अंग 258

अंग
258
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਿਧਿ ਨਿਧਾਨ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪੂਰੇ ॥
ਤਹ ਬਾਜੇ ਨਾਨਕ ਅਨਹਦ ਤੂਰੇ ॥੩੬॥
निधि निधान हरि अंम्रित पूरे ॥
तह बाजे नानक अनहद तूरे ॥३६॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो हृदय शुभ-गुणों के खजाने हरी-नाम अंमृत से भरे रहते हैं। उनके अंदर एक ऐसा आनंद बना रहता है जैसे एक-रस सब किस्मों के बाजे एक साथ मिल के बज रहे हों। 36।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਪਤਿ ਰਾਖੀ ਗੁਰਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਤਜਿ ਪਰਪੰਚ ਮੋਹ ਬਿਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਊ ਆਰਾਧੀਐ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
पति राखी गुरि पारब्रहम तजि परपंच मोह बिकार ॥
नानक सोऊ आराधीऐ अंतु न पारावारु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ जिस मनुष्य की इज्जत गुरू पारब्रहम ने रख ली। उस ने ठगी मोह विकार (आदि) त्याग दिए। हे नानक ! (इस वास्ते) उस पारब्रहम को सदा आराधना चाहिए जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी हस्ती का इस पार उस पार (छोर) नहीं ढूँढा जा सकता। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਪਪਾ ਪਰਮਿਤਿ ਪਾਰੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਅਗਮ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਹੋਤ ਪੁਨੀਤ ਕੋਟ ਅਪਰਾਧੂ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਜਪਹਿ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ॥
ਪਰਪਚ ਧ੍ਰੋਹ ਮੋਹ ਮਿਟਨਾਈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਰਾਖਹੁ ਆਪਿ ਗੁਸਾਈ ॥
ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਛਤ੍ਰ ਸਿਰ ਸੋਊ ॥
ਨਾਨਕ ਦੂਸਰ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਊ ॥੩੭॥
पउड़ी ॥
पपा परमिति पारु न पाइआ ॥
पतित पावन अगम हरि राइआ ॥
होत पुनीत कोट अपराधू ॥
अंम्रित नामु जपहि मिलि साधू ॥
परपच ध्रोह मोह मिटनाई ॥
जा कउ राखहु आपि गुसाई ॥
पातिसाहु छत्र सिर सोऊ ॥
नानक दूसर अवरु न कोऊ ॥३७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हरी प्रभू अपहुँच है। उसकी हस्ती का अंदाजा नहीं लग सकता। विकारों में गिरे हुए लोगों को पवित्र करने वाला है। अंत नहीं पाया जा सकता। करोड़ों ही वह अपराधी पवित्र हो जाते हैं जो गुरू को मिल के प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जपते हैं। तेरी सिफत सालाह की बरकति से उसके अंदर से ठॅगी-फरेब-मोह आदि विकार मिट जाते हैं। हे सृष्टि के मालिक ! जिस मनुष्य की तू खुद रक्षा करता है। हे नानक ! प्रभू शाहों का शाह है। वही असल छत्र धारी है। कोई और दूसरा उसकी बराबरी करने के लायक नहीं। 37।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਫਾਹੇ ਕਾਟੇ ਮਿਟੇ ਗਵਨ ਫਤਿਹ ਭਈ ਮਨਿ ਜੀਤ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇ ਥਿਤ ਪਾਈ ਫਿਰਨ ਮਿਟੇ ਨਿਤ ਨੀਤ ॥੧॥
सलोकु ॥
फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥
नानक गुर ते थित पाई फिरन मिटे नित नीत ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! अगर अपने मन को जीत लें। (वश में कर लें) तो (विकारों पर) जीत प्राप्त हो जाती है। माया के मोह के बंधन काटे जाते हैं। और (माया के पीछे की) भटकना समाप्त हो जाती है। जिस मनुष्य को गुरू से मन की अडोलता मिल जाती है। उसके जनम मरन के चक्कर सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਫਫਾ ਫਿਰਤ ਫਿਰਤ ਤੂ ਆਇਆ ॥
ਦ੍ਰੁਲਭ ਦੇਹ ਕਲਿਜੁਗ ਮਹਿ ਪਾਇਆ ॥
ਫਿਰਿ ਇਆ ਅਉਸਰੁ ਚਰੈ ਨ ਹਾਥਾ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਤਉ ਕਟੀਅਹਿ ਫਾਸਾ ॥
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵਨ ਜਾਨੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਏਕਹਿ ਏਕ ਜਪਹੁ ਜਪੁ ਸੋਈ ॥
ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਪ੍ਰਭ ਕਰਨੈਹਾਰੇ ॥
ਮੇਲਿ ਲੇਹੁ ਨਾਨਕ ਬੇਚਾਰੇ ॥੩੮॥
पउड़ी ॥
फफा फिरत फिरत तू आइआ ॥
द्रुलभ देह कलिजुग महि पाइआ ॥
फिरि इआ अउसरु चरै न हाथा ॥
नामु जपहु तउ कटीअहि फासा ॥
फिरि फिरि आवन जानु न होई ॥
एकहि एक जपहु जपु सोई ॥
करहु क्रिपा प्रभ करनैहारे ॥
मेलि लेहु नानक बेचारे ॥३८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) तू अनेकों जूनियों में भटकता आया है। अब तुझे संसार में ये मानस जनम मिला है। जो बड़ी मुश्किल से ही मिला करता है। (अगर तू अब भी विकारों के बंधनों में फंसा रहा। तो) ऐसा (सुंदर) मौका फिर नहीं मिलेगा। (हे भाई !) अगर तू प्रभू का नाम जपेगा। तो माया वाले सारे बंधन काटे जाएंगे। बार बार जनम मरन का चक्कर नहीं रह जाएगा। केवल एक परमात्मा का नाम जपा कर। (पर) हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर और कह,) हे सृजनहार प्रभू ! (माया-ग्रसित जीव के वश की बात नहीं)। तू स्वयं कृपा कर। और इस बिचारे को अपने चरणों में जोड़ ले। 38।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਬਿਨਉ ਸੁਨਹੁ ਤੁਮ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਗੁਪਾਲ ॥
ਸੁਖ ਸੰਪੈ ਬਹੁ ਭੋਗ ਰਸ ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਰਵਾਲ ॥੧॥
सलोकु ॥
बिनउ सुनहु तुम पारब्रहम दीन दइआल गुपाल ॥
सुख संपै बहु भोग रस नानक साध रवाल ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (अरदास कर और कह,) हे पारब्रहम ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे धरती के पालनहार ! मेरी विनती सुन। (मुझे सबुद्धि दे कि) गुरमुखों की चरण धूड़ ही मुझे अनेकों सुखों, धन-पदार्थों व अनेकों रसों के भोग के बराबर प्रतीत हो। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਬਬਾ ਬ੍ਰਹਮੁ ਜਾਨਤ ਤੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ॥
ਬੈਸਨੋ ਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੁਚ ਧਰਮਾ ॥
ਬੀਰਾ ਆਪਨ ਬੁਰਾ ਮਿਟਾਵੈ ॥
ਤਾਹੂ ਬੁਰਾ ਨਿਕਟਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥
ਬਾਧਿਓ ਆਪਨ ਹਉ ਹਉ ਬੰਧਾ ॥
ਦੋਸੁ ਦੇਤ ਆਗਹ ਕਉ ਅੰਧਾ ॥
