शिव महिम्न स्तोत्र

शिव महिम्न स्तोत्र · Shiva Mahimna Stotra

शिव महिम्न स्तोत्र

गंधर्व पुष्पदन्त का रचा शिव-स्तवन · 43 श्लोक · एक गिरावट से जन्मा हुआ गीत

🟢 पूरा , सभी 43 श्लोक, हर एक का पाँच-block treatment (शब्दार्थ, अर्थ, भावार्थ, संगति)। verified Sanskrit।

पढ़ने का समय: लगभग 50 मिनट · पहले से कुछ ज़रूरी नहीं

पहले एक बात

एक गंधर्व था, पुष्पदन्त। गंधर्वों का राजा। उसके पास एक सिद्धि थी, जब चाहे अदृश्य हो जाने की। और उसकी एक आदत थी, एक राजा के बग़ीचे से रोज़, अदृश्य होकर, शिव-पूजा के फूल चुरा लेना।

एक दिन माली ने बग़ीचे में शिव को चढ़े हुए फूल-पत्ते बिखेर दिए। पुष्पदन्त अनजाने में उन्हें लाँघ गया, और बस, उसकी सिद्धि छिन गई। वह दिखने लगा, पकड़ा गया। जब उसे समझ आया कि चूक कहाँ हुई, तो उसने माफ़ी माँगने के लिए यह स्तोत्र रचा। यानी शिव का सबसे प्यारा स्तवन एक चोरी से, एक गिरावट से जन्मा।

इस स्तोत्र की सबसे मशहूर पंक्ति इसी बेबसी को सबसे सुंदर तरीक़े से कहती है:

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिंधु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥
काला पहाड़ पिघलकर स्याही बन जाए, समुद्र दवात, कल्पवृक्ष की डाल क़लम, पूरी धरती काग़ज़, और ख़ुद शारदा देवी अनंत काल तक लिखती रहें, तब भी तेरे गुणों का छोर नहीं आता।

यह श्लोक 32 है। इसे पढ़कर लगता है यह हार मानने की बात है, पर है उल्टा। पुष्पदन्त इस बात से ख़ुश हैं कि कुछ चीज़ें ख़त्म नहीं होतीं। जिस चीज़ का छोर मिल जाए, वह छोटी पड़ जाती है।

इसे कैसे पढ़ें

एक तरीक़ा: एक बैठक में पूरा, रुक-रुककर, क़रीब 50 मिनट का अनुभव। शुरू के 9 श्लोक थोड़े सघन हैं, दर्शन की बात करते हैं। उन्हें धीरे लें।

दूसरा तरीक़ा: रोज़ कुछ श्लोक। श्लोक 10 से 24 तक पुराण-कथाएँ हैं (त्रिपुर, नीलकंठ, कामदहन), यहाँ रफ़्तार बढ़ जाती है। श्लोक 32 दिल है। 33 से 43 तक स्तोत्र अपने बारे में बात करता है, अपने जन्म और अपने फल के बारे में।

तीसरा तरीक़ा: सिर्फ़ देवनागरी बार-बार पढ़ें, बिना अर्थ देखे, मंत्र-quality पकड़ने के लिए। फिर एक दिन अर्थ के साथ लौटें।

श्लोक 1
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥
mahimnaḥ pāraṃ te paramaviduṣo yadyasadṛśī
stutirbrahmādīnāmapi tadavasannāstvayi giraḥ |
athā’vācyaḥ sarvaḥ svamatipariṇāmāvadhi gṛṇan
mamāpyeṣa stotre hara nirapavādaḥ parikaraḥ
शब्दार्थ

महिम्नः पारं, “तेरी महिमा का छोर।” परमविदुषः, “सबसे बड़े विद्वान का भी।” असदृशी, “नाकाफ़ी, बेमेल।” निरपवादः परिकरः, “बिना दोष का प्रयास।”

अर्थ

हे शिव, अगर सबसे बड़े ज्ञानी की स्तुति भी तेरी महिमा के छोर तक नहीं पहुँचती, तो ब्रह्मा जैसों की वाणी भी तेरे आगे थक जाती है। फिर भी हर कोई अपनी बुद्धि की हद तक तुझे गाता है, इसमें दोष नहीं। तो मेरा यह प्रयास भी निर्दोष है।

भावार्थ

पूरी रचना का पहला ही श्लोक एक स्वीकारोक्ति है: मैं जानता हूँ कि मैं नाकाफ़ी हूँ। यह कोई कमज़ोरी का इक़बाल नहीं, यह सबसे ईमानदार शुरुआत है। पुष्पदन्त कह रहे हैं, अगर ब्रह्मा तक की वाणी थक जाती है, तो मेरी क्या बिसात। पर फिर एक सुंदर तर्क: हर कोई अपनी समझ की हद तक गाता है, और उतना गाना ग़लत नहीं। यानी स्तुति का मक़सद विषय को पूरा बयान करना नहीं, अपने भीतर की जगह बनाना है। दिल्ली में कोई जब किसी बड़े को धन्यवाद देता है, तो शब्द कभी काफ़ी नहीं लगते, फिर भी कहना ज़रूरी होता है। यही भाव।

संगति

यही विनम्र शुरुआत केनोपनिषद् की उस पंक्ति से मिलती है जहाँ कहा गया कि जो ब्रह्म को “जानता हूँ” कहता है, वह नहीं जानता। बड़ाई के आगे शब्द का हार मान लेना, यही असली शुरुआत है।

श्लोक 2
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥
atītaḥ paṃthānaṃ tava ca mahimā vāṅmanasayoḥ
atadvyāvṛttyā yaṃ cakitamabhidhatte śrutirapi |
sa kasya stotavyaḥ katividhaguṇaḥ kasya viṣayaḥ
pade tvarvācīne patati na manaḥ kasya na vacaḥ
शब्दार्थ

अतीतः पंथानं वाङ्मनसयोः, “वाणी और मन के रास्ते से परे।” अतद्व्यावृत्त्या, “यह नहीं, यह नहीं, ऐसे हटाकर।” श्रुतिः, “वेद।” अर्वाचीने पदे, “सामान्य, छोटे विषय पर।”

अर्थ

तेरी महिमा वाणी और मन दोनों के रास्ते से बाहर है। वेद भी “यह नहीं, यह नहीं” कहकर, चकित होकर, बस इशारा कर पाता है। ऐसे में तुझे कौन ठीक से गा सकता है, तेरे गुण कितने हैं, यह किसकी पकड़ में आए। फिर भी छोटे-छोटे विषयों पर तो हर किसी का मन और वाणी दौड़ ही पड़ती है।

भावार्थ

यह श्लोक एक गहरी बात हलके से कह देता है। वेद भी शिव को सीधे बयान नहीं करता, वह “नेति, नेति” करता है, यह नहीं, यह भी नहीं। यानी सबसे बड़ा ग्रंथ भी इशारे से काम चलाता है। और फिर पुष्पदन्त एक मज़ेदार मोड़ लाते हैं: छोटे विषयों पर तो सबकी ज़ुबान और सबका मन फ़ौरन चल पड़ता है। मतलब, हमारी समझ छोटी चीज़ों के लिए बनी है, असीम के लिए नहीं। यह बात आज भी सच है: किसी फ़िल्म पर घंटों राय दे देंगे, पर “मैं कौन हूँ” पर दो मिनट टिकना भारी पड़ता है।

संगति

“नेति नेति” वाली पद्धति बृहदारण्यक उपनिषद् की है, जहाँ ब्रह्म को हर परिभाषा से हटाकर ही इशारा किया जाता है। शिव महिम्न उसी उपनिषदी चाल को काव्य में ढाल देता है।

श्लोक 3
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन्​ किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥
madhusphītā vācaḥ paramamamṛtaṃ nirmitavataḥ
tava brahman​ kiṃ vāgapi suragurorvismayapadam |
mama tvetāṃ vāṇīṃ guṇakathanapuṇyena bhavataḥ
punāmītyarthe’smin puramathana buddhirvyavasitā
शब्दार्थ

मधुस्फीता वाचः, “शहद-सी भरी वाणी।” परमममृतं, “परम अमृत।” सुरगुरोः, “देवगुरु बृहस्पति की।” पुरमथन, “तीन नगरों को भस्म करने वाले।” पुनामि, “पवित्र कर रहा हूँ।”

अर्थ

हे ब्रह्मरूप शिव, जिसने वेद की मधु-भरी वाणी और परम अमृत बनाया, उसके आगे तो देवगुरु बृहस्पति की वाणी भी कोई अचरज की बात नहीं। फिर भी मैंने तय किया है कि तेरे गुण गाने के पुण्य से अपनी इस वाणी को पवित्र कर लूँगा।

भावार्थ

पुष्पदन्त यहाँ अपनी मंशा साफ़ कर देते हैं। वे कह रहे हैं, मैं तुझे बयान करने के लिए नहीं गा रहा, क्योंकि वह तो हो ही नहीं सकता। मैं गा रहा हूँ क्योंकि गाने से मेरी अपनी वाणी साफ़ हो जाएगी। यह स्तुति का असली point है, और बहुत राहत देने वाला है। प्रार्थना भगवान के लिए कम, अपने लिए ज़्यादा होती है। आप किसी को धन्यवाद इसलिए नहीं कहते कि उसे आपके शब्दों की ज़रूरत है, बल्कि इसलिए कि कहने से आपके भीतर कुछ सीधा हो जाता है।

संगति

“गाने से गाने वाला बदलता है” वाला यही भाव हनुमान चालीसा के पाठ-माहात्म्य में और विष्णु सहस्रनाम के फल-वर्णन में भी है। नाम लेना साधन है, साध्य गाने वाले की सफ़ाई है।

श्लोक 4
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहंतुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ 4 ॥
tavaiśvaryaṃ yattajjagadudayarakṣāpralayakṛt
trayīvastu vyastaṃ tisruṣu guṇabhinnāsu tanuṣu |
abhavyānāmasmin varada ramaṇīyāmaramaṇīṃ
vihaṃtuṃ vyākrośīṃ vidadhata ihaike jaḍadhiyaḥ
शब्दार्थ

ऐश्वर्यं, “सामर्थ्य, राज।” जगदुदय-रक्षा-प्रलय-कृत्, “जगत का जन्म, रक्षा, और विलय करने वाला।” त्रयी, “तीन वेद।” जडधियः, “जड़ बुद्धि वाले।” व्याक्रोशीं विदधते, “निंदा करते हैं।”

अर्थ

तेरा ऐश्वर्य जगत को रचता है, बचाता है, समेटता है, और तीन वेद इसी को तीन गुणों के तीन रूपों में बाँटकर दिखाते हैं। फिर भी कुछ जड़-बुद्धि लोग इस सुंदर सत्य की निंदा करते हैं, उन अभागों के लिए जो इसका आनंद नहीं ले पाते।

भावार्थ

यहाँ से स्तोत्र दर्शन में उतरता है। एक ही शक्ति तीन काम करती है: बनाना, बनाए रखना, समेटना। वेद इसे ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र, या सत्त्व-रजस्-तमस् कहकर समझाते हैं, पर पीछे सत्ता एक ही है। पुष्पदन्त यह भी मानते हैं कि कुछ लोग इस बात को मानेंगे नहीं, और वे उन्हें गाली नहीं देते, बस “अभागे” कहते हैं, जो इस सुंदर समझ से वंचित रह गए। यह बहुत परिपक्व रुख है। असहमत से लड़ना नहीं, बस यह देख पाना कि वह एक मज़ा चूक रहा है।

संगति

सृष्टि-स्थिति-प्रलय का यही त्रिक गणपति अथर्वशीर्ष के “त्वमेव कर्ता, धर्ता, हर्ता” में भी आता है। नाम बदलते हैं, ढाँचा वही रहता है।

श्लोक 5
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः ॥ 5 ॥
kimīhaḥ kiṃkāyaḥ sa khalu kimupāyastribhuvanaṃ
kimādhāro dhātā sṛjati kimupādāna iti ca |
atarkyaiśvarye tvayyanavasara duḥstho hatadhiyaḥ
kutarko’yaṃ kāṃścit mukharayati mohāya jagataḥ
शब्दार्थ

किमीहः, “क्या चाह रखकर।” किंकायः, “कैसी देह से।” किमुपायः, “किस साधन से।” किमाधारः, “किस आधार पर।” कुतर्कः, “खोखला तर्क।” मोहाय जगतः, “जगत को भरमाने के लिए।”

