अंग 211

अंग
211
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਚਾਕਰ ਸੇ ਭਲੇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮੁਖ ਊਜਲੇ ॥੪॥੩॥੧੪੧॥
प्रभ के चाकर से भले ॥
नानक तिन मुख ऊजले ॥४॥३॥१४१॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह, जो मनुष्य) परमात्मा के सेवक बनते हैं~ वे भाग्यशाली हो जाते हैं (परमात्मा के दरबार में) उनके मुंह रौशन रहते हैं। 4। 3। 141।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਅਰੇ ਓਲੑਾ ਨਾਮ ਕਾ ॥
ਅਵਰੁ ਜਿ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨੋ ਤਿਨ ਮਹਿ ਭਉ ਹੈ ਜਾਮ ਕਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਵਰ ਜਤਨਿ ਨਹੀ ਪਾਈਐ ॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥
ਲਾਖ ਹਿਕਮਤੀ ਜਾਨੀਐ ॥
ਆਗੈ ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਮਾਨੀਐ ॥੨॥
ਅਹੰਬੁਧਿ ਕਰਮ ਕਮਾਵਨੇ ॥ ਗ੍ਰਿਹ ਬਾਲੂ ਨੀਰਿ ਬਹਾਵਨੇ ॥੩॥
ਪ੍ਰਭੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ॥
ਨਾਮੁ ਨਾਨਕ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਮਿਲੈ ॥੪॥੪॥੧੪੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
जीअरे ओल॑ा नाम का ॥
अवरु जि करन करावनो तिन महि भउ है जाम का ॥१॥ रहाउ ॥
अवर जतनि नही पाईऐ ॥
वडै भागि हरि धिआईऐ ॥१॥
लाख हिकमती जानीऐ ॥
आगै तिलु नही मानीऐ ॥२॥
अहंबुधि करम कमावने ॥ ग्रिह बालू नीरि बहावने ॥३॥
प्रभु क्रिपालु किरपा करै ॥
नामु नानक साधू संगि मिलै ॥४॥४॥१४२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम भूल जाता है उसे ही दुख आ घेरता है। जो मनुष्य साध-संगति में बैठ के परमात्मा का नाम सिमरते हैं~ वह गुणों के मालिक बन जाते हैं~ वह गहरे जिगरे वाले बन जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य के हृदय में (सिमरन की) सूझ पैदा हो जाती है~ उस मनुष्य के हाथों की तलियों पर नौ खजाने और सारी सिद्धियां (आ टिकती हैं)। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य (सब खजानों के) मालिक हरी प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं~ उनके घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहती। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने सिरजनहार करतार के साथ मेल-जोल बना लिया~ वह आत्मिक सुख और आनंद भोगता है। 3। हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों के हृदय-घर में परमात्मा का नाम धन आ बसता है~ उनकी संगति में रहने से हर किस्म के दुख दूर हो जाते हैं। 4। 9। 147।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਾਰਨੈ ਬਲਿਹਾਰਨੈ ਲਖ ਬਰੀਆ ॥
ਨਾਮੋ ਹੋ ਨਾਮੁ ਸਾਹਿਬ ਕੋ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਤੁਹੀ ਏਕ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਕੀ ਤੁਹੀ ਟੇਕ ॥੧॥
