अंग 283

अंग
283
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਪੁਰਬ ਲਿਖੇ ਕਾ ਲਿਖਿਆ ਪਾਈਐ ॥
ਦੂਖ ਸੂਖ ਪ੍ਰਭ ਦੇਵਨਹਾਰੁ ॥
ਅਵਰ ਤਿਆਗਿ ਤੂ ਤਿਸਹਿ ਚਿਤਾਰੁ ॥
ਜੋ ਕਛੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਮਾਨੁ ॥
ਭੂਲਾ ਕਾਹੇ ਫਿਰਹਿ ਅਜਾਨ ॥
ਕਉਨ ਬਸਤੁ ਆਈ ਤੇਰੈ ਸੰਗ ॥
ਲਪਟਿ ਰਹਿਓ ਰਸਿ ਲੋਭੀ ਪਤੰਗ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਪਿ ਹਿਰਦੇ ਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਪਤਿ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਜਾਹਿ ॥੪॥
पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
दूख सूख प्रभ देवनहारु ॥
अवर तिआगि तू तिसहि चितारु ॥
जो कछु करै सोई सुखु मानु ॥
भूला काहे फिरहि अजान ॥
कउन बसतु आई तेरै संग ॥
लपटि रहिओ रसि लोभी पतंग ॥
राम नाम जपि हिरदे माहि ॥
नानक पति सेती घरि जाहि ॥४॥

