अंग
301
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭਿ ਕਾਰਜ ਤਿਨ ਕੇ ਸਿਧਿ ਹਹਿ ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਧੁਰਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ॥੨॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਧੁਰਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿ ॥੨॥
सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥
नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥२॥
नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: जिन गुरमुखों पर वह कृपा करता है। उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। (उन्हें मानस जनम के असल व्यापार में घाटा नहीं पड़ता)। (पर) हे नानक ! प्रभू को वही मिले हैं। जो दरगाह से मिले हैं। और जिन्हें सृजनहार हरी ने स्वयं मिलाया है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਚਾ ਗੋਸਾਈ ॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸਭ ਧਿਆਇਦੀ ਸਭ ਲਗੈ ਤੇਰੀ ਪਾਈ ॥
ਤੇਰੀ ਸਿਫਤਿ ਸੁਆਲਿਉ ਸਰੂਪ ਹੈ ਜਿਨਿ ਕੀਤੀ ਤਿਸੁ ਪਾਰਿ ਲਘਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਫਲੁ ਪਾਇਦਾ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ॥
ਵਡੇ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਵਡੀ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਚਾ ਗੋਸਾਈ ॥
ਤੁਧੁਨੋ ਸਭ ਧਿਆਇਦੀ ਸਭ ਲਗੈ ਤੇਰੀ ਪਾਈ ॥
ਤੇਰੀ ਸਿਫਤਿ ਸੁਆਲਿਉ ਸਰੂਪ ਹੈ ਜਿਨਿ ਕੀਤੀ ਤਿਸੁ ਪਾਰਿ ਲਘਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਨੋ ਫਲੁ ਪਾਇਦਾ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ॥
ਵਡੇ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਵਡੀ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥
पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥
तुधुनो सभ धिआइदी सभ लगै तेरी पाई ॥
तेरी सिफति सुआलिउ सरूप है जिनि कीती तिसु पारि लघाई ॥
गुरमुखा नो फलु पाइदा सचि नामि समाई ॥
वडे मेरे साहिबा वडी तेरी वडिआई ॥१॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥
तुधुनो सभ धिआइदी सभ लगै तेरी पाई ॥
तेरी सिफति सुआलिउ सरूप है जिनि कीती तिसु पारि लघाई ॥
गुरमुखा नो फलु पाइदा सचि नामि समाई ॥
वडे मेरे साहिबा वडी तेरी वडिआई ॥१॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! तू सदा स्थिर रहने वाला मालिक है और पृथ्वी का सच्चा साई है। सारी सृष्टि तेरा ध्यान है और सब जीव-जंतु तेरे आगे सिर निवाते हैं। तेरी सिफत-सालाह करना एक सोहाना सुंदर कार्य है। जिसने किया है। उसको (संसार-सागर से) पार उतारता है। हे प्रभू ! जो जीव सतिगुरू के सन्मुख रहते हैं; तू उनकी मेहनत (सिफत-सलाह करने की मेहनत) सफल करता है। तेरे सच्चे नाम में वह लीन हो जाते हैं। हे मेरे मालिक ! (प्रभू ! जैसा) तू खुद है (वैसी ही) तेरी वडिआई (भी) बड़ी (भाव। बड़े गुण पैदा करने वाली) है। 1।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰੁ ਸਲਾਹਣਾ ਸਭੁ ਬੋਲਣੁ ਫਿਕਾ ਸਾਦੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅਹੰਕਾਰੁ ਸਲਾਹਦੇ ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਵਾਦੁ ॥
ਜਿਨ ਸਾਲਾਹਨਿ ਸੇ ਮਰਹਿ ਖਪਿ ਜਾਵੈ ਸਭੁ ਅਪਵਾਦੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਬਰੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਰਮਾਨਾਦੁ ॥੧॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰੁ ਸਲਾਹਣਾ ਸਭੁ ਬੋਲਣੁ ਫਿਕਾ ਸਾਦੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅਹੰਕਾਰੁ ਸਲਾਹਦੇ ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਵਾਦੁ ॥
ਜਿਨ ਸਾਲਾਹਨਿ ਸੇ ਮਰਹਿ ਖਪਿ ਜਾਵੈ ਸਭੁ ਅਪਵਾਦੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਬਰੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਰਮਾਨਾਦੁ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥
मनमुख अहंकारु सलाहदे हउमै ममता वादु ॥
जिन सालाहनि से मरहि खपि जावै सभु अपवादु ॥
जन नानक गुरमुखि उबरे जपि हरि हरि परमानादु ॥१॥
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥
मनमुख अहंकारु सलाहदे हउमै ममता वादु ॥
