श्री रुद्रम् और चमकम्
उस देव के सामने जो डराता भी है और जिससे माँगा भी जाता है, और फिर उसके दो हिस्से
ज़रा ठहरिए, साहब। बात रुद्र की है। ऋग्वेद उन्हें तूफ़ान और पर्वत में देखता है, और वैद्यों का वैद्य भी कहता है। नमकम् पहले झुकता है और हर रूप को नमन करता है। चमकम् उसके बाद हाथ फैलाता है और जीवन की पूरी थाली माँगता है। दो हिस्से, एक ही साँस।
यह पूरा पाठ श्री रुद्रम् कहलाता है, और रुद्रप्रश्न, रुद्राध्याय या शतरुद्रीय भी। यह कृष्ण यजुर्वेद से आता है, और दो हिस्सों में बँटा है, नमकम् (तैत्तिरीय संहिता 4.5) और चमकम् (तैत्तिरीय संहिता 4.7)।
रुद्र कौन
रुद्र को ऋग्वेद तूफ़ान, पर्वत और बाण में देखता है, मरुतों का अगुआ, जो रोग और मृत्यु भी लाता है और उन्हें हरता भी है। रुद्र का एक बड़ा सूक्त (ऋग्वेद 2.33) उन्हें वैद्यों का वैद्य कहता है, और उसी साँस में उनसे अपने बाण रोक लेने की भी विनती करता है। शिव, यानी कल्याणकारी, यह सम्बोधन समय के साथ उन पर ठहरता गया, और श्री रुद्रम् उन पाठों में है जहाँ रुद्र शिव बनते दिखते हैं।
नमकम्, जो झुकता है
नमकम् का नाम उसकी टेक नमो से है, यानी नमन। ग्यारह अनुवाक रुद्र को उनके हर रूप में नमन करते हैं, उनके अस्त्रों में, पर्वतों और नदियों में, और हर पेशे के लोगों में। आठवाँ अनुवाक वह पाँच अक्षर का मंत्र थामे है, नमः शिवाय (namaḥ śivāya)। इसी के साथ त्र्यम्बक या महामृत्युंजय मंत्र भी पढ़ा जाता है, जो ऋग्वेद 7.59.12 में मिलता है। नमकम् की चाल समर्पण की है।
चमकम्, जो माँगता है
चमकम् का नाम उसकी टेक च मे (ca me) से है, यानी और मुझे, और उसके बार-बार लौटते वाक्य से, च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् (ca me yajñena kalpantām), यानी ये सब मुझे यज्ञ के द्वारा मिलें। इसके भी ग्यारह अनुवाक हैं। नमकम् के झुक चुकने के बाद चमकम् हाथ फैलाता है। यह जीवन की लगभग पूरी थाली माँगता है, बल और मूल ऊर्जाएँ, देह के अंग और मन-वाणी की शक्तियाँ, श्रद्धा और सत्य, अन्न और पशु, स्वर्ण और संपत्ति, ऋतुएँ और देवता, और स्वयं यज्ञ के उपकरण तथा छंद। ग्यारहवाँ अनुवाक गिनती का जाप है, एक से तैंतीस तक की विषम संख्याएँ, और चार के गुणकों में अड़तालीस तक की सम संख्याएँ, मानो जो कुछ गिना जा सके वह सब। यह सांसारिक भरपूरी और मुक्ति, दोनों एक ही साँस में माँगता है।
पाठ का जीवन
इसका केंद्रीय अनुष्ठान रुद्राभिषेकम् है। इसका एक पुराना घर अग्निचयन की वेदी-विधि में है, जहाँ शतरुद्रीय वेदी में बसी सौ-रूपों वाली शक्ति को शांत करता है (शतपथ ब्राह्मण)। और पाठ की एक चढ़ती सीढ़ी है, जहाँ ग्यारह इकाइयाँ अगली एक इकाई बनाती हैं, एक रुद्री, फिर लघुरुद्र (ग्यारह रुद्री), फिर महारुद्र (एक सौ इक्कीस रुद्री), और फिर अतिरुद्र (तेरह सौ इकत्तीस रुद्री)।
दो कहानियाँ
दो कहानियाँ इसके पीछे खड़ी हैं। एक ब्राह्मण की, जिसमें रुद्र नाम का जन्म एक रोते हुए बालक से जोड़ा जाता है, जो रोता है और जिसे नाम दिए जाते हैं, और रोने को ही नाम में पढ़ लिया जाता है। दूसरी दक्ष-यज्ञ की, जहाँ रुद्र-शिव को एक बड़े यज्ञ से बाहर रखा जाता है, उनकी संगिनी सती प्राण त्याग देती हैं, उनका क्रोध उस यज्ञ को ध्वस्त कर देता है, और अंत में उन्हें उनका हिस्सा दिया जाता है। इसमें एक अनुष्ठानिक सच छिपा है, कि इस शक्ति को मान देना और उसका भाग देना ही पड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
नमकम् और चमकम् में फ़र्क़ क्या है?
नमकम् नमन करता है, रुद्र को हर रूप में झुक कर। चमकम् उसके बाद माँगता है, जीवन की भरपूरी और मुक्ति, दोनों। एक झुकता है, दूसरा हाथ फैलाता है।
यह किस वेद से है?
कृष्ण यजुर्वेद से। नमकम् तैत्तिरीय संहिता 4.5 में, और चमकम् 4.7 में।
रुद्र और शिव एक हैं?
रुद्र ऋग्वेद का तूफ़ानी देव है। शिव, यानी कल्याणकारी, यह सम्बोधन समय के साथ उन पर ठहरा। श्री रुद्रम् उसी संक्रमण के पाठों में है।
रुद्री, महारुद्र, अतिरुद्र क्या हैं?
ये पाठ की चढ़ती मात्राएँ हैं। एक रुद्री से शुरू, और हर पायदान ग्यारह गुना, लघुरुद्र, महारुद्र, अतिरुद्र तक।
पढ़ने के लिए
- आर्थर बेरीडेल कीथ, The Veda of the Black Yajus School entitled Taittiriya Sanhita
- स्टेला क्रामरिश, The Presence of Śiva
- वेंडी डॉनिगर, Śiva: The Erotic Ascetic
जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए इस पाठ की बनावट ही उसका संदेश है। पहले नमकम् हर रूप के सामने झुक कर अहं को उतारता है, फिर चमकम् खुले हाथ जीवन और मुक्ति, दोनों माँगता है। समर्पण और माँग को एक ही ढाँचे में रख देना, यही इसका सलीक़ा है, और यही इसे एक पूरी थाली बना देता है।