आनंद साहिब · Anand Sahib
गुरु अमरदास का आनंद-गीत। तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभालने वाले एक बुज़ुर्ग का स्वर, जो एक ही बात पर बार-बार लौटता है: सच्चा आनंद आता कहाँ से है, और हमारे भीतर बजता क्यों नहीं?
पहले एक बात
आनंद साहिब गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 917 से 922 पर बैठा है, राग रामकली में, और इसके रचयिता तीसरे गुरु अमरदास जी हैं। एक बात पहले जान लीजिए, जिससे पूरी रचना का स्वर खुल जाता है। अमरदास जी ने गुरु-गद्दी तब सँभाली जब उनकी उम्र तिहत्तर साल थी, 1552 में। यानी यह किसी जवान जोश का गीत नहीं है। यह उस इंसान का स्वर है जिसने समाज को बहुत क़रीब से, बहुत देर तक देखा है। लंगर की साझा-रसोई को मज़बूत करना, देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) बिठाना, जाति-भेद के सामने सीधा खड़ा होना, यह सब उन्हीं का काम है।
नाम ही पूरी बात कह देता है। “अनंदु”, यानी आनंद। पर अमरदास जी जिस आनंद की बात कर रहे हैं, वह दुनिया वाली ख़ुशी नहीं है, जो आती है और चली जाती है। यह वह भीतरी खिड़ाव है जो गुरु के मिलने से, नाम के मन में बसने से पैदा होता है, और फिर डगमगाता नहीं।
और एक सवाल पूरी रचना के बीचों-बीच धड़कता है, बिल्कुल वैसे जैसे जपुजी में “किव सचिआरा होईऐ” धड़कता है। यहाँ सवाल यह है: कहने को तो हर कोई कह देता है “मुझे आनंद मिल गया”, पर असली आनंद की सूझ आती कहाँ से है? चालीस पउड़ियाँ, एक तरह से, इसी एक सवाल के साथ बैठना हैं। आइए, साथ बैठते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से, धीरे। एक प्यारी बात ध्यान में रखिए: यह गीत एक गोलाई में चलता है। पहली पउड़ी में बाजे बजते हैं, “मनि वजीआ वाधाईआ”, और चालीसवीं में फिर वही बाजे बजते हैं, “वाजे अनहद तूरे”। बीच की अड़तीस पउड़ियाँ, इन दो बजते हुए छोरों के बीच का सफ़र हैं। पउड़ी 33 से 38 तक अमरदास जी सीधे शरीर से बात करते हैं, हे मेरे शरीर, हे मेरी आँखों, हे मेरे कानो, इन्हें एक झुंड की तरह पढ़िए, एक अलग ही कोमलता महसूस होगी।
आरम्भ · ੴ सतिगुर प्रसादि
रामकली महला 3 अनंदु
सतिगुर प्रसादि ॥
भाव: रचना का शीर्षक और मंगलाचरण। राग रामकली, तीसरे गुरु की वाणी, नाम है “अनंदु”। और शुरू में ही एक शर्त रख दी जाती है, “सतिगुर प्रसादि”, यह सब सच्चे गुरु की कृपा से। पूरी रचना यह शर्त बार-बार दोहराएगी।
पउड़ी 1
अनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मै पाइआ ॥
सतिगुरु त पाइआ सहज सेती मनि वजीआ वाधाईआ ॥
राग रतन परवार परीआ सबद गावण आईआ ॥
सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी वसाइआ ॥
कहै नानकु अनंदु होआ सतिगुरू मै पाइआ ॥1॥
भाव: पहली ही पउड़ी एक उमंग के साथ खुलती है, और सीधे माँ को पुकारती है। “हे माँ! मेरे भीतर आनंद हो गया है, क्योंकि मुझे गुरु मिल गया है।” और गुरु मिलने का असर देखिए, मन डोलना बंद कर देता है, एक अडोल अवस्था आ जाती है, और भीतर मानो ख़ुशी के बाजे बज उठते हैं। सुंदर राग, अपने पूरे परिवार और रागनियों समेत, प्रभु की सिफ़त गाने आ पहुँचे हैं।
पर अमरदास जी एक छोटी सी शर्त भी रख देते हैं: यह आनंद उन्हीं के भीतर फूटता है जिन्होंने “मनि जिनी वसाइआ”, उस शब्द को मन में बसाया है। आनंद कोई बाहर से मिलने वाली चीज़ नहीं, यह भीतर बसाए हुए नाम से उगता है।
पउड़ी 2
ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले ॥
हरि नालि रहु तू मंन मेरे दूख सभि विसारणा ॥
अंगीकारु ओहु करे तेरा कारज सभि सवारणा ॥
सभना गला समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे ॥
कहै नानकु मंन मेरे सदा रहु हरि नाले ॥2॥
भाव: अब अमरदास जी अपने ही मन से बात करने लगते हैं, बहुत प्यार से। “हे मेरे मन! तू सदा प्रभु के साथ जुड़ा रह।” और साथ रहने का इनाम भी बताते हैं, वह प्रभु सारे दुख भुला देने वाला है, हर वक़्त साथ देने वाला है, आपके सारे काम सँवारने में समर्थ है। तो फिर एक सीधा सवाल: जो हर बात कर सकने में समर्थ है, उस मालिक को मन से भुलाते ही क्यों हैं?
