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  • Bhagwad Gita

    Bhagwad Gita

    Here are the 18 lessons that we had covered over WhatsApp in Dec 2024

     

    Date – Dec 5th 2024

    चलिए साहब और साहिबा लोग, आज से भगवद गीता अध्ययन शुरू। मैं हिंदी में टाइप करूँगा, और बहुत संशिप्त में हर chapter की summary बताऊंगा। अगर आप में किसी को comments add करने हों, या सवाल पूछने हों तो ज़रूर respond करें।


    तो भगवद गीता क्या है? क्यों प्रचलित है? पहले इस बारे में कुछ information से शुरू करते हैं।


    भगवद गीता (Bhagavad Gita) एक पवित्र ग्रंथ है जो महाभारत का हिस्सा है। यह 700 श्लोकों का संग्रह है, जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच का dialog (yaani conversation between 2 people) है। यह dialog उस समय हुआ जब महाभारत के युद्ध के मैदान (कुरुक्षेत्र) में, अर्जुन युद्ध करने को लेकर doubt में थे और अपने कर्तव्यों के प्रति confused थे।

    btw, यह दो लोगों के dialog (यानी संवाद) का स्टाइल indian scriptures में बहुत popular है। इसी style में और भी कई scriptures लिखे गए हैं, जिनको उपनिषद कहा जाता है। भगवद गीता भी एक उपनिषद है।

    भगवद गीता में जीवन, धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति, और योग के विषयों पर गहन चर्चा की गई है। यह आत्मा, ब्रह्म, और मोक्ष जैसे गूढ़ विषयों पर प्रकाश डालती है। ONE line summary is – श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए निष्काम (yaani non-attachment to results) भाव से कर्म करने की शिक्षा दी और जीवन में समत्व (समान भाव) बनाए रखने का उपदेश दिया।

    गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में भी देखा जाता है। इसे विश्वभर में भारतीय दर्शन और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है।

    यह उपनिषद का होते हैं? कित्ते होते हैं?
    उपनिषदों की कुल संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद है, लेकिन परंपरागत रूप से 108 उपनिषदों की सूची स्वीकार की जाती है। ये वेदों के दार्शनिक और आध्यात्मिक भाग हैं, जिन्हें वेदांत भी कहा जाता है।

    भगवद् गीता के अलावा और कौन से popular यानी प्रचलित उपनिषद हैं?
    10 मुख्य उपनिषदों को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है

    • ईशावास्य उपनिषद
    • काठ (or Katho-) उपनिषद – ismein Nachiketa waali kahaani hai
    • कण उपनिषद
    • मुण्डक उपनिषद
    • माण्डूक्य उपनिषद
    • प्रश्न उपनिषद
    • तैत्तिरीय उपनिषद
    • ऐतरेय उपनिषद
    • छांदोग्य उपनिषद
    • बृहदारण्यक उपनिषद

    लेकिन यह उपनिषद क्यों पढ़ता है कोई?
    इनका अध्ययन आत्मा, ब्रह्म, और मोक्ष के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए किया जाता है।

    Other common questions people ask –

    इस किताब में Total कितने chapters हैं?
    Answer – 18 Chapters

    To simplify, think of the Geeta as a combination of three sections of 6 chapters each. First six are about Karma Yoga, next 6 are about Bhakti Yog, and then the last 6 are about Gyaan yog (the path of knowledge). A more detailed classification of these chapters, with each chapter’s title, for the advanced students –

    Karma Yog
    Chapter 1 – अर्जुन विषाद योग: 47 verses
    Chapter 2 – सांख्य योग: 72 verses
    Chapter 3 – कर्म योग: 43 verses
    Chapter 4 – ज्ञान योग: 42 verses
    Chapter 5 – कर्म संन्यास योग: 29 verses
    Chapter 6 – ध्याय योग: 47 verses

    Bhakti Yog
    Chapter 7 – ज्ञान-विज्ञान योग: 30 verses
    Chapter 8 – अक्षर-ब्रह्म योग: 28 verses
    Chapter 9 – राजविद्या राजगुह्य योग: 34 verses
    Chapter 10 – विभूति योग: 42 verses
    Chapter 11 – विश्व-रूप दर्शन योग: 55 verses
    Chapter 12 – भक्ति योग: 20 verses

    Gyaan Yog
    Chapter 13 – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग: 35 verses
    Chapter 14 – गुणत्रय विभाग योग: 27 verses
    Chapter 15 – पुरुषोत्तम योग: 20 verses
    Chapter 16 – दैवासुर सम्पद विभाग योग: 24 verses
    Chapter 17 – श्रद्धात्रय विभाग योग: 28 verses
    Chapter 18 – मोक्ष संन्यास योग: 78 verses

     

    Another helpful detail – Chapter 2 and Chapter 18 are summaries of the whole Gita.

    चलिए यह सब तो background information है। अब आप Chapter 1 से पढ़ना शुरू कीजिये ।

  • Chapter 1 – अर्जुन विषाद योग ।

    Date: Dec 6th, 2024

    Here is a simple picture that summarizes this chapter.

     

    महाभारत के युद्ध के प्रारंभ में, कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पांडव सेना आमने-सामने खड़ी हैं। इस अध्याय में धृतराष्ट्र (jo ki apne ghar pe baithe hain, is picture mein nahin hain) अपने साथी संजय (jiske paas TV jaisi superpower thee) से युद्ध का वर्णन सुनते हैं। संजय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्धभूमि का दृश्य धृतराष्ट्र को बताते हैं।

    अर्जुन, जो पांडवों की ओर से मुख्य योद्धा हैं, अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें ताकि वे अपने विरोधियों को देख सकें। जब अर्जुन अपने ही relatives, cousins, गुरुजनों, और मित्रों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखते हैं, तो वे गहरे शोक और मानसिक संताप में डूब जाते हैं।

    अर्जुन सोचते हैं कि इस युद्ध में विजयी होकर भी वे सुखी नहीं हो पाएंगे क्योंकि यह युद्ध उनके अपने प्रियजनों के विनाश का कारण बनेगा। वे अपने कर्तव्य (what should I do? Fight or Flight?) को लेकर confused हो जाते हैं और अपने धनुष (it was called गांडीव) को नीचे रख देते हैं। वे कृष्ण से कहते हैं कि वे इस युद्ध को नहीं लड़ सकते और पूरी तरह से निराश हो जाते हैं।

    निराश yaani Depressed हो जाते हैं । यानी की – उस ज़माने में भी होता था depression. विषाद also means Depression.

     

    That is it. Simple. Chapter 1 finished.

    भगवद गीता के पहले अध्याय, जिसका नाम ” अर्जुन विषाद योग ” है, में कुल 47 श्लोक हैं। There are a lot of details in these 47 verses, but आपने ऊपर वाली picture देख ली बस समझो सब श्लोक सुन लिए।.

     

  • Chapter 2 – सांख्य योग 

    Date: Dec 7th, 2024

    Welcome to भगवद गीता chapter – 2. Ready or not, here we go!

    यह कुछ लम्बा chapter है, इसीलिए आज के लिए, I will try to stay to the point.

    दूसरा अध्याय अर्जुन के मानसिक संघर्ष (यानि की Depression से बाहर निकलने की struggle) को दूर करने और उन्हें कर्तव्य के मार्ग पर प्रेरित करने का पहला कदम है। कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि आत्मा अमर है, और अपने धर्म का पालन करना जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। यह अध्याय कर्म योग और सांख्य योग का basic ज्ञान प्रदान करता है।

    यह सांख्य योग और कर्म योग क्या है?
    इस की best definition के लिए, आपने यह एक श्लोक ज़रूर सुना होगा – गीता के 700 में से सबसे मशहूर श्लोकों में इसकी गिनती है –

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

    प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार केवल अपने कार्य (कर्म) पर है। हमें अपने कर्तव्यों का पालन पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। हमारे कार्यों का क्या परिणाम होगा, यह हमारे नियंत्रण में नहीं है। इसलिए, फल की चिंता में उलझने की बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

    हर काम को (krishna’s) सेवा समझ के करो। किसी कार्य को केवल उसके फल (लाभ या हानि) के लिए करना अनुचित है। कर्म, specially सेवा, निष्काम (स्वार्थरहित) होना चाहिए।

    फल की चिंता से घबराकर या आलस्य में पड़कर कर्म करना छोड़ना (अकर्म) गलत है। कर्म न करना भी पाप है।

    Btw – योग का अर्थ है मन और इंद्रियों का नियंत्रण। योग के through व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है।

    Chapter- 2 का second major point –
    आत्मा का ज्ञान: आत्मा अमर, अजर और अविनाशी है। शरीर नश्वर है और नष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता। मृत्यु के बाद आत्मा केवल पुराने वस्त्र की तरह शरीर को त्यागती है और नया धारण करती है।

    Best two pictures to summarize the two concepts. are –

    This is a famous image. You must have seen it at many homes.
    You are Arjun, riding the chariot. Krishna is responsible for where the chariot (your life) goes. The horses represent your untamed abilities/ talents/ senses. Let Krishna take over and tame these. You just do your work (Karma).

    Second picture is this one –

    It represents our immortality, and the timeless cycle of birth/ life/ death.

    बस, this was the summary of Chapter – 2. This was the most difficult chapter. It gets easier after Chapter 2.

  • Chapter 3 – कर्म योग

    Date: Dec 8th, 2024

    भगवद गीता के अध्याय 2 साख्यो में, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता और निष्काम कर्म के महत्व के बारे में सिखाया। इसके बावजूद अर्जुन अभी भी भ्रमित थे और यह समझ नहीं पाए कि उन्हें ज्ञान के मार्ग पर चलना चाहिए या कर्म के मार्ग पर।

    इसको ऐसे समझें – अगर आप ने chapter २ सुन लिया, समझ लिया, तो फिर “why should I do anything? भगवान सब कर तो रहा है।” दिमाग़ में आ सकता है। यानी – ज्ञान मिल गया। अब कर्म करूँ या नहीं, की फ़र्क़ पैंदा है?

    इसलिए, श्रीकृष्ण ने अध्याय 3 (कर्म योग) में अर्जुन के भ्रम को दूर करने और कर्म के महत्व को समझाने के लिए उपदेश दिया।

    अर्जुन ने पूछा कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो उन्हें युद्ध (कर्म) करने के लिए क्यों प्रेरित किया जा रहा है?

    कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि कर्म का त्याग नहीं, बल्कि फल की इच्छा का त्याग करना चाहिए। अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए निष्काम भाव से कर्म करना ही मोक्ष का मार्ग है। कर्मयोग जीवन को शुद्ध करता है और आत्मा को उच्चतम चेतना की ओर ले जाता है।

    कर्म और ज्ञान दोनों ही मोक्ष के मार्ग हैं, लेकिन कर्म के बिना सिद्धि असंभव है।

    waise bhi – कोई भी व्यक्ति क्षणभर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; प्रकृति के गुण उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। व्यक्तियों को कर्म करके समाज के लिए प्रेरणा बनना चाहिए। उनका कर्म समाज को दिशा देता है।

    प्रकृति के गुण ही सभी कर्म करते हैं, लेकिन अहंकार से अज्ञानी व्यक्ति सोचता है, “मैं कर्ता हूँ।” श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि अहंकार को त्यागकर कर्म करें और अपने धर्म का पालन करें।

    In case Gyaan was in itself sufficient, then God is already “all knowing”. श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि मैं अपने निर्धारित कर्मों का पालन करना छोड़ दूं, तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएंगे। मैं उस अराजकता के लिए उत्तरदायी हो जाऊंगा जो फैल जाएगी, और इस प्रकार मैं मानव जाति की शांति को नष्ट कर दूंगा।

    इंद्रियां स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं, और इंद्रियों से श्रेष्ठ मन है। मन से परे बुद्धि है, और बुद्धि से भी परे आत्मा है।

    आत्मा को बुद्धि से श्रेष्ठ (superior) जानकर, अपने निम्न स्व (इंद्रियों, मन और बुद्धि) को उच्च स्व (आत्मा की शक्ति) द्वारा नियंत्रित करो, और इस भयंकर शत्रु जिसे कामना कहते हैं, का नाश करो।

    In summary – control your body (say through yoga, swimming, or playing badminton; plus eating simple foods), then learn to control your senses (through pranayam), then learn to control your mind (through meditation). you will experience the Atma, only after learning to rule over these.

    In hindi – पहले अपने शरीर को नियंत्रित करें (जैसे योग, तैराकी या बैडमिंटन खेलकर; और सादा भोजन खाकर)।
    फिर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखें (प्राणायाम के माध्यम से)।
    इसके बाद अपने मन को नियंत्रित करना सीखें (ध्यान के माध्यम से)।

    इन सभी पर विजय पाने के बाद ही आप आत्मा का अनुभव कर सकते हैं।

    Chapter 3 – summarized in a few words “Stay Busy, live a simple life, be humble”

    Summary in one image –

  • Chapter 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग

    Date: Dec 9th, 2024

    …also known as दिव्य ज्ञान

    कृष्ण कहते हैं – अब ध्यान से सुनो। यह दिव्य ज्ञान है। तुमने अनगणित जन्म लिए हैं, पर तुम्हें अपने पिछले जन्म याद नहीं। मुझे सब याद हैं।

    In a way, कृष्ण is describing – गुरु परम्परा पद्धति continuing for अनन्त युग। वे कहते हैं की मैंने यही दिव्य ज्ञान कई जन्मों में, कई बार दिया है। कृष्ण ज़िक्र करते हैं उस वक़्त का, जब उन्होंने यही ज्ञान सूर्यदेव, विवस्वान, मनु, इक्ष्वाकु etc को दिया था।

    अब आज आपकी बारी है, इस लंबी लाइन में millions of years तक इंतज़ार करने के बाद। सावधान हो कर, सुनें और समझें। Please do not miss the chance to fully comprehend. अगली बारी कब आएगी, पता नहीं।

    गीता के २ सबसे प्रचलित श्लोक इसी chapter में हैं –

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

    और

    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

    यानी की –
    जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूँ।
    सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के नाश, और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में अवतार लेता हूँ।

    इसके बाद, Chapter 4 में कृष्ण Balanced Living का महत्व बताते हैं।
    yaani – कर्म और ज्ञान के सही संतुलन को समझने का संदेश।

    kahte hain – श्रद्धा , गुरु का मार्गदर्शन , और ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास व्यक्ति को परम शांति की ओर ले जाता है।

    जो मेरे (कृष्ण के) जन्म एवं कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानते हैं वे शरीर छोड़ने पर संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। इंस्टेड, कृष्ण धाम (यान सत्य लोक, या वैकुण्ठ, या नित्य धाम) को प्राप्त करते हैं। आसक्ति (यानी मोह), भय और क्रोध से मुक्त होकर पूर्ण रूप से कृष्ण में मन लगा कर, कृष्ण की शरण ग्रहण कर, पिछले हज़ारों सालों में अनेक लोग इस ज्ञान से पवित्र हो चुके हैं। इस प्रकार से उन्होंने कृष्ण का दिव्य प्रेम प्राप्त किया है।

    जिस भाव से लोग भगवान् की शरण ग्रहण करते हैं, उसी भाव के अनुरूप भगवान्उ उन्हें फल देता है । सभी लोग जाने या अनजाने में भगवान् को ही follow करते हैं।

    इस संसार में जो लोग सकाम कर्मों में सफलता चाहते हैं (यानी की job में तरक्की, सुख, शान्ति, सेहत, लष्मी, आराम, बच्चों का सुख, आदि) वे लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि सकाम कर्मों का फल शीघ्र प्राप्त होता है। जो भी सच्चे दिल से मांगो, मिल जाएगा, पर यह मत समझ लेना की वह मोक्ष का मार्ग है।

    कृष्ण कहते हैं – न तो कर्म मुझे दूषित करते हैं और न ही मैं कर्म के फल की कामना करता हूँ जो मेरे इस स्वरूप को जानता है वह कभी कर्मफलों के बंधन में नहीं पड़ता। इस सत्य को जानकर (यानी की भगवान् से दुनियावी चीज़ें मांगने की बजाय, खुद को भगवान् जैसा बनाने की इच्छा) काल में मुक्ति की अभिलाषा करने वाली आत्माओं ने भी कर्म किए इसलिए तुम्हे भी उन मनुष्यों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

    कर्म, अकर्म और विकर्म क्या है?
    इसका निर्धारण करने में बद्धिमान लोग भी confuse हो जाते हैं।
    तुम्हें सभी तीन कर्मों – यानी कर्म, विकर्म और अकर्म की प्रकृति को समझना चाहिए।

    1 – कर्म: कार्य करने का इंटेंशन, और कार्य करने का action

    2 – अकर्म: अकर्म का अर्थ आलस्य या निष्क्रियता नहीं है। यह एक ऐसी अवस्था है जहां व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्म के फल और उसके बंधनों से मुक्त रहता है। कृष्ण सिखाते हैं कि “कर्म से बचना गलत है, लेकिन कर्म को त्यागते हुए उसका बंधन छोड़ देना ही सच्चा अकर्म है।”

    वे मनुष्य जो अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म को देखते हैं। वे सभी मनुष्यों में बुद्धिमान होते हैं। सभी प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी वे योगी कहलाते हैं और अपने सभी कर्मों में पारंगत होते हैं। जिन मनुष्यों के समस्त कर्म सांसारिक सुखों की कामना से रहित हैं तथा जिन्होंने अपने कर्म फलों को दिव्य ज्ञान की अग्नि में भस्म कर दिया है उन्हें आत्मज्ञानी संत बुद्धिमान कहते हैं।

    अपने कर्मों के फलों की आसक्ति को त्याग कर ऐसे ज्ञानीजन सदा संतुष्ट रहते हैं और बाहरी आश्रयों पर निर्भर नहीं होते। कर्मों में संलग्न रहने पर भी वे वास्तव में कोई कर्म नहीं करते। ऐसे ज्ञानीजन फल की आकांक्षाओं और स्वामित्व की भावना से मुक्त होकर अपने मन और बुद्धि को संयमित रखते हैं और शरीर से कर्म करते हुए भी कोई पाप अर्जित नहीं करते।

    वे सांसारिक मोह से मुक्त हो जाते हैं और उनकी बुद्धि दिव्य ज्ञान में स्थित हो जाती है क्योंकि वे अपने सभी कर्म यज्ञ के रूप में भगवान के लिए सम्पन्न करते हैं और इसलिए वे कार्मिक reactions/ repercussions से मुक्त रहते हैं।

    यह सब रास्ते परम सत्य की ओर बढ़ने के सही रास्ते हैं ।

    जो लोग ऐसे कोई efforts नहीं करते, वे न तो इस संसार में और न ही अगले जन्म में सुखी रह सकते हैं।

    आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य को जानो। विनम्र होकर उनसे ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा प्रकट करते हुए ज्ञान प्राप्त करो और उनकी सेवा करो। जिन्हें समस्त पापों का महापापी समझा जाता है, वे भी दिव्यज्ञान की नौका में बैठकर संसार रूपी सागर को पार करने में समर्थ हो सकते हैं।

    जिन अज्ञानी लोगों में न तो श्रद्धा और न ही ज्ञान है और जो हमेशा sceptic yaani संदेहास्पद प्रकृति के होते हैं उनका पतन होता है।

    3 – विकर्म:
    विकर्म का अर्थ है गलत कर्म या अधर्मपूर्ण कर्म। यह ऐसे कर्मों को दर्शाता है जो धर्म, नैतिकता, और ईश्वरीय मार्ग के विरुद्ध होते हैं। भगवद गीता में विकर्म का उल्लेख उन कार्यों के रूप में किया गया है जो समाज और आत्मा दोनों के लिए हानिकारक हैं और व्यक्ति को पाप व बंधनों में डालते हैं।

    जो वास्तव में अराधना करते हैं वे परम सत्य ब्रह्मरूपी (यानी universal consciousness) अग्नि में आत्माहुति (self sacrifice) देते हैं। यही मोक्ष है।

    अब कृष्ण अलग अलग तरह के योग (परमात्मा को पाने, जिसे मोक्ष कहते हैं) के रास्ते बताते हैं –

    • कुछ योगीजन श्रवणादि (मन्त्र और कीर्तन सुन ने की) क्रियाओं से संयम पाते हैं ।
    • कुछ अन्य शब्दादि (मन्त्र जाप) जैसी क्रियाओं से संयम पाते हैं।
    • कुछ लोग यज्ञ के रूप में अपनी सम्पत्ति को अर्पित करते हैं।
    • कुछ अन्य लोग यज्ञ के रूप में कठोर तपस्या करते हैं और कुछ योग यज्ञ के रूप में अष्टांग योग का अभ्यास करते हैं और,
    • जबकि अन्य लोग यज्ञ के रूप में वैदिक ग्रंथों का अध्ययन और ज्ञान पोषित करते हैं
    • कुछ कठोर प्रतिज्ञाएँ करते हैं।
    • कुछ अन्य लोग भी हैं जो प्राणायाम करते हैं।
    • कुछ योगी जन अल्प भोजन (यानी fasting या व्रत) करते है।

    यह सब रास्ते परम सत्य की ओर बढ़ने के सही रास्ते हैं ।

    जो लोग ऐसे कोई efforts नहीं करते, वे न तो इस संसार में और न ही अगले जन्म में सुखी रह सकते हैं।

    आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य को जानो। विनम्र होकर उनसे ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा प्रकट करते हुए ज्ञान प्राप्त करो और उनकी सेवा करो। जिन्हें समस्त पापों का महापापी समझा जाता है, वे भी दिव्यज्ञान की नौका में बैठकर संसार रूपी सागर को पार करने में समर्थ हो सकते हैं। जिन अज्ञानी लोगों में न तो श्रद्धा और न ही ज्ञान है और जो हमेशा sceptic yaani संदेहास्पद प्रकृति के होते हैं उनका पतन होता है।

    सवाल पूछने में कोई बुराई नहीं है। सच में curiosity है, तो बिलकुल सवाल पूछें। पर बिना सच्ची जिज्ञासा के, सिर्फ अपने को ऊपर/ या बड़ा दिखाना, या हर बात पे शक करना ठीक नहीं – संदेहास्पद जीवात्मा के लिए न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई सुख है।

  • Chapter 5 – कर्म संन्यास योग

    Date: Dec 10th, 2024

    5th Chapter में संन्यास के मार्ग की तुलना कर्मयोग के मार्ग के साथ की गयी है।

    अर्जुन ने कृष्ण से पूछा – संन्यास की सराहना की जाती है, पर आपने मुझे भक्तियुक्त कर्मयोग का पालन करने को कहा । यह कुछ confusing लगा । Please do not give me choices. निश्चित रूप से यह बताएं कि इन दोनों में से कौन सा एक मार्ग अधिक लाभदायक है।

    कृष्ण कहते हैं –
    दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं और हम इनमें से किसी एक को choose कर सकते है।

    लेकिन कर्म का त्याग तब तक पूर्णरूप से नहीं किया जा सकता, जब तक मन पूरी तरह शुद्ध न हो जाये। मन की शुद्धि, भक्ति के साथ कर्म करने से ही प्राप्त होती है। इसलिए कर्मयोग ज़्यादातर लोगों के लिए best है। कर्मयोगी अपने सांसारिक responsibilities को ठीक से निभाते हुए, अपने कर्म फलों की आसक्ति का त्याग कर उन्हें भगवान को अर्पित करते हैं। इस प्रकार से वे पाप से उसी प्रकार से अप्रभावित रहते हैं जिस प्रकार से कमल के पुष्प का पत्ता जल में तैरता है किन्तु जल उसे स्पर्श नहीं कर पाता। वे न तो स्वयं को कर्म का कर्ता और न ही कर्म का भोक्ता मानते हैं। वे ब्राह्मण, गाय, हाथी, और कुत्ते का मांस भक्षण करने वाले चांडाल तक को एक समान दृष्टि से देखते हैं।

    ऐसे सच्चे संत, भगवान की qualities को अपने भीतर विकसित करते हैं और परम सत्य में स्थित हो जाते है।

    यह chapter संन्यास के मार्ग का भी वर्णन करता है। संन्यासी अपने मन, इन्द्रियों और बुद्धि को नियंत्रित करने के लिए तपस्या करते हैं। इस प्रकार से वे बाहरी सुख के विचारों को छोड़ कर – इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो जाते हैं। तब फिर वे भगवान की भक्ति के साथ अपनी तपस्या को सम्पूर्ण करते हैं और long-term शांति प्राप्त करते हैं।

    केवल अज्ञानी ही संन्यास को कर्मयोग से different कहते हैं| जो वास्तव में ज्ञानी हैं, वे यह कहते हैं कि इन दोनों में से किसी भी मार्ग follow करने से वे दोनों का फल प्राप्त कर सकते हैं।

    कर्मयोग में belief रखने वाले हमेशा देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, चलते-फिरते, सोते हुए, श्वास लेते हुए, बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए और आंखें खोलते या बंद करते हुए – हमेशा यह सोचते हैं- ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’ और दिव्य ज्ञान के आलोक में वे यह देखते हैं कि physical senses केवल अपने विषयों में ही active रहती हैं।

    संन्यासी भी जो continuous practice से क्रोध और काम वासनाओं पर विजय पा लेते हैं एवं जो अपने मन को वश में कर सकते हैं, वे इस जन्म में और परलोक में भी माया शक्ति के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

    Chapter 5 के end में कृष्ण कहते हैं –

    पाँचों इंद्रियों और सुख के विषयों का विचार न कर, अपनी दृष्टि को भौहों के बीच के स्थान में स्थित करो। Inhale और Exhale को balance करते हुए इन्द्रिय, मन और बुद्धि को (mind, body, senses) संयमित करो । ऐसा करने से कामनाओं और भय से सदा के लिए मुक्त हो जाओ।

    This is exactly what an Olympic athlete, or a brilliant student does before each competition, and each test.

  • Chapter 6: ध्यानयोग

    Date: Dec 11th, 2024

    ध्यान योग (Dhyan Yoga) का अर्थ है Meditation का योग। यह मन की एकाग्रता, आत्म-नियंत्रण, और ध्यान के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर से union प्राप्त करने का मार्ग है।

    “ध्यान” का अर्थ है deep एकाग्रता या चिंतन, और “योग” का अर्थ है संयोग या मिलन। ध्यान योग के माध्यम से व्यक्ति अपने आत्मा (आत्मा) को परमात्मा (ईश्वर) के साथ जोड़ने का प्रयास करता है।

    ध्यान योग के main principles:

    1. मन का Discipline: मन और 5 senses को control करना और उन्हें भटकने से रोकना।
      मन disciplined है, तो यह हमारा मित्र बनता है, और यदि मन unbalanced या undisciplined है, तो यह हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।
    2. मोक्ष का मार्ग: ध्यान योग व्यक्ति को physical desires (ज़र, ज़मीन, जोरू) से ऊपर उठने और अपने Real nature को पहचानने में मदद करता है। यह आत्मिक शांति और मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने का सीधा मार्ग है।
    3. समता और आसक्ति से मुक्ति: ध्यान योगी बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित रहता है और सुख-दुख, हानि-लाभ में समभाव बनाए रखता है।
    4. ईश्वर से संबंध: ध्यान योग में स्थिर पूरे दिल और श्रद्धा से ध्यान करते हुए, साधक ईश्वर की उपस्थिति को अपने भीतर और पूरे सृष्टि में अनुभव करता है।
    5. समान दृष्टि: ध्यान योगी सभी प्राणियों में एक समान आत्मा को देखता है और समभाव के साथ सभी से व्यवहार करता है।

    Meditation कैसे की जाए?