हिन्दी अर्थ: पूर्व बीजे का फल ही खाना पड़ता है। दुख-सुख देने वाला प्रभू खुद ही है। (इसलिए) और (आसरे) छोड़ के तू उसी को याद कर। जो कुछ प्रभू करता है उसी को सुख समझ। हे अंजान ! क्यूँ भूला फिरता है? (बता) कौन सी चीज तेरे साथ आई थी। हे लोभी पतंगे ! तू (माया के) स्वाद में मस्त हो रहा है। हे नानक ! हृदय में प्रभू का नाम जप। (इस तरह) बा-इज्जत (परलोक वाले) घर में जाएगा। 4।
ਜਿਸੁ ਵਖਰ ਕਉ ਲੈਨਿ ਤੂ ਆਇਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਘਰਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਲੇਹੁ ਮਨ ਮੋਲਿ ॥ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੇ ਮਹਿ ਤੋਲਿ ॥
ਲਾਦਿ ਖੇਪ ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਚਾਲੁ ॥
ਅਵਰ ਤਿਆਗਿ ਬਿਖਿਆ ਜੰਜਾਲ ॥
ਧੰਨਿ ਧੰਨਿ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਮੁਖ ਊਜਲ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸੋਇ ॥
ਇਹੁ ਵਾਪਾਰੁ ਵਿਰਲਾ ਵਾਪਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ॥੫॥
जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥
राम नामु संतन घरि पाइआ ॥
तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ॥ राम नामु हिरदे महि तोलि ॥
लादि खेप संतह संगि चालु ॥
अवर तिआगि बिखिआ जंजाल ॥
धंनि धंनि कहै सभु कोइ ॥
मुख ऊजल हरि दरगह सोइ ॥
इहु वापारु विरला वापारै ॥
नानक ता कै सद बलिहारै ॥५॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जो सौदा खरीदने के लिए तू (जगत में) आया है; वह राम नाम (-रूपी सौदा) संतों के घर में मिलता है। (इसलिए) अहंकार छोड़ दे। और मन के बदले (ये सौदा) खरीद ले। और प्रभू का नाम हृदय में परख। संतों के साथ चल और राम नाम का ये सौदा लाद ले। माया के अन्य धंधे छोड़ दे। (अगर ये उद्यम करेगा तो) हरेक जीव तुझे शाबाश देगा। और प्रभू की दरगाह में भी तेरा मुँह उज्जवल होगा। (पर) ये व्यापार कोई विरला बंदा ही करता है। हे नानक ! ऐसे (व्यापारी) पर से सदा सदके जाएं। 5।
ਚਰਨ ਸਾਧ ਕੇ ਧੋਇ ਧੋਇ ਪੀਉ ॥
ਅਰਪਿ ਸਾਧ ਕਉ ਅਪਨਾ ਜੀਉ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਧੂਰਿ ਕਰਹੁ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਸਾਧ ਊਪਰਿ ਜਾਈਐ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥
ਸਾਧ ਸੇਵਾ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਅਨਿਕ ਬਿਘਨ ਤੇ ਸਾਧੂ ਰਾਖੈ ॥
ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਚਾਖੈ ॥
ਓਟ ਗਹੀ ਸੰਤਹ ਦਰਿ ਆਇਆ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਪਾਇਆ ॥੬॥
चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥
अरपि साध कउ अपना जीउ ॥
साध की धूरि करहु इसनानु ॥
साध ऊपरि जाईऐ कुरबानु ॥
साध सेवा वडभागी पाईऐ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
अनिक बिघन ते साधू राखै ॥
हरि गुन गाइ अंम्रित रसु चाखै ॥
ओट गही संतह दरि आइआ ॥
सरब सूख नानक तिह पाइआ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) साधु जनों के पैर धो-धो के (नाम जल) पी। साधु जनों पर से अपनी जिंद भी वार दे। गुरमुख मनुष्य के पैरों की ख़ाक में स्नान कर। गुरमुख से सदके हो। संत की सेवा बड़े भाग्यों से मिलती है। संत की संगत में ही प्रभू की सिफत सालाह की जा सकती है। संत अनेकों मुश्किलों से (जो आत्मिक जीवन के राह में आती हैं) बचा लेता है। संत प्रभू के गुण गा के नाम-अमृत का स्वाद लेता है। (जिस मनुष्य ने) संतों का आसरा लिया है जो संतों के दर पर आ गिरा है। उसने। हे नानक ! सारे सुख पा लिए हैं। 6।
ਮਿਰਤਕ ਕਉ ਜੀਵਾਲਨਹਾਰ ॥
ਭੂਖੇ ਕਉ ਦੇਵਤ ਅਧਾਰ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਜਾ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟੀ ਮਾਹਿ ॥
ਪੁਰਬ ਲਿਖੇ ਕਾ ਲਹਣਾ ਪਾਹਿ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਕਾ ਓਹੁ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਸਰ ਹੋਆ ਨ ਹੋਗੁ ॥
ਜਪਿ ਜਨ ਸਦਾ ਸਦਾ ਦਿਨੁ ਰੈਣੀ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਨਿਰਮਲ ਇਹ ਕਰਣੀ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸ ਕਉ ਨਾਮੁ ਦੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਜਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਥੀਆ ॥੭॥
मिरतक कउ जीवालनहार ॥
भूखे कउ देवत अधार ॥
सरब निधान जा की द्रिसटी माहि ॥
पुरब लिखे का लहणा पाहि ॥
सभु किछु तिस का ओहु करनै जोगु ॥
तिसु बिनु दूसर होआ न होगु ॥
जपि जन सदा सदा दिनु रैणी ॥
सभ ते ऊच निरमल इह करणी ॥
करि किरपा जिस कउ नामु दीआ ॥
नानक सो जनु निरमलु थीआ ॥७॥