पउड़ी 3
साचे साहिबा किआ नाही घरि तेरै ॥
घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावए ॥
सदा सिफति सलाह तेरी नामु मनि वसावए ॥
नामु जिन कै मनि वसिआ वाजे सबद घनेरे ॥
कहै नानकु सचे साहिब किआ नाही घरि तेरै ॥3॥
भाव: यहाँ स्वर बदल कर सीधे प्रभु से अरज़ बन जाता है। “हे सदा क़ायम रहने वाले मालिक! आपके घर में कौनसी चीज़ नहीं है?” आपके घर में तो हरेक चीज़ मौजूद है, बस वही पाता है जिसे आप ख़ुद देते हैं। और जिसे आप देते हैं, वह आपका नाम और आपकी सिफ़त अपने मन में बसा लेता है। फिर एक बार वही तस्वीर लौटती है, जिन के मन में नाम बस गया, उनके भीतर अनगिनत साजों की मिली-जुली सुरें बज उठती हैं।
पउड़ी 4
साचा नामु मेरा आधारो ॥
साचु नामु अधारु मेरा जिनि भुखा सभि गवाईआ ॥
करि सांति सुख मनि आइ वसिआ जिनि इछा सभि पुजाईआ ॥
सदा कुरबाणु कीता गुरू विटहु जिस दीआ एहि वडिआईआ ॥
कहै नानकु सुणहु संतहु सबदि धरहु पिआरो ॥
साचा नामु मेरा आधारो ॥4॥
भाव: अब एक टेक बनती है, जो पउड़ी को दोनों ओर से बाँध देती है: “साचा नामु मेरा आधारो”, वह सच्चा नाम ही मेरी ज़िंदगी का सहारा बन गया है। उसी नाम ने भीतर के सारे लालच मिटा दिए, मन की हर इच्छा पूरी कर दी, और शांति देकर मन में आ बसा। और यह सब किसकी देन है? गुरु की। इसीलिए अमरदास जी कहते हैं, मैं अपने गुरु पर सदा क़ुरबान जाता हूँ। फिर संत-जनों की ओर मुड़ते हैं, “सुनिए, गुरु के शब्द से प्यार जोड़िए।”
पउड़ी 5
वाजे पंच सबद तितु घरि सभागै ॥
घरि सभागै सबद वाजे कला जितु घरि धारीआ ॥
पंच दूत तुधु वसि कीते कालु कंटकु मारिआ ॥
धुरि करमि पाइआ तुधु जिन कउ सि नामि हरि कै लागे ॥
कहै नानकु तह सुखु होआ तितु घरि अनहद वाजे ॥5॥
भाव: यहाँ बार-बार आ रहे “बाजे” अपनी पूरी तस्वीर पाते हैं। जिस हृदय-घर में प्रभु ने अपनी शक्ति टिका दी, वह घर भाग्यशाली हो जाता है, और उसमें पाँच क़िस्म के साजों की मिली-जुली सुरें बज उठती हैं। ऐसे घर में काम-क्रोध आदि पाँचों विकार वश में आ जाते हैं, और मौत का काँटा भी निकल जाता है। पर अमरदास जी एक सच्चाई जोड़ देते हैं, यह उन्हीं को मिलता है जिनके भाग्य में धुर से ही यह लिखा था। “अनहद वाजे”, वह एकरस अनहद ध्वनि, यहीं से शुरू होती है।
पउड़ी 6
साची लिवै बिनु देह निमाणी ॥
देह निमाणी लिवै बाझहु किआ करे वेचारीआ ॥
तुधु बाझु समरथ कोइ नाही क्रिपा करि बनवारीआ ॥
एस नउ होरु थाउ नाही सबदि लागि सवारीआ ॥
कहै नानकु लिवै बाझहु किआ करे वेचारीआ ॥6॥
भाव: अब अमरदास जी दूसरा पहलू दिखाते हैं, और बहुत नरमी से। सच्चे प्रभु की लगन के बिना यह शरीर निआसरा सा रह जाता है, बेचारा, जो भी करता है अधूरा-सा करता है। और इसे सही दिशा में लगाने के लायक़ और कोई जगह है ही नहीं। इसीलिए सीधी पुकार उठती है, “क्रिपा करि बनवारीआ”, हे जगत के मालिक, आप ही कृपा कीजिए, ताकि यह गुरु के शब्द में लग कर सँवर जाए।
पउड़ी 7
आनंदु आनंदु सभु को कहै आनंदु गुरू ते जाणिआ ॥
जाणिआ आनंदु सदा गुर ते क्रिपा करे पिआरिआ ॥
करि किरपा किलविख कटे गिआन अंजनु सारिआ ॥
अंदरहु जिन का मोहु तुटा तिन का सबदु सचै सवारिआ ॥
कहै नानकु एहु अनंदु है आनंदु गुर ते जाणिआ ॥7॥
भाव: यह पूरी रचना की धुरी वाली पउड़ी है, इसे ठहर कर पढ़िए। “आनंदु आनंदु सभु को कहै”, कहने को तो हर कोई कह देता है, मुझे आनंद मिल गया। पर अमरदास जी एक महीन फ़र्क़ रखते हैं, असल आनंद की सूझ गुरु से ही मिलती है। गुरु कृपा करके भीतर के पाप काट देता है, और विचार वाली आँखों में आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा डाल देता है। जिनके भीतर से माया का मोह टूट जाता है, उनके बोल तक प्रभु मीठे कर देता है। यही असली आनंद है, और यह गुरु के बिना समझा ही नहीं जा सकता।
पउड़ी 8
बाबा जिसु तू देहि सोई जनु पावै ॥
पावै त सो जनु देहि जिस नो होरि किआ करहि वेचारिआ ॥
इकि भरमि भूले फिरहि दह दिसि इकि नामि लागि सवारिआ ॥
गुर परसादी मनु भइआ निरमलु जिना भाणा भावए ॥
कहै नानकु जिसु देहि पिआरे सोई जनु पावए ॥8॥