    कृष्ण बताते हैं:

    1. उचित स्थान: स्वच्छ, शांत, और एकांत स्थान choose करें। शरीर, सिर, और गर्दन को सीधा रखते हुए स्थिर मुद्रा में बैठें। मन को शांत करें और एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें।
    2. जीवन में संतुलन : भोजन, नींद, और कार्य में अति या कमी से बचें। संतुलित जीवनशैली अपनाएं।
    3. ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करना : अपने मन को ईश्वर या आत्मा पर स्थिर करें। मन को वैसा ही स्थिर बनाएं जैसा बिना हवा में दीपक की लौ होती है।
    4. धैर्य और अनुशासन : जब भी मन भटके, उसे धीरे-धीरे वापस ध्यान में लाएं। Apne अभ्यास में धैर्य और अनुशासन बनाए रखें।
    5. ईश्वर के साथ एकत्व : जो साधक श्रद्धा और प्रेम के साथ ईश्वर में ध्यान करता है, वही सच्चा योगी है। यह कोई physical मिलना नहीं है। दूसरों में भगवान् देखें। हर काम करने से पहले सोचें – भगवान् की सेवा में यह काम उचित होगा? अगर आप खुद भगवान् हों, तो क्या ऐसा करेंगे?

    अगर आप यह सोच रहे हैं – मैंनू की? तो ध्यान योग के फायदे note karein:

    1. आंतरिक शांति: मन को शांत करता है, तनाव और चिंता को दूर करता है, और आत्मिक शांति प्रदान करता है। You can actually feel this, as soon as you meditate, within 20 minutes.
    2. आत्म-साक्षात्कार: Real और timeless स्वरूप का अनुभव करने में मदद करता है। This is not something you will understand by reading. यह Experiential है। जब आपको इसका Experience होगा, आप शायद किसी को explain भी ना कर पाएंगे।
    3. आध्यात्मिक मुक्ति: भौतिक बंधनों और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करता है।
    4. समान दृष्टि: सभी प्राणियों में समानता और करुणा का भाव विकसित करता है।

    One controversial example – अगर आप सच में feel करें की उस Chicken का भी भाई, बहन, पिता, माता, और बच्चा है। उस chicken को भी धूप अच्छी लगती है, नींद आती है, भूख लगती है – तो क्या आप फिर भी पूछेंगे – is it ok to eat meat?

    Remember – जिन्होंने मन पर विजय पा ली है, मन उनका मित्र है किन्तु जो ऐसा करने में असफल होते हैं मन उनके शत्रु के समान कार्य करता है।
    मन Twin Edged Sword है।

    जिन्होंने मन पर विजय पा ली है वे शीत-ताप, सुख-दुख और मान-अपमान के struggles से ऊपर उठ जाते हैं।

    यह जो Chicken वाला example है – इसको सच में feel करना, और इसके बारे में पढ़ना 2 अलग अलग experiences हैं। जब आप meditation करोगे, तो एक दिन आप पालक, गाजर, aur चावल के साथ भी empathize करोगे – वह भी alive हैं।

     

  • Chapter 7: ज्ञान-विज्ञान योग

    (The Yoga of Knowledge and Wisdom )

    Date: Dec 12th, 2024

    कृष्ण कहते हैं – अब मैं तुम्हारे समक्ष इस ज्ञान और विज्ञान को पूरी तरह से प्रकट करूँगा जिसको जान लेने पर इस संसार में तुम्हारे जानने के लिए और कुछ शेष नहीं रहेगा।

    हजारों में से कोई एक मनुष्य कर्म, भक्ति, और ज्ञान के रास्ते से सिद्धि (special super powers) के लिए प्रयत्न करता है, और ऐसे सिद्धि प्राप्त करने वालों में से कोई एक विरला rare person ही वास्तव में मुझे जान पाता है।

    भगवान् से श्रेष्ठ कोई नहीं है। सब कुछ भगवान् पर उसी प्रकार से आश्रित है, जिस प्रकार से धागे में गुंथे मोती।
    भगवान् ही जल का स्वाद है, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश है, वैदिक मंत्रों में पवित्र अक्षर ओम है , भगवान् ही अंतरिक्ष की ध्वनि और मनुष्यों में सामर्थ्य है। भगवान् ही पृथ्वी की शुद्ध सुगंध और अग्नि में दमक है, सभी प्राणियों में जीवन शक्ति है, और तपस्वियों का तप है।

    कहने का मल्लब है – इस संसार में जो कुछ दिखता है, सुन ने में आता हैं, चखने में आता है, किसी भी तरह से महसूस होता है, और जो कुछ उस सब के पार भी है – सब भगवान् ही है। anything you can imagine, and everything else beyond the imagination – is God

    कृष्ण आपको God की definition समझा रहे हैं

     

    चार प्रकार के लोग भगवान् की शरण ग्रहण नहीं करते –
    1 – वे जो ज्ञान से वंचित हैं,
    2 – वे जो अपनी घटिया nature के कारण मुझे जानने में समर्थ होकर भी आलसी होकर मुझे जानने का प्रयास नहीं करते,
    3 – जिनकी बुद्धि भ्रमित (confused) है और
    4 – जो आसुरी (depressed / demonic / destructive) प्रवृति के हैं।

     

    ऐसे ही, चार प्रकार के पवित्र लोग भगवान् की भक्ति में लीन रहते हैं:
    1 – परेशान, अर्थात पीड़ित,
    2 – ज्ञान की जिज्ञासा रखने वाले जिज्ञासु,
    3 – संसार को जीतने की अभिलाषा रखने वाले लालची, और
    4 – जो परमज्ञान में स्थित ज्ञानी हैं।

    कृष्ण कहते हैं – इन चारों में से मैं #4 को मैं श्रेष्ठ मानता हूँ, जो ज्ञान युक्त होकर मेरी आराधना करते हैं और दृढ़तापूर्वक अनन्य भाव से मेरे प्रति समर्पित होते हैं। मैं उन्हें बहुत प्रिय हूँ और वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

    वास्तव में वे सब (all 4 categories) जो मुझ पर समर्पित हैं, निःसंदेह महान हैं। लेकिन जो ज्ञानी हैं (#4) और स्थिर मन वाले हैं और जिन्होंने अपनी बुद्धि मुझमें एक कर दी है और जो केवल मुझे ही परम लक्ष्य के रूप में देखते हैं, उन्हें मैं अपने समान ही मानता हूँ।

    Now comes the topic about Gurus, and Devtaas.

    कृष्ण कहते हैं –

    वे मनुष्य जिनकी बुद्धि physical and materialistic wants / needs / कामनाओं द्वारा unclear है, वे देवताओं (अपने favorite देवता का नाम आप जानते होंगे) की शरण में जाते हैं। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार वे देवताओं की पूजा करते हैं और इन देवताओं को संतुष्ट करने के लिए वे धार्मिक कर्मकाण्डों में devoted रहते हैं।

    भक्त श्रद्धा के साथ स्वर्ग के देवता के जिस रूप की पूजा करना चाहता है, मैं (यानी की यह भी भगवान् हे करते हैं ) ऐसे भक्त की श्रद्धा को उसी रूप में स्थिर करता हूँ।

    श्रद्धायुक्त होकर ऐसे भक्त किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं, और अपनी मन मानी वस्तुएँ प्राप्त करते हैं। किन्तु वास्तव में ये सब लाभ भगवान् द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं।

    (आप लोग समझ रहे हैं? देवता और भगवान् का difference? भगवान् निराकार है। अपनी ease और convenience के लिए हमनें देवताओं को याद करते है। )

    किन्तु ऐसे अल्पज्ञानी (मंद बुध्दि) लोगों को प्राप्त होने वाले फल भी नश्वर होते हैं। (They do not last for too long ) जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वे देव लोकों (temporary dimensions that may appear after death) को जाते हैं जबकि भगवान् के सच्चे भक्त मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

    बुद्धिहीन मनुष्य सोचते हैं कि परमेश्वर पहले निराकार था और अब इन मूर्तियों, pictures आदि में यह साकार व्यक्तित्त्व धारण किया है। वे मेरे इस अविनाशी (timeless) और सर्वोत्तम दिव्य (divine) स्वरूप की प्रकृत्ति को नहीं जान पाते।

    in summary – हमारी इंद्रियों की सीमाएँ हैं। हम केवल कुछ मील की दूरी तक देख सकते हैं, और यहाँ तक कि शक्तिशाली दूरबीनों से भी केवल कुछ million miles तक ही देख पाते हैं। सबसे अच्छे उपकरणों के साथ भी, हम केवल three dimensions को ही देख सकते हैं। लेकिन भगवान has unlimited dimensions, is everywhere, and has been timeless (अतीत, वर्तमान और भविष्य में सदा एक समान)।

    Question – अगर भगवान् ही सब जगह हैं, तो क्यों हमें नहीं दीखते या महसूस होते?
    यहां पर कृष्ण “माया” शब्द का use करते है। It is simply another word to describe our ignorance

    अगले Chapter में कृष्ण उन आत्माओं के संबंध में बताएँगे जो देह त्यागते समय उनका स्मरण करती हैं और उनका लोक प्राप्त करती हैं। किन्तु मृत्यु के समय भगवान का स्मरण अत्यंत कठिन होता है। मृत्यु के समय मन और बुद्धि कार्य करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चेतना शून्य हो जाता है तब ऐसी स्थिति में कोई भगवान का स्मरण कैसे कर सकता है?

    यह केवल उनके लिए संभव है जो life-long practice करे, और शरीर के सुख और दुख से परे हैं। ऐसे लोग बहुत सजगता से देह का त्याग करते हैं।

     

  • Chapter 8: अक्षर ब्रह्म योग

    (अक्षर मतलब अविनाशी, यानी Constant and unchanging)

    Date: Dec 13th, 2024

    इस अध्याय में मुख्य रूप से भगवान ने जीवन, मृत्यु, आत्मा, और मोक्ष के रहस्यों को समझाया है। अर्जुन ने भगवान से आठ questions पूछे:

    1. ब्रह्म क्या है? अर्जुन ने पूछा कि ब्रह्म (परम सत्य) का वास्तविक स्वरूप क्या है? यह अनंत और अविनाशी तत्व क्या है?
    2. अध्यात्म क्या है? आत्मा का स्वभाव और उसकी Real प्रकृति क्या है? अध्यात्म का वास्तविक अर्थ क्या है?
    3. कर्म क्या है? अर्जुन ने कर्म का real meaning और उसका प्रभाव जानना चाहा।
    4. अधिभूत क्या है? Material World और नश्वर वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप क्या है?
    5. अधिदैव क्या है? देवताओं और worldly शक्तियों का स्वभाव क्या है?
    6. अधियज्ञ कौन है? यज्ञों में उपस्थित वह देवता कौन है, जिसे अधियज्ञ कहा जाता है?
    7. मृत्यु के समय भगवान का स्मरण कैसे करें, ताकि मोक्ष प्राप्त हो सके?
    8. मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है, आत्मा की यात्रा और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है?

    इन प्रश्नों के medium से कृष्ण ने जीवन के deepest सत्य और भक्ति-योग का महत्व समझाया।

    कृष्ण ने इन सवालों का जवाब दिया –

    Answer 1: ब्रह्म वह permanent truth, जो Real, indestructible, timeless, and ever-present है।
    यह वह शक्ति है, जो सभी प्राणियों के भीतर स्थित है और जिसे न समय प्रभावित कर सकता है, न ही कोई अन्य शक्ति।
    यह संसार का मूल कारण है और सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय का आधार है।
    (human mind से इसको सही में visualize करना कठिन है। इसको एक definition यानी परिभाषा की तरह समझें)

    Answer 2: अध्यात्म का अर्थ है आत्मा का स्वभाव। आत्मा ब्रह्म का ही अंश है।
    यह शरीर से अलग है और सदा अनंत रहता है।
    आत्मा मनुष्य के भीतर स्थित वह चेतना है, जो शरीर और मन के परे है।

    Answer 3: कर्म का अर्थ है वह क्रिया (intention to act, or an action) जिससे सृष्टि का संचालन होता है।
    यह वह कार्य है, जो प्राणी को उसके past संस्कार और present इच्छाओं के आधार पर future के लिए प्रेरित करता है।
    यज्ञ, दान, तप और सभी धर्म-निष्ठ कार्य भी कर्म का ही रूप हैं।

    Answer 4: अधिभूत सभी नश्वर वस्तुएँ और material world है।
    यह सृष्टि का वह भाग है, जो समय के साथ बदलता और नष्ट हो जाता है।
    इसमें पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश) और सभी seemingly जड़ वस्तुएँ शामिल हैं।

    Answer 5: अधिदैव वह divine या ब्रह्मांडीय शक्ति है, जो physical universe और प्राणियों के संचालन में सहायक होती है।
    इसे ‘हिरण्यगर्भ’ (universal consciousness) भी कहा जाता है, जो ब्रह्मांड का divine रूप है।
    यह प्राणियों के जीवन चक्र और प्रकृति के नियमों को नियंत्रित करता है।

    Answer 6: अधियज्ञ स्वयं भगवान हैं, जो सभी यज्ञों में उपस्थित रहते हैं।
    वह प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित होकर उनके सभी कर्मों और यज्ञों को प्रेरित करते हैं।
    यज्ञ भगवान की पूजा और उनके प्रति समर्पण का प्रतीक है।
    Btw – यज्ञ का अर्थ है एक पवित्र कर्म या ceremony, जिसमें श्रद्धा और समर्पण के साथ ईश्वर की आराधना की जाती है। यह केवल अग्नि में आहुति देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उन सभी कर्मों का combination है जो निस्वार्थ भाव से किए जाएँ और जिनका उद्देश्य लोक कल्याण और ईश्वर की प्रसन्नता हो।

    Answer 7: मृत्यु के समय मन और बुद्धि को स्थिर रखकर भगवान के नाम और स्वरूप का स्मरण करना चाहिए।
    “ॐ” मंत्र का मन ही मन उच्चारण करते हुए भगवान के निराकार रूप में ध्यान केंद्रित करें। (यह कैसे करें? Well, यह एक लम्बा topic है। अभी सिर्फ इतना समझ लीजिये की इसके लिए ही meditation और भक्ति की जाती है। )
    जो व्यक्ति मृत्यु के समय भगवान को स्मरण करता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करता है।

    Answer 8: मृत्यु के बाद आत्मा उसी लोक को प्राप्त करती है, जो उसके मृत्यु के समय के स्मरण और कर्मों के अनुसार होता है।
    जो निराकार भगवान् का ध्यान करता है, वह परमधाम (भगवान का Real धाम, जिसे वैकुण्ठ और सत्य लोक कहते हैं) जाता है।
    जो भौतिक वस्तुओं या इच्छाओं में लिप्त रहता है, वह पुनर्जन्म के चक्र में लौटता है। इनमें से जो पुण्य करते हैं, वह कुछ समय के लिए स्वर्ग में Stop लेते हैं। जो गुरु का ध्यान करते है, वह अपने गुरु के पास जाते हैं (जहां भी गुरु की आत्मा गयी हो)। जो देवताओं को याद करते हैं, वह उस देवता के पास (यानी स्वर्ग, जो की temporary stop ही है ) जाते हैं।
    Eventually , कई जन्मों की continuous evolution के बाद धीरे धीरे बाकी सब से हठ के, किसी ना किसी तरह से (भगवान् की ही कृपा से) आखिर मन भगवान् में लग ही जाता है।
    आत्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है, जो भगवान की भक्ति और ध्यान से प्राप्त होता है।

    यह 8th Question का answer देते हुए जो “Eventually” (यानी बहुत समय बाद) शब्द उसे हुआ है, उसका भी मतलब कृष्ण बताते हैं –

    चारों युग मिलाकर एक महायुग बनता है, जिसकी कुल अवधि 43,20,000 वर्ष है।
    71 महायुग = 1 मन्वंतर (Manvantara) = 30,67,20,000 वर्ष (30.67 करोड़ वर्ष)
    14 मन्वंतर + अंतराल = 1 कल्प (Kalpa) = 4.32 अरब वर्ष = ब्रह्म का एक दिन। इतनी ही लम्बी ब्रह्मा की रात होती है।
    यानी ब्रह्मा का एक पूरा दिन (और रात) = 8.64 अरब वर्ष।

    ब्रह्मा के दिन के शुभारम्भ पर सभी जीव unmanifest अवस्था से visible होते हैं और रात्रि होने पर पुनः सभी जीव unmanifest अवस्था में लीन हो जाते हैं।
    ब्रह्मा के दिन के आगमन के साथ असंख्य जीव पुनः जन्म लेते हैं और ब्रह्माण्डीय रात्रि के आने पर अगले ब्रह्माण्डीय दिवस के आगमन पर
    अपने आप फिर से प्रकट होने के लिए गायब हो जाते हैं।

    व्यक्त और अव्यक्त सृष्टि से परे अन्य अव्यक्त Real डाइमेंशन्स भी है। उनको समझना human mind से परे है।

    जब सब कुछ विनष्ट हो जाता है किन्तु उसकी Existence का विनाश नहीं होता।

    Anyways, the point is – अगर भगवान् की भक्ति ना भी करो, या उलटी सीधी जैसे तैसे करो, तो भी ब्रह्मा के एक दिन बाद आप को मोक्ष मिल ही जाएगा।

    समझने की बात यह है – इतना इंतज़ार करना है? क्यों ना जल्दी यह सफर तय किया जाए।

    इसको ऐसे समझें – आपके सामने २ मार्ग हैं। इनमें से एक मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाला है और दूसरा almost-infinite पुनर्जन्म की ओर ले जाता है। जो योगी इन दोनों मार्गों का रहस्य जानते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते इसलिए वे सदैव योग में स्थित रहते हैं।

    वे वेदों के अध्ययन, तपस्या, यज्ञों के अनुष्ठान और दान से प्राप्त होने वाले फलों से above and beyond और अधिक लाभ प्राप्त करते हैं। सिर्फ ऐसे योगियों को भगवान का परमधाम जल्दी प्राप्त होता है।

    सातवें और आठवें Chapters में श्रीकृष्ण ने भक्ति को योग प्राप्त करने का सरल साधन और योग की उत्तम process बताया। 9th Chapter में उन्होंने अपनी परम महिमा का description किया है जिससे विस्मय (wonder), श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न होती है। We will take a look at that tomorrow.

  • Chapter 9: राजविद्या-राजगुह्य योग।

    Date: Dec 14th, 2024

    इसमें श्रीकृष्ण ने राजविद्या (सर्वोच्च ज्ञान) और राजगुह्य (deepest secret mystery) का उपदेश दिया है।

    इसे भगवद गीता का हृदय भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें भक्ति योग और भगवान के सर्वव्यापी स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है। ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग भक्ति है। उन्होंने अर्जुन को विश्वास दिलाया कि जो भी व्यक्ति सच्चे दिल से भगवान की भक्ति करता है, वह उन्हें प्राप्त करता है और मोक्ष प्राप्त करता है। यह अध्याय भक्ति के महत्व और भगवान के प्रति समर्पण की महिमा को दर्शाता है।

    इस अध्याय का अर्थ, चार संक्षिप्त लाइन में –
    1 – भगवान की सर्वव्यापकता (omni-presence ): भगवान हर जगह हैं और हर चीज़ में व्याप्त हैं।
    2 – भक्ति का महत्व: भगवान के प्रति सच्ची भक्ति से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष प्राप्त होता है।
    3 – सरलता: भगवान को पाने के लिए material objects की आवश्यकता नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम और श्रद्धा ही पर्याप्त है।
    4 – हर किसी के लिए समान अवसर: भक्ति का मार्ग सभी के लिए खुला है, चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग, या स्थिति का हो।

    Point #3 को समझाने के लिए, कृष्ण ने कहा – जो कोई मुझे प्रेम और भक्ति के साथ एक पत्ता, फूल, फल, या जल अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूं और प्रसन्न होता हूं। यानी छोटी से छोटी चीज़, या सिर्फ भावना ही काफ़ी है किसी सच्चे के दिल को या भगवान को जीतने के लिए।

    कृष्ण के यह शब्द दिवाली और Christmas के टाइम पर specially relevant हैं। हम बेकार में ही लोगों के लिए gifts ख़रीदते रहते हैं। जो material gifts से खुश हों, उनको खुश रखना impossible है।

    कृष्ण के कुछ और शब्द जो Chapter 9 से हैं और मेरे प्रिय हैं –

    मैं सभी प्राणियों के प्रति समान हूं। न कोई मेरा शत्रु है और न कोई मेरा प्रिय है। लेकिन जो लोग भक्ति के साथ मेरी आराधना करते हैं, वे मुझमें होते हैं और मैं उनमें।

    यानी भगवान पक्षपाती नहीं हैं। चाहे तुम पंडित हो, या merchant, या कसाई।

  • Chapter 10: विभूति योग

    Date: Dec 15th, 2024

    (विभूति मतलब – भगवान के अनन्त वैभवों (Glories) की visualization/ comprehension/ पूजा/ स्तुति)

    इस chapter में कृष्ण अपने आपको describe करते हैं। कृष्ण बताते हैं कि वे सृष्टि में प्रकट प्रत्येक अस्तित्व का स्रोत हैं। मनुष्यों में various प्रकार के गुण उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। सात महर्षि, चार महान ऋषि और चौदह मनुओं (यह पृथ्वी पर predecessors of humans थे) का जन्म उनके मन से हुआ और बाद में संसार के सभी मनुष्य इनसे प्रकट हुए।

    (Notes

    सात महर्षि (Seven Great Sages) कौन हैं ? (please notice the use of present tense – these are celestial beings that are still present)

    यह वे ऋषि हैं, जो ब्रह्मांड के निर्माण और ज्ञान के प्रसार में सहायक हैं। उन्हें सृष्टि के संचालक और मानव जाति के मार्गदर्शक माना जाता है।
    इन सात महर्षियों के नाम हैं: अत्रि, भृगु, पुलह, पुलस्त्य, वशिष्ठ , क्रतु, मरिचि।

    ये ऋषि ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं और इनका कार्य सृष्टि की रचना में सहयोग करना और धर्म, ज्ञान, और आध्यात्म का प्रचार-प्रसार करना है।

    चार महान ऋषि (Four Kumaras or Great Sages) कौन हैं?
    यह सात ऋषिओं से भी पहले आये थे। यह चार महान ऋषि वे हैं, इन्हे चतु: सनकादी ऋषि भी कहा जाता है। ये ब्रह्मा के पहले मानस पुत्र हैं और ज्ञानी, तपस्वी, तथा ब्रह्मचर्य के प्रतीक हैं। इनके नाम हैं: सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार।

    ये चारों महान ऋषि सृष्टि के प्रारंभ में ज्ञान और वैराग्य का प्रसार करने के लिए जन्मे। उन्होंने सांसारिक बंधनों को त्यागकर मोक्ष और तपस्या का मार्ग दिखाया।

    चौदह मनु (Fourteen Manus) – मनु सृष्टि के समय के मापदंड (युगों) के अधिपति (supervisor) और मानव जाति के पूर्वज हैं। हर मन्वंतर (Manvantara) में एक मनु होता है, और वर्तमान ब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं। पिछले chapter के description में मैने आपको बताया था ब्रह्मा के 1 दिन कि duration के बारे में।

    चौदह मनुओं के नाम हैं: स्वायंभुव मनु, स्वारोचिष मनु, औत्तम मनु, तमस मनु, रैवत मनु, चाक्षुष मनु, वैवस्वत मनु (वर्तमान मनु) , सावर्णि मनु, दक्षसावर्णि मनु, ब्रह्मसावर्णि मनु, धर्मसावर्णि मनु, रुद्रसावर्णि मनु, देवसावर्णि मनु, इन्द्रसावर्णि मनु।

    मनु वे हैं जो मानव जाति (मनुष्य) के जनक (creator) माने जाते हैं और धर्म, शासन, तथा संस्कृति की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्तमान में हम वैवस्वत मनु के काल में हैं।)

    जीवों में various गुण जैसे-बुद्धि, ज्ञान, विचारों की clarity, क्षमा, सत्यता, इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण, सुख और दुख, जन्म-मृत्यु, भय, निडरता, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश केवल भगवान् से ही उत्पन्न होते हैं।

    भगवान entire सृष्टि का source हैं । सभी वस्तुएँ भगवान् से ही उत्पन्न होती हैं। जो बुद्धिमान यह जान लेता है वह पूर्ण दृढ़ विश्वास और प्रेमभक्ति के साथ भगवान की उपासना करता है। भगवान् के भक्त अपने मन को भगवान् में स्थिर कर अपना जीवन भगवान् में समर्पित करते हुए सदैव संतुष्ट रहते हैं। वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते हुए भगवान् के विषय में वार्तालाप करते हुए और उनकी महिमा का गान करते हुए अत्यंत आनन्द और संतोष की अनुभूति करते हैं।

    जिनका मन सदैव भगवान् की प्रेममयी भक्ति में एकीकृत हो जाता है, भगवान् उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं जिससे वह भगवान् को पा सकते हैं।

    जो यह जानते हैं कि सबका source खुद भगवान हैं, वे unshakeable श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में डूबे रहते हैं। ऐसे भक्त उनकी महिमा की चर्चा कर full mental satisfaction एवं मानसिक शांति प्राप्त करते हैं,और अन्य लोगों को भी जागृत करते हैं क्योंकि उनका मन उनमें एकीकृत हो जाता है। इसलिए भगवान उनके हृदय में बैठकर उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं ताकि वे उन्हें सुगमता से प्राप्त कर सकें।

    कृष्ण के इन सब self-descriptions को सुन कर अर्जुन मान जाता है कि उसे भगवान की सर्वोच्च स्थिति कि पूरी understanding आ गयी है । फिर वह कृष्ण से request करता है कि वे दोबारा अपना (कृष्ण का) अधिक से अधिक वर्णन करें जिसको सुन ना अमृत पीने के समान है। इसको ऐसा समझिये कि – जब हम कहीं असाधारण आतिशबाज़ी को देखते हैं जो बहुत अच्छी लगती है और हमें ख़ुशी देती है, तब हमें उसे बार बार देखना चाहते हैं । ऐसे ही अर्जुन का भी मन था कि बार बार कृष्ण के self-description को सुने।

    कृष्ण ऐसे powerful dynamo के समान हैं जहाँ से मानवजाति के साथ-साथ ब्रह्माण्ड में सभी पदार्थ अपनी ऊर्जा प्राप्त करते हैं। बाकी Chapter में वे उन सभी श्रेष्ठ पदार्थों, व्यक्तित्वों और क्रियाओं का मनमोहक वर्णन करते हैं जो उनके विशाल वैभव को प्रदर्शित करते हैं। वह यह भी clearly कहते हैं कि उनका full-description impossible है । उनकी अनन्त महिमा के महत्व का अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वे ही अनन्त ब्रह्माण्डों को अपने दिव्य स्वरूप के एक small fraction के रूप में धारण किए हुए हैं।

    भगवान् की दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। कृष्ण ने जो अर्जुन से कहा यह भगवान् की अनन्त महिमा का संकेत मात्र है।

  • Chapter 11: विश्वरूप दर्शन योग

    Date: Dec 16th, 2024

    (भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग)

    आप की कोई फेवरेट perfume होगी? कुछ क्षण के लिए, imagine कीजिए की आप उस perfume को smell कर रहे हैं। बहुत अच्छा लगेगा शायद।

    अब imagine कीजिये की आप अपनी सब की सब पसंदीदा perfumes का प्रयोग एक साथ करें। सारी १०-१२ perfumes एक साथ लगाना शायद इतना अच्छा न लगेगा । क्यों? इसीलिए, क्यूंकि आपका दिमाग एक बार में एक ही smell को enjoy कर सकता है, दो या तीन perfumes एक साथ लगाएंगे तो ना तो अच्छा लगेगा, ना ही आप पहचान पाएंगे की कौन कौन सी लगाई हैं। अब imagine कीजिये की दुनिया की सारी स्मेल्स, अच्छी और बुरी, सब एक साथ उमड़ उमड़ के आपको घेर लें – इंसानी दिमाग में इतनी काबलियत नहीं हैं की ऐसी situation को handle कर सके। अब यह समझिये – इन 4-5 वाक्यों को मुझे इसीलिए type करना पड़ा – क्यूंकि ऐसी situation का actual अनुभव पैदा करना किसी और तरीके से नामुमकिन था।

    अब यह भी समझिये की सूँघना, इंसान की सिर्फ एक इंद्री हैं। ऐसी अलग अलग 5 इन्द्रियाँ तो हैं ही। हर इंद्री की यही limitation है – एक बार में एक ही sensation को पकड़ सकती है। पर भगवान् तो infinite है। हर इंद्री कैसे infinite sensations को पकड़ पाएगी? फिर उन infinite sensations को कैसे आप process कर पाओगे ?

