अंग
296
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਿਆਨੁ ਸ੍ਰੇਸਟ ਊਤਮ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਕਮਲ ਪ੍ਰਗਾਸ ॥
ਸਭ ਕੈ ਮਧਿ ਸਗਲ ਤੇ ਉਦਾਸ ॥
ਸੁੰਦਰੁ ਚਤੁਰੁ ਤਤ ਕਾ ਬੇਤਾ ॥
ਸਮਦਰਸੀ ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਇਹ ਫਲ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੈ ਮੁਖਿ ਭਨੇ ॥ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਬਚਨ ਮਨਿ ਸੁਨੇ ॥੬॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਕਮਲ ਪ੍ਰਗਾਸ ॥
ਸਭ ਕੈ ਮਧਿ ਸਗਲ ਤੇ ਉਦਾਸ ॥
ਸੁੰਦਰੁ ਚਤੁਰੁ ਤਤ ਕਾ ਬੇਤਾ ॥
ਸਮਦਰਸੀ ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟੇਤਾ ॥
ਇਹ ਫਲ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੈ ਮੁਖਿ ਭਨੇ ॥ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਬਚਨ ਮਨਿ ਸੁਨੇ ॥੬॥
गिआनु स्रेसट ऊतम इसनानु ॥
चारि पदारथ कमल प्रगास ॥
सभ कै मधि सगल ते उदास ॥
सुंदरु चतुरु तत का बेता ॥
समदरसी एक द्रिसटेता ॥
इह फल तिसु जन कै मुखि भने ॥ गुर नानक नाम बचन मनि सुने ॥६॥
चारि पदारथ कमल प्रगास ॥
सभ कै मधि सगल ते उदास ॥
सुंदरु चतुरु तत का बेता ॥
समदरसी एक द्रिसटेता ॥
इह फल तिसु जन कै मुखि भने ॥ गुर नानक नाम बचन मनि सुने ॥६॥
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ ज्ञान, बढ़िया से बढ़िया (भाव – तीर्थों का) स्नान; (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चारों पदार्थ,हृदय कमल का खिलना; सभी में रहते हुए भी सभी से उपराम रहना; सुंदर। समझदार (जगत के) मूल तत्व को जानने वाला। सब को ऐक जैसा जानना और सब को एक नजर से देखना; ये सारे फल; हे नानक ! उस मनुष्य के अंदर आ बसते हैं; जो गुरू के शबद और प्रभू का नाम मुँह से उचारता है और मन लगा के सुनता है। 6।
ਇਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ਜਪੈ ਮਨਿ ਕੋਇ ॥
ਸਭ ਜੁਗ ਮਹਿ ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਮ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਬਖਾਣੀ ॥
ਸਗਲ ਮਤਾਂਤ ਕੇਵਲ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਭਗਤ ਕੈ ਮਨਿ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਕੋਟਿ ਅਪ੍ਰਾਧ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਜਮ ਤੇ ਛੁਟੈ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਕਰਮ ਪ੍ਰਭਿ ਪਾਏ ॥
ਸਾਧ ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਤੇ ਆਏ ॥੭॥
ਸਭ ਜੁਗ ਮਹਿ ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਮ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਬਖਾਣੀ ॥
ਸਗਲ ਮਤਾਂਤ ਕੇਵਲ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਭਗਤ ਕੈ ਮਨਿ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਕੋਟਿ ਅਪ੍ਰਾਧ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਜਮ ਤੇ ਛੁਟੈ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਕਰਮ ਪ੍ਰਭਿ ਪਾਏ ॥
ਸਾਧ ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਤੇ ਆਏ ॥੭॥
इहु निधानु जपै मनि कोइ ॥
सभ जुग महि ता की गति होइ ॥
गुण गोबिंद नाम धुनि बाणी ॥
सिम्रिति सासत्र बेद बखाणी ॥
सगल मतांत केवल हरि नाम ॥
गोबिंद भगत कै मनि बिस्राम ॥
कोटि अप्राध साधसंगि मिटै ॥