भाव: यहाँ अमरदास जी एक सच्चाई के सामने सिर झुका देते हैं। “बाबा, जिसे तू देता है, वही पाता है।” बाक़ी बेचारे करें भी क्या? देखिए दोनों तरफ़, कुछ लोग भटकन में दसों दिशाओं में दौड़ते-फिरते हैं, और कुछ नाम में लग कर सँवर जाते हैं। फ़र्क़ कहाँ से आता है? जिन्हें उसकी रज़ा प्यारी लगने लगती है, गुरु की कृपा से उनका मन निर्मल हो जाता है। आनंद माँगने की चीज़ है, छीनने की नहीं।
पउड़ी 9
आवहु संत पिआरिहो अकथ की करह कहाणी ॥
करह कहाणी अकथ केरी कितु दुआरै पाईऐ ॥
तनु मनु धनु सभु सउपि गुर कउ हुकमि मंनिऐ पाईऐ ॥
हुकमु मंनिहु गुरू केरा गावहु सची बाणी ॥
कहै नानकु सुणहु संतहु कथिहु अकथ कहाणी ॥9॥
भाव: अब एक न्योता है, गर्मजोशी से भरा। “हे प्यारे संत-जनो, आइए, उस अकथ प्रभु की बातें मिल कर करें”, उसकी, जिसके गुण कहे ही नहीं जा सकते। और अगर कोई पूछे कि वह मिलता किस दरवाज़े से है, तो जवाब सीधा है, अपना तन, मन, धन सब गुरु के हवाले कर दीजिए। जब गुरु का हुकम मीठा लगने लगे, तभी वह मिलता है।
पउड़ी 10
ए मन चंचला चतुराई किनै न पाइआ ॥
चतुराई न पाइआ किनै तू सुणि मंन मेरिआ ॥
एह माइआ मोहणी जिनि एतु भरमि भुलाइआ ॥
माइआ त मोहणी तिनै कीती जिनि ठगउली पाईआ ॥
कुरबाणु कीता तिसै विटहु जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥
कहै नानकु मन चंचल चतुराई किनै न पाइआ ॥10॥
भाव: अब अमरदास जी अपने चंचल मन को सीधे टोकते हैं। “हे चंचल मन! चतुराई से किसी ने भी आनंद हासिल नहीं किया।” यह बात मन में बिठा लेने की है, भीतर से माया में फँसे रहना, और बाहर से सिर्फ़ बातों से आनंद चाहना, यह होता ही नहीं। यह माया बड़ी मोहने वाली है, इसी ने भुलावे में डाल रखा है। पर अमरदास जी का तरीक़ा देखिए, वे माया को नहीं कोसते, वे उस प्रभु पर क़ुरबान जाते हैं जिसने यह मीठा मोह बनाया। मोह तभी टूटता है जब उसके बनाने वाले से प्यार जुड़ता है।
पउड़ी 11
ए मन पिआरिआ तू सदा सचु समाले ॥
एहु कुटंबु तू जि देखदा चलै नाही तेरै नाले ॥
साथि तेरै चलै नाही तिसु नालि किउ चितु लाईऐ ॥
ऐसा कंमु मूले न कीचै जितु अंति पछोताईऐ ॥
सतिगुरू का उपदेसु सुणि तू होवै तेरै नाले ॥
कहै नानकु मन पिआरे तू सदा सचु समाले ॥11॥
भाव: “हे प्यारे मन! सच्चे प्रभु को सदा अपने भीतर सँभाल कर रख।” यह जो परिवार आप देखते हैं, यह अंत तक साथ नहीं निभाएगा, फिर इसी के मोह में पूरा चित्त क्यों डुबो देना? अमरदास जी एक बुज़ुर्ग की सीधी सलाह देते हैं, ऐसा काम कभी मत कीजिए जिसका अंत में पछतावा हो। और जो सचमुच साथ निभेगा, वह है, सतिगुरु का उपदेश। उसे सुनिए, बस वही आख़िर तक साथ रहता है।
पउड़ी 12
अगम अगोचरा तेरा अंतु न पाइआ ॥
अंतो न पाइआ किनै तेरा आपणा आपु तू जाणहे ॥
जीअ जंत सभि खेलु तेरा किआ को आखि वखाणए ॥
आखहि त वेखहि सभु तूहै जिनि जगतु उपाइआ ॥
कहै नानकु तू सदा अगंमु है तेरा अंतु न पाइआ ॥12॥
भाव: स्वर फिर अरज़ बन जाता है, और एक विनम्रता के साथ। “हे अगम, हे अगोचर! आपके गुणों का अंत किसी ने नहीं पाया।” अपने असली स्वरूप को बस आप ही जानते हैं। ये सारे जीव-जंतु तो आपका रचा हुआ एक खेल हैं, इन्हें बयान कौन करे? बोलने वाले में भी आप, देखने वाले में भी आप, जिसने यह सारा जगत बनाया।
पउड़ी 13
सुरि नर मुनि जन अंम्रितु खोजदे सु अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥
पाइआ अंम्रितु गुरि क्रिपा कीनी सचा मनि वसाइआ ॥
जीअ जंत सभि तुधु उपाए इकि वेखि परसणि आइआ ॥
लबु लोभु अहंकारु चूका सतिगुरू भला भाइआ ॥
कहै नानकु जिस नो आपि तुठा तिनि अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥13॥
भाव: आनंद को यहाँ एक नया नाम मिलता है, “अंम्रितु”, अमृत। यह वही अमृत है जिसे देवता, मनुष्य, मुनि-जन सब ढूँढते फिरते हैं। पर अमरदास जी की बात देखिए, यह अमृत गुरु से ही मिलता है। जिस पर गुरु ने मेहर की, उसने सच्चे प्रभु को मन में बसा कर यह अमृत पा लिया। और इसका असर? “लबु लोभु अहंकारु चूका”, लालच, लोभ, अहंकार, सब छूट गया।
पउड़ी 14 · भगतों की चाल
भगता की चाल निराली ॥
चाला निराली भगताह केरी बिखम मारगि चलणा ॥
लबु लोभु अहंकारु तजि त्रिसना बहुतु नाही बोलणा ॥
खंनिअहु तिखी वालहु निकी एतु मारगि जाणा ॥
गुर परसादी जिनी आपु तजिआ हरि वासना समाणी ॥
कहै नानकु चाल भगता जुगहु जुगु निराली ॥14॥
