अंग 277

अंग
277
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਅੰਤੁ ਨਹੀ ਕਿਛੁ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥
ਹੁਕਮੇ ਧਾਰਿ ਅਧਰ ਰਹਾਵੈ ॥
ਹੁਕਮੇ ਉਪਜੈ ਹੁਕਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਹੁਕਮੇ ਊਚ ਨੀਚ ਬਿਉਹਾਰ ॥
ਹੁਕਮੇ ਅਨਿਕ ਰੰਗ ਪਰਕਾਰ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਅਪਨੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੧॥
अंतु नही किछु पारावारा ॥
हुकमे धारि अधर रहावै ॥
हुकमे उपजै हुकमि समावै ॥
हुकमे ऊच नीच बिउहार ॥
हुकमे अनिक रंग परकार ॥
करि करि देखै अपनी वडिआई ॥
नानक सभ महि रहिआ समाई ॥१॥

हिन्दी अर्थ: (उसकी ताकत) की कोई सीमा नहीं। (सृष्टि को अपने) हुकम में पैदा करके बिना किसी आसरे टिकाए रखता है। (जगत उसके) हुकम में पैदा होता है और हुकम में लीन हो जाता है। ऊँचे और नीच लोगों की बरतों भी उसके हुकम में ही है। अनेक किस्मों के खेल तमाशे उसके हुकम में ही हो रहे हैं। अपनी बुजुर्गी (के काम) कर कर के खुद ही देख रहा है। हे नानक ! प्रभू सब जीवों में व्यापक है। १।
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਮਾਨੁਖ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਾ ਪਾਥਰ ਤਰਾਵੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਬਿਨੁ ਸਾਸ ਤੇ ਰਾਖੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਭਾਖੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਾ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰੈ ॥
ਆਪਿ ਕਰੈ ਆਪਨ ਬੀਚਾਰੈ ॥
ਦੁਹਾ ਸਿਰਿਆ ਕਾ ਆਪਿ ਸੁਆਮੀ ॥
ਖੇਲੈ ਬਿਗਸੈ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਜੋ ਭਾਵੈ ਸੋ ਕਾਰ ਕਰਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦ੍ਰਿਸਟੀ ਅਵਰੁ ਨ ਆਵੈ ॥੨॥
प्रभ भावै मानुख गति पावै ॥
प्रभ भावै ता पाथर तरावै ॥
प्रभ भावै बिनु सास ते राखै ॥
प्रभ भावै ता हरि गुण भाखै ॥
प्रभ भावै ता पतित उधारै ॥
आपि करै आपन बीचारै ॥
दुहा सिरिआ का आपि सुआमी ॥
खेलै बिगसै अंतरजामी ॥
जो भावै सो कार करावै ॥
नानक द्रिसटी अवरु न आवै ॥२॥

हिन्दी अर्थ: अगर प्रभू को ठीक लगे तो मनुष्य को उच्च आत्मिक अवस्था देता है और पत्थर (-दिलों) को भी पार लगा देता है। अगर प्रभू चाहे तो स्वास के बिना भी प्राणी को (मौत से) बचाए रखता है। उसकी मेहर हो प्रभू मेहर के गुण गाता है। अगर अकाल-पुरख की रजा हो तो गिरे चाल-चलन वालों को (विकारों से) बचा लेता है। जो कुछ करता है। अपनी सलाह अनुसार करता है। प्रभू खुद ही लोक परलोक का मालिक है। वह सबके दिल की जानने वाला खुद जगत खेल खेलता है और (इसे देख के) खुश होता है। जो उसे अच्छा लगता है वही काम करता है। हे नानक ! (उस जैसा) कोई और नहीं दिखता। २।
ਕਹੁ ਮਾਨੁਖ ਤੇ ਕਿਆ ਹੋਇ ਆਵੈ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਾਵੈ ॥
ਇਸ ਕੈ ਹਾਥਿ ਹੋਇ ਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਲੇਇ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰੇਇ ॥
ਅਨਜਾਨਤ ਬਿਖਿਆ ਮਹਿ ਰਚੈ ॥
ਜੇ ਜਾਨਤ ਆਪਨ ਆਪ ਬਚੈ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਦਹ ਦਿਸਿ ਧਾਵੈ ॥
ਨਿਮਖ ਮਾਹਿ ਚਾਰਿ ਕੁੰਟ ਫਿਰਿ ਆਵੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਅਪਨੀ ਭਗਤਿ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਨਾਮਿ ਮਿਲੇਇ ॥੩॥
कहु मानुख ते किआ होइ आवै ॥
जो तिसु भावै सोई करावै ॥
इस कै हाथि होइ ता सभु किछु लेइ ॥
जो तिसु भावै सोई करेइ ॥
अनजानत बिखिआ महि रचै ॥
जे जानत आपन आप बचै ॥
भरमे भूला दह दिसि धावै ॥
निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै ॥
करि किरपा जिसु अपनी भगति देइ ॥
नानक ते जन नामि मिलेइ ॥३॥