    इस बारे में २-३ मिनट रुक के सोचें ज़रा। infinite visions, infinite tastes, infinite sounds, infinite touches, infinite smells – over an infinite time

    human mind की इसी limitation को overcome करने के लिए – कृष्ण अर्जुन को “दिव्य दृष्टि” देते है। फिर जी अर्जुन ने अनुभव किया उसको शब्दों में समझाना असंभव है। आपको सिर्फ में इशारे से बता सकता हूँ, पर इसको सही से समझने के लिए आपको भी दिव्य दृष्टि की आव्यशकता है। meditation यानी ध्यान, भक्ति, और ज्ञान के ज़रिये से एक दिन आपको मिलेगी वह दिव्य दृष्टि।

    Now, कल्पना कीजिए कि आप अनंतता के सामने खड़े हैं। अर्जुन, जो एक योद्धा और doubts/ questions से घिरा हुआ है, भगवान श्रीकृष्ण से दिव्य दृष्टि प्राप्त करता है। युद्धभूमि की सीमाएं विलीन हो जाती हैं, और अर्जुन को कृष्ण का विश्वरूप दिखाई देता है—एक ऐसा रूप जो संपूर्ण ब्रह्मांड को समेटे हुए है। यह रूप अद्भुत है, अनगिनत चेहरे, भुजाएं, आंखें, और दिव्य dimensions (from beyond our universe) से भरा हुआ। इसमें सृष्टि की ऊर्जा भी है और विनाश की शक्ति भी।

    For God, time is meaningless. so समय थम जाता है, और साथ ही निरंतर चलता रहता है। अर्जुन देवताओं, ऋषियों और दिव्य आत्माओं को कृष्ण के चरणों में झुकते हुए देखता है। दूसरी ओर, वह यह भी देखता है कि योद्धाओं और राजाओं की असंख्य धाराएं कृष्ण के ज्वलंत मुखों में समा रही हैं—समय और मृत्यु की अपरिहार्यता को दर्शाते हुए। यह रूप भयावह भी है और अत्यंत सुंदर भी। यह सृष्टि का वह नृत्य है जिसमें निर्माण और विनाश साथ-साथ चलते हैं।

    इस विराट रूप को देखकर अर्जुन विस्मय और भय से भर जाता है। उसे अपनी तुच्छता और कृष्ण की असीम शक्ति का एहसास होता है। उसकी सारी शंकाएं समाप्त हो जाती हैं और वह पूरी तरह से कृष्ण को समर्पित हो जाता है। लेकिन इस विराट रूप की भव्यता के बीच, वह अपने सखा और मार्गदर्शक कृष्ण के सहज और human रूप को देखने की इच्छा व्यक्त करता है। उसकी विनम्र प्रार्थना सुनकर, कृष्ण अपने सामान्य और करुणामय रूप में लौट आते हैं और अर्जुन को यह कहते हुए दोबारा फिर से सांत्वना देते हैं कि उसे केवल अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए और फल की चिंता किए बिना अपना धर्म निभाना चाहिए।

    btw – इस दिव्य दृष्टि से अर्जुन ने बहुत कुछ और भी “देखा”। यह भी समझिये की जो हम देख सकते हैं वह बहुत काम मात्रा है। इस विश्व में जो दिखता है वह बहुत ही insignificant fraction है। विश्व की 99.9999999% वस्तुएं हमारी देखने की शक्ति से बाहर हैं। जैसे की – आप जानते हैं की शिव हैं, विष्णु हैं, ब्रह्मा हैं, हनुमान, गणेश, और कई हज़ारों मात्माओं/ अवतारों का वर्णन है – जो अभी भी present हैं, पर आप उनको देख नहीं पाते। अर्जुन ने उन सब को भी कृष्ण के विराट रूप में प्रत्यक्ष रूप से देखा। scientists आपको galaxies, blackholes, quasars इत्यादि के बारे में बताते हैं – अर्जुन ने उन सब को भी देखा। आपको मालूम है की सिर्फ धरती पर ही – 7 billion इंन्सान हैं, और करोड़ों प्राणी हैं, अर्जुन ने उन सबको भी प्रत्यक्ष रूप में देखा।

     

    Chapter 11 के end का यह वाक्य सोचने लायक़ है –

    “अर्जुन को यह कहते हुए दोबारा फिर से सांत्वना देते हैं कि उसे केवल अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए और फल की चिंता किए बिना अपना धर्म निभाना चाहिए।”

    यानी, आपको भी अगर life में कोई ऐसी situations आयें जिसमें बहुत confusion हो, बहुत ज़्यादा डर लगे, या कुछ समझ में नहीं आ रहा हो – तो आप भी कृष्ण के इस message से फ़ायदा उठा सकते हैं। सब कुछ कृष्ण पर छोड़ दें। सिर्फ़ अपना काम करने में पूरा ध्यान दें।

     

  • Chapter 12: भक्ति योग

    Date: Dec 17th, 2024

    (Note – अध्याय 12 और 15 गीता के सबसे छोटे अध्याय है। इन दोनों chapters में सिर्फ 20 श्लोक है – यानी अर्जुन का सवाल और कृष्ण का जवाब बहुत straight-forward हैं । ध्यान से समझियेगा। कहीं चूक ना हो जाए। कृष्ण इस अध्याय में भक्ति के बारे में एक बहुत important question का clear-cut उत्तर देते हैं।)

    अर्जुन का सवाल है – जो लोग साकार रूप में आपकी पूजा करते हैं और जो निराकार रूप में ध्यान करते हैं, उनमें से कौन अधिक श्रेष्ठ है?
    (यानी – मूर्ति पूजा, photos, मंदिरों का क्या महत्त्व है, अगर भगवान् निराकार हैं। )

    जवाब में कृष्ण कहते है –
    साकार और निराकार, दोनों रूप की आराधना सही हैं। वे जो अपने मन को मुझमें स्थिर करते हैं और सदैव दृढ़तापूर्वक पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरी भक्ति में रहते हैं, मैं उन्हें सर्वश्रेष्ठ योगी मानता हूँ।

    जिन लोगों का मन भगवान के अव्यक्त रूप पर आसक्त होता है उनके लिए भगवान की अनुभूति (experience) का मार्ग बहुत मुश्किल और self-doubts से भरा होता है। इसीलिए मनुष्य जीवन में साकार रूप का ध्यान सरल है। अव्यक्त रूप की उपासना देहधारी जीवों के लिए अत्यंत मुश्किल होती है।

    शारीरिक अभ्यास से श्रेष्ठ ज्ञान है, ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है, और ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फलों का परित्याग है। ऐसे त्याग से शीघ्र मन को शांति प्राप्त होती है।

    यदि तुम दृढ़ता से मुझ पर अपना मन स्थिर करने में असमर्थ हो तो worldly efforts से मन को अलग कर भक्ति भाव से निरंतर मेरा स्मरण करने का अभ्यास करो।
    यदि तुम मेरा स्मरण करने का अभ्यास नहीं कर सकते, तब मेरी सेवा के लिए कर्म करने का अभ्यास करो।
    यदि तुम सेवा में भी असमर्थ हो, तब अपने जो भी कर्म है उनके फलों की इच्छा का त्याग करो और सुख-दुख में समभाव रहो।


    अगर अव्यक्त रूप की आराधना को मानो सीधा पर्वत शिखर पे helicopter ride से पहुँचने के बराबर है, तो साकार रूप की आराधना एक सीढ़ी के सामान है।

    अगर आप भक्ति योग को ईश्वर के तरफ जाती इस सीढ़ी के रूप में देखें, तो –
    नींव:
    साकार या निराकार, किसी भी रूप में भगवान को अपना मानो।
    पहला पायदान: मन को भगवान् में स्थिर करो।
    दूसरा पायदान: अभ्यास और निष्ठा से भक्ति करो।
    तीसरा पायदान: यदि अभ्यास कठिन लगे, तो निस्वार्थ सेवा करो।
    चौथा पायदान: कर्म के फल का त्याग करो।
    मंज़िल: श्रद्धा, प्रेम, और समर्पण से भगवान के प्रिय बनो।

    भक्त के 5 रत्न यह है –
    प्रेम:
    सबके प्रति दया और मित्रता।
    शांति: सुख-दुख में समानता।
    त्याग: स्वार्थ और अहंकार का त्याग।
    श्रद्धा: ईश्वर में अटूट विश्वास।
    भक्ति: मन, वचन, और कर्म से भगवान का स्मरण।

  • Chapter 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

    Date: Dec 18th, 2024

    (योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता के विभेद को जानना)

    आज हम गीता का तीसरा खंड (section) शुरू करते है। इस section के छः अध्यायों में ज्ञान की व्याख्या की गयी है।
    यह दो शब्दों क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (शरीर का ज्ञाता) से परिचित कराता है। यह अध्याय आत्मा, शरीर, प्रकृति और पुरुष (ईश्वर) के बीच के संबंध को समझाने के लिए महत्वपूर्ण है।

    आप में से कुछ सोच रहे होंगे – अगर कर्मयोग और भक्तियोग समझ में आ गया, तो ज्ञानयोग का क्या महत्त्व है?

    इस रहस्य को ऐसे समझिये – “हम जो सोचते हैं वही हमारे सामने परिणाम के रूप में आता है” इसलिए हम जैसे सोचते हैं वैसे बन जाते हैं।
    योग वशिष्ठ में वशिष्ट ऋषि ने कहा था – “मन ही ब्रह्म है”, यानी “विचार ही सभी कर्मों का जनक है।” इसलिए हमें शुभ एवं उचित विचारों और कर्मों से अपने शरीर को पोषित करने की विधि सीखनी चाहिए। अगर हमारे मन में कुछ परेशानी है, तो पूरा संसार परेशानी का कारण लगता है। और जब हमारा मन खुश, तो हर जगह पे ख़ुशी का स्त्रोत नज़र आता है। जिस प्रकार किसान खेत में बीज बो कर खेती करता है। इसी प्रकार से हम अपने शरीर को शुभ-अशुभ विचारों और कर्मों से पोषित करते हैं और परिणाम स्वरूप अपना भाग्य बनाते हैं। इसके लिए शरीर और शरीर के ज्ञाता के बीच के भेद को जानना आवश्यक है।

    ज्ञान द्वारा “ज्ञेय” (यानी जानने लायक) क्या हैं? जिसे जानने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। ज्ञेय (ईश्वर) अविनाशी, अनंत, और परम सत्य हैं।


    श्रीकृष्ण बताते हैं कि शरीर को “क्षेत्र” कहा जाता है और आत्मा (जो शरीर में स्थित है) को “क्षेत्रज्ञ” कहा जाता है।
    क्षेत्र (शरीर) पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), मन, बुद्धि, अहंकार, और पाँच ज्ञानेन्द्रियों से मिलकर बना है।
    इसके अलावा सुख-दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना और धैर्य भी इसमें शामिल हैं।

    सच्चे ज्ञान के 10 गुण या लक्षण हैं:
    1 – अहंकार का त्याग।
    2 – अहिंसा (किसी को कष्ट न देना) – ध्यान दीजिये, अहिंसा सिर्फ physical violence नहीं बल्कि किसी भी तरह का कष्ट देना हैं (even harsh criticism, for an example)
    3 – क्षमा और सरलता।
    4 – गुरु के प्रति भक्ति।
    5 – पवित्रता और संयम।
    6 – इन्द्रियों का नियंत्रण।
    7 – अनित्य (ever-changing) संसार के प्रति वैराग्य।
    8 – जन्म, मृत्यु, और बुढ़ापे के दुखों का चिंतन।
    9 – निरंतर आत्मा और परमात्मा के ज्ञान का अभ्यास।
    10 – सच्चे ज्ञान की खोज और भक्ति का अभ्यास।

    कृष्ण बताते हैं कि वास्तव में प्रकृति (material world) और आत्मा दोनों अनादि (ever-existent) हैं।
    प्रकृति से सृष्टि का निर्माण होता है, जबकि आत्मा भोग का अनुभव करता है। आत्मा, सब कुछ देखने वाला और सब कुछ का साक्षी (witness) है।

    हर प्राणी के शरीर में परमात्मा (ईश्वर) स्थित हैं। इस ईश्वर को जानने के कई मार्ग हैं। कुछ लोग ध्यान और साधना के द्वारा ईश्वर को जानते हैं। कुछ लोग ज्ञान के मार्ग से, और कुछ कर्म के माध्यम से ईश्वर का साक्षात्कार करते हैं। ज्ञानी व्यक्ति यह समझता है कि ईश्वर ही इस संसार के कर्ता हैं, और वे ही इसे चलाते हैं।

    इस chapter को आप ऐसे एक कहानी के माध्यम से भी समझ सकते हैं –

    मानिये एक सुंदर राजमहल (शरीर) है, जो विशाल, भव्य और आकर्षक है। यह महल पाँच दरवाजों (इंद्रियाँ) से घिरा हुआ है। इसके अंदर कई कक्ष हैं – मन, बुद्धि, और अहंकार के कमरे। महल का मालिक (राजा) आत्मा है, जो सदा शांत, ज्ञानी और स्थिर है। राजा का उद्देश्य सत्य का अनुभव करना है, परंतु वह इस महल के आकर्षण में फँस जाता है।

    राजमहल की संरचना पाँच तत्वों से बनी है:
    पृथ्वी
    – शरीर की ठोस संरचना (हड्डियाँ)।
    जल – रक्त और रस।
    अग्नि – शरीर की ऊर्जा और ताप।
    वायु – श्वास और प्राण।
    आकाश – शरीर के भीतर का खाली स्थान।


    महल के कमरे – मन, बुद्धि, और अहंकार – हर समय हलचल मचाते हैं। मन सोचता है, बुद्धि निर्णय करती है, और अहंकार कहता है, “मैं ही राजा हूँ!”।

    लेकिन असल में इस महल का राजा आत्मा है, जो क्षेत्रज्ञ (शरीर का जानने वाला) है। आत्मा शांत और निश्चल है। वह केवल देखता है कि यह शरीर (महल) किस प्रकार कार्य करता है, और जन्म नहीं लेता, कभी मरता नहीं।

    महल (शरीर) नश्वर है; एक दिन यह मिट जाएगा। लेकिन राजा (आत्मा) अमर है और उसका असली घर परमात्मा का धाम है। जो आत्मा और परमात्मा के बीच का संबंध जान लेता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

  • Chapter 14: गुणत्रय विभाग योग

    Date: Dec 19th, 2024

    इस Chapter को समझने के लिए, प्रस्तुत है एक छोटी सी कहानी –
    “तीन मित्रों की कहानी: सत्व, रजस, और तमस”

    एक बार की बात है, एक राजा ने अपने तीन मित्रों को दरबार में बुलाया। उनके नाम थे: सत्व, रजस, और तमस। राजा ने कहा, “मैं तुम तीनों को अपने जीवन में एक खास जिम्मेदारी देना चाहता हूँ। अगर मैं तुम्हे अपना उत्तराधिकारी बनाऊं, तो तुम मुझे बताओ कि तुम कैसे मेरे राज्य की सेवा करोगे।”

    रजस ने आगे बढ़ कर बड़े उत्साह से कहा, “महाराज, मैं सक्रियता और कामनाओं का प्रतीक हूँ। मैं लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करूँगा।
    वे धन, प्रसिद्धि, और भौतिक सुख की इच्छा से कार्य करेंगे। आपके देश का जीडीपी, GNP, हर नागरिक की productivity, industry, stock market, defense, और overall Economy बहुत बढ़ेगी। हर फॅमिली के पास multiple cars होंगीं, roads, railways, airports, सबसे उम्दा होंगे। हर राष्ट्र से लोग आपके राज्य में आ कर रहना चाहेंगे। पूरे विश्व में आपके राज्य की धाक होगी।
    ….लेकिन, मेरे साथ असंतोष और संघर्ष भी आएंगे, क्योंकि भोग-विलास और खुशियां भरपूर होने पर भी किसी की चाहतें कभी पूरी नहीं होंगी।”

    राजा ने कहा, “वाह! तुम राज्य को उन्नति की ओर ले जा सकते हो, लेकिन तुम्हारे कारण अशांति भी बढ़ सकती है।”

    राजा ने फिर तमस की ओर देखा, जो चुप चाप सब सुन रहा था । कुछ प्रोत्साहन देने पर, तमस ने आलस्य भरे स्वर में कहा,

    “महाराज, मैं आपके राज्य में सबको आराम और आरामदायक जीवन का वादा करता हूँ। सच्चा मज़ा तो सोने और आराम करने में है। मेरे प्रभाव से लोग अपनी नींद अच्छी तरह से पूरी करेंगे, जो कुछ उनके पास है उसमें गहरा मोह रखेंगे। बेकार में सत्य, परमसत्य, और धर्म की खोज और बहस में कुछ नहीं रखा। कल किसने देखा है, बेकार में हर दिशा में नहीं भागेंगे। क्यूंकि दिन रात भागते रहने से तो अच्छा तो दिशाहीन होना है।

    राजा ने चिंतित होकर कहा, “कुछ आराम तो अच्छा है। पर लगता है तुम अज्ञानता और जड़ता के प्रतीक हो। तुम्हारे प्रभाव से निराशा और अंधकार आ सकती है। तुम्हारी उपस्थिति राज्य के पतन का कारण बन सकती है।”

    अब आयी सत्व की बारी। सत्व ने विनम्रता से कहा, “महाराज, मैं ज्ञान, शांति और सुख का प्रतीक हूँ। मेरा काम है लोगों के मन और शरीर को शुद्ध रखना। मैं उन्हें सच्चाई, सरलता, और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करूँगा। मेरा प्रभाव लोगों को ध्यान, योग, और सेवा में लीन करेगा, जिससे वे आत्मा का सच्चा स्वरूप पहचान सकें।
    …लेकिन सच बताऊँ तो मेरे साथ रहना हर किसी के लिए आसान नहीं।”

    राजा ने सत्व की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा, “यह मार्ग बहुत मुश्किल लगता है, इसीलिए हर नागरिक शायद तुम्हारा अनुसरण ठीक से नहीं कर सकेगा। पर तुम्हारी उपस्थिति राज्य को पवित्र और सुखी बना देगी।”

    राजा ने तीनों मित्रों से कहा, “तुम तीनों मेरे राज्य के लिए जरूरी हो, लेकिन मुझे तुम्हारे बीच संतुलन बनाना होगा।

    रजस, तुम राज्य को क्रियाशील और उन्नत बनाओगे।
    तमस, तुम्हारी ऊर्जा कभी-कभी विश्राम के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन तुम्हें सीमित रखना होगा।
    सत्व, तुम राज्य का मार्गदर्शन करोगे।”

    In summary – यदि हम इन तीनों के बीच संतुलन बना लें और सत्व को प्राथमिकता दें, तो हम जीवन में सच्ची सफलता और शांति प्राप्त कर सकते हैं।

    इस अध्याय में Material यानी worldly शक्ति की प्रकृति का वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्राकृतिक शक्ति सत्व, रजस, और तमस तीन गुणों से निर्मित है। शरीर, मन और बुद्धि उनमें भी यह तीनों गुण विद्यमान होते हैं। इन गुणों का मिश्रण (in uniquely different proportions) हमारे व्यक्तित्व के स्वरूप का निर्धारण करता है। सत्व गुण शांत स्वभाव, सद्गुण और शुद्धता को चित्रित करता है तथा रजो गुण अन्तहीन कामनाओं और सांसारिक आकर्षणों के लिए अतृप्त महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाता है एवं तमो गुण भ्रम, आलस्य, नशे और निद्रा का कारण है। जब तक आत्मा जागृत नहीं होती, तब तक हमें इन गुणों की प्रबल शक्तियों से निपटना सीखना चाहिए। मुक्ति इन तीन गुणों से परे है। भगवान इन तीनों गुणों से परे हैं। जगे हुए मनुष्य सदैव संतुलित रहते हैं, और वे संसार में तीन गुणों की activities को देखकर व्यक्तियों, पदार्थों तथा परिस्थितियों में प्रकट होने वाले उनके प्रभाव से tensions नहीं लेते। वे सभी पदार्थों को भगवान की शक्ति के expressions के रूप में देखते हैं, जो in the end उनके अपने नियंत्रण में होती है। इसलिए सांसारिक परिस्थितियाँ न तो उन्हें हर्षित और न ही उन्हें दुखी कर सकती हैं।

    इस प्रकार कृष्ण हमें एक बार फिर से – भक्ति की महिमा और तीन गुणों से परे ले जाने की इसकी क्षमता का स्मरण कराते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं।

    कृष्ण इस अध्याय में यह भी कहते हैं – सत्वगुण सांसारिक सुखों में बांधता है, रजोगुण आत्मा को सकाम कर्मों की ओर प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित कर आत्मा को भ्रम में रखता है।

    कभी-कभी सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण को परास्त करता है और कभी-कभी रजोगुण सत्व गुण और तमोगुण पर हावी हो जाता है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि तमोगुण सत्व गुण और रजोगुण पर हावी हो जाता है।

    जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान से गायब हो जाते हैं तब इसे सत्वगुण की अभिव्यक्ति मानो।
    जब रजोगुण प्रबल होता है तब लोभ, सांसारिक सुखों के लिए परिश्रम, बचैनी और उत्कंठा के लक्षण विकसित होते हैं।
    जड़ता, असावधानी और भ्रम यह तमोगुण के प्रमुख लक्षण हैं।

    जिनमें सत्वगुण की प्रधानता होती है वे मृत्यु के बाद ऋषियों के ऐसे उच्च लोक में जाते हैं, जो रजो और तमोगुण से मुक्त होता है।
    रजोगुण की प्रबलता वाले सकाम कर्म करने वाले लोगों (The Rich and Famous) के बीच स्वर्ग के वासी बन ने के बाद पृथ्वी पर ही पुनःजन्म लेते हैं।
    तमोगुणी निम्न नरक लोकों में जाते हैं, और फिर प्राश्चित के बाद पशुओं की प्रजातियों में पुनःजन्म लेते है।

    सत्वगुण में सम्पन्न किए गये कार्य शुभ फल प्रदान करते हैं, रजोगुण के प्रभाव में किए गये कर्मों का परिणाम पीड़ादायक (Expectation lead to even higher expectations, and eventually to frustrations) होता है तथा तमोगुण से सम्पन्न किए गए कार्यों का परिणाम अंधकार है।

    सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से अज्ञानता, प्रमाद (असावधानी, लापरवाही, या अज्ञानता के कारण कर्तव्य से चूकना) और भ्रम उत्पन्न होता है।

    जब बुद्धिमान व्यक्ति को यह ज्ञात हो जाता है कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है और जो मुझे इन तीन गुणों से परे देखते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करते हैं। शरीर से संबद्ध प्राकृतिक शक्ति के तीन गुणों से आगे/ परे होकर कोई जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुखों से मुक्त हो जाता है तथा अमरता प्राप्त कर लेता है।

    अध्याय के आखिर में अर्जुन ने पूछा – हे भगवान! वे जो इन तीनों गुणों से परे हो जाते हैं उनके लक्षण क्या हैं? वे किस प्रकार से गुणों के बंधन को पार करते हैं?

    कृष्ण ने जवाब में कहा – हे अर्जुन! वे गुणों की प्रकृति से impartial रहते हैं और उनसे confuse नहीं होते। वे यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, इसलिए वे बिना परेशानी आत्म स्थित रहते हैं। इन तीनों गुणों से परे, मनुष्य न तो प्रकाश (सत्वगुण से उदय), न ही कर्म (रजोगुण से उत्पन्न), और न ही मोह (तमोगुण से उत्पन्न) की बहुतायत availability होने पर इनसे घृणा करते हैं और न ही इनके अभाव में इनकी लालसा करते हैं।

    वे जो सुख और दुख में समान रहते हैं, जो आत्मस्थित हैं, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को एक समान दृष्टि से देखते हैं, जो प्रिय और अप्रिय घटनाओं के प्रति समता की भावना रखते हैं। वे बुद्धिमान हैं जो criticism और प्रशंसा को समभाव से स्वीकार करते हैं, जो मान-अपमान की स्थिति में समभाव रहते हैं। जो शत्रु और मित्र के साथ एक जैसा व्यवहार करते हैं, जो सभी material व्यापारों में फसने के बजाय उनसे ऊपर उठ जाते हैं – गुणातीत कहलाते हैं।

    ऐसे लोग विशुद्ध भक्ति के साथ सेवा करते है। वे समझते हैं की निराकार ब्रह्म – अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनन्द है।

  • Chapter 15: पुरुषोत्तम योग

    Date: Dec 20th, 2024

    (पुरुषोत्तम यानी – सर्वोच्च Divine स्वरूप)

    इस अध्याय में कृष्ण अर्जुन की संसार के प्रति विरक्ति (dispassion) विकसित करने के लिए, उसे material संसार की प्रकृति को प्रतीकात्मक शैली में समझाते हैं। वे material world की तुलना एक उलटे पीपल के वृक्ष से करते हैं – जिसकी जड़ें ऊपर की तरफ हैं, और टहनियां नीचे की तरफ।

    देहधारी आत्मा इस वृक्ष की उत्पत्ति का source है। यह कब से अस्तित्व में है और कैसे बढ़ रहा है, इसको समझे बिना आत्मा एक जन्म से दूसरे जन्म में इस वृक्ष की शाखाओं के ऊपर नीचे घूमती रहती है। इस वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर होती हैं क्योंकि इसका source भगवान में है। सकाम कर्मफल इसके पत्तों के समान हैं, जो की नीचे की ओर उगते हैं । इस वृक्ष को प्राकृत शक्ति के तीनों गुणों (जो हमनें पिछले अध्याय में समझे)। ये गुण (रजस, तमस, सत्व) इन्द्रिय विषयों को जन्म देते हैं, जोकि वृक्ष की ऊपर लगी कोमल नयी कलियों के समान हैं। इन कलियों से हवा में ऊपर उगी जड़ें (aerial roots) फूट कर प्रसारित होती हैं, जिससे वृक्ष और अधिक विकसित होता है। इस अध्याय में इस analogy को बहुत details में describe किया गया है, जिससे कि यह ज्ञात हो सके कि कैसे देहधारी आत्मा इस वृक्ष के material अस्तित्व की nature की अज्ञानता के कारण सदा सदा से संसार के बंधनो में फंसी रहकर material जगत के कष्ट सहन कर रही है।

    इसलिए कृष्ण समझाते हैं कि dispassion की कुल्हाड़ी से इस वृक्ष को काट डालना चाहिए। तब फिर हमें वृक्ष के आधार की खोज करनी चाहिए जोकि स्वयं परमेश्वर हैं।

    इस अध्याय का end, क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम शब्दों की व्याख्या के साथ होता है।
    क्षर = material जगत की नश्वर (destructible) वस्तुएँ।
    अक्षर = जो destroy नहीं हो सकता = भगवान के लोक में निवास करने वाली मुक्त आत्माएँ।
    पुरुषोत्तम = दिव्य सर्वोच्च व्यक्तित्व, जो संसार का नियम बनाने वाला, और उसको नियमों के अनुसार चलाने वाला।


    इस अध्याय को समझने के लिए, लीजिये एक और छोटी सी कहानी – “उल्टा वृक्ष और जीवन का रहस्य”

    एक बार एक बहुत सलोना और समझदार युवा अपने पिता के पास गया और पूछा, “Papa, यह संसार और हमारा जीवन कैसा है? क्या इसका कोई रहस्य है?”

