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शिव महिम्न स्तोत्र

शिव महिम्न स्तोत्र

शिव महिम्न स्तोत्र

गंधर्व पुष्पदन्त का रचा शिव-स्तवन · 43 श्लोक

पाठ-काल लगभग पचास मिनट

पहले एक बात

हिमालय की चोटी पर ध्यानमग्न शिव, व्याघ्र-चर्म बिछा, सिर के ऊपर आकाशगंगा और तारों का विस्तार, पर्वत की तलहटी में एक शिवलिंग
हिमालय पर बैठा, ब्रह्माण्ड को साँस की तरह लिए, यही महिमा है जो स्तोत्र गाता है।

एक गंधर्व था, पुष्पदन्त। गंधर्वों का राजा। उसके पास एक सिद्धि थी, जब चाहे अदृश्य हो जाने की। और उसकी एक आदत थी, एक राजा के बग़ीचे से रोज़, अदृश्य होकर, शिव-पूजा के फूल चुरा लेना।

पुष्पदन्त, पंखों वाला गंधर्व, राजा के पुष्प-उद्यान में एक शिवलिंग के पास चाँदनी में पकड़ा गया, वही क्षण जब शाप उतरता है
गंधर्व पुष्पदन्त के बाग़-चोरी के क्षण। यहीं से उसकी सिद्धि छूटी, और यहीं से यह स्तवन जन्मा।

एक दिन माली ने बग़ीचे में शिव को चढ़ी निर्माल्य-पत्तियाँ बिखेर दीं। पुष्पदन्त अनजाने उन्हें लाँघ गया, और उसी अनादर से उसकी सिद्धि छिन गई। वह दिखने लगा, पकड़ा गया। जब उसे अपनी चूक का बोध हुआ, तब पश्चात्ताप में उसने यह स्तोत्र रचा। शिव का यह सबसे प्रिय स्तवन एक भूल से, एक पतन से उपजा।

इस स्तोत्र की सबसे मशहूर पंक्ति इसी बेबसी को सबसे सुंदर तरीक़े से कहती है:

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिंधु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥
काला पहाड़ पिघलकर स्याही बन जाए, समुद्र दवात, कल्पवृक्ष की डाल क़लम, पूरी धरती काग़ज़, और ख़ुद शारदा देवी अनंत काल तक लिखती रहें, तब भी आपके गुणों का छोर नहीं आता।

यह श्लोक 32 है। ऊपर से यह वाणी की हार लगती है, भीतर से यह आनंद है। पुष्पदन्त उस बात पर मगन हैं कि कुछ महिमाएँ चुकती ही नहीं। जिस वस्तु का छोर हाथ आ जाए, वह छोटी पड़ जाती है।

इसे कैसे पढ़ें

एक तरीक़ा: एक बैठक में पूरा, रुक-रुककर, क़रीब 50 मिनट का अनुभव। शुरू के 9 श्लोक थोड़े सघन हैं, दर्शन की बात करते हैं। उन्हें धीरे लें।

दूसरा तरीक़ा: रोज़ कुछ श्लोक। श्लोक 10 से 24 तक पुराण-कथाएँ हैं (त्रिपुर, नीलकंठ, कामदहन), यहाँ रफ़्तार बढ़ जाती है। श्लोक 32 दिल है। 33 से 43 तक स्तोत्र अपने बारे में बात करता है, अपने जन्म और अपने फल के बारे में।

तीसरा तरीक़ा: सिर्फ़ देवनागरी बार-बार पढ़ें, बिना अर्थ देखे, मंत्र-विशेषता पकड़ने के लिए। फिर एक दिन अर्थ के साथ लौटें।

पुष्पदन्त की शुरुआत एक स्वीकार से होती है। वे कहते हैं, आपकी महिमा का छोर तो सबसे बड़े ज्ञानी की स्तुति भी नहीं छू पाती, ब्रह्मा जैसों की वाणी भी आपके आगे थककर रुक जाती है, फिर मेरी क्या बिसात। और तुरंत एक कोमल तर्क उठाते हैं, हर कोई अपनी बुद्धि की हद तक गाता है, और उतना गाना दोष नहीं। आगे वे और गहरे उतरते हैं। आपकी महिमा वाणी और मन दोनों के रास्ते से परे है, वेद भी “यह नहीं, यह नहीं” कहकर बस चकित होकर इशारा कर पाता है। सबसे बड़ा ग्रंथ भी संकेत से काम चलाता है। पर मज़ेदार मोड़ यह है, छोटे विषयों पर तो हर किसी की ज़ुबान और मन फ़ौरन दौड़ पड़ते हैं। हमारी समझ छोटी वस्तुओं के लिए बनी है, असीम के लिए नहीं। तीसरे श्लोक में वे अपनी मंशा साफ़ कर देते हैं, मैं आपको बयान करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए गा रहा हूँ कि गाने से मेरी अपनी वाणी पवित्र हो जाएगी। प्रार्थना आराध्य के लिए कम, साधक के लिए अधिक होती है।

