आनंद साहिब

आनंद साहिब

गुरु अमर दास जी (M3) · रामकली राग · 40 पउड़ियाँ · अंग 917-922

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो

आनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मैं पाइआ ॥

“मेरी माँ, मुझे आनंद हुआ। सतगुरु मुझे मिल गए।”

आनंद साहिब, पउड़ी 1

यह आज, दिल्ली में

दिल्ली के Sikh-घर की हर ख़ुशी के moment पर आनंद साहिब का पाठ। शादी, जन्म, exam-pass, नई नौकरी। 40 पउड़ियाँ, हर एक “आनंदु भइआ” की अलग layer।

आनंद साहिब गुरु अमर दास जी (तीसरे गुरु) की एक 40-पउड़ी रचना है, रामकली राग में। अंग 917 से 922 तक।

यह रचना उन कुछ Sikh रचनाओं में से है जो हर ceremony के अंत में पढ़ी जाती है, शादी, अंत्येष्टि, गुरुपर्व, हर जगह। 40 पूरी पउड़ियाँ नहीं, अक्सर पहली 5 + आख़िरी पउड़ी (पउड़ी 40, जिसे “अनंदु सुणहु वडभागीहो” कहते हैं)।

गुरु अमर दास जी को गुरुगद्दी 73 साल की उम्र में मिली। उन्होंने 22 साल गुरुगद्दी संभाली, 95 साल की उम्र तक। आनंद साहिब उनकी maturity-state से निकली रचना है।

थीम: आत्म-आनंद कैसे आता है? बाहरी सुख से नहीं, सतगुरु-मिलाप से। 40 पउड़ियाँ इसी एक प्रश्न को अलग-अलग angles से देखती हैं।

सब अंग, क्रम से

पूरी रचना verse-by-verse इन अंगों पर है:

कैसे पढ़ें

एक approach: पहले इस intro page को पढ़िए, फिर अंगों पर क्रम से जाइए। हर अंग पर 5-10 मिनट लगेंगे। पूरी रचना 90-120 मिनट में पूरी होती है।

दूसरा approach: अगर समय कम है, सिर्फ़ पहले अंग और आख़िरी अंग पढ़िए। बीच का flow आप mentally fill कर सकते हैं अगर context पता है।

तीसरा approach: कोई एक अंग जो आज resonate करे, उसी पर ध्यान दीजिए। ग्रंथ साहिब का design “हुकमनामा” वाला है, हर रोज़ कुछ एक अंग आज के लिए है।

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