अंग 287

अंग
287
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਅਪਨੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਕਰੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਲੇਇ ॥੨॥
अपनी क्रिपा जिसु आपि करेइ ॥
नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: जिस पर (प्रभू अपनी मेहर करता है)। हे नानक ! वह सेवक सतिगुरू की शिक्षा लेता है 2।
ਬੀਸ ਬਿਸਵੇ ਗੁਰ ਕਾ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਪਰਮੇਸੁਰ ਕੀ ਗਤਿ ਜਾਨੈ ॥
ਸੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਿਸੁ ਰਿਦੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਗੁਰ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਜੀਅ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਮਹਿ ਜਨੁ ਜਨ ਮਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥
ਏਕਹਿ ਆਪਿ ਨਹੀ ਕਛੁ ਭਰਮੁ ॥
ਸਹਸ ਸਿਆਨਪ ਲਇਆ ਨ ਜਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਐਸਾ ਗੁਰੁ ਬਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥੩॥
बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥
सो सेवकु परमेसुर की गति जानै ॥
सो सतिगुरु जिसु रिदै हरि नाउ ॥
अनिक बार गुर कउ बलि जाउ ॥
सरब निधान जीअ का दाता ॥
आठ पहर पारब्रहम रंगि राता ॥
ब्रहम महि जनु जन महि पारब्रहमु ॥
एकहि आपि नही कछु भरमु ॥
सहस सिआनप लइआ न जाईऐ ॥
नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ ॥३॥

हिन्दी अर्थ: जो सेवक अपने सतिगुरू को अपनी श्रद्धा का पूरी तरह से यकीन दिलवा लेता है। वह अकाल-पुरख की अवस्था को समझ लेता है। सतिगुरू (भी) वह है जिसके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। (मैं ऐसे) गुरू से कई बार सदके जाता हूँ। (सतिगुरू) सारे खजानों का और आत्मिक जिंदगी का देने वाला है। (क्योंकि) वह आठों पहर अकाल-पुरख के प्यार में रंगा रहता है। (प्रभू का) सेवक (-सतिगुरू) प्रभू में (जुड़ा रहता है) और (प्रभू के) सेवक-सतिगुरू में प्रभू (सदा टिका हुआ है)। गुरू और प्रभू एक रूप हैं। इसमें भुलेखे वाली बात नहीं। हे नानक ! हजारों चतुराईयों से ऐसा गुरू नहीं मिलता। बहुत भाग्यों से मिलता है। 3।
ਸਫਲ ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਪੁਨੀਤ ॥
ਪਰਸਤ ਚਰਨ ਗਤਿ ਨਿਰਮਲ ਰੀਤਿ ॥
ਭੇਟਤ ਸੰਗਿ ਰਾਮ ਗੁਨ ਰਵੇ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਦਰਗਹ ਗਵੇ ॥
ਸੁਨਿ ਕਰਿ ਬਚਨ ਕਰਨ ਆਘਾਨੇ ॥
ਮਨਿ ਸੰਤੋਖੁ ਆਤਮ ਪਤੀਆਨੇ ॥
ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਅਖੵਓ ਜਾ ਕਾ ਮੰਤ੍ਰ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਪੇਖੈ ਹੋਇ ਸੰਤ ॥
ਗੁਣ ਬਿਅੰਤ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੪॥
सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥
परसत चरन गति निरमल रीति ॥
भेटत संगि राम गुन रवे ॥
पारब्रहम की दरगह गवे ॥
सुनि करि बचन करन आघाने ॥
मनि संतोखु आतम पतीआने ॥
पूरा गुरु अखॵओ जा का मंत्र ॥
अंम्रित द्रिसटि पेखै होइ संत ॥
गुण बिअंत कीमति नही पाइ ॥
नानक जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥४॥

