (बसता) समझता है। उस मनुष्य ने ठाकुर (परमात्मा) के नाम को सदा इस्तेमाल होने वाला बनाया है परमात्मा के दर्शन से वह (सदा) तृप्त रहता है~ संतुष्ट रहता है। 1। वे परमात्मा के साथ रंगे रहते हैं (प्रभू की याद में मस्त रहते हैं) उनके मन खिले रहते हैं~ उनके तन खिले रहते हैं (हे भाई !) जो मनुष्य पूरे गुरू की शरण पड़ते हैं । 1। रहाउ। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) परमात्मा के सुंदर चरणों को अपनी जीवात्मा का आसरा बनाए रखते हैं~ वह (हर जगह) एक परमात्मा को ही (बसा हुआ) देखते हैं~ परमात्मा के हुकम में ही वे सदा चलते हैं। परमात्मा का नाम ही उनका वणज है। परमात्मा के नाम के ही वे सदा व्यापारी बने रहते हैं। परमात्मा के बिना वे किसी और के साथ गहरी सांझ नहीं डालते। 2। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य) खुशी ग़मी दोनों से ही स्वतंत्र रहते हैं~ वे सदा (माया से) निर्लिप है। परमात्मा (की याद) में जुड़े रहते हैं और अच्छी जीवन-जुगति वाले होते हैं। वे मनुष्य सबसे प्रेम करते भी दिखते हैं और सबसे अलग (निर्मोह) भी दिखाई देते हैं। वे मनुष्य सदा परमात्मा की याद में सुरति जोड़े रखते हैं। 3। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाले उन) संत जनों का मैं कौन सा बड़प्पन बयान करूँ ? उनकी आत्मिक उच्चता मानवी सोच-समझ से परे है~ मैं कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। हे अकाल पुरख ! मेरे पर कृपा कर~ और मुझ नानक को उन संत जनों के चरणों की धूड़ बख्श। 4। 17। 86।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਸਖਾ ਤੂੰਹੀ ਮੇਰਾ ਮੀਤੁ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਹੀਤੁ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰੀ ਪਤਿ ਤੂਹੈ ਮੇਰਾ ਗਹਣਾ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਨਿਮਖੁ ਨ ਜਾਈ ਰਹਣਾ ॥੧॥
ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਲਾਲਨ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਖਾਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਤੁਮ ਰਾਖਹੁ ਤਿਵ ਹੀ ਰਹਨਾ ॥
ਜੋ ਤੁਮ ਕਹਹੁ ਸੋਈ ਮੋਹਿ ਕਰਨਾ ॥
ਜਹ ਪੇਖਉ ਤਹਾ ਤੁਮ ਬਸਨਾ ॥
ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਜਪਉ ਤੇਰਾ ਰਸਨਾ ॥੨॥
ਤੂੰ ਮੇਰੀ ਨਵ ਨਿਧਿ ਤੂੰ ਭੰਡਾਰੁ ॥
ਰੰਗ ਰਸਾ ਤੂੰ ਮਨਹਿ ਅਧਾਰੁ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰੀ ਸੋਭਾ ਤੁਮ ਸੰਗਿ ਰਚੀਆ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰੀ ਓਟ ਤੂੰ ਹੈ ਮੇਰਾ ਤਕੀਆ ॥੩॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਤੁਹੀ ਧਿਆਇਆ ॥
ਮਰਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਦ੍ਰਿੜਿਆ ਇਕੁ ਏਕੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਟੇਕੈ ॥੪॥੧੮॥੮੭॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तूं मेरा सखा तूंही मेरा मीतु ॥
तूं मेरा प्रीतमु तुम संगि हीतु ॥
तूं मेरी पति तूहै मेरा गहणा ॥
तुझ बिनु निमखु न जाई रहणा ॥१॥
तूं मेरे लालन तूं मेरे प्रान ॥
तूं मेरे साहिब तूं मेरे खान ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ तुम राखहु तिव ही रहना ॥
जो तुम कहहु सोई मोहि करना ॥
जह पेखउ तहा तुम बसना ॥
निरभउ नामु जपउ तेरा रसना ॥२॥
तूं मेरी नव निधि तूं भंडारु ॥
रंग रसा तूं मनहि अधारु ॥
तूं मेरी सोभा तुम संगि रचीआ ॥
तूं मेरी ओट तूं है मेरा तकीआ ॥३॥
मन तन अंतरि तुही धिआइआ ॥
मरमु तुमारा गुर ते पाइआ ॥
सतिगुर ते द्रिड़िआ इकु एकै ॥
नानक दास हरि हरि हरि टेकै ॥४॥१८॥८७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे प्रभू !) तू ही मेरा साथी है~ तू ही मेरा मित्र है~ तू ही मेरा प्रीतम है~ मेरा तेरे साथ ही प्यार है। (हे प्रभू !) तू ही मेरी इज्जत है~ तू ही मेरा गहना है। तेरे बगैर मैं पलक झपकने जितना समय भी नहीं रह सकता। 1। अर्थ: (हे प्रभू !) तू मेरा सुंदर लाल है~ तू मेरी जीवात्मा (का सहारा) है। तू मेरा साहिब है~ तू मेरा ख़ान है। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) जैसे तू मुझे रखता है वैसे ही मैं रहता हूँ। मैं वही करता हूँ जो तू मुझे हुकम करता है। मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मुझे तू ही बसता दिखाई देता है। मैं अपनी जीभ से तेरा नाम जपता रहता हूँ~ जो दुनिया के डरों से बचा के रखने वाला है। 2। (हे प्रभू !) तू ही मेरे वास्ते दुनिया के नौ खजाने है~ तू ही मेरा खजाना है। तू ही मेरे वास्ते दुनिया के रंग और रस है~ तू ही मेरे मन का सहारा है। हे प्रभू ! तू ही मेरे वास्ते शोभा-बड़प्पन है~ मेरी सुरति तेरे (चरणों) में ही जुड़ी हुई है। तू ही मेरी ओट है तू ही मेरा आसरा है। 3। (हे प्रभू !) मैं अपने मन में अपने हृदय में तूझे ही सिमरता रहता हूँ। तेरा भेद मैंने गुरू से पा लिया है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की ओर सेएक परमात्मा का नाम ही हृदय में पक्का करने के लिए प्राप्त किया है~ उस सेवक को सदा हरी नाम का ही सहारा हो जाता है। 4। 18। 87।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

संदर्भ: यह अंग 181 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 181” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 182 →, पीछे का: ← अंग 180

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।