अंग
186
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪੀਊ ਦਾਦੇ ਕਾ ਖੋਲਿ ਡਿਠਾ ਖਜਾਨਾ ॥
ਤਾ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਇਆ ਨਿਧਾਨਾ ॥੧॥
ਰਤਨ ਲਾਲ ਜਾ ਕਾ ਕਛੂ ਨ ਮੋਲੁ ॥ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ਅਖੂਟ ਅਤੋਲ ॥੨॥
ਖਾਵਹਿ ਖਰਚਹਿ ਰਲਿ ਮਿਲਿ ਭਾਈ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਵਧਦੋ ਜਾਈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖੁ ਲਿਖਾਇ ॥
ਸੁ ਏਤੁ ਖਜਾਨੈ ਲਇਆ ਰਲਾਇ ॥੪॥੩੧॥੧੦੦॥
ਤਾ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਇਆ ਨਿਧਾਨਾ ॥੧॥
ਰਤਨ ਲਾਲ ਜਾ ਕਾ ਕਛੂ ਨ ਮੋਲੁ ॥ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ਅਖੂਟ ਅਤੋਲ ॥੨॥
ਖਾਵਹਿ ਖਰਚਹਿ ਰਲਿ ਮਿਲਿ ਭਾਈ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਵਧਦੋ ਜਾਈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖੁ ਲਿਖਾਇ ॥
ਸੁ ਏਤੁ ਖਜਾਨੈ ਲਇਆ ਰਲਾਇ ॥੪॥੩੧॥੧੦੦॥
पीऊ दादे का खोलि डिठा खजाना ॥
ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥१॥
रतन लाल जा का कछू न मोलु ॥ भरे भंडार अखूट अतोल ॥२॥
खावहि खरचहि रलि मिलि भाई ॥
तोटि न आवै वधदो जाई ॥३॥
कहु नानक जिसु मसतकि लेखु लिखाइ ॥
सु एतु खजानै लइआ रलाइ ॥४॥३१॥१००॥
ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥१॥
रतन लाल जा का कछू न मोलु ॥ भरे भंडार अखूट अतोल ॥२॥
खावहि खरचहि रलि मिलि भाई ॥
तोटि न आवै वधदो जाई ॥३॥
कहु नानक जिसु मसतकि लेखु लिखाइ ॥
सु एतु खजानै लइआ रलाइ ॥४॥३१॥१००॥
हिन्दी अर्थ: जब मैंने गुरू नानक देव से लेकर सारे गुरू साहिबान की बाणी का खजाना खोल के देखा~ तब मेरे मन में आत्मिक आनंद का भण्डार भर गया। 1। इस खजाने में परमात्मा की सिफत सालाह के अमोलक रत्नों-लालों के भण्डार भरे हुए (मैंने देखे)~जो कभी खत्म नहीं हो सकते~ जो तौले नहीं जा सकते। 2। हे भाई ! जो मनुष्य (सत्संग में) इकट्ठे हो के इन भण्डारों को खुद इस्तेमाल करते हैं व औरों को भी बाँटते हैं~ उनके पास इस खजाने की कमी नहीं होती~ बल्कि और और बढ़होत्तरी होती है। 3। (पर) हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के माथे पे परमात्मा की बख्शिश का लेख लिखा होता है~ वही इस (सिफत सालाह के) खजाने में भागीदार बनाया जाता है (भाव~ वही साध-संगति में आ के सिफत सालाह की बाणी का आनंद पाता है)। 4। 31। 100।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਡਰਿ ਡਰਿ ਮਰਤੇ ਜਬ ਜਾਨੀਐ ਦੂਰਿ ॥
ਡਰੁ ਚੂਕਾ ਦੇਖਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪਨੇ ਕਉ ਬਲਿਹਾਰੈ ॥
ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਸਰਪਰ ਤਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਖੁ ਰੋਗੁ ਸੋਗੁ ਬਿਸਰੈ ਜਬ ਨਾਮੁ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਜਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਮੁ ॥੨॥
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਕੋਈ ਨ ਕਹੀਜੈ ॥
ਛੋਡਿ ਮਾਨੁ ਹਰਿ ਚਰਨ ਗਹੀਜੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਚਿਤਾਰਿ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੪॥੩੨॥੧੦੧॥
ਡਰਿ ਡਰਿ ਮਰਤੇ ਜਬ ਜਾਨੀਐ ਦੂਰਿ ॥