हिन्दी अर्थ: गुरू का दीदार (सारे) फल देने वाला है। दीदार करने से पवित्र हो जाते हैं। गुरू के चरण छूने से उच्च अवस्था और स्वच्छ रहन-सहन हो जाता है। गुरू की संगति में रहने से प्रभू के गुण गा सकते हैं। और अकाल-पुरख की दरगाह में पहुँच हो जाती है। गुरू के बचन सुन के कान तृप्त हो जाते हैं। मन में संतोष आ जाता है और आत्मा पतीज जाती है। सतिगुरू पूरन पुरखु है। उसका उपदेश भी सदा के लिए अटॅल है। (जिस की ओर) अमर करने वाली नजर से देखता है वही संत हो जाता है। सतिगुरू के गुण बेअंत हैं। मूल्य नहीं पड़ सकता। हे नानक ! जो जीव (प्रभू को) अच्छा लगता है। उसे गुरू के साथ मिलाता है। 4।
ਜਿਹਬਾ ਏਕ ਉਸਤਤਿ ਅਨੇਕ ॥
ਸਤਿ ਪੁਰਖ ਪੂਰਨ ਬਿਬੇਕ ॥ ਕਾਹੂ ਬੋਲ ਨ ਪਹੁਚਤ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਪ੍ਰਭ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥
ਨਿਰਾਹਾਰ ਨਿਰਵੈਰ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈ ॥
ਅਨਿਕ ਭਗਤ ਬੰਦਨ ਨਿਤ ਕਰਹਿ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਹਿਰਦੈ ਸਿਮਰਹਿ ॥
ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰ ਅਪਨੇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਐਸਾ ਪ੍ਰਭੁ ਜਪਨੇ ॥੫॥
जिहबा एक उसतति अनेक ॥
सति पुरख पूरन बिबेक ॥ काहू बोल न पहुचत प्रानी ॥
अगम अगोचर प्रभ निरबानी ॥
निराहार निरवैर सुखदाई ॥
ता की कीमति किनै न पाई ॥
अनिक भगत बंदन नित करहि ॥
चरन कमल हिरदै सिमरहि ॥
सद बलिहारी सतिगुर अपने ॥
नानक जिसु प्रसादि ऐसा प्रभु जपने ॥५॥

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य की) जीभ एक है पर पूरन पुरख सदा स्थिर व्यापक प्रभू के अनेकों गुण हैं। मनुष्य किसी बोल के द्वारा (प्रभू के गुणों तक) नहीं पहुँच सकता। प्रभू पहुँच से परे है। वासना-रहित है। और मनुष्य की शारीरिक इंद्रियों की उस तक पहुँच नहीं। अकाल-पुरख को किसी खुराक की जरूरत नहीं। प्रभू वैर-रहित है (बल्कि। सबको) सुख देने वाला है। कोई जीव उस (के गुणों) का मूल्य नहीं पा सका। अनेकों भक्त सदा (प्रभू को) नमस्कार करते हैं। और उसके कमल समान (सुंदर) चरणों को अपने हृदय में सिमरते हैं। हे नानक ! (कह,) जिस गुरू की मेहर से ऐसे प्रभू को जप सकते हैं। मैं अपने उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ। 5।
ਇਹੁ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ਅਮਰੁ ਸੋ ਹੋਇ ॥
ਉਸੁ ਪੁਰਖ ਕਾ ਨਾਹੀ ਕਦੇ ਬਿਨਾਸ ॥ ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਪ੍ਰਗਟੇ ਗੁਨਤਾਸ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਲੇਇ ॥
ਸਚੁ ਉਪਦੇਸੁ ਸੇਵਕ ਕਉ ਦੇਇ ॥
ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨ ਲੇਪੁ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਰਾਖੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਏਕੁ ॥
ਅੰਧਕਾਰ ਦੀਪਕ ਪਰਗਾਸੇ ॥
ਨਾਨਕ ਭਰਮ ਮੋਹ ਦੁਖ ਤਹ ਤੇ ਨਾਸੇ ॥੬॥
इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥
अंम्रितु पीवै अमरु सो होइ ॥
उसु पुरख का नाही कदे बिनास ॥ जा कै मनि प्रगटे गुनतास ॥
आठ पहर हरि का नामु लेइ ॥
सचु उपदेसु सेवक कउ देइ ॥
मोह माइआ कै संगि न लेपु ॥
मन महि राखै हरि हरि एकु ॥
अंधकार दीपक परगासे ॥
नानक भरम मोह दुख तह ते नासे ॥६॥