ਬਾਤ ਚੀਤ ਸਭ ਰਹੀ ਸਿਆਨਪ ॥
ਜਿਸਹਿ ਜਨਾਵਹੁ ਸੋ ਜਾਨੈ ਨਾਨਕ ॥੩੯॥
पउड़ी ॥
बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥
बैसनो ते गुरमुखि सुच धरमा ॥
बीरा आपन बुरा मिटावै ॥
ताहू बुरा निकटि नही आवै ॥
बाधिओ आपन हउ हउ बंधा ॥
दोसु देत आगह कउ अंधा ॥
बात चीत सभ रही सिआनप ॥
जिसहि जनावहु सो जानै नानक ॥३९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- असल ब्राहमण वो हैं। जो ब्रहम (परमात्मा) के साथ सांझ डालते हैं। असल वैश्णव वे हैं जो गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक पवित्रता के फर्ज को पालते हैं। वह मनुष्य शूरवीर जानो जो (बनाए हुए वैरियों का खुरा खोज मिटाने की जगह) अपने अंदर से दूसरों का बुरा मांगने का स्वभाव का निशान मिटा दे। (जिस ने ये कर लिया) दूसरों की ओर से चितवी बुराई उसके पास नहीं फटकती। (पर मनुष्य) खुद ही अपने अहंकार के बंधनों में बंधा रहता है (और दूसरों के साथ उलझता है। अपने द्वारा की ज्यादती का ख्याल तक नहीं आता। किसी भी नुकसान का) दोष अंधा मनुष्य औरों पर लगाता है। (पर) हे नानक ! (ऐसा स्वाभाव बनाने के लिए) निरी ज्ञान की बातें और समझदारियों की पेश नहीं चलती। (प्रभू के आगे अरदास कर और कह,) हे प्रभू ! जिसे तू इस सुचॅजे जीवन की सूझ बख्शता है वही समझता है। 39।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਭੈ ਭੰਜਨ ਅਘ ਦੂਖ ਨਾਸ ਮਨਹਿ ਅਰਾਧਿ ਹਰੇ ॥
ਸੰਤਸੰਗ ਜਿਹ ਰਿਦ ਬਸਿਓ ਨਾਨਕ ਤੇ ਨ ਭ੍ਰਮੇ ॥੧॥
सलोकु ॥
भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥
संतसंग जिह रिद बसिओ नानक ते न भ्रमे ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ ( हे भाई ! सब पापों के) हरने वाले को अपने मन में याद रख। वही सारे डरों को दूर करने वाला है। वही सारे पापों दुखों का नाश करने वाला है। हे नानक ! सतसंग में रह के जिन मनुष्यों के हृदय में हरी आ टिकता है। वह पापों विकारों की भटकना में नहीं पड़ते। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਭਭਾ ਭਰਮੁ ਮਿਟਾਵਹੁ ਅਪਨਾ ॥
ਇਆ ਸੰਸਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਸੁਪਨਾ ॥
ਭਰਮੇ ਸੁਰਿ ਨਰ ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ॥
ਭਰਮੇ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਬ੍ਰਹਮੇਵਾ ॥
ਭਰਮਿ ਭਰਮਿ ਮਾਨੁਖ ਡਹਕਾਏ ॥
ਦੁਤਰ ਮਹਾ ਬਿਖਮ ਇਹ ਮਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਮੋਹ ਮਿਟਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇਹ ਪਰਮ ਸੁਖ ਪਾਇਆ ॥੪੦॥
पउड़ी ॥
भभा भरमु मिटावहु अपना ॥
इआ संसारु सगल है सुपना ॥
भरमे सुरि नर देवी देवा ॥
भरमे सिध साधिक ब्रहमेवा ॥
भरमि भरमि मानुख डहकाए ॥
दुतर महा बिखम इह माए ॥
गुरमुखि भ्रम भै मोह मिटाइआ ॥