भाव: अब अमरदास जी भक्तों की ओर इशारा करते हैं, और एक यादगार लाइन देते हैं, “भगता की चाल निराली”, जो लोग सच्चा आनंद भोगते हैं, उनके जीने का ढंग दुनिया से अलग होता है। यह रास्ता आसान नहीं, “खंनिअहु तिखी वालहु निकी”, यह तलवार की धार से तीखा है और बाल से भी बारीक। ऐसे रास्ते पर वही चल पाता है जो लोभ, अहंकार, तृष्णा छोड़ दे और अपनी शोभा न बखानता फिरे। जिसने गुरु की कृपा से अपना अहं छोड़ा, उसकी हर वासना प्रभु की याद में समा जाती है।
पउड़ी 15
जिउ तू चलाइहि तिव चलह सुआमी होरु किआ जाणा गुण तेरे ॥
जिव तू चलाइहि तिवै चलह जिना मारगि पावहे ॥
करि किरपा जिन नामि लाइहि सि हरि हरि सदा धिआवहे ॥
जिस नो कथा सुणाइहि आपणी सि गुरदुआरै सुखु पावहे ॥
कहै नानकु सचे साहिब जिउ भावै तिवै चलावहे ॥15॥
भाव: यह पउड़ी एक गहरी विनम्रता से भरी है, बहुत कुछ जपुजी के “हुकमि रजाई चलणा” जैसी। “हे मालिक! जैसे तू चलाता है, वैसे हम चलते हैं, आपके गुणों का और भेद मैं क्या जानूँ।” बस यही समझ पड़ी है, जिस राह पर आप डालते हैं, उसी पर हम चलते हैं। जिन्हें आप कृपा करके नाम में जोड़ते हैं, वही सदा सिमरते हैं। और जिन्हें आप अपनी कथा सुनाते हैं, वही गुरु के दर पर आनंद पाते हैं।
पउड़ी 16
एहु सोहिला सबदु सुहावा ॥
सबदो सुहावा सदा सोहिला सतिगुरू सुणाइआ ॥
एहु तिन कै मंनि वसिआ जिन धुरहु लिखिआ आइआ ॥
इकि फिरहि घनेरे करहि गला गली किनै न पाइआ ॥
कहै नानकु सबदु सोहिला सतिगुरू सुणाइआ ॥16॥
भाव: “एहु सोहिला सबदु सुहावा”, गुरु का यह सुंदर शब्द आनंद देने वाला गीत है। पर यह उन्हीं के मन में बसता है जिनके भाग्य में धुर से ही यह लिखा हो। और अमरदास जी एक सीधी बात रखते हैं, बहुत से लोग सिर्फ़ बातें करते फिरते हैं, ज्ञान की चर्चा करते हैं, पर “गली किनै न पाइआ”, कोरी बातों से किसी को आनंद नहीं मिला।
पउड़ी 17
पवितु होए से जना जिनी हरि धिआइआ ॥
हरि धिआइआ पवितु होए गुरमुखि जिनी धिआइआ ॥
पवितु माता पिता कुटंब सहित सिउ पवितु संगति सबाईआ ॥
कहदे पवितु सुणदे पवितु से पवितु जिनी मंनि वसाइआ ॥
कहै नानकु से पवितु जिनी गुरमुखि हरि हरि धिआइआ ॥17॥
भाव: यह पउड़ी एक शब्द के इर्द-गिर्द घूमती है, “पवितु”, पवित्र। जिन्होंने गुरु की शरण में रह कर नाम सिमरा, वे पवित्र हो गए। और यह पवित्रता अकेली नहीं रहती, इनकी संगत से माता-पिता, परिवार, सारी संगत पवित्र हो जाती है। नाम ऐसा आनंद का स्रोत है कि इसे जपने वाला भी पवित्र, सुनने वाला भी पवित्र, और मन में बसाने वाला भी पवित्र। यह बिल्कुल जपुजी की उस बात जैसी है, शांति संक्रामक होती है।
पउड़ी 18
करमी सहजु न ऊपजै विणु सहजै सहसा न जाइ ॥
नह जाइ सहसा कितै संजमि रहे करम कमाए ॥
सहसै जीउ मलीणु है कितु संजमि धोता जाए ॥
मंनु धोवहु सबदि लागहु हरि सिउ रहहु चितु लाइ ॥
कहै नानकु गुर परसादी सहजु उपजै इहु सहसा इव जाइ ॥18॥
भाव: यहाँ अमरदास जी एक भीतरी रोग की बात करते हैं, “सहसा”, यानी मन का सहम, तौख़ला। माया के मोह में यह बना रहता है, और बाहरी कर्मकांड से नहीं जाता, चाहे कितने ही धार्मिक दिखने वाले कर्म कर लो। मन सहम में रहता है, तो मैला रहता है। और यह मैल किसी बाहरी जुगत से नहीं धुलती। तो धोएँ कैसे? “मंनु धोवहु सबदि लागहु”, मन को गुरु के शब्द से धोइए, प्रभु से चित्त जोड़े रखिए। गुरु की कृपा से ही भीतर सहज उपजता है, और यह सहम तभी जाता है।
पउड़ी 19
जीअहु मैले बाहरहु निरमल ॥
बाहरहु निरमल जीअहु त मैले तिनी जनमु जूऐ हारिआ ॥
एह तिसना वडा रोगु लगा मरणु मनहु विसारिआ ॥
वेदा महि नामु उतमु सो सुणहि नाही फिरहि जिउ बेतालिआ ॥
कहै नानकु जिन सचु तजिआ कूड़े लागे तिनी जनमु जूऐ हारिआ ॥19॥
भाव: अब अमरदास जी एक खरी बात कहते हैं, सीधी पर बिना कड़वाहट के। जो भीतर से मैले हैं और बाहर से पवित्र दिखते हैं, उन्होंने अपना जीवन ऐसे गँवा दिया जैसे कोई जुआरी जुए में सब हार आता है। भीतर तृष्णा का बड़ा रोग लगा है, और मौत को भुला रखा है। वेदों में भी नाम को सबसे ऊँचा कहा गया, पर वे उस तरफ़ कान ही नहीं धरते, और “बेतालिआ” की तरह, बेताल की तरह, बेतरतीब भटकते रहते हैं।
पउड़ी 20
जीअहु निरमल बाहरहु निरमल ॥
बाहरहु त निरमल जीअहु निरमल सतिगुर ते करणी कमाणी ॥
कूड़ की सोइ पहुचै नाही मनसा सचि समाणी ॥
जनमु रतनु जिनी खटिआ भले से वणजारे ॥