ਡਰੁ ਚੂਕਾ ਦੇਖਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪਨੇ ਕਉ ਬਲਿਹਾਰੈ ॥
ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਸਰਪਰ ਤਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਖੁ ਰੋਗੁ ਸੋਗੁ ਬਿਸਰੈ ਜਬ ਨਾਮੁ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਜਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਮੁ ॥੨॥
ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਕੋਈ ਨ ਕਹੀਜੈ ॥
ਛੋਡਿ ਮਾਨੁ ਹਰਿ ਚਰਨ ਗਹੀਜੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਚਿਤਾਰਿ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੪॥੩੨॥੧੦੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥
डरु चूका देखिआ भरपूरि ॥१॥
सतिगुर अपने कउ बलिहारै ॥
छोडि न जाई सरपर तारै ॥१॥ रहाउ ॥
दूखु रोगु सोगु बिसरै जब नामु ॥
सदा अनंदु जा हरि गुण गामु ॥२॥
बुरा भला कोई न कहीजै ॥
छोडि मानु हरि चरन गहीजै ॥३॥
कहु नानक गुर मंत्रु चितारि ॥
सुखु पावहि साचै दरबारि ॥४॥३२॥१०१॥
डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥
डरु चूका देखिआ भरपूरि ॥१॥
सतिगुर अपने कउ बलिहारै ॥
छोडि न जाई सरपर तारै ॥१॥ रहाउ ॥
दूखु रोगु सोगु बिसरै जब नामु ॥
सदा अनंदु जा हरि गुण गामु ॥२॥
बुरा भला कोई न कहीजै ॥
छोडि मानु हरि चरन गहीजै ॥३॥
कहु नानक गुर मंत्रु चितारि ॥
सुखु पावहि साचै दरबारि ॥४॥३२॥१०१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ जब तक हम ये समझते हैं कि परमात्मा कहीं दूर बसता है~ तब तक (दुनिया के दुख रोग फिक्रों से) सहम सहम के आत्मिक मौत मरते रहते हैं। जब उसे (सारे संसार में कण कण में) व्यापक देख लिया~ (उस वक्त दुनिया के दुख आदिक का) भय खत्म हो गया। 1। मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ~ वह (दुख-रोग-सोग आदिक के समुंद्र में हम डूबतों को) छोड़ के नहीं जाता~ वह (इस समुंद्र में से) जरूर पार लंघाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !दुनिया का) दुख रोग फिक्र (तभी व्यापता) है जब परमात्मा का नाम भूल जाता है। जब परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते हैं तो (मन में) सदा आनंद बना रहता है। 2। (हे भाई !) ना किसी की निंदा करनी चाहिए~ ना किसी की खुशामद। (दुनिया का) मान त्याग के परमात्मा के चरण (हृदय में) टिका लेने चाहिए। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) गुरू का उपदेश अपने चित्त में परोए रख~ सदा कायम रहने वाले परमात्मा की दरगाह में आनंद पाऐगा। 4। 32। 101।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕਾ ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਹੈ ਸਮੀਆ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਕਹੁ ਕਾ ਕੀ ਕਮੀਆ ॥੧॥
ਜਾ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿਉ ਲਾਗੀ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਭ੍ਰਮੁ ਤਾ ਕਾ ਭਾਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕਉ ਰਸੁ ਹਰਿ ਰਸੁ ਹੈ ਆਇਓ ॥
ਸੋ ਅਨ ਰਸ ਨਾਹੀ ਲਪਟਾਇਓ ॥੨॥
ਜਾ ਕਾ ਕਹਿਆ ਦਰਗਹ ਚਲੈ ॥
ਸੋ ਕਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਲੈ ਆਵੈ ਤਲੈ ॥੩॥