ਰਾਜ ਜੋਬਨ ਪ੍ਰਭ ਤੂੰ ਧਨੀ ॥ ਤੂੰ ਨਿਰਗੁਨ ਤੂੰ ਸਰਗੁਨੀ ॥੨॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਤੁਮ ਰਖੇ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਕੋ ਲਖੇ ॥੩॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਪ੍ਰਭ ਸੁਜਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਕੀਆ ਤੁਹੀ ਤਾਣੁ ॥੪॥੫॥੧੪੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
बारनै बलिहारनै लख बरीआ ॥
नामो हो नामु साहिब को प्रान अधरीआ ॥१॥ रहाउ ॥
करन करावन तुही एक ॥
जीअ जंत की तुही टेक ॥१॥
राज जोबन प्रभ तूं धनी ॥ तूं निरगुन तूं सरगुनी ॥२॥
ईहा ऊहा तुम रखे ॥
गुर किरपा ते को लखे ॥३॥
अंतरजामी प्रभ सुजानु ॥
नानक तकीआ तुही ताणु ॥४॥५॥१४३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे जीव ! तुझे (अपने आप का) अहंकार तो बहुत है~ पर (इस अहंकार का) मूल (मेरा अपना विक्त) थोड़ा सा ही है। (इस संसार में तेरा सदा के लिए) ठिकाना नहीं है~ पर तेरी माया के वास्ते कशिश बहुत ज्यादा है। 1। रहाउ। हे जीव ! (जिस माया के मोह से) वेद आदिक धार्मिक पुस्तकें विवर्जित (रोकती) करती हैं~ उससे तेरा प्यार बना रहता है। तू जीवन बाजी हार रहा है जैसे जूए में जुआरी हारता है। इंद्रियों (काम वासना आदि) ने अपने वश में ले कर तुझे जीता हुआ है। 1। हे जीव ! सब जीवों के नाश करने वाले और पालने वाले परमात्मा के सुंदर चरणों के प्रेम में (टिकने) से तू वंचित है। हे नानक ! (कह, जो मनुष्य) साध-संगति में (जुड़ते हैं वह माया के मोह से) बच जाते हैं। कृपा के खजाने परमात्मा ने (अपनी कृपा करके) मुझे (नानक को अपने चरणों के प्यार की दाति) दी है। 2। 10। 148। हे ठाकुर ! लोक-परलोक में तुम ही मेरे रक्षक हो। पालनहार प्रभू का मैं एक निमाणा सा सेवक हूँ~ मैं उसी प्रभू का दिया हुआ अन्न ही खाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा पति प्रभू ऐसा है कि
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਰਾਧੀਐ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਭਰਮੁ ਮੋਹੁ ਭਉ ਸਾਧੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਭਨੇ ॥
ਸਭ ਊਚ ਬਿਰਾਜਿਤ ਜਨ ਸੁਨੇ ॥੧॥
ਸਗਲ ਅਸਥਾਨ ਭੈ ਭੀਤ ਚੀਨ ॥
ਰਾਮ ਸੇਵਕ ਭੈ ਰਹਤ ਕੀਨ ॥੨॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਜੋਨਿ ਫਿਰਹਿ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਲੋਕ ਨਹੀ ਜਨਮਿ ਮਰਹਿ ॥੩॥
ਬਲ ਬੁਧਿ ਸਿਆਨਪ ਹਉਮੈ ਰਹੀ ॥ ਹਰਿ ਸਾਧ ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਗਹੀ ॥੪॥੬॥੧੪੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि हरि हरि आराधीऐ ॥
संतसंगि हरि मनि वसै भरमु मोहु भउ साधीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
बेद पुराण सिम्रिति भने ॥
सभ ऊच बिराजित जन सुने ॥१॥
सगल असथान भै भीत चीन ॥
राम सेवक भै रहत कीन ॥२॥
लख चउरासीह जोनि फिरहि ॥
गोबिंद लोक नही जनमि मरहि ॥३॥
बल बुधि सिआनप हउमै रही ॥ हरि साध सरणि नानक गही ॥४॥६॥१४४॥

