पतञ्जलि योग सूत्र
किसी ने, दो हज़ार साल पहले, पूरे मन की गुत्थी 196 छोटी-छोटी लाइनों में बाँध दी। न कोई भारी-भरकम ग्रंथ, न उपदेश। बस एक सवाल: मन है क्या, और शांत कैसे होता है।
पहले एक बात
पतञ्जलि कौन थे? सच कहें तो किसी को ठीक-ठीक नहीं पता। ईसा से दो-तीन सदी इधर या उधर, किसी एक इंसान ने (या शायद एक पूरी परम्परा ने) सोचा कि पूरे योग को इतना निचोड़ दें कि वह एक धागे में पिरोया जा सके। “सूत्र” का मतलब ही यही है, धागा। कम से कम शब्द, ज़्यादा से ज़्यादा अर्थ।

और यह कोई धार्मिक किताब नहीं। न इसमें कोई कथा है, न आस्था की कोई शर्त। यह एक मार्गदर्शिका है, मन की मशीन की। पतञ्जलि लगभग एक इंजीनियर की तरह लिखते हैं: पहले बताते हैं मंज़िल क्या है, फिर रास्ता, फिर रास्ते की खूबियाँ और फिसलनें, और आख़िर में वह जगह जहाँ सब रुक जाता है।
एक छोटी सी ईमानदारी: अगर आपने कभी थोड़ा-बहुत भी मन को शांत करने की कोशिश की है, किसी भी तरह, किसी भी परम्परा में, तो यह किताब आपके लिए जगमगा उठेगी। और अगर नहीं की, तो भी कोई बात नहीं। पढ़ते-पढ़ते कोशिश अपने आप शुरू हैं जाती है।
पूरा कैसे पढ़ें
पहली बार: पाद 1 से 4, क्रम से। जल्दी मत कीजिए। हर पाद के कुछ सूत्र असली खंभे हैं, बाक़ी उन्हीं के आसपास खड़े हैं।
सिर्फ़ एक पाद का समय है? पाद 2 लीजिए। सबसे ज़मीनी है, और मशहूर अष्टांग योग वहीं रहता है।
आप पहले से अभ्यास करते हैं? पाद 1 और पाद 4 साथ पढ़िए। दोनों एक ही बात के दो छोर हैं, और बीच का सब उन्हीं को जोड़ने वाला पुल है।
सिद्धियों का क्या? पाद 3 में कुछ हैरान करने वाली क्षमताएँ आती हैं। मज़ेदार ज़रूर हैं, पर मंज़िल नहीं। पतञ्जलि खुद उन्हें रास्ते का रोड़ा कहते हैं। एक सूची-पत्र की तरह पढ़िए, करने वाले कामों की फ़ेहरिस्त की तरह नहीं।
समाधि पाद
नक्शा। मन क्या है, उसमें उठने वाली लहरें क्या हैं, और शांत होने पर पीछे क्या बचता है। अभ्यास और वैराग्य का दो-शब्द का फ़ॉर्मूला यहीं मिलता है (1.12)।
रुक कर पढ़ें: 1.2, 1.3, 1.12, 1.14, 1.33, 1.41
साधन पाद
रास्ता। दुख कहाँ से आता है (पाँच क्लेश), और अष्टांग योग के पहले पाँच अंग, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार। सबसे काम का पाद।
रुक कर पढ़ें: 2.1, 2.3, 2.16, 2.29, 2.30, 2.46, 2.47, 2.49
विभूति पाद
खूबियाँ। अष्टांग के आख़िरी तीन अंग, संयम का तरीक़ा, और उससे खुलने वाली हैरान करने वाली सिद्धियाँ, जिन्हें पतञ्जलि बताते भी हैं और आगाह भी करते हैं।
रुक कर पढ़ें: 3.1-3.4, 3.9, 3.38, 3.50, 3.51, 3.53
कैवल्य पाद
मंज़िल। मन का असली चेहरा (वह खुद नहीं चमकता), कर्म और वासना का तंत्र, धर्ममेघ समाधि, और कैवल्य। सबसे छोटा, सबसे गहरा।
रुक कर पढ़ें: 4.1, 4.3, 4.7, 4.18, 4.19, 4.22, 4.25, 4.29, 4.34
पूरी किताब का एक कमाल
चारों पादों को जोड़कर पढ़ने का एक सम्पादकीय सुझाव है: आरम्भ में उठे प्रश्न को अन्त तक साथ रखिए।
दूसरे ही सूत्र (1.2) में पतञ्जलि पूरी बात रख देते हैं: योग का मतलब है मन की लहरों का थम जाना। और अगले सूत्र में इनाम बता देते हैं, तब “देखने वाला” अपने असली रूप में आ बैठता है।
आगे अभ्यास और विवेक की चर्चा खुलती है। अन्तिम सूत्र 4.34 में कैवल्य का वर्णन पढ़ते समय आरम्भ के सूत्र 1.2 और 1.3 पर फिर लौट सकते हैं।
पहला सूत्र 1.1 योग की शिक्षा का आरम्भ घोषित करता है; योग की परिभाषा 1.2 में है और द्रष्टा के स्वरूप में स्थित होने की बात 1.3 में। आरम्भ और अन्त को साथ पढ़ने से अर्थ की नई परत खुल सकती है। यह पाठ को देखने की हमारी एक दृष्टि है, सूत्रों की एक जैसी शब्दशः बात होने का दावा नहीं।
इसके बाद
इसी साइट पर: अष्टावक्र गीता ठीक यही मंज़िल एक उल्टे रास्ते से बताती है। पतञ्जलि का रास्ता कदम-दर-कदम है, अष्टावक्र का एक ही छलाँग। दोनों को साथ पढ़िए, दोनों एक-दूसरे को रोशन कर देंगे। और गीता का अध्याय 6 ध्यान पर है, पतञ्जलि से सीधी बातचीत करता हुआ।
पढ़ते-पढ़ते एक सवाल साथ रखिए: मेरा अपना मन सबसे ज़्यादा किस लहर में डूबा रहता है? बस यही देखना, हफ़्तों की पढ़ाई से ज़्यादा कर देता है।
साथ में पढ़ें
- भगवद् गीता अध्याय 6 ध्यान योग, पतञ्जलि के अष्टांग की गूँज।
- अष्टावक्र गीता योग की अंतिम मंज़िल, अष्टावक्र की शुरुआत है।
- नारद भक्ति सूत्र भक्ति-योग, पतञ्जलि के “ईश्वर-प्रणिधान” का पूरा खिला हुआ रूप।
सितम्बर 2026 की पाठ-जाँच
क्रम की जाँच: आगाशे संस्करण का संस्कृत पाठ, ग्रेटिल और विवेकानन्द का स्वतंत्र पाठ और भाष्य, 1.1 से 3। अन्त की तुलना के लिए विवेकानन्द 4.33, जो आगाशे पाठ के 4.34 के समान सूत्र है। विवेकानन्द के संस्करण में 4.16 का अतिरिक्त सूत्र टिप्पणी में है, मुख्य गिनती में नहीं। अलग व्याख्याओं को एक नहीं माना गया है।