ਜਾ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਾ ਕਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਉ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੪॥੩੩॥੧੦੨॥
ਜਾ ਕਾ ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਹੈ ਸਮੀਆ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਕਹੁ ਕਾ ਕੀ ਕਮੀਆ ॥੧॥
ਜਾ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿਉ ਲਾਗੀ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਭ੍ਰਮੁ ਤਾ ਕਾ ਭਾਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕਉ ਰਸੁ ਹਰਿ ਰਸੁ ਹੈ ਆਇਓ ॥
ਸੋ ਅਨ ਰਸ ਨਾਹੀ ਲਪਟਾਇਓ ॥੨॥
ਜਾ ਕਾ ਕਹਿਆ ਦਰਗਹ ਚਲੈ ॥
ਸੋ ਕਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਲੈ ਆਵੈ ਤਲੈ ॥੩॥
ਜਾ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਾ ਕਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਉ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੪॥੩੩॥੧੦੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
जा का मीतु साजनु है समीआ ॥
तिसु जन कउ कहु का की कमीआ ॥१॥
जा की प्रीति गोबिंद सिउ लागी ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागी ॥१॥ रहाउ ॥
जा कउ रसु हरि रसु है आइओ ॥
सो अन रस नाही लपटाइओ ॥२॥
जा का कहिआ दरगह चलै ॥
सो किस कउ नदरि लै आवै तलै ॥३॥
जा का सभु किछु ता का होइ ॥
नानक ता कउ सदा सुखु होइ ॥४॥३३॥१०२॥
जा का मीतु साजनु है समीआ ॥
तिसु जन कउ कहु का की कमीआ ॥१॥
जा की प्रीति गोबिंद सिउ लागी ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागी ॥१॥ रहाउ ॥
जा कउ रसु हरि रसु है आइओ ॥
सो अन रस नाही लपटाइओ ॥२॥
जा का कहिआ दरगह चलै ॥
सो किस कउ नदरि लै आवै तलै ॥३॥
जा का सभु किछु ता का होइ ॥
नानक ता कउ सदा सुखु होइ ॥४॥३३॥१०२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ जिस मनुष्य को (ये यकीन बन जाए कि उसका) सज्जन प्रभू~ मित्र प्रभू हर जगह व्यापक है~ (हे भाई !) बता~ उस मनुष्य को (फिर) किस चीज की कमी रह जाती है?। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य का प्यार परमात्मा के साथ बन जाता है उसके हरेक दुख~ हरेक दर्द~ हरेक भरम-वहिम दूर हो जाते हैं। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का आनंद आ जाता है~ वह (दुनिया के) अन्य (पदार्थों के) स्वादों से नहीं चिपकता। 2। जिस मनुष्य के बोले हुए बोल परमात्मा की हजूरी में माने जाते हैं~ उसे किसी और की मुथाजी (अधीनगी) नहीं रह जाती। 3। जिस परमातमा का रचा हुआ ये संसार है उस परमात्मा का सेवक जो मनुष्य बन जाता है हे नानक ! उसे सदा आनंद प्राप्त रहता है। 4। 33। 102।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕੈ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਪੈ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਾੜਾ ਕਹਾ ਬਿਆਪੈ ॥੧॥
ਸਹਜ ਅਨੰਦ ਹਰਿ ਸਾਧੂ ਮਾਹਿ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਅਚਿੰਤੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਚਿੰਤਾ ਕਤਹੂੰ ਨਾਹਿ ॥੨॥
ਜਾ ਕੈ ਬਿਨਸਿਓ ਮਨ ਤੇ ਭਰਮਾ ॥
ਤਾ ਕੈ ਕਛੂ ਨਾਹੀ ਡਰੁ ਜਮਾ ॥੩॥
ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਨਾਮਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਸਗਲ ਨਿਧਾਨਾ ॥੪॥੩੪॥੧੦੩॥