श्लोक 1 से 3 · वाणी की हार, और एक कोमल तर्क

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन्​ किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥

अब स्तोत्र दर्शन में उतरता है। एक ही शक्ति तीन काम करती है, जगत को रचती, बचाती, समेटती है, और वेद इसी को तीन गुणों के तीन रूपों में बाँटकर दिखाते हैं। पीछे सत्ता एक ही रहती है। कुछ जड़-बुद्धि लोग इस सुंदर सत्य की निंदा करते हैं, पर पुष्पदन्त उन्हें कोसते नहीं, बस “अभागे” कहते हैं, जो इस रस को चूक रहे हैं। फिर वे एक ख़ास तरह के प्रश्न को पकड़ते हैं, रचयिता किस इच्छा से, किस देह से, किस साधन और किस आधार पर तीनों लोक रचता है। ये प्रश्न बुद्धिमानी जैसे जान पड़ते हैं, पर कोटि की भूल हैं। कुम्हार को घड़ा गढ़ने के लिए मिट्टी, चाक और हाथ चाहिए, क्योंकि कुम्हार घड़े से अलग है, पर जो सर्व है उसे बाहर से सामग्री कहाँ से मिले। शिव का ऐश्वर्य “अतर्क्य” है, तर्क की पकड़ से परे। उल्टी ओर से देखें तो उत्तर और साफ़ होता है, जिन लोकों के हिस्से साफ़ दिखते हैं वे अनादि नहीं हो सकते, और बिना किसी समर्थ सत्ता के अपने आप टिक भी नहीं सकते। फिर भी कुछ मंद-बुद्धि शंका करते रहते हैं।

श्लोक 4 से 6 · एक शक्ति, तीन काम, और तर्क की हद

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहंतुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ 4 ॥
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः ॥ 5 ॥
अजन्मानो लोकाः किमवयववंतोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ 6 ॥

अब आता है स्तोत्र का सबसे उदार श्लोक। वेद-मीमांसा, सांख्य, योग, पाशुपत, वैष्णव, अलग-अलग रास्ते हैं, और हर एक अपने को सही ठहराता है। पर लोगों की रुचि अलग-अलग होती है, किसी को सीधा रास्ता भाता है, किसी को घुमावदार। जैसे हर नदी का पानी आख़िर समुद्र में मिलता है, वैसे ही पहुँचने का ठिकाना एकमात्र आप हैं। मार्ग टेढ़ा होने से जल मैला नहीं हो जाता। फिर वे शिव के साज़-सामान पर आते हैं, एक बूढ़ा बैल, खट्वांग, कुल्हाड़ी, चमड़ा, राख, साँप और खोपड़ी, बस इतना ही। और देवता, जिनके पास स्वर्ग का सारा वैभव है, अपनी समृद्धि भी शिव की एक कृपा-दृष्टि से पाते हैं। जो “स्वात्माराम” है, अपने ही भीतर रमता है, उसे विषयों की मृगमरीचिका इधर-उधर नहीं भगाती। और अंत में पुष्पदन्त एक ईमानदार पल जीते हैं। दार्शनिक आपस में एकमत नहीं, कोई कहता है सब नित्य है, कोई कहता है सब अनित्य। इन सबके बीच आपको गाते हुए मैं शरमाता हूँ। पर सच कहूँ, यह मुखरता बेअदबी नहीं, क्योंकि यह शास्त्रार्थ नहीं, प्रेम का निवेदन है। शास्त्रार्थ में सही होना पड़ता है, प्रेम में केवल सच्चा।

श्लोक 7 से 9 · सब नदियाँ एक समुद्र, और शरमाते हुए गाना

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥
महोक्षः खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥ 8 ॥
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन्​ जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥ 9 ॥