संत क्रिपा ते जम ते छुटै ॥
जा कै मसतकि करम प्रभि पाए ॥
साध सरणि नानक ते आए ॥७॥
सभ जुग महि ता की गति होइ ॥
गुण गोबिंद नाम धुनि बाणी ॥
सिम्रिति सासत्र बेद बखाणी ॥
सगल मतांत केवल हरि नाम ॥
गोबिंद भगत कै मनि बिस्राम ॥
कोटि अप्राध साधसंगि मिटै ॥
संत क्रिपा ते जम ते छुटै ॥
जा कै मसतकि करम प्रभि पाए ॥
साध सरणि नानक ते आए ॥७॥
हिन्दी अर्थ: जो भी मनुष्य इस नाम को (जो गुणों का) खजाना है। जपता है। सारी उम्र उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बनी रहती है। उस मनुष्य के (साधारण) वचन भी गोबिंद के गुण और नाम की रौंअ के ही होते हैं। स्मृतियों, शास्त्रों और वेदों ने भी यही बात कही है। सारे मतों का निचोड़ प्रभू का नाम ही है। इस नाम का निवास प्रभू के भगत के मन में होता है। (जो मनुष्य नाम जपता है उस के) करोड़ों पाप सत्संग में रह के मिट जाते हैं। गुरू की कृपा से वह मनुष्य जमों से बच जाता है। (पर) हे नानक ! जिन के माथे पर प्रभू ने (नाम की) बख्शिश के लेख लिख धरे हैं। वह मनुष्य गुरू की शरण आते हैं। 7।
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਸੁਨੈ ਲਾਇ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਆਵੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਚੀਤਿ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਤਾ ਕਾ ਦੂਖੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਤਤਕਾਲ ਉਧਾਰੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਸੋਭਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਤਾ ਕੀ ਬਾਨੀ ॥
ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਦੂਖ ਰੋਗ ਬਿਨਸੇ ਭੈ ਭਰਮ ॥
ਸਾਧ ਨਾਮ ਨਿਰਮਲ ਤਾ ਕੇ ਕਰਮ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਤਾ ਕੀ ਸੋਭਾ ਬਨੀ ॥
ਨਾਨਕ ਇਹ ਗੁਣਿ ਨਾਮੁ ਸੁਖਮਨੀ ॥੮॥੨੪॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਆਵੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਚੀਤਿ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਤਾ ਕਾ ਦੂਖੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਤਤਕਾਲ ਉਧਾਰੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਸੋਭਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਤਾ ਕੀ ਬਾਨੀ ॥
ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਦੂਖ ਰੋਗ ਬਿਨਸੇ ਭੈ ਭਰਮ ॥
ਸਾਧ ਨਾਮ ਨਿਰਮਲ ਤਾ ਕੇ ਕਰਮ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਤਾ ਕੀ ਸੋਭਾ ਬਨੀ ॥
ਨਾਨਕ ਇਹ ਗੁਣਿ ਨਾਮੁ ਸੁਖਮਨੀ ॥੮॥੨੪॥
जिसु मनि बसै सुनै लाइ प्रीति ॥
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
जनम मरन ता का दूखु निवारै ॥
दुलभ देह ततकाल उधारै ॥
निरमल सोभा अंम्रित ता की बानी ॥
एकु नामु मन माहि समानी ॥
दूख रोग बिनसे भै भरम ॥
साध नाम निरमल ता के करम ॥
सभ ते ऊच ता की सोभा बनी ॥
नानक इह गुणि नामु सुखमनी ॥८॥२४॥
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
जनम मरन ता का दूखु निवारै ॥
दुलभ देह ततकाल उधारै ॥
निरमल सोभा अंम्रित ता की बानी ॥
एकु नामु मन माहि समानी ॥
दूख रोग बिनसे भै भरम ॥
साध नाम निरमल ता के करम ॥
सभ ते ऊच ता की सोभा बनी ॥