ਜਾ ਕੈ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਪੈ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਾੜਾ ਕਹਾ ਬਿਆਪੈ ॥੧॥
ਸਹਜ ਅਨੰਦ ਹਰਿ ਸਾਧੂ ਮਾਹਿ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਅਚਿੰਤੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਚਿੰਤਾ ਕਤਹੂੰ ਨਾਹਿ ॥੨॥
ਜਾ ਕੈ ਬਿਨਸਿਓ ਮਨ ਤੇ ਭਰਮਾ ॥
ਤਾ ਕੈ ਕਛੂ ਨਾਹੀ ਡਰੁ ਜਮਾ ॥੩॥
ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਨਾਮਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਸਗਲ ਨਿਧਾਨਾ ॥੪॥੩੪॥੧੦੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥
ता कउ काड़ा कहा बिआपै ॥१॥
सहज अनंद हरि साधू माहि ॥
आगिआकारी हरि हरि राइ ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै अचिंतु वसै मनि आइ ॥
ता कउ चिंता कतहूं नाहि ॥२॥
जा कै बिनसिओ मन ते भरमा ॥
ता कै कछू नाही डरु जमा ॥३॥
जा कै हिरदै दीओ गुरि नामा ॥
कहु नानक ता कै सगल निधाना ॥४॥३४॥१०३॥
जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥
ता कउ काड़ा कहा बिआपै ॥१॥
सहज अनंद हरि साधू माहि ॥
आगिआकारी हरि हरि राइ ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै अचिंतु वसै मनि आइ ॥
ता कउ चिंता कतहूं नाहि ॥२॥
जा कै बिनसिओ मन ते भरमा ॥
ता कै कछू नाही डरु जमा ॥३॥
जा कै हिरदै दीओ गुरि नामा ॥
कहु नानक ता कै सगल निधाना ॥४॥३४॥१०३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (प्रभू की रजा में चलने के कारण) जिस मनुष्य के हृदय में हरेक दुख सुख एक जैसा ही प्रतीत होता है~ उसे कोई चिंता-फिक्र कभी दबा नहीं सकती। 1। (हे भाई !) परमात्मा के भगत के हृदय में (सदा) आत्मिक अडोलता बनी रहती है~ (सदा) आत्मिक आनंद बना रहता है। (हरी का भक्त) हरी-प्रभू की आज्ञा में ही चलता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) चिंता-रहित परमात्मा जिस मनुष्य के हृदय में आ बसता है~ उसे कभी कोई चिंता नहीं सताती। 2। जिस मनुष्य के मन से भटकना खत्म हो जाती है~ उसके मन में मौत का डर नहीं रह जाता। 3। हे नानक ! कह, गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम टिका दिया है उसके अंदर~ जैसे~ सारे खजाने आ जाते हैं। 4। 34। 103।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਗਮ ਰੂਪ ਕਾ ਮਨ ਮਹਿ ਥਾਨਾ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕਿਨੈ ਵਿਰਲੈ ਜਾਨਾ ॥੧॥
ਸਹਜ ਕਥਾ ਕੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕੁੰਟਾ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸੁ ਲੈ ਭੁੰਚਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਹਤ ਬਾਣੀ ਥਾਨੁ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਤਾ ਕੀ ਧੁਨਿ ਮੋਹੇ ਗੋਪਾਲਾ ॥੨॥
ਤਹ ਸਹਜ ਅਖਾਰੇ ਅਨੇਕ ਅਨੰਤਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੇ ਸੰਗੀ ਸੰਤਾ ॥੩॥
ਹਰਖ ਅਨੰਤ ਸੋਗ ਨਹੀ ਬੀਆ ॥
ਸੋ ਘਰੁ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕ ਕਉ ਦੀਆ ॥੪॥੩੫॥੧੦੪॥
ਅਗਮ ਰੂਪ ਕਾ ਮਨ ਮਹਿ ਥਾਨਾ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕਿਨੈ ਵਿਰਲੈ ਜਾਨਾ ॥੧॥