यहाँ से स्तोत्र पुराण-कथाओं में उतरता है, और पहली कथा लिंगोद्भव की है। ब्रह्मा और विष्णु में बहस छिड़ी, बड़ा कौन। तभी एक अनंत आग का स्तम्भ प्रकट हुआ, और दोनों उसका छोर ढूँढने निकले, ब्रह्मा ऊपर, विष्णु नीचे। दोनों थक गए, छोर मिला ही नहीं। फिर उन्होंने नापना छोड़ा और भक्ति-श्रद्धा से स्तुति की, तब शिव स्वयं प्रकट हो गए। जो छोर नापने से नहीं मिला, वह झुकने से मिल गया। अंतिम पंक्ति एक भरोसा देती है, जब देवताओं का अनुसरण फल लाया, तो हमारा भी अवश्य फलेगा। फिर रावण आता है, और एक अनदेखा पक्ष खुलता है। तीनों लोक जीत लेने पर भी उसकी भुजाओं में युद्ध की खुजली बाक़ी थी, और उस तीव्रता को उसने अपने कमल-समान सिर काट-काटकर शिव के चरणों में भेंट चढ़ाने तक पहुँचा दिया। यह उसकी अटल भक्ति का प्रताप था। पर अगली कथा में वही रावण उलट जाता है। शिव की सेवा से जो बल उसने पाया था, उसी बल से जब उसने कैलास को हिलाना चाहा, तब शिव के पैर के अँगूठे की हल्की दाब से वह दब गया, पाताल तक उसे ठौर न मिली। जो शक्ति स्रोत से मिली है, वह उसी स्रोत के विरुद्ध खड़ी नहीं रह सकती।

श्लोक 10 से 12 · स्तम्भ का छोर, और रावण के दो रूप

तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनलमनलस्कंधवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ 10 ॥
अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकंडू-परवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणांभोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥ 12 ॥

बाणासुर की कथा इसी सीख को दूसरी ओर से कहती है। वह शिव का परम भक्त था, और उसके सम्मुख इन्द्र का ऐश्वर्य भी, जो देवलोक की सबसे ऊँची सम्पदा है, छोटा पड़ गया, तीनों लोक उसके अनुचर हो गए। इसमें अचरज क्या, पुष्पदन्त कहते हैं, आपके आगे झुका हुआ सिर किसकी उन्नति नहीं लाता। संसार में जिसे ऊँचाई कहते हैं, वह झुकने से घटती नहीं, बढ़ती है। फिर आता है स्तोत्र का सबसे प्यारा श्लोक, नीलकंठ की कथा। समुद्र-मंथन में अमृत भी निकला, विष भी। अमृत सब देवता ले उड़े, विष किसी ने नहीं लिया। शिव ने उठाया, पी लिया, गले में रोक लिया, और वह मारने वाला विष उनके गले को नीला करके एक गहना बन गया। ज़हर पीना पड़े तो उसे भीतर मत उतरने दीजिए, गले में रोक लीजिए, और देखिए, वही ज़हर पहचान बन जाता है। ज़िंदगी की कड़वाहट सही जगह रुक जाए तो नष्ट नहीं करती, गहरा कर देती है।

श्लोक 13 और 14 · झुकने से उन्नति, और विष का आभूषण

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ 13 ॥
अकांड-ब्रह्मांड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद्​ यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कंठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय- भंग- व्यसनिनः ॥ 14 ॥

अब कामदेव की बारी। उसके बाण देव, असुर, मनुष्य, किसी पर भी निष्फल नहीं जाते थे। उसी भरोसे में उसने ध्यानमग्न शिव पर भी बाण साध लिया, मानो शिव भी कोई साधारण देवता हों। तीसरी आँख खुली, और वह भस्म होकर बस “स्मर”, स्मरण-मात्र रह गया, बिना देह के। जो अपने भीतर पूरी तरह संयत है, उसकी ओर बढ़ी कामना उसे डिगा नहीं पाती, स्वयं चुक जाती है। यहाँ कुछ दबाया नहीं जा रहा, यह भीतरी स्थिरता का सहज परिणाम है। फिर स्तोत्र शिव के नृत्य की ओर मुड़ता है, और एक विरोधाभास पकड़ता है। यह नृत्य जगत की रक्षा के लिए है, पर वही रक्षा-नृत्य तीनों लोक को काँपा देता है। पैर पड़ता है तो धरती अपने टिके रहने पर ही शंका करने लगती है, भुजाएँ घूमती हैं तो विष्णु का लोक ग्रहों समेत डगमगा जाता है, जटाएँ हिलती हैं तो आकाश के किनारे टकराने लगते हैं। जिसे आप स्थिर और ठोस मानते हैं, वह उस नृत्य की एक थमी हुई मुद्रा भर है।