    पिता ने मुस्कराते हुए कहा, “चलो, आज हम साथ में घूमने चलते हैं।”
    पिता ने बेटे को एक विशाल झील के पास ले जाकर कहा, “देखो, झील के पानी में तुम्हें क्या दिखता है?”

    बेटे ने झील में झाँककर देखा और बोला, “Papa, मुझे एक वृक्ष का reflection दिखाई दे रहा है। वह उल्टा है – जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर।”

    बेटे ने उत्सुक होकर पूछा, “इस वृक्ष का क्या अर्थ है?”

    पिता ने समझाना शुरू किया:

    वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर हैं – यह जड़ें परमात्मा को दर्शाती हैं। भगवान ही इस संसार रूपी वृक्ष का आधार हैं। जड़ें बताती हैं कि हर जीवन का मूल स्रोत ईश्वर में है।
    शाखाएँ और पत्ते नीचे की ओर हैं – यह संसार की भौतिक इच्छाओं, कर्मों, और सुख-दुःख का प्रतीक है।
    शाखाएँ – विभिन्न कर्मों और इच्छाओं का विस्तार करती हैं।
    पत्ते – ज्ञान और धर्म के प्रतीक हैं, जो हमें जीवन को समझने में मदद करते हैं।
    फल – यह कर्मों के फल हैं, जो सुख और दुःख के रूप में मिलते हैं। अच्छे कर्म मीठे फल देते हैं और बुरे कर्म कड़वे।

    वृक्ष का उल्टा होना – इसका अर्थ है कि संसार का वास्तविक आधार ऊपर (परमात्मा) है, लेकिन मनुष्य इसे भौतिक संसार में उलझकर भूल जाता है। जो नीचे की शाखाओं (इच्छाओं और भोगों) में फँस जाता है, वह मोक्ष से दूर हो जाता है।

    बेटे ने पूछा, “Papa, इस उलझन से कैसे निकलें?”
    पिता ने कहा, “इस संसार रूपी वृक्ष को केवल ‘वैराग्य’ (असक्ति) और ‘ज्ञान’ की तलवार से काटा जा सकता है।”

    वैराग्य की तलवार – भोग और इच्छाओं से ऊपर उठकर ईश्वर का स्मरण करना।
    ज्ञान की तलवार – यह समझना कि यह संसार अस्थायी है और परमात्मा ही वास्तविक हैं।

    जो इस वृक्ष को काटकर ऊपर की ओर जाता है, वह ‘परमधाम’ पहुँचता है। परमधाम वह स्थान है, जहाँ न पुनर्जन्म होता है और न मृत्यु। वहाँ केवल ever-lasting शांति और आनंद है।”

    बेटे ने पिता से कहा, “अब मैं समझ गया कि यह संसार माया और मोह का जाल है। मैं अपनी इच्छाओं को नियंत्रित कर, भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर चलूँगा।”

     

  • Chapter 16: देवासुर संपद विभाग योग

    Date: Dec 21st, 2024

    Important Definitions –
    देवासुर = दैवीय + आसुरी प्रकृति के भेद।
    यानी, Differences between Divine and Demoniac Natures

    इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने 26 दैवी गुणों का वर्णन किया है, जो आत्मा को उन्नति की ओर ले जाते हैं।

    दैवीय गुण: जो मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं –
    अभयम् (निर्भयता)
    : सत्य और धर्म का पालन करते हुए किसी भी परिस्थिति में भय से मुक्त रहना।
    आत्मशुद्धि: मन, शरीर और आत्मा की पवित्रता।
    ज्ञान में स्थिरता: आत्मा और परमात्मा के सत्य ज्ञान में दृढ़ रहना।
    दान: जरूरतमंदों की निःस्वार्थ सहायता करना।
    दमः (इंद्रिय संयम): अपनी इंद्रियों को नियंत्रित रखना।
    यज्ञः भगवान की आराधना और समर्पण।
    स्वाध्यायः (self-study): धार्मिक ग्रंथों और ज्ञान का अध्ययन।
    तपः मन, वचन, और कर्म से आत्मसंयम का पालन।
    आर्जवम् (सरलता): ईमानदारी और सत्यता।
    अहिंसा: किसी भी प्राणी को कष्ट न देना।
    सत्य: सत्य बोलना और उसका पालन करना।
    अक्रोधः क्रोध से मुक्त रहना।
    त्यागः भौतिक इच्छाओं और मोह का त्याग।
    शान्तिः आंतरिक और बाहरी शांति।
    परनिंदा (Gossip) से बचना: दूसरों की बुराई न करना।
    दयाभूतेषु (सभी प्राणियों के प्रति दया): सभी जीवों के प्रति दयालु रहना।
    मृदुता: कोमलता और प्रेमपूर्ण व्यवहार।
    लज्जा: अनुचित कार्यों से लज्जा अनुभव करना।
    स्थिरता: मन और इंद्रियों में स्थिरता।
    तेजः ईमानदारी और ऊर्जा से भरा व्यक्तित्व।
    क्षमा: दूसरों की गलतियों को माफ करने की क्षमता।
    धैर्य (patience): विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना।
    शौचम् (पवित्रता): आचरण और विचारों की शुद्धता।
    अद्रोहः (द्वेष का अभाव): किसी के प्रति द्वेष या बैर न रखना।
    नातिमानिता (अहंकार का अभाव): अहंकार से मुक्त रहना और विनम्र होना।


    आसुरी स्वभाव के गुण : जो पतन का कारण बनते हैं –
    अहंकार
    : खुद को सर्वश्रेष्ठ मानना।
    दंभ : दिखावे की प्रवृत्ति।
    क्रोध : अनावश्यक गुस्सा।
    अज्ञान : धर्म और सत्य से विमुखता। ऐसे लोग अपनी सफलता को अपनी मेहनत का परिणाम मानते हैं।
    असंतोष : लालच में फँसे रहते हैं। उनकी इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होतीं।

    आसुरी लोग धर्म और सत्य को नहीं मानते। केवल material comforts, और belongings के पीछे भागते हैं। यह ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को ज़्यादा महत्त्व नहीं देते, स्वभाव से स्वार्थी होते हैं और समाज में अशांति फैलाते हैं। आखिर, अपने ही कर्मों से स्वयं का नाश करते हैं।

    कृष्ण का कहना है – दैवी गुणों को ठीक से समझें, और उन्हें अपनाएं। आसुरी गुणों को भी जानें और समझें, और उनसे दूर रहें।

     

  • Chapter 17: श्रद्धा त्रय विभाग योग

    Date: Dec 22nd, 2024

    (Note: त्रय मतलब – तीन। श्रद्धा त्रय विभाग मतलब – तीन अलग अलग तरह की श्रद्धा।)

    इस chapter में अर्जुन एक बहुत important सवाल पूछते हैं –
    हे कृष्ण! उन लोगों की स्थिति क्या होती है जो धर्मग्रन्थों की आज्ञाओं को follow नहीं करते, पर फिर भी श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं? क्या उनकी श्रद्धा, सत्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी होती है?
    (यानी – ऐसे डॉक्टर्स, engineers, lawyers, politicians, industrialists, व्यापारी, इत्यादि जो घूस लेते हैं, शराब पीते हैं, पर आपको मंदिरों, मस्जिदों, गिरजा घरों में पूरी श्रद्धा से पूजा पाठ करते नज़र आते हैं।)

    कृष्ण ने जवाब में कहा –
    “प्रत्येक प्राणी स्वाभाविक रूप से श्रद्धा के साथ जन्म लेता है जो सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक तीन प्रकार की हो सकती है।
    सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके मन की प्रकृति के अनुरूप होती है। सभी लोगों में श्रद्धा होती है चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी हो। प्रकृति वैसी होती है जो वे वास्तव में है।

    जो भी यज्ञकर्म या तप बिना श्रद्धा के किए जाते हैं वे ‘असत्’ कहलाते है। ये इस लोक और परलोक दोनों में व्यर्थ जाते हैं।

    ‘ॐ-तत्-सत्’ शब्दों को सर्वोच्च परम सत्य का symbolic expression माना है।

    सत् शब्द का अर्थ Eternal Reality/ Eternal Truth है। इसका प्रयोग शुभ कर्मों को सम्पन्न करने के लिए किया जाता है। तप, यज्ञ तथा दान जैसे कार्यों को सम्पन्न करने में established (स्थापितन, स्थिर) होने के कारण इसे ‘सत्’ शब्द द्वारा describe किया जाता है। ऐसे किसी भी उद्देश्य के लिए किए जाने वाले कार्य के लिए ‘सत्’ नाम दिया गया है।

    • रजोगुण वाले यक्षों तथा राक्षसों की पूजा करते हैं।
    • तमोगुण वाले भूतों और प्रेतात्माओं (जो कभी पहले देह स्वरुप में थे) की पूजा करते हैं।
    • सत्वगुण वाले स्वर्ग के देवी देवताओं की पूजा करते हैं।”

    यहां कृष्ण कुछ Dietary advice भी देते हैं। कहते हैं –
    लोग अपनी रूचि के अनुसार भोजन पसंद करते हैं इसी प्रकार से उनकी ऐसी रूचि यज्ञ, तपस्या तथा दान के संबंध में भी सत्य है। कुछ लोग अहंकार और दंभ से inspire होकर life-of-balance छोड़ कर कठोर तपस्या करते हैं। कामना और आसक्ति (मुझे James Bond, शाहरुख़ खान का आलिआ भट्ट जैसा दिखना है) से प्रेरित होकर वे न केवल अपने शरीर के अंगों को कष्ट देते हैं बल्कि मुझे, जो उनके शरीर में परमात्मा के रूप में स्थित रहता हूँ, को भी कष्ट पहुँचाते हैं। ऐसे मूर्ख लोगों को पैशाचिक प्रवृति वाला कहा जाता है।

    • सत्वगुण की प्रकृति वाले लोग ऐसा भोजन पसंद करते हैं जिससे आयु, सद्गुणों, शक्ति, स्वास्थ्य, प्रसन्नता तथा संतोष में वृद्धि होती है। ऐसे खाद्य पदार्थ रसीले, सरस, पौष्टिक तथा प्राकृतिक रूप से स्वादिष्ट होते हैं।
    • अत्याधिक कड़वे, खट्टे, नमकीन, गर्म, तीखे, शुष्क तथा मिर्च युक्त spicy व्यंजन रजो गुणी व्यक्तियों को प्रिय लगते हैं ऐसे भोज्य पदार्थों के सेवन से पीड़ा, दुख तथा रोग उत्पन्न होते हैं।
    • अधिक पके हुए, बासी, सड़े हुए, प्रदूषित तथा अशुद्ध प्रकार के भोजन तमोगुणी व्यक्तियों के प्रिय भोजन हैं।

    कृष्ण फिर आगे कहते है –

    • धर्मशास्त्रों की आज्ञाओं के अनुसार इनाम, पुरस्कार, सम्मान, या फल की अपेक्षा किए बिना और मन की दृढ़ता के साथ कर्त्तव्य समझते हुए करी गयी पूजा या यज्ञ सत्वगुणी प्रकृति का है।
    • जो पूजा या यज्ञ भौतिक लाभ अथवा दुनिया को दिखावे के उद्देश्य के साथ किया जाता है उसे रजोगुणी श्रेणी का यज्ञ समझो। यानी ऐसी पूजा करते हुए जो भी माँगा (फल या लाभ या यश) मिलता ज़रूर है, पर ज़रा सोचें – क्या यह ही काफी है?
    • श्रद्धा विहीन होकर तथा imbalanced पूजा या यज्ञ जिसमें भोजन अर्पित न किया गया हो, मंत्रोच्चारण न किए गए हों तथा दान न दिया गया हो, ऐसे पूजा और यज्ञ की प्रकृति तमोगुणी होती है।

    तपस्या क्या है?

    • “परमात्मा, ब्राह्मणों, आध्यात्मिक गुरु, बुद्धिमान तथा श्रेष्ठ सन्तजनों की पूजा यदि पवित्रता, सादगी, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा के पालन के साथ की जाती है तब इसे शरीर की तपस्या कहा जाता है।
    • विचारों की शुद्धता, विनम्रता, मौन, आत्म-नियन्त्रण तथा उद्देश्य की निर्मलता इन सबको मन का तप है।”

    तपस्या कैसी होनी चाहिए?

    • धर्मनिष्ठ व्यक्ति deep श्रद्धा के साथ material benefits की लालसा के बिना तपस्या करते हैं। ऐसी तपस्या best है।
    • जब तपस्या को मान-सम्मान प्राप्त करने और आराधना कराने के लिए दंभपूर्वक सम्पन्न किया जाता है तब यह राजसी कहलाती है। इससे प्राप्त होने वाले लाभ अस्थायी यानी temporary और short-lived होते हैं।
    • वह तप जो confusion और clarity के बगैर विचारों वाले करते हैं तथा जिसमें स्वयं को यातना देना तथा दूसरों का बुरा (अशुभ, अप्रिय, हानिकारक) करना सम्मिलित हो, उसे तमोगुणी कहा जाता है।”

    दान कैसा होना चाहिए?

    • “जो दान बिना फल की कामना से appropriate समय और स्थान में किसी well-deserving को दिया जाता है वह सात्विक दान माना जाता है।
    • अनिच्छापूर्वक (unwillingly) अथवा फल प्राप्त करने की इच्छा के साथ दिए गये दान को रजोगुणी कहा गया है।
    • ऐसा दान जो अपवित्र स्थान तथा अनुचित समय पर undeserving व्यक्तियों को या बिना आदर भाव के अपमान, तिरस्कार, या निंदा के साथ दिया जाता है, उसे तमोगुणी की प्रकृति का दान माना जाता है। इसका फल भी बुरा ही होता है।”
  • Chapter 18: मोक्ष संन्यास योग

    Date: Dec 24th, 2024

    भगवद्गीता का यह अंतिम (और बहुत लंबा) अध्याय है। यहां कृष्ण ने पूरी गीता की summary दी है, और इसमें कई विषयों को सम्मिलित किया है।

    chapter की शुरुआत में अर्जुन ने पूछा – संन्यास और त्याग का अर्थ, और उनसे जुड़े कुछ प्रष्न।
    आप शायद सोचते हों की दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है, यानी “किसी वस्तु या रिश्ते या आदत को छोड़ देना” । तो गीता एक इस अध्याय में ठीक से समझिये की –

    • संन्यासी वह है जो गृहस्थ जीवन में भाग नहीं लेता और समाज को त्याग कर साधना का अभ्यास करता है।
    • त्यागी वह है जो कर्म में संलग्न रहता है लेकिन कर्म-फल का भोग करने की इच्छा का त्याग करता है।
      (यही गीता का मुख्य अभिप्राय है)

    कृष्ण यह भी कहते हैं कि – यज्ञ, दान, तपस्या और कर्त्तव्य पालन संबंधी कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये आप को शुद्ध करते हैं। इनको केवल कर्त्तव्य पालन की सोच के साथ करना चाहिए, क्योंकि इन कार्यों को कर्म फल की चाह के बिना पूरा करना आवश्यक होता है।

    कर्म के तीन संघटक (3 main components of Action) – कर्म (कार्य), कर्ता (Doer), और करण (Instrument/Means). 

    1. कर्म (कार्य) – कर्म का उद्देश्य और प्रकृति महत्वपूर्ण होती है। यह निष्काम (फल की इच्छा के बिना) हो सकता है या सकाम (फल की इच्छा के साथ)।
    2. कर्ता (Doer) – कर्ता वह है जो कार्य को करता है। कर्ता के मन का भाव, दृष्टिकोण, और उद्देश्य कर्म की दिशा और गुण को तय करते हैं। कर्ता तीन प्रकार का हो सकता है:
      • सात्विक कर्ता: निःस्वार्थ, शांत, और स्थिर।
      • राजसिक कर्ता: फल की इच्छा से प्रेरित और अहंकारी।
      • तामसिक कर्ता: आलस्य और अज्ञान से प्रेरित।
    3. करण (Instrument/Means) – कर्म को पूरा करने के लिए जिन साधनों या उपकरणों का उपयोग किया जाता है, वे करण हैं। करण में बाहरी उपकरण (जैसे शारीरिक साधन) और आंतरिक उपकरण (जैसे मन, बुद्धि) दोनों शामिल होते हैं। करण का सही उपयोग कर्म को सफल बनाता है।

    कर्म फल में योगदान करने वाले पाँच कारक/ घटक (Contributors)

    1. अधिष्ठान (Base/Foundation) – कर्म की भूमि या आधार। यह वह स्थिति है जिसमें कार्य किया जाता है। उदाहरण: एक शिक्षक का शिक्षण स्थान (विद्यालय)।
    2. कर्ता (Doer) – कर्म को करने वाला व्यक्ति। कर्ता की योग्यता, दृष्टिकोण, और प्रेरणा कर्मफल को प्रभावित करती है।
    3. करण (Instruments) – कार्य को करने के लिए इस्तेमाल किए गए उपकरण। बाहरी और आंतरिक साधन, जैसे शारीरिक ऊर्जा, मानसिक एकाग्रता, और उपकरण।
    4. चेष्टा (Effort) – कर्म के लिए किया गया प्रयास। कर्मफल में कर्ता की मेहनत और उसकी दृढ़ता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
    5. दैव (Divine Will/Fate/ Luck) – ईश्वर की इच्छा या प्राकृतिक शक्ति। कर्म के परिणाम में भाग्य या परिस्थिति का प्रभाव भी होता है। यह कर्ता के नियंत्रण से बाहर की स्थिति को दर्शाता है।

    कर्म के ये पाँच घटक (contributors) कर्मफल को प्रभावित करते हैं। यदि इनमें से किसी एक में कमी होती है, तो कर्मफल भी वैसा ही होगा। उदाहरण के लिए:

    • यदि कर्तव्य (कर्त्ता) निष्काम भाव से कर्म करे, तो फल सकारात्मक और आत्मा को शुद्ध करने वाला होगा।
    • यदि चेष्टा (प्रयास) में कमी हो, तो फल अधूरा रहेगा।
    • दैव (भाग्य) की भूमिका परिस्थितियों को निर्धारित करती है, लेकिन यह कर्ता को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। उदाहरण के लिए – यदि आपके Business में कोई नुक्सान हो, तो आप हाथ पे हाथ धर के ऊपर वाले को दोष ना दें। फिर से मेहनत करें, और situation पे विजय पाएं। ठीक उसी तरह जैसे ओले पड़ने से फसल खराब हो सकती है, पर किसान हार नहीं मानता और फिर से नयी फसल बोता है।

    यह दृष्टिकोण हमें प्रेरित करता है कि:

    1. सही साधनों (करण) और अच्छे प्रयास (चेष्टा) से कर्म करें।
    2. कर्म के परिणाम को पूरी तरह से अपने हाथ में मानने के बजाय, परिस्थितियों और ईश्वर की इच्छा को स्वीकारें।
    3. अपने कर्मों को सात्विक भाव से करें, न कि राजसिक या तामसिक प्रवृत्ति से।

    कृष्ण कहते हैं कि जो अल्पज्ञानी है वे स्वयं को अपने कार्यों का कारण मानते हैं लेकिन विशुद्ध बुद्धि युक्त mature आत्माएँ न तो स्वयं को अपने कार्यों का कर्ता और न ही भोक्ता मानती हैं। अपने कर्मों के फलों से सदैव dispassionate रहने के कारण वे कार्मिक प्रतिक्रियाओं के बंधन में नहीं पड़ते।

    कृष्ण बताते हैं – लोगों के उद्देश्यों और कर्मों में भिन्नता क्यों पाई जाती है? फिर इसमें प्रकृति के तीन गुणों (सात्विक: निःस्वार्थ, शांत, और स्थिर। राजसिक: फल की इच्छा से प्रेरित और अहंकारी। तामसिक: आलस्य और अज्ञान से प्रेरित) के अनुसार – ज्ञान, कर्म और कर्ता की categories का वर्णन किया गया है। हर व्यक्ति अद्वितीय है, और उसके उद्देश्य उसके स्वभाव और क्षमताओं पर आधारित होते हैं। आत्मनिरीक्षण से हम अपने उद्देश्य और कर्मों को समझ सकते हैं। जब हम निष्काम कर्म और समर्पण के साथ काम करते हैं, तब ही हम जीवन के सच्चे अर्थ को समझ सकते हैं।

    next, कृष्ण ने- बुद्धि, दृढ संकल्प और सुख के संबंध को describe किया है। कृष्ण उन लोगों का चित्रण करते हैं जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता की अवस्था प्राप्त कर ली है और ब्रह्म के personal-experience में लीन हो गए हैं। कृष्ण ने यह भी कहा कि ऐसे पूर्ण योगी भी भक्ति द्वारा ही अपनी पूर्णता का अनुभव करते हैं। इसलिए भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व के रहस्य को केवल मधुर भक्ति द्वारा जाना जा सकता है। कृष्ण अर्जुन को फिर से याद कराते हैं कि भगवान सभी जीवों के हृदय में स्थित हैं, और उनके कर्मों के अनुसार वे उनकी गति (यानी मृत्यु के बाद क्या होगा) को direct करते हैं। यदि हम उनका स्मरण करते हैं और अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करते हैं तथा उनका आश्रय लेकर उन्हें अपना लक्ष्य बनाते हैं, तब उनकी कृपा से हम सभी प्रकार की कठिनाईयों को पार कर लेंगे। लेकिन यदि हम अपने अभिमान से प्रेरित होकर अपनी इच्छानुसार कर्म करते है तब हम सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे।

    अंत में श्रीकृष्ण यह प्रकट करते हैं कि सभी प्रकार की धार्मिकता का त्याग करना और केवल भगवान की भक्ति के साथ-साथ उनके शरणागत होना ही सबसे गहरा ज्ञान है। इसीलिए यह ज्ञान उन्हें नहीं प्रदान करना चाहिए जो सिर्फ show-off करते है, और असली भक्त नहीं हैं, क्योंकि ऐसे लोग इसकी अनुचित व्याख्या करेंगे और इसका दुरूपयोग कर irresponsibly अपने कर्मों का त्याग करेंगे। यदि हम यह गहरा ज्ञान किसी well-deserving लोगों को देते हैं, तब यह अति प्रेमायुक्त बन जाता है और भगवान को अति प्रसन्न करता है।


    आखिर में अर्जुन declare करता है कि उसका मोह/ confusion/ fear/ doubt नष्ट हो गया है और वह कृष्ण की आज्ञाओं का पालन करने के लिए तत्पर है।

    अंत में संजय, जो अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्ध भूमि पर भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच हो रहे dialog सुना रहा था, व्यक्त करता है कि वह इन बातों को सुनकर इतना stunned और आश्चर्य चकित है कि जैसे ही वह भगवान के पवित्र शब्दों और भगवान के अति विशाल विश्व रूप का स्मरण करता है तब उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

    भगवद्गीता का समापन करते हुए संजय कहता है कि विजय सदैव वहीं होती है जहाँ भगवान और उसके भक्त होते हैं और इस प्रकार से अच्छाई, प्रभुता और समृद्धि भी वहीं होगी क्योंकि परम सत्य का प्रकाश सदैव असत्य के अंधकार को परास्त कर देता है।

  • जपजी साहिब



    सतिनामु करता पुरखु
    निरभउ निरवैरु अकाल मूरति
    अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
    यह श्लोक गुरु ग्रंथ साहिब का मूल मंत्र है।
    परमात्मा एक है। उसका नाम “सत्य” है। वह सब कुछ बनाने वाला और रचयिता है। वह निडर है, जिसे किसी से भय नहीं। वह किसी से वैर (दुश्मनी) नहीं रखता। वह समय और मृत्यु से परे है, सदा स्थायी है। वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त है। वह स्वयंभू है, स्वयं के बल से अस्तित्व में है। गुरु की कृपा से उसे समझा और अनुभव किया जा सकता है।
    ईश्वर से जुड़ने के लिए हमें गुरु की कृपा, सच्चाई, और निस्वार्थ भक्ति की आवश्यकता है।



    ॥ जपु ॥
    आदि सचु जुगादि सचु ॥
    है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥१॥
    ईश्वर हमेशा से सत्य है। युगों-युगों से सत्य है। अब भी सत्य है। भविष्य में भी ईश्वर सत्य रहेगा।



    सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥
    चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥
    भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥
    सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥
    किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥
    हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ॥१॥
     

    अगर कोई लाखों बार सोचता रहे या ध्यान करे, तो भी सिर्फ सोचने से ही आत्मा शुद्ध नहीं होती। सच्चाई और आत्मज्ञान सिर्फ विचार करने से नहीं आते; इसके लिए आचरण और अनुभव जरूरी है।
    केवल मौन रहने से मन को शांति नहीं मिलती, भले ही कोई पूरी तरह ध्यान में मग्न हो जाए। असली शांति आंतरिक सत्य और प्रभु की इच्छा को समझने से आती है। लालच या इच्छाएं सिर्फ सांसारिक सुख-सामग्री इकट्ठा करने से शांत नहीं होतीं, भले ही कोई दुनिया भर की चीजें जमा कर ले। इच्छाओं को मिटाने के लिए आत्मिक संतोष जरूरी है। चाहे कोई लाखों तरह की चालाकियां और ज्ञान सीख ले, लेकिन ये सब मृत्यु के समय साथ नहीं जातीं। सांसारिक ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान है।

    सच्चाई के मार्ग पर कैसे चला जाए और झूठ के पर्दे को कैसे तोड़ा जाए?
    सच्चाई का मार्ग तभी संभव है जब हम ईश्वर की इच्छा (हुक्म) को समझें और उसके अनुसार चलें।
    सब कुछ ईश्वर की मर्जी (हुक्म) से होता है। हमें इसे स्वीकार करना चाहिए और उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना चाहिए।


    हुकमी होवनि आकार हुकमु न कहिआ जाई ॥
    हुकमी होवनि जीअ हुकमि मिलै वडिआई ॥
    हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि ॥
    इकना हुकमी बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि ॥
    हुकमै अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ ॥
    नानक हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ ॥२॥
    ईश्वर के हुकम (आदेश) से ही सभी सृष्टि के आकार और रूप बने हैं। लेकिन यह हुकम शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता। यह एक असीम और अनिर्वचनीय शक्ति है। ईश्वर के हुकम से ही सभी जीव उत्पन्न होते हैं। और उन्हीं के हुकम से किसी को सम्मान और उच्चता प्राप्त होती है। हुकम के अनुसार कोई ऊंचा (महान) होता है और कोई नीचा (तुच्छ)। और इसी हुकम से हर प्राणी को दुख और सुख का अनुभव होता है। ईश्वर के हुकम से कुछ को कृपा (बख्शीश) मिलती है,
    जबकि कुछ लोग हमेशा भ्रम में (दुनिया के चक्र में) पड़े रहते हैं। सारी सृष्टि ईश्वर के हुकम के अधीन है; इसके बाहर कुछ भी नहीं है। हर चीज़ उसी के नियंत्रण में है। यदि कोई हुकम को समझ ले, तो उसके भीतर से अहंकार (मैं-मेरा) समाप्त हो जाता है।