अर्थ

रचयिता किस इच्छा से, किस देह से, किस साधन और किस आधार पर तीनों लोक रचता है, यह पूछ-पूछकर कुछ बिगड़ी-बुद्धि लोग, जिनके पास तेरे अतर्क्य ऐश्वर्य में घुसने की जगह नहीं, बस खोखला तर्क उठाकर जगत को भरमाते हैं।

भावार्थ

यह श्लोक एक ख़ास तरह के सवाल को पकड़ता है: “भगवान ने दुनिया किस material से बनाई, किस tool से, किस table पर रखकर।” पुष्पदन्त कहते हैं, ये सवाल समझदारी जैसे लगते हैं, पर असल में category की ग़लती हैं। कुम्हार को घड़ा बनाने के लिए मिट्टी, चाक, हाथ चाहिए, क्योंकि कुम्हार ख़ुद घड़े से अलग है। पर जो सब-कुछ है, उसे बाहर से कोई सामान कहाँ से मिले। शिव का ऐश्वर्य “अतर्क्य” है, यानी तर्क की पकड़ से बाहर, इसलिए नहीं कि वह उल्टा है, बल्कि इसलिए कि तर्क छोटी चीज़ों के बीच रिश्ते जोड़ने का औज़ार है, मूल को नापने का नहीं।

संगति

“कारण के पीछे का कारण” वाला यह सवाल केनोपनिषद् में भी है, जहाँ पूछा जाता है कि मन को कौन सोचने भेजता है। कुछ सवालों का जवाब पीछे हटकर मिलता है, और गहरे खोदकर नहीं।

श्लोक 6
अजन्मानो लोकाः किमवयववंतोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ 6 ॥
ajanmāno lokāḥ kimavayavavaṃto’pi jagatāṃ
adhiṣṭhātāraṃ kiṃ bhavavidhiranādṛtya bhavati |
anīśo vā kuryād bhuvanajanane kaḥ parikaro
yato maṃdāstvāṃ pratyamaravara saṃśerata ime
शब्दार्थ

अजन्मानः लोकाः, “क्या लोक बिना जन्मे हैं।” अवयववंतः, “हिस्सों वाले।” अधिष्ठाता, “चलाने वाला, स्वामी।” अनीशः, “जो ईश नहीं, असमर्थ।” मंदाः, “मंद-बुद्धि।” संशेरते, “शंका करते हैं।”

अर्थ

क्या ये लोक बिना जन्म के हैं, हालाँकि इनके हिस्से साफ़ दिखते हैं। क्या इनका कोई स्वामी न मानकर भी इनका होना सम्भव है। और जो ख़ुद समर्थ न हो, वह जगत रचने में क्या काम आए। हे देवश्रेष्ठ, फिर भी कुछ मंद-बुद्धि लोग तेरे बारे में शंका करते रहते हैं।

भावार्थ

यह पिछले श्लोक का जवाबी पक्ष है। जिस चीज़ के हिस्से हों, वह जुड़ी हुई है, और जो जुड़ी हो वह कभी जुड़ी थी, यानी उसका एक शुरुआती बिंदु है। दुनिया के साफ़ हिस्से दिखते हैं: दिन-रात, ऋतुएँ, जन्म-मृत्यु। तो दुनिया अनादि नहीं हो सकती, और बिना किसी समर्थ सत्ता के अपने आप टिक भी नहीं सकती। पुष्पदन्त का तर्क सीधा है: व्यवस्था अपने आप नहीं बनती। पर ध्यान दें, वे शंका करने वालों पर ग़ुस्सा नहीं करते, बस उन्हें “मंद” कहते हैं, धीमे, जिनकी समझ अभी रफ़्तार नहीं पकड़ पाई।

संगति

यही तर्क आगे श्लोक 7 में खुलता है, जहाँ पुष्पदन्त मतभेद को दोष नहीं, रास्तों की विविधता मानते हैं। पहले वे शंका को धीमापन कहते हैं, फिर उसे भी एक रास्ता मान लेते हैं।

श्लोक 7
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥
trayī sāṃkhyaṃ yogaḥ paśupatimataṃ vaiṣṇavamiti
prabhinne prasthāne paramidamadaḥ pathyamiti ca |
rucīnāṃ vaicitryādṛjukuṭila nānāpathajuṣāṃ
nṛṇāmeko gamyastvamasi payasāmarṇava iva
शब्दार्थ

त्रयी, “तीन वेद, मीमांसा।” सांख्यं, योगः, पशुपतिमतं, वैष्णवम्, “दर्शन और मत के नाम।” ऋजु-कुटिल, “सीधे और घुमावदार।” पयसाम् अर्णवः इव, “जैसे सब जल का समुद्र।”

अर्थ

वेद-मीमांसा, सांख्य, योग, पाशुपत, वैष्णव, अलग-अलग रास्ते, और हर एक अपने को सही ठहराता है। पर लोगों की रुचि अलग-अलग होती है, किसी को सीधा रास्ता भाता है, किसी को घुमावदार। फिर भी, जैसे हर नदी का पानी आख़िर समुद्र में मिलता है, वैसे ही पहुँचने की जगह तू एक ही है।

भावार्थ

यह स्तोत्र का सबसे उदार और सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। पुष्पदन्त कह रहे हैं कि दर्शन और मत आपस में भले झगड़ते रहें, मंज़िल एक ही है। और उपमा कमाल की है: नदियाँ। गंगा सीधी बहे या यमुना घूमकर आए, पानी समुद्र में ही गिरता है। रास्ता टेढ़ा होने से पानी ख़राब नहीं हो जाता। आज की भाषा में: किसी को structure वाला रास्ता चाहिए, किसी को flow वाला, किसी को सवाल पूछते जाना अच्छा लगता है, किसी को बस भरोसा। यह श्लोक किसी रास्ते को नीचा नहीं कहता। यही इसकी ताक़त है।

संगति

“चार राहें, एक मंज़िल” वाला यही भाव गीता 4.11 में है, जहाँ कृष्ण कहते हैं, जो जिस भाव से मेरे पास आता है, मैं उसी रूप में मिलता हूँ। शिव महिम्न इसे नदी-समुद्र की तस्वीर में बाँध देता है।

श्लोक 8
महोक्षः खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥ 8 ॥
mahokṣaḥ khaṭvāṃgaṃ paraśurajinaṃ bhasma phaṇinaḥ
kapālaṃ cetīyattava varada taṃtropakaraṇam |
surāstāṃ tāmṛddhiṃ dadhati tu bhavadbhūpraṇihitāṃ
na hi svātmārāmaṃ viṣayamṛgatṛṣṇā bhramayati
शब्दार्थ

महोक्षः, “बड़ा बैल।” खट्वांगं, “खोपड़ी जड़ा डंडा।” परशुः, “कुल्हाड़ी।” अजिनं, “चमड़ा।” भस्म, “राख।” फणिनः, “साँप।” स्वात्मारामम्, “अपने में ही रमने वाला।” विषयमृगतृष्णा, “विषयों की मृगमरीचिका।”

अर्थ

एक बूढ़ा बैल, खट्वांग, कुल्हाड़ी, चमड़ा, राख, साँप और खोपड़ी, बस इतना ही तेरा साज़-सामान है। और देवता तरह-तरह की ऋद्धि-सिद्धि बस इसलिए पाते हैं कि तेरी एक नज़र उन पर पड़ी। क्योंकि जो अपने ही भीतर रमता है, उसे विषयों की मृगमरीचिका इधर-उधर नहीं भगाती।

भावार्थ

यह श्लोक एक तीखा contrast रखता है। शिव के पास कुछ नहीं: फटा चमड़ा, राख, एक बूढ़ा बैल, साँप। और देवता, जिनके पास स्वर्ग के सब वैभव हैं, वे भी अपनी समृद्धि शिव की कृपा-दृष्टि से ही पाते हैं। यानी जिसके पास कुछ नहीं, वही सबको देने वाला है। क्यों, क्योंकि शिव “स्वात्माराम” हैं, अपने भीतर पूरे। जिसे अपने भीतर पूरापन मिल गया, उसे बाहर की चीज़ें “मृगमरीचिका” लगती हैं, रेगिस्तान में दिखता पानी, जो पास जाओ तो ग़ायब। यह स्तोत्र का सबसे आधुनिक श्लोक है: सच्ची अमीरी सामान में नहीं, भीतर के ठहराव में है।

संगति

“विषय मृगतृष्णा हैं” वाली बात अष्टावक्र गीता के पहले प्रकरण से सीधी मिलती है, जहाँ वैराग्य का मतलब है विषयों से रस का अपने आप उतर जाना, ज़बरदस्ती छोड़ना नहीं।

श्लोक 9
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन्​ जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥ 9 ॥
dhruvaṃ kaścit sarvaṃ sakalamaparastvadhruvamidaṃ
paro dhrauvyā’dhrauvye jagati gadati vyastaviṣaye |
samaste’pyetasmin puramathana tairvismita iva
stuvan​ jihremi tvāṃ na khalu nanu dhṛṣṭā mukharatā
शब्दार्थ

ध्रुवं, “स्थिर, नित्य।” अध्रुवं, “अनित्य, बदलता हुआ।” व्यस्तविषये, “अलग-अलग नज़रिए से।” पुरमथन, “तीन पुरों के नाशक।” जिह्रेमि, “शरमाता हूँ।” मुखरता, “बोलने की हिम्मत, मुखरता।”

अर्थ

कोई दार्शनिक कहता है सब-कुछ नित्य है, कोई कहता है सब अनित्य, कोई कहता है दोनों, अलग-अलग पहलू देखकर। इन सब उलझनों के बीच, हे शिव, तुझे गाते हुए मैं शरमाता हूँ। पर सच कहूँ, मेरी यह बोलने की हिम्मत बेअदबी नहीं कहलाती।

भावार्थ

पुष्पदन्त एक ईमानदार पल जी रहे हैं। दर्शन के बड़े-बड़े सिर भी आपस में एकमत नहीं: कोई कहता है दुनिया स्थायी है, कोई कहता है पल-पल बदलती है। ऐसे में एक गंधर्व का गाना क्या मायने रखता है। वे शरमाते हैं। पर फिर ख़ुद को सँभालते हैं: मेरी यह मुखरता धृष्टता नहीं कहलाएगी। क्यों, क्योंकि गाना ज्ञान का दावा नहीं, प्रेम का इज़हार है। यह फ़र्क़ बारीक और बड़ा है। बहस में आपको सही होना पड़ता है, प्रेम में बस सच्चा। एक तरह से यह श्लोक पहले श्लोक की बात दोहराता है, पर अब और गहराई से: नाकाफ़ी होकर भी गाना, यही भक्ति है।

संगति

यही “शरमाते हुए भी गा देना” वाला भाव हनुमान चालीसा के “बुद्धिहीन तनु जानिके” में है, जहाँ तुलसीदास अपनी कमी मानकर भी क़लम उठा लेते हैं।

श्लोक 10
तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनलमनलस्कंधवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ 10 ॥
tavaiśvaryaṃ yatnād yadupari viriṃcirhariradhaḥ
paricchetuṃ yātāvanalamanalaskaṃdhavapuṣaḥ |
tato bhaktiśraddhā-bharaguru-gṛṇadbhyāṃ giriśa yat
svayaṃ tasthe tābhyāṃ tava kimanuvṛttirna phalati
शब्दार्थ

विरिंचिः, “ब्रह्मा।” हरिः, “विष्णु।” अनलस्कंध-वपुषः, “आग के खम्भे जैसी देह वाले।” परिच्छेतुं, “छोर नापने।” भक्तिश्रद्धा-भर, “भक्ति और श्रद्धा के बोझ से।” अनुवृत्तिः, “पीछे चलना, अनुसरण।”

अर्थ

तेरा ऐश्वर्य ऐसा कि ब्रह्मा ऊपर और विष्णु नीचे, दोनों आग के खम्भे जैसी तेरी देह का छोर ढूँढने निकले और हार गए। पर बाद में जब उन्होंने भक्ति और श्रद्धा से भरकर तेरी स्तुति की, तो तू स्वयं उनके सामने प्रकट हो गया। तो तेरे पीछे चलना क्या बेकार जाएगा।