हिन्दी अर्थ: (प्रभू) मरे हुए को जिंदा करने के काबिल है। भूखे को भी आसरा देता है। सारे खजाने उस मालिक की नजर में हैं। (पर जीव) अपने पहले किये कर्मों के फल भोगते हैं। सब कुछ उस प्रभू का ही है और वही सब कुछ करने के स्मर्थ है; उससे बिना ना कोई दूसरा है ना ही होगा। हे जन ! सदा ही दिन रात प्रभू को याद कर। और सभी कर्मों से यही कर्म ऊँचा और स्वच्छ है। मेहर करके जिस मनुष्य को नाम बख्शता है। हे नानक ! वह मनुष्य पवित्र हो जाता है। 7।
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਗੁਰ ਕੀ ਪਰਤੀਤਿ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਆਵੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਚੀਤਿ ॥
ਭਗਤੁ ਭਗਤੁ ਸੁਨੀਐ ਤਿਹੁ ਲੋਇ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਏਕੋ ਹੋਇ ॥
ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਸਚੁ ਤਾ ਕੀ ਰਹਤ ॥
ਸਚੁ ਹਿਰਦੈ ਸਤਿ ਮੁਖਿ ਕਹਤ ॥
ਸਾਚੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਾਚਾ ਆਕਾਰੁ ॥
ਸਚੁ ਵਰਤੈ ਸਾਚਾ ਪਾਸਾਰੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਜਿਨਿ ਸਚੁ ਕਰਿ ਜਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਜਨੁ ਸਚਿ ਸਮਾਤਾ ॥੮॥੧੫॥
जा कै मनि गुर की परतीति ॥
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
भगतु भगतु सुनीऐ तिहु लोइ ॥
जा कै हिरदै एको होइ ॥
सचु करणी सचु ता की रहत ॥
सचु हिरदै सति मुखि कहत ॥
साची द्रिसटि साचा आकारु ॥
सचु वरतै साचा पासारु ॥
पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता ॥
नानक सो जनु सचि समाता ॥८॥१५॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन में सतिगुरू की श्रद्धा बन गई है उसके चिक्त में प्रभू टिक जाता है। वह मनुष्य सारे जगत में भगत-भगत सुना जाता है। जिसके हृदय में एक प्रभू बसता है। उसकी असल जिंदगी और जिंदगी के असूल एक समान हैं। सच्चा प्रभू उसके दिल में है। और प्रभू का नाम ही वह मुंह से उच्चारता है। उस मनुष्य की नजर सच्चे प्रभू के रंग में रंगी हुई है। (तभी तो) सारा दिखाई देता जगत (उसको) प्रभू का रूप दिखता है। प्रभू ही (हर जगह) मौजूद (दिखता है। और) प्रभू का ही (सारा) पसारा दिखता है। जिस मनुष्य ने अकाल-पुरख को सदा स्थिर रहने वाला समझा है। हे नानक ! वह मनुष्य सदा उस स्थिर रहने वाले में लीन हो जाता है। 8। 15।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖ ਨ ਰੰਗੁ ਕਿਛੁ ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਤੇ ਪ੍ਰਭ ਭਿੰਨ ॥
ਤਿਸਹਿ ਬੁਝਾਏ ਨਾਨਕਾ ਜਿਸੁ ਹੋਵੈ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ॥੧॥
सलोकु ॥
रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥
तिसहि बुझाए नानका जिसु होवै सुप्रसंन ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ प्रभू का ना कोई रूप है। ना चिन्ह-चक्र और ना कोई रंग। प्रभू माया के तीन गुणों से बेदाग है। हे नानक ! प्रभू अपना आप उस मनुष्य को समझाता है जिस पर खुद मेहरबान होता है। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨ ਮਹਿ ਰਾਖੁ ॥
ਮਾਨੁਖ ਕੀ ਤੂ ਪ੍ਰੀਤਿ ਤਿਆਗੁ ॥
ਤਿਸ ਤੇ ਪਰੈ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਕੋਇ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਏਕੋ ਸੋਇ ॥
ਆਪੇ ਬੀਨਾ ਆਪੇ ਦਾਨਾ ॥
ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੁ ਗਹੀਰੁ ਸੁਜਾਨਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਾਨ ਦਇਆਲ ਬਖਸੰਦ ॥
ਸਾਧ ਤੇਰੇ ਕੀ ਚਰਨੀ ਪਾਉ ॥
असटपदी ॥
अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥
मानुख की तू प्रीति तिआगु ॥
तिस ते परै नाही किछु कोइ ॥
सरब निरंतरि एको सोइ ॥
आपे बीना आपे दाना ॥
गहिर गंभीरु गहीरु सुजाना ॥
पारब्रहम परमेसुर गोबिंद ॥
क्रिपा निधान दइआल बखसंद ॥
साध तेरे की चरनी पाउ ॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे भाई !) अपने मन में अकाल पुरख को परो के रख और मनुष्य का प्यार (मोह) त्याग दे। उससे बाहर और कोई जीव नहीं। कोई चीज नहीं। सब जीवों के अंदर एक अकाल-पुरख ही व्यापक है। वही खुद ही (जीवों के दिल की) पहचानने वाला और जानने वाला है। प्रभू बड़ा गंभीर है और गहरा है। समझदार है। हे पारब्रहम प्रभू ! सबसे बड़े मालिक ! और जीवों के पालक ! दया के खजाने ! दया के घर ! और बख्शनहार ! मैं तेरे साधुओं की चरणों में पड़ूँ। 1।

संदर्भ: यह अंग 283 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 283” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 284 →, पीछे का: ← अंग 282

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।