    गावै को ताणु होवै किसै ताणु ॥
    गावै को दाति जाणै नीसाणु ॥
    गावै को गुण वडिआईआ चार ॥
    गावै को विदिआ विखमु वीचारु ॥
    गावै को साजि करे तनु खेह ॥
    गावै को जीअ लै फिरि देह ॥
    गावै को जापै दिसै दूरि ॥
    गावै को वेखै हादरा हदूरि ॥
    कथना कथी न आवै तोटि ॥
    कथि कथि कथी कोटी कोटि कोटि ॥
    देदा दे लैदे थकि पाहि ॥
    जुगा जुगंतरि खाही खाहि ॥
    हुकमी हुकमु चलाए राहु ॥
    नानक विगसै वेपरवाहु ॥३॥
    कुछ लोग परमात्मा की शक्ति और बल का गुणगान करते हैं, जो अपार है। कुछ लोग उनकी दाताओं (दान) का गान करते हैं और समझते हैं कि उनकी कृपा का निशान (लक्ष्य) क्या है। कुछ उनके गुणों और महानता की स्तुति करते हैं। वह चारों दिशाओं में व्याप्त हैं। कुछ उनकी गहरी विद्या और कठिन विचारधारा का गान करते हैं। उनकी समझ अत्यंत गूढ़ और गहरी है। कुछ यह गाते हैं कि कैसे परमात्मा शरीर को बनाते हैं और उसे मिट्टी में मिलाते हैं। कुछ उनके इस गुण का वर्णन करते हैं कि वह जीवन देते हैं और फिर से जीवन लेते हैं। कुछ लोग यह गाते हैं कि परमात्मा दूर प्रतीत होते हैं। कुछ यह गाते हैं कि परमात्मा हर जगह मौजूद हैं और सबके करीब हैं। उनकी महिमा का वर्णन कभी समाप्त नहीं हो सकता। चाहे जितनी बार कहें, वह असीम है। अनगिनत लोग, अनगिनत बार उनकी महिमा गाते हैं, लेकिन उनकी महिमा असीम है। परमात्मा लगातार देते हैं, और लोग लेते-लेते थक जाते हैं, लेकिन उनकी देने की शक्ति कभी खत्म नहीं होती। युगों-युगों से उनकी बनाई चीजों को लोग खाते जा रहे हैं।

    परमात्मा अपने हुक्म (आदेश) के अनुसार सब कुछ चलाते हैं। यह सब कुछ करने वाला परमात्मा बेपरवाह (मायाजाल से मुक्त) है और अपनी सृष्टि में आनंदित रहता है।



    साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु ॥
    आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु ॥
    फेरि कि अगै रखीऐ जितु दिसै दरबारु ॥
    मुहौ कि बोलणु बोलीऐ जितु सुणि धरे पिआरु ॥
    अम्रित वेला सचु नाउ वडिआई वीचारु ॥
    करमी आवै कपड़ा नदरी मोखु दुआरु ॥
    नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरु ॥४॥
    सच्चा मालिक (ईश्वर) भी सच्चा है, और उसका नाम भी सच्चा है। उसे अपार प्रेम से याद किया जाता है।
    सभी लोग उससे कुछ न कुछ मांगते हैं, “दे दो, दे दो” कहकर प्रार्थना करते हैं, और वह देने वाला सबको देता रहता है।
    जब उसका दिव्य दरबार सामने प्रकट हो, तब हम उसके सामने क्या भेंट चढ़ाएं?
    ऐसा कौन-सा शब्द बोलें जिससे वह प्रभु हम पर कृपा करें और हमें प्यार से अपना लें?
    अमृत वेले (सवेरे) उठकर सच्चे नाम का सुमिरन करें और ईश्वर की महानता का विचार करें।
    हमारे कर्मों से हमें यह जीवन (शरीर रूपी वस्त्र) मिलता है और उसकी कृपा से ही मोक्ष का द्वार खुलता है।
    हे नानक! यह समझ लो कि सब कुछ उसी ईश्वर की इच्छा से होता है, वही सच्चा है।



    थापिआ न जाइ कीता न होइ ॥
    आपे आपि निरंजनु सोइ ॥
    जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु ॥
    नानक गावीऐ गुणी निधानु ॥
    गावीऐ सुणीऐ मनि रखीऐ भाउ ॥
    दुखु परहरि सुखु घरि लै जाइ ॥
    गुरमुखि नादं गुरमुखि वेदं गुरमुखि रहिआ समाई ॥
    गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा गुरु पारबती माई ॥
    जे हउ जाणा आखा नाही कहणा कथनु न जाई ॥
    गुरा इक देहि बुझाई ॥
    सभना जीआ का इकु दाता सो मै विसरि न जाई ॥५॥
    परमात्मा को कोई बना नहीं सकता, और न ही वह किसी के द्वारा बनाया गया है। यानी, वह स्वयं ही मौजूद है और उसकी कोई उत्पत्ति नहीं हुई। वह परमात्मा स्वयं ही पवित्र और निष्कलंक (निर्मल) है। उसे किसी अन्य चीज़ से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है। जिन्होंने ईश्वर की सेवा (सच्ची भक्ति) की, उन्हें सम्मान (आध्यात्मिक लाभ) मिला।  हे नानक! हमें उस प्रभु के गुणों को गाना चाहिए, जो सारे गुणों का भंडार है। हमें ईश्वर के नाम का गायन और श्रवण करना चाहिए और उसे प्रेमपूर्वक अपने मन में धारण करना चाहिए। इससे हमारे सभी दुख समाप्त हो जाते हैं और हम सच्चा सुख प्राप्त करते हैं। जो गुरु के बताए मार्ग पर चलते हैं, वे ईश्वरीय ध्वनि (शब्द), वेदों और सभी आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करते हैं। गुरु का अनुसरण करने से परमात्मा हर जगह विद्यमान प्रतीत होता है। गुरु ही शिव (ईसर), गुरु ही गोरखनाथ, गुरु ही ब्रह्मा और गुरु ही माता पार्वती हैं। यानी गुरु ही सब कुछ हैं, सभी देवताओं का सार गुरु में समाहित है। यदि मैं परमात्मा को पूरी तरह जान भी लूँ, तो भी मैं उसे व्यक्त नहीं कर सकता। उसके बारे में पूरी तरह से बताना संभव नहीं है। गुरु ने मुझे एक गहरी समझ दी है। वह परमात्मा ही सभी प्राणियों का एकमात्र दाता है, और मैं उसे कभी न भूलूँ।परमात्मा अनादि और स्वयं-निर्मित हैं। कोई उन्हें बना नहीं सकता। गुरु की महिमा सबसे बड़ी है क्योंकि गुरु ही सच्चे मार्गदर्शक हैं। भगवान की भक्ति और उनके गुण गाने से दुख समाप्त होते हैं और मन को शांति व आनंद प्राप्त होता है। परमात्मा को शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन सच्चे गुरु की कृपा से हम उसे अनुभव कर सकते हैं। ईश्वर सभी जीवों का दाता है, और हमें उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।

    गुरु की शिक्षा को अपनाने, ईश्वर का गुणगान करने और प्रेमपूर्वक भक्ति करने से हमें सच्चा सुख और शांति प्राप्त होती है।



    तीरथि नावा जे तिसु भावा विणु भाणे कि नाइ करी ॥
    जेती सिरठि उपाई वेखा विणु करमा कि मिलै लई ॥
    मति विचि रतन जवाहर माणिक जे इक गुर की सिख सुणी ॥
    गुरा इक देहि बुझाई ॥
    सभना जीआ का इकु दाता सो मै विसरि न जाई ॥६॥
    अगर भगवान (ईश्वर) को अच्छा लगे, तो ही तीर्थ स्नान का लाभ होता है। यदि उसकी इच्छा के बिना स्नान करें, तो उसका कोई फल नहीं होता। जितनी भी सृष्टि (दुनिया) बनाई गई है, मैं उसे देखता हूँ, लेकिन बिना अच्छे कर्मों के कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।  हमारे मन (बुद्धि) में बहुमूल्य रत्नों (ज्ञान और गुणों) का खजाना छुपा हुआ है, परंतु इसे समझने के लिए गुरु की सिख (शिक्षा) सुनना और अपनाना जरूरी है। सच्चा गुरु हमें यह समझ प्रदान करता है। वह ईश्वर ही सब जीवों का एकमात्र दाता (रोज़ी-रोटी देने वाला) है, और मैं उसे कभी नहीं भूल सकता।केवल बाहरी कर्मकांड (जैसे तीर्थ स्नान) करने से मोक्ष या ईश्वर की कृपा प्राप्त नहीं होती। बल्कि, सच्चा ज्ञान और मोक्ष तभी मिलता है जब हम गुरु की सिख (शिक्षा) को अपनाते हैं और अच्छे कर्म करते हैं। ईश्वर ही सबका पालनहार है, और हमें उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।



    जे जुग चारे आरजा होर दसूणी होइ ॥
    नवा खंडा विचि जाणीऐ नालि चलै सभु कोइ ॥
    चंगा नाउ रखाइ कै जसु कीरति जगि लेइ ॥
    जे तिसु नदरि न आवई त वात न पुछै के ॥
    कीटा अंदरि कीटु करि दोसी दोसु धरे ॥
    नानक निरगुणि गुणु करे गुणवंतिआ गुणु दे ॥
    तेहा कोइ न सुझई जि तिसु गुणु कोइ करे ॥७॥
    यदि किसी की उम्र चार युगों (यानी बहुत लंबी) तक बढ़ जाए और दस गुना और बढ़ जाए,  यदि वह पूरे नौ खंडों (संपूर्ण दुनिया) में प्रसिद्ध हो जाए और उसके साथ हर कोई चले (मतलब उसका सम्मान करे), और यदि उसका अच्छा नाम हो जाए, उसकी कीर्ति (शोहरत) पूरी दुनिया में फैल जाए,  लेकिन अगर उसे परमात्मा की कृपा (भगवान की दृष्टि) नहीं मिली, तो उसकी कोई कीमत नहीं, कोई उसे नहीं पूछेगा।

    वह एक छोटे कीड़े के समान ही रहेगा, जो दूसरों पर दोष मढ़ता रहता है।  गुरु नानक देव जी कहते हैं कि ईश्वर ही निर्गुण (गुण रहित) को गुणवान बनाते हैं और गुणी लोगों को और गुण प्रदान करते हैं। ऐसा कोई नहीं जो खुद से भगवान को कोई गुण दे सके (भगवान सबसे ऊपर हैं, उन्हें किसी से कुछ भी प्राप्त करने की जरूरत नहीं)।

    सिर्फ दुनिया में बड़ा नाम, लंबी उम्र और प्रसिद्धि होने से कुछ नहीं होता। अगर भगवान की कृपा नहीं मिली, तो सब व्यर्थ है। इंसान को घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि सभी गुण और महानता परमात्मा से ही आते हैं।

    Notes 1 – 

    समय को चार युगों में विभाजित किया गया है, जिसे महायुग कहा जाता है। प्रत्येक युग की अवधि अलग-अलग होती है, और यह देवताओं के वर्षों में मापी जाती है (1 देव वर्ष = 360 मानव वर्ष)।

    चार युगों की अवधि:

    • सत्य युग (कृत युग) – 4,800 देव वर्ष (1,728,000 मानव वर्ष)
    • त्रेता युग – 3,600 देव वर्ष (1,296,000 मानव वर्ष)
    • द्वापर युग – 2,400 देव वर्ष (864,000 मानव वर्ष)
    • कलियुग – 1,200 देव वर्ष (432,000 मानव वर्ष)

    महायुग की कुल अवधि: सत्य + त्रेता + द्वापर + कलि = 4,320,000 मानव वर्ष
    वर्तमान में हम “कलियुग” में हैं, जिसकी शुरुआत 3102 ईसा पूर्व हुई थी और इसकी कुल अवधि 432,000 वर्ष है।

    Note 2 – 

    नौ खंड (9 Khand) क्या हैं?
    हिन्दू, जैन और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में “नौ खंड” (9 Khand) का उल्लेख पृथ्वी या जगत के विभाजन के रूप में किया गया है। यह पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। नौ खंडों के नाम और विवरण:

    1. भारत खंड (Bharata Khand) – यह भारतवर्ष का क्षेत्र है, जिसे धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पवित्र माना जाता है।
    2. किंपुरुष खंड (Kimpurusha Khand) – यह क्षेत्र देवताओं और दिव्य प्राणियों का निवास स्थान माना जाता है, इसे हिमालय के उत्तर का क्षेत्र कहा जाता है।
    3. हरि वर्ष खंड (Hari Varsha Khand) – यह भगवान विष्णु के भक्तों का निवास स्थान है और इसे एक आध्यात्मिक क्षेत्र माना जाता है।
    4. इलावृत खंड (Ilavrita Khand) – यह क्षेत्र मेरु पर्वत के चारों ओर स्थित माना जाता है, जिसे पृथ्वी का केंद्र कहा जाता है।
    5. रम्यक खंड (Ramyaka Khand) – यह एक सुंदर और रमणीय क्षेत्र है, जहाँ पुण्य आत्माएँ निवास करती हैं।
    6. हिरण्मय खंड (Hiranmaya Khand) – यह एक स्वर्ण भूमि मानी जाती है, जिसे महान आध्यात्मिक महत्व का क्षेत्र कहा गया है।
    7. उत्तर कुरु खंड (Uttarakuru Khand) – यह एक पौराणिक उत्तरी राज्य है, जिसका उल्लेख महाभारत और अन्य ग्रंथों में मिलता है।
    8. भद्राश्व खंड (Bhadrasva Khand) – यह क्षेत्र मेरु पर्वत के पूर्व में स्थित बताया गया है।
    9. केतुमाल खंड (Ketumala Khand) – यह क्षेत्र मेरु पर्वत के पश्चिम में स्थित माना जाता है।

    महत्व और आध्यात्मिक अर्थ – ये नौ खंड जंबूद्वीप (हिन्दू ब्रह्मांडीय भूगोल के अनुसार पृथ्वी का एक द्वीप) के विभिन्न भाग हैं। हर खंड की अपनी विशेषता, संस्कृति, और आध्यात्मिक महत्व है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, ये भौगोलिक क्षेत्रों का वर्णन हैं, जबकि अन्य लोग इन्हें आध्यात्मिक प्रतीक मानते हैं।

    Note 3 – 

    हिंदू धर्म, संत परंपरा और भारतीय आध्यात्मिकता में “नौ खंड” (9 Khand) केवल भौगोलिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं। कई संतों और ग्रंथों में इनका उल्लेख आध्यात्मिक यात्रा, आत्मा की उन्नति और चेतना के विभिन्न स्तरों के रूप में किया गया है। आध्यात्मिक नौ खंड (9 Khand) और उनका अर्थ:

    1. धर्म खंड (Dharma Khand) – यह धर्म और नैतिकता का क्षेत्र है, जहाँ व्यक्ति सही और गलत का बोध करता है।
    2. ज्ञान खंड (Gyaan Khand) – यहाँ व्यक्ति ज्ञान और आत्मबोध प्राप्त करता है, वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करता है।
    3. सत्संग खंड (Satsang Khand) – इस अवस्था में व्यक्ति संतों, गुरुओं और सच्चे साधकों के संगति में आता है, जिससे उसका मन शुद्ध होता है।
    4. भक्ति खंड (Bhakti Khand) – यहाँ आत्मा प्रेम और भक्ति में लीन होकर परमात्मा से जुड़ने का प्रयास करती है।
    5. सेवा खंड (Seva Khand) – व्यक्ति निःस्वार्थ सेवा में लीन होता है, जिसे “सेवा भाव” कहा जाता है।
    6. योग खंड (Yog Khand) – यह आत्मा की योग साधना और ध्यान के मार्ग पर बढ़ने की अवस्था है, जहाँ व्यक्ति आत्मसंयम और साधना को अपनाता है।
    7. शक्ति खंड (Shakti Khand) – इस स्तर पर साधक आंतरिक शक्ति (कुंडलिनी शक्ति) का जागरण करता है और चेतना के उच्च स्तरों को अनुभव करता है।
    8. शून्य खंड (Shunya Khand) – यहाँ साधक शून्यता या निर्वाण की स्थिति में पहुँचता है, जहाँ मन और शरीर का अहंकार समाप्त हो जाता है।
    9. परम खंड (Param Khand) या सच खंड या सत्य लोक – यह अंतिम अवस्था है, जहाँ आत्मा परमात्मा से एकत्व प्राप्त करती है और मोक्ष प्राप्त होता है।

    ये आध्यात्मिक यात्रा के विभिन्न चरण हैं, जो साधक को ईश्वर की प्राप्ति और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाते हैं। गुरुओं और संतों ने इन खंडों को साधना के स्तरों के रूप में बताया है, जिससे व्यक्ति सांसारिक मोह से मुक्त होकर उच्च चेतना प्राप्त कर सके। यह यात्रा भौतिक दुनिया से आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाती है।

     

    Note 4 – 

    शून्य खंड और महाशून्य दोनों गहरे ध्यान और आत्मा की यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। शून्य खंड एक उच्च अवस्था है, लेकिन महाशून्य उससे भी आगे का एक विशाल शून्य क्षेत्र है। महाशून्य में साधक को गहरे मौन और पूर्ण अंधकार का अनुभव होता है। यदि गुरु का मार्गदर्शन न मिले, तो साधक महाशून्य में फंस सकता है और आगे सचखंड तक नहीं पहुँच सकता। संत मत, सिख गुरुओं और योग परंपरा में बताया गया है कि महाशून्य से परे जाने के लिए गुरु की कृपा अनिवार्य है।

    शून्य खंड और महाशून्य आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन दोनों पूरी तरह से एक जैसे नहीं हैं। इनका वर्णन संत मत, नाथ संप्रदाय, और सिख गुरुओं की शिक्षाओं में मिलता है।

    शून्य खंड – यह एक आध्यात्मिक स्थिति है, जहाँ साधक मौन, शांति और खालीपन का अनुभव करता है लेकिन फिर भी सजग (Aware) रहता है। इसे संसार और उच्च आध्यात्मिक लोकों के बीच की अवस्था माना जाता है। यह माया (भौतिक संसार) और अहंकार (Ego) से परे जाने की स्थिति होती है। संत मत और नाथ संप्रदाय में इसे ध्यान और आत्म-साक्षात्कार का ऊँचा स्तर माना गया है। यहाँ साधक स्वयं को शरीर से अलग महसूस करता है लेकिन अभी भी परमात्मा से पूरी तरह नहीं जुड़ा होता। यह स्थिति आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण चरण है लेकिन अंतिम गंतव्य नहीं।

    महाशून्य का अर्थ “महान शून्यता” या “विशाल शून्य” होता है। यह शून्य खंड से भी आगे का एक विशाल शून्य क्षेत्र है, जहाँ साधक पूर्ण शांति, अंधकार और मौन का अनुभव करता है। इसे आध्यात्मिक संसार और परम सत्य (Sach Khand) के बीच की सीमा माना जाता है। कुछ संत इसे एक भयावह अवस्था बताते हैं, क्योंकि यहाँ साधक को कुछ भी नहीं दिखाई देता, केवल गहरा अंधकार और मौन होता है। यदि कोई संत गुरु के मार्गदर्शन के बिना इस स्थिति में पहुँच जाता है, तो वह वहीं अटक सकता है और आगे नहीं बढ़ पाता। इसलिए, गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक होता है, जो आत्मा को महाशून्य से आगे सचखंड तक ले जा सके।

     



    सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ ॥
    सुणिऐ धरति धवल आकास ॥
    सुणिऐ दीप लोअ पाताल ॥
    सुणिऐ पोहि न सकै कालु ॥
    नानक भगता सदा विगासु ॥
    सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥८॥
    जब कोई श्रद्धा और भक्ति से गुरुबाणी को सुनता है, तो सिद्ध, पीर, देवता और योगी भी उसका सम्मान करते हैं।  इस सुनने की शक्ति से पूरी धरती, आकाश और ब्रह्मांड में एक सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।  हर लोक, द्वीप, और पाताल तक इसकी महिमा फैलती है। जो व्यक्ति ईश्वर का नाम और ज्ञान ध्यानपूर्वक सुनता है, उस पर मृत्यु का भय असर नहीं करता।  ऐसे भक्त हमेशा आनंद में रहते हैं। ध्यानपूर्वक सुनने से सभी दुख और पाप नष्ट हो जाते हैं।



    सुणिऐ ईसरु बरमा इंदु ॥
    सुणिऐ मुखि सालाहण मंदु ॥
    सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद ॥
    सुणिऐ सासत सिम्रिति वेद ॥
    नानक भगता सदा विगासु ॥
    सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥९॥
    शिव, ब्रह्मा और इंद्र देवता भी उस व्यक्ति का सम्मान करते हैं, जो प्रभु का नाम सुनता और समझता है। सुनने से व्यक्ति इतनी शुद्धता प्राप्त करता है कि उसके मुख से हमेशा भलाई और भगवान की स्तुति ही निकलती है। सुनने से व्यक्ति को सही योग और शरीर के रहस्यों की समझ आती है।  जो ईश्वर के नाम को ध्यान से सुनता है, उसे शास्त्रों, स्मृतियों और वेदों का गहरा ज्ञान स्वतः प्राप्त हो जाता है।  ऐसे भक्तों के चेहरे पर हमेशा प्रसन्नता बनी रहती है। ध्यानपूर्वक सुनने से सभी दुख और पाप मिट जाते हैं।



    सुणिऐ सतु संतोखु गिआनु ॥
    सुणिऐ अठसठि का इसनानु ॥
    सुणिऐ पड़ि पड़ि पावहि मानु ॥
    सुणिऐ लागै सहजि धिआनु ॥
    नानक भगता सदा विगासु ॥
    सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥१०॥
    सुनने से व्यक्ति में सच्चाई, संतोष और ज्ञान का विकास होता है।  केवल सुनने से ही 68 तीर्थों में स्नान करने जितना पुण्य प्राप्त होता है।  जो ध्यान से सुनता है, उसे पढ़ाई और विद्या से सम्मान मिलता है।  सुनने से ध्यान में सहजता और स्थिरता आ जाती है। भक्त हमेशा आनंदित रहते हैं। ध्यान से सुनने से सभी दुख और पाप खत्म हो जाते हैं।

    Note – 

    हिंदू धर्म में 68 तीर्थ अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। यह तीर्थस्थान नदियों, झीलों, पर्वतों, मंदिरों और नगरों के रूप में होते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन तीर्थों की यात्रा करने से पापों का नाश होता है, पुण्य की प्राप्ति होती है, और अंततः मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग खुलता है।

    पुराणों (विशेष रूप से स्कंद पुराण, पद्म पुराण, महाभारत और विष्णु पुराण) में इन तीर्थों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

    68 तीर्थों के वर्गीकरण (classification) – यह तीर्थस्थान विभिन्न प्रकार के होते हैं:

    • सात पवित्र नगर
    • चार धाम
    • 12 ज्योतिर्लिंग
    • सात पवित्र नदियाँ
    • पांच सरोवर
    • पांच भूतलिंग

    १. सप्त मोक्ष पुरी – सात पवित्र नगर – ये सात नगर मोक्ष (मुक्ति) प्रदान करने वाले माने जाते हैं:

    • काशी (वाराणसी) – भगवान शिव की नगरी
    • अयोध्या – भगवान राम की जन्मभूमि
    • मथुरा – भगवान कृष्ण की जन्मभूमि
    • हरिद्वार – गंगा का पवित्र स्थल
    • द्वारका – भगवान कृष्ण की नगरी
    • उज्जैन – महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का स्थान
    • कांचीपुरम – देवी पार्वती की पवित्र नगरी

    २. चार धाम (Char Dham) – विष्णु के चार धाम – बद्रीनाथ (उत्तराखंड), द्वारका (गुजरात), जगन्नाथ पुरी (ओडिशा), रामेश्वरम (तमिलनाडु)

    ३. द्वादश (12) ज्योतिर्लिंग – भगवान शिव के पवित्र मंदिर –

    • सोमनाथ (गुजरात)
    • मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)
    • महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश)
    • ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)
    • केदारनाथ (उत्तराखंड)
    • भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
    • काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
    • त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)
    • वैद्यनाथ (झारखंड)
    • नागेश्वर (गुजरात)
    • रामेश्वरम (तमिलनाडु)
    • घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र)

    ४. सप्त नदियाँ (Sapta Nadi) – सात पवित्र नदियाँ – गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी

    ५. पंच सरोवर (Panch Sarovar) – पांच पवित्र झीलें – यह झीलें धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

    • मानसरोवर (तिब्बत, कैलाश पर्वत के पास)
    • बिंदु सरोवर (गुजरात)
    • नारायण सरोवर (गुजरात)
    • पंपा सरोवर (कर्नाटक)
    • पुष्कर सरोवर (राजस्थान)

    ६. पंच भूतलिंग – पाँच तत्वों से जुड़े शिव मंदिर – यह मंदिर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश) का प्रतीक हैं और शिव भक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    • एकाम्बरेश्वरर (पृथ्वी – कांचीपुरम, तमिलनाडु)
    • जंबुकेश्वरर (जल – तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु)
    • अरुणाचलेश्वरर (अग्नि – तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु)
    • कालहस्तीश्वरर (वायु – श्रीकालहस्ती, आंध्र प्रदेश)
    • चिदंबरम (आकाश – चिदंबरम, तमिलनाडु)

     



    सुणिऐ सरा गुणा के गाह ॥
    सुणिऐ सेख पीर पातिसाह ॥
    सुणिऐ अंधे पावहि राहु ॥
    सुणिऐ हाथ होवै असगाहु ॥
    नानक भगता सदा विगासु ॥
    सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥११॥
    सुनने से सभी गुण हमारे अंदर आ जाते हैं। सुनने से विद्वान (शिक्षक), पीर (धार्मिक संत), और राजा (शासक) भी सही मार्ग पर चलते हैं। सुनने से अंधे (अज्ञानता में भटके हुए लोग) भी सही रास्ता पा जाते हैं। सुनने से अपार धन और आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।  गुरु नानक जी कहते हैं कि जो भक्त सच्चे मन से सुनते हैं, वे हमेशा खुश रहते हैं।  सुनने से दुख और पापों का नाश हो जाता है।

    जब हम ध्यानपूर्वक और श्रद्धा से सत्संग, गुरबाणी या ज्ञान की बातें सुनते हैं, तो हमारा जीवन बदल जाता है। हमारी सोच, व्यवहार, और आत्मा पवित्र हो जाती है। इससे हमें ज्ञान, सही दिशा, और मानसिक शांति मिलती है, और हमारे दुख व पाप खत्म हो जाते हैं।



    मंने की गति कही न जाइ ॥
    जे को कहै पिछै पछुताइ ॥
    कागदि कलम न लिखणहारु ॥
    मंने का बहि करनि वीचारु ॥
    ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥
    जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥१२॥
    जो व्यक्ति “मन” (अर्थात् गहरे आत्मिक ज्ञान और ध्यान) को समझ लेता है, उसकी स्थिति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उसकी अनुभूति इतनी गहरी होती है कि उसे बयान करना असंभव है। यदि कोई इसे शब्दों में समझाने की कोशिश करता है, तो वह बाद में पछताता है, क्योंकि यह अनुभव करने की चीज़ है, समझाने की नहीं। इस सत्य को न तो कागज पर लिखा जा सकता है, न ही इसे कलम से व्यक्त किया जा सकता है। यह एक ऐसा गूढ़ रहस्य है, जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है। “मन” को समझने और आत्मज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति विचारों से परे चला जाता है। उसकी सोच सीमित नहीं रहती, वह एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था में पहुंच जाता है। “निरंजन” यानी पवित्र, निर्मल और असीम ईश्वर का नाम भी ऐसा ही होता है—जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह से समझाया नहीं जा सकता। जो कोई भी “मन” को वास्तव में जान लेता है, वह अद्वितीय हो जाता है। उसे वही समझ सकता है, जो स्वयं उस स्थिति तक पहुँच चुका हो।