भावार्थ

यह लिंगोद्भव की कथा है। ब्रह्मा और विष्णु में बहस छिड़ी, बड़ा कौन। तभी एक अनंत आग का स्तम्भ प्रकट हुआ। दोनों चले छोर ढूँढने, ब्रह्मा ऊपर, विष्णु नीचे। दोनों थक गए, छोर मिला ही नहीं। फिर उन्होंने नापना छोड़ा और गाना शुरू किया, और शिव ख़ुद सामने आ गए। पूरा श्लोक एक सीधी सीख देता है: कुछ चीज़ें नापने से नहीं, झुकने से मिलती हैं। ब्रह्मा-विष्णु का measuring mode फ़ेल हुआ, उनका devotion mode काम कर गया। और आख़िरी पंक्ति एक भरोसा देती है: अगर देवताओं का अनुसरण काम कर गया, तो तेरा भी ज़रूर फल देगा।

संगति

“नापने से नहीं, झुकने से” वाला यही सबक़ केनोपनिषद् की उस कथा में है जहाँ देवता ब्रह्म के सामने अकड़ते हैं और हार जाते हैं, और उमा उन्हें असली बात बताती हैं।

श्लोक 11
अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकंडू-परवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणांभोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥
ayatnādāsādya tribhuvanamavairavyatikaraṃ
daśāsyo yadbāhūnabhṛta raṇakaṃḍū-paravaśān |
śiraḥpadmaśreṇī-racitacaraṇāṃbhoruha-baleḥ
sthirāyāstvadbhaktestripurahara visphūrjitamidam
शब्दार्थ

अमुष्य, “उस (रावण) का।” भुजवनम्, “भुजाओं का वन।” बलिं दशग्रीवम्, “बलि के रूप में दस सिर वाले रावण को।” अधृष्टा, “बिना थके, बिना घटे।” भुजव्यापारः, “भुजाओं का काम, पराक्रम।”

अर्थ

रावण ने अपनी भुजाओं का वन, और फिर अपने दस सिर भी, तुझे बार-बार भेंट किए। फिर भी उसकी भुजाओं की लालसा कम न हुई, युद्ध की प्यास बनी रही। तेरे चरणों में सिर रखकर भी जिसका पराक्रम न घटे, ऐसी अटूट भक्ति-शक्ति तू ही दे सकता है।

भावार्थ

रावण की कहानी आमतौर पर अहंकार की कहानी मानी जाती है। पर यह श्लोक एक और कोण दिखाता है: रावण शिव का अनन्य भक्त भी था। उसने अपने सिर तक काटकर शिव को चढ़ाए। यहाँ पुष्पदन्त उस तीव्रता को सराहते हैं। समर्पण ऐसा कि शरीर का हिसाब ही न रहे। आधुनिक नज़र से देखें तो यह एक चेतावनी और एक तारीफ़ दोनों है: तीव्रता अपने आप में बुरी नहीं, सवाल यह है कि वह किस ओर मुड़ी है। रावण की भक्ति सच्ची थी, उसका अहंकार उसे ले डूबा। ऊर्जा वही थी, दिशा ने फ़र्क़ डाला।

संगति

ऊर्जा का सही दिशा माँगना, यही गीता का कर्मयोग है: काम मत छोड़ो, कर्ता का अहंकार छोड़ो। रावण के पास काम था, अहंकार भी, बस यही गड़बड़।

श्लोक 12
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥ 12 ॥
amuṣya tvatsevā-samadhigatasāraṃ bhujavanaṃ
balāt kailāse’pi tvadadhivasatau vikramayataḥ |
alabhyā pātāle’pyalasacalitāṃguṣṭhaśirasi
pratiṣṭhā tvayyāsīd dhruvamupacito muhyati khalaḥ
शब्दार्थ

अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगता, “तेरी सेवा से पाई हुई।” कैलासे, “कैलास पर्वत के नीचे।” विधेयाः, “वश में, क़ाबू में।” विश्वे, “सारे लोक, सब कुछ।”

अर्थ

उसी रावण ने तेरी सेवा से जो शक्ति पाई थी, वह तब डगमगाई जब उसने कैलास को उठाना चाहा और तूने अँगूठे से दबा दिया। पाताल तक उसका ठिकाना न रहा। जो शक्ति तुझसे मिली थी, वही तेरे ख़िलाफ़ उठते ही बेकार हो गई।

भावार्थ

यह कैलास उठाने वाली कथा है। रावण ने वही ताक़त, जो शिव की सेवा से कमाई थी, शिव के ही पर्वत को हिलाने में लगा दी, और शिव ने पैर के अँगूठे की हलकी दाब से उसे दबा दिया। श्लोक की चोट साफ़ है: जो शक्ति स्रोत से मिली है, उसी स्रोत के विरुद्ध नहीं चल सकती। यह बिजली से चलने वाले पंखे जैसा है, जो उसी तार को काटना चाहे जिससे वह चलता है। आज की ज़िंदगी में भी यही दिखता है: जिस संस्था, जिस रिश्ते, जिस नींव ने आपको खड़ा किया, उसी को गिराने में लगी ताक़त आख़िर अपने पैर पर ही गिरती है।

संगति

शक्ति और उसके स्रोत का यह रिश्ता गीता 11.33 के “निमित्तमात्रं भव” से जुड़ता है: ताक़त हमारी होकर भी हमारी नहीं, हम बस ज़रिया हैं।

श्लोक 13
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ 13 ॥
yadṛddhiṃ sutrāmṇo varada paramoccairapi satīṃ
adhaścakre bāṇaḥ parijanavidheyatribhuvanaḥ |
na taccitraṃ tasmin varivasitari tvaccaraṇayoḥ
na kasyāpyunnatyai bhavati śirasastvayyavanatiḥ
शब्दार्थ

यद्-ऋद्धिं, “जो समृद्धि।” सुदति, “सुंदर दाँतों वाली पार्वती।” जहोः कन्या, “जह्नु की पुत्री, गंगा।” मूर्ध्नि, “सिर पर।” कलावती, “चंद्रकला धारण किए।”

अर्थ

हे शिव, तेरी जो असली समृद्धि है, वह वैभव नहीं, वह तो सिर पर बैठी गंगा है, माथे पर चंद्रकला है, और साथ में पार्वती है। बाक़ी जिसे लोग ऐश्वर्य कहते हैं, वह तेरे आगे फीका है।

भावार्थ

शिव की “सम्पत्ति” की list अजीब है: सिर पर एक नदी, माथे पर चाँद का टुकड़ा, साथ में अर्धांगिनी। न सोना, न महल। पुष्पदन्त इस छवि को प्यार से उठाते हैं। शिव की अमीरी का पैमाना संसार से उल्टा है। गंगा यानी निरंतर बहती शुद्धता, चंद्रकला यानी ठंडक और लय, पार्वती यानी शक्ति का साथ। यह “होने” की अमीरी है, “रखने” की नहीं। दिल्ली की भागती ज़िंदगी में यह श्लोक एक सवाल छोड़ता है: आपकी असली पूँजी क्या है, जो number में दिखती है या जो सुबह उठते ही भीतर महसूस होती है।

संगति

“होने की अमीरी बनाम रखने की अमीरी” का यह फ़र्क़ ईशावास्य उपनिषद् की पहली पंक्ति में है: “त्याग के साथ भोग।” जो छोड़कर भोगता है, वही असल में अमीर है।

श्लोक 14
अकांड-ब्रह्मांड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद्​ यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कंठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय- भंग- व्यसनिनः ॥ 14 ॥
akāṃḍa-brahmāṃḍa-kṣayacakita-devāsurakṛpā
vidheyasyā”sīd​ yastrinayana viṣaṃ saṃhṛtavataḥ |
sa kalmāṣaḥ kaṃṭhe tava na kurute na śriyamaho
vikāro’pi ślāghyo bhuvana-bhaya- bhaṃga- vyasaninaḥ
शब्दार्थ

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि, “तेरे आगे कोई इच्छा अधूरी नहीं रहती।” विषं, “ज़हर, हलाहल।” हे विभो, “हे व्यापक प्रभु।” कण्ठे, “गले में।” भूषणम्, “गहना।”

अर्थ

तेरे पास कोई इच्छा अधूरी रहती ही नहीं, फिर भी समुद्र-मंथन से निकला हलाहल विष तूने ख़ुद पी लिया। और वह विष तेरे गले में रुककर, उसे नीला करके, एक गहना बन गया। जो दूसरों को मारता, वह तेरे यहाँ आभूषण हो गया।

भावार्थ

यह नीलकंठ की कथा है, और स्तोत्र का सबसे प्यारा श्लोक। समुद्र-मंथन में अमृत भी निकला, विष भी। अमृत सब देवता ले उड़े, विष किसी ने नहीं लिया। शिव ने उठाया, पी लिया, गले में रोक लिया। और वह विष, मारने वाली चीज़, उनके गले को नीला करके एक पहचान, एक गहना बन गया। यह श्लोक एक गहरी बात रोज़मर्रा की भाषा में कहता है: ज़हर पीना पड़े तो उसे भीतर मत उतरने दो, गले में रोक लो, और फिर देखो, वही ज़हर तुम्हारी पहचान बन सकता है। ज़िंदगी की कड़वाहट, अपमान, दुख, अगर सही जगह रुक जाएँ तो नष्ट नहीं करते, गहरा कर देते हैं।

संगति

“विष को आभूषण बना देना” भगवद्गीता के समत्व-योग का काव्य-रूप है: सुख-दुख दोनों को बिना डगमगाए सँभाल लेना। शिव वह योगी हैं जो विष को भी संतुलन में रख लेते हैं।

श्लोक 15
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तंते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ 15 ॥
asiddhārthā naiva kvacidapi sadevāsuranare
nivartaṃte nityaṃ jagati jayino yasya viśikhāḥ |
sa paśyannīśa tvāmitarasurasādhāraṇamabhūt
smaraḥ smartavyātmā na hi vaśiṣu pathyaḥ paribhavaḥ
शब्दार्थ

असिद्धार्था, “अधूरी।” जगद्रक्षायै, “जगत की रक्षा के लिए।” त्वत्-तेजसा, “तेरे तेज से।” कल्याणीं, “शुभ करने वाली।”

अर्थ

जो काम जगत की रक्षा के लिए तूने किए, वे अपने लिए नहीं थे। तेरे तेज से ही दुनिया की भलाई होती है। तेरा हर काम कल्याण की ओर मुड़ा हुआ है, अपने फ़ायदे की ओर नहीं।

भावार्थ

यह श्लोक शिव के काम करने के ढंग को पकड़ता है। उन्हें कुछ चाहिए नहीं, फिर भी वे करते हैं। क्यों, क्योंकि उनका करना ख़ुद के लिए नहीं, जगत के लिए है। यह निष्काम कर्म की सबसे सीधी तस्वीर है। जिसे कुछ नहीं चाहिए, उसका हर काम साफ़ होता है, क्योंकि उसमें “मुझे क्या मिलेगा” वाला मोड़ नहीं होता। दफ़्तर में, घर में, हम अक्सर यह पकड़ नहीं पाते कि कोई काम भलाई के लिए हुआ या वाहवाही के लिए। शिव के यहाँ यह उलझन है ही नहीं। यही उनका तेज है: इरादे का बिलकुल साफ़ होना।

संगति

यह श्लोक गीता 3.22 से सीधा मिलता है, जहाँ कृष्ण कहते हैं, मुझे कुछ पाना नहीं, फिर भी मैं कर्म करता हूँ, क्योंकि अगर मैं रुकूँ तो जगत बिखर जाए।

श्लोक 16
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह- गणम् ।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ 16 ॥
mahī pādāghātād vrajati sahasā saṃśayapadaṃ
padaṃ viṣṇorbhrāmyad bhuja-parigha-rugṇa-graha- gaṇam |
muhurdyaurdausthyaṃ yātyanibhṛta-jaṭā-tāḍita-taṭā
jagadrakṣāyai tvaṃ naṭasi nanu vāmaiva vibhutā
शब्दार्थ

नृत्तारंभे, “तांडव की शुरुआत में।” त्रिभुवनम्, “तीनों लोक।” भ्रमयसि, “घुमा देता है।” वसुधा, “धरती।” डमरुः, “डमरू।” भयात्, “डर से।”

अर्थ

जब तू तांडव शुरू करता है, तीनों लोक काँप उठते हैं। तेरे पैर की चोट से धरती हिलती है, डमरू की गूँज से आकाश थरथराता है, और जटाओं के झटके से तारे तक डगमगा जाते हैं। तेरा नाच ही ब्रह्मांड की हलचल है।