श्लोक 15 और 16 · कामदेव का भस्म होना, रक्षा का नृत्य

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तंते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ 15 ॥
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह- गणम् ।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ 16 ॥

अब स्तोत्र अनुपात की दृष्टि खोलता है। आकाशगंगा, जो तारों की झाग लिए सारे आकाश में फैली है, शिव के मस्तक पर एक नन्ही बूँद-सी जान पड़ती है, और उसी एक विराट प्रवाह से द्वीपों और सागरों वाला पूरा जगत रचा गया। इसी से अनुमान लगाइए कि वह दिव्य शरीर कितना विराट है। महिमा यहाँ संख्याओं में नहीं, अनुपात में खुलती है। फिर त्रिपुर-दहन का दृश्य आता है, और वह भव्य है। तीन उड़ते नगरों को भस्म करने के लिए धरती शिव का रथ बनी, ब्रह्मा सारथि, मेरु धनुष, सूर्य-चंद्र दो पहिए, चक्रधारी विष्णु स्वयं बाण। पर पुष्पदन्त मुस्कुराकर पूछते हैं, तिनके-जैसे त्रिपुर के लिए इतना तामझाम क्यों, जिसकी इच्छा से सब चलता है उसे रथ-धनुष की क्या आवश्यकता। उत्तर अंतिम पंक्ति में छिपा है, समर्थ की बुद्धि साधनों पर निर्भर नहीं होती, उनसे खेलती है। यह सारा आयोजन आवश्यकता नहीं, लीला थी। तीसरी कथा भक्ति की पराकाष्ठा है। विष्णु नित्य हज़ार कमल चढ़ाते थे, एक दिन गिनती में एक कमल छूट गया, तो उन्होंने पूजा अधूरी न छोड़कर अपना नेत्र ही निकालकर अर्पित कर दिया। वही उमड़ी भक्ति सुदर्शन चक्र बन गई, जो आज भी जगत की रक्षा करती है। जो सच्चे मन से अर्पित होता है, वह रूप बदलकर, और अधिक सामर्थ्य लेकर लौटता है।

श्लोक 17 से 19 · बूँद-सी गंगा, त्रिपुर की लीला, अर्पित नेत्र

वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥ 17 ॥
रथः क्षोणी यंता शतधृतिरगेंद्रो धनुरथो
रथांगे चंद्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडंबर-विधिः
विधेयैः क्रीडंत्यो न खलु परतंत्राः प्रभुधियः ॥ 18 ॥
हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन्​ निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ 19 ॥

अब स्तोत्र एक पुरानी दार्शनिक गुत्थी छूता है। यज्ञ आज होता है, फल बहुत बाद में आता है, बीच में कर्म तो मिट चुका, फिर वह फल कहाँ से आता है। पुष्पदन्त सीधा उत्तर देते हैं, कर्म स्वयं फल नहीं देता, ईश्वर देता है, और वही कर्म के सोने पर भी जाग्रत रहता है। इसी विश्वास पर लोग वेद में श्रद्धा बाँधकर निश्चिंत होकर यज्ञ-कर्म करते हैं। कर्म और फल के बीच एक अनदेखी कड़ी है, और वह कड़ी ईश्वर का जागरण है। फिर अगला श्लोक इसी का उलटा पक्ष दिखाता है, दक्ष-यज्ञ की कथा से। दक्ष “क्रिया-दक्ष” था, कर्मकांड का मर्मज्ञ, उसके यज्ञ में हर विधान सही था, ऋषि पुरोहित थे, देवता सभासद। एक ही कमी रह गई, अहंकार में उसने शिव को न निमंत्रण दिया, न श्रद्धा, और पूरा भव्य यज्ञ नष्ट हो गया। विधि कितनी भी पूरी हो, यदि मूल के प्रति श्रद्धा छूट गई तो आयोजन टिकता नहीं, उलटे अनिष्ट कर बैठता है।