हिन्दी अर्थ: एक छिन में रचना रच के उसे सुंदर बनाने की स्मर्था रखता है। 1। (हे भाई !मैं ठाकुर प्रभू का दिया हुआ खाता हूँ) अगर उस ठाकुर प्रभू की किरपा मुझ पर हो~ तो मैं (उस का ही) काम करूँ~ उसके गुण गाता रहूँ~ उसी के सिफत सालाह के गीत गुनगुनाता रहूँ। 2। (हे भाई !) मैं उस ठाकुर प्रभू के वजीरों (संत जनों) की शरण आ पड़ा हूँ~ उनका दर्शन करके मेरे मन को भी हौसला बन रहा है (कि मैं उस मालिक की सिफत सालाह कर सकूँगां)। 3। हे दास नानक ! (कह, ठाकुर के वजीरों की शरण पड़ कर) मैंने एक परमात्मा को ही (अपने जीवन का) ओट-आसरा बनाया है~ और परमातमा (की सिफत सालाह) के काम में लगा हुआ हूँ। 4। 11। 149। प्राणी चौरासी लाख योनियों में भटकते फिरते हैं (हे भाई !) कहीं कोई ऐसा मनुष्य भी मिल जाएगा जो (मेरे) इस मन को इस मीठी (लगने वाली माया के मोह) को रोक सके?। 1। (हे भाई !इस मिठाई के असर में) मनुष्य अपनी अक्ल गवा बैठा है (क्योंकि) जो (सदा साथ निभने वाली) नहीं है उसी को तलाशता फिरता है।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਈਐ ॥
ਨੀਤ ਨੀਤ ਹਰਿ ਸੇਵੀਐ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ॥
ਦੁਖੁ ਦਰਦੁ ਅਨੇਰਾ ਭ੍ਰਮੁ ਨਸੈ ॥੧॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਜਾਪੀਐ ॥ ਸੋ ਜਨੁ ਦੂਖਿ ਨ ਵਿਆਪੀਐ ॥੨॥
ਜਾ ਕਉ ਗੁਰੁ ਹਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦੇ ॥
ਸੋ ਉਬਰਿਆ ਮਾਇਆ ਅਗਨਿ ਤੇ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਪ੍ਰਭ ਮਇਆ ਕਰਿ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਵਾਸੈ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ॥੪॥੭॥੧੪੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
मन राम नाम गुन गाईऐ ॥
नीत नीत हरि सेवीऐ सासि सासि हरि धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
संतसंगि हरि मनि वसै ॥
दुखु दरदु अनेरा भ्रमु नसै ॥१॥
संत प्रसादि हरि जापीऐ ॥ सो जनु दूखि न विआपीऐ ॥२॥
जा कउ गुरु हरि मंत्रु दे ॥
सो उबरिआ माइआ अगनि ते ॥३॥
नानक कउ प्रभ मइआ करि ॥
मेरै मनि तनि वासै नामु हरि ॥४॥७॥१४५॥

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य के मन में माया के मोह की) काली अंधियारी रात बनी हुई है। (हे भाई !) वह कौन सा तरीका हो सकता है जिससे (इसके अंदर ज्ञान का) दिन चढ़ जाए?। 1। हे नानक ! कह, (मीठी माया के मोह से मन को रोक सकने वाले की) अनेकों ढंग-तरीकों से तलाश करता-करता और भटकता-भटकता मैं थक गया। (तब प्रभू की मुझ पर) मेहर हुई (अब) साध-संगति ही मेरे वास्ते (उनके सारे गुणों का) खजाना है (जिनकी बरकति से मीठी माया के मोह से मन रुक सकता है)। 2। 12। 150। संतों की संगति द्वारा ही ईश्वर मन में निवास करता है हे तरस-रूप प्रभू ! तू ही ऐसा रत्न है जो सब जीवों की चितवी हुई कामनाएं पूरी करने वाला है। 1। रहाउ। हे पारब्रहम प्रभू ! तू गरीबों पर दया करने वाला है (तू ऐसा है) जिसके सिमरन की बरकति से सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1। हे अकाल-पुरख ! तेरे स्वरूप की समझ जीवों की अक्ल से परे है~ तेरी सिफत सालाह सुनने से करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं। 2। हे नानक ! (अरदास कर और कह,) हे किरपा के खजाने प्रभू ! जिस मनुष्य पर तू तरस करता है~ वह तेरा हरि नाम सिमरता है। 3। 13।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਸਨਾ ਜਪੀਐ ਏਕੁ ਨਾਮ ॥