नानक तेह परम सुख पाइआ ॥४०॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- इसके पीछे भटकने की बाण मिटा दो। (हे भाई !) जैसे सपना है (जैसे सपने में कई पदार्थों से मेल जोल होता है पर जागते ही वह साथ समाप्त हो जाता है)। वैसे ही इस सारे संसार का साथ है। (इस माया के चोज-तमाशों की खातिर) स्वर्गीय जीव, मनुष्य, देवी, देवते दुखी होते (सुने जाते) रहे और ब्रहमा जैसे योग साधना में माहिर जोगी, साधक, भटक रहे है (धरती के) लोग (मायावी पदार्थों की खातिर) भटक-भटक के धोखे में आते चले आ रहे हैं। ये माया एक ऐसा महा-मुश्किल (समुंद्र) है (जिस में) तैरना बहुत ही कठिन है। जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ कर (माया के पीछे की) भटकना। सहम व मोह (को अपने अंदर से) मिटा लिया। हे नानक ! उन्होंने सबसे श्रेष्ठ आत्मिक आनंद हासिल कर लिया है। 40।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਮਾਇਆ ਡੋਲੈ ਬਹੁ ਬਿਧੀ ਮਨੁ ਲਪਟਿਓ ਤਿਹ ਸੰਗ ॥
ਮਾਗਨ ਤੇ ਜਿਹ ਤੁਮ ਰਖਹੁ ਸੁ ਨਾਨਕ ਨਾਮਹਿ ਰੰਗ ॥੧॥
सलोकु ॥
माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥
मागन ते जिह तुम रखहु सु नानक नामहि रंग ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ मनुष्य का मन कई तरीकों से माया की खातिर ही डोलता रहता है। माया के साथ ही चिपका रहता है। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर और कह,) हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तू निरी माया ही मांगने से रोक लेता है वह तेरे नाम से प्यार पा लेता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਮਮਾ ਮਾਗਨਹਾਰ ਇਆਨਾ ॥
ਦੇਨਹਾਰ ਦੇ ਰਹਿਓ ਸੁਜਾਨਾ ॥
ਜੋ ਦੀਨੋ ਸੋ ਏਕਹਿ ਬਾਰ ॥
ਮਨ ਮੂਰਖ ਕਹ ਕਰਹਿ ਪੁਕਾਰ ॥
ਜਉ ਮਾਗਹਿ ਤਉ ਮਾਗਹਿ ਬੀਆ ॥
ਜਾ ਤੇ ਕੁਸਲ ਨ ਕਾਹੂ ਥੀਆ ॥
ਮਾਗਨਿ ਮਾਗ ਤ ਏਕਹਿ ਮਾਗ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾ ਤੇ ਪਰਹਿ ਪਰਾਗ ॥੪੧॥
पउड़ी ॥
ममा मागनहार इआना ॥
देनहार दे रहिओ सुजाना ॥
जो दीनो सो एकहि बार ॥
मन मूरख कह करहि पुकार ॥
जउ मागहि तउ मागहि बीआ ॥
जा ते कुसल न काहू थीआ ॥
मागनि माग त एकहि माग ॥
नानक जा ते परहि पराग ॥४१॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- बेसमझ जीव हर वक्त (माया ही माया) मांगता रहता है (ये नहीं समझता कि) सबके दिलों की जानने वाला दातार (सब पदार्थ) दिए जा रहा है। उसने सब कुछ एक ही बार में दे दिया हुआ है (उसकी दी दातें तो कभी खतम होने वाली ही नहीं हैं।) हे मूर्ख मन ! तू क्यूं सदा माया के वास्ते गिड़गिड़ा रहा है? (हे मूर्ख !) तू जब भी मांगता है (नाम के बिना) और और चीजें ही मांगता रहता है। जिनसे कभी किसी को भी आत्मिक सुख नहीं मिला। हे नानक ! (कह, हे मूर्ख मन !) अगर तूने मांग मांगनी ही है तो प्रभू का नाम ही मांग। जिसकी बरकति से तू मायावी पदार्थों की मांग से ऊपर उठ जाए। 41।

संदर्भ: यह अंग 258 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Gurgaon-Delhi border पर शाम 8 बजे की रुकी हुई traffic।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 62 पंक्तियों का है, 11 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 258” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 259 →, पीछे का: ← अंग 257

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।