श्लोक 20 और 21 · फल का जामिन, और श्रद्धाहीन यज्ञ

क्रतौ सुप्ते जाग्रत्​ त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां संप्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ 20 ॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धा-विधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ 21 ॥

दो कोमल कथाएँ साथ आती हैं, एक कोप की, एक हँसी की। पहली, आकाश के मृग-नक्षत्र का स्रोत है। प्रजापति मर्यादा भूलकर हिरनी का रूप धरे अपनी ही पुत्री की ओर बढ़ा, स्वयं मृग बनकर पीछे लगा। तब शिव ने व्याध का रूप लेकर धनुष उठाया, और बाण से बिंधकर वह मृग काँपता हुआ आकाश को भाग गया, आज भी वहीं अपने पीछे लगे व्याध-वेग को सहता दिखता है। शिव का कोप मनमाना नहीं, वह तब उठता है जब कोई मर्यादा टूटती है। करुणा और कोप, दोनों एक ही धर्म-रक्षा से उठते हैं। दूसरी कथा हल्की हँसी वाली है। कामदेव तो शिव के सम्मुख तिनके-सा जल गया, फिर भी अगर पार्वती शिव को अपने अर्धनारीश्वर रूप के कारण स्त्री के वश में समझ लें, तो यह बस उनका भोला प्रेम है। प्रेम में हार-जीत का हिसाब रखने वाला अभी प्रेम के बाहर खड़ा है। जहाँ दो सचमुच आधे-आधे एक हो जाएँ, वहाँ कौन किसके वश में, यह प्रश्न ही गिर जाता है।

श्लोक 22 और 23 · मर्यादा की रक्षा, और प्रेम का भोलापन

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्​ भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसंतं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥ 22 ॥
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥ 23 ॥

अब स्तोत्र का सबसे चौंकाने वाला श्लोक। शिव की हर वस्तु अशुभ मानी जाने वाली है, श्मशान उनका अखाड़ा, साथी भूत-प्रेत, बदन पर चिता की राख, गले में मुंडमाला। समाज जिनसे कतराता है, शिव उन्हीं के बीच रहते हैं। और फिर श्लोक पलटता है, यही शिव स्मरण करने वालों के लिए परम मंगल हैं। शिव श्मशान में इसलिए हैं क्योंकि वे मृत्यु से नहीं डरते, और जो मृत्यु से नहीं डरता वही सच्चा अभय दे सकता है। शुभ और अशुभ का हमारा बँटवारा सतह पर है, जो उसके पार चला गया वही हर दशा में मंगल बना रहता है। और फिर स्तोत्र पुराण-कथाओं से हटकर ध्यान के अनुभव में उतरता है। योगी मन को भीतर मोड़ता है, प्राण को साध लेता है, और एक अमृत-भरे तालाब में डुबकी-सी लगाता है, तब रोम-रोम खिल उठता है, आँखें आनंद से भर आती हैं। उस गहराई में जो कुछ अनकहा मिलता है, पुष्पदन्त उसे नाम नहीं देते, बस “किमपि”, कुछ एक, कहते हैं, और जोड़ देते हैं, वही आप हैं। शिव कोई दूर बैठा देवता नहीं, शिव वह अनुभव हैं जो भीतर डुबकी लगाने पर स्वयं मिलता है।

श्लोक 24 और 25 · अशुभ-सा रूप, परम मंगल, और भीतर की डुबकी

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः ।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि ॥ 24 ॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्संगति-दृशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यंतस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ॥ 25 ॥

अब स्तोत्र शिव को सब-कुछ बताने लगता है, पर एक सुंदर पलटी के साथ। आप ही सूरज, आप ही चाँद, आप ही हवा, आग, जल, आकाश, धरती, और भीतर का आत्मा भी आप। पर इस तरह गिनाना भी एक प्रकार से आपको सीमित करना है, क्योंकि गिनती की एक हद होती है। असली बात यह है कि ऐसा कुछ है ही नहीं जो आप न हों। ईश्वर को कहीं ढूँढने जाना नहीं पड़ता, क्योंकि ऐसा कोई स्थान है ही नहीं जहाँ वह न हो। फिर ओम् खुलकर रख दिया जाता है। ओम् तीन ध्वनियों का जोड़ है, अ-उ-म, और हर ध्वनि एक तिकड़ी को समेटती है, तीन वेद, तीन अवस्थाएँ, तीन लोक, तीन देव। यानी ओम् पूरी रची हुई दुनिया का संक्षेप है। पर इसके परे एक चौथा है, तुरीय, जो तीनों अवस्थाओं को देखता है पर किसी में बँधता नहीं, और ओम् के बाद की वह हलकी मौन-गूँज उसी चौथे की ओर इशारा करती है। अगली बार ओम् बोलें तो ध्यान आख़िरी “म्” के बाद के सन्नाटे पर रखिए, वही असली पता है।