कहै नानकु जिन मंनु निरमलु सदा रहहि गुर नाले ॥20॥
भाव: पिछली पउड़ी का उल्टा पहलू। जो गुरु से वह करनी सीख लेते हैं, वे भीतर से भी निर्मल और बाहर से भी निर्मल हो जाते हैं। उनके भीतर इतना आनंद बनता है कि माया के मोह की ख़बर तक उन तक नहीं पहुँचती, उनका मन सच में समा जाता है। जीव इस जगत में आनंद का व्यापार करने आए हैं, और अमरदास जी कहते हैं, “भले से वणजारे”, वही व्यापारी सच्चे हैं जिन्होंने इस अनमोल जन्म को सफल कर लिया।
पउड़ी 21 · सनमुख सिख
जे को सिखु गुरू सेती सनमुखु होवै ॥
होवै त सनमुखु सिखु कोई जीअहु रहै गुर नाले ॥
गुर के चरन हिरदै धिआए अंतर आतमै समाले ॥
आपु छडि सदा रहै परणै गुर बिनु अवरु न जाणै कोए ॥
कहै नानकु सुणहु संतहु सो सिखु सनमुखु होए ॥21॥
भाव: अब अमरदास जी सिख की बात करते हैं, और एक प्यारा शब्द लाते हैं, “सनमुख”, यानी जो गुरु के सामने खुले मुँह, बिना किसी छिपे खोट के खड़ा हो सके। ऐसा सिख कैसे बनता है? जो सच्चे दिल से गुरु के चरणों में टिके, गुरु को हृदय में बसाए, अपना अहं छोड़ कर सदा गुरु के आसरे रहे, और गुरु के सिवा किसी और को आत्मिक जीवन का सहारा न समझे। वही सिख गुरु के सामने सुर्ख़रू होता है।
पउड़ी 22
जे को गुर ते वेमुखु होवै बिनु सतिगुर मुकति न पावै ॥
पावै मुकति न होर थै कोई पुछहु बिबेकीआ जाए ॥
अनेक जूनी भरमि आवै विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥
फिरि मुकति पाए लागि चरणी सतिगुरू सबदु सुणाए ॥
कहै नानकु वीचारि देखहु विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥22॥
भाव: सनमुख का उल्टा है, “वेमुख”, जो गुरु से मुँह मोड़ ले। अमरदास जी कहते हैं, ऐसे को मुक्ति नहीं मिलती। और यह उनकी अपनी बात नहीं, “पुछहु बिबेकीआ जाए”, किसी भी विचारवान से जा कर पूछ लीजिए। गुरु के बिना माया के बंधन कहीं और से नहीं कटते। माया में फँसा जीव अनेक योनियों में भटकता है, और छुटकारा तभी मिलता है जब वह गुरु के चरणों में लगे और गुरु उसे शब्द सुनाए।
पउड़ी 23
आवहु सिख सतिगुरू के पिआरिहो गावहु सची बाणी ॥
बाणी त गावहु गुरू केरी बाणीआ सिरि बाणी ॥
जिन कउ नदरि करमु होवै हिरदै तिना समाणी ॥
पीवहु अंम्रितु सदा रहहु हरि रंगि जपिहु सारिगपाणी ॥
कहै नानकु सदा गावहु एह सची बाणी ॥23॥
भाव: फिर एक गर्मजोशी भरा न्योता। “हे सतिगुरु के प्यारे सिखो, आइए, सच्ची बाणी गाइए।” और अमरदास जी इस बाणी को एक ऊँचा दर्जा देते हैं, “बाणीआ सिरि बाणी”, यह सब बाणियों में शिरोमणि है। पर यह उन्हीं के हृदय में टिकती है जिन पर प्रभु की मेहर की नज़र हो। “पीवहु अंम्रितु”, इस नाम-जल को पीजिए, प्रभु के रंग में सदा रहिए। इसी में आनंद है।
पउड़ी 24
सतिगुरू बिना होर कची है बाणी ॥
बाणी त कची सतिगुरू बाझहु होर कची बाणी ॥
कहदे कचे सुणदे कचे कचंी आखि वखाणी ॥
हरि हरि नित करहि रसना कहिआ कछू न जाणी ॥
चितु जिन का हिरि लइआ माइआ बोलनि पए रवाणी ॥
कहै नानकु सतिगुरू बाझहु होर कची बाणी ॥24॥
भाव: पिछली पउड़ी सच्ची बाणी की थी, यह उसके उलट की। गुरु के आशय से हट कर कही गई बाणी “कची” है, कच्ची, जो मन को आनंद के ठिकाने से नीचे गिरा देती है। ऐसी बाणी कहने वाले और सुनने वाले दोनों का मन कमज़ोर हो जाता है। और एक महीन बात, ऐसे लोग ज़बान से हरि-हरि भी बोलें, तो भी उनकी प्रभु से गहरी साँझ नहीं बनती, क्योंकि उनका चित्त माया ने मोह रखा है। वे जो बोलते हैं, “रवाणी”, बस ऊपर-ऊपर से बोलते हैं।
पउड़ी 25
गुर का सबदु रतंनु है हीरे जितु जड़ाउ ॥
सबदु रतनु जितु मंनु लागा एहु होआ समाउ ॥
सबद सेती मनु मिलिआ सचै लाइआ भाउ ॥
आपे हीरा रतनु आपे जिस नो देइ बुझाइ ॥
कहै नानकु सबदु रतनु है हीरा जितु जड़ाउ ॥25॥
भाव: यहाँ एक सुंदर रूपक है। गुरु का शब्द एक रतन है, जिसमें हीरे जड़े हैं, यानी जिसमें प्रभु की महिमाएँ भरी हैं। जब मन इस शब्द-रतन में जुड़ जाता है, तो प्रभु में एक आश्चर्यजनक लीनता बन जाती है। पर अमरदास जी अंत में वही शर्त रख देते हैं, “आपे हीरा रतनु आपे”, हीरा भी वही है, रतन भी वही, और यह सूझ उसी को मिलती है जिसे वह ख़ुद बख़्शता है।
पउड़ी 26
सिव सकति आपि उपाइ कै करता आपे हुकमु वरताए ॥
हुकमु वरताए आपि वेखै गुरमुखि किसै बुझाए ॥