    मन की गहराई को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। आध्यात्मिक अनुभूति केवल अनुभव करने से आती है, उसे पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता। ईश्वर का नाम और सच्चा ज्ञान लिखने या बोलने की चीज़ नहीं है, बल्कि इसे आत्मसात करने की आवश्यकता है। जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, वह साधारण इंसान से अलग हो जाता है और उच्च चेतना में पहुँच जाता है।

    जिस तरह गहरी शांति, प्रेम, या ध्यान की अनुभूति को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, उसी तरह मन और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को शब्दों से नहीं समझाया जा सकता। इसे केवल अनुभव किया जा सकता है।आत्मज्ञान और आध्यात्मिकता सिर्फ पढ़ने-लिखने की चीज़ नहीं है, बल्कि इसे मन, ध्यान और अनुभव से समझना पड़ता है।



    मंनै सुरति होवै मनि बुधि ॥
    मंनै सगल भवण की सुधि ॥
    मंनै मुहि चोटा ना खाइ ॥
    मंनै जम कै साथि न जाइ ॥
    ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥
    जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥१३॥
    जो व्यक्ति “मन” (श्रद्धा और भक्ति) के मार्ग पर चलता है, उसकी स्मृति (याददाश्त) और बुद्धि प्रखर हो जाती है। जो सच्ची श्रद्धा और विश्वास से गुरबाणी को अपनाता है, उसकी सोचने-समझने की शक्ति (बुद्धि) तेज़ हो जाती है और वह जीवन में सही मार्ग पर चलता है।  जो मनन करता है, उसे संसार के सभी लोकों और रहस्यों का ज्ञान हो जाता है। ध्यान और ज्ञान से व्यक्ति केवल इस संसार का ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जगत का भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

    जो श्रद्धा और ध्यान में लीन होता है, वह अपमान या मानसिक दुखों से प्रभावित नहीं होता।  सच्चा भक्त किसी भी परिस्थिति में अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखता है और दूसरों के कहे शब्दों से आहत नहीं होता।  जो मनन करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं सताता। ऐसा व्यक्ति पुण्य कर्म करता है और मृत्यु के बाद उसे यमराज (नरक) के पास नहीं जाना पड़ता।

    यह परमात्मा का दिव्य नाम है, जो पवित्र (निरंजन) और शुद्ध है। यह ज्ञान और भक्ति का मार्ग ऐसा है जो व्यक्ति को पवित्र और मोक्ष की ओर ले जाता है। सिर्फ वही इसे समझ सकता है जो सच्चे मन से इसे अपनाए। यह गहरा आध्यात्मिक सत्य है, जिसे केवल वही समझ सकता है जो सच्चे हृदय से गुरबाणी का अभ्यास करता है।

    जो व्यक्ति श्रद्धा और ध्यान से जीवन व्यतीत करता है, वह ज्ञानी, आत्मनिर्भर, अपमान से अछूता, मृत्यु के भय से मुक्त और मोक्ष के पथ पर अग्रसर होता है। गुरु की शिक्षा को सच्चे मन से समझने वाला व्यक्ति ही आत्मज्ञान और मुक्ति प्राप्त करता है। सच्चे मन से ध्यान और भक्ति करने से व्यक्ति संसार के दुखों और भय से मुक्त हो सकता है।



    मंनै मारगि ठाक न पाइ ॥
    मंनै पति सिउ परगटु जाइ ॥
    मंनै मगु न चलै पंथु ॥
    मंनै धरम सेती सनबंधु ॥
    ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥
    जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥१४॥
    जो व्यक्ति अपने मन में पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रखता है, उसे जीवन के मार्ग में कोई अड़चन या रुकावट नहीं आती। अर्थात्, सच्ची आस्था और विश्वास से व्यक्ति को जीवन में सही दिशा मिलती है, और कोई भी कठिनाई उसे रोक नहीं सकती। जो व्यक्ति सच्चे विश्वास और श्रद्धा से चलता है, वह प्रभु के साथ सीधा संबंध बना सकता है। उसे प्रभु की प्राप्ति में कोई संदेह नहीं रहता और उसका मन परमात्मा के प्रति जागरूक हो जाता है। जो व्यक्ति सच्चे विश्वास को अपनाता है, वह गलत मार्ग (भटकाव) पर नहीं चलता। अर्थात्, ऐसे व्यक्ति को सही और गलत की पहचान हो जाती है और वह कभी अधर्म या पाप के रास्ते पर नहीं जाता। जो व्यक्ति सच्चे विश्वास को धारण करता है, उसका संबंध धर्म और सच्चाई से होता है। उसका जीवन नैतिकता, सत्य, और धर्म से जुड़ा होता है। यह परमात्मा का नाम (नाम सिमरन) बिल्कुल शुद्ध और पवित्र होता है। जो भी इसे सच्चे हृदय से अपनाता है, वह निर्मल और शुद्ध बन जाता है। जो कोई इस विश्वास की सच्चाई को समझ जाता है, वही वास्तव में इसे अनुभव कर सकता है। यह एक रहस्य है, जिसे केवल सच्चे विश्वास वाले व्यक्ति ही जान सकते हैं।

    “मंनै” यानी पूर्ण विश्वास और श्रद्धा हमें सही मार्ग दिखाता है, हमें प्रभु से जोड़ता है, और हमें सच्चाई व धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। अगर व्यक्ति का विश्वास अडिग है, तो वह सभी बाधाओं को पार कर सकता है, सही मार्ग पर चलता है और परमात्मा के दर्शन करता है। यदि हमारे मन में पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और समर्पण है, तो जीवन में कोई कठिनाई हमें नहीं रोक सकती। हमें सत्य, धर्म और ईमानदारी के मार्ग पर चलना चाहिए, क्योंकि यही हमें प्रभु से जोड़ता है।



    मंनै पावहि मोखु दुआरु ॥
    मंनै परवारै साधारु ॥
    मंनै तरै तारे गुरु सिख ॥
    मंनै नानक भवहि न भिख ॥
    ऐसा नामु निरंजनु होइ ॥
    जे को मंनि जाणै मनि कोइ ॥१५॥
    जो व्यक्ति सच्चे मन से विश्वास करता है, उसे मोक्ष का द्वार (मुक्ति का रास्ता) प्राप्त होता है। आध्यात्मिक ज्ञान और गुरु की वाणी को मानने से इंसान आत्मिक मुक्ति पा सकता है।
    जो व्यक्ति विश्वास करता है, उसका पूरा परिवार भी संसार सागर से पार होने में समर्थ हो जाता है। एक व्यक्ति का सच्चा विश्वास उसके पूरे परिवार को आध्यात्मिक रूप से प्रेरित कर सकता है।

    जो व्यक्ति विश्वास करता है, वह स्वयं भी संसार सागर से पार हो जाता है और दूसरों को भी पार कर सकता है। गुरु का सिख (शिष्य), जो पूरी श्रद्धा से गुरु की बातों को मानता है, न केवल खुद मोक्ष प्राप्त करता है बल्कि दूसरों को भी आध्यात्मिक मार्ग दिखाता है।

    जो व्यक्ति सच्चे मन से विश्वास करता है, वह भटकता नहीं है और मांगने की स्थिति में नहीं आता। जिसके अंदर पूर्ण श्रद्धा होती है, वह कभी भी आध्यात्मिक रूप से खोया हुआ महसूस नहीं करता और संतोष और आत्मनिर्भरता से भर जाता है।

    यह सतगुरु का नाम (परमात्मा का नाम) इतना पवित्र और शुद्ध है कि यह व्यक्ति को निर्मल और पवित्र बना देता है। भगवान का नाम (सतनाम) एक अनमोल खजाना है जो आत्मा को शुद्ध करता है।
    यदि कोई व्यक्ति इसे सच्चे मन से समझता और अपनाता है, तो वह इसका सच्चा अनुभव कर सकता है। बहुत कम लोग इस सत्य को समझ पाते हैं और उसे अपने जीवन में अपनाते हैं।

    श्रद्धा और विश्वास जीवन में बहुत जरूरी हैं। गुरु की वाणी को मानने से आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है। गुरु का सिख (शिष्य) न केवल खुद को सुधार सकता है, बल्कि दूसरों को भी राह दिखा सकता है। जिसके अंदर सच्चा विश्वास होता है, वह कभी भ्रमित नहीं होता और आत्मनिर्भर बन जाता है। परमात्मा का नाम (सतनाम) इंसान को पवित्र बनाता है और उसे सच्ची शांति देता है।

    यदि हम पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ गुरु की सिख को अपनाएं, तो हम आध्यात्मिक रूप से उन्नति कर सकते हैं और अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं।



    पंच परवाण पंच परधानु ॥
    पंचे पावहि दरगहि मानु ॥
    पंचे सोहहि दरि राजानु ॥
    पंचा का गुरु एकु धिआनु ॥
    जे को कहै करै वीचारु ॥
    करते कै करणै नाही सुमारु ॥
    धौलु धरमु दइआ का पूतु ॥
    संतोखु थापि रखिआ जिनि सूति ॥
    जे को बुझै होवै सचिआरु ॥
    धवलै उपरि केता भारु ॥
    धरती होरु परै होरु होरु ॥
    तिस ते भारु तलै कवणु जोरु ॥
    जीअ जाति रंगा के नाव ॥
    सभना लिखिआ वुड़ी कलाम ॥
    एहु लेखा लिखि जाणै कोइ ॥
    लेखा लिखिआ केता होइ ॥
    केता ताणु सुआलिहु रूपु ॥
    केती दाति जाणै कौणु कूतु ॥
    कीता पसाउ एको कवाउ ॥
    तिस ते होए लख दरीआउ ॥
    कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
    वारिआ न जावा एक वार ॥
    जो तुधु भावै साई भली कार ॥
    तू सदा सलामति निरंकार ॥१६॥
    पाँच (सत्संगी, ज्ञानी, भक्त) स्वीकार किए जाते हैं और वे ही प्रधान (मुख्य) होते हैं। यहाँ “पंच” का मतलब उन श्रेष्ठ आत्माओं से है जो परमात्मा में लीन होते हैं, सत्य और धर्म का पालन करते हैं। वे इस दुनिया में आदर्श माने जाते हैं। वे पाँच प्रभु की दरगाह (दरबार) में सम्मान प्राप्त करते हैं। जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते हैं, वे ईश्वर की कृपा पाते हैं और उन्हें आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त होती है। वे प्रभु के दरबार में राजा जैसे सुशोभित होते हैं। जो सच्चे संत, भक्त, या ज्ञानी होते हैं, वे प्रभु की उपस्थिति में विशेष महत्व रखते हैं, जैसे राजा किसी दरबार में प्रमुख होता है। उनका गुरु केवल एक ध्यान है (परमात्मा का ध्यान ही उनका मार्गदर्शक है)। वे सच्चे साधक हैं जो केवल ईश्वर का ही ध्यान करते हैं और उसी में लीन रहते हैं। अगर कोई इस विषय में विचार करे, तो उसे समझ में आएगा कि सृष्टि के कर्ता (ईश्वर) की लीला की कोई गिनती नहीं है। ईश्वर की महानता, उनकी रचनाएँ और उनकी कृपा को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। इस दुनिया का आधार धर्म है, जो दया का पुत्र है, और संतोष की डोरी से इसे थामे रखा गया है। यह सारा संसार धर्म पर टिका हुआ है, धर्म का मूल आधार ‘दया’ (करुणा) है, और इस व्यवस्था को ‘संतोष’ (संयम) से स्थिर रखा गया है। जो इसे समझ लेता है, वही सच्चा बनता है। लेकिन इस सच्चाई का बोझ बहुत भारी है। सत्य का मार्ग आसान नहीं है, यह जिम्मेदारी से भरा हुआ है। इसे वही समझ सकता है जो वास्तव में सच्चा साधक है। अगर धरती के ऊपर और धरती हो, तो भी इसका भार कौन उठा सकता है? ईश्वर की सृष्टि अनंत है, और उसकी महानता का अंदाजा लगाना संभव नहीं। इस सृष्टि में अनेकों प्राणी, जातियाँ, रंग और नाम हैं, और सबका लेखा-जोखा परमात्मा के पास है। ईश्वर ने विविध रूप, जातियाँ, रंग और विशेषताएँ बनाई हैं। उनकी सृष्टि अनगिनत है। इस सृष्टि का पूरा हिसाब कौन जान सकता है? यह कितना बड़ा है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कोई भी व्यक्ति परमात्मा की रचना का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। उस ईश्वर की शक्ति और सुंदरता कितनी है, यह कौन जान सकता है? उनकी दी हुई दातों (वरदानों) को कौन माप सकता है? ईश्वर की कृपा और उनकी रचनाएँ असीमित हैं। कोई भी उनकी सीमा नहीं जान सकता। ईश्वर ने एक शब्द (आदेश) से यह सृष्टि फैला दी, जिससे लाखों नदियाँ और ब्रह्मांड उत्पन्न हो गए। यह ब्रह्मांड, इसके सारे जीव-जंतु, नदियाँ, पहाड़—सभी परमात्मा की एक आज्ञा से बने हैं। प्रकृति कितनी अद्भुत है, इस पर विचार भी नहीं किया जा सकता। मैं इस पर अपनी जान भी न्योछावर कर दूँ, तो भी कम है। ईश्वर की बनाई प्रकृति इतनी अद्भुत है कि इसकी महिमा का वर्णन करना असंभव है। जो तुझे अच्छा लगे, वही अच्छा कार्य है। हे निरंकार (निर्गुण, निराकार प्रभु), तू सदा बना रहे। अंत में गुरु नानक जी कह रहे हैं कि जो कुछ भी होता है, वह ईश्वर की इच्छा से होता है, और उनकी कृपा सदा बनी रहती है।

    ईश्वर की सृष्टि असीम और अनंत है। सच्चे संत, भक्त, और ज्ञानी ही प्रभु के दरबार में स्वीकार किए जाते हैं। संसार धर्म, दया, और संतोष पर टिका हुआ है। जो ईश्वर को पहचान लेता है, वही सच्चा ज्ञानी होता है। संसार का सारा हिसाब केवल ईश्वर ही जानता है।  ईश्वर की महिमा का वर्णन करना असंभव है। हमें सच्चाई, दया, धर्म, और ईश्वर के प्रति समर्पण की राह पर चलना चाहिए।



    असंख जप असंख भाउ ॥
    असंख पूजा असंख तप ताउ ॥
    असंख गरंथ मुखि वेद पाठ ॥
    असंख जोग मनि रहहि उदास ॥
    असंख भगत गुण गिआन वीचार ॥
    असंख सती असंख दातार ॥
    असंख सूर मुह भख सार ॥
    असंख मोनि लिव लाइ तार ॥
    कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
    वारिआ न जावा एक वार ॥
    जो तुधु भावै साई भली कार ॥
    तू सदा सलामति निरंकार ॥१७॥
    अनगिनत लोग ईश्वर का जप (स्मरण) करते हैं, और अनगिनत लोग ईश्वर के प्रति प्रेम और श्रद्धा से भरे हुए हैं। अनगिनत लोग अलग-अलग प्रकार की पूजा करते हैं और अनगिनत लोग तपस्या (सख्त साधना) में लगे रहते हैं। अनगिनत धार्मिक ग्रंथ हैं, और अनगिनत लोग वेदों तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं। अनगिनत योगी और संन्यासी हैं, जो संसार के मोह से दूर रहते हुए ध्यान में लीन रहते हैं। अनगिनत भक्त ईश्वर के गुणगान में लगे हैं और ज्ञान तथा विचार के माध्यम से उसकी महिमा का चिंतन करते हैं। अनगिनत सती (धार्मिक रूप से समर्पित आत्माएँ) और अनगिनत दानी (दान करने वाले) लोग हैं। अनगिनत वीर योद्धा हैं, जो अपने मुख से ज्ञान और वीरता की बातें करते हैं। अनगिनत मुनि (संन्यासी) और ध्यानमग्न लोग हैं, जो पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं।

    ईश्वर की बनाई हुई इस सृष्टि को पूरी तरह से समझना और उसका पूरा वर्णन करना संभव नहीं है। मैं (गुरु नानक देव जी) उसकी महिमा के बदले में खुद को भी कुर्बान नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी महानता अनंत है। जो कुछ भी ईश्वर को अच्छा लगता है, वही वास्तव में अच्छा है। (अर्थात सब कुछ उसी की इच्छा से होता है और वह सर्वोत्तम है।)  हे निरंकार (रूपहीन परमात्मा)! तू हमेशा स्थिर, अविनाशी और अटल है।

    इस संसार में असंख्य भक्त, योगी, दानी, तपस्वी और ज्ञानी लोग हैं, जो अलग-अलग तरीके से ईश्वर की पूजा और भक्ति में लगे हुए हैं। लेकिन फिर भी, ईश्वर की महानता का पूरी तरह से वर्णन करना असंभव है। ईश्वर की महिमा अनंत है, और जो कुछ भी उसकी इच्छा के अनुसार होता है, वही अच्छा होता है। अंत में, गुरु जी परमात्मा (निरंकार) की अपार शक्ति, स्थिरता और अविनाशी स्वरूप की महिमा गाते हैं।

    हमें हमेशा भक्ति, सेवा, प्रेम और समर्पण के मार्ग पर चलना चाहिए और अपने अहंकार को त्यागकर उसकी इच्छा को स्वीकार करना चाहिए।



    असंख मूरख अंध घोर ॥
    असंख चोर हरामखोर ॥
    असंख अमर करि जाहि जोर ॥
    असंख गलवढ हतिआ कमाहि ॥
    असंख पापी पापु करि जाहि ॥
    असंख कूड़िआर कूड़े फिराहि ॥
    असंख मलेछ मलु भखि खाहि ॥
    असंख निंदक सिरि करहि भारु ॥
    नानकु नीचु कहै वीचारु ॥
    वारिआ न जावा एक वार ॥
    जो तुधु भावै साई भली कार ॥
    तू सदा सलामति निरंकार ॥१८॥
    इस दुनिया में अनगिनत मूर्ख (बेवकूफ) लोग हैं, जो अज्ञानता में डूबे हुए हैं। वे सच और झूठ का भेद नहीं कर पाते। अनगिनत चोर और धूर्त लोग हैं, जो दूसरों की चीज़ें चुराते हैं और गलत तरीकों से अपना जीवन चलाते हैं।अनगिनत ऐसे लोग हैं, जो अपनी ताकत के दम पर दूसरों पर अत्याचार करते हैं और ज़बरदस्ती राज करना चाहते हैं। अनगिनत लोग ऐसे हैं जो निर्दोषों का गला काटते हैं, यानी हत्या और हिंसा करते हैं।  इस दुनिया में अनगिनत पापी हैं, जो निरंतर पाप करते रहते हैं। बहुत से लोग झूठे होते हैं, जो केवल झूठ के सहारे अपना जीवन व्यतीत करते हैं। अनगिनत लोग ऐसे हैं जो अपवित्र कर्म करते हैं और अपवित्र चीज़ों को खाते हैं। कई लोग ऐसे होते हैं, जो हर समय दूसरों की बुराई (निंदा) करते रहते हैं और इस वजह से उनका सिर पाप के भार से भारी हो जाता है।

    गुरु जी कहते हैं कि मैं उस ईश्वर पर न्योछावर होने के लिए तैयार हूँ, लेकिन फिर भी उसका गुणगान करने में असमर्थ हूँ। जो कुछ भी ईश्वर को अच्छा लगे, वही सबसे अच्छा कार्य है। हे निरंकार (निर्गुण और निराकार परमात्मा), तू सदा अटल और स्थिर है।



    असंख नाव असंख थाव ॥
    अगम अगम असंख लोअ ॥
    असंख कहहि सिरि भारु होइ ॥
    अखरी नामु अखरी सालाह ॥
    अखरी गिआनु गीत गुण गाह ॥
    अखरी लिखणु बोलणु बाणि ॥
    अखरा सिरि संजोगु वखाणि ॥
    जिनि एहि लिखे तिसु सिरि नाहि ॥
    जिव फुरमाए तिव तिव पाहि ॥
    जेता कीता तेता नाउ ॥
    विणु नावै नाही को थाउ ॥
    कुदरति कवण कहा वीचारु ॥
    वारिआ न जावा एक वार ॥
    जो तुधु भावै साई भली कार ॥
    तू सदा सलामति निरंकार ॥१९॥
    अनगिनत (असंख्य) नाम हैं और अनगिनत स्थान (ठिकाने) हैं। परमात्मा के अनगिनत रूप और नाम हैं, और वह हर जगह विद्यमान है। परमात्मा तक पहुँचना कठिन (अगम) है, और अनगिनत लोक (दुनिया और ब्रह्मांड) हैं।
    उसका स्वरूप इतना विशाल और रहस्यमय है कि कोई भी उसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता। अनगिनत लोग उसे बयान करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे थककर चूर हो जाते हैं। उसकी महिमा का वर्णन करने की कोई सीमा नहीं, कोई उसे पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता। शब्दों (अक्षरों) से ही परमात्मा का नाम लिया जाता है और उसकी स्तुति (प्रशंसा) की जाती है। परमात्मा को जानने और उसकी महिमा का वर्णन करने के लिए हमें शब्दों का ही सहारा लेना पड़ता है।

    शब्दों से ही ज्ञान प्राप्त होता है, और इन्हीं शब्दों से भगवान की स्तुति में गीत गाए जाते हैं। ज्ञान और भक्ति दोनों ही शब्दों के माध्यम से संभव हैं। शब्दों से ही लिखना, बोलना और संवाद करना संभव होता है। पूरा संसार भाषा और अक्षरों के माध्यम से ही जुड़ा हुआ है। शब्दों से ही भाग्य का निर्माण और उसके रहस्य बताए जाते हैं। हमारी तकदीर (भाग्य) भी शब्दों के माध्यम से ही प्रकट होती है। जिसने यह सृष्टि रची है, उसके सिर पर कोई सीमा नहीं है। अर्थात् परमात्मा अनंत और निराकार है, उसकी कोई सीमा नहीं। जो भी वह आदेश देता है, उसी के अनुसार सब कुछ घटित होता है। पूरी सृष्टि परमात्मा की इच्छा से ही चलती है। जितनी भी सृष्टि बनी है, वह सब परमात्मा के नाम से बनी है। हर वस्तु, हर जीव उसके द्वारा निर्मित है और उसका नाम हर जगह व्याप्त है। उसके नाम के बिना कोई स्थान (अस्तित्व) नहीं है। हर चीज़ उसी के नाम पर आधारित है, उसके बिना कुछ भी संभव नहीं। उसकी बनाई हुई इस सृष्टि के बारे में मैं क्या विचार कर सकता हूँ?

    उसकी रचना इतनी अद्भुत और विशाल है कि उसे पूरी तरह समझना नामुमकिन है। मैं उस परमात्मा पर अपनी हर चीज़ कुर्बान कर दूँ, फिर भी यह कम होगा। उसका एहसान इतना बड़ा है कि हम उसका बदला कभी नहीं चुका सकते। जो कुछ तुझे अच्छा लगे, वही सबसे उत्तम कार्य है। परमात्मा जो भी करता है, वही सर्वोत्तम होता है। तू सदा सुरक्षित (अविनाशी) और निरंकार (रूप-रहित) है। परमात्मा न कभी जन्म लेता है, न मरता है, वह सदा के लिए एक समान रहता है।

    परमात्मा की महिमा अपरंपार है। वह अनगिनत रूपों में प्रकट होता है, अनगिनत लोकों में विद्यमान है, और उसकी स्तुति करने वाले भी असंख्य हैं। शब्दों (अक्षरों) के माध्यम से हम उसे जानने, उसकी स्तुति करने, और अपने विचार प्रकट करने में सक्षम होते हैं। परमात्मा ही इस पूरी सृष्टि के रचयिता हैं, और उनका कोई अंत नहीं। उनका नाम ही इस सृष्टि का आधार है। उनकी बनाई हुई सृष्टि इतनी अद्भुत है कि हम उसकी पूरी तरह व्याख्या नहीं कर सकते। हम उनके दिए हुए आशीर्वाद के लिए हमेशा कृतज्ञ रह सकते हैं, लेकिन उनका कर्ज़ कभी नहीं चुका सकते। जो कुछ भी होता है, वह उनकी इच्छा से ही होता है, और वही सर्वोत्तम होता है।

    परमात्मा निरंकार (रूप-रहित) और अविनाशी हैं, और सदा के लिए सलामत रहते हैं।



    भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥
    पाणी धोतै उतरसु खेह ॥
    मूत पलीती कपड़ु होइ ॥
    दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ ॥
    भरीऐ मति पापा कै संगि ॥
    ओहु धोपै नावै कै रंगि ॥
    पुंनी पापी आखणु नाहि ॥
    करि करि करणा लिखि लै जाहु ॥
    आपे बीजि आपे ही खाहु ॥
    नानक हुकमी आवहु जाहु ॥२०॥
    जब हमारे हाथ, पैर और शरीर गंदे हो जाते हैं, तो पानी से धोने पर गंदगी साफ हो जाती है। अगर कपड़ा अशुद्ध (गंदा) हो जाता है, तो साबुन से धोने पर वह फिर से साफ हो जाता है। लेकिन जब हमारा मन (बुद्धि) पापों से भर जाता है, तो उसे केवल “नाम” (ईश्वर के स्मरण) के रंग में रंगने से ही शुद्ध किया जा सकता है। यहां “नावै” का अर्थ है भगवान का नाम, यानी सत्संग, भक्ति, और सच्चे कर्मों द्वारा मन को पवित्र किया जा सकता है।

    कोई भी जन्म से न पापी होता है, न ही पुण्यात्मा। बल्कि, जो जैसा कर्म करता है, उसका हिसाब उसी के अनुसार लिखा जाता है। इंसान अपने कर्मों से ही पुण्यवान (अच्छा) या पापी (बुरा) बनता है। जो भी तुम अपने जीवन में बोओगे, वही तुम्हें भविष्य में भोगना पड़ेगा। यह सिद्धांत “कर्म का सिद्धांत” कहलाता है – अच्छे कर्म करोगे तो अच्छे फल मिलेंगे, बुरे कर्म करोगे तो बुरे परिणाम झेलने होंगे।

    सब कुछ परमात्मा के हुक्म (आदेश) से होता है – जन्म और मृत्यु भी उसी के अनुसार होती है। इंसान को अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर के आदेश को समझना और उसके अनुसार अपने जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए।



    तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥
    जे को पावै तिल का मानु ॥
    सुणिआ मंनिआ मनि कीता भाउ ॥
    अंतरगति तीरथि मलि नाउ ॥
    सभि गुण तेरे मै नाही कोइ ॥
    विणु गुण कीते भगति न होइ ॥
    सुअसति आथि बाणी बरमाउ ॥
    सति सुहाणु सदा मनि चाउ ॥
    कवणु सु वेला वखतु कवणु कवण थिति कवणु वारु ॥
    कवणि सि रुती माहु कवणु जितु होआ आकारु ॥
    वेल न पाईआ पंडती जि होवै लेखु पुराणु ॥
    वखतु न पाइओ कादीआ जि लिखनि लेखु कुराणु ॥
    थिति वारु ना जोगी जाणै रुति माहु ना कोई ॥
    जा करता सिरठी कउ साजे आपे जाणै सोई ॥
    किव करि आखा किव सालाही किउ वरनी किव जाणा ॥
    नानक आखणि सभु को आखै इक दू इकु सिआणा ॥
    वडा साहिबु वडी नाई कीता जा का होवै ॥
    नानक जे को आपौ जाणै अगै गइआ न सोहै ॥२१॥
    तीर्थ, तपस्या, दया, और दान – ये सभी पुण्य कर्म माने जाते हैं। अगर कोई इन कर्मों को करता है, तो भी ईश्वर के दरबार में इसका बहुत ही थोड़ा महत्व (तिल के समान) होता है। केवल बाहरी कर्मों से ईश्वर की कृपा नहीं मिलती। असली भक्ति और सच्चाई मन के अंदर होनी चाहिए। श्रवण (सुनना), मनन (सोचना), और सच्चे प्रेम के साथ ध्यान करना – यही असली पूजा है। अंदर की गहराई में जाकर आत्मा को पवित्र करना असली तीर्थ यात्रा है, केवल नदी में स्नान करने से आत्मा शुद्ध नहीं होती। असली तीर्थ यात्रा मन की पवित्रता और ईश्वर के नाम का ध्यान करना है।

    हे प्रभु! सभी गुण आपके हैं, मेरे अंदर कोई गुण नहीं है। बिना अच्छे कर्मों के (अच्छे गुणों को अपनाए बिना) सच्ची भक्ति नहीं हो सकती। भगवान की भक्ति के लिए इंसान को पहले अपने भीतर अच्छे गुण लाने चाहिए।

    आपकी बाणी (शब्द) सत्य है, और यह सभी भ्रमों को दूर करती है। सत्य बहुत सुंदर है, और इसे अपनाने वाला व्यक्ति हमेशा आनंद में रहता है। जो व्यक्ति सच्चाई के मार्ग पर चलता है, वह हमेशा शांति और आनंद का अनुभव करता है।

    अब, आगे गुरु नानक जी सृष्टि के निर्माण से जुड़े सवाल पूछते हैं: वह कौन सा समय, कौन सा क्षण, कौन सी तिथि और कौन सा दिन था जब सृष्टि का निर्माण हुआ? कौन सा मौसम और कौन सा महीना था जब इस सृष्टि की रचना हुई?पंडितों को भी यह समय ज्ञात नहीं, चाहे वे वेद-पुराण पढ़ें। मुल्ला और काज़ी भी यह नहीं जानते, चाहे वे कुरान में खोजें। सृष्टि के निर्माण का समय न तो हिंदू ग्रंथों में बताया गया है, न इस्लामी ग्रंथों में। इसका ज्ञान केवल ईश्वर को ही है।

    योगी भी नहीं जानते कि कौन सी तिथि, वार, ऋतु या महीना था। जिस ईश्वर ने सृष्टि बनाई, केवल वही इसका रहस्य जानता है। मानव अपने ज्ञान पर घमंड न करे, क्योंकि वास्तविक ज्ञान केवल ईश्वर के पास है।

    मैं ईश्वर की महिमा को कैसे बयान करूं? कैसे उसकी प्रशंसा करूं? उसे कैसे समझूं? हर कोई कुछ न कुछ कहने की कोशिश करता है, लेकिन कोई भी पूर्ण सत्य नहीं जानता। हर इंसान अपनी बुद्धि के अनुसार ईश्वर को समझने की कोशिश करता है, लेकिन उसका वास्तविक स्वरूप असीम और अनंत है।

    ईश्वर महान है, और उसकी महिमा भी महान है। अगर कोई खुद को बहुत ज्ञानी समझे और घमंड करे, तो वह ईश्वर के दरबार में स्वीकार नहीं किया जाएगा। अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा दुश्मन है। ईश्वर के सच्चे भक्त विनम्र होते हैं और अहंकार से दूर रहते हैं।



    पाताला पाताल लख आगासा आगास ॥
    ओड़क ओड़क भालि थके वेद कहनि इक वात ॥
    सहस अठारह कहनि कतेबा असुलू इकु धातु ॥
    लेखा होइ त लिखीऐ लेखै होइ विणासु ॥
    नानक वडा आखीऐ आपे जाणै आपु ॥२२॥
    असंख्य पाताल (धरती के नीचे की दुनिया) और असंख्य आकाश (आसमान) हैं। ब्रह्मांड असीम है और इसकी कोई सीमा नहीं। बहुत से लोग (विद्वान, ऋषि-मुनि) इसे खोज-खोज कर थक गए, लेकिन वेदों ने अंततः केवल एक ही बात कही। ईश्वर की महानता को पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं है। 18,000 ग्रंथ (धार्मिक पुस्तकें) और अन्य ग्रंथ भी केवल एक ही सत्य को प्रकट करते हैं। यानी सभी धार्मिक शास्त्रों का सार यही है कि ईश्वर एकमात्र सत्य है।

    अगर ईश्वर की महानता को गिनकर लिखा जा सकता, तो लेखन समाप्त भी हो जाता। ईश्वर की महिमा असीमित है, जिसे पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। ईश्वर को वास्तव में “महान” ही कहा जा सकता है, लेकिन उसकी वास्तविकता को केवल वही जानता है। यानी, ईश्वर की वास्तविकता को पूरी तरह से समझना या वर्णन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

    ऋषि-मुनि और वेदों ने बहुत खोज की, लेकिन अंत में वे केवल यही कह पाए कि ईश्वर की महिमा को पूरी तरह समझना असंभव है। हजारों धार्मिक ग्रंथों का सार यही है कि ईश्वर एक ही है। ईश्वर की महिमा को शब्दों में बांधना संभव नहीं है। केवल वही (ईश्वर) अपनी वास्तविकता को जानता है। हमें विनम्र रहकर ईश्वर के ज्ञान की खोज करनी चाहिए, लेकिन यह समझना चाहिए कि पूर्ण सत्य केवल ईश्वर ही जानता है।



    सालाही सालाहि एती सुरति न पाईआ ॥
    नदीआ अतै वाह पवहि समुंदि न जाणीअहि ॥
    समुंद साह सुलतान गिरहा सेती मालु धनु ॥
    कीड़ी तुलि न होवनी जे तिसु मनहु न वीसरहि ॥२३॥
    भगवान की महिमा जितनी भी की जाए, फिर भी उनकी महानता को पूरी तरह से समझ पाना संभव नहीं है। ईश्वर अनंत हैं, और उनकी प्रशंसा करने से भी हम उनकी पूरी महिमा और वास्तविक स्वरूप को नहीं जान सकते। जितना भी कोई उनकी स्तुति करे, फिर भी उनका सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता।  जितनी भी नदियाँ और नाले समुद्र में मिलते हैं, फिर भी वे समुद्र की गहराई और विशालता को पूरी तरह नहीं जान सकते। यहाँ समुद्र को ईश्वर का प्रतीक माना गया है और नदियों को मनुष्यों की बुद्धि। जैसे सभी नदियाँ अंततः समुद्र में विलीन हो जाती हैं लेकिन समुद्र की संपूर्णता को नहीं समझ पातीं, वैसे ही हमारी बुद्धि और ज्ञान कितना भी उन्नत हो, हम ईश्वर की संपूर्णता को पूरी तरह से नहीं जान सकते।

    यदि कोई राजा या सुल्तान भी हो और उसके पास ढेर सारा धन-संपत्ति हो, तब भी वह ईश्वर के सामने कुछ भी नहीं है। संसारिक धन, पद, प्रतिष्ठा और शक्ति का कोई वास्तविक मूल्य नहीं है यदि इंसान के मन में ईश्वर का सुमिरन (स्मरण) नहीं है। यहाँ “समुंद साह” का अर्थ बहुत बड़े और धनी राजा से है, लेकिन उसकी सारी संपत्ति भी ईश्वर की तुलना में नगण्य है। अगर कोई ईश्वर को भूल जाता है, तो वह करोड़पति या राजा होने के बावजूद एक कीड़े के बराबर भी नहीं होता।

    यदि कोई व्यक्ति कितना भी अमीर, शक्तिशाली, बुद्धिमान या प्रतिष्ठित हो, लेकिन उसके मन में ईश्वर का स्मरण नहीं है, तो उसकी स्थिति एक छोटे कीड़े के समान होती है। दूसरे शब्दों में, सच्ची महानता सांसारिक संपत्ति से नहीं, बल्कि ईश्वर की भक्ति से मिलती है।



    अंतु न सिफती कहणि न अंतु ॥
    अंतु न करणै देणि न अंतु ॥
    अंतु न वेखणि सुणणि न अंतु ॥
    अंतु न जापै किआ मनि मंतु ॥
    अंतु न जापै कीता आकारु ॥
    अंतु न जापै पारावारु ॥
    अंत कारणि केते बिललाहि ॥
    ता के अंत न पाए जाहि ॥
    एहु अंतु न जाणै कोइ ॥
    बहुता कहीऐ बहुता होइ ॥
    वडा साहिबु ऊचा थाउ ॥
    ऊचे उपरि ऊचा नाउ ॥
    एवडु ऊचा होवै कोइ ॥
    तिसु ऊचे कउ जाणै सोइ ॥
    जेवडु आपि जाणै आपि आपि ॥
    नानक नदरी करमी दाति ॥२४॥
    ईश्वर की स्तुति (प्रशंसा) का कोई अंत नहीं है। जितनी भी बार उसकी महिमा गाई जाए, उतनी ही बढ़ती जाती है। ईश्वर की कृपा और दानशीलता (देने की शक्ति) का भी कोई अंत नहीं है। वह अनंत रूप से अपनी रचनाओं को प्रदान करता है। ईश्वर के दर्शन (देखने) और उसकी वाणी को सुनने की कोई सीमा नहीं है। उसकी सत्ता हर जगह है, लेकिन उसे पूरी तरह से जान पाना असंभव है। मनुष्य के मन और विचारों से ईश्वर के अंत का अनुमान लगाना असंभव है। कोई भी यह नहीं जान सकता कि उसका स्वरूप कहाँ तक फैला हुआ है।

    ईश्वर ने जो यह सृष्टि बनाई है, उसका भी कोई अंत नहीं है। उसकी रचना अपार और अनगिनत है। हम ईश्वर की सत्ता की सीमा नहीं जान सकते, न ही उसके विस्तार का कोई छोर पा सकते हैं। बहुत से ज्ञानी और महापुरुष ईश्वर के अंत को खोजने का प्रयास करते रहे हैं, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो सके। फिर भी, कोई भी उसके अंत को नहीं जान सका। सच तो यह है कि उसके अंत को कोई भी नहीं जान सकता। जितना अधिक उसकी महिमा का वर्णन किया जाए, उतना ही अधिक उसका प्रभाव और महानता महसूस होती है। वह ईश्वर महान स्वामी है, और उसका स्थान सबसे ऊँचा और श्रेष्ठ है। उसके नाम से ऊँचा और कुछ भी नहीं है। वह सबसे ऊँचा और महानतम है। यदि कोई उसकी महानता की बराबरी करना चाहे, तो वह नहीं कर सकता। केवल वही व्यक्ति ईश्वर को जान सकता है, जिसे ईश्वर स्वयं अपनी कृपा से यह ज्ञान प्रदान करे। ईश्वर स्वयं ही अपनी महिमा को पूरी तरह से जानता है, क्योंकि वह स्वयं ही अनंत और अपार है। गुरु नानक देव जी कहते हैं कि उसकी कृपा और दान केवल उसकी कृपा-दृष्टि (नज़र) से ही प्राप्त होती है। मनुष्य को उसे अपनी बुद्धि से समझने की बजाय उसकी कृपा का पात्र बनने की कोशिश करनी चाहिए।



    बहुता करमु लिखिआ ना जाइ ॥
    वडा दाता तिलु न तमाइ ॥
    केते मंगहि जोध अपार ॥
    केतिआ गणत नही वीचारु ॥
    केते खपि तुटहि वेकार ॥
    केते लै लै मुकरु पाहि ॥
    केते मूरख खाही खाहि ॥
    केतिआ दूख भूख सद मार ॥
    एहि भि दाति तेरी दातार ॥
    बंदि खलासी भाणै होइ ॥
    होरु आखि न सकै कोइ ॥
    जे को खाइकु आखणि पाइ ॥
    ओहु जाणै जेतीआ मुहि खाइ ॥
    आपे जाणै आपे देइ ॥
    आखहि सि भि केई केइ ॥
    जिस नो बखसे सिफति सालाह ॥
    नानक पातिसाही पातिसाहु ॥२५॥
    ईश्वर की कृपा और दया इतनी विशाल है कि उसे लिखा या गिना नहीं जा सकता।  वह परमात्मा (ईश्वर) सबसे बड़ा दाता (दान करने वाला) है और किसी भी प्रकार का लालच नहीं रखता। अनेक वीर और शक्तिशाली लोग उससे कुछ न कुछ माँगते रहते हैं। इतनी अधिक दया और कृपा है कि उसकी कोई गणना या सोच-विचार नहीं हो सकता। बहुत से लोग जीवनभर मेहनत करते हैं, फिर भी व्यर्थ में ही टूट जाते हैं। बहुत से लोग ईश्वर से प्राप्त चीज़ें लेकर भी इनकार कर देते हैं (अहंकार या नाशुक्री कर देते हैं)। बहुत से मूर्ख (अज्ञानी) बार-बार खाते हैं, फिर भी संतुष्ट नहीं होते। बहुत से लोग हमेशा दुख और भूख की मार सहते हैं। हे दातार (दाता परमात्मा), यह भी तेरी ही दी हुई दात (भेट) है।

    बंदी (कष्ट में पड़े लोग) तभी मुक्त होते हैं जब ईश्वर की इच्छा होती है। और कोई भी इसके बारे में कुछ नहीं कह सकता। अगर कोई कहे कि वह परमात्मा की कृपा को जान सकता है, तो वह केवल उतना ही जानता है जितना उसने (ईश्वर की कृपा से) अनुभव किया है।

    ईश्वर स्वयं ही जानता है और स्वयं ही सबको देता है। बहुत से लोग ईश्वर की महिमा का बखान करते हैं। लेकिन केवल वही लोग उसकी वास्तविक महिमा को समझ सकते हैं जिन्हें वह अपनी कृपा से यह अवसर देता है। गुरु नानक देव जी कहते हैं: वह परमात्मा सभी राजाओं का राजा है।

    ईश्वर की दया और कृपा अनंत है। दुनिया में बहुत से लोग उससे कुछ न कुछ माँगते रहते हैं, लेकिन उसकी कृपा को पूरी तरह से समझ पाना असंभव है। कुछ लोग लालच में रहते हैं, कुछ ईश्वर के दिए हुए आशीर्वाद को ठुकरा देते हैं, और कुछ लोग हमेशा दुख और भूख से पीड़ित रहते हैं। सच्चा संतोष और मुक्ति केवल ईश्वर की इच्छा से ही संभव है। जो भी व्यक्ति सच में उसकी महिमा को समझता है, वह वही है जिसे ईश्वर स्वयं यह ज्ञान प्रदान करता है।



    अमुल गुण अमुल वापार ॥
    अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥
    अमुल आवहि अमुल लै जाहि ॥
    अमुल भाइ अमुला समाहि ॥
    अमुलु धरमु अमुलु दीबाणु ॥
    अमुलु तुलु अमुलु परवाणु ॥
    अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणु ॥
    अमुलु करमु अमुलु फुरमाणु ॥
    अमुलो अमुलु आखिआ न जाइ ॥
    आखि आखि रहे लिव लाइ ॥
    आखहि वेद पाठ पुराण ॥
    आखहि पड़े करहि वखिआण ॥
    आखहि बरमे आखहि इंद ॥
    आखहि गोपी तै गोविंद ॥
    आखहि ईसर आखहि सिध ॥
    आखहि केते कीते बुध ॥
    आखहि दानव आखहि देव ॥
    आखहि सुरि नर मुनि जन सेव ॥
    केते आखहि आखणि पाहि ॥
    केते कहि कहि उठि उठि जाहि ॥
    एते कीते होरि करेहि ॥
    ता आखि न सकहि केई केइ ॥
    जेवडु भावै तेवडु होइ ॥
    नानक जाणै साचा सोइ ॥
    जे को आखै बोलुविगाड़ु ॥
    ता लिखीऐ सिरि गावारा गावारु ॥२६॥
    परमात्मा के गुण अमूल्य हैं, और उसका व्यापार (यानी उसकी लीला) भी अनमोल है।  वह व्यापारी (ईश्वर) अनमोल है, और उसके खजाने (भंडार) भी अनमोल हैं।  जो लोग आते हैं (जन्म लेते हैं) वे भी अनमोल हैं, और जो चले जाते हैं (मरते हैं) वे भी अमूल्य हैं। उसका प्रेम भी अनमोल है, और उसमें समा जाना (एक हो जाना) भी अनमोल है। उसका न्याय और उसकी अदालत (सत्य का न्याय) भी अनमोल है। उसका न्याय और उसके निर्णय भी अनमोल हैं। उसकी कृपा (बख्शीश) और उसकी पहचान (उसका नाम) भी अनमोल हैं। उसके कर्म और उसके आदेश भी अनमोल हैं। उसका अनमोल होना शब्दों में बताया नहीं जा सकता।

    कई लोग उसे कहने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः वे उसकी भक्ति में लीन हो जाते हैं। वेद और पुराण भी उसे बयान करने की कोशिश करते हैं। पढ़े-लिखे लोग भी उसके बारे में चर्चा करते हैं। ब्रह्मा और इंद्र भी उसकी महिमा का बखान करते हैं। गोपियाँ और भगवान कृष्ण भी उसकी चर्चा करते हैं। शिवजी और सिद्ध महात्मा भी उसकी महिमा का वर्णन करते हैं। कई ज्ञानी और बुद्धिमान भी उसके बारे में बोलते हैं। राक्षस और देवता भी उसका वर्णन करते हैं देवता, मनुष्य, ऋषि और सेवक भी उसकी महिमा गाते हैं। बहुत लोग उसे कहने का प्रयास करते हैं। बहुतों ने उसे समझने की कोशिश की, लेकिन वे असफल होकर चले गए। अगर उससे भी अधिक लोग उसे जानने की कोशिश करें, तब भी… कोई भी उसे पूरी तरह से नहीं समझ सकता। वह जितना चाहता है, उतना ही होता है। गुरु नानक कहते हैं, केवल वही सच्चा है जो उसे जानता है। अगर कोई उसकी महिमा को गलत तरीके से कहता है… तो उसे मूर्ख कहा जाता है।



    सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥
    वाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे ॥
    केते राग परी सिउ कहीअनि केते गावणहारे ॥
    गावहि तुहनो पउणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरमु दुआरे ॥
    गावहि चितु गुपतु लिखि जाणहि लिखि लिखि धरमु वीचारे ॥
    गावहि ईसरु बरमा देवी सोहनि सदा सवारे ॥
    गावहि इंद इदासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
    गावहि सिध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे ॥
    गावनि जती सती संतोखी गावहि वीर करारे ॥
    गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले ॥
    गावहि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले ॥
    गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥
    गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे ॥
    गावहि खंड मंडल वरभंडा करि करि रखे धारे ॥
    सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले ॥
    होरि केते गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ वीचारे ॥
    सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ॥
    है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥
    रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई ॥
    करि करि वेखै कीता आपणा जिव तिस दी वडिआई ॥
    जो तिसु भावै सोई करसी हुकमु न करणा जाई ॥
    सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु नानक रहणु रजाई ॥२७॥
    ईश्वर सबका पालनहार है।
    वह (ईश्वर) कहाँ रहता है? उसका दरबार (घर) कहाँ है? वह हर जगह उपस्थित है और पूरे संसार का ध्यान रखता है। ईश्वर के दरबार में अनगिनत नाद (संगीत) बजते हैं, और अनगिनत लोग उसकी महिमा गाते हैं।
    बहुत से राग और संगीतकार ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं। कुदरत भी भगवान की स्तुति करती है। हवा, पानी, और अग्नि भगवान की महिमा गाते हैं। राजा धर्मराज (यमराज) भी उसके आदेशों का पालन करता है।
    चिंतन करने वाले, साधु, संत, योगी भी उसकी स्तुति करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, और सभी देवता भी उसकी महिमा गाते हैं। स्वर्ग की अप्सराएँ भी उसकी सुंदरता का वर्णन करती हैं। असंख्य ऋषि-मुनि वेदों के माध्यम से ईश्वर की स्तुति करते हैं। चारों युगों में उसकी महिमा गाई जाती है। सभी संत, तपस्वी, ज्ञानी, और वीर योद्धा भी उसकी प्रशंसा करते हैं। अष्टसठि तीर्थ (68 तीर्थ स्थान) भी उसकी महिमा गाते हैं। चारों लोकों और सृष्टि में जितने भी प्राणी हैं, वे सभी उसकी कृपा से बने हैं और उसी की स्तुति करते हैं। परम सत्य और शाश्वत ईश्वर ही हमेशा सच्चा है। वह पहले भी था, अब भी है, और हमेशा रहेगा। पूरी सृष्टि उसी ने बनाई है।

    ईश्वर की लीला अपरंपार है। ईश्वर ने अपनी माया से भिन्न-भिन्न रूपों और रंगों में यह सृष्टि बनाई है। वह अपनी बनाई हुई रचना को खुद ही देखता है और उसकी महिमा करता है। ईश्वर की मर्ज़ी ही सर्वोपरि है।
    जो कुछ भी ईश्वर चाहता है, वही होता है। उसके आदेश को बदला नहीं जा सकता। गुरु नानक जी कहते हैं कि वही सच्चा राजा है और उसकी इच्छा ही सर्वोपरि है।



    मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूति ॥
    खिंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति ॥
    आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीतु ॥
    आदेसु तिसै आदेसु ॥
    आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥२८॥
    यहाँ मुंडन (सन्यासियों द्वारा सिर मुंडवाने की क्रिया) का प्रतीकात्मक अर्थ लिया गया है। असली मुंडन (संन्यास) वह है जिसमें संतोष (संतुष्टि) को धारण किया जाए।  जीवन में संतोष को अपनाना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। सच्चे साधु या गुरमुख को लज्जा और विनम्रता रखनी चाहिए। यदि इंसान मेहनती और नम्र हो, तो उसे असली सम्मान प्राप्त होता है। यह साधुओं के कटोरे का प्रतीक है, लेकिन गुरु जी यहाँ कह रहे हैं कि धैर्य और संतोष ही असली झोली है। जो धूल (भस्म) साधु अपने शरीर पर लगाते हैं, उसका असली अर्थ यह है कि मनुष्य अपने मन को ध्यान में केंद्रित करे।

    एक सच्चा योगी या संत वह नहीं जो बाहरी रूप से साधु दिखे, बल्कि वह है जो संतोष, मेहनत, और ध्यान को अपनाए।

    साधु अपने शरीर पर फटी-पुरानी पोशाक पहनते हैं, लेकिन असली पोशाक समय (काल) को मानना चाहिए – यानी जीवन नश्वर है, इसे समझो। शरीर को पवित्र रखना और बुरी सोच से बचना चाहिए। साधु डंडा लेकर चलते हैं, लेकिन असली सहारा सद्गुण और नैतिकता है। मनुष्य को ईश्वर में भरोसा – परतीति (आत्म-विश्वास और श्रद्धा) – रखना चाहिए।

    बाहरी वस्त्रों या साधनों से कोई संत नहीं बनता। असली संन्यास वह है जिसमें व्यक्ति अपने मन और शरीर को पवित्र रखे, समय को पहचाने और श्रद्धा रखे।

    सभी इंसान समान हैं और सबका मार्ग एक ही है – सतमार्ग (सच्चाई का रास्ता)। सगल जमाती (समाज के सभी लोग) – सभी इंसान एक समान हैं, जाति-पाति का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
    जो अपने मन पर जीत हासिल कर लेता है, वही असली दुनिया को जीत सकता है।

    जाति, धर्म, ऊँच-नीच से ऊपर उठकर सभी को समान मानना चाहिए। अगर कोई अपने मन को जीत ले, तो वह पूरी दुनिया को जीत सकता है।

    उस परमात्मा को बार-बार प्रणाम हो, उस ईश्वर को नमन हो। हमेशा ईश्वर को नमन करना चाहिए, क्योंकि वही सबसे महान और सर्वोच्च शक्ति है।

    ईश्वर अनादि (जिसकी कोई शुरुआत नहीं) है। वह हमेशा पवित्र और निष्कलंक है। अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं) – भगवान का कोई जन्म या अंत नहीं है। अनाहति (जिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता) – ईश्वर किसी से भी प्रभावित नहीं होता। हर युग में ईश्वर एक ही रूप में रहता है, उसका स्वरूप कभी नहीं बदलता।



    भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
    आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
    संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥
    आदेसु तिसै आदेसु ॥
    आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥२९॥
    भोग (अनुभव) ज्ञान है, और दया (करुणा) उसका भंडार (कोष) है। हर जीव के हृदय में परमात्मा की आवाज गूंज रही है। वास्तविक आनंद (भोग) ज्ञान के द्वारा प्राप्त होता है, और यह ज्ञान दया से संचित होता है। जब कोई व्यक्ति ज्ञान और दया को अपना लेता है, तो उसे अपने अंदर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है। हर प्राणी के हृदय में नाद (ईश्वरीय ध्वनि) गूंजती है, जो ईश्वर का प्रतीक है।

    वह स्वयं ही सबका स्वामी है और सबका मालिक है। सारी रिद्धियाँ और सिद्धियाँ (चमत्कारी शक्तियाँ) केवल क्षणिक सुख हैं। ईश्वर ही सबका स्वामी है। कुछ लोग सांसारिक शक्तियों, सिद्धियों और चमत्कारों को महत्व देते हैं, लेकिन यह सभी ईश्वर के वास्तविक आनंद से बहुत छोटे हैं। सच्ची रिद्धि-सिद्धि ईश्वर की भक्ति और ज्ञान से प्राप्त होती है, न कि बाहरी चमत्कारों से।

    संसार में मिलना (संयोग) और बिछड़ना (वियोग) – ये दोनों कर्मों के कारण होते हैं। भाग्य भी उन्हीं के अनुसार मिलता है। हमारे जीवन में मिलन (खुशियाँ) और बिछड़ना (दुख) कर्मों के अनुसार चलते हैं। जो कुछ भी हमें जीवन में प्राप्त होता है, वह हमारे पिछले कर्मों (भाग्य) के आधार पर होता है। यह संसार ईश्वर के नियमों से चलता है, और हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है।

    मैं उस परमात्मा को बार-बार प्रणाम करता हूँ, क्योंकि वही सृष्टि का वास्तविक स्वामी है। वह आदि (प्रारंभ से पहले का), अनील (निर्मल), अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं), अनाहत (जिसे कोई आघात नहीं पहुँचा सकता) है। वह हर युग में एक समान रहता है। ईश्वर को कोई बांध नहीं सकता। वह शुद्ध, सदा रहने वाला, जन्म-मरण से परे, अजर-अमर और युगों-युगों तक एक समान रहने वाला है। वह कभी बदलता नहीं, जबकि संसार परिवर्तनशील है।



    एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
    इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥
    जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु ॥
    ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु ॥
    आदेसु तिसै आदेसु ॥
    आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥३०॥
    एक माई (शक्ति) ने अपनी विधि (जुगति) से यह संसार बनाया और तीन प्रकार की शक्तियों को जन्म दिया। यहाँ माई का अर्थ माया या ईश्वर की शक्ति से है, जिसने इस पूरी सृष्टि की रचना की।

    “तीन चेले” से तात्पर्य तीन गुणों से है—

    • सतोगुण (पवित्रता, ज्ञान, सच्चाई)
    • रजोगुण (इच्छाएं, कर्म, गतिविधियाँ)
    • तमोगुण (अज्ञान, आलस्य, अंधकार)