ਸਹਜ ਕਥਾ ਕੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕੁੰਟਾ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸੁ ਲੈ ਭੁੰਚਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਹਤ ਬਾਣੀ ਥਾਨੁ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਤਾ ਕੀ ਧੁਨਿ ਮੋਹੇ ਗੋਪਾਲਾ ॥੨॥
ਤਹ ਸਹਜ ਅਖਾਰੇ ਅਨੇਕ ਅਨੰਤਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੇ ਸੰਗੀ ਸੰਤਾ ॥੩॥
ਹਰਖ ਅਨੰਤ ਸੋਗ ਨਹੀ ਬੀਆ ॥
ਸੋ ਘਰੁ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕ ਕਉ ਦੀਆ ॥੪॥੩੫॥੧੦੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
अगम रूप का मन महि थाना ॥
गुर प्रसादि किनै विरलै जाना ॥१॥
सहज कथा के अंम्रित कुंटा ॥
जिसहि परापति तिसु लै भुंचा ॥१॥ रहाउ ॥
अनहत बाणी थानु निराला ॥
ता की धुनि मोहे गोपाला ॥२॥
तह सहज अखारे अनेक अनंता ॥
पारब्रहम के संगी संता ॥३॥
हरख अनंत सोग नही बीआ ॥
सो घरु गुरि नानक कउ दीआ ॥४॥३५॥१०४॥
अगम रूप का मन महि थाना ॥
गुर प्रसादि किनै विरलै जाना ॥१॥
सहज कथा के अंम्रित कुंटा ॥
जिसहि परापति तिसु लै भुंचा ॥१॥ रहाउ ॥
अनहत बाणी थानु निराला ॥
ता की धुनि मोहे गोपाला ॥२॥
तह सहज अखारे अनेक अनंता ॥
पारब्रहम के संगी संता ॥३॥
हरख अनंत सोग नही बीआ ॥
सो घरु गुरि नानक कउ दीआ ॥४॥३५॥१०४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (जिस मन में सिफत सालाह के चश्मे जारी हो जाते हैं) उस मन में अपहुँच स्वरूप वाले परमात्मा का निवास हो जाता है। (पर) किसी विरले मनुष्य ने गुरू की कृपा से (ये भेद) समझा है। 1। आत्मिक अडोलता और सिफत सलाह के अमृत के चश्मों का आनंद जिस मनुष्य के भाग्यों में प्राप्ति का लेख होता है वह (गुरू की कृपा से) पाता है। 1। रहाउ। (जहाँ सिफत सालाह और आत्मिक अडोलता के चश्मे चल पड़ते हैं) उसका हृदय-स्थल एक-रस सिफत सालाह की बाणी की बरकति से अनोखा (सुंदर) हो जाता है। उसकी जुड़ी सुरति पर परमात्मा (भी) मोहित हो जाता है। 2। वहाँ- आत्मिक अडोलता के अनेकों और बेअंत अखाड़े रच के रखते हैं जहाँ – संत जन परमात्मा के चरणों में जुड़ जुड़ें होते हैं । 3। (उस अवस्था में) बेअंत खुशी ही खुशी बनी रहती है~ किसी तरह की अन्य कोई चिंता फिक्र नहीं। (हे भाई !) गुरू ने वह आत्मिक ठिकाना (मुझे) नानक को (भी) बख्शा है। 4। 35। 104।
ਗਉੜੀ ਮਃ ੫ ॥
ਕਵਨ ਰੂਪੁ ਤੇਰਾ ਆਰਾਧਉ ॥
ਕਵਨ ਜੋਗ ਕਾਇਆ ਲੇ ਸਾਧਉ ॥੧॥
ਕਵਨ ਰੂਪੁ ਤੇਰਾ ਆਰਾਧਉ ॥
ਕਵਨ ਜੋਗ ਕਾਇਆ ਲੇ ਸਾਧਉ ॥੧॥
गउड़ी मः ५ ॥
कवन रूपु तेरा आराधउ ॥
कवन जोग काइआ ले साधउ ॥१॥
कवन रूपु तेरा आराधउ ॥
कवन जोग काइआ ले साधउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी मः ५ ॥ मैं नहीं जानता कि) तेरा वह कौन सा रूप है जिसका मैं ध्यान धरूँ। (हे प्रभू ! मुझे समझ नहीं कि) जोग का वह कौन सा साधन है जिससे मैं अपने शरीर को वश में ले आऊँ (और तुझे प्रसन्न करूँ)। योग साधना के साथ तुझे खुश नहीं किया जा सकता। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 186 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 186” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 187 →, पीछे का: ← अंग 185।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।