हिन्दी अर्थ: कोई विरला मनुष्य ही प्रभू के नाम का स्वाद लेता है (और जो लेता है) वह नाम-अमृत पीता है और अमर हो जाता है। जिसके मन में गुणों के खजाने प्रभू का प्रकाश होता है। उसका कभी नाश नहीं होता (भाव। वह बार बार मौत का शिकार नहीं होता)। (सतिगुरू) आठों पहर प्रभू का नाम सिमरता है। और अपने सेवक को भी यही सच्चा उपदेश देता है। माया के मोह से उसका कभी लगाव नहीं होता। वह सदा अपने मन में एक प्रभू को टिकाता है। हे नानक ! (जिसके अंदर से) (नाम-रूपी) दीए से (अज्ञानता का) अंधेरा (हट के) प्रकाश हो जाता है। उसके भुलेखे और मोह के (कारण पैदा हुए) दुख दूर हो जाते हैं। 6।
ਤਪਤਿ ਮਾਹਿ ਠਾਢਿ ਵਰਤਾਈ ॥
ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਦੁਖ ਨਾਠੇ ਭਾਈ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਕੇ ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸੇ ॥
ਸਾਧੂ ਕੇ ਪੂਰਨ ਉਪਦੇਸੇ ॥
ਭਉ ਚੂਕਾ ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ਬਸੇ ॥
ਸਗਲ ਬਿਆਧਿ ਮਨ ਤੇ ਖੈ ਨਸੇ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਾ ਤਿਨਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਥਿਤਿ ਪਾਈ ਚੂਕੇ ਭ੍ਰਮ ਗਵਨ ॥
ਸੁਨਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸ੍ਰਵਨ ॥੭॥
तपति माहि ठाढि वरताई ॥
अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
जनम मरन के मिटे अंदेसे ॥
साधू के पूरन उपदेसे ॥
भउ चूका निरभउ होइ बसे ॥
सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
जिस का सा तिनि किरपा धारी ॥
साधसंगि जपि नामु मुरारी ॥
थिति पाई चूके भ्रम गवन ॥
सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥७॥

हिन्दी अर्थ: तपश में (बसते हुए भी। प्रभू ने हमारे अंदर) ठंड वरता दी है, सुख ही सुख हो गया है, दुख भाग गए हैं और जनम मरन के (चक्कर में पड़ने के) डर फिक्र मिट गए हैं, हे भाई ! (यह सब) गुरू के पूरे उपदेश से हुआ । (सारा) डर खत्म हो गया है अब निडर बसते हैं रोग नाश हो के मन से बिसर गए हैं,और जिस गुरू के बने थे, उसने (हमारे पर) कृपा की है, (यह सब) सत्संग में प्रभू का नाम जप के हुआ (हमारे) भुलेखे और भटकनें समाप्त हो गई हैं। हे नानक ! प्रभू का यश कानों से सुन के (हमने) शांति हासिल कर ली है 7।
ਨਿਰਗੁਨੁ ਆਪਿ ਸਰਗੁਨੁ ਭੀ ਓਹੀ ॥
ਕਲਾ ਧਾਰਿ ਜਿਨਿ ਸਗਲੀ ਮੋਹੀ ॥
ਅਪਨੇ ਚਰਿਤ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਬਨਾਏ ॥
ਅਪੁਨੀ ਕੀਮਤਿ ਆਪੇ ਪਾਏ ॥
ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਏਕੋ ਸੋਇ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਰਵਿਆ ਰੂਪ ਰੰਗ ॥
ਭਏ ਪ੍ਰਗਾਸ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗ ॥
निरगुनु आपि सरगुनु भी ओही ॥
कला धारि जिनि सगली मोही ॥
अपने चरित प्रभि आपि बनाए ॥
अपुनी कीमति आपे पाए ॥
हरि बिनु दूजा नाही कोइ ॥
सरब निरंतरि एको सोइ ॥
ओति पोति रविआ रूप रंग ॥
भए प्रगास साध कै संग ॥

हिन्दी अर्थ: वह स्वयं माया के तीनों गुणों से अलग है। त्रिगुणी संसार का रूप भी स्वयं ही है। जिस प्रभू ने अपनी ताकत कायम करके सारे जगत को मोह लिया है। प्रभू ने अपने खेल तमाशे स्वयं ही बनाए हैं। अपनी बुजुर्गी का मूल्य भी खुद ही डालता है। प्रभू के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। सब के अंदर प्रभू स्वयं ही (मौजूद) है। ओत-प्रोत सारे रूपों और रंगों में व्यापक है; ये प्रकाश (भाव। समझ) सतिगुरू की संगति में प्रकाशित होता है।

संदर्भ: यह अंग 287 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 287” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 288 →, पीछे का: ← अंग 286

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।