नानक इह गुणि नामु सुखमनी ॥८॥२४॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन में (नाम) बसता है जो प्रीत लगा के (नाम) सुनता है। उस को प्रभू याद आता है; उस मनुष्य के पैदा होने मरने के कष्ट काटे जाते हैं। वह इस दुर्लभ मानव-शरीर को उसी वक्त (विकारों से) बचा लेता है। उसकी बेदाग शोभा और उसकी बाणी (नाम-) अमृत से भरपूर होती है। (क्योंकि) उसके मन में प्रभू का नाम ही बसा रहता है। दुख, रोग, डर और वहम उसके नाश हो जाते हैं। उसका नाम ‘साधु’ पड़ जाता है और उसके काम (विकारों की) मैल से साफ होते हैं। सबसे ऊँची शोभा उसको मिलती है। हे नानक ! इस गुण के कारण (प्रभू का) नाम सुखों की मणी है (भाव- सर्वोक्तम सुख है)। 8। 24।
ਥਿਤੀ ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਲੋਕੁ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਪੂਰਿਆ ਸੁਆਮੀ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥
ਅਨਿਕ ਭਾਂਤਿ ਹੋਇ ਪਸਰਿਆ ਨਾਨਕ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥੧॥
ਸਲੋਕੁ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਪੂਰਿਆ ਸੁਆਮੀ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥
ਅਨਿਕ ਭਾਂਤਿ ਹੋਇ ਪਸਰਿਆ ਨਾਨਕ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥੧॥
थिती गउड़ी महला ५ ॥
सलोकु ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ सुआमी सिरजनहारु ॥
अनिक भांति होइ पसरिआ नानक एकंकारु ॥१॥
सलोकु ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ सुआमी सिरजनहारु ॥
अनिक भांति होइ पसरिआ नानक एकंकारु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: थिती गउड़ी महला ५ ॥ सलोकु- ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे नानक ! सारे जगत को पैदा करने वाला मालिक प्रभू जल में। धरती में और आकाश में भरपूर है। वह एक अकाल-पुरख अनेकों ही तरीकों से (जगत में हर जगह) बिखरा हुआ है।
ਪਉੜੀ ॥
ਏਕਮ ਏਕੰਕਾਰੁ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਉ ਬੰਦਨਾ ਧਿਆਇ ॥
ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਪਾਲ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨਿ ਪਰਉ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਆਸ ਕਲਿਆਣ ਸੁਖ ਜਾ ਤੇ ਸਭੁ ਕਛੁ ਹੋਇ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਦਹ ਦਿਸਿ ਭ੍ਰਮਿਓ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸੁਨੇ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਕਰਉ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਭੈ ਹਰਨ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਦਾਤਾ ਭੁਗਤਾ ਦੇਨਹਾਰੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜੋ ਚਾਹਹਿ ਸੋਈ ਮਿਲੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੧॥
ਗੋਬਿੰਦ ਜਸੁ ਗਾਈਐ ਹਰਿ ਨੀਤ ॥
ਮਿਲਿ ਭਜੀਐ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮੇਰੇ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕਮ ਏਕੰਕਾਰੁ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰਉ ਬੰਦਨਾ ਧਿਆਇ ॥
ਗੁਣ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਪਾਲ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨਿ ਪਰਉ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਆਸ ਕਲਿਆਣ ਸੁਖ ਜਾ ਤੇ ਸਭੁ ਕਛੁ ਹੋਇ ॥
ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਦਹ ਦਿਸਿ ਭ੍ਰਮਿਓ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸੁਨੇ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਕਰਉ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਭੈ ਹਰਨ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਦਾਤਾ ਭੁਗਤਾ ਦੇਨਹਾਰੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜੋ ਚਾਹਹਿ ਸੋਈ ਮਿਲੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੧॥
ਗੋਬਿੰਦ ਜਸੁ ਗਾਈਐ ਹਰਿ ਨੀਤ ॥
ਮਿਲਿ ਭਜੀਐ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮੇਰੇ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
पउड़ी ॥
एकम एकंकारु प्रभु करउ बंदना धिआइ ॥
गुण गोबिंद गुपाल प्रभ सरनि परउ हरि राइ ॥
ता की आस कलिआण सुख जा ते सभु कछु होइ ॥
चारि कुंट दह दिसि भ्रमिओ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
बेद पुरान सिम्रिति सुने बहु बिधि करउ बीचारु ॥
पतित उधारन भै हरन सुख सागर निरंकार ॥
दाता भुगता देनहारु तिसु बिनु अवरु न जाइ ॥
जो चाहहि सोई मिलै नानक हरि गुन गाइ ॥१॥
गोबिंद जसु गाईऐ हरि नीत ॥
मिलि भजीऐ साधसंगि मेरे मीत ॥१॥ रहाउ ॥
एकम एकंकारु प्रभु करउ बंदना धिआइ ॥
गुण गोबिंद गुपाल प्रभ सरनि परउ हरि राइ ॥
ता की आस कलिआण सुख जा ते सभु कछु होइ ॥
चारि कुंट दह दिसि भ्रमिओ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
बेद पुरान सिम्रिति सुने बहु बिधि करउ बीचारु ॥
पतित उधारन भै हरन सुख सागर निरंकार ॥
दाता भुगता देनहारु तिसु बिनु अवरु न जाइ ॥
जो चाहहि सोई मिलै नानक हरि गुन गाइ ॥१॥
गोबिंद जसु गाईऐ हरि नीत ॥
मिलि भजीऐ साधसंगि मेरे मीत ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) मैं एक अकाल-पुरख प्रभू को सिमर के (उसके आगे ही) नमस्कार करता हूँ। मैं गोबिंद, गोपाल, प्रभू के गुण (गाता हूँ और उस) प्रभू पातशाह की शरण पड़ता हूँ। (हे भाई !) जिस मालिक प्रभू (के हुकम) से ही (जगत में) सब कुछ हो रहा है। उसकी आस रखने से सारे सुख मिलते हैं। मैंने चारों कुंटों और दसों दिशाओं में घूम के देख लिया है उस (मालिक प्रभू) के बिना और कोई (रक्षक) नहीं। (हे भाई !) वेद। पुराण। स्मृतियां (आदि धर्म-पुस्तकें) सुन के मैं (और भी) अनेकों ढंग-तरीकों से विचार करता हूँ (और इस नतीजे पर पहुँचता हूँ कि) आकार-रहित परमात्मा ही (विकारों में) गिरे हुए जीवों को (विकारों से) बचाने वाला है (जीवों के) सारे डर दूर करने वाला है और सुखों का समुंद्र है। वह परमात्मा ही सब दातें देने वाला है। (सब जीवों में व्यापक हो के सारे पदार्थ) भोगने वाला है। सब कुछ देने की स्मर्था वाला है। उसके बिना (जीवों के लिए) और कोई जगह-आसरा नहीं। 1। हे नानक ! (सदा) परमात्मा के गुण गाता रह। (उससे) जो कुछ तू चाहेगा वही मिल जाता है। हे मेरे मित्र ! सदा ही गोबिंद प्रभू की सिफत-सालाह गाते रहना चाहिए। साधसंगति में मिल के (उसका) भजन सिमरन करना चाहिए। रहाउ।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਕਰਉ ਬੰਦਨਾ ਅਨਿਕ ਵਾਰ ਸਰਨਿ ਪਰਉ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਭ੍ਰਮੁ ਕਟੀਐ ਨਾਨਕ ਸਾਧਸੰਗਿ ਦੁਤੀਆ ਭਾਉ ਮਿਟਾਇ ॥੨॥