तोड़े बंधन होवै मुकतु सबदु मंनि वसाए ॥
गुरमुखि जिस नो आपि करे सु होवै एकस सिउ लिव लाए ॥
कहै नानकु आपि करता आपे हुकमु बुझाए ॥26॥
भाव: यह पउड़ी जपुजी के “हुकम” वाली बात के बहुत क़रीब है। जीवात्मा और माया, दोनों को रच कर करतार ख़ुद ही अपना हुकम चलाता है, और ख़ुद ही यह खेल देखता है कि जीव कैसे माया के हाथों नाच रहे हैं। किसी विरले को गुरु के ज़रिए इसकी सूझ देता है, उसके बंधन तोड़ देता है, और वह माया से मुक्त हो जाता है। यानी माया का ज़ोर भी उसी का हुकम है, यह समझ ही मुक्ति है।
पउड़ी 27
सिम्रिति सासत्र पुंन पाप बीचारदे ततै सार न जाणी ॥
ततै सार न जाणी गुरू बाझहु ततै सार न जाणी ॥
तिही गुणी संसारु भ्रमि सुता सुतिआ रैणि विहाणी ॥
गुर किरपा ते से जन जागे जिना हरि मनि वसिआ बोलहि अंम्रित बाणी ॥
कहै नानकु सो ततु पाए जिस नो अनदिनु हरि लिव लागै जागत रैणि विहाणी ॥27॥
भाव: स्मृतियाँ और शास्त्र पढ़ने वाले पंडित बस यही विचारते रहते हैं कि पाप क्या है और पुण्य क्या, पर “ततै सार”, असली तत्त्व का स्वाद उन्हें नहीं आता। और अमरदास जी कारण भी बता देते हैं, गुरु के बिना यह स्वाद आता ही नहीं। सारा संसार तीन गुणों की भटकन में सोया पड़ा है, और सोते-सोते ही उम्र की रात बीत जाती है। जागते वही हैं जिनके मन में प्रभु बसता है। आत्मिक आनंद उसी को मिलता है जिसकी रात जागते हुए बीते।
पउड़ी 28 · माँ के गर्भ की आग
माता के उदर महि प्रतिपाल करे सो किउ मनहु विसारीऐ ॥
मनहु किउ विसारीऐ एवडु दाता जि अगनि महि आहारु पहुचावए ॥
ओस नो किहु पोहि न सकी जिस नउ आपणी लिव लावए ॥
आपणी लिव आपे लाए गुरमुखि सदा समालीऐ ॥
कहै नानकु एवडु दाता सो किउ मनहु विसारीऐ ॥28॥
भाव: यहाँ एक बहुत कोमल तस्वीर है। जो प्रभु माँ के पेट में, उस आग के बीच भी, बच्चे को पालता है और उस तक भोजन पहुँचाता है, इतने बड़े दाता को मन से भुलाते ही क्यों हैं? और एक राहत वाली बात, जिसे वह अपनी प्रीति की लगन से जोड़ लेता है, उसे माया कुछ छू नहीं सकती। पर यह प्रीति भी, “आपणी लिव आपे लाए”, वही ख़ुद लगाता है।
पउड़ी 29
जैसी अगनि उदर महि तैसी बाहरि माइआ ॥
माइआ अगनि सभ इको जेही करतै खेलु रचाइआ ॥
जा तिसु भाणा ता जंमिआ परवारि भला भाइआ ॥
लिव छुड़की लगी त्रिसना माइआ अमरु वरताइआ ॥
एह माइआ जितु हरि विसरै मोहु उपजै भाउ दूजा लाइआ ॥
कहै नानकु गुर परसादी जिना लिव लागी तिनी विचे माइआ पाइआ ॥29॥
भाव: पिछली पउड़ी की आग वाली तस्वीर यहाँ खुलती है। जैसी आग माँ के पेट में है, वैसी ही बाहर जगत में माया है, करतार ने यही खेल रचा है। जन्म होते ही परिवार का प्यार घेर लेता है, और उसी में फँस कर प्रभु से प्रीति की डोर टूट जाती है, तृष्णा आ चिपकती है। यही माया है, जिसमें प्रभु भूल जाता है। पर अंत में एक उम्मीद, जिनकी प्रीति गुरु की कृपा से प्रभु में जुड़ी रहती है, “तिनी विचे माइआ पाइआ”, उन्हें इसी माया के बीच रहते हुए आनंद मिल जाता है।
पउड़ी 30
हरि आपि अमुलकु है मुलि न पाइआ जाइ ॥
मुलि न पाइआ जाइ किसै विटहु रहे लोक विललाइ ॥
ऐसा सतिगुरु जे मिलै तिस नो सिरु सउपीऐ विचहु आपु जाइ ॥
जिस दा जीउ तिसु मिलि रहै हरि वसै मनि आइ ॥
हरि आपि अमुलकु है भाग तिना के नानका जिन हरि पलै पाइ ॥30॥
भाव: “हरि आपि अमुलकु है”, प्रभु ख़ुद अमूल्य है, किसी क़ीमत से नहीं मिलता। लोग धन-दौलत से उसे पाने की कोशिश में खप-खप कर हार गए। तो रास्ता क्या है? अगर ऐसा गुरु मिल जाए जिसके मिलने से भीतर का अहं निकल जाए, तो उसके आगे अपना सिर भेंट कर देना चाहिए। फिर जिसका यह जीव है, उसी से जा मिलता है, और प्रभु मन में आ बसता है। भाग्य उन्हीं के जागते हैं जिन्हें वह ख़ुद अपने पल्ले से लगा लेता है।
पउड़ी 31
हरि रासि मेरी मनु वणजारा ॥
हरि रासि मेरी मनु वणजारा सतिगुर ते रासि जाणी ॥
हरि हरि नित जपिहु जीअहु लाहा खटिहु दिहाड़ी ॥
एहु धनु तिना मिलिआ जिन हरि आपे भाणा ॥
कहै नानकु हरि रासि मेरी मनु होआ वणजारा ॥31॥
भाव: अब अमरदास जी एक व्यापारी का रूपक लाते हैं, और बहुत निजी स्वर में। “प्रभु का नाम मेरी पूँजी है, और मेरा मन व्यापारी बन गया है।” यह पूँजी गुरु से ही समझ आई। और फिर एक न्योता, “हरि हरि नित जपिहु”, रोज़ नाम जपिए, हर दिन आनंद का नफ़ा कमाइए। पर यह धन भी उन्हीं को मिलता है जिन्हें देना प्रभु को ख़ुद अच्छा लगता है।