श्लोक 26 और 27 · ऐसा कुछ नहीं जो आप न हों, और ओम् का नक़्शा

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि ॥ 26 ॥
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुंधानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ 27 ॥

अब आते हैं नमस्कार के श्लोक, और स्वर मंत्र जैसा हो जाता है। पहले शिव के आठ नाम, अष्टमूर्ति, यानी आठ रूप, धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र, और चेतन यजमान। हर नाम सृष्टि के एक अंश का स्वामी है, और हर नाम उसी एक तक पहुँचने का एक द्वार। नाम अलग, ठिकाना एक। फिर पुष्पदन्त एक ही साँस में उल्टी जोड़ियाँ रखते हैं, सबसे पास वाले को नमस्कार और सबसे दूर वाले को भी, सबसे सूक्ष्म को और सबसे विशाल को, सबसे प्राचीन को और सबसे नए को। तर्क कहता है एक चीज़ दोनों कैसे हो, पर शिव हर जोड़ी के दोनों सिरे हैं, और बीच का सब भी। यह समझाने की कोशिश नहीं करता, यह विरोधों को साथ रखकर मन को वहाँ ले जाता है जहाँ “या तो यह, या वह” वाली सोच ख़ुद ढीली पड़ जाती है। फिर वही नमस्कार एक साफ़ ढाँचे में बैठ जाता है, तीन काम, तीन गुण, तीन नाम, सृष्टि के लिए रजस् और भव, संहार के लिए तमस् और हर, पालन के लिए सत्त्व और मृड। पर असली बात आख़िरी पंक्ति में है, “निस्त्रैगुण्य”, तीनों गुणों के परे। शिव गुणों के साथ काम तो करते हैं, पर ख़ुद उनमें बँधते नहीं, और कहीं न कहीं, हम भी वही चौथा हैं जो तीनों को आते-जाते देखता है।

श्लोक 28 से 30 · आठ नाम, उल्टी जोड़ियाँ, गुणों के पार

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते ॥ 28 ॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिसर्वाय च नमः ॥ 29 ॥
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः ।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ 30 ॥

अब पुष्पदन्त लगभग पूरा घेरा पूरा कर देते हैं। पहले श्लोक की वह बात फिर लौटती है, कहाँ मेरा यह छोटा-सा, दुखों के वश में डोलता मन, और कहाँ आपकी वह महिमा जो हर सीमा लाँघ जाती है। इस फ़र्क़ को देखकर मन डरकर रुक जाता, पर अब एक खोज जुड़ गई है, मुझे यह गवाया किसने। जवाब, भक्ति ने। भक्ति ने मन को “अमंद” कर दिया, सुस्ती से बाहर खींचकर शब्दों के फूल चरणों में चढ़वा दिए। गाना योग्यता से नहीं, उस प्रेम से होता है जो हमें योग्यता के प्रश्न से ही ऊपर उठा देता है। और इसके ठीक बाद आता है पूरे स्तोत्र का दिल, वही पंक्ति जो शुरू में हम सुन चुके। पुष्पदन्त ब्रह्मांड को ही लेखन-सामग्री बना देते हैं, काला पहाड़ स्याही, समुद्र दवात, कल्पवृक्ष क़लम, धरती काग़ज़, और लिखने वाली ख़ुद विद्या की देवी, समय की कोई हद नहीं। इतने असीम साधनों के बाद भी जवाब वही, छोर नहीं आता। पर यह हार का नहीं, आनंद का श्लोक है। जिस चीज़ का छोर मिल जाए वह छोटी पड़ जाती है, और महिमा का बेछोर होना ही उसका सबसे सुंदर गुण है। यही पहले श्लोक का जवाब है, इसलिए वाणी नाकाफ़ी थी, और इसलिए नाकाफ़ी होना कोई शर्म की बात नहीं।