ਕਰਉ ਬੰਦਨਾ ਅਨਿਕ ਵਾਰ ਸਰਨਿ ਪਰਉ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਭ੍ਰਮੁ ਕਟੀਐ ਨਾਨਕ ਸਾਧਸੰਗਿ ਦੁਤੀਆ ਭਾਉ ਮਿਟਾਇ ॥੨॥
सलोकु ॥
करउ बंदना अनिक वार सरनि परउ हरि राइ ॥
भ्रमु कटीऐ नानक साधसंगि दुतीआ भाउ मिटाइ ॥२॥
करउ बंदना अनिक वार सरनि परउ हरि राइ ॥
भ्रमु कटीऐ नानक साधसंगि दुतीआ भाउ मिटाइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु- (हे भाई !) मैं प्रभू पातशाह की शरण पड़ता हूँ और (उसके दर पर) अनेकों बार नमस्कार करता हूँ। हे नानक ! साध-संगति में रह के (प्रभू के बिना) और-और मोह-प्यार दूर करने से मन की भटकना दूर हो जाती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਦੁਤੀਆ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਰਿ ਕਰਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਕਰਿ ਨੀਤ ॥
ਰਾਮ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਸੈ ਤਜਿ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੀਤ ॥
ਮਰਣੁ ਮਿਟੈ ਜੀਵਨੁ ਮਿਲੈ ਬਿਨਸਹਿ ਸਗਲ ਕਲੇਸ ॥
ਆਪੁ ਤਜਹੁ ਗੋਬਿੰਦ ਭਜਹੁ ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਪਰਵੇਸ ॥
ਦੁਤੀਆ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਰਿ ਕਰਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਕਰਿ ਨੀਤ ॥
ਰਾਮ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਸੈ ਤਜਿ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੀਤ ॥
ਮਰਣੁ ਮਿਟੈ ਜੀਵਨੁ ਮਿਲੈ ਬਿਨਸਹਿ ਸਗਲ ਕਲੇਸ ॥
ਆਪੁ ਤਜਹੁ ਗੋਬਿੰਦ ਭਜਹੁ ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਪਰਵੇਸ ॥
पउड़ी ॥
दुतीआ दुरमति दूरि करि गुर सेवा करि नीत ॥
राम रतनु मनि तनि बसै तजि कामु क्रोधु लोभु मीत ॥
मरणु मिटै जीवनु मिलै बिनसहि सगल कलेस ॥
आपु तजहु गोबिंद भजहु भाउ भगति परवेस ॥
दुतीआ दुरमति दूरि करि गुर सेवा करि नीत ॥
राम रतनु मनि तनि बसै तजि कामु क्रोधु लोभु मीत ॥
मरणु मिटै जीवनु मिलै बिनसहि सगल कलेस ॥
आपु तजहु गोबिंद भजहु भाउ भगति परवेस ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) सदा गुरू की बताई हुई सेवा करता रह। (और इस तरह अपने अंदर से) खोटी मति निकाल। हे मित्र ! (अपने अंदर से) काम-क्रोध-लोभ दूर कर। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसके) मन में हृदय में रतन (जैसा कीमती) प्रभू नाम आ बसता है। (जो मनुष्य ऐसा करने का प्रयत्न करता है उसको) आत्मिक जीवन मिल जाता है। उसे (स्वच्छ पवित्र) जीवन मिल जाता है। उसके सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं। (हे मित्र ! अपने मन में से) अहंकार दूर करो और परमात्मा का भजन करो। उसके अंदर प्रभू प्रेम आ बसता है। प्रभू की भक्ति आ बसती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 296 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली की Pollution-Day की शाम, AQI 400, और घर के अंदर कुछ साँस।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 296” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 297 →, पीछे का: ← अंग 295।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।