पउड़ी 32
ए रसना तू अन रसि राचि रही तेरी पिआस न जाइ ॥
पिआस न जाइ होरतु कितै जिचरु हरि रसु पलै न पाइ ॥
हरि रसु पाइ पलै पीऐ हरि रसु बहुड़ि न त्रिसना लागै आइ ॥
एहु हरि रसु करमी पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥
कहै नानकु होरि अन रस सभि वीसरे जा हरि वसै मनि आइ ॥32॥
भाव: अब स्वर शरीर की ओर मुड़ता है, और अमरदास जी सीधे जीभ से बात करते हैं। “हे जीभ! तू और-और स्वादों में मस्त रहती है, पर तेरी प्यास बुझती ही नहीं।” और बुझेगी भी कैसे, जब तक “हरि रसु”, प्रभु के नाम का रस, हाथ न आ जाए। जिसे यह रस मिल गया, उसे फिर तृष्णा छू नहीं सकती। बाक़ी सारे स्वाद उसी दिन भूल जाते हैं जिस दिन प्रभु मन में आ बसता है।
पउड़ी 33 · हे मेरे शरीर
ए सरीरा मेरिआ हरि तुम महि जोति रखी ता तू जग महि आइआ ॥
हरि जोति रखी तुधु विचि ता तू जग महि आइआ ॥
हरि आपे माता आपे पिता जिनि जीउ उपाइ जगतु दिखाइआ ॥
गुर परसादी बुझिआ ता चलतु होआ चलतु नदरी आइआ ॥
कहै नानकु स्रिसटि का मूलु रचिआ जोति राखी ता तू जग महि आइआ ॥33॥
भाव: यहाँ से एक नया, बहुत कोमल हिस्सा शुरू होता है, जहाँ अमरदास जी सीधे शरीर को संबोधित करते हैं। “हे मेरे शरीर! तू जगत में आया ही तब, जब प्रभु ने अपनी ज्योति तेरे भीतर रखी।” वही ज्योति तेरी असली जान है। और जो प्रभु जीव को रच कर जगत दिखाता है, वही ख़ुद इसकी माँ है, वही पिता। जब गुरु की कृपा से सूझ आती है, तो यह सारा जगत एक खेल, एक तमाशा लगने लगता है। आनंद का स्रोत बाहर के पदार्थों में नहीं, उस भीतरी ज्योति में है।
पउड़ी 34
मनि चाउ भइआ प्रभ आगमु सुणिआ ॥
हरि मंगलु गाउ सखी ग्रिहु मंदरु बणिआ ॥
हरि गाउ मंगलु नित सखीए सोगु दूखु न विआपए ॥
गुर चरन लागे दिन सभागे आपणा पिरु जापए ॥
अनहत बाणी गुर सबदि जाणी हरि नामु हरि रसु भोगो ॥
कहै नानकु प्रभु आपि मिलिआ करण कारण जोगो ॥34॥
भाव: यह पूरी रचना का सबसे ख़ुशी से भरा क्षण है। “मनि चाउ भइआ”, मन में चाव उमड़ आया, क्योंकि प्रभु-पति के आने की ख़बर मिल गई। अमरदास जी एक सखी की तरह पुकारते हैं, “हरि मंगलु गाउ सखी”, हे सहेली, मंगल-गीत गा, यह हृदय-घर अब प्रभु का मंदिर बन गया। जिस दिन माथा गुरु के चरणों पर टिकता है, वह दिन भाग्यशाली होता है, प्यारा पति-प्रभु दिख जाता है। और भीतर वही “अनहत बाणी”, अनहद की एकरस ध्वनि बजने लगती है। सब कुछ कर सकने वाला प्रभु ख़ुद आ कर मिल गया।
पउड़ी 35
ए सरीरा मेरिआ इसु जग महि आइ कै किआ तुधु करम कमाइआ ॥
कि करम कमाइआ तुधु सरीरा जा तू जग महि आइआ ॥
जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ सो हरि मनि न वसाइआ ॥
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ ॥
कहै नानकु एहु सरीरु परवाणु होआ जिनि सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥35॥
भाव: शरीर से बात जारी है, पर अब एक सीधा सवाल के साथ। “हे मेरे शरीर! इस जगत में आ कर तूने किया क्या?” जिसने तुझे रचा, उसी प्रभु को तूने मन में नहीं बसाया, और-और ही काम करता रहा। पर अमरदास जी निराशा में नहीं छोड़ते, गुरु की कृपा से जिसके पूर्व के लिखे संस्कार उघड़ते हैं, उसके मन में प्रभु बस जाता है। और तब, “एहु सरीरु परवाणु होआ”, वह शरीर सफल हो जाता है जिसने गुरु से चित्त जोड़ लिया।
पउड़ी 36 · हे मेरी आँखों
ए नेत्रहु मेरिहो हरि तुम महि जोति धरी हरि बिनु अवरु न देखहु कोई ॥
हरि बिनु अवरु न देखहु कोई नदरी हरि निहालिआ ॥
एहु विसु संसारु तुम देखदे एहु हरि का रूपु है हरि रूपु नदरी आइआ ॥
गुर परसादी बुझिआ जा वेखा हरि इकु है हरि बिनु अवरु न कोई ॥
कहै नानकु एहि नेत्र अंध से सतिगुरि मिलिऐ दिब द्रिसटि होई ॥36॥
भाव: अब आँखों की बारी। “हे मेरी आँखों! प्रभु ने तुम में अपनी ज्योति रखी है, इसलिए जिधर देखो, प्रभु को ही देखो।” यह पूरा संसार जो तुम देख रही हो, यह उसी का रूप है। गुरु की कृपा से जब सूझ आई, तो हर जगह एक ही प्रभु दिखने लगा, उसके सिवा और कुछ नहीं। और एक चौंकाने वाली बात, “एहि नेत्र अंध से”, गुरु मिलने से पहले ये आँखें अंधी थीं, गुरु मिला तो “दिब द्रिसटि”, दिव्य दृष्टि खुली। यही देखना ही आनंद की जड़ है।