जिन सालाहनि से मरहि खपि जावै सभु अपवादु ॥
जन नानक गुरमुखि उबरे जपि हरि हरि परमानादु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ हरी के नाम के बिना किसी और की महिमा करनी – ये बोलने का सारा (उद्यम) बे-स्वादा काम है (भाव। इसमें असली आनंद नहीं है)। मनमुख जीव अहंकार। अहंम और अपनत्व की बातों को पसंद करते हैं। इनके आधार पर किसी मनुष्य की निंदा करते हैं और इनका सारा झगड़ा (भाव। उस्तति-निंदा की बातों का सिलसिला) व्यर्थ जाता है। हे नानक ! सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य पूर्ण आनंद स्वरूप प्रभू का सिमरन करके (दूसरे मनुष्यों की उस्तति निंदा के चस्के से) बच निकलते हैं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਦਸਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਮਨਿ ਹਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਵਿਤੁ ਹਰਿ ਮੁਖਿ ਬੋਲੀ ਸਭਿ ਦੁਖ ਪਰਹਰੀ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਦਸਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਮਨਿ ਹਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਪਵਿਤੁ ਹਰਿ ਮੁਖਿ ਬੋਲੀ ਸਭਿ ਦੁਖ ਪਰਹਰੀ ॥੨॥
मः ४ ॥
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥
नानक नामु पवितु हरि मुखि बोली सभि दुख परहरी ॥२॥
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥
नानक नामु पवितु हरि मुखि बोली सभि दुख परहरी ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ हे सतिगुरू ! मुझे प्रभू की बातें सुना (जिससे) मैं हृदय में प्रभू का नाम सिमर सकूँ। हे नानक ! प्रभू का नाम पवित्र है (इसलिए मन चाहता है कि मैं भी) मुँह से उच्चारण करके (अपने) सारे दुख दूर कर लूँ। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਹੈ ਨਿਰੰਜਨ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਜਿਨੀ ਤੂ ਇਕ ਮਨਿ ਸਚੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨ ਕਾ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਤੇਰਾ ਸਰੀਕੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ਜਿਸ ਨੋ ਲਵੈ ਲਾਇ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਤੂਹੈ ਨਿਰੰਜਨਾ ਤੂਹੈ ਸਚੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਸਚੇ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਸਚੇ ਸਚੁ ਨਾਇਆ ॥੨॥
ਤੂ ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਹੈ ਨਿਰੰਜਨ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਜਿਨੀ ਤੂ ਇਕ ਮਨਿ ਸਚੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨ ਕਾ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਤੇਰਾ ਸਰੀਕੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ਜਿਸ ਨੋ ਲਵੈ ਲਾਇ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਤੂਹੈ ਨਿਰੰਜਨਾ ਤੂਹੈ ਸਚੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਸਚੇ ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਸਚੇ ਸਚੁ ਨਾਇਆ ॥੨॥
पउड़ी ॥
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥
जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥
तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥
तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥
सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥२॥
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥
जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥
तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥
तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥
सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे रौशनी देने वाले माया से रहित प्रभू ! तू स्वयं ही स्वयं निरंकार है। हे सच्चे साई ! जिन्होंने एकाग्र हो के तेरा सिमरन किया है। उनका तूने सब दुख दूर कर दिया है। (संसार में) तेरा शरीक कोई नहीं जिसे बराबरी दे के (तेरे जैसा) कहें। हे माया से रहित सच्चे हरी ! तेरे जितना तू स्वयं ही दाता है। तू ही मेरे मन को प्यारा लगता है। हे मेरे सच्चे साहिब ! तेरी बडिआई (महिमा) सदा कायम रहने वाली है। 2।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਹੈ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਮਨਮੁਖ ਦੁਰਜਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰੋਗੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸਜਨਾ ॥੧॥
ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਹੈ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਮਨਮੁਖ ਦੁਰਜਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰੋਗੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸਜਨਾ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥१॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ जिनके मन में अहंकार का रोग है। वे मन के मुरीद विकारी लोग भ्रम में भूले हुए हैं। हे नानक ! ये अहंम् का रोग सतिगुरू को मिल के और सत्संग में रह कर दूर कर। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਤਾ ਰੰਗ ਸਿਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਸਰਣਾਗਤੀ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਗੁਰ ਸਾਬਾਸਿ ॥੨॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਰਤਾ ਰੰਗ ਸਿਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਸਰਣਾਗਤੀ ਹਰਿ ਮੇਲੇ ਗੁਰ ਸਾਬਾਸਿ ॥੨॥
मः ४ ॥
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥
जन नानक हरि सरणागती हरि मेले गुर साबासि ॥२॥
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥
जन नानक हरि सरणागती हरि मेले गुर साबासि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का मन और शरीर गुण-निधान हरी के प्रेम से रंगा रहता है। हे नानक ! जिस जन को सतिगुरू की शाबशी मिलती है। प्रभू की शरण पड़े उस मनुष्य को प्रभू (अपने साथ) मेल लेता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਅਗੰਮੁ ਹੈ ਕਿਸੁ ਨਾਲਿ ਤੂ ਵੜੀਐ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਹੋਇ ਸੁ ਆਖੀਐ ਤੁਧੁ ਜੇਹਾ ਤੂਹੈ ਪੜੀਐ ॥
ਤੂ ਘਟਿ ਘਟਿ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਗੜੀਐ ॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਭਸ ਦਾ ਖਸਮੁ ਹੈ ਸਭ ਦੂ ਤੂ ਚੜੀਐ ॥
ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਹੋਇਸੀ ਤਾ ਕਾਇਤੁ ਕੜੀਐ ॥੩॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਅਗੰਮੁ ਹੈ ਕਿਸੁ ਨਾਲਿ ਤੂ ਵੜੀਐ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਹੋਇ ਸੁ ਆਖੀਐ ਤੁਧੁ ਜੇਹਾ ਤੂਹੈ ਪੜੀਐ ॥
ਤੂ ਘਟਿ ਘਟਿ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਗੜੀਐ ॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਭਸ ਦਾ ਖਸਮੁ ਹੈ ਸਭ ਦੂ ਤੂ ਚੜੀਐ ॥
ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਹੋਇਸੀ ਤਾ ਕਾਇਤੁ ਕੜੀਐ ॥੩॥
पउड़ी ॥
तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥
तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥
तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥
तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥३॥
तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥
तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥
तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥
तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! तू (सारी सृष्टि को) रचने वाला है। (सृष्टि में) व्यापक है (और फिर भी) पहुँच से परे है। किसी के साथ तेरी तुलना नहीं की जा सकती। किस का नाम लें? तेरे जितना और कोई नहीं। तुझे ही तेरे जितना कह सकते हैं। (हे हरी !) तू हरेक शरीर में व्यापक है। (पर ये बात) उनपे प्रगट (होती है) जो सतिगुरू के सन्मुख (होते हैं)। (हे प्रभू !) तू सदा स्थिर रहने वाला सब का मालिक है और सबसे सुंदर (श्रेष्ठ) है। हे सच्चे (हरी !) (अगर हमें ये निश्चय हो जाए कि) जो तू करता है वही होता है। तो हम चिंता क्यों करें?। 3।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਪਿਰੰਮ ਕਾ ਅਠੇ ਪਹਰ ਲਗੰਨਿ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪ੍ਰਭ ਸਤਿਗੁਰ ਸੁਖਿ ਵਸੰਨਿ ॥੧॥
ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਪਿਰੰਮ ਕਾ ਅਠੇ ਪਹਰ ਲਗੰਨਿ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪ੍ਰਭ ਸਤਿਗੁਰ ਸੁਖਿ ਵਸੰਨਿ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥
जन नानक किरपा धारि प्रभ सतिगुर सुखि वसंनि ॥१॥
मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥
जन नानक किरपा धारि प्रभ सतिगुर सुखि वसंनि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४ ॥ (मन चाहता है कि) आठों पहर लग जाएं (भाव। गुजर जाएं) (पर) मेरे हृदय और शरीर में प्यारे का प्यार (लगा रहे। भाव – ना खत्म हो) (क्योंकि) हे नानक ! (जिन) मनुष्यों पर हरी (ऐसी) कृपा करता है वह सतिगुरू के (बख्शे हुए) सुख में (सदा) बसते हैं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰੰਮ ਕੀ ਜਿਉ ਬੋਲਨਿ ਤਿਵੈ ਸੋਹੰਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਆਪੇ ਜਾਣਦਾ ਜਿਨਿ ਲਾਈ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰੰਨਿ ॥੨॥
ਜਿਨ ਅੰਦਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰੰਮ ਕੀ ਜਿਉ ਬੋਲਨਿ ਤਿਵੈ ਸੋਹੰਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਆਪੇ ਜਾਣਦਾ ਜਿਨਿ ਲਾਈ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਰੰਨਿ ॥੨॥
मः ४ ॥
जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥
नानक हरि आपे जाणदा जिनि लाई प्रीति पिरंनि ॥२॥
जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥
नानक हरि आपे जाणदा जिनि लाई प्रीति पिरंनि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ जिन के हृदय में प्रभू का प्यार है। वह जैसे बोलते हैं। वैसे ही शोभा देते हैं (भाव। उनका बोला हुआ मीठा लगता है) (ये एक आश्चर्यजनक चमत्कार है)। हे नानक ! (इस भेद की जीव को समझ नहीं आ सकती) जिस पर (प्रभू) ने ये प्यार लगाया है वह खुद ही जानता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਅਭੁਲੁ ਹੈ ਭੁਲਣ ਵਿਚਿ ਨਾਹੀ ॥
ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਭਲਾ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਹੀ ॥
ਤੂ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ਹੈ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਅਗਮੁ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਸਭਿ ਤੁਧੁ ਧਿਆਹੀ ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਅਭੁਲੁ ਹੈ ਭੁਲਣ ਵਿਚਿ ਨਾਹੀ ॥
ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਸਚੇ ਭਲਾ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਹੀ ॥
ਤੂ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥੁ ਹੈ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਅਗਮੁ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਸਭਿ ਤੁਧੁ ਧਿਆਹੀ ॥
पउड़ी ॥
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥
तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥
तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥
तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥
तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥
तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥
तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे (सृष्टि के) रचनहार ! तू खुद अभॅुल है। भूलता नहीं (गलती नहीं करता)। हे सच्चे ! सतिगुरू के शबद के द्वारा तू ये समझाता है कि जो तू करता है सो ठीक करता है। हे हरी ! तेरा कोई शरीक नहीं और सृष्टि के इस सारे परपंच का मूल तू खुद ही है और समर्था वाला है। तू दया करने वाला मालिक है (पर) तेरे तक पहुँच नहीं हो सकती; सब जीव-जंतु तुझे सिमरते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 301 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Connaught Place के Bangla Sahib में दोपहर 12 बजे का langar-समय, और बीच में यह पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 11 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 301” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 302 →, पीछे का: ← अंग 300।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।