भावार्थ

शिव का तांडव सिर्फ़ एक नृत्य नहीं, यह सृष्टि की धड़कन की तस्वीर है। श्लोक की हर पंक्ति में हलचल है: पैर पड़ता है, धरती हिलती है, डमरू बजता है, आकाश काँपता है। यानी जिसे हम “ठोस” और “स्थिर” समझते हैं, वह असल में एक लय है, एक vibration है। आधुनिक भौतिकी भी यही कहती है कि पदार्थ की गहराई में सब कुछ कंपन ही है। पर इसमें गहरे उतरना ज़रूरी नहीं। बस इतना देख लेना काफ़ी है: स्थिरता एक भ्रम है, और जिसे हम दुनिया कहते हैं, वह एक नाच है, जो किसी पल शुरू हुआ और किसी पल थमेगा।

संगति

“सब कुछ लय है, ठोस नहीं” वाला यह दर्शन योग वसिष्ठ की कई कथाओं की जड़ है, जहाँ ठोस दिखती दुनिया असल में चेतना का स्पंदन निकलती है।

श्लोक 17
वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥ 17 ॥
viyadvyāpī tārā-gaṇa-guṇita-phenodgama-ruciḥ
pravāho vārāṃ yaḥ pṛṣatalaghudṛṣṭaḥ śirasi te |
jagaddvīpākāraṃ jaladhivalayaṃ tena kṛtamiti
anenaivonneyaṃ dhṛtamahima divyaṃ tava vapuḥ
शब्दार्थ

विधिः, “ब्रह्मा।” रथः, “रथ।” सारथिः, “रथ हाँकने वाला।” मेरुः धनुः, “मेरु पर्वत धनुष।” बाणः विष्णुः, “विष्णु बाण।” हास्यः, “हँसी की बात।”

अर्थ

त्रिपुर को जलाने के लिए धरती तेरा रथ बनी, ब्रह्मा सारथी, मेरु पर्वत धनुष, और विष्णु बाण। पर पुरमथन, क्या तुझे इतने सब साज़-सामान की ज़रूरत थी। तेरी एक नज़र ही काफ़ी थी। यह पूरा आयोजन तो बस एक लीला, एक खेल था।

भावार्थ

त्रिपुर-दहन की कथा का यह सबसे चतुर पाठ है। कथा में शिव तीन उड़ते नगरों को एक बाण से जलाते हैं, और इसके लिए पूरा ब्रह्मांड हथियार बन जाता है: धरती रथ, सूर्य-चंद्र पहिए, ब्रह्मा सारथी। भव्य दृश्य। पर पुष्पदन्त मुस्कुराकर पूछते हैं: इतना तामझाम क्यों, जिसकी इच्छा से सब चलता है उसे रथ-धनुष की क्या ज़रूरत। जवाब छिपा है: यह सब लीला थी, खेल। ज़रूरत से नहीं, मौज से। यह एक राहत भरी बात है। ईश्वर का काम मेहनत नहीं, खेल है। और शायद हमारा सबसे अच्छा काम भी तभी होता है जब वह बोझ नहीं, खेल बन जाता है।

संगति

“सृष्टि एक लीला है” वाला यह भाव पूरे शैव-वेदांत की रीढ़ है, और योग वसिष्ठ में बार-बार लौटता है: जगत बनाने वाले को न मेहनत है, न मक़सद, बस खेल।

श्लोक 18
रथः क्षोणी यंता शतधृतिरगेंद्रो धनुरथो
रथांगे चंद्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडंबर-विधिः
विधेयैः क्रीडंत्यो न खलु परतंत्राः प्रभुधियः ॥ 18 ॥
rathaḥ kṣoṇī yaṃtā śatadhṛtirageṃdro dhanuratho
rathāṃge caṃdrārkau ratha-caraṇa-pāṇiḥ śara iti |
didhakṣoste ko’yaṃ tripuratṛṇamāḍaṃbara-vidhiḥ
vidheyaiḥ krīḍaṃtyo na khalu parataṃtrāḥ prabhudhiyaḥ
शब्दार्थ

हरिस्ते साहस्रं, “विष्णु ने हज़ार।” कमल, “कमल के फूल।” पदम्, “चरण, एक कमल भी।” नयन-कमलम्, “आँख रूपी कमल।” भक्तिः चक्रः, “यही भक्ति सुदर्शन चक्र बनी।”

अर्थ

विष्णु तेरी पूजा में रोज़ हज़ार कमल चढ़ाते थे। एक दिन एक कमल कम पड़ा, तो उन्होंने अपनी कमल-सी आँख ही निकालकर चढ़ा दी। तेरी वही भक्ति विष्णु के हाथ का सुदर्शन चक्र बन गई, जो आज भी जगत की रक्षा करता है।

भावार्थ

यह कथा भक्ति की पराकाष्ठा है। विष्णु एक कमल कम पड़ने पर रुकते नहीं, अपनी आँख चढ़ा देते हैं। और श्लोक का सबसे सुंदर मोड़ यह है: वह आँख व्यर्थ नहीं गई, वह सुदर्शन चक्र बन गई, विष्णु की सबसे बड़ी शक्ति। यानी जो भक्ति में अर्पित होता है, वह खोता नहीं, रूप बदलकर लौटता है, और पहले से ज़्यादा ताक़तवर होकर। यह एक गहरी तसल्ली है। समर्पण घाटे का सौदा लगता है, पर वह असल में निवेश है। जो आपने सच्चे मन से दिया, वह किसी और रूप में, किसी और दिन, आपके पास लौट आता है।

संगति

“अर्पित चीज़ रूप बदलकर लौटती है” वाला यही भाव विष्णु सहस्रनाम के पाठ-फल में है, और हनुमान चालीसा के समर्पण-भाव में भी।

श्लोक 19
हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन्​ निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ 19 ॥
hariste sāhasraṃ kamala balimādhāya padayoḥ
yadekone tasmin​ nijamudaharannetrakamalam |
gato bhaktyudrekaḥ pariṇatimasau cakravapuṣaḥ
trayāṇāṃ rakṣāyai tripurahara jāgarti jagatām
शब्दार्थ

क्रतौ सुप्ते, “यज्ञ के सोने पर, यज्ञ बंद होने पर।” फलम्, “फल।” कर्म, “किया हुआ कर्म।” ध्वंसिनः, “नाशवान।” श्रद्धा-संबन्ध, “श्रद्धा का जुड़ाव।”

अर्थ

यज्ञ-कर्म तो ख़त्म होकर मिट जाते हैं, फिर उनका फल बाद में कैसे मिलता है। इसका जवाब यही है कि कर्म ख़ुद फल नहीं देता, तू देता है। श्रद्धा का जुड़ाव ही कर्म को फल तक पहुँचाता है। तेरे बिना कर्म बस एक हरकत है।

भावार्थ

यह श्लोक एक पुरानी दार्शनिक उलझन को छूता है: यज्ञ आज होता है, फल छह महीने बाद आता है। बीच में कर्म तो ख़त्म हो चुका, फिर वह फल कहाँ से लाता है। मीमांसक कहते थे कर्म एक अदृश्य “अपूर्व” छोड़ जाता है। पुष्पदन्त एक सीधा जवाब देते हैं: कर्म ख़ुद फल नहीं देता, ईश्वर देता है, और श्रद्धा वह तार है जो दोनों को जोड़ती है। यह बात आज भी काम की है। हम सोचते हैं मेहनत अपने आप नतीजा देती है, एक सीधी मशीन की तरह। पर असल में मेहनत और नतीजे के बीच एक पूरी अनदेखी दुनिया है, समय, संयोग, और वह जो सबको जोड़े हुए है। श्रद्धा यानी इस अनदेखे पर भरोसा।

संगति

यह श्लोक गीता 17.28 से मिलता है: “अश्रद्धया हुतं”, बिना श्रद्धा किया हवन व्यर्थ है। कर्म का ढाँचा नहीं, उसके पीछे का भाव फल तय करता है।

श्लोक 20
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्​ त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां संप्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ 20 ॥
kratau supte jāgrat​ tvamasi phalayoge kratumatāṃ
kva karma pradhvastaṃ phalati puruṣārādhanamṛte |
atastvāṃ saṃprekṣya kratuṣu phaladāna-pratibhuvaṃ
śrutau śraddhāṃ badhvā dṛḍhaparikaraḥ karmasu janaḥ
शब्दार्थ

क्रिया-दक्षः, “यज्ञ-कर्म में निपुण दक्ष।” अध्वरस्य, “यज्ञ का।” ध्वंसः, “नाश।” ऋषीणाम् आर्त्विज्यम्, “ऋषियों का पुरोहित-कर्म।” विमुख, “विमुख हो जाने पर।”

अर्थ

दक्ष का यज्ञ, जिसमें बड़े-बड़े ऋषि पुरोहित बने थे, सब विधि-विधान से परिपूर्ण था। पर उसमें तेरा हिस्सा नहीं रखा गया, और वह पूरा भव्य यज्ञ नष्ट हो गया। यानी विधि कितनी भी ठीक हो, अगर मूल को छोड़ दिया, तो आयोजन टिकता नहीं।

भावार्थ

दक्ष-यज्ञ की कथा यहाँ एक सबक़ बन जाती है। दक्ष “क्रिया-दक्ष” था, कर्मकांड का माहिर। उसके यज्ञ में हर नियम सही था, हर ऋषि मौजूद था। बस एक चीज़ छूट गई: शिव को निमंत्रण नहीं दिया गया, अहंकार में। और पूरा यज्ञ बिखर गया। श्लोक की चोट यह है कि form perfect हो और मूल छूट जाए, तो form बेकार है। यह ज़िंदगी में बार-बार दिखता है: एक शादी जिसमें हर रस्म पूरी हो पर प्रेम न हो, एक संस्था जिसमें हर process चले पर मक़सद मर चुका हो। ढाँचा आख़िर मूल को ढोने का साधन है। मूल गया, तो ढाँचा बस एक ख़ाली डिब्बा।

संगति

“विधि ठीक, मूल ग़ायब” वाली यही गड़बड़ गणपति अथर्वशीर्ष की उस याद दिलाती है कि उपासना में पहले “त्वमेव”, बाक़ी सब बाद में। केंद्र चूका तो परिधि बेकार।

श्लोक 21
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धा-विधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ 21 ॥
kriyādakṣo dakṣaḥ kratupatiradhīśastanubhṛtāṃ
ṛṣīṇāmārtvijyaṃ śaraṇada sadasyāḥ sura-gaṇāḥ |
kratubhraṃśastvattaḥ kratuphala-vidhāna-vyasaninaḥ
dhruvaṃ kartuḥ śraddhā-vidhuramabhicārāya hi makhāḥ
शब्दार्थ

प्रजानाथं नाथ, “प्रजापति दक्ष को, हे नाथ।” प्रसभम्, “ज़बरदस्ती।” अभिकम्, “कामातुर होकर।” स्व-दुहितरम्, “अपनी ही पुत्री की ओर।” कः अनुनयेत्, “कौन समझाए, कौन रोके।”

अर्थ

हे नाथ, जब प्रजापति अपनी ही संतान की ओर बेक़ाबू होकर बढ़ा, तब तेरा क्रोध एक तीर बनकर उठा और आज भी आकाश में हिरण के रूप में उसका पीछा करता दिखता है। तेरा क्रोध भी अंधा नहीं, वह व्यवस्था की रक्षा में उठता है।

भावार्थ

यह एक मुश्किल, पुराणकथा-वाला श्लोक है, जहाँ एक प्रजापति की मर्यादा-भंग करती हरकत पर शिव का क्रोध उठता है, और वह तीर आकाश में मृग-नक्षत्र के रूप में जड़ जाता है। श्लोक का काम यह दिखाना है कि शिव का क्रोध मनमाना नहीं। वह तब उठता है जब कोई सीमा, कोई मर्यादा टूट रही हो। यह एक ज़रूरी बात है: शांति का मतलब हर चीज़ को होने देना नहीं। एक सच्चा संत भी कुछ चीज़ों पर रुकता नहीं, ख़ामोश नहीं रहता। शिव की करुणा और शिव का क्रोध, दोनों एक ही व्यवस्था-प्रेम से निकलते हैं। फ़र्क़ बस यह है कि किसके सामने क्या ज़रूरी है।

संगति

“क्रोध भी धर्म की रक्षा में हो सकता है” वाला यह भाव गीता के उस कृष्ण से मिलता है जो अर्जुन को लड़ने को कहते हैं। हर जगह कोमलता नहीं, सही जगह दृढ़ता भी धर्म है।

श्लोक 22
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्​ भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसंतं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥ 22 ॥
prajānāthaṃ nātha prasabhamabhikaṃ svāṃ duhitaraṃ
gataṃ rohid​ bhūtāṃ riramayiṣumṛṣyasya vapuṣā |
dhanuṣpāṇeryātaṃ divamapi sapatrākṛtamamuṃ
trasaṃtaṃ te’dyāpi tyajati na mṛgavyādharabhasaḥ
शब्दार्थ