हिन्दी अर्थ: बताओ मनुष्य से (अपने आप) कौन सा काम हो सकता है? जो प्रभू को ठीक लगता है वही (जीव से) कराता है। इस (मनुष्य) के हाथ में हो तो हर चीज पर कब्जा कर ले। (पर) प्रभू वही कुछ करता है जो उसे भाता है। मूर्खता के कारण मनुष्य माया में उलझ जाता है। यदि समझदार हो तो अपने आप (इससे) बचा रहे। (पर इसका मन) भुलेखे में भूला हुआ (माया की खातिर) दसों दिशाओं में दौड़ता है। आँख की झपक में चारों कोनों में दौड़ भाग आता है। (प्रभू) मेहर करके जिस जिस मनुष्य को अपनी भक्ति बख्शता है। हे नानक ! वे मनुष्य नाम में टिके रहते हैं। 3।
ਖਿਨ ਮਹਿ ਨੀਚ ਕੀਟ ਕਉ ਰਾਜ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਗਰੀਬ ਨਿਵਾਜ ॥
ਜਾ ਕਾ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਛੂ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਸੁ ਤਤਕਾਲ ਦਹ ਦਿਸ ਪ੍ਰਗਟਾਵੈ ॥
ਜਾ ਕਉ ਅਪੁਨੀ ਕਰੈ ਬਖਸੀਸ ॥
ਤਾ ਕਾ ਲੇਖਾ ਨ ਗਨੈ ਜਗਦੀਸ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭ ਤਿਸ ਕੀ ਰਾਸਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਪੂਰਨ ਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਗਾਸ ॥
ਅਪਨੀ ਬਣਤ ਆਪਿ ਬਨਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਦੇਖਿ ਬਡਾਈ ॥੪॥
खिन महि नीच कीट कउ राज ॥
पारब्रहम गरीब निवाज ॥
जा का द्रिसटि कछू न आवै ॥
तिसु ततकाल दह दिस प्रगटावै ॥
जा कउ अपुनी करै बखसीस ॥
ता का लेखा न गनै जगदीस ॥
जीउ पिंडु सभ तिस की रासि ॥
घटि घटि पूरन ब्रहम प्रगास ॥
अपनी बणत आपि बनाई ॥
नानक जीवै देखि बडाई ॥४॥

हिन्दी अर्थ: छिन में प्रभू कीड़े (जैसे) छोटे (मनुष्य) को राज दे देता है। प्रभू गरीबों पर मेहर करने वाला है। जिस मनुष्य में कोई गुण नहीं दिखाई देता। उसे एक पल में ही दसों दिशाओं में चमका देता है। जिस मनुष्य पर जगत का मालिक प्रभू अपनी बख्शिश करता है; उसके (कर्मों के) लेख नहीं गिनता। ये जिंद और शरीर सब उस प्रभू की दी हुई पूँजी है। हरेक शरीर में व्यापक प्रभू का ही जलवा है। ये (जगत) रचना उसने खुद रची है। हे नानक ! अपनी (इस) बुजुर्गी को खुद देख के खुश हो रहा है। 4।
ਇਸ ਕਾ ਬਲੁ ਨਾਹੀ ਇਸੁ ਹਾਥ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਰਬ ਕੋ ਨਾਥ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਬਪੁਰਾ ਜੀਉ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਫੁਨਿ ਥੀਉ ॥
ਕਬਹੂ ਊਚ ਨੀਚ ਮਹਿ ਬਸੈ ॥
ਕਬਹੂ ਸੋਗ ਹਰਖ ਰੰਗਿ ਹਸੈ ॥
ਕਬਹੂ ਨਿੰਦ ਚਿੰਦ ਬਿਉਹਾਰ ॥
ਕਬਹੂ ਊਭ ਅਕਾਸ ਪਇਆਲ ॥
ਕਬਹੂ ਬੇਤਾ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰ ॥੫॥
इस का बलु नाही इसु हाथ ॥
करन करावन सरब को नाथ ॥
आगिआकारी बपुरा जीउ ॥
जो तिसु भावै सोई फुनि थीउ ॥
कबहू ऊच नीच महि बसै ॥
कबहू सोग हरख रंगि हसै ॥
कबहू निंद चिंद बिउहार ॥
कबहू ऊभ अकास पइआल ॥
कबहू बेता ब्रहम बीचार ॥
नानक आपि मिलावणहार ॥५॥