श्लोक 31 और 32 · भक्ति ने गवाया, और महिमा का बेछोर होना

कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धिः ।
इति चकितममंदीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥ 31 ॥
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिंधु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ 32 ॥

यहाँ से स्तोत्र अपने बारे में बात करने लगता है। पहले रचयिता अपना नाम दर्ज करते हैं, पर बहुत हलके से, पहले शिव का परिचय देकर, फिर अपना, “पुष्पदन्त नाम वाला एक गण।” कलाकार पीछे रहता है, कृति आगे। और एक बात ख़ास है, वे शिव को “निर्गुण” कहते हैं, गुणों से परे, फिर भी पूरा स्तोत्र उन्हीं के गुण गाता है। दिखने में यह विरोध है, असल में यही भक्ति का स्वभाव है, हम जानते हैं कि जिसे गा रहे हैं वह शब्दों से बड़ा है, फिर भी जुड़ने के लिए गाते हैं। फिर फलश्रुति शुरू होती है, पाठ का फल बताने वाला पहला श्लोक, और यह दोनों दुनिया की बात करता है, आगे शिवलोक में रुद्र-समान स्थान, और यहीं इस जीवन में धन, आयु, संतान, यश। पर एक शर्त है, “शुद्ध-चित्त”, साफ़ मन से। फल पाठ की संख्या से नहीं, मन की निर्मलता से आता है। और फिर चार छोटे-छोटे वाक्य, हर एक एक “सबसे ऊँचा”, महेश से बड़ा कोई देव नहीं, महिम्न से बढ़कर कोई स्तुति नहीं, अघोर से बढ़कर कोई मंत्र नहीं, और सबसे ऊँचा तत्त्व, गुरु। बिना गुरु के मंत्र केवल ध्वनि है, स्तोत्र केवल शब्द। विद्या एक से दूसरे तक, हाथ-दर-हाथ, जीवित रूप में चलती है, और वही जीवित हस्तांतरण सबसे ऊँचा है।

श्लोक 33 से 35 · विनम्र हस्ताक्षर, पाठ का फल, और गुरु

असुर-सुर-मुनींद्रैरर्चितस्येंदु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदंताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥ 33 ॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ॥ 34 ॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ 35 ॥

अब फलश्रुति सबसे साहसी बात कहती है। दीक्षा, दान, तप, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ, ये सब बड़े-बड़े पुण्य-कर्म मिलकर भी इस स्तोत्र के सच्चे पाठ के सोलहवें हिस्से के बराबर नहीं ठहरते। दान, तीर्थ, यज्ञ, ये सब “करने” वाले कर्म हैं, इनमें एक कर्ता खड़ा रहता है, “मैंने यह किया।” पर सच्चे पाठ में, जहाँ मन डूब जाए, वहाँ कर्ता ही पिघल जाता है, और जहाँ कर्ता पिघला वहीं असली बात घटी। फिर स्तोत्र अपनी जन्म-कथा दर्ज करता है, और श्लोक 31 की वह विनम्रता अब समझ आती है। पुष्पदन्त गंधर्व-राज था, अदृश्य होने की सिद्धि वाला, जो रोज़ एक बग़ीचे से शिव-पूजा के फूल चुरा लेता था। एक दिन शिव को चढ़ी निर्माल्य-पत्तियाँ अनजाने लाँघ गया, और वह अनादर उसकी सिद्धि छीन ले गया, वह दिखने लगा, पकड़ा गया, और पश्चात्ताप में यह स्तोत्र रचा। सबसे प्रिय शिव-स्तोत्र एक भूल से, एक पतन से उपजा। और तीसरा श्लोक भरोसा देता है, जो हाथ जोड़कर, एकाग्र मन से इसे पढ़ता है, वह किन्नरों से सराहा जाता हुआ शिव के समीप पहुँचता है। यह स्तोत्र “स्वर्ग-मोक्ष-एक-हेतु” है, सुख और मुक्ति दोनों का एक ही कारण, और “अमोघ” है, कभी ख़ाली नहीं लौटता।

श्लोक 36 से 38 · सब कर्मों से बढ़कर, स्तोत्र का जन्म, और अमोघ फल

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हंति षोडशीम् ॥ 36 ॥
कुसुमदशन-नामा सर्व-गंधर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः ॥ 37 ॥
सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं [सुरवरमुनिपूज्यं]
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्य-चेताः ।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदंतप्रणीतम् ॥ 38 ॥