स्वलावण्य, “अपनी सुंदरता।” मदनः, “कामदेव।” त्वां, “तुझ पर।” भस्म, “राख।” मनोभवः, “मन से जन्मा, कामदेव।”

अर्थ

कामदेव को अपनी सुंदरता और अपने बाणों पर भरोसा था। उसने तुझ पर भी बाण चलाने की हिमाकत की, और तेरी एक नज़र में राख हो गया। जो मन को डगमगाता था, वह तेरे ध्यान के आगे टिक न सका।

भावार्थ

कामदेव-दहन की कथा का यह संक्षिप्त रूप है। कामदेव हर किसी को डिगा देता था, देवता तक उसके बाण से बच नहीं पाते थे। उसे अपने रूप और अपने तीरों पर पूरा भरोसा था। पर जब उसने ध्यानमग्न शिव पर तीर चलाया, शिव की तीसरी आँख खुली और वह भस्म हो गया। श्लोक का इशारा बारीक है: कामना उसी को डिगाती है जिसका ध्यान बँटा हुआ है। जो अपने भीतर पूरी तरह जमा है, उस पर कामना का तीर बेअसर है। यह दमन की बात नहीं, स्थिरता की बात है। कामदेव हारता है ताक़त से नहीं, शिव की पूरी एकाग्रता से। भीतर भरा हुआ मन बाहर की खींच के आगे नहीं झुकता।

संगति

“भरा हुआ मन खिंचता नहीं” वाली यही बात श्लोक 8 की “विषय-मृगतृष्णा” से जुड़ती है, और अष्टावक्र के वैराग्य से भी: रस अपने आप उतरे, तभी असली।

श्लोक 23
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥ 23 ॥
svalāvaṇyāśaṃsā dhṛtadhanuṣamahnāya tṛṇavat
puraḥ pluṣṭaṃ dṛṣṭvā puramathana puṣpāyudhamapi |
yadi straiṇaṃ devī yamanirata-dehārdha-ghaṭanāt
avaiti tvāmaddhā bata varada mugdhā yuvatayaḥ
शब्दार्थ

स्वलावण्य-आशंसा, “अपनी सुंदरता का भरोसा।” तृणवत् प्लुष्टं, “तिनके-सा जल गया।” स्त्रैणं, “स्त्री के वश में।” देह-अर्ध-घटनात्, “आधी देह दे देने से, अर्धनारीश्वर रूप से।”

अर्थ

कामदेव अपने रूप पर इतराता धनुष उठाए था, और तेरे सामने पल भर में तिनके-सा जल गया। फिर भी अगर पार्वती तुझे अपने अर्धनारीश्वर रूप के कारण स्त्री के वश में समझती हैं, तो हे वरद, यह बस उनका भोला प्रेम है। युवतियाँ ऐसे ही सोचती हैं।

भावार्थ

यह श्लोक पिछले वाले का हलका-सा शरारती जुड़वाँ है। कामदेव जल गया, यह तय हुआ। अब एक मीठा मोड़: पार्वती ने शिव को अपनी आधी देह में जगह दी है, अर्धनारीश्वर रूप। तो क्या इसका मतलब शिव स्त्री के वश में हैं। पुष्पदन्त मुस्कुराकर कहते हैं, अगर पार्वती ऐसा सोचती हैं, तो यह बस प्रेम का भोलापन है। श्लोक का असली इशारा यह है कि अर्धनारीश्वर “वश में होना” नहीं, “एक हो जाना” है। प्रेम में हार-जीत का हिसाब रखने वाला अभी प्रेम के बाहर खड़ा है। जहाँ दो सच में आधे-आधे हो जाएँ, वहाँ कौन किसके वश में, यह सवाल ही गिर जाता है।

संगति

अर्धनारीश्वर का यह भाव सौन्दर्य लहरी से सीधा मिलता है, जहाँ शिव और शक्ति के बिना एक-दूसरे के कुछ कर पाने की बात ही नहीं उठती। दो नहीं, एक।

श्लोक 24
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः ।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि ॥ 24 ॥
śmaśāneṣvākrīḍā smarahara piśācāḥ sahacarāḥ
citā-bhasmālepaḥ sragapi nṛkaroṭī-parikaraḥ |
amaṃgalyaṃ śīlaṃ tava bhavatu nāmaivamakhilaṃ
tathāpi smartṝṇāṃ varada paramaṃ maṃgalamasi
शब्दार्थ

श्मशानेषु आक्रीडा, “श्मशान में खेल।” पिशाचाः सहचराः, “भूत-प्रेत साथी।” चिता-भस्म, “चिता की राख।” अमंगल्यं शीलम्, “अशुभ-सा स्वभाव।” परमं मंगलम्, “परम मंगल।”

अर्थ

तेरा अखाड़ा श्मशान, साथी भूत-प्रेत, बदन पर चिता की राख, गले में मुंडमाला। हे वरद, मान लिया कि तेरा सब कुछ अशुभ-सा दिखता है। फिर भी जो तुझे याद करता है, उसके लिए तू परम मंगल बन जाता है।

भावार्थ

यह स्तोत्र का सबसे चौंकाने वाला श्लोक है। शिव की हर चीज़ “अशुभ” की list में है: श्मशान, राख, खोपड़ियाँ, भूत। समाज जिन चीज़ों से कतराता है, शिव उन्हीं के बीच रहते हैं। और फिर श्लोक पलटता है: यही शिव, याद करने वालों के लिए, परम मंगल हैं। इसका मतलब गहरा है। शिव श्मशान में इसलिए हैं क्योंकि वे मृत्यु से नहीं डरते, और जो मृत्यु से नहीं डरता वही असली अभय दे सकता है। शुभ-अशुभ का हमारा बँटवारा सतह पर है। जो उस बँटवारे के पार चला गया, वही हर हाल में मंगल रह पाता है। दिल्ली में लोग नई गाड़ी पर नींबू-मिर्च टाँगते हैं, अशुभ से बचने को। शिव उस पूरे डर के दूसरी तरफ़ खड़े हैं।

संगति

शुभ-अशुभ के पार जाने वाला यह भाव ईशावास्य उपनिषद् के उस मंत्र से मिलता है जहाँ विद्या-अविद्या, सम्भूति-असम्भूति, दोनों को साथ देखने को कहा गया है। बँटवारे के पार ही पूर्णता है।

श्लोक 25
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्संगति-दृशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यंतस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ॥ 25 ॥
manaḥ pratyakcitte savidhamavidhāyātta-marutaḥ
prahṛṣyadromāṇaḥ pramada-salilotsaṃgati-dṛśaḥ |
yadālokyāhlādaṃ hrada iva nimajyāmṛtamaye
dadhatyaṃtastattvaṃ kimapi yaminastat kila bhavān
शब्दार्थ

मनः प्रत्यक्-चित्ते, “मन को भीतर की ओर मोड़कर।” आत्त-मरुतः, “प्राण को साध लिया जिसने।” प्रहृष्यद्-रोमाणः, “रोम-रोम खिल उठा।” ह्रदः इव, “तालाब की तरह।” यमिनः, “संयमी, योगी।”

अर्थ

योगी जब मन को भीतर मोड़ते हैं, प्राण को साध लेते हैं, और एक अमृत-भरे तालाब में डुबकी-सी लगाते हैं, तब उनके रोम-रोम खिल उठते हैं, आँखें आनंद से भर आती हैं। उस गहराई में उन्हें जो कुछ अनकहा मिलता है, हे शिव, वह तू ही है।

भावार्थ

यहाँ स्तोत्र पुराणकथाओं से हटकर ध्यान के अनुभव में उतरता है, और बहुत कोमलता से। योगी आँख बंद करता है, मन को बाहर से भीतर मोड़ता है, साँस को धीमा करता है। और फिर कुछ होता है: रोंगटे खड़े हो जाते हैं, आँखें भीग जाती हैं, जैसे किसी ठंडे मीठे तालाब में डुबकी लग गई हो। उस गहराई में जो “कुछ” मिलता है, पुष्पदन्त उसे नाम नहीं देते, बस “किमपि”, कोई एक चीज़, कहते हैं, और जोड़ देते हैं: वही तू है। यह श्लोक बताता है कि शिव कोई दूर बैठा देवता नहीं। शिव वह अनुभव है जो भीतर डुबकी लगाने पर ख़ुद मिलता है। मंदिर बाहर है, पर असली शिव-दर्शन भीतर की उस शांत जगह पर होता है।

संगति

यह श्लोक पूरे योग सूत्र का काव्य-सार है: मन को भीतर मोड़ो, प्राण साधो, और जो ठहराव मिले वही असली है। शिव यहाँ देवता कम, ध्यान की गहराई का नाम ज़्यादा हैं।

श्लोक 26
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि ॥ 26 ॥
tvamarkastvaṃ somastvamasi pavanastvaṃ hutavahaḥ
tvamāpastvaṃ vyoma tvamu dharaṇirātmā tvamiti ca |
paricchinnāmevaṃ tvayi pariṇatā bibhrati giraṃ
na vidmastattattvaṃ vayamiha tu yat tvaṃ na bhavasi
शब्दार्थ

त्वम् अर्कः, सोमः, पवनः, हुतवहः, आपः, व्योम, धरणिः, आत्मा, “तू ही सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, जल, आकाश, धरती, और आत्मा है।” परिच्छिन्नाम्, “सीमित।” यत् त्वं न भवसि, “ऐसा जो तू न हो।”

अर्थ

तू ही सूरज, तू ही चाँद, तू ही हवा, आग, जल, आकाश, धरती, और भीतर का आत्मा भी तू ही। लोग ऐसे गिनाकर तेरे बारे में बात तो करते हैं, पर यह गिनती तुझे सीमित कर देती है। सच यह है कि ऐसा कुछ हम जानते ही नहीं जो तू न हो।

भावार्थ

यह श्लोक एक सुंदर पलटी मारता है। पहले तीन पंक्तियाँ शिव को सब-कुछ बताती हैं: सूर्य, चंद्र, पाँच तत्व, आत्मा। यह वैदिक “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” वाली शैली है। पर आख़िरी पंक्ति में पुष्पदन्त रुककर कहते हैं: यह list बनाना भी एक तरह से तुझे छोटा करना है, क्योंकि list की एक हद होती है। असली बात यह है कि ऐसी कोई चीज़ है ही नहीं जो तू न हो। यह “नेति नेति” का उल्टा है, “इति इति”, यह भी, यह भी, और कुछ बचता ही नहीं। बहुत राहत देने वाली बात है: आप ईश्वर को कहीं ढूँढने नहीं जाते, क्योंकि ऐसी कोई जगह है ही नहीं जहाँ वह न हो।

संगति

“ऐसा कुछ है ही नहीं जो वह न हो” वाला यह भाव गणपति अथर्वशीर्ष के “त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि” की सीधी काव्य-गूँज है।

श्लोक 27
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुंधानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ 27 ॥
trayīṃ tisro vṛttīstribhuvanamatho trīnapi surān
akārādyairvarṇaistribhirabhidadhat tīrṇavikṛti |
turīyaṃ te dhāma dhvanibhiravaruṃdhānamaṇubhiḥ
samastaṃ vyastaṃ tvāṃ śaraṇada gṛṇātyomiti padam
शब्दार्थ

त्रयीं, “तीन वेद।” तिस्रः वृत्तीः, “तीन अवस्थाएँ, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति।” अकार-आदि वर्णैः, “अ, उ, म वर्णों से।” तुरीयं धाम, “चौथा धाम।” ओम् इति पदम्, “ओम् शब्द।”

अर्थ

तीन वेद, तीन अवस्थाएँ, तीन लोक, तीन देव, इन सबको “अ, उ, म” तीन ध्वनियाँ अपने में समेट लेती हैं। और इन तीनों के परे जो तेरा चौथा धाम है, उसे ओम् की वह आख़िरी मौन-गूँज इशारे से छू लेती है। ओम् ही तेरा पूरा नक़्शा है।