हिन्दी अर्थ: इस (जीव) की ताकत इसके अपने हाथ में नहीं। सब जीवों का प्रभू स्वयं सब कुछ करने कराने के स्मर्थ है। बिचारा जीव प्रभू के हुकम में चलने वाला है (क्योंकि) होता वही है जो उस प्रभू को भाता है। (प्रभू स्वयं) कभी ऊँचों में कभी छोटों में प्रगट हो रहा है। कभी चिंता में है और कभी खुशी की मौज में हँस रहा है। कभी (दूसरों की) निंदा विचारने का व्यवहार बनाए बैठा है। कभी (खुशी के कारण) आकाश में ऊँचा (चढ़ता है) (कभी चिंता के कारण) पाताल में (गिरा पड़ा है)। कभी खुद ही ईश्वरीय विचार का महरम है। हे नानक ! जीवों को अपने में मेलने वाला स्वयं ही है। 5।
ਕਬਹੂ ਨਿਰਤਿ ਕਰੈ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥
ਕਬਹੂ ਸੋਇ ਰਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
ਕਬਹੂ ਮਹਾ ਕ੍ਰੋਧ ਬਿਕਰਾਲ ॥
ਕਬਹੂੰ ਸਰਬ ਕੀ ਹੋਤ ਰਵਾਲ ॥
ਕਬਹੂ ਹੋਇ ਬਹੈ ਬਡ ਰਾਜਾ ॥
ਕਬਹੁ ਭੇਖਾਰੀ ਨੀਚ ਕਾ ਸਾਜਾ ॥
ਕਬਹੂ ਅਪਕੀਰਤਿ ਮਹਿ ਆਵੈ ॥
ਕਬਹੂ ਭਲਾ ਭਲਾ ਕਹਾਵੈ ॥
ਜਿਉ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਖੈ ਤਿਵ ਹੀ ਰਹੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਕਹੈ ॥੬॥
कबहू निरति करै बहु भाति ॥
कबहू सोइ रहै दिनु राति ॥
कबहू महा क्रोध बिकराल ॥
कबहूं सरब की होत रवाल ॥
कबहू होइ बहै बड राजा ॥
कबहु भेखारी नीच का साजा ॥
कबहू अपकीरति महि आवै ॥
कबहू भला भला कहावै ॥
जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै ॥
गुर प्रसादि नानक सचु कहै ॥६॥

हिन्दी अर्थ: (प्रभू जीवों में व्यापक हो के) कभी कई किस्मों के नाच कर रहा है। कभी दिन रात सोया रहता है। कभी क्रोध (में आ के) बड़ा डरावना (लगता है)। कभी जीवों के चरणों की धूड़ (बना रहता है)। कभी बड़ा राजा बन बैठता है। कभी एक नीच जाति के मंगते का स्वांग (बना लेता है)। कभी अपनी बदनामी करा रहा है। कभी तारीफ करवा रहा है। जीव उसी तरह जीवन व्यतीत करता है जैसे प्रभू करवाता है। हे नानक ! (कोई विरला मनुष्य) गुरू की कृपा से प्रभू को सिमरता है। 6।
ਕਬਹੂ ਹੋਇ ਪੰਡਿਤੁ ਕਰੇ ਬਖੵਾਨੁ ॥
ਕਬਹੂ ਮੋਨਿਧਾਰੀ ਲਾਵੈ ਧਿਆਨੁ ॥
ਕਬਹੂ ਤਟ ਤੀਰਥ ਇਸਨਾਨ ॥
ਕਬਹੂ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਮੁਖਿ ਗਿਆਨ ॥
ਕਬਹੂ ਕੀਟ ਹਸਤਿ ਪਤੰਗ ਹੋਇ ਜੀਆ ॥
ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਭਰਮੈ ਭਰਮੀਆ ॥
कबहू होइ पंडितु करे बखॵानु ॥
कबहू मोनिधारी लावै धिआनु ॥
कबहू तट तीरथ इसनान ॥
कबहू सिध साधिक मुखि गिआन ॥
कबहू कीट हसति पतंग होइ जीआ ॥
अनिक जोनि भरमै भरमीआ ॥

हिन्दी अर्थ: (सर्व-व्यापी प्रभू) कभी पंडित बन के (दूसरों को) उपदेश कर रहा है। कभी मोनी साधू हो के समाधि लगाए बैठा है। कभी तीर्थों के किनारे स्नान कर रहा है। कभी सिद्ध और साधिक (के रूप में) मुंह से ज्ञान की बातें करता है। कभी कीड़े, हाथी, पतंगा (आदि जीव) बना हुआ है और (अपना ही) भरमाया हुआ कई जूनियों में भटक रहा है।

संदर्भ: यह अंग 277 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 63 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 277” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 278 →, पीछे का: ← अंग 276

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।