    इन तीनों गुणों के अनुसार, तीन मुख्य कार्यकर्ता बने:

    • संसारी (ब्रह्मा) – जो सृष्टि की रचना करता है।
    • भंडारी (विष्णु) – जो पालन करता है।
    • दीबाणु (शिव) – जो संहार करता है।

    यह त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का वर्णन है, जिन्हें संसार को चलाने के लिए नियुक्त किया गया।

    जिस प्रकार ईश्वर को अच्छा लगता है, वैसे ही वह इस संसार को चलाता है और जैसा उसका हुक्म (आदेश) होता है, वैसे ही सबकुछ घटित होता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी परमात्मा की ही इच्छा से कार्य करते हैं, वे अपने आप कुछ नहीं कर सकते।

    वह (ईश्वर) सबको देखता है, लेकिन उसे कोई देख नहीं सकता। यह बहुत ही अद्भुत बात है। ईश्वर सर्वव्यापी है, वह हमें हर समय देखता है, लेकिन हमारी आँखें उसे देख नहीं सकतीं। यह उसका अलौकिक गुण है। वह परमात्मा आदि (सर्वप्रथम) है, अनील (निर्मल) है, अनादि (जिसका कोई आदि या आरंभ नहीं) है, अनाहत (जिसे कोई नष्ट नहीं कर सकता) है, जुग-जुग एको वेसु (जो सदा एक समान है, कभी बदलता नहीं)।



    आसणु लोइ लोइ भंडार ॥
    जो किछु पाइआ सु एका वार ॥
    करि करि वेखै सिरजणहारु ॥
    नानक सचे की साची कार ॥
    आदेसु तिसै आदेसु ॥
    आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥३१॥
    परमात्मा (ईश्वर) के अनगिनत स्थान (आसण) हैं, और उनकी अनगिनत भंडारगृह (खजाने) हैं। मतलब कि ईश्वर की रचना असीम है, उनके खजाने और आशीर्वाद हर जगह फैले हुए हैं। जो कुछ भी हमें मिलता है, वह सब उसी (परमात्मा) की ओर से आता है। यानी, हर चीज़ जो हमें प्राप्त होती है, चाहे वह सुख हो या दुख, वह ईश्वर की ही देन होती है।

    ईश्वर ने सारी सृष्टि को बनाया है और वे स्वयं ही उसे बार-बार देख रहे हैं। ईश्वर सृष्टि का रचयिता है और वह अपने बनाए संसार की देखभाल भी करता है। सच्चे (परमात्मा) का कार्य (कृपा) भी सच्ची और अटल होती है।
    ईश्वर का बनाया हुआ संसार और उनकी लीला सत्य है और सदा अडिग रहती है। वह सृष्टि के प्रारंभ से पहले भी मौजूद था। वह पवित्र और निर्लिप्त (दुनिया के मोह-माया से परे) है। उसका कोई आदि (शुरुआत) नहीं है, वह हमेशा से है।
    वह अजेय और अविनाशी है। हर युग में वह एक ही रूप में रहता है, वह कभी बदलता नहीं है।



    इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
    लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥
    एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
    सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥
    नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥३२॥
    अगर किसी के पास एक की बजाय दो ज़ुबान (जीभ) हों, फिर लाख हों, फिर बीस लाख हो जाएँ… अगर कोई लाखों-करोड़ों ज़ुबानों से भी ईश्वर की महिमा का गुणगान करे, तो भी वह पर्याप्त नहीं होगा। भगवान की महानता इतनी विशाल है कि कोई भी पूरी तरह उसका वर्णन नहीं कर सकता।

    यदि लाखों बार बार-बार भी परमेश्वर का नाम लिया जाए, तो भी वह कम ही लगेगा। ईश्वर के नाम की महिमा इतनी अनंत है कि अगर हम अनगिनत बार भी उसका जाप करें, तब भी उसकी महिमा पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते।

    इस मार्ग पर चलते हुए कोई उच्च अवस्था प्राप्त कर सकता है। अगर कोई लगातार ईश्वर के नाम का सुमिरन करता रहे और भक्ति में लगा रहे, तो वह आध्यात्मिक रूप से ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।

    जब छोटे जीव-कीट (कीड़े) आसमान की ऊँचाइयों की बातें सुनते हैं, तो उन्हें ईर्ष्या होती है। जो लोग अज्ञान में हैं, वे भक्तों की भक्ति और आध्यात्मिक उपलब्धियों को देखकर जलन महसूस कर सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे एक छोटा कीड़ा आसमान में उड़ते पक्षियों को देखकर जलता है, क्योंकि वह वहाँ नहीं पहुँच सकता।

    ईश्वर की कृपा से ही उसका नाम जपा जा सकता है, और झूठा व्यक्ति (अहंकारी) झूठ में ही नष्ट हो जाता है। ईश्वर की भक्ति और उसकी पहचान केवल उसकी कृपा (नजर) से ही संभव है। जो लोग माया (भौतिक सुखों) में फँसे रहते हैं, वे अंततः दुखी ही होते हैं।



    आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥
    जोरु न मंगणि देणि न जोरु ॥
    जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु ॥
    जोरु न राजि मालि मनि सोरु ॥
    जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥
    जोरु न जुगती छुटै संसारु ॥
    जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ ॥
    नानक उतमु नीचु न कोइ ॥३३॥

    • किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह जबरदस्ती – (जोर) से बोल सके या जबरदस्ती चुप रह सके। बोलने और चुप रहने का अधिकार ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है।
    • किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह जबरदस्ती – कुछ मांग सके या जबरदस्ती किसी को कुछ दे सके। सच्ची दया और कृपा केवल भगवान से ही प्राप्त होती है।
    • किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह जबरदस्ती – जीवन प्राप्त कर सके या मृत्यु को रोक सके। जीवन और मृत्यु केवल परमात्मा की इच्छा से होती है।
    • किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह जबरदस्ती – राज (सत्ता), धन-संपत्ति, मोती (आभूषण) और सांसारिक ऐश्वर्य प्राप्त कर सके। यह सब परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होता है।
    • किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह जबरदस्ती – बोध (समझदारी), ज्ञान और विचार प्राप्त कर सके। सच्ची बुद्धि और विवेक केवल भगवान की कृपा से मिलता है।
    • किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह अपने बल से – संसार के बंधनों (मोह-माया) से मुक्त हो सके। केवल सच्चे भक्ति और गुरु की कृपा से ही मुक्ति संभव है।

    सच्ची शक्ति और अधिकार केवल उसी के हाथ में है, जो सबकुछ देख रहा है यानी ईश्वर। वह जो चाहे, कर सकता है। परमात्मा की दृष्टि में कोई उच्च (महान) या नीच (छोटा) नहीं है। सब समान हैं, क्योंकि सभी उसी की बनाई हुई सृष्टि का हिस्सा हैं।



    राती रुती थिती वार ॥
    पवण पाणी अगनी पाताल ॥
    तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल ॥
    तिसु विचि जीअ जुगति के रंग ॥
    तिन के नाम अनेक अनंत ॥
    करमी करमी होइ वीचारु ॥
    सचा आपि सचा दरबारु ॥
    तिथै सोहनि पंच परवाणु ॥
    नदरी करमि पवै नीसाणु ॥
    कच पकाई ओथै पाइ ॥
    नानक गइआ जापै जाइ ॥३४॥
    रात (रात्रि), ऋतु (मौसम), तिथि (चंद्र कैलेंडर के दिन), और वार (सप्ताह के दिन) – यह सब सृष्टि के नियम हैं। ईश्वर ने इस ब्रह्मांड की रचना की और इसमें समय का एक निश्चित क्रम बनाया, जिससे सब कुछ व्यवस्थित रूप से चलता है। सृष्टि के मूल तत्व हैं – हवा (पवन), पानी (जल), अग्नि (अग्नि), और पाताल (धरती के नीचे का संसार)। इन तत्वों के बिना जीवन संभव नहीं है। पूरी दुनिया इन्हीं तत्वों पर आधारित है। ईश्वर ने इन सभी तत्वों के बीच धरती (पृथ्वी) को स्थिर रखा, ताकि यह धरम साल यानी धर्म की जगह बने। यहाँ “धरम साल” का अर्थ यह है कि पृथ्वी को ऐसा स्थान बनाया गया जहाँ लोग अच्छे कर्म और धार्मिक जीवन जी सकते हैं। इसी पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव-जंतु, प्राणी और इंसान रहते हैं। इन सबकी अपनी-अपनी जीवनशैली और गुण हैं। सब अपने-अपने ढंग से जीवन जीते हैं। इन सभी जीवों के असंख्य नाम और प्रकार हैं। हर प्राणी की अपनी अलग पहचान और गुण होते हैं।

    हर व्यक्ति अपने कर्मों के आधार पर परखा जाता है। ईश्वर न्याय करते समय इंसान के अच्छे और बुरे कर्मों को देखता है। ईश्वर स्वयं सत्य है और उसका दरबार (न्यायालय) भी सत्य है। वहाँ किसी प्रकार का झूठ या छल नहीं चलता। ईश्वर के दरबार में केवल वे लोग स्वीकार किए जाते हैं जो सच्चे और अच्छे कर्मों वाले होते हैं। उन्हें वहाँ सम्मान मिलता है। ईश्वर की कृपा से ही कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग पर चलने का आशीर्वाद प्राप्त करता है। जब ईश्वर कृपा करता है, तभी व्यक्ति धर्म के रास्ते पर चलता है।  ईश्वर के दरबार में हर व्यक्ति के कर्मों को जांचा जाता है। कुछ लोग कच्चे (अधूरे, बुरे कर्मों वाले) होते हैं, और कुछ लोग पके (सच्चे, अच्छे कर्मों वाले) होते हैं। उसी आधार पर उनका निर्णय किया जाता है।

    जो भी इस सत्य को समझता है, उसे यह महसूस होता है कि इस संसार में सब कुछ कर्म और सत्य के अनुसार चलता है। इसलिए इंसान को अपने कर्मों को अच्छा बनाना चाहिए ताकि वह ईश्वर के दरबार में स्वीकार किया जाए।



    धरम खंड का एहो धरमु ॥
    गिआन खंड का आखहु करमु ॥
    केते पवण पाणी वैसंतर केते कान महेस ॥
    केते बरमे घाड़ति घड़ीअहि रूप रंग के वेस ॥
    केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस ॥
    केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस ॥
    केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस ॥
    केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद ॥
    केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद ॥
    केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंतु न अंतु ॥३५॥
    धरम खंड (धर्म के क्षेत्र) में – सच्चा धर्म वही है, जो इंसान को सत्य, न्याय, करुणा और भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
    ज्ञान खंड (ज्ञान के क्षेत्र) में कर्म महत्वपूर्ण होता है। ज्ञान की राह पर आगे बढ़ने के लिए केवल सोचने से कुछ नहीं होता, बल्कि कर्म भी करना आवश्यक होता है। सच्चे ज्ञान की पहचान कर्मों से होती है।
    असंख्य वायु, जल, अग्नि और अनेक शिव (महेश) हैं। सृष्टि में अनगिनत तत्व मौजूद हैं। यहाँ पर गुरु नानक जी यह बता रहे हैं कि ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि बहुत विशाल और अनगिनत तत्वों से भरी हुई है। इसमें अनेक प्रकार की प्राकृतिक शक्तियाँ और शक्तिशाली देवता मौजूद हैं। अनेक ब्रह्मा, जो सृजन में लगे हैं, विभिन्न रूप, रंग और वेशधारी हैं। ईश्वर की बनाई सृष्टि में अनेकों ब्रह्मा (सृजनकर्ता) हैं, जो अनगिनत रूपों और रंगों में मौजूद हैं। अनेक धर्मभूमियाँ, मेरु पर्वत और अनेकों गुरु और ऋषियों के उपदेश हैं। संसार में अनेक धर्म, तीर्थ स्थान, और आध्यात्मिक उपदेश मौजूद हैं, जो हमें सही रास्ता दिखाते हैं। असंख्य इंद्र, चंद्रमा, सूर्य, ग्रह और देश हैं।  यह ईश्वर की महानता का बखान है कि सृष्टि में अनगिनत ग्रह, चंद्रमा, सूर्य और आकाशगंगाएँ हैं।

    असंख्य सिद्ध, ज्ञानी, योगी और देवी-देवताओं के रूप हैं। ईश्वर ने अनेकों सिद्ध योगी, बुद्धिमान ज्ञानी और देवी-देवताओं को भी बनाया है। असंख्य देवता, दानव, ऋषि और समुद्रों में बहुमूल्य रत्न हैं। संसार में केवल सकारात्मक (देवता) और नकारात्मक (दानव) शक्तियाँ ही नहीं हैं, बल्कि मूल्यवान खजाने और ज्ञान के भंडार भी मौजूद हैं। असंख्य योनियाँ, भाषाएँ और असंख्य राजा हैं। यहाँ यह बताया गया है कि सृष्टि में अनगिनत प्रजातियाँ, भाषाएँ और राजघराने हैं।

    असंख्य भक्त, सेवक और इस सृष्टि का कोई अंत नहीं है, नानक। भगवान की बनाई हुई सृष्टि इतनी विशाल और अपार है कि इसका कोई अंत नहीं है।

     



    गिआन खंड महि गिआनु परचंडु ॥
    तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु ॥
    सरम खंड की बाणी रूपु ॥
    तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ॥
    ता कीआ गला कथीआ ना जाहि ॥
    जे को कहै पिछै पछुताइ ॥
    तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि ॥
    तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुधि ॥३६॥
    आध्यात्मिक मार्ग पर कई चरण होते हैं। पहले व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है, फिर वह अपनी आत्मा को परिशुद्ध करता है, और फिर वह उच्चतम आध्यात्मिक स्थिति तक पहुँचता है। यह पूरी यात्रा एक आंतरिक अनुभव है, जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह से शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

    ज्ञान के खंड (अर्थात् स्तर) में ज्ञान अत्यंत शक्तिशाली और तेज़ होता है। जब कोई आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ता है, तो पहला चरण “ज्ञान खंड” (ज्ञान का क्षेत्र) होता है। यहाँ पर आत्मा को वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान साधारण नहीं होता बल्कि बहुत तेज और प्रभावशाली होता है, जिससे व्यक्ति सत्य को पहचानता है। वहाँ (ज्ञान खंड में) नाद (आध्यात्मिक ध्वनि), बिनोद (आनंद), और करोड़ों प्रकार के सुख होते हैं। जब व्यक्ति ज्ञान खंड में प्रवेश करता है, तो उसे दिव्य ध्वनियाँ (नाद) सुनाई देती हैं, आनंद की अनुभूति होती है, और उसे अनगिनत आध्यात्मिक सुख प्राप्त होते हैं।

    अगला स्तर “सरम खंड” है। सरम खंड (प्रयास का क्षेत्र) की भाषा सुंदरता से भरी होती है, जहाँ आत्मा खुद को परिशुद्ध करने के लिए प्रयासरत रहती है। यहाँ पर आत्मा सुंदरता, गुण, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए कड़ी मेहनत करती है। वहाँ (सरम खंड में) बेहद अनूठे रूप और आकार तैयार किए जाते हैं। इस चरण में आत्मा को आकार दिया जाता है, उसका मानसिक और आध्यात्मिक विकास किया जाता है, ताकि वह परम सत्य तक पहुँचने के योग्य बन सके। वहाँ की बातें शब्दों में बयान नहीं की जा सकतीं। यह अवस्था इतनी गहरी और दिव्य होती है कि इसे कोई शब्दों में नहीं कह सकता। यह केवल अनुभव किया जा सकता है। अगर कोई इसे समझाने की कोशिश करे, तो वह पछताएगा। क्योंकि यह आध्यात्मिक अनुभव शब्दों से परे है, इसे समझाने की कोशिश करने पर व्यक्ति अधूरा महसूस करेगा, क्योंकि शब्द इसकी गहराई को पूरी तरह नहीं पकड़ सकते।

    वहाँ पर ध्यान, बुद्धि, और मन को शुद्ध किया जाता है। इस खंड में आत्मा की चेतना (सुरति), समझ (मति), मन, और बुद्धि को परिशुद्ध कर उसे सत्य की ओर अग्रसर किया जाता है। वहाँ पर वीरों (संतों) और सिद्धों (योगियों) की समझ का निर्माण होता है। इस अवस्था में व्यक्ति संतों, ऋषियों और महापुरुषों की तरह गहरी आध्यात्मिक समझ प्राप्त करता है। वह अपने अहंकार को छोड़कर पूर्ण ज्ञान की ओर बढ़ता है।



    करम खंड की बाणी जोरु ॥
    तिथै होरु न कोई होरु ॥
    तिथै जोध महाबल सूर ॥
    तिन महि रामु रहिआ भरपूर ॥
    तिथै सीतो सीता महिमा माहि ॥
    ता के रूप न कथने जाहि ॥
    ना ओहि मरहि न ठागे जाहि ॥
    जिन कै रामु वसै मन माहि ॥
    तिथै भगत वसहि के लोअ ॥
    करहि अनंदु सचा मनि सोइ ॥
    सच खंडि वसै निरंकारु ॥
    करि करि वेखै नदरि निहाल ॥
    तिथै खंड मंडल वरभंड ॥
    जे को कथै त अंत न अंत ॥
    तिथै लोअ लोअ आकार ॥
    जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार ॥
    वेखै विगसै करि वीचारु ॥
    नानक कथना करड़ा सारु ॥३७॥
    यह पंक्तियाँ ईश्वर की अनंतता, सत्य के राज्य की महिमा, और उसके आध्यात्मिक नियमों का वर्णन करती हैं। गुरु नानक देव जी हमें बताते हैं कि जो लोग सच्चे हृदय से ईश्वर को अपने मन में बसाते हैं, वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और दिव्य आनंद प्राप्त करते हैं।

    “करम खंड” (कर्म क्षेत्र) में ईश्वर की शक्ति का वर्चस्व है, वहाँ और किसी की शक्ति नहीं चलती। वहाँ पर महान योद्धा और बलशाली लोग निवास करते हैं, और उनके भीतर भी राम (परमात्मा) व्याप्त हैं।  वहाँ की सुंदरता और महिमा इतनी अद्भुत है कि उसका वर्णन शब्दों में करना संभव नहीं। वहाँ रहने वाले लोग न तो मरते हैं और न ही किसी के धोखे में आते हैं, क्योंकि उनके हृदय में ईश्वर (राम) बसते हैं। वहाँ सच्चे भक्त निवास करते हैं, जो ईश्वर के नाम में लीन होकर आनंदमय जीवन जीते हैं।

    “सच खंड” (सत्य का क्षेत्र) में निरंकार (बिना रूप वाला परमात्मा) स्वयं निवास करता है और अपने सृजन को प्रेमपूर्वक देखता है। वहाँ अनगिनत ब्रह्मांड, लोक और आकाशमंडल मौजूद हैं, जिनका कोई अंत नहीं। अलग-अलग लोकों में विविध आकार और जीव हैं, और वे सभी परमात्मा के आदेशानुसार चलते हैं। परमात्मा अपने सृजन को देखकर प्रसन्न होता है, परंतु उसकी महिमा का पूरा वर्णन करना बहुत कठिन है।



    जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु ॥
    अहरणि मति वेदु हथीआरु ॥
    भउ खला अगनि तप ताउ ॥
    भांडा भाउ अम्रितु तितु ढालि ॥
    घड़ीऐ सबदु सची टकसाल ॥
    जिन कउ नदरि करमु तिन कार ॥
    नानक नदरी नदरि निहाल ॥३८॥
    संयम (धैर्य) को पहाड़ (आधार) बनाओ और सहनशीलता को सुनार (सोने का कारीगर) मानो। अर्थात्, जीवन में संयम और धैर्य बहुत ज़रूरी हैं, जैसे सोने को गहना बनाने के लिए सुनार की मेहनत जरूरी होती है। बुद्धि (समझ) को धातु पिघलाने की जगह (अहरण) बनाओ और वेद (ज्ञान) को औजार मानो। हमें अपनी समझ को मजबूत बनाना चाहिए और सही ज्ञान को औजार की तरह उपयोग करना चाहिए।

    डर (भय) को धौंकनी बनाओ और तप (धैर्य और कड़ी मेहनत) को आग मानो। सही मार्ग पर चलने के लिए भय और अनुशासन की आवश्यकता होती है, जो सोने को परखने वाली आग की तरह काम करता है।

    प्रेम (भक्ति) को पात्र बनाओ और उसमें अमृत (परम सत्य, ज्ञान) डालो। जीवन में प्रेम और भक्ति का पात्र ही सच्चा आनंद और अमृत रस धारण करने योग्य होता है।

    सच्चे शब्दों (नाम-सुमिरन) को टकसाल (असली सिक्का ढालने की जगह) बनाओ। सच्चे और पवित्र शब्द ही आत्मा को मजबूत और निर्मल बनाते हैं। जिन पर गुरु की कृपा और सच्चा कर्म होता है, वही इस मार्ग पर चल पाते हैं।
    सही मार्ग पर चलने के लिए भगवान की कृपा और अच्छे कर्म आवश्यक हैं। जिन पर परमात्मा की विशेष कृपा होती है, वे आनंदित हो जाते हैं। भगवान की कृपा ही सच्ची खुशी और मुक्ति का मार्ग है।

    Note – 

    सिख धर्म के अनुसार, आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा को पाँच प्रमुख चरणों या “खंडों” में विभाजित किया गया है। इन्हें पंच खंड (पाँच खंड) कहा जाता है। यह विवरण जपुजी साहिब की 34वीं से 38वीं पौड़ियों में गुरु नानक देव जी द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

    पाँच खंड इस प्रकार हैं:

    1. धरम खंड (न्याय और कर्तव्य का क्षेत्र)
    2. ज्ञान खंड (ज्ञान का क्षेत्र)
    3. सरम खंड (तपस्या और प्रयास का क्षेत्र)
    4. करम खंड (कृपा और शक्ति का क्षेत्र)
    5. सच खंड (सत्य और मुक्ति का क्षेत्र)

    आत्मा ईश्वर तक पहुँचने के लिए इन चरणों से होकर गुजरती है। हर खंड आत्मा की उन्नति के एक विशेष स्तर को दर्शाता है।

    1. धरम खंड (न्याय और कर्तव्य का क्षेत्र) – धरम खंड वह पहला स्तर है जहाँ आत्मा अपने कर्मों के अनुसार न्याय प्राप्त करती है। यह वह स्थान है जहाँ हर आत्मा के जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों का मूल्यांकन किया जाता है।

    इस खंड में न्याय की प्रधानता होती है। यहाँ यह निर्धारित किया जाता है कि आत्मा अगले स्तर पर जाने योग्य है या नहीं। इस स्तर पर व्यक्ति को यह समझना आवश्यक होता है कि धर्म (कर्तव्य) का पालन करना क्यों आवश्यक है। नैतिकता, सेवा, और परोपकार जैसे सिद्धांत इस खंड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ब्रह्मांड में अनगिनत जीव, तत्व, देवता और ऋषि-मुनि मौजूद हैं, लेकिन सत्य की राह पर चलना ही सबसे बड़ा धर्म है।

    2. ज्ञान खंड (ज्ञान का क्षेत्र) – ज्ञान खंड वह अवस्था है जहाँ आत्मा को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। जब व्यक्ति धर्म (कर्तव्य) को समझ लेता है, तब वह ज्ञान की खोज करता है। यह ज्ञान व्यक्ति को सत्य और सृष्टि की वास्तविकता का बोध कराता है। यहाँ आत्मा को यह एहसास होता है कि सृष्टि कितनी विस्तृत और जटिल है। इसमें आत्मा को ईश्वर और उसके बनाए नियमों का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। यहाँ संगीत (नाद), आनंद और दिव्यता का अनुभव होता है।
    इस खंड में व्यक्ति सच्चे ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) को प्राप्त करता है।

    3. सरम खंड (श्रम यानी मेहनत, तपस्या और प्रयास का क्षेत्र) – सरम खंड वह स्थान है जहाँ आत्मा अपने आध्यात्मिक और नैतिक सुधार के लिए प्रयास करती है। इस खंड में आत्मा को ईश्वर की ओर जाने के लिए कठिन साधना और तपस्या करनी होती है। इस अवस्था में व्यक्ति को अपनी बुराइयों पर नियंत्रण पाना होता है। आत्मा को ईश्वर तक पहुँचने के लिए पूर्ण समर्पण और परिश्रम करना पड़ता है। यहाँ आत्मा का रूप और विचार शुद्ध होने लगते हैं।
    इस स्तर पर आत्मा को बाहरी दुनिया से हटकर अपने आंतरिक सुधार पर ध्यान देना होता है।

    4. करम खंड (कृपा और शक्ति का क्षेत्र) – करम खंड वह स्थान है जहाँ आत्मा को ईश्वर की कृपा और दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। यह वह चरण है जहाँ आत्मा अपनी सांसारिक सीमाओं को पार कर लेती है और दिव्यता के करीब पहुँचती है। इस स्तर पर व्यक्ति अपनी चेतना को ऊँचा उठाता है और शक्तिशाली आत्माओं की श्रेणी में आता है। इस खंड में आत्मा को ईश्वर के करीब लाने वाली कृपा प्राप्त होती है। इस क्षेत्र में आत्मा को किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।
    यह क्षेत्र महान योद्धाओं और संतों का होता है। यहाँ तक पहुँचने वाली आत्माएँ संसार में धर्म की स्थापना करती हैं और सत्य के मार्ग पर अडिग रहती हैं।

    5. सच खंड (सत्य और मुक्ति का क्षेत्र) – सच खंड वह अंतिम और सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ आत्मा ईश्वर में विलीन हो जाती है। यह आत्मा की पूर्ण मुक्ति की अवस्था है, जहाँ केवल सत्य का वास होता है। इस अवस्था में आत्मा परमात्मा के साथ एक हो जाती है। यहाँ कोई भय, मोह, द्वेष या भ्रम नहीं रहता। यह सच्ची शांति और आनंद की अवस्था है। इस खंड में केवल सत्य का शासन होता है और वहाँ सभी आत्माएँ परम आनंद में रहती हैं। यहाँ ईश्वर अपने सृष्टि को देखता और नियंत्रित करता है।

     



    सलोकु ॥
    पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
    दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥
    चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥
    करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥
    जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥
    नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि ॥१॥
    हवा (पवन) को गुरु कहा गया है, पानी को पिता और धरती को माता बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि ये सभी चीजें जीवन के लिए बहुत जरूरी हैं, जैसे माता-पिता हमारे पालन-पोषण के लिए जरूरी होते हैं। दिन और रात को दाई (देखभाल करने वाला) कहा गया है, जो संसार में हर किसी की देखभाल करते हैं। ये समय का चक्र है, जिसमें सारा संसार खेल की तरह चलता है। अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब धर्म (न्याय) के सामने होता है। इसका मतलब यह है कि हर व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा रखा जाता है। इंसान अपने कर्मों के अनुसार भगवान के करीब या दूर होता है। अगर कोई अच्छे कर्म करता है, तो वह भगवान के करीब जाता है, और अगर बुरे कर्म करता है, तो वह दूर चला जाता है।जिन्होंने सच्चे नाम (भगवान के नाम) का ध्यान किया और मेहनत से जीवन जिया, वे सफल हुए। ऐसे लोग जिनका जीवन भगवान के नाम में लीन होता है, उनका मुख उज्जवल (सम्मानित) होता है और उनके साथ कई और लोग भी मोक्ष (छुटकारा) पाते हैं।