भावार्थ

यह श्लोक ओम् को खोलकर रख देता है। ओम् कोई एक अक्षर नहीं, यह तीन ध्वनियों का जोड़ है: अ, उ, म। और हर ध्वनि एक तिकड़ी को समेटती है, तीन वेद, तीन अवस्थाएँ (जागना, सपना, गहरी नींद), तीन लोक। यानी ओम् पूरी रची हुई दुनिया का संक्षेप है। पर इसके बाद एक चौथा है: तुरीय, वह जो तीनों अवस्थाओं को देखता है पर किसी में बँधता नहीं। और ओम् के बाद की वह हलकी गूँज, वह मौन, उसी चौथे की ओर इशारा करती है। अगली बार ओम् बोलें तो ध्यान आख़िरी “म्” के बाद के सन्नाटे पर रखिए। वही असली पता है।

संगति

यह श्लोक सीधे माण्डूक्य उपनिषद् है, जो ओम् के अ-उ-म और तुरीय को पूरे विस्तार से खोलती है। शिव महिम्न उस पूरी उपनिषद् को एक श्लोक में बाँध देता है।

श्लोक 28
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते ॥ 28 ॥
bhavaḥ śarvo rudraḥ paśupatirathograḥ sahamahān
tathā bhīmeśānāviti yadabhidhānāṣṭakamidam |
amuṣmin pratyekaṃ pravicarati deva śrutirapi
priyāyāsmaidhāmne praṇihita-namasyo’smi bhavate
शब्दार्थ

भवः, शर्वः, रुद्रः, पशुपतिः, उग्रः, महान्, भीमः, ईशानः, “शिव के आठ नाम।” अभिधान-अष्टकम्, “आठ नामों का समूह।” प्रणिहित-नमस्यः, “झुककर नमस्कार करता हुआ।”

अर्थ

भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम, ईशान, तेरे ये आठ नाम हैं। वेद ख़ुद इन एक-एक नाम में घूम-घूमकर तेरा ध्यान करता है। हे देव, मैं तेरे इस प्रिय आठ-नाम वाले रूप को झुककर नमस्कार करता हूँ।

भावार्थ

शिव के आठ नाम, अष्टमूर्ति, यानी आठ रूप: धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र, और यजमान (चेतन प्राणी)। हर नाम सृष्टि के एक हिस्से का स्वामी है। श्लोक का भाव यह है कि शिव कोई एक मूर्ति नहीं, वे पूरी प्रकृति में फैले हुए हैं, और हर नाम उसी एक का एक दरवाज़ा है। यह बात रोज़मर्रा में काम की है: हम चाहें तो धरती की मज़बूती में, बहते पानी में, सुबह की धूप में, हर जगह उसी एक की झलक पढ़ सकते हैं। नाम अलग, पता एक। पुष्पदन्त बस इतना कहते हैं, और झुक जाते हैं।

संगति

आठ नामों में बँटकर भी एक रहना, यही विष्णु सहस्रनाम का भी ढाँचा है, हज़ार नाम, एक ही सत्ता। नाम गिनती के लिए नहीं, अलग-अलग दरवाज़ों के लिए हैं।

श्लोक 29
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिसर्वाय च नमः ॥ 29 ॥
namo nediṣṭhāya priyadava daviṣṭhāya ca namaḥ
namaḥ kṣodiṣṭhāya smarahara mahiṣṭhāya ca namaḥ |
namo varṣiṣṭhāya trinayana yaviṣṭhāya ca namaḥ
namaḥ sarvasmai te tadidamitisarvāya ca namaḥ
शब्दार्थ

नेदिष्ठाय, “सबसे पास वाले को।” दविष्ठाय, “सबसे दूर वाले को।” क्षोदिष्ठाय, “सबसे सूक्ष्म को।” महिष्ठाय, “सबसे विशाल को।” वर्षिष्ठाय, “सबसे बूढ़े को।” यविष्ठाय, “सबसे युवा को।”

अर्थ

सबसे पास वाले को नमस्कार, और सबसे दूर वाले को भी। सबसे सूक्ष्म को नमस्कार, और सबसे विशाल को भी। सबसे प्राचीन को नमस्कार, और सबसे नए को भी। हे त्रिनेत्र, जो सब-कुछ है, उस तुझ सर्व को नमस्कार।

भावार्थ

यह श्लोक एक ही साँस में उल्टी जोड़ियाँ रखता है: पास और दूर, सूक्ष्म और विशाल, बूढ़ा और जवान। तर्क कहता है, एक चीज़ दोनों कैसे हो सकती है। पर पुष्पदन्त यही कह रहे हैं: शिव हर जोड़ी के दोनों सिरे हैं, और बीच का सब भी। यह श्लोक पढ़ने में एक मंत्र-सा लगता है, “नमः, नमः” की लय में बहता हुआ, और यही इसकी ताक़त है। यह समझाने की कोशिश नहीं करता, यह विरोधों को साथ रखकर मन को एक ऐसी जगह ले जाता है जहाँ “या तो यह, या वह” वाली सोच ख़ुद ढीली पड़ जाती है। कभी-कभी सच को समझा नहीं जाता, बस उसके सामने झुका जाता है।

संगति

उल्टी जोड़ियों को साथ रखने वाला यह भाव ईशावास्य उपनिषद् के उस मंत्र की गूँज है, “वह चलता है, वह नहीं चलता, वह दूर है, वह बहुत पास है।” विरोध वहीं घुलते हैं जहाँ शब्द हार जाते हैं।

श्लोक 30
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः ।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ 30 ॥
bahula-rajase viśvotpattau bhavāya namo namaḥ
prabala-tamase tat saṃhāre harāya namo namaḥ |
jana-sukhakṛte sattvodriktau mṛḍāya namo namaḥ
pramahasi pade nistraiguṇye śivāya namo namaḥ
शब्दार्थ

बहुल-रजसे भवाय, “रजोगुण से भरे, सृष्टि करने वाले रूप को।” प्रबल-तमसे हराय, “तमोगुण वाले, संहार करने वाले को।” सत्त्व-उद्रिक्तौ मृडाय, “सत्त्व से भरे, सुख देने वाले को।” निस्त्रैगुण्ये शिवाय, “तीनों गुणों से परे शिव को।”

अर्थ

जब सृष्टि रचनी हो, तब रजोगुण से भरे भव को नमस्कार। जब समेटनी हो, तब तमोगुण वाले हर को नमस्कार। जब प्राणियों को सुख देना हो, तब सत्त्व से भरे मृड को नमस्कार। और इन तीनों गुणों के परे, अपने असली शिव-रूप में, तुझे बार-बार नमस्कार।

भावार्थ

यह श्लोक पिछले वाले की लय को आगे बढ़ाता है, पर अब एक साफ़ ढाँचे के साथ। तीन काम, तीन गुण, तीन नाम: सृष्टि के लिए रजस् और भव, संहार के लिए तमस् और हर, पालन के लिए सत्त्व और मृड। पर असली बात आख़िरी पंक्ति में है: “निस्त्रैगुण्य”, तीनों गुणों के परे। शिव गुणों के साथ काम तो करते हैं, पर ख़ुद उनमें बँधते नहीं। यह बहुत काम की बात है। हम सब तीन मोड में जीते हैं: कभी active (रजस्), कभी सुस्त (तमस्), कभी शांत-संतुलित (सत्त्व)। तीनों आते-जाते रहते हैं। पर एक चौथा भी है, वह जो इन तीनों को आते-जाते देखता है, और किसी में फँसता नहीं। शिव वही चौथा है, और कहीं न कहीं, हम भी।

संगति

तीन गुणों के पार जाना, यही गीता के 14वें अध्याय का पूरा सार है, गुणातीत हो जाना। शिव वह स्थिति का नाम है जहाँ गुण चलते रहते हैं और आप उनसे अछूते रहते हैं।

श्लोक 31
कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धिः ।
इति चकितममंदीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥ 31 ॥
kṛśa-pariṇati-cetaḥ kleśavaśyaṃ kva cedaṃ
kva ca tava guṇa-sīmollaṃghinī śaśvadṛddhiḥ |
iti cakitamamaṃdīkṛtya māṃ bhaktirādhād
varada caraṇayoste vākya-puṣpopahāram
शब्दार्थ

कृश-परिणति-चेतः, “कमज़ोर समझ वाला मन।” क्लेश-वश्यम्, “दुखों के वश में।” गुण-सीमा-उल्लंघिनी, “गुणों की हर सीमा लाँघने वाली।” वाक्य-पुष्प-उपहारम्, “शब्दों के फूलों का चढ़ावा।”

अर्थ

कहाँ मेरा यह छोटा-सा, दुखों के वश में डोलता मन, और कहाँ तेरी वह महिमा जो हर सीमा लाँघ जाती है। इस फ़र्क़ को देखकर मैं सहम जाता हूँ। पर भक्ति ने मुझे हिम्मत दी, और उसी ने तेरे चरणों में मेरे शब्दों के फूल चढ़वा दिए।

भावार्थ

यहाँ पुष्पदन्त लगभग पूरा घेरा पूरा कर देते हैं। श्लोक 1 में उन्होंने कहा था, मेरी वाणी नाकाफ़ी है। अब, 31 श्लोक गा लेने के बाद, वे फिर वहीं लौटते हैं: कहाँ मेरा यह कमज़ोर, दुख से डोलता मन, कहाँ तेरी असीम महिमा। पर अब एक फ़र्क़ है। पहले यह सिर्फ़ विनम्रता थी, अब इसमें एक खोज जुड़ गई है: मुझे यह स्तोत्र गवाया किसने। जवाब: भक्ति ने। मन डरकर रुक जाता, भक्ति ने उसे “अमंद” कर दिया, सुस्ती से बाहर खींच लिया। यह एक सुंदर स्वीकार है। अच्छा काम अक्सर हमारी काबिलियत से नहीं, उस प्रेम से होता है जो हमें काबिलियत के सवाल से ऊपर उठा देता है।

संगति

“भक्ति ने डर हटाकर गवाया” वाला यही भाव श्लोक 9 से जुड़ता है, और हनुमान चालीसा के “बल बुधि विद्या देहु” से भी, जहाँ काम करने की ताक़त ख़ुद माँगी जाती है, मानी नहीं जाती।

श्लोक 32
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिंधु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ 32 ॥
asita-giri-samaṃ syāt kajjalaṃ siṃdhu-pātre
sura-taruvara-śākhā lekhanī patramurvī |
likhati yadi gṛhītvā śāradā sarvakālaṃ
tadapi tava guṇānāmīśa pāraṃ na yāti
शब्दार्थ

असित-गिरि-समं कज्जलं, “काले पहाड़ जितनी स्याही।” सिंधु-पात्रे, “समुद्र को दवात बनाकर।” सुर-तरुवर-शाखा लेखनी, “कल्पवृक्ष की डाल क़लम।” पत्रम् उर्वी, “धरती काग़ज़।” शारदा, “विद्या की देवी।” पारं न याति, “छोर तक नहीं पहुँचती।”

अर्थ

मान लो काला पहाड़ पिघलकर स्याही बन जाए, समुद्र दवात बने, कल्पवृक्ष की डाल क़लम और पूरी धरती काग़ज़। और फिर ख़ुद शारदा देवी अनंत काल तक लिखती रहें। तब भी, हे ईश, तेरे गुणों का छोर नहीं आता।

भावार्थ

यह पूरे स्तोत्र की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है, और हर शब्द में एक तस्वीर है। पुष्पदन्त ब्रह्मांड को ही लेखन-सामग्री बना देते हैं: पहाड़ स्याही, समुद्र दवात, कल्पवृक्ष क़लम, धरती काग़ज़। और लिखने वाली कोई आम क़लमकार नहीं, ख़ुद विद्या की देवी, और समय की कोई हद नहीं, “सर्वकाल”। इतने असीम साधनों के बाद भी जवाब वही: छोर नहीं आता। पर ध्यान दें, यह हार का श्लोक नहीं। यह आनंद का श्लोक है। पुष्पदन्त इस बात से ख़ुश हैं कि कुछ चीज़ें ख़त्म नहीं होतीं। जिस चीज़ का छोर मिल जाए, वह छोटी पड़ जाती है। शिव की महिमा का बेछोर होना ही उसका सबसे सुंदर गुण है। यही असल में पहले श्लोक का जवाब है: इसलिए मेरी वाणी नाकाफ़ी थी, और इसलिए नाकाफ़ी होना कोई शर्म की बात नहीं।

संगति

यह पूरे स्तोत्र का दिल है, और श्लोक 1 का जवाब। बेछोर के आगे शब्द का हार जाना दुख नहीं, यही उसका सबसे बड़ा सम्मान है। केनोपनिषद् भी यही कहती है, जो नहीं जानता वही जानता है।