पउड़ी 37 · हे मेरे कानो
ए स्रवणहु मेरिहो साचै सुनणै नो पठाए ॥
साचै सुनणै नो पठाए सरीरि लाए सुणहु सति बाणी ॥
जितु सुणी मनु तनु हरिआ होआ रसना रसि समाणी ॥
सचु अलख विडाणी ता की गति कही न जाए ॥
कहै नानकु अंम्रित नामु सुणहु पवित्र होवहु साचै सुनणै नो पठाए ॥37॥
भाव: अब कानों से बात। “हे मेरे कानो! सच्चे करतार ने तुम्हें इसी सुनने के लिए बनाया है, सति बाणी सुनो।” और सुनने का असर देखिए, जिस बाणी को सुनते ही मन और तन हरे हो जाते हैं, जीभ रस में डूब जाती है। वह सच्चा प्रभु तो आश्चर्य-रूप है, उसकी गति कही ही नहीं जा सकती। पर इतना तय है, “अंम्रित नामु सुणहु पवित्र होवहु”, अमृत-नाम सुनिए, पवित्र हो जाएँगे, कानों को इसी काम के लिए भेजा गया है।
पउड़ी 38 · दसवाँ द्वार
हरि जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥
वजाइआ वाजा पउण नउ दुआरे परगटु कीए दसवा गुपतु रखाइआ ॥
गुरदुआरै लाइ भावनी इकना दसवा दुआरु दिखाइआ ॥
तह अनेक रूप नाउ नव निधि तिस दा अंतु न जाई पाइआ ॥
कहै नानकु हरि पिआरै जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥38॥
भाव: यह एक गहरी पउड़ी है, और इसे ठहर कर पढ़िए। प्रभु ने जीवात्मा को शरीर-रूपी गुफा में टिका कर, फिर पवन का बाजा बजाया, यानी साँस की हवा से जीव को बोलने की शक्ति दी। नौ द्वार, नाक, कान, आँख आदि, प्रत्यक्ष बनाए, पर दसवाँ द्वार छिपा कर रखा। जिन्हें प्रभु गुरु के दर पर श्रद्धा बख़्शता है, उन्हें यह दसवाँ द्वार दिखा देता है, और वहाँ अनेक रूपों वाला नाम-रूपी नौ निधियों का भंडार मिलता है, जिसका अंत नहीं पड़ता।
पउड़ी 39
एहु साचा सोहिला साचै घरि गावहु ॥
गावहु त सोहिला घरि साचै जिथै सदा सचु धिआवहे ॥
सचो धिआवहि जा तुधु भावहि गुरमुखि जिना बुझावहे ॥
इहु सचु सभना का खसमु है जिसु बखसे सो जनु पावहे ॥
कहै नानकु सचु सोहिला सचै घरि गावहे ॥39॥
भाव: अड़तीस पउड़ियों का सफ़र अब समेटने को है। “एहु साचा सोहिला”, यह सच्चा आनंद-गीत वहीं गाइए, उस सत्संग में, जहाँ सब मिल कर सदा सच्चे प्रभु को ध्याते हैं। पर अमरदास जी वही शर्त एक बार फिर रख देते हैं, सिमरते वही हैं जो उसे भले लगते हैं, जिन्हें वह गुरु के ज़रिए सूझ बख़्शता है। वह सच्चा प्रभु सबका मालिक है, और पाता वही है जिस पर उसकी बख़्शिश हो।
पउड़ी 40 · समापन
अनदु सुणहु वडभागीहो सगल मनोरथ पूरे ॥
पारब्रहमु प्रभु पाइआ उतरे सगल विसूरे ॥
दूख रोग संताप उतरे सुणी सची बाणी ॥
संत साजन भए सरसे पूरे गुर ते जाणी ॥
सुणते पुनीत कहते पवितु सतिगुरु रहिआ भरपूरे ॥
बिनवंति नानकु गुर चरण लागे वाजे अनहद तूरे ॥40॥1॥
भाव: और रचना ठीक वहीं आ कर बंद होती है जहाँ से चली थी, बजते हुए बाजों पर। “अनदु सुणहु वडभागीहो”, हे बड़े भाग्य वालो, यह आनंद सुनो। आनंद यही है कि मन की सारी दौड़ें थम जाती हैं, सारे संकल्प पूरे हो जाते हैं, परब्रह्म मिल जाता है, और सारी चिंताएँ उतर जाती हैं। सच्ची बाणी सुनने से दुख, रोग, संताप सब मिट जाते हैं। और आख़िरी लाइन में अमरदास जी विनती के स्वर में आ जाते हैं, “बिनवंति नानकु”, जो गुरु के चरणों में लगते हैं, उनके भीतर “वाजे अनहद तूरे”, वही अनहद की तुरही बज उठती है। पहली पउड़ी के “वजीआ वाधाईआ” का घेरा यहाँ पूरा होता है।
पढ़ कर आगे क्या
इसी site पर: जपुजी साहिबगुरु नानक की सुबह वाली प्रार्थना, गुरु ग्रंथ साहिब का पहला पन्ना। जपुजी पूछता है, “सच्चा इंसान बना कैसे जाए?”, और आनंद साहिब पूछता है, “सच्चा आनंद आता कहाँ से है?”। दोनों एक ही दिशा से आते हैं, गुरु की कृपा और नाम। साथ में सुखमनी साहिब भी, पाँचवें गुरु अर्जुन देव की मन को शांति देने वाली रचना।
और एक बात जेब में रखिए, वही जो अमरदास जी सातवीं पउड़ी में कहते हैं: “आनंदु आनंदु सभु को कहै”। आज ख़ुद को एक बार पकड़िए, जब ख़ुशी कहीं बाहर से आती हुई लगे, तो ज़रा ठहर कर देखिए, क्या वह सचमुच भीतर बसी है, या बस कहने भर की है।
साथ में पढ़ें · Companion Texts
- जपुजी साहिब M1 की सुबह वाली प्रार्थना, ग्रंथ का पहला पन्ना।
- सुखमनी साहिब M5 की magnum opus, मन की सांत्वना।
- आसा-दी-वार M1 की 24-पउड़ी morning-वार।