ਈਹਾ ਸੁਖੁ ਆਨੰਦੁ ਘਨਾ ਆਗੈ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਟੀਐ ਤੇਰਾ ਅਹੰ ਰੋਗੁ ॥
ਤੂੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕਰਿ ਰਾਜ ਜੋਗੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਜਿਨਿ ਜਨਿ ਚਾਖਿਆ ॥
ਤਾ ਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਲਾਥੀਆ ॥੨॥
ਹਰਿ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ਨਿਧਿ ਪਾਇਆ ॥
ਸੋ ਬਹੁਰਿ ਨ ਕਤ ਹੀ ਧਾਇਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਾ ਭਉ ਗਇਆ ॥੪॥੮॥੧੪੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
रसना जपीऐ एकु नाम ॥
ईहा सुखु आनंदु घना आगै जीअ कै संगि काम ॥१॥ रहाउ ॥
कटीऐ तेरा अहं रोगु ॥
तूं गुर प्रसादि करि राज जोगु ॥१॥
हरि रसु जिनि जनि चाखिआ ॥
ता की त्रिसना लाथीआ ॥२॥
हरि बिस्राम निधि पाइआ ॥
सो बहुरि न कत ही धाइआ ॥३॥
हरि हरि नामु जा कउ गुरि दीआ ॥
नानक ता का भउ गइआ ॥४॥८॥१४६॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ता है~ वह आत्मिक आनंद पाता है। जिस दिन जिंद का दाता सुखों का देने वाला (प्रभू) जीव को बिसर जाता है~ (उसका) वह दिन व्यर्थ चला जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) तुम एक रात (कहीं सफर में) गुजारने वाले मेहमान की तरह (जगत में) आए हो पर यहां कई युग जीते रहने की उम्मीदें बाँध रहे हो। (हे भाई !) ये घर-महल~ धन-पदार्थ – जो कुछ दिख रहा है~ ये सभ वृक्ष की छाया की तरह है (सदा साथ नहीं निभाता)। 1। ये शरीर मेरा है~ ये धन-पदार्थ सारा मेरा है~ ये बाग मेरे हैं~ ये जमीनें मेरी हैं~ ये सारे स्थान मेरे हैं, (हे भाई ! इस ममता में फंस के मनुष्य को ये सब कुछ) देने वाला परमात्मा ठाकुर भूल जाता है (और~ ये सारे ही पदार्थ) एक छिन में पराए हो जाते हैं (इस तरह आखिर खाली हाथ चल पड़ता है)। 2। मनुष्य नहा-धो के सफेद साफ कपड़े पहनता है~ इत्र और चंदन आदि (शरीर को कपड़ों को) लगाता है~ पर यदि मनुष्य निरभउ~ निरंकार के साथ जान-पहिचान नहीं डालता तो ये सब उद्यम यूँ ही हैं जैसे कोई मनुष्य हाथी को नहलाता है (और नहाने के बाद हाथी अपने ऊपर धूल डाल लेता है)। 3। (पर) हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश?) जब परमात्मा (किसी पर) दयावान होता है~ तब उसे गुरू मिलाता है (गुरू उसे नाम की दाति देता है जिस) हरी-नाम में सारे ही सुख हैं। जिस मनुष्य के (माया के मोह के) बंधन गुरू ने खोल दिए~ वह मनुष्य (ही) परमात्मा के गुण गाता है। 4। 14। 152।

संदर्भ: यह अंग 211 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Khan Market की किताबों की दुकान में किसी पुरानी कविता-book को उठाते-उठाते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 211” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 212 →, पीछे का: ← अंग 210

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।