श्लोक 33
असुर-सुर-मुनींद्रैरर्चितस्येंदु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदंताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥ 33 ॥
asura-sura-munīṃdrairarcitasyeṃdu-mauleḥ
grathita-guṇamahimno nirguṇasyeśvarasya |
sakala-gaṇa-variṣṭhaḥ puṣpadaṃtābhidhānaḥ
ruciramalaghuvṛttaiḥ stotrametaccakāra
शब्दार्थ

असुर-सुर-मुनींद्रैः अर्चितस्य, “राक्षस, देव और मुनि सबसे पूजित।” इंदु-मौलेः, “चंद्रमा को सिर पर धारण किए।” निर्गुणस्य, “गुणों से परे।” गण-वरिष्ठः, “गणों में श्रेष्ठ।” पुष्पदंत-अभिधानः, “पुष्पदन्त नाम वाले।”

अर्थ

जिन शिव को राक्षस, देवता और बड़े-बड़े मुनि सब पूजते हैं, जो चंद्रमा को सिर पर धारण करते हैं, जो गुणों से परे हैं, उन्हीं का यह स्तोत्र, गणों में श्रेष्ठ, पुष्पदन्त नाम वाले गंधर्व ने, सुंदर और गहरे छंदों में रचा।

भावार्थ

यहाँ रचयिता अपना नाम दर्ज करते हैं, पर एक ख़ास तरीक़े से। वे पहले शिव का परिचय देते हैं, फिर बहुत हलके से अपना: “पुष्पदन्त नाम वाला एक गण।” यह हस्ताक्षर का विनम्र ढंग है। कलाकार पीछे रहता है, कृति आगे। और एक बात ख़ास है: वे शिव को “निर्गुण” कहते हैं, गुणों से परे, फिर भी पूरा स्तोत्र उन्हीं के गुण गाता है। यह विरोध नहीं, यह भक्ति का स्वभाव है। हम जानते हैं कि जिसे गा रहे हैं वह शब्दों से बड़ा है, फिर भी गाते हैं, क्योंकि गाना समझने के लिए नहीं, जुड़ने के लिए है।

संगति

अगले श्लोकों में यह फलश्रुति बन जाता है। यहाँ से स्तोत्र अपने बारे में बात करने लगता है, जैसे हनुमान चालीसा अपने अंतिम दोहों में अपने पाठ का फल बताती है।

श्लोक 34
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ॥ 34 ॥
aharaharanavadyaṃ dhūrjaṭeḥ stotrametat
paṭhati paramabhaktyā śuddha-cittaḥ pumān yaḥ |
sa bhavati śivaloke rudratulyastathā’tra
pracuratara-dhanāyuḥ putravān kīrtimāṃśca
शब्दार्थ

अहरहः, “रोज़-रोज़।” अनवद्यं, “निर्दोष।” धूर्जटेः, “जटाधारी शिव का।” शुद्ध-चित्तः, “साफ़ मन वाला।” रुद्र-तुल्यः, “रुद्र के समान।” कीर्तिमान्, “यश वाला।”

अर्थ

जो व्यक्ति साफ़ मन से, परम भक्ति के साथ, रोज़ इस निर्दोष स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक में रुद्र के समान हो जाता है, और यहाँ इस जीवन में भी धन, आयु, संतान और यश पाता है।

भावार्थ

यह फलश्रुति का पहला श्लोक है, यानी पाठ का फल बताने वाला। और ध्यान देने लायक़ बात यह है कि यह दोनों दुनिया की बात करता है। आगे शिवलोक, और यहीं, इसी जीवन में, धन-आयु-संतान-यश। यह बँटवारा नहीं डालता कि आध्यात्मिक राह वाले को सांसारिक सुख छोड़ देना चाहिए। पर एक शर्त है, और वह असली बात है: “शुद्ध-चित्त”, साफ़ मन से। फल पाठ की गिनती से नहीं, मन की सफ़ाई से आता है। तोते की तरह दोहराना और दिल से गाना, दोनों में यही फ़र्क़ है। स्तोत्र निर्दोष है, अब पाठ करने वाले के मन का निर्दोष होना बाक़ी है।

संगति

यह श्लोक हनुमान चालीसा के “जो सत बार पाठ कर कोई” से सीधा मिलता है, और श्लोक 19 की उस बात से भी, कि फल कर्म से नहीं, श्रद्धा के जुड़ाव से आता है।

श्लोक 35
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ 35 ॥
maheśānnāparo devo mahimno nāparā stutiḥ |
aghorānnāparo maṃtro nāsti tattvaṃ guroḥ param
शब्दार्थ

महेशात् न अपरः देवः, “महेश से बड़ा कोई देव नहीं।” महिम्नः न अपरा स्तुतिः, “महिम्न से बढ़कर कोई स्तुति नहीं।” अघोरात् न अपरः मंत्रः, “अघोर से बढ़कर कोई मंत्र नहीं।” गुरोः परम् न तत्त्वम्, “गुरु से ऊँचा कोई तत्त्व नहीं।”

अर्थ

महेश से बड़ा कोई देव नहीं, इस महिम्न से बढ़कर कोई स्तुति नहीं, अघोर मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं, और गुरु से ऊँचा कोई तत्त्व नहीं।

भावार्थ

यह श्लोक चार छोटे-छोटे वाक्यों में बँधा है, और हर एक एक “सबसे ऊँचा” बताता है। पहली नज़र में यह बस स्तुति-अतिशयोक्ति लगती है। पर आख़िरी पंक्ति इसे गहरा कर देती है: “गुरु से ऊँचा कोई तत्त्व नहीं।” यानी देवता हैं, स्तुति है, मंत्र है, पर इन सबको जोड़ने वाला, इनका अर्थ खोलने वाला, वह जीवित कड़ी, गुरु है। बिना गुरु के मंत्र बस ध्वनि है, स्तोत्र बस शब्द। परंपरा किताब में नहीं, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक हाथ-दर-हाथ चलती है। यह श्लोक उसी जीवित हस्तांतरण को सबसे ऊँचा तत्त्व कहता है।

संगति

“गुरु से ऊँचा कुछ नहीं” वाला यही भाव हनुमान चालीसा के पहले दोहे में है, “श्रीगुरु चरन सरोज रज।” हर बड़ी रचना पहले गुरु के आगे झुकती है, फिर शुरू होती है।

श्लोक 36
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हंति षोडशीम् ॥ 36 ॥
dīkṣā dānaṃ tapastīrthaṃ jñānaṃ yāgādikāḥ kriyāḥ |
mahimnastava pāṭhasya kalāṃ nārhaṃti ṣoḍaśīm
शब्दार्थ

दीक्षा, दानं, तपः, तीर्थं, ज्ञानं, यागादिकाः क्रियाः, “दीक्षा, दान, तप, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ आदि कर्म।” कलां न अर्हन्ति षोडशीम्, “सोलहवें हिस्से के भी बराबर नहीं।”

अर्थ

दीक्षा, दान, तप, तीर्थ-यात्रा, शास्त्र-ज्ञान, यज्ञ जैसे सब बड़े-बड़े पुण्य-कर्म, ये सब मिलकर भी इस महिम्न-स्तोत्र के पाठ के सोलहवें हिस्से के बराबर नहीं ठहरते।

भावार्थ

यह फलश्रुति का सबसे बोल्ड श्लोक है। यह कह रहा है कि एक स्तोत्र का सच्चा पाठ, दान-तप-तीर्थ-यज्ञ सबसे बढ़कर है। पहली नज़र में यह अतिशयोक्ति लगती है। पर इसके पीछे एक असली बात है। दान, तीर्थ, यज्ञ, ये सब “करने” वाले काम हैं, इनमें एक कर्ता खड़ा रहता है, “मैंने यह किया।” जबकि सच्चा स्तोत्र-पाठ, जहाँ मन डूब जाए, वहाँ कर्ता ही पिघल जाता है। और जहाँ कर्ता पिघला, वहीं असली बात हुई। तो श्लोक कर्मकांड को नीचा नहीं दिखा रहा, वह बस इशारा कर रहा है कि बाहर का कितना भी करो, जब तक भीतर का “मैं” न घुले, बात अधूरी है। यह तुलना मात्रा की नहीं, गहराई की है।

संगति

यह बिलकुल भज गोविन्दम् वाली चोट है, जहाँ शंकराचार्य व्याकरण और कर्मकांड को किनारे रखकर सीधे हृदय की बात करते हैं। बाहर का आयोजन साधन है, भीतर का घुलना साध्य।

श्लोक 37
कुसुमदशन-नामा सर्व-गंधर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः ॥ 37 ॥
kusumadaśana-nāmā sarva-gaṃdharva-rājaḥ
śaśidharavara-maulerdevadevasya dāsaḥ |
sa khalu nija-mahimno bhraṣṭa evāsya roṣāt
stavanamidamakārṣīd divya-divyaṃ mahimnaḥ
शब्दार्थ

कुसुमदशन-नामा, “पुष्पदन्त नाम वाला।” सर्व-गंधर्व-राजः, “सब गंधर्वों का राजा।” देवदेवस्य दासः, “देवों के देव का सेवक।” निज-महिम्नः भ्रष्टः, “अपनी महिमा से गिरा हुआ।” रोषात्, “शिव के क्रोध से।”

अर्थ

कुसुमदन्त, यानी पुष्पदन्त नाम वाला, गंधर्वों का राजा, देवों के देव शिव का सेवक, जब अपनी ही महिमा से, शिव के रोष के कारण, गिर गया, तब उसने यह दिव्य महिम्न-स्तोत्र रचा।

भावार्थ

यहाँ स्तोत्र की जन्म-कथा दर्ज है। पुष्पदन्त गंधर्व-राज था, उसके पास एक सिद्धि थी, अदृश्य हो जाने की। वह रोज़ अदृश्य होकर एक राजा के बग़ीचे से शिव-पूजा के फूल चुरा लेता था। एक दिन माली ने बग़ीचे में शिव को चढ़ी निर्माल्य-पत्तियाँ बिखेर दीं। पुष्पदन्त अनजाने उन्हें लाँघ गया, और यह अनादर उसकी सिद्धि छीन ले गया, वह दिखने लगा, पकड़ा गया। तब उसे समझ आया कि चूक कहाँ हुई, और पश्चात्ताप में उसने यह स्तोत्र रचा। श्लोक की ख़ूबसूरती यह है: यह सबसे प्यारा शिव-स्तोत्र एक ग़लती से, एक गिरावट से जन्मा। कभी-कभी सबसे सुंदर चीज़ हमारे सबसे नीचे गिरे पल से निकलती है। पतन अंत नहीं, अक्सर एक नई शुरुआत का दरवाज़ा है।

संगति

“गिरकर रचना” वाली यह कथा पूरे स्तोत्र को एक नई रोशनी देती है। श्लोक 31 की वह विनम्रता अब समझ आती है, यह किसी विजेता का गीत नहीं, एक गिरे हुए का पश्चात्ताप-गीत है, और इसीलिए इतना सच्चा।

श्लोक 38
सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं [सुरवरमुनिपूज्यं]
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्य-चेताः ।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदंतप्रणीतम् ॥ 38 ॥
suragurumabhipūjya svarga-mokṣaika-hetuṃ [suravaramunipūjyaṃ]
paṭhati yadi manuṣyaḥ prāṃjalirnānya-cetāḥ |
vrajati śiva-samīpaṃ kinnaraiḥ stūyamānaḥ
stavanamidamamoghaṃ puṣpadaṃtapraṇītam
शब्दार्थ

सुरगुरुम् अभिपूज्य, “देवगुरु को पूजकर।” स्वर्ग-मोक्ष-एक-हेतुं, “स्वर्ग और मोक्ष दोनों का एकमात्र कारण।” प्रांजलिः, “हाथ जोड़े।” अनन्य-चेताः, “एकाग्र मन से।” अमोघं, “कभी व्यर्थ न जाने वाला।”

अर्थ

जो मनुष्य हाथ जोड़कर, एकाग्र मन से, स्वर्ग और मोक्ष दोनों का कारण इस स्तोत्र को पढ़ता है, वह किन्नरों से सराहा जाता हुआ शिव के समीप पहुँचता है। पुष्पदन्त का रचा यह स्तोत्र कभी व्यर्थ नहीं जाता।