अब स्तोत्र धीरे-धीरे ज़मीन पर उतरता है, जैसे कोई गहरी बातचीत शांति में ढलती हो। पहले यह अपने पूरा होने की घोषणा सादगी से करता है, यह पुण्यमय गंधर्व-वाणी यहाँ पूरी हुई, बेजोड़ है, मन हर लेने वाली है, और शुरू से अंत तक बस ईश्वर का ही वर्णन है। एक शब्द ध्यान खींचता है, “सर्वम् ईश्वर-वर्णनम्”, यानी पुष्पदन्त ने कहीं भी अपनी कथा या अपना दुख केंद्र नहीं बनाया, भले स्तोत्र उनके पतन से जन्मा। कृति में से अपने आप को हटा देना, ताकि बस विषय चमके। फिर एक सुंदर बात साफ़ होती है, यह एक “वाङ्मयी पूजा” है, शब्दों से की गई पूजा। फूल चुराने की सिद्धि तक नहीं बची थी, तो उन्होंने शब्दों के फूल चढ़ाए, और शब्दों की पूजा भी उतनी ही असली है। जिसके पास फूल न हों, वह अपनी बात चढ़ा दे, चढ़ाने का भाव असली है, चढ़ावे की क़ीमत नहीं।

श्लोक 39 और 40 · स्तोत्र का पूरा होना, और शब्दों की पूजा

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्व-भाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ॥ 39 ॥
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छंकर-पादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ 40 ॥

और अंत में, चालीस श्लोक गा लेने के बाद, पुष्पदन्त एक ऐसी बात कहते हैं जो पूरे स्तोत्र को नई गहराई दे देती है, “मैं आपका तत्त्व नहीं जानता।” इतना लंबा, इतना सुंदर स्तोत्र रचकर भी वे यह नहीं कहते कि अब मैं जान गया। और ठीक उसके बाद सबसे सुंदर मोड़, आप जैसे भी हैं, उसी रूप को बार-बार नमस्कार। जानना नमस्कार की शर्त नहीं रहती। प्रेम और आदर समझ का इंतज़ार नहीं करते, आप किसी को पूरा समझकर प्यार नहीं करते, प्यार करते हुए धीरे-धीरे समझते हैं। फिर आख़िरी फलश्रुति की एक प्यारी लचक, एक बार, दो बार, या तीन बार, जितना हो सके, कोई कठोर नियम नहीं। और अंतिम श्लोक तीन तरीक़े गिनाता है, कंठस्थित यानी याद कर लेना, पठित यानी रोज़ का अभ्यास, और समाहित यानी एकाग्र होकर डूब जाना। पहले दो साधन हैं, तीसरा मंज़िल। आप पहले याद करते हैं, फिर दोहराते हैं, और किसी दिन दोहराना रुक जाता है और बस डूबना रह जाता है। स्तोत्र शिव को “भूतपति” कहकर बंद होता है, सब प्राणियों का स्वामी, यानी दूर का देवता नहीं, सबके भीतर बैठा अपना ही स्वामी। पुष्पदन्त ने जो यात्रा फूल चुराने से शुरू की थी, वह यहाँ शब्दों के फूल चढ़ाकर पूरी होती है। गिरना, पहचानना, गाना, और फिर गाने में घुल जाना।

श्लोक 41 से 43 · नहीं जानता फिर भी नमस्कार, और तीन सीढ़ियाँ

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥ 41 ॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥ 42 ॥
श्री पुष्पदंत-मुख-पंकज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण ।
कंठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥ 43 ॥

साथ में पढ़ें

स्रोत: देवनागरी मूल पाठ vignanam.org और sanskritdocuments.org से मिलाकर जाँचा गया। हिन्दी टीका lulla.net की, मूल अर्थ के प्रति निष्ठावान।

परंपरा: गंधर्व पुष्पदन्त रचित यह स्वतंत्र शिव-स्तवन शैव भक्ति-परंपरा के सबसे प्रिय स्तोत्रों में गिना जाता है। श्लोक-संख्या संस्करण-दर-संस्करण थोड़ी बदलती है, यहाँ 43-श्लोक वाला प्रचलित पाठ लिया गया है।

अनुज्ञप्ति: मूल संस्कृत पाठ सार्वजनिक-धरोहर। हिन्दी टीका, CC BY-NC 4.0।

अंतिम संशोधन: 30 मई 2026।