भावार्थ

फलश्रुति यहाँ एक और बात जोड़ती है, और वह राहत देने वाली है: यह स्तोत्र “स्वर्ग-मोक्ष-एक-हेतु” है, यानी दोनों का एक ही कारण। आमतौर पर परंपरा में दो रास्ते अलग माने जाते हैं, एक सुख-समृद्धि चाहने वालों का, दूसरा मुक्ति चाहने वालों का। यह श्लोक कहता है, यहाँ बँटवारा नहीं। जो भाव से गाएगा, उसे जो चाहिए वह मिलेगा, और जो उससे बड़ा है वह भी। शर्त वही पुरानी है: “अनन्य-चेता”, बँटा हुआ नहीं, जुड़ा हुआ मन। और “अमोघ” शब्द एक भरोसा देता है, यह कभी ख़ाली नहीं लौटता। सच्चे मन से कही गई बात कहीं न कहीं दर्ज हो ही जाती है।

संगति

“अमोघ, व्यर्थ न जाने वाला” यही भरोसा गीता 2.40 में है, जहाँ कृष्ण कहते हैं, इस राह पर शुरू किया गया थोड़ा-सा भी काम बेकार नहीं जाता।

श्लोक 39
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्व-भाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ॥ 39 ॥
āsamāptamidaṃ stotraṃ puṇyaṃ gaṃdharva-bhāṣitam |
anaupamyaṃ manohāri sarvamīśvaravarṇanam
शब्दार्थ

आसमाप्तम्, “पूरा हो गया।” गंधर्व-भाषितम्, “गंधर्व का कहा हुआ।” अनौपम्यं, “जिसकी कोई उपमा नहीं।” मनोहारि, “मन हर लेने वाला।” ईश्वर-वर्णनम्, “ईश्वर का वर्णन।”

अर्थ

यह पुण्यमय स्तोत्र, जो एक गंधर्व के मुख से निकला, यहाँ पूरा होता है। यह बेजोड़ है, मन को हर लेने वाला है, और शुरू से अंत तक बस ईश्वर का ही वर्णन है।

भावार्थ

यह स्तोत्र अपने पूरा होने की घोषणा ख़ुद करता है, और बहुत सादगी से। कोई भारी-भरकम समापन नहीं, बस एक शांत वाक्य: यह पूरा हुआ। पर एक शब्द ध्यान खींचता है, “सर्वम् ईश्वर-वर्णनम्”, यह पूरा का पूरा बस ईश्वर का वर्णन है। यानी इसमें कहीं भी पुष्पदन्त ने अपनी कथा, अपना दुख, अपनी माँग को केंद्र नहीं बनाया, भले स्तोत्र जन्मा उनके पतन से। यह कलाकार का सबसे ऊँचा अनुशासन है: कृति में से अपने आप को हटा देना, ताकि बस विषय चमके। आख़िरी कुछ श्लोक स्तोत्र को धीरे-धीरे ज़मीन पर उतारते हैं, जैसे कोई गहरी बातचीत धीरे-धीरे शांति में ढलती है।

संगति

“बस विषय चमके, रचयिता हट जाए” वाला यही भाव श्लोक 33 की विनम्र हस्ताक्षर-शैली से जुड़ता है। बड़ी रचना अपने रचने वाले को छोटा नहीं, पारदर्शी बना देती है।

श्लोक 40
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छंकर-पादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ 40 ॥
ityeṣā vāṅmayī pūjā śrīmacchaṃkara-pādayoḥ |
arpitā tena deveśaḥ prīyatāṃ me sadāśivaḥ
शब्दार्थ

वाङ्मयी पूजा, “शब्दों से की गई पूजा।” श्रीमत्-शंकर-पादयोः, “शिव के श्री-चरणों में।” अर्पिता, “चढ़ा दी गई।” देवेशः सदाशिवः प्रीयताम्, “देवेश सदाशिव प्रसन्न हों।”

अर्थ

इस तरह यह शब्दों से बनी पूजा शिव के चरणों में चढ़ा दी गई। इसे चढ़ाकर जो भाव उठा, उससे देवेश सदाशिव मुझ पर प्रसन्न हों।

भावार्थ

यह श्लोक एक सुंदर बात साफ़ कर देता है: यह स्तोत्र एक “वाङ्मयी पूजा” है, शब्दों से की गई पूजा। आमतौर पर पूजा में फूल, जल, धूप, दीप चढ़ता है। पुष्पदन्त के पास, गिर जाने के बाद, फूल चुराने की सिद्धि भी नहीं बची थी। तो उन्होंने शब्दों के फूल चढ़ाए। और श्लोक यह मान लेता है कि शब्दों की पूजा भी उतनी ही असली है। यह बहुत मुक्त करने वाली बात है। पूजा के लिए सामान की कमी कभी रुकावट नहीं। मन है, भाव है, शब्द है, तो पूजा हो सकती है, कहीं भी, किसी भी हाल में। जिसके पास फूल न हों, वह अपनी बात चढ़ा दे। चढ़ाने का भाव असली है, चढ़ावे की क़ीमत नहीं।

संगति

“शब्दों की पूजा” वाला यही भाव श्लोक 3 से पूरा घेरा बनाता है, जहाँ पुष्पदन्त ने कहा था, मैं गाकर अपनी वाणी पवित्र कर रहा हूँ। गीता 9.26 भी यही कहती है, पत्ता-फूल-जल नहीं, भाव चाहिए।

श्लोक 41
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥ 41 ॥
tava tattvaṃ na jānāmi kīdṛśo’si maheśvara |
yādṛśo’si mahādeva tādṛśāya namo namaḥ
शब्दार्थ

तव तत्त्वं न जानामि, “तेरा असली स्वरूप मैं नहीं जानता।” कीदृशः असि, “तू कैसा है।” यादृशः असि, “तू जैसा भी है।” तादृशाय नमः, “उसी रूप को नमस्कार।”

अर्थ

हे महेश्वर, सच कहूँ तो तेरा असली तत्त्व मैं नहीं जानता, तू कैसा है यह मेरी पकड़ में नहीं आता। पर हे महादेव, तू जैसा भी है, उसी रूप को मेरा बार-बार नमस्कार।

भावार्थ

चालीस श्लोक गा लेने के बाद, पुष्पदन्त एक ऐसी बात कहते हैं जो पूरे स्तोत्र को एक नई गहराई दे देती है: “मैं तेरा तत्त्व नहीं जानता।” इतना लंबा, इतना सुंदर स्तोत्र रचने के बाद भी, वे यह नहीं कहते कि अब मैं जान गया। यह हार नहीं, यह स्तोत्र की सबसे ईमानदार पंक्ति है। और इसके ठीक बाद वह सबसे सुंदर मोड़: “तू जैसा भी है, उसी को नमस्कार।” यानी जानना नमस्कार की शर्त नहीं रहती। हम अक्सर सोचते हैं पहले समझेंगे, फिर मानेंगे। यह श्लोक कहता है, ज़रूरी नहीं। प्रेम और आदर समझ का इंतज़ार नहीं करते। आप किसी को पूरा समझकर प्यार नहीं करते, प्यार करते हुए धीरे-धीरे समझते हैं, और शायद कभी पूरा नहीं भी।

संगति

“नहीं जानता, फिर भी नमस्कार” वाला यह भाव केनोपनिषद् के सीधे उलट और सीधे साथ है, जो कहती है, जो जानने का दावा करे वह नहीं जानता। न जानने की यह स्वीकृति ही सच्चा जानना है।

श्लोक 42
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥ 42 ॥
ekakālaṃ dvikālaṃ vā trikālaṃ yaḥ paṭhennaraḥ |
sarvapāpa-vinirmuktaḥ śiva loke mahīyate
शब्दार्थ

एककालं, द्विकालं, त्रिकालं, “दिन में एक, दो, या तीन बार।” यः पठेत् नरः, “जो मनुष्य पाठ करे।” सर्व-पाप-विनिर्मुक्तः, “सब पापों से छूटा हुआ।” शिव-लोके महीयते, “शिवलोक में सम्मान पाता है।”

अर्थ

जो मनुष्य इस स्तोत्र का दिन में एक बार, दो बार, या तीन बार पाठ करता है, वह सब पापों से छूट जाता है और शिवलोक में आदर पाता है।

भावार्थ

यह आख़िरी फलश्रुति-श्लोक है, और इसमें एक प्यारी लचक है: एक बार, दो बार, या तीन बार, जितना हो सके। यह कोई कठोर नियम नहीं थोपता, “रोज़ इतनी बार ही करना वरना फल नहीं।” यह बस एक खुला निमंत्रण है। और “सर्व-पाप-विनिर्मुक्त” का मतलब कोई जादू नहीं, जिससे पाप अपने आप मिट जाएँ। असली पाठ मन को बदलता है, और बदला हुआ मन वैसे काम करना ही छोड़ देता है जिन्हें पाप कहते हैं। मुक्ति बाहर से मिटाने में नहीं, भीतर से रुचि बदल जाने में है। जब गाना आदत बन जाए, तो वह धीरे-धीरे गाने वाले को गढ़ने लगता है। यही इस श्लोक का असली वादा है।

संगति

“जितना हो सके, उतना” वाली यह उदारता पूरे स्तोत्र के मिज़ाज से मेल खाती है, जो श्लोक 7 में चार अलग रास्तों को एक ही समुद्र तक पहुँचता मानता है। यहाँ भी कोई एक ही सही तरीक़ा नहीं।

श्लोक 43
श्री पुष्पदंत-मुख-पंकज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण ।
कंठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥ 43 ॥
śrī puṣpadaṃta-mukha-paṃkaja-nirgatena
stotreṇa kilbiṣa-hareṇa hara-priyeṇa |
kaṃṭhasthitena paṭhitena samāhitena
suprīṇito bhavati bhūtapatirmaheśaḥ
शब्दार्थ

पुष्पदंत-मुख-पंकज-निर्गतेन, “पुष्पदन्त के मुख-कमल से निकले।” किल्बिष-हरेण, “पाप हरने वाले।” हर-प्रियेण, “शिव को प्रिय।” कंठस्थितेन, “कंठस्थ कर लेने से।” समाहितेन, “एकाग्र मन से।” भूतपतिः महेशः, “प्राणियों के स्वामी महेश।”

अर्थ

पुष्पदन्त के मुख-कमल से निकला यह स्तोत्र पाप हरने वाला है और शिव को प्रिय है। जो इसे कंठस्थ कर ले, या पढ़े, या एकाग्र मन से इसमें डूब जाए, उससे प्राणियों के स्वामी महेश ख़ूब प्रसन्न होते हैं।

भावार्थ

अंतिम श्लोक तीन तरीक़े गिनाता है, और तीनों के अलग-अलग रंग हैं। “कंठस्थित”, याद कर लेना, ताकि स्तोत्र हमेशा साथ रहे। “पठित”, पढ़ना, रोज़ का अभ्यास। और “समाहित”, एकाग्र होकर उसमें डूब जाना। पहले दो साधन हैं, तीसरा मंज़िल। आप पहले याद करते हैं, फिर दोहराते हैं, और किसी दिन दोहराना रुक जाता है और बस डूबना रह जाता है। उसी पल स्तोत्र अपना काम पूरा करता है। और स्तोत्र शिव को “भूतपति” कहकर बंद होता है, सब प्राणियों का स्वामी, यानी वह दूर का देवता नहीं, सबके भीतर बैठा अपना ही स्वामी। पुष्पदन्त ने जो यात्रा फूल चुराने से शुरू की थी, वह यहाँ शब्दों के फूल चढ़ाकर पूरी होती है। गिरना, पहचानना, गाना, और फिर गाने में घुल जाना।

संगति

“याद करना, पढ़ना, डूबना” यह तीन-सीढ़ी हनुमान चालीसा और विष्णु सहस्रनाम के पाठ-क्रम में भी है। और महावाक्य पृष्ठ की वह बात यहीं से जुड़ती है, सच्चा पाठ अंत में पाठ करने वाले और जिसका पाठ है, उसका फ़र्क़ ही घुला देता है।

साथ में पढ़ें

स्रोत: देवनागरी Sanskrit text vignanam.org और sanskritdocuments.org से मिलाकर verify किया गया। IAST transliteration locally generated। हिन्दी टीका lulla.net, चाय-tone में, मूल अर्थ के प्रति वफ़ादार।

परंपरा: गंधर्व पुष्पदन्त रचित शिव-स्तोत्र। यह किसी पुराण का अंश नहीं, एक स्वतंत्र स्तवन है, जो शैव भक्ति-परंपरा में सबसे प्रिय स्तोत्रों में गिना जाता है। श्लोक-संख्या संस्करण-दर-संस्करण थोड़ी बदलती है, यहाँ 43-श्लोक वाला प्रचलित पाठ लिया गया है।

license: मूल Sanskrit text public-domain। हिन्दी commentary, CC BY-NC 4.0।

अंतिम संशोधन: 22 मई 2026।